चित्रोत्पला गंगा के त्रिवेणी संगम पर-“राजिम कुंभ” (कुछ झलकियाँ)
ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 30 जनवरी 2010प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक - शिल्पाचार्य विश्वकर्मा जयंती पर विशेष(ललि्त शर्मा)
ब्लॉ.ललित शर्मा, बृहस्पतिवार, 28 जनवरी 2010गणतंत्र दिवस की झलकियां-गाँव की सुबह के साथ(ललित शर्मा)
ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, 26 जनवरी 2010बुरे लोगों की संगति का फल तो भुगतना ही पड़ता है.!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, 25 जनवरी 2010एक किसान के खेत में कौंवों का एक विशाल झुण्ड आ जाता और उसकी फसल तहस-नहस कर देता. इससे किसान इन कौंवों से परेशान था. उसने खेत में कई बार कपड़ों के पुतले खड़े किये, किन्तु कौंवें उसके धोखे में नहीं आये. उन्होंने पुतलों को भी चीर फाड़ डाला.
जब किसान बेहद दुखी हो गया तो उसने खेत में जाल बिछा दिया.जाल ऊपर उसने अनाज के कुछ दाने बिखेर दिये. कौंवों की नजर दानों पे पड़ी तो बिना सोचे समझे दानो पर टूट पड़े. जैसे ही वे दाने चुगने के लिए नीचे उतरे, सब-के-सब जाल में फँस गए.
किसान जाल में फंसे कौंवों को देख कर बहुत खुश हुआ. उसने कहा"आज फंसे हो मेरे चंगुल में,दुष्टों! अब मैं तुममे से किसी को नहीं छोडूंगा."
तभी किसान को एक करुण आवाज सुनी दी. उस सुनकर किसान को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने ध्यान से जाल में देखा तो कौंवों के साथ उसमे एक कबूतर भी फंसा हुआ था.
किसान ने कबूतर से कहा "अरे! इस टोली में तू कब से शामिल हो गया? पर मैं तुझे भी छोड़ने वाला नहीं हूँ. क्योंकि तू बुरे लोगों की संगत करता है. बुरे लोगों की संगति का फल तो तुझे भुगतना ही होगा. इसके बाद किसान ने अपने शिकारी कुत्तों को इशारा कर दिया......................
Promoted By :ram और shyamand aurएवम goodको
पापी ! तूने मुझे बेकार मरवा दिया.!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, रविवार, 24 जनवरी 2010खंडहर हुए इन्द्र प्रस्थ में धृतराष्ट्र की तरह राज करना!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 23 जनवरी 2010गधे का क्या अंजाम हुआ?
ब्लॉ.ललित शर्मा, शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
एक पुरानी कहानी पर चलते हैं. एक धोबी के पास एक गधा था. वह उसका बहुत ख्याल रखता था. मगर गधा दिन प्रतिदिन सूखता जा रहा था. धोबी ने सोचा कि इसका पेट भरने का उचित प्रबंध नहीं हुआ तो यह मर जायेगा. तभी उसके दिमाग में एक नई योजना आ गई.क्या आप इसे जानते? पढिए
ब्लॉ.ललित शर्मा, बृहस्पतिवार, 21 जनवरी 2010- मनुष्य के नेत्र गोलों का वजन 28 ग्राम होता है।
- हमारे शरीर मे कार्निया ही एक ऐसा जीवित भाग है, जिसमे रक्त वाहिनी नहीं होती।
- शरीर की सबसे छोटी हड्डी का नाम "स्टेप्स" है, जो कान मे होती है।
- मनुष्य के सिर का वजन औसतन 8 पौंड होता है।
- हमारे चेहरे मे कुल 14 हड्डियाँ होती हैं।
- मानव हृदय मे दबाव को उत्तपन्न की इतनी शक्ति होती है कि वह रक्त को 30 फ़िट तक फ़ेंकता है।
- हमारा हृदय साल भर मे 3,70,00,000 बार धड़कता है। जीवन भर मे ढाई लाख बिलियन(एक बिलियन=10करोड़) तक्।
- जब हम भी छींकते हैं, उस दौरान शरीर कार्य करना बंद कर देता है, यहां तक हृदय भी कार्य करना बंद कर देता है।
- मनुष्य की त्वचा मे से प्रति घंटा 6,00,000 कण झड़ते हैं और डेढ पौंड पुरे साल में
- हाथों मे कलाई सहित 54 हड्डियाँ होती हैं।
- जांघ की हड्डी हमारे शरीर की सबसे मजबुत हड्डी होती है।
- हम साल भर मे 84 मिलियन (एक मिलियन=10 लाख)बार पलकों को झपकाते हैं।
- मानव शरीर की 3 सौ मिलियन कोशिकाएं हर एक मिनट मे नष्ट होती हैं।
- मनुष्य की बाहरी त्वचा की कोशिकाएं झड़ंने और पुन: बढने की प्रक्रिया 27 दिन की होती है। पुरे जीवन मे 1000 बार नयी त्वचा आती है।
- जानते हैं! हमारे पैर का बड़ा अंगुठा सिर के लिए प्रेशर प्वाईंट का काम करता है। यानी पैर का अंगुठा दबाओ सिर दर्द से मुक्ति पाओ।
- मनुष्य के पैरों की जोड़ी मे 2,50,000 पसीने की ग्रंथियां होती हैं।
- हम हमारी जीभ से लगभग 9000 तरह के स्वाद ले सकते है।
- एक अनुमान के आधार पर हम अपने पुरे जीवन मे 16,000 गैलन पानी पीते हैं।
- हमारे छींकने से निकलने वाली हवा की गति 100 मील प्रति घंटा होती है।
- सर्व प्रथम डॉ डेनियल हॉल विलियम्स के द्वारा 1893 में दिल की सर्जरी की गयी थी।
दिल से दिल की राह होती है!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, बुधवार, 20 जनवरी 2010तुझे जलेबियाँ खानी है?
ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, 19 जनवरी 2010
आँखों में क्या है? जरा झांक के देखो?
ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, 18 जनवरी 2010आँखों में क्या है?
पिता की आँखों में- फर्ज
माता की आँखों में - ममता
भाई की आँखों में- प्यार
बहन की आँखों में- स्नेह
अमीर की आँखों में- घमंड
गरीब की आँखों में- आशा
मित्र की आँखों में- सहयोग
दुश्मन की आँखों में- बदला
सज्जन की आँखों में- दया
गुरु की आँखों में - प्रेम
शिक्षक की आँखों में- ट्यूशन
शिष्य की आँखों में- आदर
पत्नी की आँखों में - सावन
पति की आँखों में- उम्मीद
प्रेमिका की आँखों में - चमक
नेता की आँखों में - धूर्तता
ब्लोगर की आँखों में - जूनून
एक बार दाढ़ी हिला दो महाराज!
ब्लॉ.ललित शर्मा, रविवार, 17 जनवरी 2010कलयुगी गुरु-चेला !
ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 16 जनवरी 2010वो सबको मुर्ख बनाता है!
Br.Lalit Sharma, शुक्रवार, 15 जनवरी 2010उस गधे का क्या हुआ?
ब्लॉ.ललित शर्मा, बृहस्पतिवार, 14 जनवरी 2010
एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन बगदाद यात्रा पर जा रहे थे. एक गांव से गुजर रहे थे तो एक बूढे किसान से १०० रूपये में एक गधा खरीद लिया, किसान ने कहा की अगले दिन आकर ले जाना, मैं गधा दे दूंगा.
अगले दिन नसीरुद्दीन पहुंचे तो
किसान बोला-"बुरी खबर है, गधा पिछली रात मर गया."
तो नसीरुद्दीन बोले-"पैसा वापस कर दो"
किसान बोला "लेकिन पैसे तो मै कल रात में ही खर्च कर बैठा हूँ."
मुल्ला नसीरुद्दीन बोले " ठीक है, मुझे मरा हुआ गधा ही दे दो."
"तुम उसका क्या करोगे?" किसान ने पूछा.
"मैं उसे पर्ची डाल कर बेचने वाला हूँ"
"तुम एक मरे हुए गधे को कैसे बेच सकते हो?"
"बिलकुल बेच सकता हूँ, बस तुम देखते जाओ"
एक महीने बाद यात्रा से लौट कर मुल्ला नसीरुद्दीन फिर उसी रास्ते से गुजारे और उसी गांव में ठहरे. किसान मिला और
उसने पूछा "उस गधे का क्या हुआ?"
"मैंने तो उसे बेच दिया. तम्बू लगाया,गधा छुपाया, दो रूपये में गधा ले लो कहकर दो-दो रूपये के ५०० टिकिट बेच दिये. ड्रा निकाला और ९९८ रूपये कमा लिए."
किसान ने पूछा- कैसे? किसी ने शिकायत नहीं की?
"हां की थी केवल उसने जिसका टिकिट खुला था. मैंने उसके दो रूपये वापस कर दिये.
क्यों कैसी रही?
संगीता पूरी जी और पंडित डी.के.वत्स जी से एक सवाल?
ब्लॉ.ललित शर्मा, बुधवार, 13 जनवरी 2010मांग! क्या मांगता है?
ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, 12 जनवरी 2010नवाब गाजीउद्दीन के समय की बात है. लखनऊ के गोलागंज में संगीत के एक धुरंधर उस्ताद हैदरी खान रहते थे. वह चूँकि बैजू बावरा की तरह खोये-खोये से रहते थे इसलिए उनका नाम "सिड़े हैदरी खां" मशहूर हो ग्या.
नवाब साहब ने उनका नाम सुना तो उनका गाना सुनने के लिए बेताब हो गए. पर कभी ऐसा मौका हाथ नहीं आया. एक दिन शाम को गाजीउद्दीन दरिया के किनारे सैर के लिए निकले. रोमी दरवाजे के नीचे उनके कारिंदों ने "सिड़े हैदरी खां" को जाते देखा तो नवाब साहब से अर्ज किया
" कब्ला-ए-आलम!वह जा रहे हैं हैदरी खां."
नवाब साहब तो उत्सुक थे. हुक्म दिया "बुलाओ".
कारिंदे पकड़ कर लाये और सामने खड़ा कर दिया.
नवाब साहब ने कहा "अरे मियां हैदरी खां, हमें अपने कभी अपना गाना नहीं सुनाया".
वह बोले "जरुर सुनाता, मगर मुझे आपका मकान मालूम नहीं है."
नवाब साहब सुनकर हंस पड़े और कहा," अच्छा हमारे साथ चलो, हम खुद तुम्हे अपने मकान पर ले चलेंगे.".....
"बहुत खूब'. इतना कहकर वह नवाब साहब के साथ चल दिये.
इतर मंजिल के करीब पहुँच कर अचानक हैदरी खां ने कहा "मैं चलता तो हूँ मगर पुरियां और बालाई खिलवाईयेगा तभी गाऊंगा."
नवाब साहब ने वादा किया की पेट भर खिलावायेंगे. महल में पहुँच कर उनका गाना सुना तो नवाब साहब मस्त हो उठे. उनको हाल आने लगा और बेसुध हो गये. यह हालत देखकर हैदरी खां खामोश हो गए. थोड़ी देर में वापस अपने हाल पर आने के बाद
नवाब साहब ने फिर गाने को कहा तो.......
हैदरी खां बोले " हुजुर आपके पेचवान में भरा तम्बाखू बहुत अच्छा मालूम होता है, आप किसकी दुकान से मंगवाते हैं?"
गाजीउद्दीन हैडर खुद सिड़ी मशहूर थे. इस सवाल पर नाराज हुए ......
तो मुसाहिबों ने धीरे से अर्ज किया " किब्ला-ए-आलम! यह पक्का सिड़ी है. अभी तक यह नहीं समझा है किस्से बातें कर रहा है."
नवाब के इशारे पर लोग हैदरी खां को दुसरे कमरे में ले गए, पुरियां बालाईं खिलवाई, हुक्का पिलवाया, उन्होंने पाव भर पुरीयाँ आधा पाव बालीं और थोड़ी सी शक्कर अपनी बीबी के लिए भिजवाई.
उधर नवाब साहब जाम पर जाम चढ़ाये जा रहे थे. जब नशे का जोर हुआ तो हैदरी खां की फिर याद आई. उसे बुलाकर गाने का हुक्म दिया. जैसे ही हैदरी खां ने गाना शुरू किया.....
तो नवाब साहब ने रोक कर कहा "हैदरी खां सुनते हो. अगर गाने से मुझे खाली खुश किया और रुलाया नहीं तो याद रखो गोमती में डूबवा दूंगा."
हैदरी खां चक्कर खा गये उनको समझ में आया कि यह तो बादशाह है. कहा हुजुर "अल्लाह मालिक है" कह कर जी तोड़ गाने लगे.
खुदा की कुदरत थी या हैदरी खां की जिन्दगी थी. गाने का ऐसा असर हुआ कि थोड़ी देर में नवाब साहब रोने लगे. खुश होकर बोले "हैदरी खां! मांग, क्या मांगता है?"
हैदरी खां ने अर्ज किया "जो मांगूंगा, दीजियेगा"
नवाब साहब ने वादा किया तो हैदरी खां ने तीन बार हामी भरवा कर कहा " हुजुर! मैं यह मानता हूँ कि मुझे फिर कभी न बुलवाईयेगा और न गाना सुनियेगा."
हैदरी खां सम्भल कर बोले "आपका क्या? कहीं मुझे मरवा दिया तो मुझ जैसा हैदरी खां न पैदा होगा और आप मर जायेंगे तो फ़ौरन दूसरा बादशाह आपकी जगह ले लेगा."
इस बात पर नाराज होकर नवाब साहब ने मुंह फेर लिया . यह मौका पाते ही हैदरी खां अपनी जान लेकर भागे और सीधे घर पहुँच कर ही दम लिया.
परिवार नियोजन केंद्र के बाहर बोर्ड लगा है!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, 11 जनवरी 2010आज कुछ हल्का फुल्का हो जाये-राजीव जी की कथा पढ़ के आ रहा हूँ कुछ तो असर होगा.
(१)
परिवार नियोजन केंद्र के बाहर बोर्ड लगा है.
"अपने माँ-बाप की गलतियों से सबक लें. परिवार नियोजन के उपाय करें."
(२)
चंदू का नर्सरी में एडमिशन के लिए इंटरव्यू चल रहा था.
"तुम्हारे पापा क्या करते हैं?" इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमेन ने कहा.
"जी वही जो मम्मी करती है" चंदू ने बताया.
"और मम्मी क्या करती हैं?" चेयरमेन ने आगे पूछा
"वही जो पड़ोस की स्वीटी आंटी कहती है" चंदू ने आगे बताया
"तो इसका मतलब यह हुआ की तुम्हारे पापा अल्टीमेटली स्वीटी आंटी
को फालो करते हैं, हमेशा उनके पीछे जाते हैं"
इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमेन ने चंदू को फंसाने की कोशिश की.
"जी सच तो यही है, पर जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो मम्मी मेरी पिटाई कर देती है".
चंदू ने अपनी प्राब्लम साफ कर दी.
उन्होंने जनेऊ तोड़ दिया.....!!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, रविवार, 10 जनवरी 2010
एक दिन खेत में मजदूरन चीख रही थी. दिवेदी जी उधर से गुजर रहे थे. देखा कि उस महिला को साँप ने काट लिया है. उन्होंने तुरंत जनेऊ तोड़ कर घाव चीर कर उस पर कस कर अपना जनेऊ बांध दिया ताकि जहर ना फैले. कुछ देर बाद ग्राम वासी आये. सब कुछ देख-समझने के बाद द्विवेदी जी को भली-बुरी सुनाई "आप ब्राह्मण हैं और यह महिला अछूत है और आपने पवित्र जनेऊ तोड़ डाला और जनेऊ इसके पांव में बांध दिया.............कुछ तड़फ़ कुछ झड़प अपने गाँव की---------- ललित शर्मा
ब्लॉ.ललित शर्मा,जब से अपना गाँव छोड़ के बाद दूसरे गाँव के बाशिंदे हुए तब से अपने तन-मन को नोचवा रहे हैं। नए गाँव में भ्रमण करते हुए एक बरस बीत गया। इस गाँव का हाल-चाल भी हमारे गाँव जैसा ही है। गांव सारे एक जैसे ही होते है, यहां आकर पता लगा,पहट से ही दूनिया शुरु हो जाती है। आप सूते रहिए और इधर धड़ा-धड़ लेन-देन चालु हो जाता है। परबतिया भौजी भोर में ही सिर पर तगाड़ी धरे घुमती है,चार छ: सुअर हमेशा उनके साथ घुमते हैं,कुछ तो मिल जाएगा, घुमने के लाने, गाँव में भी भोर में गोबर-कचरा और गोठान सफ़ाई का काम चालु हो जाता है। गाँव में अपने गोठान का कचरा अपने घूरे में ही फ़ेंका जाता है। अपना माल अपने ठिकाने पर लगाया जाता है। लेकिन इस गाँव में बड़े समझदार लोग हैं अपने दिमाग का गोबर-कचरा दूसरे के घर दूवारी में फ़ेंक आते हैं। अब वह बेचारा सुबह-सुबह अपने दूवारी पर पड़े गोबर कचरा को देख कर माथा पीट लेता है और धुलाई-सफ़ाई के साथ गंगा जल छिड़क कर सतनारायण भगवान का कथा कराता है। दान दक्षिणा का खर्चा और बढ जाता है।
“मार कर मेरे पत्थर छिपा कौन है, बोलता भी नहीं है वो मूआ कौन है?’ बस ऐसा ही कंडिशन है। एक बार गांव में घूमते-घूमते चौक में पहुंच गए। वहां देखा कि 30-40 लोगों का नाम लिखा हुआ है। जिज्ञासावश हमने पढा तो हमारा भी नाम लिस्ट में था। हम भौंचक रह गए कर्जा माफ़ी के बाद कापरेटिव बैंक से रिकवरी कैसे निकल गया फ़िर से। जब ध्यान से पढा तो लिखा था कि “ये नौकरी करने वाले लोग इतना पैसा कहां से पाते हैं जो इस पढे लिखे लोगों के गाँव में आ गए?” बहुत बड़ा प्रश्न वाचक चिन्ह था। हमने तो आज तक किसी ससुर की नौकरी नहीं करी। हमारे घर में गोबर-कचरा से लेकर झाड़ू बुहारी तक नौकर ही नौकर हैं। फ़िर भी लिस्ट में हमारा नाम था। दुबारा जब वहाँ पहुंचे तो वह चौक ही गायब मिला, जहाँ लिस्ट लगी थी। झाड़ पोंछ के चकाचक हो गया था। हम अपना समय और पैसा खर्चा करके घर दूवार बसाएं हैं। किसी के बाप का खर्चा से नहीं। हमें तो पता नहीं था ऐसे भी चोट्टे लोग भी इस गाँव में हैं। लेकिन साल भर में सबको पहचानने का मौका मिल गया।
गाँव में एक पटवारी साहेब भी हैं, जो अपना तोप यदा-कदा इधर उधर दागते रहते हैं। कभी किसी का खेत एक जरीब ज्यादा नाप देते हैं तो किसी को आबादी का ढाई डिसमिल का पट्टा दे देते हैं। गुमास्ता जो ठहरे। लोग लल्लो-चप्पो में लगे रहते हैं। एक बार हम नहर के किनारे-किनारे उषा पान के लिए जा रहे थे। देखा की तीन चार जवान लड़के नहर में नंगे नहा रहे हैं। हमने भी अपनी गाँव की आदत के हिसाब से पूछ ही लिया कि-“ तुम लोग कौन हो? नंगा नहाते शरम नहीं आती? तो एक लड़का बोला-“ तुम मेरे को नहीं पहचानते क्या? हमने कहा-“नहीं। तो वो गर्व से बोला-“ मैं पटवारी का लड़का हूँ।“ हमने कहा कि-“ शाब्बास! बहुत सार्थक काम कर रहे हो। अरे तुम नंगे नहीं नहाओगे तो और कौन नहाएगा? कल से पूरा खान-दान नंगा नहाए करो। अपने भाई बहिनी महतारी को भी लेकर आ जाना। कम से कम पटवारी का रौब दाब तो दिखेगा गाँव वालों को।
गाँव में डागदर बाबू हैं। एक तो आर एम पी हैं और अपने नाम के आगे डागदर लगाते हैं। गाँव में चांदसी दुवाखाना खोल रखे है। बवासीर और भगंदर का इलाज करते हैं। नीम हकीम खतरे जान। एक बार कोई छठी के निमंत्रण पत्र में इनके नाम के आगे डागदर लिखना भूल गया था। तो उसको बहुत गरियाए और पेनेसिलिन का इंजेक्शन महाराज को ठोंक दिए। दूसरे डागदर हैं कीट विज्ञानी। इनको दूर से देख कर पता चल जाता है कि किसके दिमाग में कौन सा कीट रेंग रहा है और उसे मारने के लिए कौन सा कीटनाशक लगेगा?एक दिन बताया कि हमारे ही दिमाग में कीट प्रवेश कर गया तब से एक एन्टीवायरस खरीदे और पूरे दिमाग को दो महीने स्केन किया। तब कहीं चलने के लायक हुआ। तब से हम तो डर के मारे पीठ पर कीटनाशक स्प्रेयर लादे फ़िर रहे हैं। जहां भी जाते हैं बैठने से पहले कीट्नाशक का छिड़काव कर लेते हैं। एक डागदर साहब हैं वह मरीजों को भजन सुनाते हैं जब से हरिदुवार से होकर आएं हैं श्रीराम श्री राम जपते हैं। जब भी मिलते हैं दो दोहे ठोक ही देते हैं और हम अपने बाल नोचते रहते हैं कि सुबह-सुबह किस मरदूद से पाला पड़ गया।
अब कहते हैं न जैसा आदमी होता है वैसे ही उसके मित्र भी मिल जाते हैं। हम ठहरे सीधे-साधे गंवई आदमी। इस नए गाँव में भी हमको ऐसे ही यार-दोस्त, भाई-भौजाई, बहन बहनोई, माँ-बाप, सास-ससुर आदि रिश्ते नाते मिल गए। एक परिवार हमारा यहाँ भी तैयार हो गया। हाँ कुछ साले भी मिले। कभी कभी हमारी बेवजह खाट खड़ी करने को तैयार रहते हैं। साले ठीक से सोने भी नहीं देते। हमारे बेड रुम में ही डेरा डाल देते हैं। का बताएं जब तक रहते हैं तब तक हमें बैठक के तखत पर ही सोना पड़ता है। जो डनलप का गद्दा उनके बाप ने दिया था उसका पूरा उपयोग करते हैं। हम भी कुछ नहीं कह पाते। वे जीजा-जीजा कहते हैं पर हम साला भी नहीं कह पाते, पता नहीं कब बुरा मान जाएं। इसलिए सालिगराम जी कहते हैं। उनकी बहन हमारे आंगन की तुलसी है और वे हमारे तुलसी चौरा के सालिग राम।
ये अत्याचार कब तक सहेगें? एक बार तो हम गाँव छोड़ कर भाग ही लिए थे। जैसे कृष्ण रण छोड़ हो गए थे, हम भी रण छोड़ दास हो गए,गाँव के दोस्तों और रिश्तेदारों ने बहुत मान मनौवल किया तब वापस आए। गाँव के कुछ निठल्ले लोग जो चौक चौराहे पर बैठ कर ताश खेलते रहते हैं उनको हमारा याराना रास नहीं आता। जब देखो तब अपनी बोफ़ार्स तोप से गोला दागते रहते हैं। अब हमने भी बोफ़ार्स तोप बिसाने की सोच लिया है। अभी तोप कारखाने का भ्रमण करके आए हैं। शीघ्र ही ऑडर दे रहे हैं। बोफ़ार्स तोप का खासियत यह है कि ये तोप गोला छोड़ने के बाद अपना स्थान छोड़ देती है और मुंह घुमाकर खड़ी हो जाती है जैसे इसने कुछ भी नहीं किया हो और गोला किसी ने छोड़ा हो। तो भैया गाँव की भाषा में कहें तो किसकी बाड़ी-बखरी में कौन हग आया पता ही नहीं चलता वैसा ही बोफ़ार्स का हाल है। मायावी लोगों से निपटने के लिए मायावी यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती ही है।
अभी पराए देश से एक अपने शहरी बाबू आ गए। हमने मित्र मंडली बैठा ली। पहले जब बैठते थे तो मदरस से ही काम चला लेते थे। लेकिन विलायती बाबू के सामने काहे इज्जत खराब करें सोचकर विलायती पर हाथ आजमा लिया। अब मारे खुशी के गाँव में भी बता दिया। चौक पर बैठे ताश खेलने वाले निठल्ले जल भुन गए। अब कहना शुरु कर दिया कि ग्राम पंचायत की बैठकी में इन्होने विलायती रस पान किया है। हम कौन सा झूठ बोल रहे हैं? हमने किया है तो किया है। तुम्हारे जैसे मुंह छुपा कर तो नहीं किया? “दिन में राम भजत है और रात हनत है गाय।“ दोहरा चरितर नहीं है हमारा। अगर तुम्हारे में कूबत हो तो तुम भी करो कौन मनाही है? अभी बेलंटाईन डे आ रहा है,पार्टी का जश्न भी होगा। पतुरिया भी नाचेगी, ठुमका भी लगाएगी। हम भी मौज लेगें।बेलंटाईन डे का परम्परागत ढंग से स्वागत जो करना है। समारोह में मित्रों को भी आमंत्रित किया है। बिलायती नहीं सही,देशी महुआ सही। सबका यथा योग्य स्वागत किया जाएगा। सभी को आगामी बेलंटाईन डे का बधाई। बुड्ढे-बुड्ढी और नवजवान सभी मौज मनाओ।
गीत अधुरा रह गया!!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 9 जनवरी 2010
आज एक स्मरण पर चलते हैं. गुरुदेव रविन्द्र नाथ मृत्यु शैया पर अंतिम सांसे ले रहे थे. तभी एक व्यक्ति आकर कहने लगा-" धन्य हैं आप! आपने जीवन सार्थक कर लिया. छ: हजार गीत रचे. आप तो तृप्त हो गए. संसार के लिए एक अनूठी धरोहर छोड़ी है आपने".ब्लॉग का आई कान लिंक डेस्क टॉप पर बन सकता है क्या?
ब्लॉ.ललित शर्मा, शुक्रवार, 8 जनवरी 2010सफलता कैसे मिले?
ब्लॉ.ललित शर्मा, बृहस्पतिवार, 7 जनवरी 2010पीने वालों के लिए खुशखबरी-नए साल में !!!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, बुधवार, 6 जनवरी 2010
नया साल आया तो अपने साथ पीने वालों के लिए खुशखबरी भी लेकर आया है. नए साल के पहले सप्ताह में ही एक अच्छी खबर आ गई. लेकिन यह अच्छी खबर इससे वास्ता रखने वालों के लिए ही है. हमने देखा है कि दो पैग ज्यादा होने पर पीने के बाद लोग बहक जाते हैं. उसके बाद इसके नशे में कुछ का कुछ हो जाता है "जाना था रंगून पहुँच गए चीन सुकू-सुकू". फिर जूतम पैजार की नौबत आ जाती है. फिर थाना, कचहरी, जेल तक मामला पहुँच जाता है. अगर ना पहुंचे तो फिर सुबह का हैंग ओवर परेशान कर देता है. काम में दिल नहीं लगता क्या करूँ.? सर दुःख रहा है. एक डिस्प्रिन ले ली जाये.साहित्य एक तपस्या है, साधना है!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, मंगलवार, 5 जनवरी 2010- इंग्लैण्ड के राष्ट्र कवि जोन मेसफिल्ड ने कहा है- मैं १७-१८ वर्ष का था जब मुझे कवि बनने की धुन सवार हुयी, परन्तु मेरी कविताओं की तरफ कोई आँख उठा कर नही देखता था. मैं धीरज छोड़ चूका था. संयोग वश मैंने कहीं एक कविता पढ़ी जिसमे लिखा था-केवल चाहने और हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से कोई महान नहीं बन सकता. मछली भगवान भेजता है, परन्तु जाल तुम्हे ही फेंकना पड़ता है.
- मेस फिल्ड कहते हैं-ये पंक्तियाँ मेरे मन में पैठ गई. मैंने फिर कठोर परिश्रम करना प्रारंभ किया और कई मास की साधना के बाद एक एईसी कविता लिख पाया जो प्रकाशक ने स्वीकार कर ली. कई वर्षों तक मेरी फुटकर कवितायेँ और छोटी कहानियां ही छपती रही. इसी बीच महाकवि यीट्स ने मुझे सलाह दी कि तुम कोई ग्रन्थ या महाकाव्य लिखो और मैं ग्रन्थ लिखने में लग गया. परन्तु मुझे इसमें सफलता नहीं मिली. मेरी हिम्मत टूट कर बिखर गई. मैंने उपर्युक्त पंक्तियों का फिर स्मरण किया और काम में जुट गया. दस वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद मेरा प्रथम उपन्यास प्रकाशित हुआ. जिसकी आलोचकों और यीट्स ने भी सराहना की.
- अमेरिकी साहित्यकार कर्नल वुड को अपनी एक रचना पर लग-भग चार हजार रूपये का पारिश्रमिक मिलता था. जब संपादक पीज ने उन्हें बताया कि उनकी पत्रिका "पैसिफिक मंथली" अर्थाभाव के कारण बंद होने वाली है तो वुड ने वचन दिया कि वे अपनी रचनाएँ कहीं और ना भेज कर केवल इसी पत्रिका को भेजेंगे. चार वर्ष तक वुड इस पत्रिका को बिना कुछ पारिश्रमिक लिए अपनी रचनाएँ भेजते रहे. एक अंक में कभी-कभी तो उनकी दस-दस रचनाएँ रहती थी चूँकि एक ही व्यक्ति के नाम से कई-कई रचनाएँ अच्छी नहीं लगती, अत: वुड ये रचनाएँ छद्म नाम से लिखते थे.
- ज्वायस की रचनाएँ प्रथम बर जब एक पत्रिका ने प्रकाशनार्थ स्वीकृत की तो उनकी आयु चालीस वर्ष हो चुकी थी. "युलिसिस" लिखने में तो उन्हें पुरे बीस साल लगे.
- नोबल पुरस्कारों के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल साहित्यकार भी थे. उनके एक नाटक नेमिसिस की तीन प्रतियों को छोड़ कर बाकी सभी प्रतियाँ उनके उत्तराधिकारियों ने फूंक दी, क्योंकि नाटक का स्तर इतना गिरा हुआ था कि उससे नोबेल जनता की निगाहों से गिर जाते.
दीवारें भी चमकेंगी नई रौशनी से! "एक नया अविष्कार"
ब्लॉ.ललित शर्मा, सोमवार, 4 जनवरी 2010तुर-तुर-तुर-तुरतुरिया!!!
ब्लॉ.ललित शर्मा, शनिवार, 2 जनवरी 2010
माता गढ़ नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है. जहाँ पर महाकाली विराजमान हैं. नदी के दूसरी तरफ एक ऊँची पहाडी है. इस मंदिर पर जाने के लिए पगडण्डी के साथ सीडियां भी बनी हुयी हैं.माता गढ़ में कभी बलि प्रथा होने के कारण बंदरों की बलि चढ़ाई जाती थी. लेकिन अब पिछले 15 -20 सालों से बलि प्रथा बंद है. अब यहाँ सिर्फ सात्विक प्रसाद चढ़ाया जाता है. माता गढ़ में एक स्थान पर वाल्मिकी आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में जानकी कुटिया है. यह एक लोक मान्यता है.120 दिन 356 पोस्ट- स्वागत 2010- हार्दिक बधाई
ब्लॉ.ललित शर्मा, शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
इस यात्रा में मेरे सहयोगी बने उनमे प्रथम नाम संजीव तिवारी जी का ही आता हैं. उनसे मेरी मुलाकात नेट पर ही हुयी उन्होंने मुझे ब्लागिंग की बारीकियों के विषय में अवगत कराया. फिर समीर लाल जी ब्लॉग पर पहुचे अपने उड़ान तश्तरी लेकर. तब लेकर उनसे रोज दुआ सलाम हो ही जाती है.ताऊ जी रामपुरिया जी का अपार स्नेह प्राप्त हुआ.अनिल पुसदकर भैया, बी.एस. पावला, अविनाश वाचस्पति ,डॉ.सत्यजित साहू. "गिरीशपंकज भैया अलबेला खत्री, आचार्य रूपचंद शास्त्री, निर्मला कपिला , संगीता पूरी , कुसुम ठाकुर, श्रीमती आशा जोगलेकर, अल्पना देशपांडे, बबली, लवली कुमारी,पी.सी. गोदियाल , परमजीत बाली जी, संजीव तिवारी, शरद कोकास, दिनेश राय दिवेदी ,गिरिजेश राव, गिरीश पंकज, राजकुमार ग्वालानी, जी.के अवधिया, खुशदीप सहगल, राजीव तनेजा, पंकज मिश्रा, राज भाटिया. ज्ञान दत्त पांडेय, चिटठा चर्चा वाले अनूप शुक्ल जी ने भी चर्चा में स्थान दिया , हिन्दी चिटठा चर्चा में पंकज मिश्रा जी ने चर्चा की . अजयकुमार झा से मित्रता हुयी., एम् वर्मा, परम जीत बाली, श्यामल सुमन, महेंद्र मिश्रा शिवम् मिश्रा सदा अदृश्य रहें वाले टिप्पू चाचा, मुरारी पारीक, रतन सिंग शेखावत जी, ताऊ जी लट्ठ वाले, रवि रतलामी सूर्यकांत गुप्ता, बाल कृष्ण अय्यर, सुनील कौशल, विवेक रस्तोगी, रवि कुमार रावतभाठा, दीपक तिरुवा महफूज अली अजय कुमार जी.पंडित डी.के.शर्मा"वत्स", का अपार स्नेह मिला.चिट्ठों का कोष
-
▼
2010
(263)
-
▼
January
(29)
- चित्रोत्पला गंगा के त्रिवेणी संगम पर-“राजिम कुंभ” ...
- प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक - शिल्पाचार्य विश्व...
- गणतंत्र दिवस की झलकियां-गाँव की सुबह के साथ(ललित श...
- गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
- बुरे लोगों की संगति का फल तो भुगतना ही पड़ता है.!!...
- पापी ! तूने मुझे बेकार मरवा दिया.!!
- खंडहर हुए इन्द्र प्रस्थ में धृतराष्ट्र की तरह राज ...
- गधे का क्या अंजाम हुआ?
- क्या आप इसे जानते? पढिए
- दिल से दिल की राह होती है!!
- तुझे जलेबियाँ खानी है?
- आँखों में क्या है? जरा झांक के देखो?
- एक बार दाढ़ी हिला दो महाराज!
- कलयुगी गुरु-चेला !
- वो सबको मुर्ख बनाता है!
- उस गधे का क्या हुआ?
- संगीता पूरी जी और पंडित डी.के.वत्स जी से एक सवाल?
- मांग! क्या मांगता है?
- परिवार नियोजन केंद्र के बाहर बोर्ड लगा है!!
- उन्होंने जनेऊ तोड़ दिया.....!!!
- कुछ तड़फ़ कुछ झड़प अपने गाँव की---------- ललित शर्मा
- गीत अधुरा रह गया!!!
- ब्लॉग का आई कान लिंक डेस्क टॉप पर बन सकता है क्या?...
- सफलता कैसे मिले?
- पीने वालों के लिए खुशखबरी-नए साल में !!!!
- साहित्य एक तपस्या है, साधना है!!
- दीवारें भी चमकेंगी नई रौशनी से! "एक नया अविष्कार"
- तुर-तुर-तुर-तुरतुरिया!!!
- 120 दिन 356 पोस्ट- स्वागत 2010- हार्दिक बधाई
-
▼
January
(29)












