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चित्रोत्पला गंगा के त्रिवेणी संगम पर-“राजिम कुंभ” (कुछ झलकियाँ)

आज माघ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है. भगवान राजीव लोचन की नगरी राजिम में कुम्भ मेला प्रतिवर्षानुसार प्रारंभ हो रहा है. तिन नदियों के संगम पर बसा हुआ राजिम प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है. यहाँ चित्रोत्पला गंगा महानदी के किनारे यह कुम्भ मेला भरता है. त्रिवेणी संगम पर भगवान कुलेश्वर महा देव का प्राचीन मंदिर है. छत्तीसगढ़ प्रदेश का यह प्रमुख आयोजन है. यह कुम्भ मेला शिवरात्रि तक चलता है. लाखों श्रद्धालु यहाँ आकर स्नान करते हैं. मंदिरों में दर्शनकर प्रसाद पाते है. यह कुम्भ मेला छत्तीसगढ़ के वासियों की आस्था के साथ जुड़ा है. राजिम कुम्भ की झलक गत वर्ष के चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत है.
कुछ झलकियाँ “राजिम कुंभ” राजीव लोचन मंदिर
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कुलेश्वर महादेव मंन्दिर
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कुलेश्वर महादेव
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नागा साधु
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नागा साधु
Rajim kumbh
शाही स्नान
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मेले का दृश्य
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संत प्रवचन
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फ़ोटो-रोमा कम्प्युटर से साभार (गत वर्ष के चित्र)

प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक - शिल्पाचार्य विश्वकर्मा जयंती पर विशेष(ललि्त शर्मा)


आज माघ सुदी त्रयोदशी है, इस दिन शिल्पाचार्य भगवान विश्वकर्मा की जयंती संसार में धूम धाम से मनाई जाती है. आज भारत के शिल्पियों को मेरा लेख समर्पित है. भारत में शिल्पकार्य का लाखों साल पुराना इतिहास है. आज जिसे हम इंड्रस्ट्रीज कहते हैं उसे वैदिक काल मे शिल्पशा्स्त्र या कला ज्ञान कहते थे। इसके जानने वाले विश्वकर्मा या शिल्पी कहलाते थे। उस समय हमारा विज्ञान चरम सीमा पर था. ग्रहों की चाल जानने के लिए वेध चक्र और तुरीय यन्त्र (दूरबीन) बनाया गया, इसी तरह इनके पास कम्पास भी था. कम्पास का सिद्धांत चुम्बक की सुई पर अवलंबित है. 
वैशेषिक दर्शन में कणाद मुनि लिखते हैं कि-- 
"मणिगमनं सू्च्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् । "
अर्थात चुमबक की सुई की ओर लोहे के दौड़ने का कारण अदृष्ट है, यह लोह चुम्बक सुई के अस्तित्व का प्राचीनतम प्रमाण है। इस तरह हस्तलिखित शिल्प संहिता, जो गुजरात के अणहिलपुर के जैन पुस्तकालय मे है, उसमे ध्रुवमत्स्य यंत्र बनाने की विधि स्पष्ट रुप से लिखी मिलती है। इसके साथ ही इस शिल्प संहिता में  थर्मा मीटर और बैरो मीटर बनने की भी विधि लिखी है. वहां लिखा है कि--
" पारदाम्बुजसूत्राणि शुक्लतैलजलानि च। बीजानि पांसवस्तेषु।"  
अर्थात पारा, सूत, तेल और जाल के योग से यह यन्त्र बनता है. शिल्प संहिताकार कहते हैं कि इस यन्त्र के निर्माण से ग्रीष्म आदि ऋतुओं का ज्ञान होता था तथा जाना जाता था कि कितनी सर्दी और गर्मी है. इनका वर्णन सिद्धांत शिरोमणि में भी है. इसके अतिरिक्त वैदिक काल में धूप घडी, जल घडी और बालुका घडी का भी निर्माण कर लिया गया था.
ज्योतिष ग्रंथों में लिखा है कि- 
तोययंत्रकपालाद्यैर्मयुरनरवानरै:। ससूत्ररेणुगर्भश्च सम्यक्कालंअ प्रसाधयेत्।
जल यंत्र से समय जाना जाता है, मयूर,नर,वानर की आकृति के यन्त्र बनाकर उनमे बालू भरने और एक ओर का रेणु सूत्र दुसरे में गिरने से भी समय नापने का यन्त्र  बन जाता है. इस प्रकार के दूरबीन, कम्पास, बैरोमीटर,  और घडी आदि यंत्रों के बन जाने से प्राचीन काल में ग्रहों की चल, उनसे उत्पन्न हुए वायु वेग की दिशा, गर्मी का पारा और समय आदि का ज्ञान संपादन करने में सुविधा होती  थी. इतना ही नहीं, किन्तु उन्होंने स्वयंवह नामक यन्त्र भी बना लिया था. जो गर्मी या सर्दी पाकर अपने आप चलने लगता था. इसका वर्णन सिद्धांत शिरोमणि में इस प्रकार आया है- 
तुंगबीजसमायुक्तं गोलयंत्र प्रसाधयेत्। गोप्यमेतत्  प्रकाशोक्तं सर्वगम्यं भवेदिह। 
अर्थात पारा भरकर इस गोल यन्त्र को बनावें. यह यंत्र थोड़ी सी भी हवा चलने से, गर्मी पाकर अपने आप ही चल पड़ता है था. तूफान और मानसून जानने के लिए आज तक जितने भी यंत्र बने हैं, इसकी खूबी को एक भी नहीं पकड़ पाया है. 
मेरा यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि भारत वैदिक काल में वैज्ञानिक प्रगति के उत्कर्ष पर था. जिसे इस स्थिति में पहुँचाने के लिए विश्वकर्मा के वंशजों ने अपनी सम्पूर्ण कार्य कुशलता का परिचय दिया तथा समाज को भौतिकता युक्त सभ्य बनने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. आज उन्ही भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती है. जो माघ सुदी त्रयोदशी को मनाई जाती है. मेरा उनको शत-शत नमन है.

गणतंत्र दिवस की झलकियां-गाँव की सुबह के साथ(ललित शर्मा)

आज २६ जनवरी है. जिसे हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं. गांव, गली, मोहल्ले, कसबे, शहर सभी जगह तिरंगा झंडा फहराया जाता है. हमारे गांव में भी गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया गया. मुझे बच्चों के बीच गणतंत्र पर्व मनाना भाता है. मोहक मुस्कान लिए हाथों में तिरंगा लहराते बच्चे देश के भावी नागरिक हैं. हम इनके मासूम जज्बे को सैल्यूट करते है. हमने भी आज झंडा फहराया और बच्चों के गीत कहानी सुने. बूंदी का प्रसाद खाया. कुछ झलकियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं.
गणतंत्र दिवस की सुबह
Image0789 एक झलकी और
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ध्वजारोहण
Image0810 एक झलकी-जन-गण-मण
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बच्चों का उद्वोधन-कविता गीत
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सावधान-नंदन-अभिनंदन
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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आप सभी को गणतंत्र दिवस की पुन: ढेर सारी शुभकामनाएं

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

गुगल से साभार

बुरे लोगों की संगति का फल तो भुगतना ही पड़ता है.!!

एक किसान के खेत में कौंवों का एक विशाल झुण्ड आ जाता और उसकी फसल तहस-नहस कर देता. इससे किसान इन कौंवों से परेशान था. उसने खेत में कई बार कपड़ों के पुतले खड़े किये, किन्तु कौंवें उसके धोखे में नहीं आये. उन्होंने पुतलों को भी चीर फाड़ डाला.
जब किसान बेहद दुखी हो गया तो उसने खेत में जाल बिछा दिया.जाल ऊपर उसने अनाज के कुछ दाने बिखेर दिये. कौंवों की नजर दानों पे पड़ी तो बिना सोचे समझे दानो पर टूट पड़े. जैसे ही वे दाने चुगने के लिए नीचे उतरे, सब-के-सब जाल में फँस गए.
किसान जाल में फंसे कौंवों को देख कर बहुत खुश हुआ. उसने कहा"आज फंसे हो मेरे चंगुल में,दुष्टों! अब मैं तुममे से किसी को नहीं छोडूंगा."
तभी किसान को एक करुण आवाज सुनी दी. उस सुनकर किसान को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने ध्यान से जाल में देखा तो कौंवों के साथ उसमे एक कबूतर भी फंसा हुआ था.
किसान ने कबूतर से कहा "अरे! इस टोली में तू कब से शामिल हो गया? पर मैं तुझे भी छोड़ने वाला नहीं हूँ. क्योंकि तू बुरे लोगों की संगत करता है. बुरे लोगों की संगति का फल तो तुझे भुगतना ही होगा. इसके बाद किसान ने अपने शिकारी कुत्तों को इशारा कर दिया......................
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पापी ! तूने मुझे बेकार मरवा दिया.!!

हमारी दादी कहती थी कि इस जुबान का गलत इस्तेमाल मत करो क्योंकि इसका कुछ नहीं बिगड़ता, ये तो बोल कर अन्दर घुस जाती है और दांतों का सत्यानाश (तुडवा) करवा देती है.इसका मतलब यह होता है कि करे कोई और भरे कोई. इस पर ही एक कहानी है.
एक पेड पर एक कौवा और एक बटेर रहते थे. एक बात पक्षियों को सूचना मिली कि गरुड़ भगवान सागर तट पर पधार रहे हैं, तो सभी पक्षी इकट्ठे होकर उनके दर्शनों के लिए सागर तट की ओर चल दिये.
जिस मार्ग से वे दोनों जा रहे थे, उसी राह पर जाता हुआ एक ग्वाला मिल गया. उसने अपने सर पर दही का मटका रखा हुआ था. कौवे ने ग्वाले के सर पर रखा हुआ दही का मटका देखा तो उसके मुंह में पानी भर आया. फिर क्या था, कौवा उस दही को खाने के लिए नीचे उतर आया. खाने के लोभ में वह ये भी भूल गया कि गरुड़ जी के दर्शनों के लिए जा रहा है.
कौवा मटके पर भीत के आराम से दही खाने लगा, कुछ देर बाद ग्वाले को पता चल गया कि मटके से कोई दही खा रहा है.
कौवा बहुत चालक होता है, वह पल भर में दो चर चोंच मार कर उड़ जाता. थोड़ी देर बाद फिर आ जाता.इस प्रकार ग्वाले के चलते चलते कौवा अपना काम करता रहा.
बटेर ने कौवे को ऐसा करने से मना भी किया, परन्तु कौवा कहाँ किसी की बात सुनता है. वह तो यही सोचता है कि मुझ से बड़ा बुद्धिमान कोई नहीं.
ग्वाले ने चलते-चलते कई बार हाथ उठाकर चोर को पकड़ने की चेष्टा की. किन्तु कौवा उसके हाथ नहीं आया.
जब दही चोर को पकड़ा नहीं जा सका तो ग्वाले ने दही का मटका सर से उतर कर नीचे रख दिया. फिर वहीं एक ओर छिपकर बैठ गया और दही चोर का इंतजार करने लगा. उसने देखा कि उपर वृक्ष पर कौवा और बटेर बैठे हैं.
ग्वाला समझ गया कि यही दही के चोर हैं. क्रोध से भरे गवाले ने पास पड़ा एक पत्थर उठाकर उन पर खींच कर मारा. जैसे ही कौवे ने ग्वाले को पत्थर उठाते देखा तो वह झट से उड़ गया मगर बटेर बेचारा नहीं उड़ सका और पत्थर सीधा बटेर को लग गया. पत्थर लगाते ही बटेर के मुंह से दर्द भरी चीख निकली. इसके साथ ही वह धरती पर जा गिरा और अपने जीवन कि अंतिम साँस लेते हुए बोला-----पापी ! तूने मुझे बेकार मरवा दिया. 

खंडहर हुए इन्द्र प्रस्थ में धृतराष्ट्र की तरह राज करना!!

कांग्रेस और एन.सी.पी. के इस फैसले ने यह जता दिया कि महज किसी एक वर्ग को संतुष्ट करने के लिए कहाँ तक समझौता किया जा सकता है. निरीह गरीब मजदूरों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? कहीं से भी आकर मजदूरी करके खा रहे हैं कमा रहे हैं. पलायन कौन करना चाहेगा जब उसे घर बैठे रोजगार मिल जायेगा तो. कौन घर दुवार बीबी बच्चे भगवान भरोसे छोड़ कर जायेगा. ये पेट की भूख आदमी से क्या नहीं करवा देती. रोजगार के लिए पलायन कोई आज से नही हो रहा है, पलायन वह करता है जिसके हाथ में हुनर होता है, खोपड़ी में दिमाग. घर से दो हाथ लेकर निकलता है इस दुनिया में कमाने के लिए. बच्चों का पेट पालने के लिए.
अभी महाराष्ट्र सरकार ने जो निर्णय लिया है उसके दूर गामी परिणाम होंगे. समुद्र के किनारे मुंबई को बसाने और बनाने में उत्तर भारतीयों का भी हाथ है. उन्होंने ने भी अपने खून और पसीने से इस शहर को सींचा है. जितना हक़ तुम्हारा बनता है उतना ही हक़ उत्तर भारतियों का भी है. क्या मराठी भारत में महाराष्ट्र में ही बसते हैं? और कहीं नहीं?. जरा अकल से काम लो. जिस दिन ये कामगार मजदुर मुंबई से चले जायेंगे उस दिन तुम्हे दाल आटे का भाव पता चल जायेगा. अगर पीने को पानी भी मिल जाये तो वह बहुत बड़ी बात होगी. मुंबई में मराठी भाषियों से अधिक अन्य भाषा-भाषी लोग रहते है. जो उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, राजस्थान,  गुजरात केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश से आते है.मुंबई के कल कारखानों को अपने पसीने और मेहनत के दम चलाने वाले यही लोग हैं.
पिछले साल १५ दिसंबर को मैं मुंबई में ही था. जब दादर में खोमचे वालों को मारा पीटा जा रहा था. टैक्सी वालों से उनका नाम-नाम पूछ कर उनकी टैक्सियाँ जलाई जा रही थी. पुलिस इन गुंडों के सामने हाथ बांधे खड़ी थी. तब कहाँ थे? ये मुंबई में कानून व्यवस्था की दुहाई देने वाले नेता. शरद पवार की दोगली नीति जग जाहिर है. पहले बाल ठाकरे को बढ़ावा दिया, उससे गुप्त समझौता करके अपना उल्लू सीधा किया और अब नया मोहरा मिल गया राज ठाकरे के रूप में. अब इसका इस्ते माल चालू है.
गरीबों, मजदूरों को मारना पीटना कहाँ क़ी बहादुरी है? जब मुंबई में आतंकवादी हमला हुया था. तब ये मराठी मानुस की दुहाई देने वाले कहाँ थे? उस समय दो चार आतंक वादियों को टपकाते तो हम भी मानते कि जिगर वाले लोग हैं और इनकी धमकी से डरना चाहिए. पूरा भारत तुम्हारी जय जयकार करता. लेकिन पता नहीं ये कागज के शेर उस दिन किस बिल में घुसे हुए थे. जब फौज आई तभी आतंकवादियों को धराशायी कर मुंबई को आतंक मुक्त करवाया गया. हम फौज के जज्बे को सलाम करते हैं और तुम्हारी राष्ट्र घाती हरकतों की निंदा करते हैं.
आज जिन उत्तर भारतियों के परिश्रम के दम पर मुंबई खड़ी है उसे स्वीकारना ही होगा. "गरीब की लुगाई सबकी भौजाई".उत्तर भारतीय टैक्सी वालों को प्रताड़ित करके तुम क्या सन्देश देना चाहते हो. यही ना की अब पुराना हफ्ता नहीं चलेगा. नया हफ्ता लगेगा. एक गुब्बारा बेचने वाला १० साल का बच्चा जो लाल बत्ती पर खड़ा है वही भी उस जगह मात्र खड़े होने का रोज का सौ रूपये से कम नहीं देता है. बाकी की तो बात छोड़ दो. यह जग जाहिर है. गरीबों का शोषण सदियों से होता आया है. गरीब लात खाने के लिए और कीड़े मकोड़े की तरह मरने के लिए ही पैदा होते है. अगर तुम्हारे में दम है तो मुंबई निवासी धनियों और पूंजी पतियों को भगाओ. वहां के कल कारखानों को बंद करवाओ.इसके बाद तुम्हारे को मुंबई में एक भी उत्तर भारतीय अपनी इच्छा से निवास करता हुआ दिख जाये तब बताना. फिर खंडहर हुए इन्द्र प्रस्थ में धृतराष्ट्र की तरह राज करना. प्रज्ञा हीन तथा प्रजा हीन राजा की तरह, कोई मनाही नहीं है किसी से भी टैक्सी चलवाना.

समस्त भारतियों को अब मुंबई की दशा देखते हुए उसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर नियंत्रण केंद्र के हाथों में लेने की मांग करनी चाहिए. मुंबई केंद्र सरकार चलाये. बाकी प्रदेश प्रादेशिक नेता चलायें. इसका यही समाधान नजर आता है.


गधे का क्या अंजाम हुआ?

क पुरानी कहानी पर चलते हैं. एक धोबी के पास एक गधा था. वह उसका बहुत ख्याल रखता था. मगर गधा दिन प्रतिदिन सूखता जा रहा था. धोबी ने सोचा कि इसका पेट भरने का उचित प्रबंध नहीं हुआ तो यह मर जायेगा. तभी उसके दिमाग में एक नई योजना आ गई.
उसने चुटकी बजाते हुए कहा-"लो बन गया काम, मैं इस गधे को शेर की खाल पहना कर रातों को खेतों में छोड़ दिया करूँगा.जिससे यह बड़े मजे से अपना पेट भर सकेगा."
दुसरे दिन धोबी एक शिकारी के पास जाकर शेर की खाल खरीद लाया. रात के समय गधे को शेर की खाल पहना कर खेतों की ओर खदेड़ दिया.
बस उस दिन के बाद गधे के भाग्य जग गए. वह बड़े मजे से रात होने पर खेतों में जाता, खूब पेट भर खाता और मौज मारता, अब तो थोड़े दिन में ही गधा खा-खाकर मोटा-ताजा हो गया.
किसान जब उस गधे को खेतों में आते देखते तो डर के मारे भाग खड़े होते. वे लोग यही समझते कि शेर आ गया. इस गधे ने इस क्षेत्र की सारी फसलों को चौपट कर दिया.
एक गरीब किसान का जब सारा खेत नष्ट हो गया तो वह बेचारा बहुत दुखी हुआ और उसने सोचा की इस शेर को मारे बिना गुजारा नही होगा. अगर उसे भूखे मरना है तो क्यों इस शेर को साथ लेकर मरुँ.
उस रात उसने अपने शरीर पर मटमैले रंग का कम्बल ओढ़ लिया. उसके अन्दर अपना धनुष-बाण छुपा लिया और अपने ही खेत एक कोने में दुबक कर बैठ गया.
जैसे ही शेर की खाल पहने गधा खेत के अन्दर आया तो उसने खेत के कोने में मटियाले रंग के पशु को बैठे देखा, उसने समझा कि यह भी  कोई गधा होगा, अपने भाई को वहां देखकर भूल गया कि वह शेर बना हुआ है, बस लगा उसी समय गधे की बांटी 'ढेंचू......ढेंचू' करने.
किसान ने जैसे ही शेर के मुंह से गधे की आवाज सुनी. तो वह समझ गया कि यह तो धोखे बाज गधा है. अब तो मैं इसे किसी भी कीमत पर जीवित नहीं छोडूंगा.......क्रोध से भरे किसान ने उसी समय तीर चलाकर गधे को........................................

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क्या आप इसे जानते? पढिए

श्वर द्वारा निर्मित यह शरीर रचना अद्भुत है। इस पर मानव अपनी खोजी प्रकृति के द्वारा निरंतर शोध कर रहा है। लेकिन अभी तक शरीर के विषय मे पुर्ण रुप से नही जान पाया है। ईश्वर की इस अनुपम कृति के आगे सब नतमस्तक हैं आज थोड़ी सी जानकारी इस पर भी लेते है। जिसे वैज्ञानिकों ने शोध कर निकाला है।

  1. मनुष्य के नेत्र गोलों का वजन 28 ग्राम होता है।
  2. हमारे शरीर मे कार्निया ही एक ऐसा जीवित भाग है, जिसमे रक्त वाहिनी नहीं होती।
  3. शरीर की सबसे छोटी हड्डी का नाम "स्टेप्स" है, जो कान मे होती है।
  4. मनुष्य के सिर का वजन औसतन 8 पौंड होता है।
  5. हमारे चेहरे मे कुल 14 हड्डियाँ होती हैं।
  6. मानव हृदय मे दबाव को उत्तपन्न की इतनी शक्ति होती है कि वह रक्त को 30 फ़िट तक फ़ेंकता है।
  7. हमारा हृदय साल भर मे 3,70,00,000 बार धड़कता है। जीवन भर मे ढाई लाख बिलियन(एक बिलियन=10करोड़) तक्।
  8. जब हम भी छींकते हैं, उस दौरान शरीर कार्य करना बंद कर देता है, यहां तक हृदय भी कार्य करना बंद कर देता है।
  9. मनुष्य की त्वचा मे से प्रति घंटा 6,00,000 कण झड़ते हैं और डेढ पौंड पुरे साल में
  10. हाथों मे कलाई सहित 54 हड्डियाँ होती हैं।
  11. जांघ की हड्डी हमारे शरीर की सबसे मजबुत हड्डी होती है।
  12. हम साल भर मे 84 मिलियन (एक मिलियन=10 लाख)बार पलकों को झपकाते हैं।
  13. मानव शरीर की 3 सौ मिलियन कोशिकाएं हर एक मिनट मे नष्ट होती हैं।
  14. मनुष्य की बाहरी त्वचा की कोशिकाएं झड़ंने और पुन: बढने की प्रक्रिया 27 दिन की होती है। पुरे जीवन मे 1000 बार नयी त्वचा आती है।
  15. जानते हैं! हमारे पैर का बड़ा अंगुठा सिर के लिए प्रेशर प्वाईंट का काम करता है। यानी पैर का अंगुठा दबाओ सिर दर्द से मुक्ति पाओ।
  16. मनुष्य के पैरों की जोड़ी मे 2,50,000 पसीने की ग्रंथियां होती हैं।
  17. हम हमारी जीभ से लगभग 9000 तरह के स्वाद ले सकते है।
  18. एक अनुमान के आधार पर हम अपने पुरे जीवन मे 16,000 गैलन पानी पीते हैं।
  19. हमारे छींकने से निकलने वाली हवा की गति 100 मील प्रति घंटा होती है।
  20. सर्व प्रथम डॉ डेनियल हॉल विलियम्स के द्वारा 1893 में दिल की सर्जरी की गयी थी।

दिल से दिल की राह होती है!!

क बार अकबर और बीरबल कहीं जा रहे थे. सामने से कुछ फासले पर उन्हें एक जाट आता हुआ दिखा. 
अकबर ने बीरबल से कहा- इसे देख कर मेरा मन कहता है कि इसे गोली मार दूँ. 
देखें उसके मन में मेरे प्रति क्या विचार आते हैं? 
जब वह जाट उनके समीप आया तो बीरबल ने बादशाह की तरफ इशारा करके
उस जाट से पूछा कि-भाई डरो नहीं! सच-सच बताओ, 
" जब तुम्हारी नजर इस आदमी पर पड़ी तो तुम्हारे मन में क्या ख्याल आया था? 
उस जाट ने कहा कि मेरा दिल चाहता था कि इस आदमी की दाढ़ी खींच लूँ. 
अब पुष्टि हो चुकी थी कि दिल से दिल की राह होती है. 

तुझे जलेबियाँ खानी है?



क फकीर बाजार से गुजर रहा था. रास्ते में एक हलवाई की दुकान थी उसने बड़ी अच्छी जलेबियाँ सजा कर रखी हुई थी. उनके मन में आया कि जलेबियाँ खानी है. पर पास में पैसा नहीं था, करे तो क्या करे. मन को समझाया बुझाया लेकिन माना नहीं. फकीर आखिर वहां से वापस चले आया.

मन  की आदत है कि इसको जिस तरफ से वापस लाओ उसी तरफ जाता है. जब रात को भजन में बैठा तो जलेबियाँ सामने आयें. मन बाहर जाने लगा फकीर उठ गया. जब फिर बैठा तो वही ख्याल फिर सामने आया. जब सुबह हुयी तो वह पैसे कमाने के  लिए काम करने लगा. गर्मी बहुत थी और उसका मालिक कडक स्वभाव का था. जैसे तैसे शाम को थककर चूर होकर लडखडाता हुआ बाजार आया क्योंकि उसका मन तो जलेबियाँ खाना चाहता था.

उस समय जलेबियाँ सस्ती थी. रूपये की तीन सेर होती थी. उसने तीन सेर जलेबियाँ खरीदी और जंगल में ले गया. जलेबियाँ सामने रख कर बैठ गया. और मन से पूछता था कि तुझे जलेबियाँ खानी है? मन कहता था गरम-गरम खानी है. जल्दी खिलाओ फिर ठंडी  हो जाएँगी. लेकिन फकीर जलेबियाँ खाता नहीं था. वह मन से फिर पूछता था. जलेबियाँ खानी है? तो आवाज आती थी देर मत करो जल्दी खिलाओ. मन की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी. जब एक मौका ऐसा आया कि अब जलेबियों पर झपट पड़ेगा. तभी सामने से एक राहगीर आ रहा था. फकीर ने सारी जलेबियाँ उसे दे दी. फिर मन ने जलेबियाँ नहीं मांगी

आँखों में क्या है? जरा झांक के देखो?

आँखों में क्या है?



पिता की आँखों में-                    फर्ज
माता की आँखों में -                   ममता
भाई की आँखों में-                      प्यार
बहन की आँखों में-                     स्नेह
अमीर की आँखों में-                   घमंड
गरीब की आँखों में-                    आशा
मित्र की आँखों में-                      सहयोग
दुश्मन की आँखों में-                   बदला
सज्जन की आँखों में-                  दया
गुरु की आँखों में -                       प्रेम 
शिक्षक की आँखों में-                  ट्यूशन
शिष्य की आँखों में-                    आदर
पत्नी की आँखों में -                     सावन 
पति की आँखों में-                      उम्मीद
प्रेमिका की आँखों में -                चमक
नेता की आँखों में -                     धूर्तता
ब्लोगर की आँखों में -                 जूनून

एक बार दाढ़ी हिला दो महाराज!

क राजा रात को प्रजा का हाल जानने के लिए भेष बदल कर घूमता था. एक बार उसे पॉँच चोर मिले. राजा ने पूछा " आप कौन हो" चोरों जवाब दिया " हम चोर हैं.""पर आप कौन हैं" चोरों ने राजा से पूछा.राजा ने कहा कि मै भी चोर हूँ. इस पर चोरों ने उसको अपने गिरोह में शामिल कर लिया. अब चोरी करने की सलाह हुयी. लेकिन चोरी करने से पहले यह तय हुआ कि किसी एक को सरदार बनाना होगा. इस पर सब सहमत हो गये. सरदार चुनने के लिए जरुरी था सबका अपना-अपना गुण बताना पड़ेगा तथा जिसका गुण अच्छा होगा उसे ही सरदार चुना जायेगा.

पहले चोर ने कहा कि मैं ऐसी कमन्द लगता हूँ कि एक ही बार में रस्सी फँस जाती है. फिर चाहे सैकड़ों आदमी चढ़ जाएँ ऊपर. दुसरे ने कहा कि मैं सेंध लगाना अच्छी तरह से जानता हूँ. इतनी जल्दी और आसानी से सेंध लगता हूँ कि किसी को आवाज भी नहीं आती. तीसरा बोला मैं सूंघ कर बता सकता हूँ की माल कहाँ दबा है. चौथे ने कहा कि मैं जानवरों की बोली समझ सकता हूँ कि वे क्या कहते हैं? पांचवे ने कहा जिसको मैं रात को एक बार देख लेता हूँ उसे दिन में पहचान लेता हूँ. अब राजा सोच रहा था कि मैं क्या बताऊँ? अब राजा ने कहा कि मेरी दाढ़ी में इतने गुण हैं कि कितने ही बड़े अपराध वाले चोर-डाकू फांसी पर चढ़ रहे हों तो मैं जरा दाढ़ी हिला दूँ तो वे छुट जाते हैं. चोरों ने राजा का गुण सुना तो उसको अपना सरदार बना लिया.

अब पास में ही राजा का महल था. अब सलाह हुयी की राजा के महल में चोरी की जाये. मजबूरन राजा भी मान गया. जब महल की ओर चले तो रास्ते में एक कुत्ता भोंका, सभी ने चौथे चोर से पूछा कि ये क्या कहता है?  उसने कहा कि कुत्ता कहता हैं कि हममे से कोई एक राजा है. सब जोरों से हंस पड़े तो राजा भी हंस पड़ा. महल में पहुँच कर पहले चोर ने कमन्द लगाईं. सारे चोर और राजा ऊपर चढ़ गए. दुसरे ने सेंध लगाई. तीसरे ने सूंघ कर खजाने का पता बता दिया.माल की गठरीयाँ बांध कर नीचे आ गये. अपने इकट्ठे होने की जगह पहुँच कर चोरी का माल बाँट लिया और अपने -अपने घर की ओर चल दिये.

अगले दिन राजा ने अपने आदमी भेज कर चोरों को पकडवा लिया और फांसी का आदेश दे दिया.जब फांसी देने लगे तो पांचवा चोर सामने आया. उसने राजा से प्रार्थना की कि महाराज मैंने आपको पहचान लिया है क्योंकि आप तो रात को हमारे साथ थे. अब दाढ़ी हिला दो और हमें फांसी से बचा दो. हम पर कृपा करो. अब हम प्रण करते हैं कि आज के बाद कभी चोरी नहीं करेंगे और सारी उमर आपकी सेवा में बीता देंगे. राजा को दया आ गई. उसने दाढ़ी हिला दी, दाढ़ी का हिलना हुआ और पांचो चोर फांसी के तख्ते से नीचे उतार लिए गए उनकी हथकड़ी बेड़ियाँ खोल दी गई. अब वो सब राजा की सेवा में लग गए.

कलयुगी गुरु-चेला !

सोटा नन्द अपने गुरु लोटा नन्द के साथ जंगल में रहता था. इस बार की सर्दियों में जोर की बारिश हुयी तो अँधेरी रात में झोपड़ी की छत से पानी टपकने लगा. 
लोटा नन्द ने सोटा नन्द से कहा, "बच्चा! छत पर चढ़ कर देख कि छत में से पानी कहाँ से टपक रहा है? उसे ठीक करने का उपाय कर?"
सोटा नन्द भी गुरु कहना मानना चाहता था पर उसने मन में सोचा कि बाहर अँधेरा और ठण्ड है, अगर मैं बाहर गया तो भीग जाऊंगा. फिसल कर गिर गया तो मेरी टांग टूट जाएगी. इसलिए मुझे बाहर जाने से कोई फायदा नहीं है. 
उसने गुरूजी से कहा "गुरुदेव! अगर मै छत पर गया तो मेरे पैर छत पर होंगे और आप छत के नीचे. मैं ऐसी बेअदबी कैसे कर सकता हूँ." 
गुरु ने कोई उत्तर नहीं दिया और खुद ही छत पर चढ़ कर छत को ठीक कर लिया.जब वो छत से नीचे आय, उनहोने देखा कि जलाने के लिए लकड़ियाँ ख़त्म हो गई हैं. 
इसलिए फिर सोटा नन्द को कहा" बच्चा!बाहर जाकर जंगल में से जलाने के लिए कुछ लकड़ियाँ ले आओ.
सोटा नन्द गुरु का कहना मानना चाहता था पर जंगल से डर लगता था. वह सोचने लगा बाहर जंगल है, अँधेरा है और जंगली जानवर हैं.मुझे चोट लग सकती है और कोई शेर बघेरा मिल गया तो जिन्दा ही खा जायेगा. उसने मन में फ़ौरन ही बहाना ढून्ढना शुरू कर दिया.
गुरु से बोला "गुरुदेव! अगर मैं जंगल की ओर गया तो मेरी पीठ आपकी ओर हो जाएगी, मैं आपकी बे अदबी कैसे कर सकता हूँ."
इस बार भी गुरु ने कुछ नहीं कहा और खुद ही जंगल में जाकर जलाने के लिए लकड़ियाँ इक्कट्ठी कर लाये.गुरु ने वापस आकर खाना तैयार किया. जब भोजन तैयार हो गया.
तो सोटा नन्द से कहा, "बेटा खाना तैयार है, आकर खालो" 
यह सुनते ही सोटा नन्द जोर से दौड़ता हुआ आया और गुरु के चरणों में गिर पड़ा.

प्रेम से कहने लगा "गुरू जी! गुरू जी!  मुझे क्षमा कर दो! मैंने दो बार आपकी हुक्म-अदूली की है, इस बार मै आपका हुक्म जरुर मानूंगा.

वो सबको मुर्ख बनाता है!

एक महात्मा दुकान पर खड़ा वहां की चीजों को देख रहा था कि उसे एक ख्याल आया. अपने मन से बोला तेरी बहुत तारीफ़ सुनी है, कुछ अपनी करतूत तो दिखा. मन ने कहा ठहरो, अभी दिखाता हूँ. वहां पे एक आदमी शहद बेच रहा था. उसने शहद से भरी ऊँगली को दीवार से पोंछ दिया. दीवार पर शहद लगाने की देर बस थी कि उसकी खुशबु पाकर कुछ मक्खियाँ आ बैठी. शहद खाने लगी. फिर मक्खियों की संख्या बढ़ गयी. अभी वे शहद खा रही थी कि छिपकली ने देख लिया कि यह तो मेरा शिकार है. उसने छलांग लगायी और शहद समेत कुछ मक्खियों को खा लिया. उस दुकानदार ने बड़े प्यार से एक बिल्ली पाल रखी थी. बिल्ली छिपकली पर झपटी और उसको एक ही बार में खा लिया. पास ही एक कुत्ता खड़ा था, बिल्ली पर हमला करके उसको मार डाला. दुकानदार को बहुत गुस्सा आया. उसने नौकरों को कहा मारो कुत्ते को. उन्होंने कुत्ते को डंडे से पीट कर मार डाला. वह कुत्ता पास ही खड़े ग्राहक का था. उस ग्राहक को बहुत ही गुस्सा आया. उसने दुकानदार को गाली दी.गाली  देने  की देर बस थी कि दोनों आपस में लड़ने लगे. दुकानदार के साथ उसके नौकर और ग्राहक के साथ बहुत से लोग. खूब लडाई हुयी तो मन ने उस महात्मा से कहा, ये मेरे खेल हैं, ये मेरे धोखे हैं. मैं लोगों के मन में इच्छाएं पैदा करके उनको मुर्ख बनाता हूँ. उन बेचारों को पता नहीं लगता कि उनकी इन इच्छाओं का उन्हें क्या फल भुगतना पड़ता है.ऐसे हैं मन के खेल. 

उस गधे का क्या हुआ?

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन बगदाद यात्रा पर जा रहे थे. एक गांव से गुजर रहे थे तो एक बूढे किसान से १०० रूपये में एक गधा खरीद लिया, किसान ने कहा की अगले दिन आकर ले जाना, मैं गधा दे दूंगा.
अगले दिन नसीरुद्दीन पहुंचे तो 
किसान बोला-"बुरी खबर है, गधा पिछली रात मर गया." 
तो नसीरुद्दीन बोले-"पैसा वापस कर दो"
किसान बोला "लेकिन पैसे तो मै कल रात में ही खर्च कर बैठा हूँ." 
मुल्ला नसीरुद्दीन बोले " ठीक है, मुझे मरा हुआ गधा ही दे दो."
"तुम उसका क्या करोगे?" किसान ने पूछा.
"मैं उसे पर्ची डाल कर बेचने वाला हूँ"
"तुम एक मरे हुए गधे को कैसे बेच सकते हो?"
"बिलकुल बेच सकता हूँ, बस तुम देखते जाओ"
एक महीने बाद यात्रा से लौट कर मुल्ला नसीरुद्दीन फिर उसी रास्ते से गुजारे और उसी गांव में ठहरे. किसान मिला और 
उसने पूछा "उस गधे का क्या हुआ?"
"मैंने तो उसे बेच दिया. तम्बू लगाया,गधा छुपाया, दो रूपये में गधा ले लो कहकर दो-दो रूपये के ५०० टिकिट बेच दिये. ड्रा निकाला और ९९८ रूपये कमा लिए."
किसान ने पूछा- कैसे? किसी ने शिकायत नहीं की?
"हां की थी केवल उसने जिसका टिकिट खुला था. मैंने उसके दो रूपये वापस कर दिये.
क्यों कैसी रही?

संगीता पूरी जी और पंडित डी.के.वत्स जी से एक सवाल?

मंहगाई बेलगाम होती जा रही है. आम उपभोग की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. सरकार कानों में रुई डाल कर बैठ गई है. उसके जिम्मेदार मंत्री माकूल जवाब नहीं दे रहे हैं. कुल मिलाकर देश को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया गया है. जो महीने राशन ४००० का आता था वो १०००० का हो गया है. व्यर्थ की चीजों के दाम घट रहे हैं और दैनिक उपयोग में आने वाली सामग्री काबू से बाहर होती जा रही है. ऐसे में कल कृषि मंत्री शरद पवार से प्रश्न किया गया कि"मंहगाई कब  कम होगी? तो उसने जवाब दिया मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ जो बता सकूँ कि मंहगाई कब कम होगी." चुनाव में शक्कर लाबी ने अपना कमाल दिखाया जिसका परिणाम है कि शक्कर ५० रूपये किलो हो गयी है. ये बात किसी से छुपी नहीं है.
अब बात ज्योतिषियों पर आ गई है. सवाल आम आदमी से जुड़ा है. उसके पेट की भूख से जुड़ा है. अब हम तो दो ज्योतिषियों को जानते हैं जो हमारे ब्लॉग परिवार में शामिल हैं संगीता पूरी जी और पंडित डी. के.वत्स जी. अब मैं यह सवाल इनसे ही कर रहा हूँ जिसका जवाब ये दें साथ ही साथ ये भी बताएं कि यह सरकार कितने दिन की मेहमान है आपके दिये जवाब से कृषि मंत्री शरद पवार को पत्र लिख कर अवगत कराएँगे कि ज्योतिषियों ने यह जवाब दिया है. इस विषय में आपकी क्या राय है? 

मांग! क्या मांगता है?

वाब गाजीउद्दीन के समय की बात है. लखनऊ के गोलागंज में संगीत के एक धुरंधर उस्ताद हैदरी खान रहते थे. वह चूँकि बैजू बावरा की तरह खोये-खोये से रहते थे इसलिए उनका नाम "सिड़े हैदरी खां" मशहूर हो ग्या.
नवाब साहब ने उनका नाम सुना तो उनका गाना सुनने के लिए बेताब हो गए. पर कभी ऐसा मौका हाथ नहीं आया. एक दिन शाम को गाजीउद्दीन दरिया के किनारे सैर के लिए निकले. रोमी दरवाजे के नीचे उनके कारिंदों ने "सिड़े हैदरी खां" को जाते देखा तो नवाब साहब से अर्ज किया
" कब्ला-ए-आलम!वह जा रहे हैं हैदरी खां."
नवाब साहब तो उत्सुक थे. हुक्म दिया "बुलाओ".
कारिंदे पकड़ कर लाये और सामने खड़ा कर दिया.
नवाब साहब ने कहा "अरे मियां हैदरी खां, हमें अपने कभी अपना गाना नहीं सुनाया".
वह बोले "जरुर सुनाता, मगर मुझे आपका मकान मालूम नहीं है."
नवाब साहब सुनकर हंस पड़े और कहा," अच्छा हमारे साथ चलो, हम खुद तुम्हे अपने मकान पर ले चलेंगे.".....
"बहुत खूब'. इतना कहकर वह नवाब साहब के साथ चल दिये.
इतर मंजिल के करीब पहुँच कर अचानक हैदरी खां ने कहा "मैं चलता तो हूँ मगर पुरियां और बालाई खिलवाईयेगा तभी गाऊंगा."
नवाब साहब ने वादा किया की पेट भर खिलावायेंगे. महल में पहुँच कर उनका गाना सुना तो नवाब साहब मस्त हो उठे. उनको हाल आने लगा और बेसुध हो गये. यह हालत देखकर हैदरी खां खामोश हो गए. थोड़ी देर में वापस अपने हाल पर आने के बाद
नवाब साहब ने फिर गाने को कहा तो.......
हैदरी खां बोले " हुजुर आपके पेचवान में भरा तम्बाखू बहुत अच्छा मालूम होता है, आप किसकी दुकान से मंगवाते हैं?"
गाजीउद्दीन हैडर खुद  सिड़ी मशहूर थे. इस सवाल पर नाराज हुए ......
तो मुसाहिबों ने धीरे से अर्ज किया " किब्ला-ए-आलम! यह पक्का सिड़ी है. अभी तक यह नहीं समझा है किस्से बातें कर रहा है."
नवाब के इशारे पर लोग हैदरी खां को दुसरे कमरे में ले गए, पुरियां बालाईं खिलवाई, हुक्का पिलवाया, उन्होंने पाव भर पुरीयाँ आधा पाव बालीं और थोड़ी सी शक्कर अपनी बीबी के लिए भिजवाई.
उधर नवाब साहब जाम पर जाम चढ़ाये जा रहे थे. जब नशे का जोर हुआ तो हैदरी खां की फिर याद आई. उसे बुलाकर गाने का हुक्म दिया. जैसे ही हैदरी खां ने गाना शुरू किया.....
 तो नवाब साहब ने रोक कर कहा "हैदरी खां सुनते हो. अगर गाने से मुझे खाली खुश किया और रुलाया नहीं तो याद रखो गोमती में डूबवा दूंगा."
हैदरी खां चक्कर खा गये उनको समझ में आया कि यह तो बादशाह है. कहा हुजुर "अल्लाह मालिक है" कह कर जी तोड़ गाने लगे.
खुदा की कुदरत थी या हैदरी खां की जिन्दगी थी. गाने का ऐसा असर हुआ कि थोड़ी देर में नवाब साहब रोने लगे. खुश होकर बोले "हैदरी खां! मांग, क्या मांगता है?"
हैदरी खां ने अर्ज किया "जो मांगूंगा, दीजियेगा"
नवाब साहब ने वादा किया तो हैदरी खां ने तीन बार हामी भरवा कर कहा " हुजुर! मैं यह मानता हूँ कि मुझे फिर कभी न बुलवाईयेगा और न गाना सुनियेगा."
हैदरी  खां सम्भल कर बोले "आपका क्या? कहीं मुझे मरवा दिया तो मुझ जैसा हैदरी खां न पैदा होगा और आप मर जायेंगे तो फ़ौरन दूसरा बादशाह आपकी जगह ले लेगा."
इस बात पर नाराज होकर नवाब साहब ने मुंह फेर लिया . यह मौका पाते ही हैदरी खां अपनी जान लेकर भागे और सीधे घर  पहुँच कर ही दम लिया.  

परिवार नियोजन केंद्र के बाहर बोर्ड लगा है!!

आज कुछ हल्का फुल्का हो जाये-राजीव जी की कथा पढ़ के आ रहा हूँ कुछ तो असर होगा.

(१)
परिवार नियोजन केंद्र के बाहर बोर्ड लगा है.
"अपने माँ-बाप की गलतियों से सबक लें. परिवार नियोजन के उपाय करें." 


(२)
चंदू का नर्सरी में एडमिशन के लिए इंटरव्यू चल रहा था.
"तुम्हारे पापा क्या करते हैं?" इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमेन ने कहा.
"जी वही जो मम्मी करती है" चंदू ने बताया.
"और मम्मी क्या करती हैं?" चेयरमेन ने आगे पूछा
"वही जो पड़ोस की स्वीटी आंटी कहती है" चंदू ने आगे बताया
"तो इसका मतलब यह हुआ की तुम्हारे पापा अल्टीमेटली स्वीटी आंटी 
को फालो करते हैं, हमेशा उनके पीछे जाते हैं" 
इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमेन ने चंदू को फंसाने की कोशिश की.
"जी सच तो यही है, पर जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो मम्मी मेरी पिटाई कर देती है".
 चंदू ने अपनी प्राब्लम साफ कर दी. 

उन्होंने जनेऊ तोड़ दिया.....!!!

ज एक प्रेरणा दायक स्मरण पर चलते हैं. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के शलाका-पुरुष थे.महान सम्पादक और "लेखकों के निर्माता" होने के बाद भी उनमे घमंड लेश मात्र को भी नहीं था. "सरस्वती पत्रिका" से सेवा निवृत होने के बाद वह अपने गांव आ गए. ग्राम वासियों की इच्छा का आदर करते हुए उन्होंने सरपंच पद स्वीकार कर लिया.
एक दिन खेत में मजदूरन चीख रही थी. दिवेदी जी उधर से गुजर रहे थे. देखा कि उस महिला को साँप ने काट लिया है. उन्होंने तुरंत जनेऊ तोड़ कर घाव चीर कर उस पर कस कर अपना जनेऊ बांध दिया ताकि जहर ना फैले. कुछ देर बाद ग्राम वासी आये. सब कुछ देख-समझने के बाद द्विवेदी जी को भली-बुरी सुनाई "आप ब्राह्मण हैं और यह महिला अछूत है और आपने पवित्र जनेऊ तोड़ डाला और जनेऊ इसके पांव में बांध दिया.............
रुष्ट गांव वालों को द्विवेदी जी ने कहा" मनुष्य की सेवा से बढ़कर कोई फर्ज नही है और अछूत भी कोई नही होता.......और सुनो पराई पीड़ा को दूर करने के लिए  मैं जनेऊ तो क्या......इस शरीर का रक्त और मांस भी दे सकता हूँ". सुनकर सभी हतप्रभ थे और द्विवेदी जी चरणों में नत हो गये.  

कुछ तड़फ़ कुछ झड़प अपने गाँव की---------- ललित शर्मा

जब से अपना गाँव छोड़ के बाद दूसरे गाँव के बाशिंदे हुए तब से अपने तन-मन को नोचवा रहे हैं। नए गाँव में भ्रमण करते हुए एक बरस बीत गया। इस गाँव का हाल-चाल भी हमारे गाँव जैसा ही है। गांव सारे एक जैसे ही होते है, यहां आकर पता लगा,पहट से ही दूनिया शुरु हो जाती है। आप सूते रहिए और इधर धड़ा-धड़ लेन-देन चालु हो जाता है। परबतिया भौजी भोर में ही सिर पर तगाड़ी धरे घुमती है,चार छ: सुअर हमेशा उनके साथ घुमते हैं,कुछ तो मिल जाएगा, घुमने के लाने, गाँव में भी भोर में गोबर-कचरा और गोठान सफ़ाई का काम चालु हो जाता है। गाँव में अपने गोठान का कचरा अपने घूरे में ही फ़ेंका जाता है। अपना माल अपने ठिकाने पर लगाया जाता है। लेकिन इस गाँव में बड़े समझदार लोग हैं अपने दिमाग का गोबर-कचरा दूसरे के घर दूवारी में फ़ेंक आते हैं। अब वह बेचारा सुबह-सुबह अपने दूवारी पर पड़े गोबर कचरा को देख कर माथा पीट लेता है और धुलाई-सफ़ाई के साथ गंगा जल छिड़क कर सतनारायण भगवान का कथा कराता है। दान दक्षिणा का खर्चा और बढ जाता है।

“मार कर मेरे पत्थर छिपा कौन है, बोलता भी नहीं है वो मूआ कौन है?’ बस ऐसा ही कंडिशन है। एक बार गांव में घूमते-घूमते चौक में पहुंच गए। वहां देखा कि 30-40 लोगों का नाम लिखा हुआ है। जिज्ञासावश हमने पढा तो हमारा भी नाम लिस्ट में था। हम भौंचक रह गए कर्जा माफ़ी के बाद कापरेटिव बैंक से रिकवरी कैसे निकल गया फ़िर से। जब ध्यान से पढा तो लिखा था कि “ये नौकरी करने वाले लोग इतना पैसा कहां से पाते हैं जो इस पढे लिखे लोगों के गाँव में आ गए?” बहुत बड़ा प्रश्न वाचक चिन्ह था। हमने तो आज तक किसी ससुर की नौकरी नहीं करी। हमारे घर में गोबर-कचरा से लेकर झाड़ू बुहारी तक नौकर ही नौकर हैं। फ़िर भी लिस्ट में हमारा नाम था। दुबारा जब वहाँ पहुंचे तो वह चौक ही गायब मिला, जहाँ लिस्ट लगी थी। झाड़ पोंछ के चकाचक हो गया था। हम अपना समय और पैसा खर्चा करके घर दूवार बसाएं हैं। किसी के बाप का खर्चा से नहीं। हमें तो पता नहीं था ऐसे भी चोट्टे लोग भी इस गाँव में हैं। लेकिन साल भर में सबको पहचानने का मौका मिल गया।

गाँव में एक पटवारी साहेब भी हैं, जो अपना तोप यदा-कदा इधर उधर दागते रहते हैं। कभी किसी का खेत एक जरीब ज्यादा नाप देते हैं तो किसी को आबादी का ढाई डिसमिल का पट्टा दे देते हैं। गुमास्ता जो ठहरे। लोग लल्लो-चप्पो में लगे रहते हैं। एक बार हम नहर के किनारे-किनारे उषा पान के लिए जा रहे थे। देखा की तीन चार जवान लड़के नहर में नंगे नहा रहे हैं। हमने भी अपनी गाँव की आदत के हिसाब से पूछ ही लिया कि-“ तुम लोग कौन हो? नंगा नहाते शरम नहीं आती? तो एक लड़का बोला-“ तुम मेरे को नहीं पहचानते क्या? हमने कहा-“नहीं। तो वो गर्व से बोला-“ मैं पटवारी का लड़का हूँ।“ हमने कहा कि-“ शाब्बास! बहुत सार्थक काम कर रहे हो। अरे तुम नंगे नहीं नहाओगे तो और कौन नहाएगा? कल से पूरा खान-दान नंगा नहाए करो। अपने भाई बहिनी महतारी को भी लेकर आ जाना। कम से कम पटवारी का रौब दाब तो दिखेगा गाँव वालों को।

गाँव में डागदर बाबू हैं। एक तो आर एम पी हैं और अपने नाम के आगे डागदर लगाते हैं। गाँव में चांदसी दुवाखाना खोल रखे है। बवासीर और भगंदर का इलाज करते हैं। नीम हकीम खतरे जान। एक बार कोई छठी के निमंत्रण पत्र में इनके नाम के आगे डागदर लिखना भूल गया था। तो उसको बहुत गरियाए और पेनेसिलिन का इंजेक्शन महाराज को ठोंक दिए। दूसरे डागदर हैं कीट विज्ञानी। इनको दूर से देख कर पता चल जाता है कि किसके दिमाग में कौन सा कीट रेंग रहा है और उसे मारने के लिए कौन सा कीटनाशक लगेगा?एक दिन बताया कि हमारे ही दिमाग में कीट प्रवेश कर गया तब से एक एन्टीवायरस खरीदे और पूरे दिमाग को दो महीने स्केन किया। तब कहीं चलने के लायक हुआ। तब से हम तो डर के मारे पीठ पर कीटनाशक स्प्रेयर लादे फ़िर रहे हैं। जहां भी जाते हैं बैठने से पहले कीट्नाशक का छिड़काव कर लेते हैं। एक डागदर साहब हैं वह मरीजों को भजन सुनाते हैं जब से हरिदुवार से होकर आएं हैं श्रीराम श्री राम जपते हैं। जब भी मिलते हैं दो दोहे ठोक ही देते हैं और हम अपने बाल नोचते रहते हैं कि सुबह-सुबह किस मरदूद से पाला पड़ गया।

अब कहते हैं न जैसा आदमी होता है वैसे ही उसके मित्र भी मिल जाते हैं। हम ठहरे सीधे-साधे गंवई आदमी। इस नए गाँव में भी हमको ऐसे ही यार-दोस्त, भाई-भौजाई, बहन बहनोई, माँ-बाप, सास-ससुर आदि रिश्ते नाते मिल गए। एक परिवार हमारा यहाँ भी तैयार हो गया। हाँ कुछ साले भी मिले। कभी कभी हमारी बेवजह खाट खड़ी करने को तैयार रहते हैं। साले ठीक से सोने भी नहीं देते। हमारे बेड रुम में ही डेरा डाल देते हैं। का बताएं जब तक रहते हैं तब तक हमें बैठक के तखत पर ही सोना पड़ता है। जो डनलप का गद्दा उनके बाप ने दिया था उसका पूरा उपयोग करते हैं। हम भी कुछ नहीं कह पाते। वे जीजा-जीजा कहते हैं पर हम साला भी नहीं कह पाते, पता नहीं कब बुरा मान जाएं। इसलिए सालिगराम जी कहते हैं। उनकी बहन हमारे आंगन की तुलसी है और वे हमारे तुलसी चौरा के सालिग राम।

ये अत्याचार कब तक सहेगें? एक बार तो हम गाँव छोड़ कर भाग ही लिए थे। जैसे कृष्ण रण छोड़ हो गए थे, हम भी रण छोड़ दास हो गए,गाँव के दोस्तों और रिश्तेदारों ने बहुत मान मनौवल किया तब वापस आए। गाँव के कुछ निठल्ले लोग जो चौक चौराहे पर बैठ कर ताश खेलते रहते हैं उनको हमारा याराना रास नहीं आता। जब देखो तब अपनी बोफ़ार्स तोप से गोला दागते रहते हैं। अब हमने भी बोफ़ार्स तोप बिसाने की सोच लिया है। अभी तोप कारखाने का भ्रमण करके आए हैं। शीघ्र ही ऑडर दे रहे हैं। बोफ़ार्स तोप का खासियत यह है कि ये तोप गोला छोड़ने के बाद अपना स्थान छोड़ देती है और मुंह घुमाकर खड़ी हो जाती  है जैसे इसने कुछ भी नहीं किया हो और गोला किसी ने छोड़ा हो। तो भैया गाँव की भाषा में कहें तो किसकी बाड़ी-बखरी में कौन हग आया पता ही नहीं चलता वैसा ही बोफ़ार्स का हाल है। मायावी लोगों से निपटने के लिए मायावी यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती ही है।

अभी पराए देश से एक अपने शहरी बाबू आ गए। हमने मित्र मंडली बैठा ली। पहले जब बैठते थे तो मदरस से ही काम चला लेते थे। लेकिन विलायती बाबू के सामने काहे इज्जत खराब करें सोचकर विलायती पर हाथ आजमा लिया। अब मारे खुशी के गाँव में भी बता दिया। चौक पर बैठे ताश खेलने वाले निठल्ले जल भुन गए। अब कहना शुरु कर दिया कि ग्राम पंचायत की बैठकी में इन्होने विलायती रस पान किया है। हम कौन सा झूठ बोल रहे हैं? हमने किया है तो किया है। तुम्हारे जैसे मुंह छुपा कर तो नहीं किया? “दिन में राम भजत है और रात हनत है गाय।“ दोहरा चरितर नहीं है हमारा। अगर तुम्हारे में कूबत हो तो तुम भी करो कौन मनाही है? अभी बेलंटाईन डे आ रहा है,पार्टी का जश्न भी होगा। पतुरिया भी नाचेगी, ठुमका भी लगाएगी। हम भी मौज लेगें।बेलंटाईन डे का परम्परागत ढंग से स्वागत जो करना है। समारोह में मित्रों को भी आमंत्रित किया है। बिलायती नहीं सही,देशी महुआ सही। सबका यथा योग्य स्वागत किया जाएगा। सभी को आगामी बेलंटाईन डे का बधाई। बुड्ढे-बुड्ढी और नवजवान सभी मौज मनाओ।

गीत अधुरा रह गया!!!

ज एक स्मरण पर चलते हैं. गुरुदेव रविन्द्र नाथ मृत्यु शैया पर अंतिम सांसे ले रहे थे. तभी एक व्यक्ति आकर कहने लगा-" धन्य हैं आप! आपने जीवन सार्थक कर लिया. छ: हजार गीत रचे. आप तो तृप्त हो गए. संसार के लिए एक अनूठी धरोहर छोड़ी है आपने".
गुरुदेव ने आँखें खोली और नम्रता से बोले-" तृप्त कहाँ हुआ? मेरा प्रत्येक गीत अधुरा ही रहा. जो मेरे उदगार थे, वे तो मेरे अन्दर अभी भी अटके हुए हैं. ये छ: हजार गीत तो उस दिशा में की गई मात्र असफल चेष्टाएँ है. उन उदगारों को बाहर लाने का प्रयास भर हैं. मैंने छ: हजार बार कोशिशें की किन्तु वह गीत अधुरा ही रहा जिससे मैं गाना चाहता था. उस गीत को, उस उदगार को गाने का प्रयास करने में ही था की तब तक बुलावा आ गया". गीत अधुरा रह गया. 

ब्लॉग का आई कान लिंक डेस्क टॉप पर बन सकता है क्या?

मित्रों आज एक समस्या लेकर उपस्थित हुआ हूँ, हमारे ब्लाग परिवार में कम्पूटर और इंटरनेट के धुरंदर जानकार हैं. समस्या यह है कि अगर मुझे किसी का ब्लॉग पढ़ना है तो नेट ब्राउजर में जाकर एग्रीगेटर से या डेशबोर्ड में अनुशरण कर्ता में जाकर पढ़ना पड़ता है. मैं सोचता हूँ कि जब हम सोफ्ट वेयर इंस्टाल करते हैं उनके आई कान डेस्क टॉप पर बन जाते हैं, उसी तरह किसी भी ब्लॉग का  लिंक डेस्क टॉप पे बन सकता है क्या? हम बिना इतना झमेला किये. सीधा नेट कनेक्ट किये और डेस्क टॉप पर आई कान पर क्लिक करके सीधा मनवांछित ब्लॉग में पहुँच जाये. यदि किसी को जानकारी है तो देने की महती कृपा करें. 

सफलता कैसे मिले?

प्रत्येक व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी न किसी का हाथ होता है ऐसा कहा जाता है. लेकिन भीतर की दृढ इच्छा शक्ति हो बिना किसी के सहयोग के भी सफलता मिल सकती है. संसार आज जिन महापुरुषों का नाम लेता है उनकी सफलता के पीछे भी उनकी स्वयं की दृढ इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास ही  है. एक अंग्रेजी की कहावत में कहा गया है कि- इच्छा शक्ति ही हमें मेहनत के लिए प्रेरित करती है और परिश्रम से आत्म विश्वास बढ़ता है.
महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन, जेम्स वाट, नेपोलियन बोना पार्ट, एकलव्य आदि अपनी इच्छा शक्ति के दम पर ही सफल हो सके. संकल्प जितने दृढ होंगे व्यक्ति कार्य को उतनी ही सफलता पूर्वक करेगा. इच्छा शक्ति के अभाव में अनेक तरह की कठिनाईयां सामने आती हैं तो उनका हाल निकालने में समस्या पैदा हो जाती है. मन में तरह तरह की शंकाएं पैदा हो जाती हैं.
लक्ष्य को बार-बार बदलना, छोटी-छोटी कठिनाईयों से घबरा जाना, हीन भावना से पीड़ित होना, निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होना आदि निर्बल इच्छा शक्ति के दुष्परिणाम हैं. जो व्यक्ति दृढ निश्चयी है वह अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है.  कोई भी कठिनाई या बढा आये उसे सहजता से स्वीकार कर दूर करने की कोशिस करता है और सफलता भी मिलती है.
दृढ इच्छा शक्ति के साथ सकारात्मक सोच होना भी सफलता के लिए आवश्यक है अन्यथा इसके अभाव में व्यक्ति गलत निर्णय ले बैठता है. सकारात्मक शोच व्यक्ति को आगे बढ़ाने में सहायक होती है यह  मार्ग में आई कठिनाईयों, भाधाओं को दूर करके व्यक्ति के अन्दर नयी शक्तियों का संचार करती है. साथ -साथ पथ प्रदर्शन भी करती है.
एक बार नेपोलियन की सेना आगे बढ़ते हुए जा रही थी कि बीच में यूरोप की उच्चतम पर्वत श्रेणी "एल्प्स" आ गई. सैनिक थोड़े ठिठके ही थे कि पीछे से नेपोलियन की आवाज आई "एल्प्स" है ही नहीं. नेपोलियन की आदमी इच्छा शक्ति ने सैनिकों की मनोवृत्ति को बदल दिया. देखते ही देखते सेना एल्प्स को पार कर गई. नेपोलियन कहा भी करते थे कि असंभव कुछ भी नहीं. असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोष में है.
इच्छा शक्ति दृढ हो तो असंभव-सा प्रतीत होने वाला कार्य  भी संभव हो जाता है. प्रारंभ में व्यक्ति छोटे-छोटे संकल्प ले और उसे पूरा करे. चाहे संकल्प रोज दो घंटे पढने का ही क्यों ना हो. आप अपनी योग्यता, क्षमता, तथा इच्छा के अनुरूप संकल्प लें सफलता अवश्य ही आपके कदम चूमेगी.  

पीने वालों के लिए खुशखबरी-नए साल में !!!!

नया साल आया तो अपने साथ पीने वालों के लिए खुशखबरी भी लेकर आया है. नए साल के पहले सप्ताह में ही एक अच्छी खबर आ गई. लेकिन यह अच्छी खबर इससे वास्ता रखने वालों के लिए ही है. हमने देखा है कि दो पैग ज्यादा होने पर पीने के बाद लोग बहक जाते हैं. उसके बाद इसके नशे में कुछ का कुछ हो जाता है "जाना था रंगून पहुँच गए चीन सुकू-सुकू". फिर जूतम पैजार की नौबत आ जाती है. फिर थाना, कचहरी, जेल तक मामला पहुँच जाता है. अगर ना पहुंचे तो फिर सुबह का हैंग ओवर परेशान कर देता है. काम में दिल नहीं लगता क्या करूँ.? सर दुःख रहा है. एक डिस्प्रिन ले ली जाये.

अब इसका तोड़ निकाला जा रहा है. ब्रिटिश वैज्ञानिक एक ऐसा सिंथेटिक ड्रिंक विकसित कर रहे हैं जो हमारे दिमाग को वैसी ही रहत देगा जैसा की शराब देती है. इसे पीने वाला पीकर अब बहकेगा नहीं और नहीं हैंग ओवर की शिकायत होगी. अल्कोहल का यह विकल्प लन्दन के इम्पीरियल कालेज में विकसित किया जा रहा है. इस टीम की अगुवाई ब्रिटेन के टप ड्रग एक्सपर्ट डेविड नट कर रहे हैं. ये सिंथेटिक ड्रिंक दिमाग के उन हिस्सों में असर नहीं डालेगा जो हमारे मूड में आने वाले बदलावों को कंट्रोल करता है. इस लिए इसमें हैंग ओवर जैसी शिकायत नहीं होगी. इसे शरीर से निकालने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं होगी.ऐसा कुछ ब्रिटेन के अखबार फरमा रहे हैं. अब यह ड्रिंक तो बाजार में आ जायेगा लोगों को सुकून भी मिलेगा. झूम बराबर झूम शराबी, हमें पीने का शौक नही पीते हैं गम भुलाने को, गम तो भूल जायेंगे और खतरा भी कम हो जायेगा.


साहित्य एक तपस्या है, साधना है!!

साहित्य एक तपस्या है, साधना है, यह एक निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है. तब कहीं जाकर एक उत्कृष्ट कृति हमारे सामने आती है. साहित्य को विनोद समझने वालों के विवेक पर तरस आता है. ऐसे लोग देश व समाज और राष्ट्र को कुछ नही दे सकते बल्कि समय भी बर्बाद कर रहे हैं. साहित्य बहुत अध्ययन, चिंतन, मनन के बाद समाज के हित में व्यक्त किया जाता है. यह पुरे संसार के लिए होता है. मानव मात्र के लिए होता है. भाषाओँ के बन्धनों से मुक्त होता है. एक साहित्यकार की रचनाओं  का कई भाषाओँ में अनुवाद होता है. इस क्षेत्र में लोगों ने अथक परिश्रम किया है. इस क्षेत्र के कुछ लोगों की आज चर्चा करते हैं
  • इंग्लैण्ड के राष्ट्र कवि जोन मेसफिल्ड ने कहा है- मैं १७-१८ वर्ष का था जब मुझे कवि बनने की धुन सवार हुयी, परन्तु मेरी कविताओं की तरफ कोई आँख उठा कर नही देखता था. मैं धीरज छोड़ चूका था. संयोग वश मैंने कहीं एक कविता पढ़ी जिसमे लिखा था-केवल चाहने और हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से कोई महान नहीं बन सकता. मछली भगवान भेजता है, परन्तु जाल तुम्हे ही फेंकना पड़ता है.
  • मेस फिल्ड कहते हैं-ये पंक्तियाँ मेरे मन में पैठ गई. मैंने फिर कठोर परिश्रम करना प्रारंभ किया और कई मास की साधना के बाद एक एईसी कविता लिख पाया जो प्रकाशक ने स्वीकार कर ली. कई वर्षों तक मेरी फुटकर कवितायेँ और छोटी कहानियां ही छपती रही. इसी बीच महाकवि यीट्स ने मुझे सलाह दी कि तुम कोई ग्रन्थ या महाकाव्य लिखो और मैं ग्रन्थ लिखने में लग गया. परन्तु मुझे इसमें सफलता नहीं मिली. मेरी हिम्मत टूट कर बिखर गई. मैंने उपर्युक्त पंक्तियों का फिर स्मरण किया और काम में जुट गया. दस वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद मेरा प्रथम उपन्यास प्रकाशित हुआ. जिसकी आलोचकों और यीट्स ने भी सराहना की.
  • अमेरिकी साहित्यकार कर्नल वुड को अपनी एक रचना पर लग-भग चार हजार रूपये का पारिश्रमिक मिलता था. जब संपादक पीज ने उन्हें बताया कि उनकी पत्रिका "पैसिफिक मंथली" अर्थाभाव के कारण बंद होने वाली है तो वुड ने वचन दिया कि वे अपनी रचनाएँ कहीं और ना भेज कर केवल इसी पत्रिका को भेजेंगे. चार वर्ष तक वुड इस पत्रिका को बिना कुछ पारिश्रमिक लिए अपनी रचनाएँ भेजते रहे. एक अंक में कभी-कभी तो उनकी दस-दस रचनाएँ रहती थी चूँकि एक ही व्यक्ति के नाम से कई-कई रचनाएँ अच्छी नहीं लगती, अत: वुड ये रचनाएँ छद्म नाम से लिखते थे.
  • ज्वायस की रचनाएँ प्रथम बर जब एक पत्रिका ने प्रकाशनार्थ स्वीकृत की तो उनकी आयु चालीस वर्ष हो चुकी थी. "युलिसिस" लिखने में तो उन्हें पुरे बीस साल लगे.
  • नोबल पुरस्कारों के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल साहित्यकार भी थे. उनके एक नाटक नेमिसिस की तीन प्रतियों को छोड़ कर बाकी सभी प्रतियाँ उनके उत्तराधिकारियों ने फूंक दी, क्योंकि नाटक का स्तर इतना गिरा हुआ था कि उससे नोबेल जनता की निगाहों से गिर जाते.

इस तरह साहित्य एक साधना का विषय है. मैंने अपनी प्रथम कविता 13 साल की उम्र में लिखी थी और वह अमृत सन्देश अख़बार में छपी भी थी, लेकिन उसके बाद किसी पत्र में छापी गई किसी ने वापस लौटा दिया. फिर मैंने लगातार 20 साल तक जब भी कविता करने की इच्छा हुयी तब सिर्फ लिखा ही और पत्र पत्रिकाओं में भेजना बंद कर दिया. अब कुछ दिनों से फिर समय निकाल कर सतत लेखन में ही लगा हूँ जिसे ब्लाग पर लगा देता हूँ और कभी मन हुआ तो किसी को भेज देता हूँ. यह कार्य निरंतर जारी है.  

    दीवारें भी चमकेंगी नई रौशनी से! "एक नया अविष्कार"

    विज्ञान तरक्की कर रहा है, नित नयी खोज हो रही हैं. पहले एक मात्र प्रकाश और उर्जा का साधन सूर्य ही था. उसके बाद अग्नि का अविष्कार हुआ. रात के अंधियारे को दूर करने के लिए घी तेल के दिये आये. फिर उसके बाद विद्युत् के अविष्कार ने एक नयी विद्युत क्रांति को जन्म दिया. जिसका उपयोग हम आज तक कर रहें है. अब बिजली के बल्बों और ट्यूब लाईटों का जमाना भी जा रहा है. सी.ऍफ़.एल बल्ब और ट्यूब लाईटें आ गई. 

    इसके बाद वैज्ञानिक इसके आगे कैसी लाईटें हो? और कैसी प्रकाश व्यवस्था हो? इस खोज में लगे हैं. अब एक ऐसा वाल पेपर बनया जा रहा जिसे दीवाल पर लगाने के बाद प्रकाश देगा. यह वाल पेपर २०१२ तक घर-घर पहुँचाने का  दावा किया जा रहा है. कम कार्बन  उत्सर्जित करने वाली तकनीकि से बल्ब से भी अधिक चमकीली और धुप जैसी रौशनी देने वाले वाल पेपर बाजार में आ जायेंगे. जिन्हें जहाँ चाहो चिपका लो.
    ब्रिटेन के समाचार पत्र द टाईम्स के अनुसार इन वाल पेपरों पर एक खास किस्म का रसायन चढ़ा होगा.जो बल्ब से बेहतर रोशनी देगा. इससे ऑंखें भी नहीं चौन्धियाएगी. इन रसायन लिपे पेपरों को रौशन करने के लिए बिजली का करंट ही इस्तेमाल किया जायेगा. लेकिन इसमें वोल्टेज इतना कम होगा की दीवाल पर हाथ लगाने से कोई करंट का झटका नहीं लगेगा. इन वाल पेपरों की रौशनी को रेग्युलेटर से कम और ज्यादा किया जा सकेगा. ये वाल पेपर साधारण बिजली बल्ब से ढाई गुना अधिक प्रभावी और बिजली की खपत कम करने वाले होंगे. इसमें ३ से ५ वोल्ट तक का ही करंट प्रवाहित होगा. यह कार्य ब्रिटिश सरकार द्वारा समर्थित कंपनी कार्बन ट्रस्ट ने इस कंपनी को तकनीकी विकसित करने के लिए अनुदान भी दिया है.
    इस नयी तकनीकि से अवश्य ही बिजली की बचत होगी. इसके शोध करता वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में टेलीविजन, कंप्यूटर, और मोबाइल फोन डिसप्ले में उपयोग की जाएगी. यह कम्पनी इस खास तरह एक पेपर का उपयोग सबसे पहले उन स्थानों पर करेगी जहाँ बिजली नहीं है. वहां इन्हें सौर्य उर्जा और बैटरी से करंट दिया जायेगा. तो अब तैयार हो जाएँ नए तरह के चमकीली उर्जा और प्रकाश देने वाले वाल पेपर अपनी दीवाल पर लगाने के लिए. बिजली और बल्ब का खरचा बचाने के लिए. २०१२ में ये उपहार मिलेगा.




    तुर-तुर-तुर-तुरतुरिया!!!

    चलिए आज तुरतुरिया चलते हैं. नए साल का दूसरा दिन है. मौसम ठंडक है. ऐसे में इस प्राचीन स्थल का भ्रमण करना लाभ दायक होगा. रायपुर से लग भग १५० किलो मीटर दूर वारंगा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली बालमदेई  नदी के किनारे पर स्थित है तुरतुरिया. यहाँ जाने के लिए रायपुर से बलौदा बाजार से कसडोल होते हुए एवं राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर सिरपुर से कसडोल होते हुए भी जा सकते हैं. इसका एतिहासिक, पुरातात्विक, एवं पौराणिक महत्त्व है. तुरतुरिया का बारे में कहते हैं कि श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेही सीता ने यहाँ पर वाल्मीकि आश्रम में आश्रय लिया था. उसके बाद लव-कुश का जन्म यहीं पर हुआ था. रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि का आश्रम होने के कारण यह स्थान तीर्थ स्थलों में गिना जाता है.



    सन 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्.लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी. जिसमे अनेक मंदिर और सदियाँ पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुयी थी. पुरातात्विक इतिहास मिलने के बाद इसके पौराणिक महत्व की सत्यता को बल मिलता है.यहाँ पर कई मंदिर बने हुए है. जब हम यहाँ पहंचते हैं. तो हमें सबसे पहले एक धर्म शाला दिखाई देती है जो यादव समाज ने बनवाई है.कुछ दूर जाने पर एक मंदिर है. जिसमे दो तल हैं, निचले तल में आद्य शक्ति काली माता का मंदिर है. दुसरे तल में राम जानकी मंदिर है. जहाँ संगमरमर की मूर्तियाँ हैं. साथ में लव कुश एवं वाल्मिकी की मूर्तियाँ हैं. मंदिर के नीचे बांयी ओर एक जल कुंड है. जल कुंड के ऊपर एक गौमुख बना हुआ है. जिसमे डेढ़ दो इंच मोटी जलधारा तुर-तुर-तुर की आवाज करती हुयी लगातार गिरती रहती है. शायद इसी कारण इस जगह का नाम तुरतुरिया पड़ा है.


    माता गढ़ नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है. जहाँ पर महाकाली विराजमान हैं. नदी के दूसरी तरफ एक ऊँची पहाडी है. इस मंदिर पर जाने के लिए पगडण्डी के साथ सीडियां भी बनी हुयी हैं.माता गढ़ में कभी बलि प्रथा होने के कारण बंदरों की बलि चढ़ाई जाती थी. लेकिन अब पिछले 15 -20 सालों से बलि प्रथा बंद है. अब यहाँ सिर्फ सात्विक प्रसाद चढ़ाया जाता है. माता गढ़ में एक स्थान पर वाल्मिकी आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में जानकी कुटिया है. यह एक लोक मान्यता है.


    यहाँ प्रति वर्ष पौष की पूर्णिमा के दिन मेला भरता है. कवि वाल्मिकी की कर्म भूमि.बौद्ध साधकों की तपोभूमि और शाक्तों की साधना भूमि के भाव त्रिकोण , धर्म, काम, मोक्ष  के पुरुषार्थ त्रय के दिव्य त्रिकोण और शैल शिखरों से निर्मित सहज प्राकृतिक भूमि क्षेत्र दर्शनीय है. मेला भरने के समय हजारों श्रद्धालुओं का तुरतुरिया आगमन होता है. धार्मिक एवं पुरात्रत्विक महत्त्व के साथ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य की भी छटा निराली है. चारों ओर गहन जंगल है और इसमें मोर, चीतल, सांभर, बराह, तेंदुआ, बाघ, भालू इत्यादि वन्य प्राणी भी निवास करते है. कुल मिला कर दर्शनीय स्थल है. यहाँ पर आकर देखें साक्षात् प्रकृति सौंदर्य का लाभ मिलता है.       

    120 दिन 356 पोस्ट- स्वागत 2010- हार्दिक बधाई

    नवल धवल सूरज से आलोकित, हो घर आँगन परिवार
    नूतन वर्ष २०१० की आपको अशेष शुभकामनाएं अपार

    बाधाएं दूर हो जीवन की, नित प्रेम सुरभि का हो संचार
    मन में करुणा व्यापे निश दिन, बढे सुखों का कोषागार 

    आज नव वर्ष २०१० का प्रथम सूर्योदय हो चूका है. सूर्य की स्वर्णिम किरणे धरा को स्वर्णमयी चादर में लपेट चुकी हैं. गुलाबी ठण्ड में कोहरे की हलकी सी धुंध प्रकाश की  किरणों का मार्ग रोकने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन किरणों को तो धरा पर आना है, एक सत्य की तरह, चाहे कितनी भी धुंध की चादर उसे ढकने का असफल प्रयास कर लें, किरणों को तो मंजिल तक पहुंचना ही है.अब पथिक चल पड़ा है. दृढ निश्चय करके लक्ष्य की ओर, जहाँ उसे पहुंचना ही है. यही जीवन है.दृढ निश्चयी पथिक मंजिल पा ही लेता है. चाहे कितने भी अवरोधक खड़े किये जाएँ उसे रोकने के लिए. इन दिनों में मैंने यही देखा है. मैं बैठा था बीते हुए वर्ष में मैंने ब्लॉग जगत पर जो लिखा उसकी चर्चा करने के लिए.

    गत जनवरी माह में मैं ब्लाग पर आ चूका था. लेकिन सक्रिय लेखन १५ जुलाई से प्राम्भ किया. उसके बाद सिलसिला बदस्तूर जारी है. जो कारवां एक बार चल पड़ा वो रुका नहीं है. इस यात्रा में बहुत से सहयात्री मिले. उनका बहुमूल्य सहयोग मुझे प्राप्त हुआ. मैंने शिल्पकार के मुख से ब्लाग पर कवितायेँ लिखना प्रारंभ किया. उसके पश्चात् "एक लोहार की" , ललित डोट कॉम, ललित वाणी, अड़हा के गोठ,  इससे पूर्व गुरतुर गोठ में छत्तीसगढ़ी लिखता रहा. जब मित्रों का दायरा बढा तो एक सामूहिक ब्लॉग की आवश्यकता हुयी, तब आपस में विचार करके चर्चा पान की दुकान पर ब्लाग का उदय हुया. मैंने अन्य सामूहिक ब्लॉग पर भी लिखा उल्टा तीर, नेट प्रेस, जबलपुर ब्रिगेड, साल के अंत में आते-आते चर्चा मंच पर चिटठा चर्चा भी लिखी. अंतिम में हिंदी चिटठा चर्चा परिवार में शामिल हुआ. इसके पूर्व पंजाबी ब्लाग पंजाब दी खुशबु में भी अपना पंजाबी लिखने का शौक पूरा करने के लिए शामिल हुआ.

    इस अवधि में मैं सभी ब्लॉगों पर लगातार 356 पोस्ट लिखी, जिन्हें लग भग २,८६,289 पाठकों ने अपना प्रेम और स्नेह दिया तथा सभी को मिलाकर अभी तक 1665 टिप्पणियां प्राप्त हुयी. यह मेरे गत वर्ष के लेखन का लेखा जोखा था. जहाँ तक कोशिश हुयी की मेरी दो पोस्ट लगातार प्रकाशित होती रहे और मैं इसमें कामयाब भी हुआ. एक गृहस्थ जीवन के झंझावातों से समय निकाल कर इतना कर पाना बहुत ही मुश्किल है. लेकिन मैंने इसे निरंतर करने की पुरजोर कोशिश की. 

    इन दिनों में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. ब्लॉग की राजनीति से मैं दूर था और हमेशा ही दूर रहना चाहूँगा. क्योंकि मैंने राजनीति को बहुत ही करीब से जीया है. जहाँ तक लोगों का पहुंचना एक सपना है. उसे मैं छोड़ कर आ चूका हूँ अपने घर, अब मुझे सिर्फ शांति से बैठ कर लेखन कार्य ही करना है. इसलिए मैं इस ब्लाग राजनीति दूर रहता हूं और अपनी टिप्पणी भी सोच समझ कर देता हूँ कि मेरी किसी टिप्पणी से किसी को ठेस मत पहुंचे. ईश्वर ने अभी तक तो साथ दिया है. अपनी कृपा बनाये रखी है. आगे उसकी मर्जी. "जेहि विधि रखे राम तेहि विधि रहिये".

    इस यात्रा में मेरे सहयोगी बने उनमे प्रथम नाम संजीव तिवारी जी का ही आता हैं. उनसे मेरी मुलाकात नेट पर ही हुयी उन्होंने मुझे ब्लागिंग की बारीकियों के विषय में अवगत कराया. फिर समीर लाल जी ब्लॉग पर पहुचे अपने उड़ान तश्तरी लेकर. तब लेकर उनसे रोज दुआ सलाम हो ही जाती है.ताऊ जी रामपुरिया जी का अपार स्नेह प्राप्त हुआ.अनिल पुसदकर भैया, बी.एस. पावला, अविनाश वाचस्पति ,डॉ.सत्यजित साहू. "गिरीशपंकज भैया  अलबेला खत्री, आचार्य रूपचंद शास्त्री, निर्मला कपिला , संगीता पूरी , कुसुम ठाकुर, श्रीमती आशा जोगलेकर, अल्पना देशपांडे, बबली, लवली कुमारी,पी.सी. गोदियाल , परमजीत बाली जी,  संजीव तिवारी, शरद कोकास, दिनेश राय दिवेदी ,गिरिजेश राव, गिरीश पंकज, राजकुमार ग्वालानी, जी.के अवधिया, खुशदीप सहगल, राजीव तनेजा, पंकज मिश्रा, राज भाटिया. ज्ञान दत्त पांडेय, चिटठा चर्चा वाले अनूप शुक्ल जी ने भी चर्चा में स्थान दिया , हिन्दी चिटठा चर्चा में पंकज मिश्रा जी ने चर्चा की . अजयकुमार झा से मित्रता हुयी., एम् वर्मा, परम जीत बाली, श्यामल सुमन, महेंद्र मिश्रा  शिवम् मिश्रा सदा अदृश्य रहें वाले टिप्पू चाचा, मुरारी पारीक, रतन सिंग शेखावत जी, ताऊ जी लट्ठ वाले, रवि रतलामी  सूर्यकांत गुप्ता, बाल कृष्ण अय्यर, सुनील कौशल, विवेक रस्तोगी, रवि  कुमार रावतभाठा, दीपक तिरुवा महफूज अली  अजय कुमार जी.पंडित डी.के.शर्मा"वत्स", का अपार स्नेह मिला.

    अब चर्चा पान की दुकान पर समीर लाल जी , ताऊ रामपुरिया जी , अजय झा जी, राजीव तनेजा जी, जी.के. अवधिया जी. योगेन्द्र मौदगिल जी, अनिल पुसदकर जी , गिरीश पंकज जी ,शरद कोकास जी,  महेंद्र मिश्रा जी, कुसुम ठाकुर जी, बालकृष्ण अय्यर जी , संजीव तिवारी जी, राजकुमार ग्वालानी जी . बी.एस. पावला जी, अपनी उत्कृष्ट रचनाये दे रहे है. इस तरह छत्तीसगढ़ से हमारा सामूहिक ब्लाग चल रहा है. हमारा उद्देश्य है की हम पाठकों को अच्छी से अच्छी रचनाएँ दे.

    अभी कुछ दिनों में नए साथी भी मेरे से जुड़े. जिसमे डॉ. टी.एस. दराल जी,अरविन्द मिश्रा जी, दिनेश राय दिवेदी जी, डॉ. रूपचंद शास्त्री जी, कार्टूनिस्ट काजल कुमार जी, सुरेश शर्मा जी, जबलपुरिहा दुबे जी, हिमाशु जी, वाणी गीत जी, विवेक गुप्ता जी , मनोज कुमार जी, अदा जी, अल्पना वर्मा जी, सुनीता शानू जी, रेखा प्रह्लाद जी, शबनम खान जी, गिरीश बिल्लोरे जी, प्रवीण शाह, अंतर सोहिल जी, जाकिर अली रजनीश जी, स्मार्ट इंडियन जी, बवाल जी, हमारे युवा साथी कुलवंत हैप्पी जी, मिथलेश दुबे जी,  का साथ मिला, अब कारवां बढ़ चला है. ब्लाग जगत का परिवार भी बढ़ रहा है.

    मैं सभी पाठको एवं ब्लागर मित्रों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और आशा करता हूँ कि जब तक मैं इस दुनिया में हूँ इसी तरह अपना स्नेह बनायें रखे. आपका आभारी रहूँगा. यदि किसी मित्र का नाम मानवीय भूल से इस सूची में छुट गया हो तो मुझे क्षमा करना. तथा मुझे आगाह करना, यही मित्रता है, मित्र की भूल को क्षमा कर देना. आपसे पुन: आशीष की आकांक्षा के साथ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये. कुछ मित्रों के समयाभाव होने के कारण लिंक नही दे पाया क्षमा प्रार्थी हूँ. 

    आपका स्नेहाकांक्षी 
    ललित शर्मा  

     

     

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