शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

चुड़ैल से सामना और भुतहा रेस्ट हाउस की कहानी

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वापसी की यात्रा पहाड़ से उतरने वाली थी।  सभी धड़ल्ले से उतर रहे थे। सुमीत भी एक झटके में ही नीचे उतर आया। रास्ते में मुझे एक कोटपुतली राजस्थान के श्रद्धालु मिले। उनकी चुंदड़ी वाली पगड़ी देख कर उनसे कुछ बात चीत की।

उन्होने बताया कि लगभग डेढ सौ साल पहले उनका परिवार कबीर साहब का अनुयायी बना था। तब से पीढी दर पीढी हम निभा रहे हैं। एक परिवार दार्जलिंग से आया हुआ था।

इस परिवार के मुखिया देवमणि जी से मेरी कई किलोमीटर तक चर्चा हुई। उन्होने भी बताया कि लगभग 200 वर्षों से उनका परिवार कबीर पंथ का अनुयायी रहा है। इनके साथ कई माताएं भी आई थी दार्जलिंग से।

उनका उत्साह देखते ही बनता था। इन्होने अपना सामान चाय तोड़ने की टोकरी की तरह सिर पर टांक रखा था। भारत के कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे थे।

वापसी पर जंगल के रास्ते में हमें हिरण, जंगली सुअर, चिंकारा आदि देखने मिले। जो नाले में पानी पी रहे थे।

देवमणि से बातें करते हुए मैं सुमीत और गुड्डु से पीछे रह गया था। ये काफ़ी आगे बढ गए। जब देवमणि के पीछे छुटने वाले परिवार का फ़ोन आया तो मैने उन्हे रुकने के लिए कहा और आगे बढ गया।

थोड़ी देर चलने के बाद सुमीत लोग दिखाई दे गए। जल्दी जल्दी कदम बढाने पर उनके पास पहुंच गया। जब अभ्यारण का गेट दिखाई दिया तो लगा कि बांधवगढ को हमने फ़तह कर लिया।

गेट पर फ़ारेस्ट के गार्ड और रेंजर दिए गए पास वापस ले रहे थे और उस पास में लिखी हुई संख्या को गिन रहे थे। कहीं कोई जंगल में रह जाए और कोई हादसा हो जाए तो लेने के देन पड़ जाएगें। हमने भी अपना अनुमति पत्र उनके पास जमा करा दिया।

कबीर पंथ के प्रथम गुरु धनी धर्मदास और आमीन माता मंदिर
होटल पहुंचने पर टांगे जवाब दे चुकी थी। क्योंकि बीस किलोमीटर रिकार्ड समय में लगातार चलना मामुली नहीं है। ठंड बढ चुकी थी। पानी ठिठुर रहा था।

गर्म पानी मंगाकर पैरों की सिकाई की गयी और तय किया की भोजन करके कुछ देर सोया जाए और आधी रात को उठकर वापसी की जाए।

भोजन करके सो गए। रात डेढ बजे मेरी नींद खुली। मैने इन्हे जगाया। बड़ी मुस्किल से दोनो महानुभाव उठे। सामान पैक किया गया। होटल का बिल चुकाया।

वैसे नर्मदा लाज रुकने ले लिए उत्तम है और यहां के रसोईए ने उम्दा खाना खिलाया। रेट कुछ ज्यादा था लेकिन उम्दा खाने ने कसर पूरी कर दी।

मैने स्कार्पियों की बीच वाली सीट पकड़ी, गुड्डू ने पिछली सीट और सुमीत ने ड्रायवर के साथ वाली। गाड़ी चल पड़ी बांधवगढ से अपने गंतव्य की ओर।

गुड्डू के खर्राटे शुरु हो गए। मैने शंका होने पर जंगल में गाड़ी रुकवाई, गाड़ी में हीटर चल रहा था बाहर निकलते ही ठंड का पता चल गया।

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। जल्दी से गाड़ी में घुस कर मैने सोने का यत्न किया लेकिन नींद नही आ रही थी। सुबह 4 बजे के बाद नींद आई तो सपने में एक भयानक चुड़ैल का चेहरा दिखाई दिया।

मैं उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उसका चेहरा लगातार बदलता जा रहा था। उसके रुप बदलते जा रहे थे।

मुझे कह रही थी कि –“ अब तुम्हारा समय पूरा हो गया है, तुम्हे मेरे साथ चलना ही पड़ेगा।“ फ़िर उसके चेहरे का रंग अनवरत बदलने लगा।

मैंने उसे गाली दी और गन की ओर हाथ बढा रहा था। गन मेरे हाथ से दूर छिटकते जा रही थी। तभी मेरी आँख खुली तो देखा कि गाड़ी जंगल में खड़ी है। मैने गाड़ी रुकने का कारण पूछा तो सुमीत बोला नींद आ रही है। 

मैने कहा कि अब तुम लोग सो जाओ,गाड़ी मैं चलाता हूँ। मैने ड्रायविंग सीट संभाली तो मील का पत्थर बता रहा था कि केंवची 18 किलोमीटर है।

केंवची पहुंच कर मैने गाड़ी एक होटल में लगाई चाय पीने के लिए। गाड़ी से निकल कर चाय बनते तक ठिठुर चुका था।

होटल की भट्टी की आँच भी गरमाहट नहीं दे रही थी। मिस्त्री ने बताया कि दो दिनों से यहां पाला पड़ रहा है। पानी जमने लगा है।

जल्दी से चाय के घूंट लेकर मैं आगे बढ लिया। केंवची से अचानकमार टायगर अभ्यारण प्रारंभ हो जाता है। जंगल के बीच पहाड़ी घुमावदार पहाड़ी रास्ते पर इतने मोड़ हैं कि गिनती ही नहीं हो सकती। सर्पीला रास्ता गाड़ी की स्पीड बढाने ही नहीं दे रहा था।  

सूर्योदय हो रहा था, सामने सूरज की किरणे सीधे ही चेहरे पर पड़ती थी तो रास्ता दिखाई नहीं देता था। अचानकमार अभ्यारण में रात में भारी वाहनों का प्रवेश वर्जित है तथा साथ में यह भी हिदायत है कि रात 6 बजे से सुबह 8 बजे तक अभ्यारण में कहीं पर वाहन खड़ा नहीं कर सकते।

यहाँ भी शेर देखे जाते हैं। लेकिन बांधवगढ जैसे अचानकमार में शेर का लोकेशन फ़ारेस्ट के लोगों को पता नहीं रहता। शेर यहां वहां घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं। अचानकमार अभ्यारण में कई गांव भी हैं जहां लोगों की बसाहट है।

यहां प्रकाश के लिए सोलर लाईटें लगी है और ठंड भी अन्य क्षे्त्रों की अपेक्षा अधिक ही पड़ती है। पिछली बार मुझे गर्म कोट पहनना ही पड़ गया था। जबकि पेंड्रारोड़ में ठंड नहीं थी।

वैसे भी जंगली इलाके में ठंड का असर कु्छ अधिक ही होता है। ग्रामीण आग जलाकर घर को गर्म कर लेते हैं और महुआ रस पीकर तन को। इस प्रकार ठंड से उनका बचाव हो जाता है।

अचानकमार के जंगल के छपरवा गांव में फ़ारेस्ट का एक रेस्टहाउस है। जिसमें भूतों का डेरा है। स्टार न्युज के “डरना मना है’ कार्यक्रम में इस रेस्ट हाउस के विषय में एक स्टोरी देखी थी।

तब से मेरे इच्छा है कि एक रात इस रेस्ट हाऊस में जरुर गुजारुं और भूतों से मुलाकात करुं। स्टोरी में रायपुर के एक परिवार के बारे में ही बताया गया था कि वे रात को छपरवा रेस्ट हाउस में रुक गए थे।

जब खाना खाने लगे तो उन्हे पर्दे हिलते हुए नजर आने लगे कि जैसे परदे की पीछे कोई है। फ़िर उन्हे छाया दिखाई देने लगी। कहते हैं कि चौकीदार ने उन्हे रुकने से मना किया था। लेकिन वे नहीं माने। फ़िर कोई आकृति दिखाई दी।

थोड़ी देर के बाद सब शांत हो गया। लेकिन वे सब आपस में ही लड़ने लगे और एक दुसरे को मरने मारने पर उतारु हो गए। किसी तरह वे रात को रेस्ट हाउस से बाहर निकल कर भागे तो उनकी जान बची।

इस तरह की घटना और भी लोगों के साथ हो चुकी है। बताते हैं कि यहां किसी ने अपनी पत्नी को जला दिया था। तब से वही लोगों को नजर आती है।

रात को इस रेस्ट हाउस में कोई रुकता नहीं है। मैने जब से यह स्टोरी देखी है तब से इस रेस्ट हाउस में एक रात गुजारने का मन बना चुका हूँ लेकिन वह रात कब आएगी? यह अभी तय नहीं हुआ है।

यह रेस्ट हाऊस मेरे सामने आया तो मैं गाड़ी से उतरकर रेस्ट हाउस को देखा। सुबह का समय  था इसलिए चौकीदार दिखाई नहीं दिया। वह रात नहीं रुकता शायद अपने घर चला जाता है। 

मैने रेस्ट हाउस की फ़ोटो ली  और आगे की यात्रा जारी रखी। यह रेस्ट हाउस अचानकमार अभ्यारण्य के घनचोर जंगल में है। मैं भूत प्रेत इत्यादि को मानता नहीं हूँ अगर कोई ब्लॉगर मित्र मेरे साथ इस रेस्ट हाउस में रात रुकना चाहता है तो उसका स्वागत है।

अभ्यारण्य में दो जगह गाड़ी के नम्बर एवं ड्रायवर का नाम लिखा जाता है। एक जांच चौकी बनी है। ताकि अनाधिकृत रुप से कोई शिकारी वन्य जीवों को नुकसान ना पहुंचा दे।

वन्य प्राणियों की सुरक्षा की दृष्टि से आने जाने वालों की जानकारी रखना आवश्यक है। अचानकमार के जंगल से मैं लगभग नौ बजे बाहर निकल चुका था। मुझे लगा कि गाड़ी में एक सवारी कम है।

मैने ड्रायवर से पूछा कि गुड्डू कहां है? तो पता चला कि उसे पेंड्रारोड़ से लिया था वहीं छोड़ दिया गया है। मैने लगातार नांदघाट तक गाड़ी ड्राईव की। यहां चाय नास्ता करने के बाद सुमीत ने स्टेयरिंग संभाल लिया।

सुमीत गाड़ी कमाल की ड्राईव करता है। जब यह गाड़ी चलाता है तो मैं चैन से सो जाता हूँ। इसने मुझे साढे 12 बजे घर पहुंचा दिया। इस त्तरह हमारी बांधवगढ की यात्रा सम्पन्न हुई।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

कबीर दास का बांधवगढ,हुमायूँ का पीछा और शेरों का कब्जा


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हमें पेंड्रारोड़ के पड़ाव को छोड़ना था और जाना था  बांधवगढ की ओर। होटल पहुंच कर सामान उठाया चल पड़े मंजिल की ओर।

वेंकटनगर से हमने मध्यप्रदेश में प्रवेश किया। अनूपपुर होते हुए शहडोल पहुंचे। रास्ते में चचाई पावर प्लांट के पास एक होटल में खाना खाया। उमरिया से बांधवगढ के लिए रास्ता है। 15 किलोमीटर की यह सड़क खराब है।

रात को ढाई बजे हम ताला गांव याने बांधवगढ पहुंचे। यहां पहुंचने पर पता चला कि सभी रिजोर्ट और होटल फ़ुल चल रहे हैं। एक रिजोर्ट में गए तो उसने 2000 से कम कोई भी कमरा उपलब्ध नहीं है बताया। तब हमने उससे पूछा कि और किस जगह कमरा मिल सकता है। तो उसने नर्मदा लाज का पता बताया।

हम नर्मदा लाज में पहुंचे वहां भी उसने 2000 और 1500 रुपए ही बताए। लेकिन मैने थोड़ा मोल भाव किया तो 800 रुपए में वह तैयार हो गया। ठंड इतनी अधिक थी कि पानी जम रहा था। इसलिए एसी रुम की जरुरत ही नहीं थी। अलबत्ता डबल कंबल के बिना ठंड नहीं रुकने वाली थी। इसलिए हमने और कम्बल लिए। 

बांधवगढ अभ्यारण्य का मेन गेट
बांधवगढ का किला वर्ष में एक बार कबीर दर्शन के नाम से खुलता है। इस दिन हजारों कबीर पंथी श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

इस दिन यहां प्रवेश शुल्क की छूट रहती है। अन्य दिनों में 6 सवारियों के लिए 1200 रुपए की टिकिट और 2700 रुपए जिप्सी का चार्ज लगता है। किले तक नहीं ले जाया जाता। सिर्फ़ शेर दिखाया जाता है।

हमें बताया गया कि किले तक की यात्रा पैदल करनी पड़ेगी। गाड़ी ले जाने की मनाही है। अभ्यारण होने के कारण उसके नियमों का पालन करना पड़ेगा।

यहां के डायरेक्टर पाटिल ने सिर्फ़ एक ही गाड़ी ले जाने की अनुमति दी थी जिसमें दामाखेड़ा गद्दी के गुरु जी प्रकाश मुनि नाम साहेब जी ही जाएगें। हम 9 बजे करीब अभ्यारण के गेट पर पहुंचे तो वहां जाने वालों की कतार लगी हुई थी।

सारी स्थिति को समझ कर हमने तय किया कि सबसे पहले पेट भर कर नास्ता किया जाए और पानी साथ में रख लिया जाए।

हमने डबल नास्ता किया और 4 बोतल पानी साथ में रख लिया। अनुमति पत्र तो मैं पहले ही बनवा चुका था। अभ्यारण में किले तक लगभग 6 किलो मीटर चलना पड़ता है फ़िर किले के लिए 4 किलोमीटर की पहाड़ी चढाई करनी पड़ती है।

रास्ते में खाने पीने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए बाहर से ही तैयार होकर जाना पड़ता है। हमने भी अंदर का हाल नहीं देखा था। फ़िर भी 10 बजे हमने पैदल यात्रा प्रारंभ की। जयकारा लगाया बोल बाबा की जय और चल पड़े।

रास्ते में प्राकृतिक सौंदर्य का रस पान करते हुए आनंदित हो रहे थे। भक्तों का रेला छोटे बच्चों के साथ चल रहा था। किले के रास्ते को छोड़ कर अन्य रास्तों पर गार्ड लगे थे।

जहां शेर मौजुद था वहां हाथी खड़े कर रखे थे। हम भी गपशप करते चल रहे थे। किले में पहुंचते ही पहली चढाई पर पहाड़ में खोद कर बनाई हुई घुड़साल नजर आई। इसमें कई दरवाजे एक साथ हैं।

मैने अंदाजा लगाया कि राजा लोग किले तक रथ या बैलगाड़ी से आते होगें। उसके बाद मैदान में बैलगाड़ी या रथ छोड़कर पहाड़ पर चढने लिए घोड़े का उपयोग करते होगें।

इसलिए किले के प्रारंभ में ही घुड़साल बनाई गयी है। धीरे-धीरे चढाई चढते रहे। सुमीत भी जोर आजमा रहा था। 103 किलो वजन होने के बाद भी उसकी हिम्मत काबिले तारीफ़ है। मैं शार्टकट के चक्कर में रास्ते को छोड़ कर सीधी चढाई चढ रहा था। एक बार सुमीत को भी चढाया लेकिन बाद में उसने हाथ खड़े कर दिए।

सुमीत दास, ललित शर्मा, शरद(गुड्डु) शेष शय्या के सामने
सबसे पहले शेषशय्या आती है। जहां 35 फ़ुट लम्बे पत्थर को तराश कर सात फ़नों वाले शेषनाग पर विष्णु भगवान लेटे हैं।

विष्णु भगवान को समृद्धि और एश्वर्य का देवता माना जाता है। इस प्रतिमा को कलचुरी राजा युवराजदेव के मंत्री गोल्लक ने 10 वीं सदी ईसवीं में बनवाया था। यह मूर्ति बलुवा पत्थर से निर्मित है। मूर्ति के चरणों के पास से एक झरना झरना निकल रहा है इसे चरण गंगा का नाम दिया गया है।

पुराणों में इसे वेत्रावली गंगा कहा गया है। चरण गंगा सदानीर जल स्रोत है यहां कई नाले आकर मिलते हैं यह बांधवगढ के वन्यजीवों के लिए जीवन धारा के समान है। चरणगंगा से ताला स्थित पर्यटक संकुल को एवं कई गावों को पानी मिलता है। इस कुंड में काई जमने से पानी हरा हो गया है।
 
यहां से सीधी चढाई शुरु हो जाती है। एक जगह पर मेरे हाथ के पास खुजली हुई। मैने मुड़ कर देखा तो एक पेड़ दिखाई दिया। जिसमें केंवाच की फ़ली लटकी हुई थी। उसे किसी ने हिला दिया था। उसके रेसे हवा में तैर रहे थे।

मैं तो तुरंत ही भागा वहां से, कुछ लोग खड़े रहे  बाद में क्या हाल हुआ होगा उनका राम ही जाने। हम किले के मुख्य दरवाजे तक पहुंच गए। तो लगा कि अब पहुच ही गए। यहां से दो किलोमीटर और चलना था कबीर तलैया तक।

उबड़ खाबड़ रस्ते पर चलते हुए दुसरे दरवाजे तक पहुंचे तो वहां भग्न अवस्था में एक बजरंगबली का मंदिर दिखा। उसके बाद तीसरा दरवाजा आया वहां भी बजरंग बली का मंदिर था। 

इसके आगे चलने पर देखा की लोग एक पेड़ की पत्तियाँ तोड़ने में लगे हुए थे किसी ने इस पेड़ के विषय में कह दिया कि इसकी पत्तियाँ गठिया वात रोग के इलाज में काम आती है। बस फ़िर क्या था लोग लग गए तोड़ने।

मैं उनकी फ़ोटो ले रहा था। तभी मुझे उस पेड़ में भी केंवाच की बेल दिखाई दी। लोगों को बताने के बाद भी नहीं माने। मेरे से  ही पूछ रहे थे कि केंवाच क्या होता है। भैया जब तक गोबर से नहीं नहा लेगें तब तक केंवाच ही केवांच रटते रहगें और खुजाते रहेगें।

अब भीड़ को कौन समझाए। शायद वे लोग अभी तक खुजा रहे होगें और कह रहे होंगे की फ़ौजी की बात मान ही लेते तो यह दिन नहीं देखना पड़ता।
 
रास्ते में एक बड़ा पक्का तालाब मिला। इसका पानी भी निकासी नहीं होने के कारण हरा हो गया था। तभी मुझे उसमें तैरता हुआ एक मगरमच्छ दिखाई दिया। कैमरे को जूम करने के बाद भी उसकी फ़ोटो नहीं आई। तालाब बहुत बड़ा है।

कहते हैं कि किले में 12 तालाब हैं जिसमें से 2 तो हमने देखे बाकी का पता नहीं। इन तालाबों में बारहों महीने पानी भरा रहता है।

किले की इमारते तो उजड़ गयी है। लेकिन कुछ मंदिर अभी बचे हुए हैं। किंवदंती है कि रावण को मारने के बाद राम इस जंगल में से गुजरे थे तो उन्होने अपने भाई लक्ष्मण को भेंट करने के लिए इस किले का निर्माण कराया था। इसीलिए इसका नाम बांधवगढ पड़ा। 

घुड़साल में दो घोड़े
किंवदंती की बात छोड़ दें तो यह किला 552 एकड़ में फ़ैला है। समुद्र तल से 811 मीटर की उचाई पर स्थित है। इसका निर्माण तीसरी शताब्दी में हुआ था।

तीसरी सदी से लेकर 20 वीं सदी तक वाकटक, कलचुरी, सोलंकी, कुरुवंशी और बघेल राजवंशों ने यहां से राज किया।

सोलहवीं सदी में संत कबीर भी यहां कुछ वर्ष रहे थे। जब शेरशाह सूरी हुमायूँ का पीछा कर रहा था तब किले में मुगल बादशाह हुमांयू की बेगम को भी शरण मिली थी। इसका अहसान चुकाते हुए हुमांयू के बेटे अकबर ने बांधवगढ के नाम से चांदी के सिक्के जारी किए थे।

1617 में बघेल अपने राज्य की राजधानी रींवा ले गए और उसके बाद इस किले को खाली कर दिया गया तब से इस पर वन्य जीवों का ही कब्जा है। शेर भी यहां घुमते रहते है।

आगे चलने पर हम कबीर तलैया पहुंचे। यहां पर लोग स्नान कर रहे थे। कोई मुंडन करवा रहा था। कोई इसका जल बोतल में भर कर ले जा रहा था जिससे वह इसका उपयोग गंगा जल की तरह पवित्री करण के लिए कर सके।

कोई रास्ते में बैठकर भोजन कर रहा था। यहां पहुच कर तो मेला ही लगा हुआ था। हमें भी यहां पहुंच कर अहसास हुआ की कुछ भोजन सामग्री ले कर आना था। क्योंकि भूख लगने लगी थी और यहां कुछ मिलता नहीं है।

दो आदमी एक जगह पर चूना पत्थर तोड़ रहे थे। उन्हे मैने भी देखा था तब गुड्डु ने बताया कि एक कह रहा था कि आधा आधा रख लेते हैं साल भर चंदन नहीं खरीदना पड़ेगा। सुनने वाले और हम हँस पड़े। कबीर दास जी ने जिस पाखंड का विरोध किया था। उसका अनुशरण करना छूटा नहीं है।

कबीर गुफ़ा पर श्रद्धालु
जिस स्थान पर कबीरदास जी निवास करते थे वहां एक गुफ़ा है। उस गुफ़ा में दर्शन करने वालों का तांता लगा हुआ था। उसके पास ही महंत लोग बैठे थे अपने-अपने जजमान को मुड़ने के लिए।

 एक गाड़ी में पानी लाया गया था उसके लिए लोग मारा मारी कर रहे थे। प्रशासन को यहां कम से कम पानी की व्यवस्था तो करनी ही चाहिए थी। हमारे साथ यात्रा पर एक बूढी माई भी थी, जिनकी उम्र 94 वर्ष थी वे झुकी कमर से पैदल चल कर यहां तक पहुंची थी।

थानेदार ने उन्हे अपनी जिप्सी में बैठा लिया और खाने का पैकेट दिया। उसे आश्वस्त किया कि जब वे नीचे जाएंगे तो अपने साथ उसे गाड़ी में ले जाएगें। 

94 वर्षीय माई और थानेदार धुर्वे
आस्था बलवान होती है। उस आस्था के बल पर माई इतनी दूर पैदल चली आई।अब वापसी की तैयारी थी। सुमीत चित्त हो रहा था लेकिन वापिस तो जाना ही था।

वापसी में कबीर तलैया की दुसरी तरफ़ धनी धर्मदास और आमीन माता का स्थान बना हुआ है। बताते हैं कि यहां पर कबीर दास जी उन्हे उपदेश दिया करते थे। यहां पर भी हम गए।

श्रद्धालु इस स्थान पर नारियल और अगरबत्ती जला रहे थे। किले में मुझे बजरंगबली के कई मंदिरों के भग्नावेष दिखाई दिए। इससे महसूस हुआ कि तत्कालीन राजा हनुमान जी के बड़े भक्त रहे होगें।

एक जगह पर हनुमान जी के मंदिर के सामने एक लोहे का गदानुमा सामान पड़ा था जिसे उठाकर लोग जोर आजमाईश कर रहे थे। मैने उठाया लेकिन उसका हत्था छोटा होने के कारण हाथ से फ़िसल जाता था।

यहां पर राजाओं द्वारा बनाई गयी सैनिक छावनी के भी अवशेष दिखाई दिए। लेकिन राजा के रहने के महल इत्यादि का ठिकाना नहीं मिल सका। पूरे किले में घना जंगल खड़ा हुआ है। कहां से कौन जानवर निकल आए पता नहीं। इसलिए हमने मुख्य मार्ग छोड़कर अन्य कहीं तलाश करने का यत्न नही किया।


अचिंत दास
कबीर पंथ गुरु गद्दी दामाखेड़ा के गद्दीनशीन प्रकाश मुनि नाम साहेब के मुख्य कार्य सहयोगी अचिंत दास से सुबह बांधवगढ में मुलाकात हुई।

इस आयोजन के लिए इन्होने बहुत मेहनत की। शासकीय अनुमति से लेकर श्रद्धालुओं के हाल चाल पुछने तक।

अभ्यारण्य के डायरेक्टर पाटिल ने इन्हे सिर्फ़ एक ही वाहन किले तक ले जाने की अनुमति दी। ये मंत्री से लेकर संत्री तक फ़ोन लगाते रहे कि और वाहनों की अनुमति मिल जाए। लेकिन उन्हे प्रयास में सफ़लता नहीं मिली।

हमारे रुम में ही सदा मुस्कुराने वाले इनके मनमोहक चेहरे का दीदार सुबह ही हो गया था। हमने साथ-साथ ही प्रातराश लिया और ये हमारे साथ अभ्यारण्य के मुख्यद्वार तक आए। अचिंत दास विगत 25 वर्षों से दामाखेड़ा गुरु गद्दी की सेवा में लगे हैं। साहेब बंदगी साहेब। आगे पढ़ें 

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

उधारी में हजामत, दो लड़कियाँ, महुआ की हंड़िया और गांव का हाट

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शाम हो रही थी। शोण कुंड के पास ही साप्ताहिक हाट लगा हुआ था। छत्तीसगढ में सुदूर अंचल के गावों में साप्ताहिक हाट लगना सामान्य बात है।

यहां पर लोग अपने रोजर्मरा के काम आने वाले सामान खरीद लेते है सप्ताह भर के लिए। वस्तु विनिमय भी हो जाता है।

इन साप्ताहिक बाजारों का अपना ही महत्व है। पांच सात गावों के मुख्य गांव में यह बाजार लगते है। बाजार में आने वाले लोग अपने आस-पास के गावों में रहने वाले परिजनों से भी मिल लेते हैं। उनका हाल-चाल भी जान लेते है। कुछ समय साथ-साथ बिता लेते हैं।

माँ को बेटी मिल जाती है। वह उसका हाल चाल पूछ लेती है। हाट से उसे कुछ सामान दिला देती है। अगर गांव से कुछ सामान लेकर आई है तो वह बेटी तक पहुंच जाता है। 

हाट बाजार में आवश्यकता की सभी वस्तुएं मिल जाती है। सब्जी से लेकर इलेक्ट्रानिक सामान तक। सभी दुकाने अस्थाई होती हैं लेकिन उसके लगने की जगह, दिन और समय निश्चित होता है।

बाजार का दृश्य मनमोहक होता है। सजी धजी महिलाएं और पुरुष मोल भाव करते नजर आते हैं तो युवा लड़के-लड़कियाँ एक दूसरे से पहचान बढाते।

आधुनिकता के इस दौर में गांव भी अछूते नहीं है मोबाईल क्रांति की मार से। पहले लड़के-लड़कियाँ एक दूसरे के गांव का पता पूछते थे तो अब मोबाईल नम्बर नोट करते हैं और जान लेते हैं कब बाजार पहुंच रहे हैं।

मेरे मन में हाट बाजार देखने की इच्छा हुई। बाजार तो हमारे गांव में भी भरता है लेकिन यहां का बाजार कुछ भिन्न लगा।

बाजार के रास्ते में तालाब के किनारे पेड़ के नीचे एक हीरो होन्डा सवार तराजु लगाए खड़ा था। उसके पास ग्रामीण महिलाएं किलो दो किलो धान बेच कर नगद पैसे ले रही थी जिससे बाजार में कुछ सामान खरीदा जा सके।

बाजार में पीपल के पेड़ के नीचे एक कुर्सी पर एक नाई की दुकान चल रही थी। एक ग्राहक उससे हजामत करने कह रहा था। नाई कह रहा था कि बाजार के दिन उधारी में हजामत नहीं करेगा। उधारी में हजामत सिर्फ़ गांव में होगी, बाजार में नहीं। यहां नगदी लगेगा।  

मेरी निगाह बाजार में कपड़े सिलते कुछ दर्जियों पर पड़ी। उसे महिलाएं ब्लाऊज का कपड़ा दे रही थी सिलने के लिए। टेलर नाप जोख ले रहा था कपड़े जमा कर रहा था। अगले बाजार में सिल कर लाएगा। ब्लाऊज के लिए एक हफ़्ते का इंतजार तो करना पड़ेगा।

एक जगह स्कूल की किताब कापियों की दुकान लगी हुई थी। लोग जूते चप्पल खरीद रहे थे। पास ही एक मोची अपनी रांपी सूजा सूत लेकर बैठा ग्राहक का इंतजार कर रहा था।

पॉलिश का काम तो यहां है नहीं लेकिन टूटे जूते चप्पलों की रिपेयरिंग कराने लोग आते हैं। उसने बताया। एक जगह टार्च से लेकर रेड़ियो, वाकमेन और अन्य इलेक्ट्रानिक सामान बेचने वाले की दुकान थी। कुछ लड़के एफ़ एम रेड़ियो खरीदने के लिए मोल भाव कर रहे थे।

उसके पास ही एक तराजु लगा कर महुआ खरीद रहा था। महुआ भी ग्रामीण अंचल के लोगों को नगद उपलब्ध कराता है।

गर्मी के सीजन में इमली आ जाती है। ग्रामीण इमली भी इकट्ठी करके बेचते हैं। पास में ही एक होटल चल रहा था। उसमें गरमा-गरम जलेबियां तली जा रही थी। लोग अपने बच्चों के लिए खाई-खजानी खरीद रहे थे।

आगे किराने की दुकान लगी हुई थी।दो लड़कियाँ खड़ी हुई किसी का इंतजार कर रही थी। कुछ लोग पान दुकान पर खड़े होकर बतिया रहे थे।

एक महिला कपड़े की दुकान वाले को गरिया रही थी कि उसने जो कपड़ा दिया वह खराब निकला। सिलाई अलग से लग गयी मुफ़्त में। कपड़े को रख कर उसका पैसा वापस करो।कुल मिला कर यहीं असल जिन्दगी के मेले देखने मिलते हैं। 

होटल की आड़ में कुछ दूर पर भीड़ लगी थी एक आदमी हंडिया लेकर बैठा था। वह दोने में कुछ डाल कर उन्हे दे रही था। नजदीक जाने पर पता चला कि 3 रुपया दोना महुआ रस पान हो रहा है।

एक तरफ़ बैल और भैंसो का बाजार लगा था। बहुत सारे लोग बैल-भैंसा खरीदने आए हुए थे। एक ने बताया की रतनपुर जैसा ही बड़ा मवेशी बाजार यहां भरता है।

साप्ताहिक हाट बाजार ग्रामीण अंचल की दैनिक आवश्यकता को पुरी करने के मुख्य साधन है। यहां पर सभी तरह की काम की चीजें आसानी के साथ उपलब्ध हो जाती है। गांव के बाजार भी साप्ताहिक दिनों में बंटे होते हैं।

एक के बाद एक दिन अलग-अलग गांव में बाजार लगते हैं। हम भी पान की दुकान से पान खाकर चल पड़े पेंड्रा रोड़ की ओर। आगे पढ़ें 

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

शोण भद्र--कुकुर बिलाई-मणिधारी सर्प और महुआ के लड्डू

वर्षों की तमन्ना थी कि कभी बांधवगढ का किला देखा जाए। लेकिन वहाँ जाने का योग ही नहीं बन रहा था। 18 तारीख को सुबह सुमीत का फ़ोन आया कि-“ भैया बांधवगढ़ चलेंगे। मुझे मनचाही मुराद मिल गयी।

मैने कहा कि-“कब चलना है? उसने बताया कि आज ही चलते हैं। मैं तुरंत तैयार हो गया। रात को लगभग 9 बजे हम लोग बांधवगढ की ओर चल पड़े।

ड्रायवर को मिला कर हम तीन ही थे। पहला पड़ाव हमने पेंड्रारोड़ को बनाया। मैं तो खाना खाकर सो गया। पेंड्रारोड़ में हमने सुरभि लाज में रुम फ़ोन पर बुक कर लिया था।

जब भी पेंड्रारोड़ आते हैं तो हम यहीं रुकते हैं। लगभग 3 बजे सुमीत ने जगाया कि-“उठो भैया पेंड्रारोड़ आ गया।“ आंखे मलते हुए देखा तो गाड़ी सुरभि लाज के सामने खड़ी थी। रुम में अंदर होते हैं बिस्तर में घुस गए। बहुत ठंड थी यहाँ पर।

सुबह 9 बजे तक सोते रहे। तब तक गुड्डु (शरद सरोरा) भी आ चुका था। साथ हमने चाय पी और तैयार होकर मरवाही ब्लाक में स्थित सोनकुन्ड की ओर चल पड़े।

सोनकुंड मैं पहले भी गया हूँ। लेकिन इसके एतिहासिक महत्व पर कभी ध्यान नहीं दिया। यहां शोणभद्र और नर्मदा का मंदिर है। एक जल का कुंड और बाबा जी का धूना भी है।

यहां एक बाबा जी निवास करते हैं और यहां मेला भी भरता है। हम सोनकुंड पंहुचे यहां हमें कुछ मित्रों से मिलना था। वे भी पहुंच चुके थे। चंद्रभान, शनिराम, फ़ूलचंद इत्यादि।

गुड्डु को एक पेड़ पर अमरुद दिख गए। वह उसे तोड़ने का प्रयास करने लगा। एक बाबा जी वहां पर थे उन्होने गुड्डु को और भी पेड़ बताए और कहा कि वहां से तोड़ लो। वे छोटे पेड़ हैं अमरुद हाथ आ ही जाएंगे।

मैने बाबा जी से इस स्थान के महत्व के विषय में चर्चा की तो उन्होने बताया कि यह स्थान मानस तीर्थ शोण भद्र का उदगम स्थल है इस स्थान को सोनकुंड कहा जाता है।

इसी कुंड से उसका उदगम हुआ है। यह नदी नही उसका नर रुप नद है। मैने नदी के नर रुप में होने के विषय में ब्रह्मपुत्र (लोहित) को ही जाना था। लेकिन शोणभद्र के नद रुप होने की जानकारी पहली बार मिली।

उन्होने बताया कि शोण राजा मैकल की पुत्री रेवा से विवाह करने के लिए अमरकंटक गए थे। अमकंटक के रास्ते में जोहिला नदी पड़ती है। वह रेवा की दासी रही है। खूबसूरत और चतुर होने के कारण उसने रेवा का रुप धर लिया और उसके कपड़े गहने पहन कर शोण को मोहित करके ब्याह करने के लिए चली आई।

विवाह का पहला फ़ेरा ही हुआ था तभी रेवा को पता चला कि दासी जोहिला से शोण विवाह कर रहे हैं। वह विवाह स्थल पर चली आई।

रेवा ने शोण की तरफ़ क्रोधित होकर देखा, रेवा के क्रोध का सामना शोण नहीं कर सके उन्होने सिर झुका लिया। इसके घटना के बाद वह शोण से शोण भद्र कहलाने लगे। क्योंकि सिर का झुकना याने भद्र होना होता है।

रेवा को भी अपनी गलती का अहसास होता है तो वह ग्लानिवश उल्टी दिशा (पश्चिम) की तरफ़ बहने लगती है। नर का मर्दन (अपमानित) करने के कारण रेवा का नाम नर्मदा पड़ा।

वापस आकर शोण जी मानस कुंड से शोण भद्र के रुप में प्रवाहित होने लगे। जोहिला कुछ दूर तक प्रवाहित होकर लुप्त होकर शोण से मिल जाती हैं।

शोण भारत की सबसे चौड़ा नद है। झारखंड सोनपुर और गढवा घाट पर 99 पाए का पुल 6 किलोमीटर लम्बा बना हुआ है। इस पुल पर सात मेल एक्सप्रेस एक साथ खड़ी हो सकती है।

पेन्ड्रा रोड़ से 13 किलोमीटर दूर एक गांव कारीआम है। इसका पुरातन नाम श्री गणेशपुरी कारी ग्राम है। पेन्ड्रागढी के मालगुजार लाल अमोल सिंह ने कालीग्राम मंदिर की माँ काली की मूर्ति को पेन्ड्रागढी में लाकर स्थापित कर दिया जिसके कारण उन्हे शापित होना पड़ा।

उनका परिवार धीरे धीरे समाप्त होने लगा। राजा और रानी सोनकुंड में पूजा करने आते थे। तो उन्होने स्वामी एकनाथ जी को अपनी समस्या बताई। तो उन्होने कुंड एवं शिव जी का एक मंदिर बनाने को कहा। तब लाल अमोल सिह ने यहां कुंड एवं शिव का मंदिर बनाया। जिससे वे शाप मुक्त हुए।

यहां त्रिभुवन नाथ नामक शिव जी का विग्रह है जो निरंतर बढते ही जा रहा है।इसकी स्थापना स्वामी एकनाथ जी ने ही की थी। बाबा जी ने बताया कि 6 साल में शिव लिंग 6 इंच बढ चुका है।

इस मंदिर की छत अस्थाई है जब शिवलिंग और अधिक बढा जाएगा तो छत हटाई जा सकती है। छत का निर्माण इसी हिसाब से किया गया है। यहाँ तरह तरह से सर्प भी हैं।

बाबा जी कहते हैं कि उन्होने यहां मणिहारी सर्प भी देखा है। वह श्वेत रंग का है उनका दर्शन कभी कभी होता है। एक बड़ा नाग सर्प भी है जो आश्रम की चालिस जरीब जमीन भ्रमण करता है। राजा ने इस आश्रम को 70 एकड़ जमीन दी थी।

जिस पर खेती होती है। गुरु पूजा पर्व पर यहां मेला भरता है और 20 क्विंटल धान कोठियों से निकाला जाता है। यह धान 6 वर्ष पुराना होता है। इस धान की खपत एक दिन में ही होती है। 

गुरु पूजा के अवसर पर 20 क्विंटल महुआ के लड्डु बनाए जाते हैं प्रसाद के रुप में भक्तों को वितरित करने के लिए।

महुआ से दारु बनाते हुए तो देखा सुना था लेकिन महुआ के फ़ूल से लड्डु बनाए जाने की बात सुनकर कुछ उत्सुकता बढी कि यह लड्डु कैसे बनाए जाते हैं और उसका स्वाद कैसा होता है?

बाबा जी ने महुआ से सिद्द करके बनाया हुआ प्रसाद खिलाया। बड़ा स्वादिष्ट था। उनसे महुआ का प्रसाद मांग कर मैं घर भी लेकर आया। एकदम चाकलेटी स्वाद लगा।

इस महुआ प्रसाद को बनाने का तरीका भी मैने बाबा जी से पूछा। उन्होने बताया कि पहले महुआ के फ़ूलों को कड़ाही में धीमी आंच पर भूना जाता है। जब फ़ूल चुटकी में लेने से फ़ुटने लगे तो उसे कूटा और पीसा जाता है। इसी तरह समान मात्रा में अलसी और तिल को भी भूना जाता है। महुआ फ़ूल,अलसी और तिल के चुर्ण को देशी घी में सिद्ध किया जाता है।

महुआ चुर्ण में काजु किसमिश बादाम इत्यादि मेवे भी डाले जाते हैं। इसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर लड्डू बांध लिया जाता है।

जिसे गुरु पूजा पर भक्तों को प्रसाद के रुप में दिया जाता है। यहां का धूना सैकड़ो वर्षों पुराना है जिसमें अनवरत अग्नि प्रज्जवलित हो रही है।

धुने को शीश नवाने लोग आते हैं। बम बम भोले का चिलम प्रसाद भी यहां चलता है। चिलमची भक्त भी पहुंचते हैं। धुने पर एक भैरव (कुकुर देव) भी दिखे। ये हमेशा धुने पर ही बैठते हैं। तभी एक बिल्ली आकर मेरी गोदी में बैठ गयी।

कुकुर और बिलाई दोनो साथ-साथ रह नहीं सकते। दोनो का बैर जग जाहिर है। लेकिन यहाँ दोनो एक साथ दिखाई दिए। साथ-साथ ही रहते हैं। आगे पढ़ें 

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

पॉन्डिचेरी का अरविंदो आश्रम फ़्रांसिसी वास्तु शिल्प

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सुबह तैयार होकर हम एक बार फ़िर समुद्र की सैर पर पहुंचे। आठ बज रहे थे। पॉन्डिचेरी, फ़्रांस का उपनिवेश रहा है, इसलिए यहां मकानों की बनावट से लेकर पुलिस की टोपी तक में फ़्रांसिसी संस्कृति की छाप है।

अरविंदो आश्रम पहुंचे,यहां फ़ोटो खींचने की मनाही है। इसलिए मैने चित्र गेट से ही लिए।

अंदर महर्षि अरविंद की समाधि है। उसका लोग स्पर्श करके चेतना की अदृष्य तरंगे ग्रहण कर रहे थे। आश्रम की संस्कृत लाईब्रेरी भी काफ़ी बड़ी है।

यहां संस्कृत भाषा की पुस्तकों का भी प्रकाशन होता है। सरस संस्कृत नामक एक पाठ्यपुस्तक दो भागों में मिलती है। जो संस्कृत के प्राथमिक विद्यार्थी के लिए उत्तम है।

मैने पहले भी यहां से यह पुस्तक खरीदी है। आश्रम से निकल कर हम समुद्र के किनारे पहुंच गए। धूप निकली हुई थी। 

पान्डीचेरी के इस समुद्र तट पर गांधी स्टेच्यु के पास का एक पत्थर मुझे हमेशा आकर्षित करता है। मैं जब भी तट पर पहुंचता हूं तो इस पत्थर पर बैठकर एक चित्र जरुर लेता हूँ यादगार के रुप में।

अब तो यह पत्थर भी मुझे पहचानने लगा है। गांधी जी के साथ भी हमने चित्र लिए। एक घंटा तट पर बिताने के बाद नास्ते के लिए होटल अदिति पहुंचे। यह थ्री स्टार होटल है।

पान्डीचेरी के परम्परागत व्यंजन इसके रेस्टोरेंट में मिल जाते है। थोड़ा मंहगा जरुर है लेकिन नास्ता करने के बाद लगता है कि कीमत सही है।

तभी फ़ोन पर पता चलता है कि हमारे अन्य मित्र भी आ चुके है। वे होटल आदित्य में रुके हैं। सरकारी व्यवस्था वहीं पर है।

होटल आदित्य में पहुंचने के लिए ऑटो लिया। पान्डीचेरी में ऑटो की सवारी करने के लिए सामान्य से कुछ ज्यादा ही जेब ढीली करनी पड़ती है।

चाहे आप आधा किलोमीटर जाओ या दो किलोमीटर 40 रुपए देने ही पड़ेंगे। इससे कम किराया नहीं है। होटल आदित्य में पहुंचने पर बेंगलुरु सुप्रीम कोर्ट के वकील मित्र मोहन कृष्णा, केरल से वी विश्वनाथन जी, सुधाकरन जी, रवि ताम्रकुलम, इत्यादि पहुंच चुके थे।

मोहन कृष्णा एंग्री यंग मैन है। इनके विचार हमेशा क्रांतिकारी रहे हैं। व्यवस्था के खिलाफ़ बहुत मुखर हैं। इनका यह अंदाज मुझे भाता है।

काफ़ी अरसे के बाद हम जी भर के मिले। तभी सूचना मिली कि उद्घाटन समारोह का समय बढाकर 3 बजे कर दिया गया है।

मेरी रात को 10 बजे तमिलनाडु एक्सप्रेस से वापसी थी। अगर 3 बजे के इस कार्यक्रम में शामिल होता तो ट्रेन छोड़नी पड़ती और जबलपुर जाने का कार्यक्रम भी स्थगित करना पड़ता।

दोपहर को सभी मित्रों के साथ पांडीचेरी का परम्परागत भोजन किया। जिसमें चावल रसम,छाछ,सब्जी, अचार, पापड़ इत्यादि था। बरसात शुरु हो चुकी थी।

मैने उन्हे बता दिया कि इस उद्घाटन समारोह में शामिल होना मेरे लिए मुस्किल है। मुझे क्षमा करें, सभी ने रुकने का पुरजोर आग्रह किया। लेकिन समयाभाव के कारण मैं रुक न सका।

मेरा भी दुर्भाग्य रहा कि पान्डीचेरी पहुंचने के बाद भी उद्घाटन समारोह में शामिल न हो सका। मैं आयोजकों को धन्यवाद देकर वहां से चल पड़ा।

सुरेश नें मुझे पांडीचेरी से चेन्नई जाने वाली लो फ़्लोर एसी बस में बैठा दिया। 170 रुपए में नानस्टाप बस से इ.सी.आर. होते हुए चेन्नई के लिए चल पड़ा। अब यह यात्रा समुद्र के किनारे किनारे हुई।

रास्ते में बारिश हो रही थी। चारों तरफ़ पानी ही पानी था। जैसे हमारे यहां बारिश के मौसम में होता है। बस भी अपनी रफ़्तार से चल रही थी।

सबसे पहला स्टाप बस ने चेन्नई एयरपोर्ट का लिया। उसके बाद सीएमबीटी (कोयम्बेट) बस स्टैन्ड का।  वहां से मैने 7 बजे चेन्नई सेंट्रल के लिए 15 बी नम्बर सीटी बस पकड़ी।

जिसका किराया सिर्फ़ 4 रुपए था। जबकि पिछली बार मैने चेन्नई सेंट्रल से बस स्टैंड जाने के लिए ऑटो का किराया 100 रुपए दिया था।

सफ़र में जानकारी के अभाव में जरुरत से ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते है।1800 रुपए में पान्डीचेरी गए और 170 रुपए में वापस आए। 11 गुने रुपए अधिक खर्च करने पड़े। इसलिए सफ़र में जानकारी रखना महत्वपुर्ण होता है।

चेन्नई सेंट्रल से 10 बजे तमिलनाडु एक्सप्रेस नागपुर के लिए चल पड़ी। नागपुर से रायपुर के लिए मैने अहमदाबाद हावड़ा एक्सप्रेस से रिजर्वेशन करवा रखा था।

तमिलनाडु एक्सप्रेस द्रुतगति से चलने वाली गाड़ियों में से एक है। चेन्नई से चलकर पहला पड़ाव विजयवाड़ा (आंध्रप्रदेश) दूसरा वारंगल (आन्ध्रप्रदेश) और तीसरा बल्लारशाह (महाराष्ट्र) है।

2 बजे मैं नागपुर पहुंच चुका था। मेरी ट्रेन शाम को 6 बजे थी। घर से 300 किलोमीटर पर होने के बाद अब एक लम्बी यात्रा के बाद घर पहुंचने की व्यग्रता बढती जा रही थी। तभी पता लगा कि अहमदाबाद एक्सप्रेस डेढ घंटा विलंब से चल रही थी। अब रुका नहीं जा रहा था।

 नागपुर के मित्रों को फ़ोन करने का भी मन नहीं बन रहा था। एक कुली से मैने पुछा तो उसने बताया कि कोचीन एक्सप्रेस भी खड़ी है तीन नम्बर पर प्लेटफ़ार्म पर। लेकिन मेरे पास कन्फ़र्म टिकिट थी अहमदाबाद एक्सप्रेस की। अब क्या किया जाए सोचता रहा। अंतिम निर्णय पर पहुंचा की कोचीन एक्सप्रेस से ही चला जाए। पहले वाली टिकिट को फ़ाड़ कर फ़ेंका जाए।

कोचीन एक्सप्रेस के लिए टिकिट लेने का समय नहीं था। मैं सपाटे से प्लेटफ़ार्म नम्बर 3 पर पहुंचा तो एसी कोच के पास दो टी टी दिखाई दे गए।

मैने उन्हे बताया कि रायपुर जाना है। एक टी टी बोला “रायपुर ही क्या आपको हावड़ा तक पहुंचा देते हैं।“ उसने अपने चार्ट में से एक छोटा सा कागज फ़ाड़ा और उस पर एस 1 की 55 नम्बर की सीट लिख दी और कहा कि “ आप इस सीट पर मजे से सोयें, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।

आपको 330 रुपए अधिक लगेंगे। मैने कहा कोई बात नहीं। 4 घंटे बचाने के लिए 100 रुपए घंटे के हिसाब से ये सौदा भी कोई बुरा नहीं है।

विजेन्दर नाम का यह टी टी भी बड़ा दिलदार था। 435 रुपए लेकर मेरी टिकिट बनाई। पता चला कि वह रोहतक से ही था। पहलवान होने के कारण स्पोर्ट कोटे में रेल्वे की नौकरी लगी थी। उसने मुझे अपना नम्बर दिया।

शाम को 7 बजे मैं रायपुर स्टेशन पर पहुंचा। धीरज को फ़ोन करके बुलाया। क्योंकि बस बाजार से कुछ खिलौने खरीदने थे।

जब भी सफ़र से वापस आता हूँ तो घर पहुंचने से पहले गिरीश भाई की गजल का एक शेर याद आ जाता है –“ कैसी बेकार किस्मत है उस बाप की, बिन खिलौने के वो फ़िर से घर जाएगा। यह शेर दिलो दिमाग पर छा गया है, मुझे भूलने नहीं देता कि उदय के लिए खिलौने लेने हैं।

खिलौनों की दुकान पर पहुंच कर उदय ही फ़रमाईश पूरी की उसके लिए बैटरी से चलने वाली रेलगाड़ी खरीदी। बस युं लग रहा था कि अब उड़ कर घर पहुंच जाऊं नहीं तो उदय सो जाएगा। उसे रेलगाड़ी चलाते हुए खुशी से झुमते हुए देखना चाहता था।

घर साढे नौ बजे पहुंचा। सभी व्यग्रता से इंतजार कर रहे थे। एक लम्बी यात्रा के बाद घर पहुंचा था। उदय सो चुका था,

मैंने रेलगाड़ी उसके सिरहाने रख दी कि सुबह वह जब सोकर उठेगा तो उसे सबसे पहले दिखाई दे जाए और वह आनंद से भर उठे। इस तरह सुखद अनुभवों के साथ एक लम्बी यात्रा सम्पन्न हुई।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

पणंग कलंगा, बोंडा और पांडीचेरी की शंकरा

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एयरपोर्ट से बाहर निकलने पर सबसे पहले इडली पर हाथ साफ़ किया और फ़ास्ट ट्रेक टैक्सी का रेट पूछा पान्डीचेरी जाने के लिए।

उसने 3600 रुपए और टोल अलग से लगेगा बताया। जबकि बस से जाने पर 55 रुपए से लेकर अधिकतम 170 रुपए ही लगते। लेकिन उसके लिए बस स्टैंड तक के लिए 800 रुपए टैक्सी के देन पड़ते।

तभी एक एम्बेसेडर टैक्सी वाला आ गया। उसने 2200 रुपए किराया कहा तो हमने मोल भाव करके 1800 रुपए में उसे तय किया और चल पड़े पान्डीचेरी की ओर।

यह टैक्सी एयरपोर्ट स्टैंड के बाहर की थी इसलिए आधी कीमत में मिल गयी अगर बुथ से लेते तो 3600 ही लगते।

टैक्सी चालक का नाम कृष्णन था। पुरानी टैक्सी को बड़ी कुशलता से हांक रहा था। रास्ते में एक जगह हमने बोंडा का नाश्ता किया। बहुत ही स्वादिष्ट था। बड़े जैसा ही।

गरमा गरम सांभर और चटनी के साथ मजा आ गया। पान्डीचेरी जाने के लिए दो रास्ते हैं एक गोल्डन बीच होकर जाता है उसे ईसीआर (ईस्ट कोस्ट रोड़) कहते हैं।

दूसरा रोड़ डॉक्टर रामदास के संसदीय क्षेत्र से होकर गुजरता है। रास्ते में बरसात होने लगी थी। लग रहा था कि पान्डीचेरी में बारिश जम कर हमारा स्वागत करेगी। मैने तंगम को फ़ोन लगा कर आने की सूचना दी।

अरविन्दो आश्रम के पास निर्मल गेस्ट हाऊस में हमारा रुम श्रीनिवास ने बुक करवा रखा था।

रास्ते में टोल पर एक जड़ जैसी चीज बेचने वाला मिला। मुझे तो पता नहीं था ये क्या है लेकिन कृष्णन ने 20 रुपए देकर दो गुच्छियाँ खरीद ली।

उसने बताया कि इसे पणंग कलंगा कहते हैं। फ़िर उसने छील कर बताया कि इसे कैसे खाया जाता है। इसका स्वाद कुछ शकरकंद जैसा ही था। उसे उबाल रखा था। पणंग कलंगा कंद मूल ही है।

ताड़ी के पेड़ में जो फ़ल लगते हैं उसे तोड़ा नहीं जाता। तोड़ने के बाद पेड़ ताड़ी कम मात्रा में देने लगता है। इसलिए ये फ़ल पेड़ पर ही सूख जाते हैं और इसके बीज पत्थर जैसे हो जाते हैं।

इस फ़ल को जमीन में गाड़ने से इसमें से जड़ जैसा कंद निकलता है उसे उबाल कर खाया जाता है। धूसर रंग का यह कंद खाकर हमने भी नए फ़ल पणंग कलंगा का मजा लिया। 

हम सीधे गेस्ट हाऊस ही पहुंचे। इस गेस्ट हाऊस में तीसरी बार पहुंच रहे थे। समुद्र और आश्रम यहां से पैदल जाया जा सकता है।

सामान रख कर हम समुद्र के किनारे पहुंच गए।रात के अंधेरे में समुद्र की जलराशि दिखाई नहीं दे रही थी पर उसकी उपस्थिति का अहसास उसकी गर्जना से होने लगा था। शेर जैसी दहाड़ थी समुद्र की।

मैं आँखे बंद करके उसकी उपस्थिति का अहसास करने लगा। रात के अंधेरे में कुछ चित्र लेने की कोशिश की लेकिन चित्र सही नहीं आए। सैलानी समुद्र के किनारे घुम रहे थे।

मैं उस आर्ट गैलरी को ढूंढ रहा था जहां पिछली बार एक चित्र प्रदर्शनी देखी थी। विदेशी चित्रकार ने वाटर कलर का उपयोग करके काफ़ी उम्दा चित्र बनाए थे। हमने टाईम पास भुट्टे लिए।

यहां कलमी आम भी बिक रहे थे। पान्डीचेरी में बरसात का मौसम नवम्बर से लेकर मार्च तक होता है। बारिश कब हो जाए इसका पता ही नहीं चलता। सब समुद्र के मौसम पर आधारित है। अब हमें बाजार की तरफ़ भी जाना था।

पान्डीचेरी में वाईन टैक्स फ़्री है। हर एक दुकान के बाद वाईन शाप है और बार भी। सी फ़ुड प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। शंकरा नामक मछली और झिंगे सभी जगह मिलते हैं। कहीं कहीं पर समुद्री केकड़े भी फ़्राई हो रहे थे। 
पाम्पेट फ़िश दिखाई नहीं दी। यह केरल में मिलती है और इसका स्वाद तो मत पूछिए। शंकरा छोटी मछली होती और साबुत फ़्राई की जाती है। 

एक सरकारी दुकान में शैम्पेन से लेकर स्कॉच तक की सभी विदेशी ब्रांडेड वाईन मिलती है, एक पैग से लेकर एक लीटर तक की पैकिंग में। आप यहां से वाईन खरीद कर अपने साथ नहीं ले जा सकते। 

एकाध बोतल सील तोड़कर ले जाई जा सकती है। गेस्ट हाऊस में ही खाना मंगा लिया। यहां के खाने में नमक और लाल मिर्च का उपयोग बहुत कम किया जाता है। हां गेंहू की रोटियाँ प्राय: होटलों में नहीं मिलती। अब आयोजक गण भी पहुंच चुके थे।

पान्डीचेरी सरकार ने आर्टिसन कॉपरेटिव सोसायटी का निर्माण किया था। जिसका लाभ पान्डीचेरी के परम्परागत शिल्पकारों को मिलना है। उनकी यह मांग काफ़ी पुरानी थी।

हमने भी इसका समर्थन किया था और पिछले दौरे में मुख्यमंत्री और गर्वनर से भी चर्चा की थी। कॉपरेटिव सोसायटी के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री के साथ मुझे भी विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था।

समारोह 28 नवम्बर को 11 बजे होना था। केरल,कर्नाटक और तमिलनाडु से भी कुछ नए पुराने मित्र पहुंच चुके थे। उसकी सूचना हमें रात को ही मिल गयी थी। आगे पढ़ें