शनिवार, 30 जुलाई 2011

हरेली अमावस और जादू-टोना की रात ---- ललित शर्मा

पंजा जोड़ी- बैगा ने पत्थर से निकालना बताया, जीवाश्म हो सकता है
त्तीसगढ अंचल में सावन माह को तन्त्र-मंत्र और जादू टोने के साथ जोड़ा जाता है एवं सावन माह को ग्रामांचल में काफ़ी महत्व दिया जाता है। प्रत्येक ग्राम में एक बैगा होता है, जो गाँव के देवी-देवताओं की पूजा करके उन्हे परम्परागत ढंग से मनाता है। सावन में प्रत्येक ग्राम वासी से चंदा करके गाँव बांधने एवं देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।  इसे सावनाही बरोना कहते हैं, सावन के प्रथम सोमवार की रात को पूजा का सामान लेकर अपने चेलों के साथ बैगा गाँव की चौहद्दी सीमा (सरहद-सियारा-मुनारा) में अपने चेलों के साथ जाता है, तथा जिस स्थान पर देवी-देवता का स्थान नियत है, उस स्थान पर होम-धूप देकर पूजा करता है। ग्राम के बाहर खार (खेत) में भैंसासुर, सतबहनिया, शीतला, ग्राम देवता, आदि का निवास माना जाता है तथा ग्राम की भीतर सांहड़ा देव, महादेव, हनुमान जी, दुर्गा देवी एवं अन्य देवताओं का निवास मानते हैं।

सावनाही रेंगाना - ग्राम सीमा में टोटका
बैगा खार (खेतों) के नियत स्थानों पर पर देवी-देवताओं की पूजा करके गाँव की सीमा में एक स्थान पर विशेष पूजा करता है, जिसे गांव बांधना कहते हैं। सावन सोमवार को गाँव बांधने की पूजा के कारण ही सभी स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी रहती है, जब हम स्कूल में पढते थे तब भी होती थी और आज भी होती है। इस दिन गाँव के सभी लोग छुट्टी करते हैं काम से और किसी दुसरे गाँव भी नहीं जाते। गाँव बांधने की तांत्रिक पूजा में लाल, काले, सफ़ेद छोटे छोटे झंडे, नींबु, काली हंडी, बांस की टोकनी (चरिहा) खुमरी (बांस की बनी टोपी) नारियल होम-धूप, लकड़ी की बैलगाड़ी का प्रतीक, दारु, मुर्गी इत्यादि का प्रयोग होता है। इस पूजा में बैगा सभी देवी-देवताओं का आह्वान करके उनसे गाँव की रक्षा का निवेदन करता है कि गाँव में धूकी (हैजा-कालरा) भूत-प्रेत, टोना-टोटका एवं अन्य दैविय प्रकोप न हो। इसके बाद एक मुर्गी को जिंदा छोड़ा जाता है और फ़िर उस पूजा स्थल को दुबारा पीछे मुड़ के नहीं देखा जाता। बीमारियों को दैविय प्रकोप से जोड़ कर देखा जाता है। गाँव बांधने बाद सभी लोग घर नहीं जाते, गाँव के बाहर स्थित स्कूल, मंदिर या ग्राम पंचायत भवन में रात गुजार देते हैं। मान्यता है कि इनके साथ कहीं भूत-प्रेत गांव में प्रवेश न कर जाए। फ़ोड़े गए नारियलों का प्रसाद ये ही लोग खाते है, घर लेकर नहीं जाते।

टोटका का सामान-  श्वेत-लाल-काले ध्वज
गाँव में किसी के बीमार होने पर लोग सबसे पहले बैगा के पास ही इलाज के लिए जाते हैं, बैगा झाड़-फ़ूंक एवं परम्परागत जड़ी-बूटियों से इलाज करता है। बैगा के इलाज से स्वस्थ न होने पर ही लोग कस्बों एवं शहरों की तरफ़ इलाज के लिए उन्मुख होते हैं। इन्हे अपनी परम्परागत चिकित्सा एवं टोने-टोटके में अत्यधिक विश्वास है। इनका पारम्परिक मान्यताओं पर विश्वास ही पढे लिखे लोगों को अंधविश्वास दिखाई देता है। जबकि पारम्परिक जड़ी-बूटियों से भी कारगर इलाज होता है। विद्याअध्यन काल में मीठा खाकर घर से बाहर निकलने पर मुझे बुखार जैसा लग कर हाथ पैरों में दर्द के साथ ठंड लगने लगती थी। तब चुल्हे के पास बैठ कर उसकी गर्मी से बदन को सेकता था। एक बैगा हमारे यहाँ काम करता था, उसके एक बार झाड़ने फ़ुंकने से ही मैं ठीक हो जाता था। अब तो बरसों से ऐसी स्थिति नहीं बनी है। लगता है कि बैगा की विद्या भी काम करती थी।

बैलगाड़ी के प्रतीक का उपयोग
सावन की अमावस को हरेली का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बैगा और उसके चेले मंत्र सिद्ध करते हैं। गुरु नए चेलों को मंत्र दीक्षा भी देते हैं। गाँव के एकांत में नियत स्थान पर एकत्र होकर सभी तांत्रिक क्रियाओं को अंजाम देकर बैगा चेलों को जड़ी-बूटियों की पहचान भी बताते हैं। मेरी भेंट सिलोंधा निवासी दल्लु बैगा से हुई, ये साँप भी पकड़ते हैं एवं बैगाई-गुनियाई भी करते है। इनके पास मैने एक से एक सांप देखे जिसमें लगभग 9 फ़िट का किंग कोबरा भी था। जब उसकी फ़ोटो लेने लगा तो वह सिर उठाकर फ़ोटोशेसन करवाने लगा। सिर घुमाकर चारों तरफ़ देखता था। मैने दल्लु बैगा से टोनही देखाने को कहा। तो बैगा ने कहा कि टोनही तीन प्रकार की होती है,श्वेत, लाल और काली। आपको टोनही देखना है तो दैइहान (चारागन-जहां पशु एकत्र होते हैं) में अमावस की रात 12-1 बजे को एक नारियल लेकर खड़े हो जाओ, सब दिख जाएगा। एक से एक टोनही मिलेगी झुपते हुए, लेकिन उसके लिए तंत्र-मंत्र का इंतजाम करना पड़ेगा।

दल्लु बैगा - सिलोंधा वाले
मैने उसे अपने साथ चलकर टोनही दिखाने का आग्रह किया। उसने अनजान आदमी के लिए खतरा बताया। मैने कहा कि अपनी गारंटी मैं लेता हूँ और तुम्हे लिखित में देता हूँ कि अनहोनी होने पर मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। उसे मेरा प्रस्ताव पसंद नहीं आया। उसने कहा कि-"मैं आपको जड़ी दे सकता हूँ, उसके प्रभाव से आपको कुछ नहीं होगा, लेकिन मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, आपको अकेले ही जाना पड़ेगा।" इसका तात्पर्य यह था कि वह पल्ला झाड़ना चाहता था। परन्तु मैं भी जिद्दी आदमी हूँ, समय मिलने पर उसके गाँव तक जाऊंगा और सत्यान्वेषण करुंगा, छोड़ुंगा नहीं। उसने सांपों का जहर सेवन की भी बात बताई। उसका कहना था कि वे सांपों का जहर निकाल कर खाते भी हैं और बेचेते भी हैं। मैं जहर निकाल कर खाते हुए फ़िल्माना भी चाहता हूँ। देखते हैं यह अवसर कब आता है?

हत्था  जोड़ी
आज हरेली त्यौहार है, कुछ और बैगाओं को पकड़ते है, जिससे हमें भी ज्ञान मिले। अज्ञात से ज्ञात होना तो सभी चाहते हैं, लेकिन जो जानकार होने का दावा करते हैं वे सामने आने पर बहाना बनाकर भाग जाते हैं।हरेली त्यौहार मूलत: किसानों का त्यौहार है जिसमें बोआई के पश्चात किसान अपने कृषि यंत्रों को धो मांज कर उनकी पूजा करते हैं। घर में पकवान बनाकर भगवान को होम जग देते हैं। सावन में जल-जनित बीमारियाँ की रोकथाम के लिए गाँव के देवताओं से निवेदन करते हैं। गेंडी चलाकर उत्सव मनाते हैं। पता नहीं कैसे हरेली त्यौहार को लोगों ने टोना-टोटका एवं तंत्र-मंत्र से जोड़ दिया। मुझे भूत-प्रेत एवं जादू टोने पर विश्वास नहीं है। ऐसे अवसर ढूंढते रहता हूँ कि भूत-प्रेत से भेंट हो, पर नहीं होती तो क्या करें। आज जंगल के गावों में जाकर जादु-टोना देखने का विचार है, रात को बैगाओं के तंत्र-मंत्र के प्रयोग भी देखना है। सभी को हरेली त्यौहार की शुभकामनाएं।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

महर्षि महेश योगी के जन्मस्थान पाण्डुका की सैर --- ललित शर्मा

त्तीसगढ की पूण्य भूमि पर अनेक संतों एवं महापुरुषों ने जन्म लिया। महर्षि महेश योगी भी उनमें एक थे। कई बार पाण्डुका से गुजरते हुए आगे निकला, पर महर्षि जी के जन्मस्थान का दर्शन लाभ प्राप्त नही कर सका। आज वह समय आ ही गया, मैं उनकी संस्था द्वारा संचालित विद्यापीठ में पहुंच ही गया। 

मुख्यद्वार से आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुए दो सज्जन नजर आए, चर्चा होने पर पता चला कि सज्जन (श्रीवास्तव जी) महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ के व्यवस्थापक हैं तथा दुसरे सह-व्यवस्थापक हैं। इन्होने महर्षि के विषय में हमें बहुत कुछ जानकारी दी। वेद विज्ञान पर चर्चा हुई, श्रीवास्तव जी ने बताया कि महेश प्रसाद वर्मा याने महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ। इनके पिताजी रामप्रसाद वर्मा यहाँ राजस्व विभाग में कार्यरत थे। महर्षि के बड़े भाई जागेश्वर प्रसाद की प्राथमिक शिक्षा पाण्डुका में ही हुई थी। पाण्डुका इनका बर्थ प्लेस है, नेटिव प्लेस जबलपुर के पास गोटे गाँव है। महर्षि महेश योगी ने इलाहाबाद विवि से भौतिक शास्त्र में स्नातक और दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली थी। 

विद्यापीठ का मुख्य द्वार
दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि लेने के बाद वे 1941में स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के अनुयायी बन गए। स्वामी जी ने उन्हें बाल ब्रह्माचार्य महेश नाम दिया। 1953 तक ब्रह्मानंद सरस्वती के सानिध्य में रहने के बाद महर्षि योगी ने उत्तरकाशी की ओर रुख किया। एक जनवरी 1958को मद्रास के एक सम्मेलन में महर्षि ने ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन के माध्यम से पूरे विश्व में आध्यात्मिक ज्ञान फैलाने की घोषणा की। यही वह क्षण था जब वे वैश्विक होने की ओर उन्मुख हुए। इसके पश्चात समूचे विश्व में ध्यान योग का डंका बजाया। पश्चिम में दम मारो दम की हिप्पी संस्कृति जोर पकड़ रही थी, महर्षि ने इन्हे नशे से मुक्त होने की दिशा में उन्मुख किया। इसी क्रम में 1958 में महेश योगी ने विश्‍वस्‍तरीय आध्‍यात्‍मिक प्रसार अभियान का आरंभ किया। इस प्रसार कार्यक्रम का उद्देश्‍य मानवता के लिए ध्‍यान और साधना को प्रचारित करना था। अभियान के प्रसार के लिए उन्‍होंने विश्‍व के कई देशों वर्मा, मलाया, हाँगकाँग, होनुलूलु का भ्रमण किया। उन्‍होंने अपना सबसे ज्‍यादा वक्‍त अमेरिका में बिताया। 

महषि जी का जन्म इसी घर में हुआ था
महर्षि महेश योगी ने 1963 में अपनी पहली पुस्‍तक अस्‍तित्‍व का विज्ञान और जीने की कला लिखी। 1965 में भगवद गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। अपने योग के प्रसार के दौरान इस बात का दावा किया कि ट्रांसडेंटल मेडिटेशन से तनाव और निराशा दूर हो सकती है, जिससे लोगों का जीवन भी सुखमय होता है। हालाँकि उनके ध्‍यान के दौरान हवा में तैरने जैसे बातों की काफी आलोचना हुई, लेकिन ध्‍यान के चमत्‍कारिक प्रभाव को सभी ने स्‍वीकार किया। महेश योगी का मानना था कि सिद्ध लोगों के सामूहिक ध्‍यान करने से एक विशेष वातावरण का निर्माण होता है, जो कि आध्‍यात्‍मिक प्रभाव क्षेत्र का निर्माण करता है। इस क्षेत्र के विस्‍तार के अपराध और बुराइयों पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है। महर्षि महेश योगी का यह भी दावा था कि इसका असर स्‍टॉक मार्केट पर भी होता है।  

व्यावस्थापक श्रीवास्तव जी एवं तुलेन्द्र तिवारी जी
महर्षि को अपने सिद्धांतों पर अटूट विश्‍वास था और वह उसके विस्‍तार से पूरे विश्‍व को लाभ पहुँचाना चाहते थे। 1971 में उन्‍होंने लॉस एंजिल्‍स में महर्षि अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की। इसके साथ ही कई करोड़ों का अपना साम्राज्‍य स्‍थापित किया। वैदिक सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए महर्षि विद्या मंदिर की स्‍थापना की गई। भारत में इसके करीब 200 शाखाएँ हैं। इसके अलावा महर्षि इंस्‍टीट्युट का एमबीए, एमसीए, वैदिक विश्‍वविद्यालय, महर्षि गंधर्ववेद विश्‍व विद्यापीठ, महर्षि आयुर्वेद विश्‍वविद्यालय, महर्षि इंफार्मेशन टेक्‍नोलॉजी और महर्षि वेद-विज्ञान विश्‍वविद्यापीठ हैं। इनके साथ उन्होने अत्युत्‍म ध्‍यान (ट्रांसडेंटल मेडिटेशन), महर्षि वेदिक टेक्‍नोलॉजी ऑफ कांशियसनेस, महर्षि स्‍थापत्‍य वेद, सिद्धी कार्यक्रम, महर्षि ग्‍लोबल एडमिनिस्‍ट्रेशन थ्रू नेचुरल लॉ, महर्षि ज्‍योतिष और योग कार्यक्रम, महर्षि वाणिज्‍य विकास कार्यक्रम भी चलाए।

महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन की मुद्रा "राम"
महर्षि चैनल भी चला करता था, अब बंद हो गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि महर्षि ने अपनी राम नामक मुद्रा भी चलाई, जिसे नीदर लैंड में मान्यता है। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस ने अक्टूबर २००२ में जारी किया था। अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी राम का प्रचलन है। वैसे 35 अमरीकी राज्यों में राम पर आधारित बॉन्डस चलते हैं। नीदरलैंड की डच दुकानों में एक राम के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। राम नाम की मुद्रा विदेशों में चल रही है, पर राम के देश में नहीं चला पाए। महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन द्वारा राम मुद्रा जारी की गयी  है। जिस पर सुंदर कल्प वृक्ष का चित्र अंकित हैं।

ब्रह्मचारियों के साथ एक गृहस्थ
ग्राम पाण्डुका में महर्षि के पिताजी रामप्रसाद वर्मा किराए के घर में रहते थे, महर्षि के जन्म स्थान की जानकारी होने पर संस्था द्वारा इस मकान को खरीदा गया। महर्षि ने कहा कि इस घर को उसी अवस्था में रखा जाए जैसा पहले था। कोई अतिरिक्त निर्माण नहीं किया जाए। इसके साथ ही पाण्डुका ग्राम में 51 एकड़ जमीन खरीद कर विद्यापीठ की स्थापना की गयी। महर्षि इस गांव को योजनाबद्ध रुप से संवारना चाहते थे। लेकिन गांव के गौंटिया लोगों की आपत्ति एवं विरोध के पश्चात उन्होने इरादा त्याग दिया। मुझे याद है। कुछ वर्षों पूर्व विद्यापीठ में असामाजिक तत्वों ने आगजनी भी थी। महर्षि विद्यापीठ के कर्ता-धर्ताओं के साथ गांव वालों का विवाद भी हुआ था। इस विद्यापीठ में ब्राह्मणों के बच्चों को कर्मकांड सिखाए जाते हैं। वेद पाठ कंठस्थ कराया जाता है।

आवासीय विद्यापीठ के भवन
विद्यापीठ में जाकर मैने विद्यार्थियों से चारों वेदों का पाठ सुना और रिकार्ड भी किया। इस आवासीय विद्यापीठ में 132 विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। रहने के भवन की व्यवस्था अच्छी लगी। भवन पक्के बनाए हुए हैं। साथ-साथ धान की खेती भी की जा रही है। कुछ पेड़ पौधे भी लगाए गए हैं। मुझे हड़जोड़ का पौधा मिला, जिसकी एक कलम लेकर आया और लगाई। हड़जोड़ सूखी और हरी हाथ पैर के दर्द में काम आती है। इसका सेवन करने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है, जो इसके नाम (हड़जोड़) से ही प्रतीत होता है। विद्यापीठ में घूमने के बाद हमने आगे बढने का कार्यक्रम बनाया। जाना तो चाहते थे जतमई एवं घटारानी, पर तिवारी जी ने कहा कि सिरकट्टी से मेघा, कुरुद होते हुए अभनपुर पहुंचा जाए। हमने श्रीवास्तव जी से विदा ली और आगे बढ लिए सिरकट्टी की ओर।


NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे ---- ललित शर्मा

सप्ताहांत के दिन की सुबह चमकीली नहीं थी, आसमाने में काले-काले बादलों की घटा छाई हुई थी, कोई पता नहीं कब बरस जाएं? 5 दिनों सर्दी बुखार का मजा लेते-लेते खोपड़ी खराब हो गयी, दवाईयाँ लो और सो जाओ, बस यही चल रहा था। तबियत जब कूछ ठीक हुई तो दिमाग ने भी काम करना शुरु किया, वह सोचने लगा कि घर में बैठे-बैठे भी क्या करें? आज कहीं घूम ही लिया जाए। बाईक पर लांग ड्राईव का मजा इसी मौसम में आता है, अगर रिमझिम फ़ुहारें बरस रही हों तो क्या कहने, आनंद ही आनंद। तिवारी जी फ़ोन लगाया तो पता चला कि वे साप्ताहिक धुलाई के कार्यक्रम में व्यस्त हैं। उन्होने एक घंटे बाद साथ चलने की हामी भरी। मैं नियत समय पर उनके घर पहुंच गया। सुबह का नास्ता हो गया था, पर समय देखते हुए श्रीमती जी ने भोजन करके ही जाने को कहा। लेकिन भोजन के कारण विलंब हो सकता था। इसलिए ऐसे ही चल पड़े। रास्ते में कहीं भोजन कर लिया जाएगा। तिवारी जी को घर से लेकर आगे बढ लिए। हमारी योजना में महानदी की बाढ, महर्षि महेशयोगी की जन्मस्थान की सैर शामिल था।

गाड़ी हाइवे पर चली जा रही थी, तिवारी ने हमें ही हांकने की आज्ञा दे दी। आसमान की तरफ़ देखकर लगता था कि बरस जाएगा, मानिकचौरी रेल्वे क्रांसिग पार करते ही भूख लगने लगी। घर से निकले तो 15 मिनट ही हुआ था। ग्राम हसदा चौक पर एक चाट का ठेला दिखाई दे गया। बस गोलगप्पे खाने के इरादे से वहीं टिक गए, हसदा आना-जान बचपन से लगा हुआ है, तिवारी जी भी हसदा में अध्यापन कर चुके हैं। जान पहचाने के लोग वहां मिल गए। स्टूल और बेंच पर जम गए, देवा चाट भंडार, प्रोप्राईटर साहू जी को गोलगप्पे का आडर दिया, तभी मन बदल गया, चाट बनाने के लिए कहा। तिवारी जी ने गोलगप्पे थामें और मैने चाट। वाह! स्वाद के क्या कहने थे, मजा आ गया। ऐसी चाट शहर की भी किसी बड़े होटल में नहीं खाई। एक प्लेट उदरस्थ करने के पहले ही दुसरी का भी आडर दे दिया। फ़िर गोल गप्पे का, गोल गप्पे में तेल की महक थी, थोड़ा उसे गरियाया। पता किया कि एस पी (सरपंच पति) कहाँ है? गाँव में नहीं थे, परन्तु याद करते ही वे भी पहुंच गए। बड़ी लम्बी उमर है यार, शैतान का नाम लेते ही हाजिर।

चाट भक्षण चालु था, तभी एक नवयुवक गले में हेडफ़ोन डाले, हाथ में मोबाईल लिए पहुंचा। मुझसे बोला -"अंकल जी थोड़ा सरकिए"। हम सरक लिए, वह बेंच पर आकर बैठ गया। मोबाईल में गाना सुना रहा था। मैने जब उसे नीचे से पर तक देखा तो उसकी हरकत पर गौर करके अन्य लोग भी हँसने लगे। तिवारी गुरुजी ठहाके लगाने लगे। तभी उसके मोबाईल में घंटी आई और बंद हो गई, बोला -" साले मन मिस काल करथे।" मैने कहा - "ओखर मोबाईल मे तैंहा रिचार्ज कराथस का?" करातेस त फ़ुल काल करतिस।" उसने क्या सोचा पता नहीं, तभी उसका एक साथी पहुंच गया - "चल बे, जाना हे त, मैं जात हंव।" मैने कहा-" हेडफ़ोन ला कान में लगा, बने दिखथे।" वहां बैठे लोग उसका मजा लिए जा रहे थे। चाट के आनंद के साथ आनंद दुगना हो गया। सामने मुझे सप्तपर्णी का वृक्ष दिखाई दिया। परसों ही मल्हार पर मेडागास्कर पाम का जिक्र सुब्रमनियन जी ने किया था। मैने उसके कुछ चित्र लिए और सुब्रमनियन जी के चित्रों से मिलान किया। यह वृक्ष भी उसी जाति का लगा पर, इसमें फ़ूल नहीं आए थे, मैने फ़ूल भी देखे हैं। जो सुब्रमनियम जी के चित्रों में दिखाए फ़ूलों जैसे ही होते हैं। 

दो प्लेट चाट और 4 प्लेट गोल गप्पे अंदर करने के बाद हमने सेवा शुल्क पूछा तो उसने हमारे 30 रुपए लिए। सस्ते में मामला निपट गया। शुल्क जमा करके हम आगे बढ लिए, क्योंकि आगे जाने में विलंब होने की आशंका थी, नवापारा पहुचकर गंज रोड़ की प्रदक्षिणा करके हम महानदी के घाट पर पहुंचे। वहां कोई भी कावंडिया दिखाई नहीं दिया। हमारी फ़ोटो इच्छा पूर्ति नहीं हुई। जब नदी के पुल पर पहुंचे तो बाढ देखने की इच्छा भी अधुरी रह गयी। नदी में पानी ही नहीं था। कुलेश्वर मंदिर के आस-पास रेत दिख रही थी। अर्थात वर्षा कम ही हुई है, नदी में भरपूर जल नहीं आ सका। 

मैने सोचा था कि नदी में पानी होगा तो नाव वाले भी मिलेंगे। उनसे चर्चा करेगें कि - "नाव में मामा-भानजा एवं पहिलावत (ज्येष्ठ पुत्र-पुत्री) क्यों नहीं बैठते? मान्यता है कि इनके बैठने से नाव उलट जाती है। नाव वाले नहीं मिले, रामभरोसा जी ने बताया था कि एक बार जानकारी के अभाव में वे मामा-भांजा एक साथ नाव में बैठ गए। जब नाव डगमगाने लगी तो नाव ने कहा कि -" कोई मामा भांजा बैठे हो तो बता दो, नहीं तो नाव उलट जाएगी।" इनका पता चलने पर एक को नाव से नदी में कूद जाने कहा। मामा तो बैठे रहे, नदी में रामभरोसा जी को कूदना पड़ा। थोड़ी देर नजारे देखने के बाद आगे बढ लिए।

गरियाबंद मार्ग पर आगे बढे, रास्ते में बोल बम कावंड़िए मिले, सावन में शिव भक्ति सैलाब उफ़ान पर होता है। कौन कहां से जल लेकर कहां चढाने जा रहा है पता ही नहीं चलता। पर कावंड़िए हर सड़क पर मिल जाते हैं। एक महिला कांवड़िया दल भी मिला और नौजवान भी, चलते-चलते इनकी चाल बदल चुकी थी। मुझे भी अनुभव है इसका। जांघे छिलने के कारण पैदल चलना कठिन हो जाता है। मैने तो इसका तोड़ निकाल लिया था, नारियल तेल की एक शीशी साथ लेकर चलता था और जांघों में लगा लेता था। जिससे जांघे छिलती नहीं थी और यात्रा भी मजे से हो जाती थी। अब समय नहीं था कि इन्हे यात्रा टिप्स देते चलुं। नहीं तो अवश्य ही बता देता। धान के खेतों में फ़सल लहलहा रही है, जिन्होने पहले बोनी कर ली वे चलाई, निंदाई और बियासी कर रहे हैं। महिलाओं का दल रोपा लगा रहा है, जिस खेत में पानी अधिक था और समय पर बोनी नहीं हुई उसमें लाई-चोपी बोनी पद्धति (खेत को मता कर उसमें उपर ही बीज छिड़कना) का प्रयोग किया गया था।

रास्ते में एक नंगरिहा बैलों को खोलकर सड़क पर बैठकर चोंगी सिपचा (बीड़ी जलाना) रहा था, थोड़ी देर आराम करने के बाद फ़िर बैला नांगर में फ़ांदने की तैयारी कर रहा था, मतलब बैटरी रिचार्ज कर रहा था। 300 एकड़ के खार में बोवाई हो चुकी है, निंदाई चलाई चल रही है किसान पुरानिक पटेल ने बताया। तीन-चार दिनों की बारिश ने किसानों के चेहरे पर रौनक ला दी। पौधों के भरी हुई बैलगाड़ियाँ खड़ी हैं, रोपा लगाने वाले थरहा ले जा रहे हैं। रोपा कतार में लगाया हुआ सुंदर दिखाई दे रहा था। ढंग से रोपा लगाने से फ़सल अच्छी होती है। गांव में रोपा का काम ठेके पर होता है। अगर खेत का मालिक स्वयं सामने न रहे तो मजदुर एक पौधे से दुसरे पौधे की दुरी बढा कर जल्दी से काम निपटाने की कोशिश करते हैं। जिससे फ़सल कम होने की संभावना रहती है। इसलिए खेत मालिक को भी उनके साथ काम में जुटना पड़ता है। तभी तो कहते हैं "खेती अपन सेती"। कांवरिए लगातार चल रहे हैं अपनी मंजिल की ओर तथा हम भी बढ रहे हैं आगे।  

NH-30 सड़क गंगा की सैर

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

उदय की चित्रकारी, रिमझिम रिमझिम बरस्यो पाणी -- ललित शर्मा

बारिश प्रारंभ होते ही प्रकृति का नजारा बदल जाता है, बच्चे-बूढे, जवान, युवतियाँ सब निज-निज तरह से स्वागत करते हैं। सावन की के झूले और फ़िर सावनी त्यौहार मौसम में हरितिमा घोलते हैं। यहीं से तीज त्यौहारों के दिनों की शुरुवात भी होती है। परसों से बारिश की झड़ी लगी, तीन दिन हो गए बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही। मौसम को देख कर कवि, गीतकार, चित्रकार सब वर्षा ॠतु का वर्णन अपने माध्यमों से करने लगते हैं। 

बारिश में उदय स्कूल नहीं गया, उसने अपनी अभिव्यक्ति के लिए पेंसिल और ड्राईगशीट को माध्यम चुना और बारिश के चित्र बनाता रहा। अपनी क्रियात्मक क्षमता के हिसाब से चित्र खींच लिया। बाल मन की अभिव्यक्ति रोचक होती है, वह वस्तु या दृश्य को जैसा देखता है वैसा  ही चित्रित करता है, रेखांकन वास्तविक होता है। उदय द्वारा रेखांकित एक चित्र देखिए। उसने अपने रेखांकन के माध्यम से वर्षा का स्वागत किया। अभी कह रहा था कि-"पापा! मैं नाव बनाना भूल गया।" उसने कल कागज की नाव बनाकर चलाई थी। मैने कहा कि- अब नाव चलाते हुए चित्र बनाना, उसे लगाएगें।

एक काव्यचित्र मैंने भी गत वर्ष खींचा था वर्षा ॠतु का। बरसात के साथ नेट-बिजली की समस्या शुरु होने के कारण स्वाध्याय का समय मिल जाता है। नहीं तो ब्लॉग राग में ही दिन बीत जाता और कु्छ समय चैटराम एवं चलभाष मित्रों को भी देना पड़ता है। कल ताऊ शेखावाटी जी के प्रसिद्ध ग्रंथ "हम्मीर महाकाव्य" का अध्यन कर रहा था। उन्होने वर्षा ॠतु का राजस्थानी भाषा में मनोरम चित्रण किया है। हम्मीर महाकाव्य सरल राजस्थानी भाषा में हठी हम्मीर पर लिखा गया है। उसमें से वर्षा ॠतु का वर्णन प्रस्तुत है-

ताऊ शेखावाटी की कृति "हम्मीर महाकाव्य" के "चौथो जुद्ध" सर्ग से

नाचण लाग्या मोरिया देख, घणघौर नभ मडंल में।
चातकड़ै री मीठी पी-पी, गुंजण लागी भू मंडल में।।

अम्बर में च्यारुँमेर घटा, काळी-काळी गरजण लागी।
तपती धरती री छाती पर, मुसळाधार बरसण लागी॥

तपतै तन पर ठंडी-ठंडी, जद टप-टप छांट पड़ण लागी।
जड़िए विरहण मन दरवाजे, ठक-ठक-ठक ठाप पड़न लागी।

अणचाणचुकै ईं धरती रा, सोंवतड़ा भाग जणा जाग्या।
उड़ता बरसंता बादळिया, आया-छाया रस बरसाग्या॥

बादळ री घोर गरजणा स्युँ, सारी घांटियां गरजण लागी।
नभ में बादळियाँ बीच छिपी, बिजळी चम-चम चमकण लागी॥

दुष्टां री प्रीत कदे जैयाँ, थिर पळ भर नीं हो पावै है।
बैयाँ ईं बिजळी छण-छण में, निज पळ पळाट दिखलावै है॥

रिमझिम रिमझिम बरस्यो पाणी, नदियां उमड़ी तळाब भरया।
फ़ूटी कूंपळ तो सुख्योड़ा, सब ठूंठ होग्या हरया-भरया॥

कळ कळ तद बै'ण लग्यो, पाणी सब नदी नाळाँ में।
अर जगाँ-जगाँ होग्यो भेळो, घाट्याँ रै जोहड़ खाळां में॥

ताळाब किनारे जद मेंढक, यूँ टर्र-टर्र टर्राण लग्या।
जाणै गु्रुकुल में टाबरिया, मिल वेद-पुरान सुणाण लग्या॥

चमकण लाग्या जुगनुं चम-चम, अंधियारी काळी रातां में।
सुणके मन में रस आण लग्यो, चकवे चकवी री बातां में॥

ठंडी पुरवाई चाली तो, हर मन में मस्ती छाण लगी।
मुळ्कंती खिलती कळी-कळी, मँडरातां भवर लुभाण लगी।

बिरछां पर झूला पड़ग्या अर, मिळ कामणियाँ झूलण लागी।
तीज्याँ रा गाती गीतड़ला, छोरयां बागां घूमण लागी॥

मन मुदित हुया करसा सगळां, खेतां मे हळियो हांकता।
गायां सागै चाल्या गुवाळ, बंसी री घुन पर नाचता॥

सब हरया-भरया होग्या डूंगर, धरती पै छाई हरियाळी।
बन बाग खिलंतै फ़ुलां स्यूँ, महकण लागी डाळी डाळी॥

ज्यूँ जोबण मद मे चूर होय, धन नुँवी नवेली घूम र'यी।
बैया ही हरी-भरी होय'र, तरवर री डाळयाँ लूम र'यी ॥

झर-झर झरता सारा झरणा, मिल मीठी तान सुणाण लग्या।
तद मस्त जीवड़ा लोग कई, हो भेळा गोठ मणाण लग्या॥

अर घोट-घोट पीवण लाग्या, सब मिलकै भांग-भंगेड़ी तब।
गांजै सुल्फ़ै री चिलम खींच, होग्या मद मस्त नसेड़ी सब॥

अर जाय'र बाग-बगीचां में, सावण रा गीत सुणाण लग्या।
नाचता - कूदंता सगळा, ढप लेय'र कुरजां गाण लग्या॥


NH-30 सड़क गंगा की सैर

बुधवार, 20 जुलाई 2011

बरसात की एक रात का चिंतन --- ललित शर्मा

मैने रात 1 बजे बारिश की आवाज रिकार्ड की।  बारिश की बूंदो की आवाज के साथ झिंगुरों का स्वराघात बादलों की गड़गड़ाहट के कारण रहस्यमय संगीत पैदा कर रहा था। बारिश का संगीत सुनिए फ़ुहारों के साथ। कुछ आवाजे शुन्य में प्रगट हो रही हैं। जैसे कोई सरसराती आवाज में कुछ कह रहा हो। 



मौसम बरसाती बना हुआ है, थोड़ा बहुत बरस कर बादल रह जाते हैं, पहले 5-10 दिनों की झड़ी बनती थी, अब वह नहीं बन रही। हां! बरसाती बीमारियाँ जरुर पहुंच गयी। डॉक्टर फ़सल काटने में लगे हुए हैं और मरीज जेब खाली करने में। भगवान रोटी-रिजक सबको देता है सभी व्यवसाय एक दूसरे पर ही निर्भर हैं। आधी रात हो चुकी है, खिड़की के सामने खड़े-खड़े बारिश देखते हुए, कुछ दिमाग में चलने लगता है, लोग कहते हैं कि जिन्दगी में खालीपन होता है, मैं कहता हूँ कि कभी नहीं होता। हां! दिमाग चेतना अवश्य खो सकता है, विक्षिप्तता में वह कुछ भी सोच सकता है और कर सकता है। सबके अपने-अपने कर्म हैं। कोई स्वयं को रिक्त समझ सकता है पर ब्रह्माण्ड में खाली कुछ भी नहीं, खाली को शुन्य कहते है, पर खाली वह भी नहीं। शुन्य ही सृष्टि का आरंभ है। हर चीज भरी हुई है, कभी-कभी दिमाग खाली हो जाता है, कहें तो चेतना चली जाती है, फ़िर लौट आती है। दिमाग अपने काम में लग जाता है।

दो दिन की बरसाती अस्वस्थता ने काफ़ी परेशान किया। वैसे बारिश में भीगने पर भी बुखार नहीं आता, पर कहीं से जरासिम आ जाएं तो अपना काम कर ही जाते हैं। रात गहराने के साथ नींद कोसों दूर भागती जा रही है। आसमान में बादल गरज रहे हैं, बारिश की फ़ुहारें शुरु हो गयी। खिड़की से बिजली की चमक दिखती है। यही समय होता है बिजली रानी के रुठने का। बिजली के रुठते ही बल्ब भी बुझ जाता है, जैसे मंत्री के कुर्सी से उतरते ही चमचों के चेहरे का नूर स्वत: चले जाता है। पावर स्टेशन से ही करेंट चला जाए तो फ़िर बंदा करे क्या? नींद नहीं आई तो खिड़की के सामने खड़ा हो जाता हूँ, उस पार से बौछारें आ रही हैं ठंडी हवा के साथ। अच्छा लगता है, जब बिजली चली जाए और ठंडी हवा चलती रहे। अंधेरे में समय बिताने के लिए कोई और साधन भी तो नहीं। ऐसे में प्रकृति की ताल से ताल मिलाना ही ठीक है।

खिड़की के पार से बिजली चमकी और बादल जोर गड़गड़ाने लगे। कूलर की चद्दर पर पड़ती हुई पानी की लय बद्ध बूंदों से संगीत पैदा हो लगा। मेरा ध्यान टप-टप, डुम-डुम, डुड़ुम-डुड़ुम डुड़ुम, टप-टप की ध्वनि करती बूंदो पर है। कितनी मधुर लय है, इन बूंदो की तान में। सधा हुआ सुर आनंदित कर रहा है। अंधेरे में भी आँखे बंद करके सुनने का मजा ही कुछ और है। बिलकुल गुंगे के गुड़ जैसा, जिसे स्वाद आता गुड़ का पर वर्णन नहीं कर सकता। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही  है। अगर जीवन लय बद्ध है तो जीवन संगीत का आनंद आता है। परिवार में तालमेल न हो और सुर बिगड़ा हो तो त्रैलोक्य में भी आनंद नहीं, तृप्ति नही। आनंदानुभुति एवं तृप्ति के लिए स्वर का लय बद्ध होना आवश्यक है।

बूंदों के साथ झिंगुरों का सुर में सुर मिलाना गजब है। जैसे उन्हे पता है कि अभी तबला कौन से ताल में बज रहा है और उसके साथ सरगम कौन सी मिलानी है। अंधेरे में खिड़की पार बिजली चमकती है, पेड़ों की छाया रहस्यमयी प्रतीत होती है। मुझे मसखरी सूझती है, जिसे लोग शुन्य, नीरवता, सन्नाटा, खाली पन कहते हैं उसकी आवाज रिकार्ड करने लगता हूँ, शुन्य में पैदा हुई आवाज को सुनना चाहता हूं। शुन्य से कैसी आवाजें आती हैं आज तक सुना नहीं। अनहद नाद जैसा ही होगा। चमकती हुई दामिनी के चित्र लेने चाहिए। फ़िर कभी ऐसी बरसात न हुई तो। चमकती हुई बिजली के चित्र लेना भी धैर्य का काम है। पहले बिजली चमकती है फ़िर उसके एक मिनट बाद बादल गरजते हैं। जैसे ही बिजली चमकती थी और मैं क्लिक करता था तो अंधेरे के अलावा कुछ चित्र में आता ही नहीं था। प्रयास जारी रहा, कभी तो एकाध फ़्रेम में बिजली फ़ंसेगी।

रिकार्डिंग बंद करके जैसे ही मुड़ता हूँ, बिजली की चमक से कमरे में लगे दर्पण से टकरा कर रोशनी का प्रतिबिंब लौट कर मुझे चौंका देता है। अंधेरे में जरा से उजाले से चौंक पड़ता हूं। थोड़ी सी रोशनी से दर्पण में दिखाई देते प्रतिबिंब एवं दिन की रोशनी में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब में जमीन आसमान का अंतर है। थोड़ी सी चमक ने दर्पणाकृति रहस्यमयी बना दी। तभी एक जगह लिखा याद आता है - "दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को चैन से सो सको, और रात को ऐसे कर्म करो कि सुबह किसी को मुंह दिखा सको।" सच कहा है, अगर मनुष्य अपना चेहरा ही गौर से देखे आंशिक प्रकाश में तो रुप कितना विकृत दिखाई देता है। इसलिए जीवन में प्रकाश का होना निहायत ही जरुरी है। जीवन में प्रकाश तभी रहेगा जब कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। तभी तन-मन-जीवन आलोकित होगा।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

बस्तरिहा मैजिक का असर --- ललित शर्मा

स्तर जाने का कार्यक्रम अचानक ही बन गया बैठे बिठाए। दोपहर तीन बजे अचानक उठे और चल पड़े बस्तर की ओर। रायपुर से 305 किलोमीटर की दूरी पर बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर स्थित है। जाने में लगभग 6 घंटे का समय लगता है। धमतरी के बाद चारामा घाट से जंगल शुरु हो जाता है। सड़क के दोनो तरफ़ हरे भरे वृक्षों के बीच से सांप सी लहराती सड़क घाट और वनों के बीच से गुजरते हुए जगदलपुर तक पहुंचाती है। केसकाल घाट पर तेलीन माता का मंदिर है, जहां एक बार वाहन चालक रुके नहीं तो भी माता के स्वागत में हार्न बजाकर जरुर जाते हैं। केसकाल से कोन्डागांव फ़िर भानपुरी एवं बस्तर गाँव होते हुए मुख्यालय जगदलपुर।

रास्ते में ध्यान आया कि अली साहब से नहीं मिले पिछली यात्रा के दौरान। इस बार मिल लिया जाए। उन्हे फ़ोन लगाया तो वे घर पर ही मिल गए। हमने भी जगदलपुर पहुंचने की सूचना दे दी। उन्होने कहा कि हमारे यहाँ ही रुके। मैने नीरज को होटल बुक करने के लिए कह दिया था। नीरज मेरा चचेरा भाई है जो पिछले साल मेरे साथ यात्रा पर गया था। अली सा के आग्रह को टाल न सका और उसे मना कर दिया और कहा कि अंकल को भी न दे मेरे आने की सूचना, उनसे कल मिल लेगें। हम 8 बजे जगदलपुर पहुंच गए। इस शहर के सभी चौक चौराहे एक जैसे ही हैं, जिनमें मैं उलझ जाता हूँ। अब तो मुख्य सड़क चौड़ी हो गयी है। इसलिए कुछ रास्ता तो समझ आ जाता है। अली साहब  मुझे लेने के लिए 8 बजे शहीद पार्क पहुंच गए।

घर पहुंचने पर पता चला कि वे वायरल संक्रमण के शिकार हो गए हैं, तबियत कुछ नासाज सी है। मुझे ब्लॉगर रुम दे दिया गया, फ़िर तो कुछ कहना पूछना ही नहीं। ब्लॉगर को नेट-सेट मिल जाए तो जंगल में भी बैठ कर समय गुजार देगा। चाहे उस पर दीमक बांबियाँ भी बना ले तो भी पता न चले। रात के भोजन के पश्चात आदत के अनुसार 2 बजे तक नेट पर रहा। उसके बाद सोने का प्रयास किया। थोड़ी नींद आई और नहीं भी आई। इसी उहापोह में 6 बजे उठ गया। खिड़की से सूरज का प्रकाश आ रहा था और चिड़ियों का चहचहाना प्रारंभ हो गया, नीचे बगीचे में अली सा ने एक छोटा सा तालाब बना रखा है जिसमें मछलियाँ और कमल, कुमुदनी भी पाल रखे हैं।कुमुद के नीले फ़ूल बड़े सुंदर दिखाई दे रहे थे।
 
आस-पास में आम, कालीमिर्च, तेजपत्ता, और भी न जाने क्या-क्या लगा रखा है। चम्पा, चमेली, गुलाब, कटहल इत्यादि मतलब बगीचा अच्छा लगा रखा है। सुबह-सुबह मछलियाँ तालाब में कूद फ़ांद कर खेलने का मजा ले रही थी। एक दो मेंढक भी अली साहब ने दिखाए, जो तालाब में बलात प्रवेश कर गए थे। सांपों से दोस्ती के विषय  में बताया। इसके बाद मैने नेट शुरु कर लिया और 10 बजे तक नहा धोकर तैयार। घर के बाहर कोचाई पत्ता दिखाई दिया। छत्तीसगढ में कहावत है कि किसी का बैठे बिठाए खर्च कराना हो तो उसके घर कोचाई पत्ता भेज दो। अर्थात कोचाई पत्ता तो दो रुपए का होगा पर उसकी सब्जी बनाने के लिए 50 रुपए और खर्चा करने पड़ेगें और उतनी ही मेहनत भी।

महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव
हरी भरी वादियों एवं बेशकीमती इमारती लकड़ी के घने वनों से आच्छादित बस्तर धरती का स्वर्ग ही है। कल-कल करते झरने एवं प्रवाहित होती नदियाँ के साथ जंगल के प्राणियों से मुलाकात यहीं होती है। बस्तर तो मैं बरसों से जाता रहा हूँ। वर्तमान में नक्सली वारदातों के कारण पर्यटक जंगलों में भीतर नहीं जाते। बस्तर का नाम जेहन में आते ही राजा प्रवीरचंद भंजदेव की भी याद आती है। बस्तर के काकतीय वंशीय राज परिवार का इतिहास 14 वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है, इसके प्रथम शासक आत्मदेव रहे हैं। बस्तर में आत्मदेव 1313 में राजा के रुप में प्रतिष्ठित हुए। इन्होने 47 वर्षों तक राज किया, 77 वर्ष की आयु में 1358 में इनकी मृत्यु हुई। कहते हैं कि आत्मदेव को देवी का वरदान प्राप्त था, कहा जाता है कि वे जहाँ तक विजय अभियान में जाएगें, देवी उनके साथ रहेगी, उन्हे देवी के पायल की आवाज सुनाई देती रहेगी। अगर उसने पीछे देखा तो विजय अभियान वहीं रुक जाएगा। एक बार उन्हे पायल की आवाज सुनाई नहीं दी, पीछे मुड़कर देख लिया। देवी के पैर नदी के रेत में धंसे होने के कारण पायल की आवाज सुनाई नहीं दी और उनका विजय अभियान वहीं रुक गया।

राजमहल बस्तर- जगदलपुर
गत 20-25 वर्षों में जगदलपुर जाने पर कई बार यहां के राजमहल के सामने गुजर जाता था, लेकिन कभी भीतर जाकर नहीं देखा। यहां का 75 दिनों का दशहरा पर्व मशहूर है। इच्छा आज राजमहल को भीतर से जाकर देखने की थी। यह राजमहल कई शताब्दियों का इतिहास समेंटे हुए है। 25 मार्च 1966 को घटित घटना में राजा प्रवीरचंद भंजदेव एवं सैकड़ों आदिवासी इस राजमहल में मारे गए थे। सत्ता की लड़ाई में अक्सर मुकाबले होते रहे हैं जिनकी परिणिति मौतों से ही हुई है। राजा प्रवीरचंद भंजदेव आदिवासियों के बीच भगवान की तरह पूजनीय हैं। आदिवासियों के पूजा स्थल में प्रवीरचंद भंजदेव के चित्र अन्य स्थानीय देवी देवताओं के साथ मिल जाएगें। महल के दरबार कक्ष में राज प्रवीरचंद के चित्र के दर्शन करने के लिए आदिवासियों  का आज भी तांता लगा रहता है। जो गांव से एक बार शहर आता है वह महल तक भी पहुंचता है। इनके वर्तमान वंशजो ने महल के हिस्से को किराए में दे रखा है। जिसमें व्यवसायियों ने अपने काम धंधे खोल रखे हैं। जो कबाड़ी बाजार जैसा दिखाई देता है।

बस्तर राजमहल का मुख्य द्वार
राजमहल में प्रवेश करने पर दिखा कि पहले हिस्से में नर्सिंग कॉलेज चलाया जा रहा है। कुछ विद्यार्थी नजर आए। सिर्फ़ महल का एक कक्ष ही खुला मिला। वहाँ और कोई जानकारी देने वाला नहीं था। पूछने पर बताया कि महारानी महल के उपरी हिस्से में निवास करती है। राजा प्रवीरचंद के वर्तमान वंशज कमलदेव भी से भी मुलाकात नहीं हुई। गत वर्ष उनसे रायफ़ल शुटिंग प्रतियोगिता के दौरान माना में ही मुलाकात हुई थी। साधारण रंग रोगन से ही महल को संवारा गया है। महल के मुख्य द्वार पर बस्तर राज की कुल देवी दंतेश्वरी माई का मंदिर है। वहां दर्शनार्थी भी मिले। दंतेवाड़ा में भी माँ दंतेश्वरी का मंदिर है। लकड़ी से निर्मित इस मंदिर में दर्शनों का अवसर मुझे कई बार मिला। एक बाबा जी ने बताया कि साक्षात देवी हैं। इसका अहसास उन्हे हुआ। मैं तो साधारण दर्शनार्थी ही था। मुझे तो धोती पहन कर सिर्फ़ विग्रह का ही दर्शन करना था और दर्शन किए भी।


दलपत सागर जगदलपुर
नीरज को मैने बताया नहीं था कि कहां रुका हूँ। दोपहर भोजन के पूर्व राजमहल गए, राजमहल के कुछ फ़ोटो लिए, उसके बाद दलपत सागर पहुंचे, जगदलपुर के दलपत सागर को दलपत देव ने अपने शासन काल 1722 से 1775 के बीच बनवाया था। दलपत सागर में पर्यटकों के लिए बोट की व्यवस्था है तथा म्युजिकल फ़ाउंटेन भी लगे हैं। मैं पहुचा तो कुछ युगल भी कोने में एकांतलाप कर रहे थे। एक के साथ एक फ़्री वाली योजना भी वहां साकार होती दिखाई दी। इस मामले में तो जगदपुर रायपुर के भी कान काटते नजर आया। लगा कि पाश्चात्य संस्कृति का अपमिश्रण फ़िल्मों के माध्यम से यहां तेजी से हो रहा है। अली सा के घर के पास बालाजी मंदिर है, जहाँ मैं पहले भी आ चुका हूँ, इस मंदिर को यहां के तेलगु समुदाय ने बनवाया है। तिरुपति बालाजी के प्रतिरुप जैसा ही है। दोपहर को यह मंदिर बंद रहता है और शाम के 6 बजे खुलता है। मंदिर के दीवारों एवं चौखटों पर खूबसूरत नक्काशी हुई है, मंदिर के सिंहद्वार पर देवी देवताओं एवं यक्ष किन्नरों की मुर्तियाँ बनी हैं। मंदिर का प्रांगण सुंदर एवं गरिमामयी है।

यहाँ से हम एन्थ्रोपोलाजी म्युजियम गए। जहां बस्तर के आदिवासियों के रहन-सहन संस्कृति संबंधी चित्र एवं वस्तुए प्रदर्शित किए गए हैं। जिससे उनके जन जीवन की जानकारी मिलती है। वहां पहुचने पर विद्युत अवरोध की सूचना मिली, म्युजियम में अंधेरा फ़ैला हुआ था। मेरे पास समय कम था, वहां के कर्मचारी को टार्च लाने की कही तो उसने टार्च नहीं होने की जानकारी दी। पर मुझे दरवाजे के पास  एक होंडा कम्पनी का नया और बड़ा जनरेटर भी दिखाई दिया। उसे कहने पर भी चालु नही किया, उसका उपयोग बिजली व्यवस्था बनाने की बजाए खाने के टेबल के रुप में किया जा रहा था। चलो जनरेटर किसी काम तो आया, नहीं तो यूँ ही पड़ा रहता।

बस्तर राज्य का राज चिन्ह
घर पहुंचने पर दोपहर का खाना तैयार था। भोजनोपरांत अली सा ने मुझे अंकल के यहां छोड़ दिया। जो और साथी थे उनका कोई समाचार नहीं मिला। लगा कि उनका इंतजार करना बेमानी है, फ़ोन लगाने पर भी फ़ोन बंद मिला, मैने तुरंत बस की टिकिट बुक करवा ली, रात का खाना नीरज के साथ खाकर घर के लिए बस पकड़ ली। 11 बजे स्लीपर बर्थ पर डेरा डाला, लेटे लेटे सोच रहा था कि बस्तर की सुरम्य वादियों को किसकी नजर  लग गयी। नक्सली एवं पुलिस नाम के दो पाटों के बीच लोग पिस रहे हैं, एक तरफ़ कुंआ और एक तरफ़ खाई वाला किस्सा है। इधर गए तो मरे और उधर गए तो मरे। जान बचाना है तो बस्तरिया मैजिक काम आएगा, न  काहू से दोस्ती न काहू से बैर। हम भी जब चले थे तब बस्तरिया मैजिक का सरुर था, ज्यों-ज्यों  दूर होते गए, बस्तर मैजिक का असर कुछ कम होने लगा तो नींद खुल गयी। देखा कि पौ फ़टने वाली है, अभी घर से कुछ दुर हैं, घर पहुंचे तो सुबह के 6 बज रहे थे।

NH-30 सड़क गंगा की सैर

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

ट्रिनSSS ट्रिनSSS ट्रिनSSS - ललित शर्मा

ट्रिनSSS ट्रिनSSS ट्रिनSSS ट्रिनSSS ट्रिनSSS ट्रिनSSS

नम्बर देखा तो दिल्ली का था, 011-XXXXXXXX, सोचा किसी मित्र का होगा, उठा लिया जाए।

हेलोSSSSSSS

"हेलो! सर गुड मार्निंग, मैं XXXXX एयर फ़ेल कम्पनी से बोल रहा हूँ"

"बोलिए"

"सर, हमारी ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज ने एक स्वास्थ्य बीमा योजना शुरु की है। उसके विषय में आपको जानकारी देनी है, आप कुछ समय देगें?"

"किसकी कम्पनी है?"

"सर, फ़ुनिल सित्तल जी हमारी कम्पनी के मालिक हैं, उनके बहुत सारे व्यवसाय हैं।"

"अच्छा! वही मोबाईल कम्पनी वाला।"

"जी सर! आपने सही पहचाना।"

"बहुत अच्छा किया तुमने फ़ोन लगा लिया, मैं एयर फ़ेल के फ़ोन का इंतजार कर रहा था। बताओ तुम्हारी बीमा योजना क्या है?"

"सर! हमारी कम्पनी मेडिक्लेम करती है, बहुत ही कम प्रीमियम में। एक बार करवा कर देखिए, मेडिक्लेम नहीं तो एक मनी बैक पालिसी ले लीजिए,हमारे बीमा योजना के सामने सभी कम्पनियों की बीमा योजना फ़ेल हैं।"

अच्छा! वैसे भी तुम्हारी कम्पनी के नाम के साथ "फ़ेल" जुड़ा है, पैसा जमा करने के बाद वापसी की क्या गारटी है?"

"सर! आपको हम बाँड देंगे, जब वह मैच्योर हो जाएगा तो आपको रुपया मिल जाएगा।"

"ये बाँड क्या होता है?"

"सर! कागज पर बना सर्टिफ़िकेट होता है, जिसमें हम रुपए वापसी एवं रिस्क कव्हर की गारंटी देते हैं।"

"अगर रुपए लेकर तुम्हारी कम्पनी भाग गयी तो मैं कागज को क्या चाटुंगा।"

"नहीं सर! ऐसा कैसे हो सकता है? नामी कम्पनी है।"

"ये नामी कम्पनियां जब घाटे में रहती हैं तो बैलेंस सीट फ़ायदे वाली बनाती हैं, और जब फ़ायदे में होती तो बैलेंस शीट घाटे वाली बनती है, ताकि माल अंदर किया, दीवाला निकाला, और छुट्टी पाई। चलो तुम मुझे दो पैसा, तुम्हे भी मैं ऐसा ही सर्टिफ़िकेट देता हूँ, जीवन भर की गारंटी। न फ़टेगा, न गलेगा, न चलेगा।"

"सर! हमारी कम्पनी को रिजर्वबैंक की मान्यता है। उनके रजिस्ट्रेशन से ही कम्पनी चला रहे हैं।"

"हमारे को भी रिजर्व बैंक की मान्यता है, जो नोट मेरे पास हैं उस पर रिजर्व बैंक के गर्वनर से साईन हैं, नोट उनके साईन से ही चलता है। क्या तुमने फ़ु्द्दु समझ रखा है।"

"सर! ऐसा नही है, यह फ़ुनिल सित्तल की कम्पनी है, कारपोरेट जगत में उनका नाम चलता है।"

"अच्छा! क्या गारंटी है इसकी, मै तो कभी मिला ही नहीं, उसने बिना मिले ही धोखा-धड़ी कर दी, और अब तुम्हे पीछे लगा दिया।"

"क्या हुआ सर?

"अरे! मैने रात को 100 रुपए का रिचार्ज करवाया था। सुबह उठ कर देखा तो 75 रुपए गायब। कम्पनी में फ़ोन लगाया तो उन्होने कहा कि आपने रेड़ियो एक्टिवेट करवाया है, जिसके 75 रुपए जमा कर लिए गए हैं। अरे मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है कि मोबाईल पर रुपए खर्च करके तुम्हारा गर्दभ गान सुनुंगा। जबकि मेरे पास मोबाईल में एफ़ एम रेड़ियो है, मेरे पैसे वापस करो।"

"वह बोला- सर आपके मोबाईल नम्बर से रिक्स्वेस्ट आई है, पैसा वापस नहीं हो सकता।"

"तेरी तो ऐसी की तैसी, मेरा पैसा तु क्या तेरा बाप भी नहीं खा सकता।"

सर मैं तो बीमा कम्पनी की तरफ़ से बोल रहा हूँ।"

"ऐसी की तैसी तेरी बीमा कम्पनी की, जब तुम्हारी एयर फ़ेल कम्पनी दो चार रुपए की चोरी नीयत रखती है तो हजारों रुपयों का क्या भरोसा। गरीबों के एक-एक रुपए मार कर अपनी जेब भरने वालों का क्या विश्वास करु, कहीं रुपए लेकर भाग गया तो? हमारी लुटिया डूबा दोगे।"

"सर सुनिए न............?

"क्या सुनना है? तुम्हारी कम्पनी के खिलाफ़ एफ़ आई आर करवाऊंगा, इसने मेरी जेब पर डाका डाला है। आई पी सी की धारा 395 और 420 लगवाऊंगा। जेल भिजवाऊंगा। मोबाईल से बैलेंस काटना क्या डकैती नहीं है? अगर किसी की जेब से दो रुपए निकाल लो तो अपराध बनता है कि नहीं? तुम्हारा फ़ुनिल सित्तल सबसे बड़ा चोर है। गरीब आदमी 10 रुपए का रिचार्च कराता है और उसका उलजलूल बैलेंस काट लेते हो। उसे पता ही नहीं चलता कि किस बात पर बैलेंस खाली हो गया। वह रिचार्ज करने वालों की खोपड़ी खाता है कि बैलेंस कैसे कट गया मैने तो बात ही नहीं की। बैलेंस काटने के बाद किसी का रुपया भी वापस नहीं होता। सर्विस सेंटर में फ़ोन लगाओ तो उसके लिए 50 पैसा मिनट काटा जाता है। मतलब चारों तरफ़ से लूट लो इंडिया को।"

"सर सर! मैं बीमा कम्पनी से हूँ सर।"

"क्या सर सर लगा रखी है, तुम्हारी कम्पनी की बात कर रहा हूँ, मेरा नम्बर किसने दिया? मतलब तुम्हारी कम्पनी अपने यहां दर्ज नम्बरों का दुरुपयोग कर रही है। किसी भी नम्बर पे उठाओ और फ़ोन करो, विज्ञापन करो। हो सकता है डाटाबेस और जानकारी बेच रही होगी,  डाटाबेस से नम्बर लेकर फ़ोन करना भी सायबर अपराध है। कुछ मालूम है कि नहीं? तुम्हारी कम्पनी के खिलाफ़ धरना करवाऊंगा, हड़ताल करवाऊंगा, एयर फ़ेल की बजाए बिना छोड़ूंगा नहीं। समझे कि नहीं। मेरी बात कराओ अभी फ़ुनिल सित्तल से।"

टूंऊंऊंऊं टूऊंऊंऊं टूंऊंऊंऊं टूंऊंऊंऊं टूऊंऊंऊं टूंऊंऊंऊंSSSSSS       

NH-30 सड़क गंगा की सैर

सोमवार, 11 जुलाई 2011

पीठ में दर्द आज भी है - रेल दुर्घटना - ललित शर्मा

रेल दुर्घटना अपने आप में एक बहुत बड़ी त्रासदी होती है और जो इसको भोग ले, उसके लिए इससे उबर पाना बहुत ही कठिन होता है। जीवन भर इसे भुला पाना मुश्किल होता है। मैं १2 साल होने पर भी नहीं भुला पाया हूँ. इन दुर्घटनाओं में सालाना हजारों लोगों की जाने जा रही हैं, उनके परिवार बर्बाद हो रहे हैं, सिर्फ चालकों एवं सिगनल की लापरवाही से. इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार तो लाख दो लाख रुपए देकर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती है। लेकिन दुर्घटना मरे एवं घायल यात्रियों के परिजनों पर जो गुजरती है, उसे वही जानते हैं। ऐसी ही एक त्रासदी पूर्ण दुर्घटना का मैं साक्षी रहा हूँ। जब भी कहीं रेल दुर्घटना होती है। मेरे सामने 1998 का वह दृश्य आ जाता है।

बात २ सितम्बर १९९८ की है, मैं दिल्ली से रायपुर आने के लिए चला, मुझे नरेन्द्र ताम्रकार दुर्ग वाले  निजामुद्दीन स्टेशन तक छोड़ने आये. गोंडवाना एक्सप्रेस से मेरी टिकट थी रायपुर आने के लिए. उस समय गोंडवाना एक्सप्रेस दिल्ली से २.३५ पर छुटती थी. मैंने सोचा कि ट्रेन में बैठने से पहले घर एक फोन लगा लेता हूँ , लेकिन लाइन नहीं मिली, ट्रेन में मैने अपनी सीट संभाली और   के बाद अपना सफारी उतार कर हाफ पेंट और टी शर्ट पहन ली। मेरे कम्पार्टमेंट में कोई नहीं था खाली था तभी मेरे सामने सीट पर दो लोग और आ गए. ट्रेन ने चलते ही फुल स्पीड पकड़ ली. मैंने अपनी किताब निकाली और खिड़की के पास बैठ कर पढने लगा. उसी समय रेल की पटरी से रोड़ियां उछल कर खिड़की से अन्दर आकर मुझे लगी. खिड़की से थोडा दूर हो गया और सामने बैठे व्यक्तियों से बोला "यार लगता है आज ड्राईवर ने दो पैग ज्यादा ही चढा लिए, ट्रेन फुल स्पीड में चला रहा है"। 

मैं इतना कहा ही था कि जोर से आवाज आई और सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया. कुछ क्षण के लिए तो होश गायब कि ये क्या हो गया, मुझे लगा कि कोई भारी चीज मेरे ऊपर गिरी है, होश आने पर अपने आप को संभाला, तो देखा की एक आदमी जो साइड ऊपर सीट पर सो रहा था वो मेरे उपर गिरा हुआ है, मैं उसके नीचे दबा हुआ हूँ. मैं उसे हटाया देखा तो बोगी पलट गई थी. गनीमत थी के हमारी बर्थ दरवाजे के नजदीक थी. मैंने अपना सामान बेग उठाया और दरवाजे से लटक के बोगी के ऊपर पंहुचा तो,और जो पॉँच लोग थे उनको भी बोगी के उपर खींचा. देखा की ट्रेन के तीन टुकड़े हो गए हैं. १४ बोगीयां गिर गई थी.ऐसी बोगी बच गई थी उसके पीछे के पहिये ही उतरे थे. गाड़ी ड़ीरेल हो गयी , यानी पटरी से नीचे उतर गयी थी. नीचे पटरियां उखड़ गयी थी. और उन पर तार पड़े थे. मैं नीचे जमीन पर डर के मारे नहीं उतर रहा था मेरी बेकबोन में दर्द हो रहा था.

जब ट्रेन डिरेल हुई तो ऐसी बोगी नहीं गिरी थी, उसके पीछे तीन पहिए ही पटरी से उतरे थे,  तभी ऐसी बोगी दरवाजा खोल कर एक बंगाली बाहर निकला और बोला - क्या तमाशा लगा रखा है, इतनी देर से बोगी का ऍसी बंद है, कितनी गर्मी लग रही है? सवारी लोग गर्मी से बेहाल है, ऐसी चालु क्यों नहीं करते। ये उसकी बात वहां पीड़ित लोगों को नागवार गुजरी और उसके बाद उन्होंने उसको पकड़ लिया पीटने के लिए। एक बोला-" सुसरे! इतने आदमी मर गए एक्सिडेंट में और तुझे ऐसी की पड़ी है। तेरी बोगी गिरती तो तंदूरी मुर्गा बन जाता, मारो साले को।"  वह दरवाजा बंद करके  ऍसी बोगी में घुस गया तो बच गया नहीं तो उसका....... पता नहीं दुनिया में कैसे-कैसे लोग होते हैं? जब खुद पर बीतती है तब पता चलता है।

सांझ होने लगी. अँधेरा घिर रहा था. सुनसान बियाबान में खेतों के बीच में बल्लभ गढ़ के पास गैस की बड़ी-बड़ी टंकियां लगी हैं वहीँ पर गाड़ी गिरी थी.तभी एक ने कहा कि सर बिजली के तार टूटने से से इनमे करेंट का प्रवाह बंद हो जाता है. तब हम हिम्मत करके बोगी से नीचे उतरे, जब आगे गए और गिरी हुई बोगियों के पास तो बड़ी बुरी हालत थी. काफी लोग मारे गए थे, कुछ ने तो मेरी आँखों के सामने ही दम तोडा था. मैं वहां कुछ भी नहीं कर सकता था. असहाय खडा था.२ घंटे तक दिल्ली या आस पास के स्टेशनों से कोई सहायता नहीं आई. जबलपुर जाने वाली बोगी में बहुत सारे फौजी थे.उसमे ही ज्यादा मौत हुई थी. क्योंकि स्पीड होने के कारण पीछे की बोगियों में नुकसान जायदा हुआ था. 

गार्ड ने वहीं पर एक रेल्वे का टेलीफ़ोन कनेक्शन ढूंढा। एक टेलीफ़ोन का इंमरजेंसी सेट उसमें लगा कर पास वाले स्टेशन को दुर्घटना की सूचना दी। टीटी ने ट्रेन में चार्ट भी चेक नहीं किया था। मेरे पास कोई सबूत नहीं था, इस ट्रेन में सफ़र करने का। मैने टी टी को ढूंढा और उससे अपनी टिकिट पर लिखवाया कि मैं इस ट्रेन में हूँ। अगर कोई शारीरिक नुकसान बाद में पता चलता तो रेल्वे पर क्लेम करने वक्त वही टिकिट काम आती। चारों तरफ़ अफ़रा तफ़री मची हुई थी। आस-पास के गाँव वाले आ चुके थे। लेकिन 3 घंटे तक कोई रिलीफ़ नहीं आई, जबकि बल्लभगढ स्टेशन नजदीक ही था। ना कोई डॉक्टर ना कोई पुलिस या स्थानीय प्रशासन का नुमाईन्दा। मैं अपना बैग उठा कर पैदल ही चल पड़ा अँधेरा होने वाला था.बल्लभ गढ़ और दिल्ली वाले रोड पर पहुंचकर बस पकड़ी, उसने मुझे आश्रम वाले पुल पे उतारा, फिर वहां से बस पकड कर नार्थ एवेन्यू पंहुचा. 

वहां पर नरेन्द्र ताम्रकार ने मुझे वापस आये देखा तो उसे आश्चर्य हुआ कि अभी तो ट्रेन में बैठा कर आया था, वापस कैसे आ गये? मैंने उसे सारी घटना बताई, तब उसने टी वी चालू करके देखा तो न्यूज में दुर्घटना के बारे में बता रहा था. जब रेलवे स्टेशन पंहुचा तो वहां अपने-अपने परिजनों के विषय में लोग पूछ ताछ कर रहे थे लेकिन उन्हें कोई माकूल जवाब नहीं मिल रहा था. रेलवे वाले सीधे मुंह बात नहीं कर रहे थे. मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी टिकिट वापस की, फिर मेरे एक मित्र ने सुबह हवाई जहाज की टिकिट बनवा दी, जिससे मैं अपने घर सही सलामत वापस आ गया. घर पर फोन नहीं लगने का एक फायदा ये हुआ कि उन्हें ये पता नहीं था कि मै इसी ट्रेन से आ रहा हूँ. नहीं तो घर में कोहराम मच जाता. इस दुर्घटना की उस दिन की टिकिट की फोटो स्टेट कापी एवं सभी अख़बारों की कापी आज भी मेरे संग्रह में है. एक यादगार के लिए, इस दुर्घटना के कारण मेरी पीठ में बेकबोन का दर्द आज भी सालता है. कहते हैं ना,

"जाको राखे सांईंया,मार सके ना कोय,
बाल ना बांको कर सके,जो जग बैरी होय"


NH-30 सड़क गंगा की सैर

शनिवार, 9 जुलाई 2011

भोले बाबा के भोले भक्त -- ललित शर्मा

बाबा की नगरिया (बैद्यनाथ धाम) पहुंचने की तैयारियाँ जोर शोर से चल रही हैं, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सभी बाबा के दर्शनों के लिए लालायित हैं। इस वर्ष मेरा टाईम टेबल कुछ गड़बड़ होने के कारण पहुंचना मुश्किल लगता है। सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर तक का सफ़र रोमांचकता से भरपुर होने के कारण आनंददायी है। जो एक बार जाता है वह बार-बार जाना चाहेगा। यात्रा में जाने के लिए मीनु के साथ न्यौता मुझे मिला। कांवरिए दो महीने पहले से तैयारी कर लेते हैं पूरे रास्ते की। एक बानगी देखिए।
बोलबम यात्रा मीनू चार्ट

17/7/11---सुबह - 8 बजे स्टेशन में:- चाय, बिस्किट, सूप
आरंभ से क्युल तक :- पेप्सी, सेवनअप, लिची ज्युस,सेब ज्युस, मठा, नमकीन बिस्किट, काजू, बादाम, पिस्ता, हल्दीराम भुजिया, कुरकुरे नमकीन्।
9 बजे बिलासपुर में नास्ता :- 2 मलाई चाप, 1 कटलेट, 1 ढोकला, 1सेंडविच, 1 भुजिया ।
11/30 को रायगढ में दोपहर का खाना:- 1 मीठा, 1 दही बड़ा, 2 सब्जी (पनीर मसाला, मिक्स वेज), सादी रोटी, मेसी रोटी, पापड़ एवं सलाद
दोपहर 2 बजे:- राउरकेला स्टेशन में :- फ़ल, आईसक्रीम, मुसंबी ज्युस।
4 बजे चक्रधरपुर स्टेशन में :-  नास्ता, चाय, मीठा, नमकीन
6 बजे टाटा स्टेशन में :- 2 मीठा, दहीबड़ा, तन्दूरी रोटी, नान रोटी, पुलाव, दाल, मिक्सवेज, मलाई कोफ़्ता
रात 9 बजे पुरुलिया स्टेशन में :- केशर दूध।

18/8/11 सुबह 5 बजे क्युल स्टेशन में :-  सुबह का नाश्ता
सुल्तान गंज स्टेशन में :-  दोपहर :-  धर्मशाला में खाना
असरगंज में रात का खाना :- दाल-चावल, कढी, सब्जी में-फ़ूलगोभी, भिंडी, सादी रोटी, मेथी, पापड़, सलाद, अचार (केशर दूध)

19/8/11 सरकारी धर्मशाला :-  छोले भटूरे, केसर जलेबी, पूलाव, मठा, लस्सी
चंदन मोड़ रात में :-  चावल, सादी रोटी, सब्जी, पापड़, सलाद, गुलाब जामुन, केशर दूध

20/8/11 शिवलोक दोपहर खाना :-  बादाम का हलवा, पकोड़ी (मुंग दाल) मसाला कचोड़ी, आलू की सब्जी, हरी चटनी।
रात्रि का खाना:-  चावल,रोटी, सब्जी, कढी, पापड़, सलाद, मुंगदाल का हलवा, केशर दूध
21/8/11 धर्मशाला में - खीर-पुड़ी, सब्जी,पुलाव
झारखंड गेट में रात्रि भोजन :-  चावल, सादी रोटी और मेसी रोटी, सब्जी पापड़, रसगुल्ला

22/8/11 बाबाधाम बिहार गेस्ट हाउस :-  सुबह का नास्ता, पोहा, गुलाब जामुन, हल्दीराम का सेव
दोपहर एवं रात में सादा खाना

23/8/11 सुबह नास्ता:- कटलेट,मलाईचाप, खीर मोहन, हल्दीराम का भुजिया, सेंडविच, चाय बिस्किट
दोपहर में:- दाल-बाटी-चूरमा, चाव-दाल-सब्जी
रात में :-  पुलाव, पूरी, आलू की सब्जी, रमकेलिया की सब्जी

वापसी

24/8/11 को सुबह 8 बजे टाटा स्टेशन में :-  2 कटलेट, ढोकला, समोसा, मीठा, भुजिया, सेंडविच
11 बजे राउरकेला में दोपहर का खाना :- 2 मीठा, सादा रोटी, मेथी रोटी, चावल-दाल, पापड़ सलाद, रायता
3 बजे रायगढ स्टेशन में शाम का नास्ता :- पकोड़ी, चाय-बिस्किट, मीठा
रात 6 बजे बिलासपुर में :- काफ़ी बिस्किट
रात 7 बजे यात्रा सम्पन्न।

जय भोले बाबा के भक्तों की। भोलेपन में ही कितना वजन बढा लिया एक हफ़्ते में इस खान-पान यात्रा में भक्तों ने। :)

NH-30 सड़क गंगा की सैर

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

हसदा-2 में शाला प्रवेशोत्सव -- ललित शर्मा

अभनपुर ब्लॉक के ग्राम हसदा-2 में 5 जुलाई को शाला प्रवेशोत्सव मनाया गया। इस अवसर पर छत्तीसगढ राज्य भंडारण निगम के अध्यक्ष अशोक बजाज जी, सरपंच, सरपंच प्रतिनिधि व्यासनारायण साहू, स्कूल के प्राचार्य कार्ले, किसान राईसमील के अध्यक्ष माधो लाल मिरी एवं ग्राम के वरिष्ठ नागरिक एंव शाला परिवार के साथ विद्याथी उपस्थित थे। रंगारंग सांस्कृति कार्यक्रम के साथ विद्यार्थियों को पुस्तकों के साथ गणवेश वितरण किया गया। अशोक बजाज जी ने नव प्रवेशी विद्यार्थियों का मिठाई खिला कर स्वागत किया। वृक्षारोपण के साथ विद्यार्थियों को पर्यावरण के प्रति जागरुक रहने एवं नशा मुक्ति का संदेश इस अवसर पर अशोक बजाज जी ने दिया। कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत हैं:-

सरपंच, अशोक बजाज, ललित शर्मा, माधो  लाल, नोहरु राम
नशा मुक्ति कार्यक्रम
 विद्यार्थी
पुस्तक एवं शालेय गणवेश वितरण
विद्यार्थी
शालेय प्रांगण में बजाज जी के द्वारा
शालेय प्रांगण में मेरे द्वारा

NH-30 सड़क गंगा की सैर

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

असोढिया सांप और बैगा से भेंट -- ललित शर्मा

आलमारी के नीचे
रसात होते ही सांपों की आमदरफ़्त बढ जाती है। इस पर एक पोस्ट मैने लिखी थी। असोढिया सांप की पहचान धामन के रुप में हुई। धामन चूहे खाने वाला बड़ा सांप है, इसके विषधर होने की जानकारी नहीं है। पर कहते हैं असाढ में डसने पर डेढ गांजे की चिलम के बराबर नशा होता है, इसकी लम्बाई अधिक होने के कारण खतरनाक दिखता है, इसलिए ग्रामीणों के भय का शिकार हो जाता है। दो दिन पहले यह बाड़े के घर में फ़िर दिखाई दिया। एक कमरे में यह छत से गिर गया। जिसकी सूचना मुझे मिली और मैं दौड़ कर पहुंचा। यह आलमारी के नीचे घूम रहा था। लम्बाई लगभग 8 फ़िट थी। आलमारी से खिड़की  की उंचाई लगभग साढे तीन फ़िट है। यह पूँछ के बल पर खुली खिड़की से बाहर निकलने के प्रयास में था। पूंछ पर सीधा खड़ा हो रहा था। लेकिन खिड़की इसकी पहुंच के बाहर थी। मैं सांप के दिमाग की थाह ले रहा था कि अब ये क्या करेगा?

आलमारी के उपर
फ़ौजी हर तरह की जगह में वक्त गुजारने के लिए अपना अस्थाई आशियाना (टेंट) हमेशा साथ ही रखते है। जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, बर्फ़ और पानी में भी रहना पड़ता है। जमीन पर अस्थाई निवास (टेंट) बनाते समय सांप बिच्छुओं से बचने का इंतजाम भी करना पड़ता है, जिससे अनजान जगह पर थकान भरी ड्युटी करके चैन से आराम कर सकें। इनसे बचने के लिए ये अपने टेंट के चारों तरफ़ डेढ गुना डेढ फ़ीट की एक ट्रेंच खोदते हैं, जिसकी मिट्टी टेंट की तरफ़ चढाई जाती है। यह नियम अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे हैं, शोध के उपरातं इन्होने पाया कि कोई भी सांप बिना किसी सहारे के डेढ फ़ीट की जगह को नहीं फ़र्लांग सकता। पूंछ के बल पर भले ही 3 फ़िट खड़ा हो जाए पर जमीन पर सरक कर उसे डेढ फ़ीट फ़र्लांगना मुस्किल हो जाता है  और वह खोदी हुई ट्रेंच में गिर जाता है। जिससे टेंट के भीतर तक नहीं पहुंचता। शायद इसी लिए खाट, तखत, कुर्सी इत्यादि के की उंचाई भी डेढ फ़ीट या 21 इंच रखी जाती है।

आलमारी से खिड़की की ओर
उस सांप को देखकर मेरे मन में यही बात आ रही थी और आज परीक्षण का अवसर भी था। दो चार बार उस सांप ने खिड़की से निकलने की कोशिश की, कामयाबी नहीं मिली। फ़िर वह आलमारी पर चढ गया। आलमारी पर पूंछ के बल खड़े होकर खिड़की ढूंढने का प्रयास करने लगा। उसे खिड़की से आ रही रोशनी दिखाई दे रही थी। बार बार खिड़की तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था। अपनी लम्बाई का फ़ायदा उठा कर खिड़की तक पहुंचना चाहता था। लेकिन प्रयास करने पर गिर पड़ता था। शरीर का संतुलन संभल नहीं रहा था जिसके कारण वह खिड़की तक नहीं पहुंच पा रहा था। मैं उसकी हरकतें शांत होकर देख रहा था। कहीं थोड़ी सी भी आवाज आती तो फ़र्श से भाग सकता था। उसने फ़िर खिड़की तक पहुंचने का प्रयास किया, अबकी बार पहुंचने में सफ़ल हो गया।

खिड़की के बाहर दीवार की ओर जाने का प्रयास
श्रीमती जी और बच्चे भी देख रहे थे, 8 फ़ीट लम्बा सांप देखकर तो किसी को भी डर लग सकता है, बार-बार मुझसे मारने का आग्रह कर रहे थे। सांप जहरीला हो या न हो, पर इतने बड़े सांप को मारना अकेले आदमी के बस की बात नहीं है। प्रशिक्षित व्यक्ति तो पकड़ भी सकता है। मेरे भी बस की बात नहीं थी। थोड़ा छोटा होता तो एक दो प्रहार में काम हो जाता। सांप हमेशा कोने पड़े हुए कबाड़ में घुस जाते हैं, उस स्थान पर चोट सही नहीं पड़ती। थोड़ा खुले में आने के बात तो उसका राम नाम सत्य हो सकता है। गांव में लोहार सांप मारने का कांटा वाला भाला बना कर रखते हैं, जिसके एक वार में ही वह फ़ंस जाता है। फ़िर मारा जा सकता है, मेरे पास इस स्थिति में डंडा भी नहीं था मारने के लिए। फ़िर क्यों इनकी बातों में आऊं?मैने समझाया कि यह घूम-घाम कर चला जाएगा अपनी जगह पर।

वापस खिड़की से अंदर की ओर
सांप खिड़की पर चढ चुका था। सरिए लपट कर बाहर की तरफ़ आ गया। बाहर आकर उसने निकलने के लिए तांक-झांक की। खिड़की से बाउंड्रीवाल ओर जाना चाहता था, लेकिन खिड़की और बाउंड्रीवाल के दरमियान 10 फ़ीट से अधिक का फ़ासला है। वह खिड़की से लिपट कर थाह लेता रहा, कभी बरगद के पेड़ की तरफ़ मुंह घुमाता कभी बाउंड्रीवाल की तरफ़। सरियों पर उसने पूंछ की पकड़ मजबूत बना रखी थी। उसने कमरे में वापस जाने का विचार बना लिया। खिड़की से सरकता हुआ, आलमारी से होकर जमीन पर पहुंच गया।  कमरे में ही घूमता रहा। सभी कह रहे थे, इसे बाहर निकालो, बाहर निकालो। कोई गाय, भैस, बकरी तो नहीं, जो हांकने से बाहर निकल जाए। लेकिन यह समझ में आया कि सांप भी दिमाग का प्रयोग करता है, आलमारी से खिड़की तक पहुंचने की प्रक्रिया लाजवाब थी। वह अभी भी यहीं घूम रहा है।

फ़िर पलटी खाया- आलमारी की दिशा में
कुछ साल पहले एक संपेरा आया, जिसके विषय में एक मोहन भैया ने मुझे बताया था। उनके राईसमील में आकर उस संपेरे ने कुछ छोटी-छोटी हड्डियों के साथ धान का भूसा मिला कर राईसमील प्लांट के फ़ड़ में छिड़का और मंत्र पढने से उस जगह पर जितने भी जहरीले सांप थे निकल आए, उसने जहर निकाल कर सबको दिखाया, और उन्हे पकड़ कर ले गया। फ़िर एक अन्य राईसमील एवं रेडियंट स्कूल से भी इसी तरह सांप निकाले थे। वह सांपों के जहर का व्यवसाय करता था। मुझे उसकी याद आई, अगर वह मिल जाए तो मेरे भी इलाके के सांपों से मुक्ति मिल जाए। मोहन भैया से पूछने पर उसका पता नहीं चला। उनका कहना था कि कोई उत्तराखंड का पहाड़ी था और अचानक आया था। मेरी यह योजना भी फ़्लाप हो गयी। अब कहां से पहाड़ी ढूंढा जाए?

ठेलका नहर के किनारे एक दिन असोढिया सांप दिखाई दिया, उसी समय दो मोटरसायकिल सवारों ने उसे तुरंत दौड़कर पकड़ा, तत्काल उसका सिर अलग कर केले के छिलके जैसे उसकी चमड़ी उतार ली। पूंछ को काट कर फ़ेंक दिया। एक थैली में उसकी खाल और मांस को रख लिया। पूछने पर बताया कि वे इस खाल को बेच देंगे और मांस को मछली जैसे तल कर और तरकारी बना कर खाएगें। असोढिया सांप के विषय में जनश्रुतियां बहुत हैं, जितने मुंह उतनी बात। पर मैने जितना देखा है वही लिख रहा हूँ। जहरीले सांपो के दंश का शिकार होने पर ग्रामीण अस्पताल जाने की बजाए बैगा पर ही अधिक विश्वास करते हैं। सबसे पहले बैगा से झाड़ फ़ूंक कराने पहुंचते हैं। ऐसे ही एक बैगा का साक्षात्कार डॉ पंकज अवधिया ने किया। आप यह विडियो अवश्य देंखे, बैगा द्वारा सांपों के विषय में दी गयी जानकारी से ज्ञानरजंन होगा। बैगा ने मेरे द्वारा सांपों की वर्षा देखे जाने की पुष्टि की। उसने कहा कि- गुच्छे में आकाश से पिटपिटी सांप गिरते हैं बारिश में उसने भी देखा है।   

बैगा से बातचीत - डॉ पंकज अवधिया द्वारा




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सर्प नृत्य (नई दुनिया से साभार दिनांक 5/7/2011)
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