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धरती पर यमराज के एजेंट --- ललित शर्मा

सुबह की सैर पर आज हल्की फ़ुल्की चर्चा ने गंभीर मोड़ ले लिया। बंसी काका कहने लगे - "अब बीमार होने से भी डर लगने लगा है, आम आदमी चाहता है कि बीमार ही न हो। सोचने से क्या होता है? पता नहीं कब धरती के यमराजों (डॉक्टर, दवा विक्रेता और दवा निर्माता) के हत्थे चढ जाए, बच गया तो घर द्वार बेच कर सड़क पर आ जाएगा अन्यथा राम नाम सत्य तो मान ही लो।" बंसी काका की बात पर मुझे भी सोचना पड़ा। अगर राम नाम सत्य हो गया तो परिजनों को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी, परिजन की मृत्यू एवं कर्जे के दलदल में फ़ँसने की। धरती के यमराजों का गिरोह उन्हे कहीं का नहीं छोड़ेगा। हर डॉक्टर का अपना बंधा-बंधाया पैथालाजिस्ट है। अगर उसके सजेस्ट किए पैथालाजिस्ट के पास न जा कर किसी दूसरे के पास चले गए तो दोहरा खर्च होगा और डॉक्टर के बताए पैथालाजिस्ट से ही टेस्ट करवाने पड़ेगें । कई डॉक्टरों और पैथालाजिस्टों में इतनी सेटिंग होती है कि डॉक्टर स्वस्थ मरीज को भी बहुत सारी जाँच लिख देता है और पैथालाजिस्ट सैम्पल लेकर बिना जाँच किए ही रिपोर्ट दे देता है कि सारे टेस्ट नार्मल हैं। टेस्ट करने की ज़हमत कौन उठाए, बिना किए ही रिपोर्ट देकर लूट का माल आधा-आधा ईमानदारी से बांट लिया जाता है।

हद तो तब हो गई जब एक नामी गिरामी अस्पताल में मैने 80 साल की महिला रिश्तेदार को भर्ती किया। उम्र का असर उन पर हो रहा था और स्मृति कमजोर होती जा रही थी। उन्हे न्युरोफ़ीजिशियन को दिखाया गया। न्यूरोफ़ीजिशियन ने दूनिया भर के टेस्ट लिख दिए और पर्ची मुझे थमा दी। सभी टेस्ट लगभग 5000 रुपए के थे। मरीज को भर्ती कर लिया गया और मैने एडवांस पेमेंट कर दिया पैथालाजी टेस्ट का भी। दूसरे दिन जब मुझे पैथालाजी टेस्ट का बिल दिया गया तो उसमें 900 रुपए HIV टेस्ट के भी थे। मुझे बड़ी कोफ़्त हुई कि 80 साल की उम्र में भी मरीज का HIV टेस्ट किया जा रहा है। अगर इन्हे HIV होता भी तो इतने साल तक जीना मुश्किल था। इतनी तो कामन सेंस आम आदमी के पास भी है। डॉक्टर को जब इस बारे में पूछा तो उसने कहा कि " बड़ा अस्पताल है, कोई बीमारी छूट न जाए इसलिए सारे टेस्ट कराने पड़ते हैं।" इसे कहते हैं मरीज की जेब पर सरासर डाका, लूट लो इंडिया मिल के। अस्पताल संचालकों से लेकर डॉक्टरों तक की सीधी पहुंच राजनेताओं तक होती है। उनको भी इनसे ईलाज करवाना होता है, इसलिए शिकायत होने पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती। एक नर्सिंग होम संचालक एक फ़ोन पर शिकायत करने से छत्तीसगढ के तत्कालीन डीजी स्वयं पहुच गए थे फ़ोर्स लेकर।

गाहे-बगाहे समाचार मिलते ही रहते हैं इन नर्सिंग होम्स की कारगुजारियों के। डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, उसे प्राण दाता मान लिया गया। मरीज अपने प्राण उसके हाथों में सौप देता है। शल्य चिकित्सा से पश्चात पेट में तौलिया, गाज बैंडेज, कैंची या अन्य औजार छोड़ना तो आम बात हो गयी। कुछ डॉक्टर को इतने एक्सपर्ट हैं कि मरीज की नब्ज के साथ उसकी जेब की नब्ज भी भांप लेते है फ़िर वैसा ही ईलाज करते हैं। व्यवसायिकता का रोग इन्हे भी लग गया और सेवा भाव तिरोहित हो गया। जहाँ धर्मार्थ चिकित्सालय है वहाँ पर भी ये नजर नहीं आते। कम्पाउंडर ही दवा-पानी देकर ईलाज कर देता है। किडनी रैकेट के खुलासे के बात डॉक्टरों की हैवानियत की पराकाष्ठा सामने आई है। महाराष्ट्र के बीड़ जिले की परली तहसील के डॉक्टर दम्पत्ति सुदाम मुंडे एवं सरस्वती मुंडे गर्भपात के पश्चात अपने पालतु कुत्तों को कन्या भ्रुण खिला देते थे। जिससे गर्भपात के सबूत का पता ही न चले। डॉक्टरों की अमानवीयता का एक सबसे बड़ा उदाहरण है। अब इन्हे देवता माने या दानव। रायपुर के अस्पतालों में तो कई वाकये हो चुके है कि मरीज की मृत्यू के पश्चात उसका मृत शरीर परिजनों को तब तक नहीं सौंपा गया जब तक उन्होने उनके बिल की रकम जमा नहीं करवा दी।

बड़ी-बड़ी दवा कम्पनियाँ कभी भी अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन किसी अखबार या टीवी चैनल पर नहीं करती। उनके प्रतिनिधि सीधे डॉक्टर से मिलते है और कम्पनी के प्रोडक्ट की जानकारी देते हैं साथ ही उनकी कम्पनी की दवा लिखने पर गिफ़्ट क्या होगा ये तय हो जाता है। एक वाकया मेरे साथ ही घटा, हिमाचल पहुचने पर ऊंचाई के कारण मुझे कुछ हरारत सी महसूस हुई। डॉक्टर को फ़ोन लगा कर दवाई की सलाह माँगी। उसने सर्दी जुकाम की जो दवाई बताई उसकी 10 टेबलेट की स्ट्रिप लगभग 600 रुपए की आई। बाद में घर आने पर अपने पारिवारिक डॉक्टर से पूछ तो उन्होने बताया कि जो इलाज 10 रुपए की दवाई से हो सकता था उसके लिए 600 रुपए खर्च करने पड़े। आंध्र प्रदेश का ही एक मामला सामने आया है। जिसमें डॉक्टर ने एक गाँव की लगभग 600 महिलाओं की बच्चे दानी निकाल डाली। यह एक लोमहर्षक एवं निंदनीय घटना है। इतना सब होने के बाद भी कभी नहीं सुना गया, किसी डॉक्टर को सजा हुई या उसकी पैक्टिस करने का लायसेंस खारिज किया गया हो। सब कुछ गोल माल है और मैनेज कर लिया जाता है।

सरकारी अस्पतालों में ईलाज के खोखले दावे होते हैं। अधिकतर डॉक्टर सरकारी नौकरी करते है पर अस्पतालों में नहीं जाते, अपनी सेवा निजि चिकित्सालयों एवं नर्सिंग होम्स में देते हैं। वेतन सरकार से लेते है और उपरी कमाई निजि नर्सिंग होम्स से करते हैं। गाँव महिला स्वास्थ्य रक्षण के नाम से नियुक्त मितानिनों का सम्पर्क निजि नर्सिंग होम्स से है। उन्हे मर्ज की गंभीरता एंव ईलाज के हिसाब से कमीशन दिया जाता है। एक मितानिन से चर्चा होने पर उसने बताया कि बच्चा दानी के आपरेशन का मरीज लाने पर 1000 रुपए मिलते हैं। निजि नर्सिंग होम्स की नजर हर जगह बच्चेदानी पर ही टिकी है, इसे निकालना भी आसान है और एक आपरेशन के 20-30 हजार मिल जाते हैं। सारे यमराज मिलकर फ़सल काटने में लगे हुए हैं। एक डॉक्टर मित्र का कहना था कि आप शहर के किसी भी नर्सिंग होम में चले जाईए पेट दर्द की शिकायत लेकर आपका 5-10 हजार तो सिर्फ़ टेस्ट में ही चला जाएगा। भले ही मरीज को कोई गंभीर समस्या न हो, अगर नर्सिंग होम् का बेड खाली है और रुम नहीं लगा है तो मानकर चलिए कि दूसरे मरीज के आते तक आपको ही उसका खर्च और किराया वहन करना है। हाथ आया मुर्गा इतनी आसानी से नहीं छोड़ा जाता। अधिक होगा तो आपरेशन थियेटर में ले जाकर बिना मतलब के ही एक लम्बा चीरा लगा कर सिलाई कर दी जाएगी और मरीज के परिजन समझेगें कि डॉक्टर ने बड़ा आपरेशन किया है, मरीज को बड़ी जद्दोजहद से बचाया है।

एक जमाना था जब डॉक्टर मरीज की नब्ज देख कर ही बीमारी पहचान लेता था और और कड़ुवी पुड़िया और लाल मिक्सचर देकर ईलाज कर दिया करता था। वर्तमान चिकित्सा को व्यावसाय बनाकर मरीजों के साथ खिलवाड़ के सिवा कुछ नहीं हो रहा। मंहगी से मंहगी दवाई लिखना आम बात हो गयी है। बड़ी दवाई कम्पनियों के पैकेज बने हुए हैं और डॉक्टर द्वारा दवाई लिखने एवं बिकने के हिसाब से उसका हिस्सा पहुंचा दिया जाता है। सरकार ने झोला छाप डॉक्टरों के खिलाफ़ अभियान छेड़ रखा है। जबकि गाँव में यही ग्रामीण चिकित्सक ही काम आते हैं। ब्लॉक मुख्यालय के समीप वाले गाँवों के मरीज तो सरकारी अस्पताल एवं निजि चिकित्सालयों तक पहुँच जाते है पर 10-15 किलोमीटर दूर के गाँवों में यही झोला छाप डॉक्टर ईलाज करके मरीजों को राहत दिलाते हैं। अगर झोला छाप डॉक्टर न हों तो ग्रामीण क्षेत्र में मरीजों का ईलाज ही नहीं हो सकता। झोला छाप डॉक्टरों को सरकार द्वारा प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण देकर प्रमाणित करना चाहिए जिससे वे ग्रामीण क्षेत्रों में ईलाज मुहैया करवा सकें। सभी डॉक्टरों को एक ही तुला में नही तोला जा सकता। कुछ डॉक्टर है जो अपना काम ईमानदारी एवं लगन से कर रहे हैं जिनके भरोसे ही डॉक्टरों पर विश्वास कायम है। लेकिन अधिंकाशत: डॉक्टरों ने चिकित्सा को व्यवसाय बना लिया है और धरती पर यमराज के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। बंसी काका का कहना सही है कि अब बीमार होने से भी डर लगने लगा है।

एक युद्ध डायबीटिज से……… ललित शर्मा


डॉ सत्यजीत साहू
जब से लोग सुविधाभोगी हुए हैं, तब से भारत में डायबीटिज रोगियों का तेजी से प्रसार हो रहा है। ऐसा नहीं है कि डायबीटिज कोइ नया रोग है, चरक संहिता में उल्लेखित प्रमेहों में एक प्रमेह मधुमेह का भी उल्लेख हुआ है तथा इसका उपचार बताया गया है। असयंमित, अमर्यादित दिनचर्या के कारण मधुमेह अधिक लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, मैं एक विश्वविद्यालय के कुलपति से मिलने गया था। उनसे चर्चा के दौरान तीन व्यक्ति और उपस्थित थे। जब कुलपति जी ने चाय लाने कहा तो सभी लोगों ने एक स्वर में बिना शक्कर की ही चाय कही। इसका मतलब यह था कि हम पाँच लोगों में सभी मधुमेह का शिकार थे। एक स्थान पर 100% मधुमेह ग्रसित व्यक्तियों का मिलना मुझे आश्चर्य चकित कर गया। खैर अब तो इसे राज रोग कहा जाने लगा है। एक मित्र का कहना था कि- मधुमेह एड्स से भी बुरी बीमारी है। क्योंकि एड्स के फ़र्स्ट स्टेज, सेकंड स्टेज एवं फ़ायनल स्टेज के विषय में व्यक्ति एवं डॉक्टर को पता रहता है परन्तु मधुमेह के मरीज को पता नहीं रहता कि कब उसे अटेक आ जाएगा या अन्य मधुमेह जनित रोग उसे कब अपनी गिरफ़्त में ले लेगें।

ड़ायबीटिज से ग्रसित होने पर ही व्यक्ति को पता चल पाता है कि वह रोग की चपेट में आ गया। डॉक्टर द्वारा शुगर लेबल बढा हुआ बताने पर वह चिंता ग्रस्त हो जाता है तथा मधुमेह को सहज स्वीकार नहीं करता। जैसे उसकी दिनचर्या चलती है उसी पर कायम रहता है। मधुमेह के प्रति जागरुकता की आवश्यकता है, जागरुकता एवं जानकारी के अभाव में अधिक नुकसान होता है और जान से भी हाथ धोना पड़ता है। कुछ दिन पूर्व एक महोदय मिले, उन्हे मधुमेह जनित इतनी अधिक बीमारियाँ थी कि सुबह से लेकर शाम तक 23 टेबलेट खाने के बारे मे बताया। ग्रामीण अंचल में भी मधुमेह पसर गया है। पहले लोग थकते तक मेहनत करते अब मशीनों के आने के कारण शारीरिक श्रम कम हो गया। आवश्यक नहीं है कि मधुमेह सिर्फ़ सुविधाभोगी लोगों को ही अपनी गिरफ़्त में ले रहा है। एक बोरा ढोने वाला पल्लेदार (कुली) भी इसकी गिरफ़्त में है। मधुमेह रोग जाति -पांति, धर्म, वर्ग, आयु, नारी-पुरुष आदि के बंधनों को तोड़ कर बिना किसी भेदभाव के सभी को समान रुप से शुगर से नवाज रहा है और मधुमेह से लोग जूझ रहे हैं।


ग्रामीण अंचल में मधुमेह का हमला सबसे पहले पैरों पर ही होता है। क्योंकि यहाँ खेतों में काम करने के लिए नंगे पैर जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में ही खेती होती है, खेत को जोतने, बीज छिड़कने, निंदाई करने, रोपा लगाने, मेड़ मुंही पार बांधने के लिए पानी में ही काम करना पड़ता है। कांच से कटने एवं कांटे गड़ने का भय हमेशा बना रहता है। छोटी-मोटी फ़ुंसी होने, या कांटा, कांच गड़ने पर तुरंत ही गैंगरीन हो जाता है और पैर काटना पड़ता है। अच्छा भला व्यक्ति जागरुकता के अभाव में विकलांग हो जाता है। मैने होम्योपैथी के एक डॉक्टर के पास आया हुआ गातापार गाँव का एक ऐसा मरीज देखा कि जिसके दोनो हाथ कोहनियों एवं दोनो पैर घुटने के उपर से कटे थे तथा सारा शरीर सड़ रहा था, बदबू के मारे घिन आ रही थी। वह साक्षात नरक भोग रहा था। उस मरीज को देख कर डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए क्योंकि वह सभी चिकित्सा पद्धतियों से गुजर चुका था। अब अंतिम इलाज मौत ही थी। ऐसे मरीज देखकर कोई भी मधुमेह का मरीज दहल जाए। ऐसी अवस्था में मधुमेह के प्रति लोगों को जागरुक करना सामाजिक संस्थाओं एवं सरकार का कर्तव्य हो जाता है।


सरकार, मलेरिया, एडस, कैंसर एवं अन्य बीमारियों के विषय में जागरुकता फ़ैला रही है। लेकिन डायबीटिज जैसे भयानक रोग के विषय में कोई कार्यक्रम नहीं है। सारा बजट इन्ही बीमारियों के प्रचार-प्रसार में लग रहा है। डायबीटिज के विषय में ग्रामीण अंचल में जागरुकता फ़ैलाने का काम डॉ सत्यजीत साहू ने प्रारंभ किया है। रायपुर के इस युवा डॉक्टर ने कालीबाड़ी रायपुर में डायबीटिक रिसर्च सेंटर एवं चिकित्सालय प्रारंभ किया। जहाँ मधुमेह के मरीजों के ओपीडी इलाज के साथ उसके साथ जीने का तौर तरीका सिखाया जा रहा है। प्रतिमाह की पहली तारीख को नि:शुल्क शुगर परीक्षण के साथ इलाज भी किया जाता है। साथ ही साथ ग्रामीण अंचल में डायबीटिज के प्रति जागरुकता के लिए "डायबीटिक मित्र" भी नियुक्त किए जा रहे हैं। जो ग्रामीणों को डायबीटिज के प्रति जागरुक करने का महती कार्य करेगें। प्रति रविवार को ग्रामीण अंचल का दौरा करके पोस्टर-पाम्पलेट एवं व्यक्तिगत सम्पर्कों से डायबीटिज के विरुद्ध युद्ध का शंखनाद किया जा चुका है। डॉ सत्यजीत साहू का कहना है कि अब यह युद्ध लगातार लड़ा जाएगा। प्रत्येक गाँव में मधुमेह से ग्रसित लोग मिल रहे हैं। उनको स्वस्थ्य रहने की उपयुक्त सलाह के साथ चिकित्सा भी दी जा रही है। डायबीटिज जैसे महामारी के विरुद्ध लड़ाई में हम भी डॉ सत्यजीत साहू के साथ हैं।

दो ब्लॉगर- डॉ सत्यजीत साहू और ललित शर्मा
ड़ायबीटिज से बचने के लिए सिर्फ़ खानपान एवं जीवन शैली बदलने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। ड़ायबीटिज एक बहुत हीं खतरनाक बीमारी है लेकिन अगर आप प्राकृतिक उपायों से इस पर नियंत्रण कर सके तो मधुमेह से आपको घबराने की जरुरत नहीं है। डायबीटिज को समझें और उसका उपचार करें। अगर शुगर अत्यधिक बढ गयी हो तो पहले ऐलोपैथी से नियंत्रित करके प्राकृतिक उपचार से भी नियंत्रित की जा सकती है। जिसमें हल्के व्यायाम के साथ सुबह की सैर और फ़ायबर युक्त कम कैलोरी का भोजन प्रमुख हैं। मीठा, चावल, फ़लों का रस, कोल्डड्रिंक, शराब को त्याग ही देना बेहतर होगा। घरेलु तौर पर शाक सब्जियाँ शुगर नियंत्रित करने मे मुख्य भूमिका निभाती हैं। कहते हैं कि डायबीटिज और हाईब्लड्प्रेशर दोनो बहन-भाई जैसे ही हैं। एक के आगमन पर दूसरा बिना बुलाए ही साथ चला आता है। मैने अधिकतर डायबीटिज रोगियों को हाईब्लड्प्रेशर का शिकार देखा है। दोनो बहन-भाई मिल कर मनुष्य के शरीर को घुन या दीमक जैसे चट कर जाते हैं। अंत मे कुछ नहीं बचता राम नाम सत्य के सिवा। इसलिए जिन्हे भी डायबीटिज का राजरोग हो गया है वे स्वास्थ्य के प्रति जागरुक रहें और मित्रों के निवेदन है डायबीटिज के विरुद्ध इस मुहिम में अपना हाथ बटाएं। फ़ेसबुक पर डायबीटिक ग्रुप ज्वाईन करें, जहाँ नित नई जानकारियाँ प्राप्त होते रहेगी।

हसदपुर ---- ललित शर्मा

स्वामी विकासानंद जी का कमरा
सुबह के 9 बजे हैं, हमारी कार गाँव की सड़क पर चल रही है। थोड़ी देर में तालाब के सामने एक बड़ा सा कम्पाऊंड दिखाई देता है, जहाँ कुछ निर्माण हो रहा है। एक लम्बा सा चूने से पुता परसार है जिसमें नीले रंग का दरवाजा लगा है। रोको-रोको, मुझे यहीं  जाना है।- ड्रायवर से कहता हूँ। कार से उतर कर दरवाजे से भीतर पहुंचा तो एक नौकर दिखाई दिया। फ़ड़नवीस सर हैं क्या? मै उससे पूछता हूँ। मंदिर गए हैं - वह कहता है। सामने परछी में एक आराम कुर्सी रखी है अंग्रेजों के जमाने की। जिस पर कांच के फ़ेम में जड़ी एक तश्वीर रखी है। साथ ही कुछ फ़ूल भी चढे हुए हैं। कुर्सी के बाजु से एक तखत रखा है और दोनो के बीच एक दरवाजा है, जो अभी बंद है। सामने तख्ती पर लिखा है "जूते उतार कर प्रवेश करें।" मै और डॉ सत्यजीत साहू जूते उतारते हैं और पिछवाड़े जाने वाले दरवाजे से मंदिर की ओर जाते हैं। सामने गोबर गैस का टैंक बना है, यह लगभग 4 एकड़ की बखरी (बाड़ी)  है। जिसमें तरह-तरह के फ़ूल खिले हैं। आम, जाम, जामुन, नीम, पीपल और भी तरह तरह के वृक्ष लगे हैं। वातावरण काफ़ी शांत और सुकून भरा है।

नाना से प्राप्त शिवाजी का आगरा-पूणे मार्ग
हम मंदिर के दरवाजे पर पहुंचते हैं तो भीतर से आवाज आती है - मोजे उतार कर भीतर आ जाओ। हम मोजे उतारकर भीतर प्रवेश करते है तो राम के विग्रह के समक्ष फ़ड़नवीस सर विनीत मुद्रा में खड़े होकर प्रार्थना कर रहे है। उसके बाद वह मुड़ कर हमारा परिचय पूछते है और आने का सबब। मै उन्हे डॉ सत्यजीत के साथ अपना परिचय देता हूँ और आने का कारण बताता हूँ। वे मुझे पहचान जाते हैं। फ़ड़नवीस सर का पूरा नाम गणपत शंकर राव फ़ड़नवीस है। ये अभनपुर तहसील रायपुर जिला के हसदा गाँव के निवासी हैं। हसदा गाँव अभनपुर से लगभग 8 किलो मीटर दूर राजिम मार्ग पर है। मुख्य मार्ग से 2 किलोमीटर भीतर और जाना पड़ता है। यहाँ इनकी पुरखौती जमीन जायदाद है। 80 वर्षीय फ़ड़नवीस सर हसदा के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत है। बेटे बाहर नौकरी करते है और ये गांव में रहकर खेती बाड़ी देखते है। वे बताते हैं कि - हसदा गांव का नाम प्राचीन नाम हसदपुर है। यहां उनके पुरखे आए थे। बाजी राव पेशवा के भाई चीमा जी अप्पा ने जब बंगाल पर आक्रमण किया तो उनके पूर्वज सेना के साथ आए थे। सेना के कूच के दौरान चीमा जी अप्पा को खबर मिली कि उनके भाई बाजी राव पेशवा बीमार हैं तो वे अपनी सेना लेकर लौट गए और उनके पूर्वज यहीं रह गए।

राजा गोपीचंद की तप स्थली 800-1000 वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष, 
हसदपुर गाँव की मालगुजारी उनके पिता शंकर राव फ़ड़नवीस की मौसी जानकी बाई की थी। शंकरराव धमतरी से उनकी मालगुजारी की देख रेख करने बुलाए गए थे। मालगुजारी में इनका एक आने का हिस्सा था। तब से हसदा गांव में ही निवासरत है। मेरा प्रथम बार हसदा आना सन 1978 में हुआ था। अभनपुर से नैरो गेज की राजिम जाने वाली ट्रेन में बैठ कर हम सब दोस्त मानिकचौरी पहुंचे थे और वहां से खेतों की मेड़ पर पैदल चलते हुए हसदा पहुंचे। फ़ड़नवीस सर की बखरी में हमने दिन भर पिकनिक मनाई और शाम की गाड़ी से वापस अभनपुर आए। उस समय की कुछ धुंधली सी यादें चेतना में हैं। तब फ़ड़नवीस सर ने बताया था कि इस स्थान पर बंगाल के राजा गोपीचंद ने तपस्या की थी। आज पुन: यादें ताजा करने के लिए हसदा पहुंच गया। राम मंदिर के पीछे पीपल का एक बड़ा पेड़ है। इसके नीचे सांप की बांबी बनी हुई है। साथ ही इनके कुल देवता हनुमान जी भी विराजमान है। फ़ड़नवीस सर अपने साथ टोकरी  में लिए फ़ूल चढाते हैं और बताते हैं कि उनके कुल गुरु स्वामी विकासानंद महाराज ने बताया था कि इस पीपल के नीचे नौ नाथों में जालंधरनाथ के शिष्य बंगाल के राजा गोपीचंद ने संन्यास ग्रहण करने के बाद तपस्या की थी। (एक कथा के अनुसार गोपीचंद बंग देश के राजा थे। उनकी माता का नाम मुक्ता था। रानी मुक्ता को पता चलता है कि अट्ठारहवे वर्ष में गोपीचंद की मृत्यु हो जायेगी। इसलिए वह गोपीचन्द को सन्यास के लिए प्रेरित करती हैं। कहते हैं कि रानी मुक्तावती राजा भृतहरि की बहन थी जिसे मैनावती भी कहा जाता है ) यह पीपल का पेड़ लगभग 800-1000 वर्ष पुराना है। इसकी बांबी में बड़े-बड़े नाग सर्प हैं जो अक्सर दिखाई देते हैं।

हसदपुर की महामाया देवी
हसदपुर गांव के चारों तरफ़ खाई बनी हुई थी। संभवत: यहाँ कोई किले जैसी संरचना थी और किसी राजा का निवास स्थान भी था। लेकिन किसका था यह पता नहीं है। इनकी बखरी के बगल की जमीन में कुछ ढाल दिखाई दे रही है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कभी यहाँ खाई रही होगी। गाँव के इर्द गिर्द सात तालाब बने हुए हैं। इतने तालाब एक ही स्थान पर तभी मिल सकते हैं जब कोई बड़ी आबादी यहाँ रहती होगी। यह पुरातात्विक शोध का विषय है। गाँव के लोग खाई के आस-पास के खेतों को अभी भी "खईया" कहते हैं। इस गाँव में हमेशा आते रहा हूँ पर कुछ खोजने की दृष्टि से कभी नहीं देखा। लगता है इस गाँव का संबंध अवश्य इतिहास से रहा है। इस पर शोध किया जाना चाहिए और पुरातत्व विभाग द्वारा सर्वे भी किया जाना चाहिए। पहले जब इस गाँव में आया था तो यहाँ के तालाबों का पानी साफ़ था और उसमें कमल-कुमुदिनी खिले हुए थे। मैं यहीं पहली बार कुमुदनी से परिचित हुआ था। राम मंदिर के दक्षिण दिशा में एक टीले पर महामाया का मंदिर है। बताते हैं कि यह मंदिर प्राचीन है। मंदिर में एक तरफ़ महामाया और दूसरी तरफ़ भैंरव विराजमान हैं। हम एक नौकर के साथ महामाया मंदिर के दर्शन करने जाते हैं। मंदिर में ताला बंद था, इसलिए नौकर चाबी साथ लेकर आया था।


स्वामी विकासानंद जी
 दर्शन करने के बाद डॉ सत्यजित ग्राम भ्रमण पर चले जाते है और मै नाना फ़ड़नवीस से चर्चा करता हूँ। वे स्वामी विकासानंद जी (लाम्बे महाराज) विषय में बताते हैं। उनका मुख्याश्रम नागपुर में स्थित है। गुरुजी अब तो शांत हो गए हैं, जब कभी वे राजनांदगांव तक आते थे तो हसदा जरुर आते थे। उनका ध्यान और पूजा करने का कमरा आज भी यथावत है। उनका सारा सामान करीने से सजा हुआ है। वहाँ कोई  नहीं जाता सिर्फ़ नाना फ़ड़नवीस सुबह शाम पूजा करने जाते हैं। हमे गुरुजी का वो कमरा दिखाया जाता है जहां पलंग पर गद्दा और चादर बिछी हुई  है और उस पर गुरुजी की एक फ़ोटो रखी हुई है। गुरुजी यहीं साधना करते थे तथा कभी-कभी सु्क्ष्म रुप में कमरे से आते-जाते दिखाई देते हैं। उनकी आत्मा यहीं लगी रहती है और किसी को कोई नुकसान नहीं करती। स्वामी विकासानंद के लगभग 20-22 आश्रम बताए जाते हैं। जबलपुर में ग्रुरु पूर्णिमा के आयोजन के लिए यहां से चावल भेजे जा रहे हैं। नाना फ़ड़नवीस एच एम टी चावल भरी बोरियाँ दिखाते हैं और कहते हैं कि- इसे ट्रांसपोर्ट से भेजा जाएगा।


नाना फ़ड़नवीस ( गणपत शंकर राव फ़ड़नवीस)
परछी के म्यार में एक लकडी का झूला लटका है। नाना उस पर आकर बैठ जाते हैं, कहते हैं कि उन्हे एक बार अटैक आ गया है और ओपन हार्ट सर्जरी भी हो चुकी है। वैसे 80 वर्ष की अवस्था में वे स्वस्थ हैं। नौकर से चाय बनाने के लिए कहते हैं तो मै मना कर देता हूँ। नाना बालक भगवान (पुरन सोनी) के विषय में बताते हुए कहते हैं कि एक बार उन्होने गुरुजी से कहा कि नौरात्रि में हसदा में पीपल के नीचे बैठ कर नौ दिन का उपवास करना चाहते हैं। गुरुजी ने हसदा खबर भेज कर उनकी व्यवस्था करने कहा। हमने व्यवस्था कर दी, बालक भगवान नौदिन का संकल्प करके दो दिन वहाँ बैठे और तीसरे दिन कहने लगे कि मैं यहाँ नहीं बैठ सकता। मुझे राजिम में माता जी बुला रही हैं। लाख मना करने पर भी नही माने और चले गए। मैने गुरुजी को नागपुर खबर भेज दी कि बालक भगवान चले गए हैं। मुझे लगा कि कुछ तो घटित हुआ है जिसके कारण बालक भगवान को जाना पड़ा। कुछ दिनों के बाद वे फ़िर आए तो पूछने पर उन्होने बताया कि जब वे पीपल के नीचे ध्यान मग्न थे तो एक बहुत बड़ा नाग सांप वहाँ आकर कुंडली मार कर बैठ गया। जब मेरी आँख खुली तो वह मेरी आँखों में झांक रहा था। न खुद हिल रहा था न मुझे हिलने दे रहा था। ऐसी अवस्था में दोनो को बैठे तीन घंटे हो गए थे। इसलिए मैं डर के मारे भाग गया था।

नाना फ़ड़नवीस से प्राप्त दस्तावेज की प्रति
नाना एक रहस्योद्घाटन भी करते हैं। वे कहते हैं कि जब शिवाजी महाराज औरंगजेब की कैद से आगरा से भागे तो रायपुर होते हुए हसदपुर भी आए थे। मैने इसका प्रमाण मांगा तो उन्होने किसी के शोध की कुछ प्रतियाँ नक्शे सहित उपलब्ध कराई। गांव में फ़ोटो स्टेट मशीन नही थी इसलिए डॉ सत्यजीत ने उन दस्तावेजों के चित्र लिए। वे कहते हैं कि शिवाजी महाराज महामाया देवी के भक्त थे। जब वे आगरा से चले तो महामाया माता के मंदिरों के दर्शन करते हुए चले। जहाँ भी रास्ते में महामाया मंदिर मिला वहीं रुके। वे रतनपुर महामाया के दर्शन करके रायपुर होते हुए हसदा पहुंचे और यहीं से चंद्रपुर में महामाया दर्शन करके पूना की ओर गए। संभवत: 1666 के सितम्बर माह में वे हसदा आए थे। चंद्रपुर के इतिहासकार दत्तात्रेय नानरकर और अशोक ठाकुर के अनुसार आगरा से छूटने के पश्चात शिवाजी महाराज गुप्त रुप से नागपुर इसी रास्ते से आए होगें। उनका ऐसा अनुमान है।मेरा यही मानना है कि हसदा के इतिहास के विषय में खोज होनी चाहिए जिससे किंवदंतियों एवं दंतकथाओं की पु्ष्टि हो सके। नाना फ़ड़नवीस विस्तृत चर्चा के उपरांत हमने उनसे विदा ली और उन्होने पुन: आने का निमंत्रण दिया और हम आगे की यात्रा पूरी करने के लिए चल पड़े।

46 वर्षों से बाट जोह रहे उपन्यास "धान के देश में" का प्रकाशन ---- ललित शर्मा

कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाए तरुवर फ़ले, केतक सींचो नीर। इस कथन से लगता है कि किसी भी कार्य को भाग्य एवं ईश्वर के भरोसे छोड़ देना चाहिए। समय आने पर कार्य होगा ही। लेकिन अधिरता भी रखना जरुरी है। यदि कार्य के प्रति लगन लगी रहेगी तो एक दिन अवश्य सम्पन्न भी होगा और सिरे भी चढेगा। अकर्मण्यता से सिर्फ़ ईश्वर के भरोसे छोड़ने से कार्य सिद्ध नही होता, इसके लिए सतत प्रयास भी करना चाहिए और सतत प्रयास ही रंग लाता है। ऐसी ही कुछ कहानी स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास "धान के देश में" की है। यह उपन्यास सन् 1965 में लिखा गया था। इसका प्रकाशन लेखन के 47 वें वर्ष में हो रहा है। प्रख्यात साहित्यकार और पत्रकार पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी जी ने इस उपन्यास की भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को  लिखी थी। छत्तीसगढ शासन के संस्कृति विभाग एवं हरिप्रसाद अवधिया जी के पुत्र जी.के. अवधिया के वित्तिय सहयोग से वैभव प्रकाशन रायपुर से "धान के देश में उपन्यास" का प्रकाशन होना सुखद है।


उपन्यास के प्रकाशन को लेकर मैने गत वर्ष एक पोस्ट ललित डॉट कॉम पर लिखी थी। जिसके फ़लस्वरुप यह उपन्यास चर्चा में आया। संस्कृति विभाग के उच्चाधिकारियों की दृष्टि इस पर पड़ी और वे उपन्यास के प्रकाशन के लिए सहयोग करने को तैयार हो गए। छत्तीसगढ की पृष्ठ भूमि को लेकर रचित यह उपन्यास सांस्कृतिक विरासत से कम नहीं है। उपन्यास को लिखे हुए अर्ध शताब्दी बीत रही है। इन वर्षों में समाज में बदलाव आया है। लोगों के रहन सहन का अंदाज बदला है तो साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन हुआ है। गांव में त्यौहारों एवं शादियो के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत गायब हो रहे हैं तो लोकाचार में भी परिवर्तन आया है। साहित्य भी सांस्कृतिक प्रदूषण की मार झेल रहा है ऐसे समय में स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास का प्रकाशन होना छत्तीसगढ की संस्कृति के प्रचार प्रसार एवं उसे संवर्धन में महती भूमिका निभाएगा। ग्रामीण परिवेश पर आधारित उपन्यास में छत्तीसगढ के रीति रिवाजों, परम्पराओं का विशेष रुप से सम्मिलित होना इसे विशेषता प्रदान करता है, उपन्यास के कुछ अंश यहाँ पर उदधृत करना प्रासंगिक समझता हूँ।



दूर्गाप्रसाद द्वारा विधवा राजवती का हाथ मांगने से उपन्यास का कथानक प्रारंभ होता है। इसके साथ कहानी फ़्लेश बैक में चलती है। साथ ही ग्रामीण अंचल का सुंदर चित्रण भी - संध्या की सुनहरी किरणे अभी पेड़ों के पत्तों पर बिछल रही थीं। खेतों से झुण्ड के झुण्ड गायों को घेर कर लाते हुये ग्वाले अपनी बाँस की बाँसुरी पर सुरीली तान छेड़ रहे थे। पश्चिमी क्षितिज में डूबते हुये सूर्य की लालिमा को उड़ती हुई धूल ने ऐसा ढँक दिया था कि मानो लाल रंग के परदर्शी मलमल से परदा कर दिया गया हो। गाँव के अंतिम छोर पर मिट्टी का छोटा सा घर था। लाल खपरैल की जगह घास की छत थी। दीवालें नीचे से आधी दूर तक गोबर से लिपी हुई थीं। शेष आधा भाग गेरू से पुता था। घर में एक ही दरवाजा था और एक ही खिड़की। घर तथा दरवाजे के मध्य छोटा सा साफ-सुथरा लिपा-पुता आँगन था जिसके बीचोबीच तुलसी चौरा (एक छोटे से चबूतरे पर बोया गया तुलसी का पौधा) था। आँगन के एक कोने में धनिया और मिर्च के पौधे संध्या की बिखरती हुई कालिमा में उनींदे हो रहे थे। दूसरे कोने में एक गैया कोठा था जिसमें एक देसी गाय बँधी थी जिसके पास ही बँधा बछड़ा रह-रह कर रँभा उठता था - शायद दिन भर के बाद इस समय तक उसे जोरों से भूख लग आई थी।


ग्रामीण अंचल में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले गहनों का जिक्र भी उपन्यास में है -रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने सुहागिनों के मांग में सिंदूर की मोटी नारंगी रंग की रेखायें थीं और हाथों में चूड़ियाँ। विभिन्न गहनों से उन्होंने अपना श्रृंगार कर रखा था - कानों में 'खिनवा', बाहों में 'बँहुटे' या 'नागमोरी', कमर में चांदी के 'करधन' और पावों में काँसे या चांदी की 'पैरियाँ'। विधवायें सफेद रंग की साड़ियाँ पहने थीं और किसी-किसी के हाथ में चांदी का 'चुरुवा' था क्योंकि इस क्षेत्र के रिवाज के अनुसार वे चुरुवा के सिवा अन्य कोई गहना नहीं पहनतीं। साथ ही त्यौहारों एवं उत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों का विशेष उल्लेख है।

सोहर गीत हैं -
सतहे मास जब लागै तौ अठहे जनाय हो ललना।
अठहे मास जब लागै तौ सधौरी खवाय हो ललना।
नवे मासे जब लागै तो कंसासुर जानय हो ललना।
जड़ि दिहिन हाथे हथकड़ियाँ पावें बेलिया तो ललना।

इस प्रकार सोहर के पदों में ललनाओं ने बालक की श्री कृष्ण से तुलना कर उसके यश की कामना प्रकट करती हैं।

विवाह के अवसर पर औरतें गाती हैं

घेरी बेरी बरजेंवँ दुलरू दमाद राय,
दूर खेलन मत जाव हो।
दूर खेलत सुवना एक पायेव,
लइ लानेव बहियाँ चढ़ाय हो।
बारे दुलरुवा के हरदी चढ़त हय,
सुवना करत किलकोर हो।
तुम तो जाथव बाबा गौरी बिहाये,
हमहु क ले लौ बरात हो।
अइसन दुलरू मैं कबहुँ नहिं देखेंव,
सुवना ला लाये बरात हो।

दीवाली के अवसर पर गाँव में जुआ खेलने की परम्परा है और थाने में सरगर्मी बढ़ गई थी। पुलिस वाले जुये की टोह में गाँव-गाँव का दौरा कर रहे थे। स्वयं सब इस्पेक्टर खुड़मुड़ी आये। गाँव के कोटवार भुलउ ने उनकी बड़ी आवभगत की। चौपाल पर खाट बिछा दी गई। उस पर सब इंसपेक्टर बैठ गये। दारोगा का आगमन सुन कर महेन्द्र और सदाराम भी आ गये। तीनों में बातें होती रहीं। भुलउ चुपचाप बैठा था। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गये थे। दारोगा ने भुलउ को बताया कि वह रात गाँव में ही रहेगा। सुनकर भुलउ दौड़ता हुआ गया और उसके लिये खाट तथा रसद का प्रबंध कर आया। बेगार और रसद अंग्रेजी शासन के युग में साधारण बात थी।

उपन्यास में दीवाली का जिक्र - लक्ष्मी पूजा की रात गाँव में प्रायः कोई नहीं सोया। औरतें 'गोड़िन गौरा' की पूजा और उत्सव में व्यस्त हो गईं। इसके पहले दिन वे औरतें मालगुजार और बड़े किसानों के घर जाकर 'सुआ नाच' नाचती रहीं थीं। बाँस से बने एक टोकनी में चाँवल भर कर उसमें चार-पाँच पतली लकड़ियाँ खड़ी की गई थीं। उन लकड़ियों के ऊपरी भाग में मिट्टी के छोटे-छोटे तोते बनाये गये थे। उस टोकनी को बीच में रख कर स्त्रियाँ गोल घेरे में आधी झुकी हुईं गोल घूम घूम कर, झूम झूम कर नाचती रहीं थीं। उनके मुँह से एक स्वर होकर सहगान के रूप में छत्तीसगढ़ का 'सुआ गीत' गूँज रहा था -

जावहु सुवना नन्दन वन
नन्दन वन आमा गउद लेइ आव,
ना रे सुआ हो, आमा गउद लेइ आव।
जाये बर जाहव आमा गउद बर, कइसे के लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, कइसे के लाहव टोर।
गोड़न रेंगिहव, पंखन उड़िहव, मुँहे में लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, मुँहे में लइहव टोर।
लाये बर लाहव आमा गउदला, काला मैं देहँव धराय,
ना रे सुआ हो, काला मैं देहँव धराय।
गुड़ी में बइठे मोर बंधवइया, पगड़िन देहव अरझाय।
रे सुआ हो, पगड़िन देहव अरझाय।

आगे चलकर उपन्यास में प्रेम कहानी जन्म लेती है और विभिन्न घटनाक्रमों को लेकर उत्सुकता एवं रोचकता को बनी रहती है। मेरा प्रयास उपन्यास की एक झलक प्रस्तुत करना है। "धान के देश में" उपन्यास शोधार्थियों के लिए भी मददगार साबित होगा। उपन्यास प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में इनकी महती भूमिका है। "धान के देश में" के विमोचन की सूचना सभी मित्रों तक पहुंचाई जाएगी। जिन्होने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रकाशन हेतू सहयोग प्रदान किया उन्हे साधुवाद।

पटियापाली का स्कूल और हाईब्रीड धनिया ---------- ललित शर्मा

हम यादव के साथ मड़वारानी पहुंचे,  यह रेल्वे का पैसेजंर हाल्ट भी है। यहाँ मड़वारानी माता का मंदिर है। दर्शनार्थियों की कतार लगी रहती है। यहाँ से छ: किलोमीटर पूर्व में पटियापाली गाँव हैं, जहाँ के आदिमजाति कल्याण विभाग के माध्यमिक स्कूल में बाबु साहब मुख्याध्यापक हैं। हम स्कूल पहुंचते है, विद्यार्थियों की वार्षिक परिक्षाएं चल रही हैं। सुबह 8 बजे से पेपर शुरु होने हैं और हम समय पर स्कूल पहुंच जाते है। स्कूल के सामने नल है, जहां कुछ स्त्रियां पानी भर रही हैं। स्कूल का स्टाफ़ चहल कदमी कर रहा है। मुझे अपरिचित निगाहों से देखते हैं कि कौन आ गया निरीक्षण परीक्षण करने। बच्चे भी कौतुक भरी निगाहों से देखते हैं कि ये कौन मुंछ वाला नया गुरुजी आ गया पढाने के लिए।  तभी एक टीचर का मोबाईल बजता है और वह हाँ और हाँ के अलावा कुछ नहीं कहता। शायद उनके लिए उपर से कोई निर्देश आया  है। 

फ़िर वह मेरी ओर मुखातिब होकर कहते है - सर आप आफ़िस में बैठिए यहाँ क्यों खड़े हैं? मुझे एक कुर्सी यहीं मंगवा दीजिए… मैं आम की छाया में बैठना चाहता हूँ। कुर्सी आ जाती है और मैं आम की छाया में अपना डेरा लगा लेता हूँ। स्कूल का स्टाफ़ और विद्यार्थी अपने काम में लग जाते हैं। मै भी बैग से प्यारेलाल गुप्त जी का कविता संग्रह निकाल कर पढने लगता हूँ। आम के पेड़ से लाल मकोड़े मेरे उपर टपकने लगते हैं। लेकिन मेहमान समझ कर काटते नहीं। अगर कोई काट लेता तो ता ता थैइया के अलावा कुछ नहीं था करने को। स्कूल के कैम्पस में कुछ निर्माण हो रहा है। एक खाया-पीया इंजीनियर पहुंचता है निरीक्षण करने के लिए। आते ही बाबू साहब का पता लेता है। उसे कुछ जानकारी चाहिए, स्कूल फ़ंड से संबंधित। तो उसे बाबू साहब का इंतजार करना पड़ता है। 

यादव एक कप चाय बनाकर ले आता है कम शक्कर की। मुझे देकर चला जाता है तो इंजीनियर आवाज लगाकर कहता है - क्या मुझे चाय नहीं पिलाओगे? वह सुनता नहीं है। तब तक बाबू साहब पहुंच जाते हैं हीरो होण्डा पर सवार होकर। उनकी इंजीनियर से गुफ़्तगुं होती है और मै कविताओं के साथ चाय का आनंद लेता हूँ। बाबू साहब ऑफ़िस में चलकर बैठने का आग्रह करते हैं। अब जाना ही पड़ेगा उनके साथ, क्योंकि धूप थोड़ी बढने लगी  है। पटियापाली आदिवासी बाहुल्य गाँव है। तभी बाबू साहब अपनी शिष्याओं को बुलाकर मेरा परिचय करवाते हैं और मेरा उनसे। विद्यार्थी बाबू साहेब से बहुत स्नेह करते हैं और आदर भी। विद्यार्थी उनसे बहुत हिले-मिले हैं। समय-समय पर बाबू साहब अपनी वेतन से भी इनकी सहायता करते हैं, लेकिन विद्यार्थियों की शिक्षा में कोई बाधा नहीं आने देते। इनके भीतर एक जज्बा है जो इन्हे हमेशा सक्रीय रखता है।

बाबू साहब कहते हैं कि - प्रधानाध्यापक का पद ग्रहण करने के बाद कई समस्याएं थी, लेकिन उन्होने सबको सीधे समझा दिया कि - सब बने-बने रहव,  नहीं त बिहिनिया धनिया बोहूँ त संझा तक ले फ़र घलो जाही।:) ( सब ठीक से रहों नहीं तो सुबह धनिया बोऊंगा तो शाम तक फ़ल भी लग जाएगा।) कहने का तात्पर्य है कि किसी भी कार्य का परिणाम तुरंत मिलेगा, देर नहीं होगी। बाबू साहब ने स्कूल में वृक्ष एवं फ़ूलों  के पौधे लगाए हैं जिससे स्कूल प्रांगण की सुंदरता बढ गयी है। पढाई अच्छी होने के कारण विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम भी उल्लेखनीय हैं। बाबू साहब बताते हैं कि उन्होने स्कूल में 70 वृक्ष लगाए थे। एक छात्र उनसे बार-बार उत्तीर्ण करने को कहता था। उन्होने उसके कहने पर नहीं किया तो उस छात्र ने गुस्से में आकर कुछ पेड़ काट डाले। इसलिए पेड़ कम हो गए। 

स्कूल में नेट कनेक्ट करने की कोशिश करते हैं पर सफ़लता आंशिक ही मिलती है। फ़ोटो अपलोड नहीं होते, थक हार कर उसे छोड़ देता हूँ। तब तक परीक्षा समाप्त हो जाती है और इधर दोपहर का खाना भी बन जाता है। थम्सअप के साथ खाने का आनंद आ जाता है जब यह जंगल में उपलब्ध हो जाए। भोजन करने के बाद स्कूल के स्टाफ़ का एक चित्र लेकर विदा होते हैं और चल पड़ते हैं पुन: अपने रास्ते पर। बाबू साहब को चांपा में आभा सिंह को ट्रेन में बैठाना है। मै उनसे वहीं मिलता हूँ। वे मुझे कहते हैं कि जांजगीर से उनका सीपीयू भी लेकर चलना है। हम जांजगीर की कम्पयूटर दुकान से सीपीयू लेते हैं और दो-दो बर्फ़ की चुस्की लेकर अकलतरा की ओर बढ जाते हैं। धूप बहुत बढ गयी है। बाबू साहब अंगोछा बांध लेते हैं पर मुझे आदत नही है, टोपी या अंगोछा बांध कर चलने की। अपन ऐसे ही ठीक हैं। रास्ते में गर्मी का प्रताप इतना बढता है कि बहुत जोर से प्यास लगती है और एक बार में एक लीटर पानी पीया जाता है। राम राम करते हुए घर पहुंचते हैं।

अकलतरा घर पहुंचते हैं तो उनके बड़े भैया शशांक सिंह जी से मुलाकात होती है। भोजन करने बाद मुझे नींद आ जाती है। कूलर की ठंडी हवा में एक नींद लेता हूँ क्योंकि मेरी रायपुर वापसी के लिए गाड़ी शाम 4 बजे हैं। बाबू साहब का नाती (युवराज सिंह) अच्छे चित्र बनाता है। मुझे रात को उसने अपने बनाए हुए चित्र दिखाए थे। उनकी तश्वीर भी ली थी मैने। गाड़ी के समय पर नींद खुलती है और मैं माता जी, बहनों से विदा लेता हूँ। वे फ़िर आने के लिए कहते हैं स्नेह से। साथ में ठेठरी-खुरमी और बड़ी का छत्तीसगढी व्यंजन बांध देते हैं घर ले जाने के लिए। बाबू साहब और उनका पोता मुझे स्टेशन ट्रेन में बैठाने आते हैं। साउथ विहार एक्सप्रेस आती है और मैं उसमें सवार हो जाता हूँ। बैठे-बैठे सोचता हूँ कि कोई व्यक्ति इतना आत्मीय कैसे हो जाता है? शायद पिछले जन्मों का कोई रिश्ता है जो मुझे इस जन्म में उनके करीब ले जाता है। ट्रेन धड़धड़ाते हुए रायपुर की ओर बढ रही है………

टेसू के फ़ूल

लाया हूँ मैं
सहज ही तुम्हारे लिए
टेसू के फ़ूल
जो अभिव्यक्ति है
मेरी प्रीत की
गुलाब तो
अभिजात्य वर्ग के
नकली प्रेम की
निशानी है
गुलाबी प्रेम में
झलकती है
बेवफ़ाई/कटुताई
टेसू के फ़ूल
निर्मल निर्दोष
सहज और सरल हैं
अभिव्यक्त करते हैं
निश्चछल प्रीत को
उनमें भरी ज्वाला
भस्म कर देती है
अंतस के कलुष को
भर जाता है प्रकाश
अंतरमन में
होती है प्रीत मुखरित
जनम जनम की

"क्षितिजा" छाई काव्य क्षितिज पर - नागपुर से लौटकर ललित शर्मा

नागपुर, भारतीय रेल्वे का हृदय माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हावड़ा से मुंबई अहमदाबाद लाईन और दिल्ली से दक्षिण भारत की लाईन नागपुर से होकर ही गुजरती है। कहा जाए तो विजयवाड़ा से पहले नागपुर दक्षिण की यात्रियों का स्वागत करता सिंह द्वार है। एक खास बात और है नागपुर की, यहाँ दो रेल मार्ग 90 अंश के कोण में एक दूसरे को क्रास करते हैं। नागपुर हजारों बार जाना हो चुका है लेकिन 14 अप्रेल 2012 को नागपुर विशेष प्रयोजन से जाना पड़ा। करनाळ की कवियत्रि अंजु चौधरी जी को महात्मा फ़ूले टैलेंट रिसर्च अकादमी द्वारा उनके प्रथम काव्य संग्रह "क्षितिजा" पर सम्मान मिलना था। इस आशय का समाचार मुझे मिल चुका था। अंजु चौधरी जी का विशेष आग्रह था समारोह में उपस्थित होने का। जिसे मैं टाल न सका, क्योंकि नागपुर रायपुर से अधिक दूर भी नहीं है और मेरे पास समय भी था उनका निमंत्रण स्वीकार करने का। दिल्ली में हुए "क्षितिजा" के विमोचन समारोह में शामिल न हो पाने की भरपाई नागपुर में करना चाहता था। 13 अप्रेल की रात को नागपुर पहुंच चुका था सत्येन्द्र-संध्या शर्मा जी के दौलत खाने पर। सत्येन्द्र जी मुझे स्टेशन लेने आए।

सुबह की सैर पर हम एयरपोर्ट तक गए, वहाँ बाबा साहेब के पुतले समक्ष लोग एकत्रित हो रहे थे, अगरबत्ती की खुश्बू से वातावरण गमक रहा था। फ़ूल मालाएं बंदनवार भी सज रही थी। आज बाबा साहब की जयंती मनाई जा रही है। हमने भी पुतले की प्रदक्षिणा और वापस घर के रास्ते पर आ गए। बाबा साहब की जयंती पर नागपुर में विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई कार्यक्रम रखे गए थे। रास्ते में सुबह की सैर करने वाले बहुत सारे लोग थे, लगा कि नि:संदेह रामदेव बाबा ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने में महती भूमिका निभाई है। कुछ लोग सड़क किनारे की दूब पर अनुलोम विलोम करते दिखाई दिए और एक स्थान पर लौकी, करेले, टमाटर, गाजर आदि का रस बोतलों में भरा दिखाई दिया। सैर करने वाले लोग वहीं आकर स्वास्थ्यवर्धक रसानंद लेते हैं। हम घर की ओर बढ रहे थे, सूर्य की किरणे शैशवावस्था से यौवन पर आ रही थी। धूप चमकीली हो चुकी थी। हमने सोचा कि जल्दी घर पहुंचने में ही भलाई है, अगर अधिक देर तक सैर हुई तो रसानंद, क्रंदन में भी बदल सकता है।

घर पहुंचने पर अंजु चौधरी जी का फ़ोन आया कि वे भी एयरपोर्ट से अभी होटल पहुंची है और हमें युनिवर्सिटी के पूर्णचंद बू्टी सभागृह में 9/30 पर पहुंचना है। मुझे उनका उत्साह समझ में आ रहा था। ऐसा कोई सेमीनार नहीं देखा जो सुबह 9/30 बजे प्रारंभ हो जाए। हम (मैं, संध्या जी और सत्येन्द्र जी) प्रात: रास लेकर घर से दस बजे यूनिवर्सिटी के लिए चले। हम जब यूनिर्वसिटी पहुंचे तो वहां कोई पुर्णचंद बूटी सभागृह नहीं मिला। पूछने पर गार्ड ने सिर हिला दिया और कहा कि महाराजबाग में देख लीजिए। महाराजबाग में कृषि विश्वविद्यालय है। सत्येन्द्र जी नागपुर के जानकार ठहरे इसलिए हम पूर्ण चंद बूटी सभागृह तक पहुंच गए। वहाँ पहुचते ही हमने अंजु चौधरी जी को ढूंढा, वे अपने चिंरजीव के साथ सिंहासनारुढ थी। मुलाकात होते ही सभी की बत्तिसियाँ खिल उठी, मेरी पूरी बत्तिसी नहीं है, अकल दाढ आज तक बाहर ही नहीं आई, इसलिए उसकी गिनती करना बेमानी है। हमने तीसी से काम चला लिया।

सभागृह के द्वार पर पंजीयन काउंटर लगा था, वहाँ आगंतुक पंजियन करवा कर अपना परिचय पत्र ले रहे थे। जिसे गले में लटकाना था, हमने भी दो लिए और गले में लटका लिया, जिससे पता चले कि छत्तिसगढ का प्रतिनिधित्व इस कार्यक्रम में हो रहा है। भले ही हम अंजु चौधरी जी द्वारा आमंत्रित थे पर अपनी उपस्थिति तो बताना जरुरी है। तभी अंजु चौधरी जी ने बताया कि केलीफ़ोर्निया से ब्लॉगर अनिता कपुर भी पधारी इस कार्यक्रम में, हम सब उनसे मिले जाकर। उन्होने पहचान लिया और कहा कि आप तो फ़ेसबुक पर मेरे मित्र हैं। हमने भी हामी भर ली और एक चित्र खिंचवा लिया साथ ही साथ। कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, अतिथि मंचासीन हुए और उद्घाटनोपरांत उद्बोधन का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया। सभागृह की कुर्सियां खचाखच भर चुकी थी, लगा कि काफ़ी जागरुक लोग हैं जो कार्यक्रम में सम्मिलित होने आए हैं। वरना वर्तमान किसके पास इतना समय है कि किसी की आनी-बानी की गोठ सुने?

संजीव तिवारी जी और अंजु चौधरी जी
बैठते ही अंजु चौधरी जी ने खुलासा किया कि हमारे परम सनेही ब्लॉगर संजीव तिवारी जी भी सहस्त्रचक्रवाहिनी लौहपथगामिनी से कार्यक्रम की शोभा बढाने पहुंच रहे हैं। वाह! सुनकर रोम रोम खिल गया। अब मजा आएगा कार्यक्रम का। संजीव जी को फ़ोन लगाया कि तो पता चला कि किसी ने रेल्वे प्रशासन को बता दिया कि इस ट्रेन में एक ब्लॉगर सफ़र कर रहा है इसलिए ट्रेन में विशेष सुरक्षा जांच नागपुर के प्रवेश द्वार इतवारी में की जा रही है। संजीव तिवारी जी के पासपोर्ट वीजा की गहन जाँच हो रही हैं। क्योंकि ब्लॉगर का क्या भरोसा कब, कहाँ किसका भंडाफ़ोड़ कर दे। वैसे न्यु मीडिया से डरना भी जायज है। संघवी ने इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया तक सीडी पहुंचने न दी पर किसी दिलजले ने यूट्यूब पर डाल कर उसके मंसुबों पर पानी फ़ेर दिया और अस्तीफ़ा देना ही पड़ा। संजीव तिवारी जी सभागृह में पधार चुके थे। हम उनका इस्तेकबाल करने के लिए ग्रंथालय के द्वार पर खड़े थे। मुलाकात भी ऐसे हुई जैसे कोई दो बिछुड़े प्रेमी बरसों के बाद औरंगजेब की कैद से छूट कर आए हों।

सतिथि देवी भव:
सभागृह में हम जिस तरफ़ बैठे थे उधर की विद्युत व्यवस्था में कुछ अवरोध था। बार-बार पंखे बंद हो जाते थे। अरे यार क्या करें किस्मत ही ऐसी है, जब कुछ अच्छा करने की कोशिश करते हैं कोई न कोई बाधा खडी हो जाती है। शादी के लिए जब लड़की वाले देखने आते थे तो डर के मारे सिर के बाल खड़े हो जाते थे, जो उन्हे पसंद नहीं आते थे और बात बनते बनते रह जाती थी। तब हमने सेट-वेट लगाकर थोड़ा सेक्सी लुक बनाया और बात फ़िट हो गयी । हम भी परणाय गए, नहीं बाल खड़े के खड़े ही रहते और हम प्लेटफ़ार्म पर। आज भी यही हो रहा था, अंजु जी को सम्मान मिलना था और पंखे पसीना निकाल दे रहे थे। संध्या जी ने जुगत लगाई, रजिस्ट्रेशन के वक्त मिले फ़ोल्डर से हवा करनी शुरु की, थोड़ी सी हमारे तक भी पहुंची। हमें भी ध्यान आया ऐसा ही फ़ोल्डर तो हमारे पास भी है। पर क्या करें? अकल हो तो उपयोग करे न? अब हमने भी फ़ोल्डर घुमाया और अपने को कम् और अंजु जी को अधिक हवा दी, क्योंकि उन्हे इसकी दरकार भी थी।

 अनिता कपुर जी
मंच से भाषण शुरु थे, श्रोत अध्येता भाषण दे रहे थे और हमारे जैसे श्रोता सुन रहे थे। अनिता कपूर जी का भी नम्बर आया, उन्होने अपना वक्तव्य देना प्रारंभ किया, हमने सोचा कि वे अपने भाषण के प्रांरंभ में ब्लॉगर बिरादरी का भी जिक्र करेंगी। क्योंकि हम ब्लॉगर भी वहीं थे और ब्लॉगर्स का जिक्र उनके मुंह से सुनना चाहते थे। लेकिन वे अपनी इस बिरादरी को भुल गयी। भाषण की समाप्ति पर मैने उन्हे मंच पर जाकर कहा कि - आपसे नाराज हूँ। कारण पुछने पर मैने उन्हे कारण बता दिया। उन्होने से क्षमा मांग कर कहा कि आगे से ध्यान रखुंगी। अब गलती नहीं होगी, आप नाराजी दूर कर लो बाबा। अब बाबा भी खुश हुए, मैने अपनी बात उन तक पहुंचा दी। प्रथम सत्र समाप्त हो चुका था, माईक से भोजन करने की घोषणा हो रही थी और कहा जा रहा था कि अगला सत्र सम्मान सत्र होगा जो 3 बजे प्रारंभ होगा। इस कार्यक्रम में विदेशों से भी प्रतिभागी आए थे। एक गोरा भी था शायद जर्मनी से उसने भी अपना भाषण पढा। भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ मंधानी भी मंचासीन थे। बाकी लोगों को मै जानता नहीं, इसलिए जिक्र भी उचित नहीं समझता।

जय बाबा की - काला पर्स रखते ही  कृपा आनी शुरु हुई :)
निर्मल बाबा की कृपा आनी शुरु हो गयी थी, सुबह उनका एस्क्लुसिव इंटरव्यु देख कर चले थे। सभी लोग भोजन करने गए तो हमने भी भोजन के लिए उचित जगह की तलाश शुरु कर दी। आखिर तय  हुआ, होटल एल बी चला जाए, जो नागपुर के सदर में है और वहीं अंजु जी का डेरा भी। आटो वाले ने 100 रुपए किराया बताया, भुख जोरों की लगी थी इसलिए मोलभाव करने का समय नहीं था हम चारों ऑटो में सवार हो गए। जगह सिर्फ़ तीन की थी। संजीव तिवारी जी को मुझे गोद में बिठाना पड़ा, बात थी कि किसी भी तरह फ़टाफ़ट भोजन करने  लिए होटल पहुंचा जाए। होटल एल बी का रेस्टोरेंट अच्छा था पर सप्लाई ढीली थी, खाना आते तक एक-एक साफ़्ट ड्रिंक झेली। फ़िर तीन लोगों की सहमति से कुक्कड़ भी आ गया। संजीव तिवारी जी ने घास पात से ही काम चलाया। वैसे पता चला कि अंजु जी कड़कनाथ अच्छा बनाती हैं। कभी मुहूर्त हुआ तो उनके हाथ का भी खाएगें। कविताओं की तरह रस जरुर मिलेगा उसमें। भाव प्रधान कड़कनाथ के कहने ही क्या हैं थोड़ा चटपटा भी चलेगा। रुकिए रुकिए यह विचार उस समय के थे, अब के नहीं क्योंकि अब मनाही हो चुकी है, बैन लग चुका है और इनकी निगाह मुझ पर सतत लगी रहती है।

फ़ोटो ग्राफ़ी - (चित्र संजीव तिवारी) 
भोजनोपरांत वापस ग्रंथालय सभागार उसी भाड़े में आए, हमें थोड़ा विलंब हो चुका था। सभागार में हमारे बैठने के लिए कुर्सियाँ ही खाली नहीं थी, पहले आओ और पहले पाओ वाली स्थिति थी, न ही किसी ने उठकर कुर्सियाँ देने की जहमत उठाई, उपस्थित सभी नौगजे थे। हम चारों पीछे की तरफ़ खड़े हो गए जाकर। समय बीतता जा रहा है। थोक में सम्मान प्रक्रिया शुरु थी, वहाँ जितने बैठे थे सभी को किसी न किसी नाम से सम्मान मिलना था। तभी नागपुर के खासदार विलास राव मुत्तेमवार का आगमन होता है, वे मराठी में जोरदार धुवांधार भाषण देते हैं साथ ही विदर्भ की बात करते हैं। उसके पश्चात एक दलित लेखक जो शायद विदेश में रहते हैं उन्होने भी लच्छेदार मराठी भाषा में अगड़ों-पिछड़ों को गरियाया। राजा बलि की जय बोलाई, स्वर्णों की खाल खींची, हम सुनते रहे बैठकर। अरे भाई जब सवर्णों को गाली नहीं दोगे तब तक तुम्हारी दुकान नहीं चलेगी। क्योंकि दलित संगठनों का मुख्य कार्य ही सवर्णों को गाली देना हो गया और इस पर ही एकता कायम है। जबकि मेरा सोचना है कि समाज का निर्माण सभी जाति घटकों को मिला कर होता है। इसलिए अलग रह कर या किसी को गाली देकर कोई अपने जाति संगठन का विकास नहीं कर सकता है। समाज में सभी घटकों की आवश्यकता होती है। खैर छोड़ों इन बातों को सभी पढे लिखे और समझदार हैं यार।

सम्मान ग्रहण करते अंजु चौधरी
सम्मान देने की प्रक्रिया जारी थी, कुछ लोग सम्मान लेकर चले गए इसलिए उनकी कुर्सी खाली हुई और हमें बैठने के लिए स्थान प्राप्त हो गया। नामों की घोषणाएं हो रही थी, हमें अंजु जी के नाम की व्यग्रता से प्रतिक्षा  थी क्योंकि 5 बजने को थे। इतनी देर तो भाड़े के ताली बजाने वाले दर्शक भी नहीं रुकते, 5 बजे दफ़्तर से चपरासी भी चले जाता है चाहे साह्ब बैठे रहें कुर्सी पर रात भर। पर हम भी भीष्म प्रतिज्ञा करके आए थे कि अंजु जी को सम्मान दिला कर ही जाएगें। चाहे धैर्य की कितनी भी परीक्षा ले ली जाए। हम भी भीष्म जैसे अंजु जी की सम्मान प्राप्ति से बंधे थे। इन्हे सम्मान मिला और हम हो जाएं रफ़ुचक्कर। एक बार सम्मानदाताओं कह भी आया था कि अंजु जी सम्मान जल्दी करो, उनकी फ़्लाईट छूट जाएगी तो तुम्हें फ़ालतु 20 हजार का दंड भरना पड़ेगा। आखिर वह घड़ी आ ही गयी, जब अंजु जी का नाम आसंदी से उद्घोषक ने लिया, हमारे गर्मी में मुरझाए, सिकुड़े हुए चेहरे खिल उठे। मुस्कुराते ही होठों पर पड़ी पपड़ियाँ फ़टकर दर्द करने लगी। भाई ब्लॉगर मित्र के सम्मान के लिए इतना दर्द तो सहना पड़ेगा। जिस मित्र ने मित्र का साथ नहीं दिया वह कैसा मित्र? अंजु जी मंच पर पहुंची उन्हे शाल श्री फ़ल के साथ सम्मान दिया गया और हमने फ़टाफ़ट चित्र उतारे। एक सुखद अहसास, लो भई 10 बजे से शुरु हुई तपस्या 6 बजे समाप्त हुई।

ललित शर्मा, अंजु चौधरी, संध्या शर्मा, सत्येन्द्र शर्मा
विजयी भाव और गर्व से तनी हुई गर्दन लिए हम सभागृह से बाहर आए और जी भर के अंजु जी को सम्मान प्राप्त करने की बधाई दी। उनके साथ चित्र भी खिंचवाए, भई एक सेलीब्रेटी के साथ चित्र खिंचवाने का आनंद ही कुछ और है। हमारे चित्र संजीव तिवारी जी ने खींचे और संजीव तिवारी जी के हमने। सत्येन्द्र शर्मा जी भी अपने जरुरी काम निपटा कर पंहुच चुके थे। अब अंजु जी से विदाई ली, हमने अपनी काली घोड़ी को पुचकार खरहेरा किया। उसने भी सिर हिलाया कि वह सवारी कराने के लिए तैयार है।इस तरह "क्षितिजा" का सम्मान समारोह निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। हमने भी राहत की सांस ली, जैसे स्कूल की छुट्टी की घंटी बजते ही बच्चे घर की ओर दौड़ लगा देते हैं, बस इसी तरह का कुछ मन हमारा भी था। इस कार्यक्रम में सूर्यकांत गुप्ता जी एवं गुप्तैईन भाभी को भी आना था पर गुप्ता जी की अस्वस्थता की वजह से वे पहुंच नहीं पाए। सभी से विदा लेते हुए आनंद के क्षणों को अपनी यादों एवं कैमरे में कैद करते हुए फ़िर मिलने का वादा करते हुए हम सब अपनी-अपनी मंजिल की ओर बढ गए। एक आत्मिक संतुष्टि मन को मिली। जब कोई व्यक्ति रचता है और उसे सम्मान मिलता है वह जीवन का अविष्मर्णीय समय होता है।घर पहुंचने पर रात भोजन के समय अंजु जी का मैसेज मिला कि फ़्लाईट दिल्ली के लिए टेक ऑफ़ हो गयी है और हम लग गए अपनी निर्गुणी धुन में……

 

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