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सोमवार, 31 जनवरी 2011

आएगें सजना तो होगा सजना

हमारा सजना भी क्या सजना, आएगें सजना तब होगा सजना। रजनीगंधा की खुश्बू के साथ अलसाई सी सुबह हुई, खुमारी लिए हुए। चाय के प्याले की भाप में स्वर्णिम किरणें इंद्रधनुष बना रही हैं। हल्की-हल्की गुलाबी ठंड में चाय की एक चुस्की ने गर्माहट दी।

खुमारी उतरने का इंतजार कर रहा हूँ। अखबार के पन्ने पलटता हूँ, वही बरसों पुराने समाचार हैं, नए अखबार में। अखबार नया है पर समाचार वही हैं, सिर्फ़ किरदार बदले हैं।

घूस लेने का समाचार। चाणक्य के काल में भी घूस इसी तरह ली जाती थी, फ़र्क इतना है, इसे उत्कोच कहते थे। लेकिन थी घूस ही। लेने और देने वाला बदला है। बाकी समाचार वही है। सिर्फ़ नाम बदल कर कट पेस्ट करना है।

इसी तरह बाकी अन्य समाचार भी अपनी पुरानी गाथा ही कहते नजर आते हैं। नया कुछ भी नहीं है इस अखबार में।

पढते-पढते जम्हाई आने लगती है। जम्हाई भी आना तय है जब बोरियत होने लगे। सुबह-सुबह बोर होना ठीक नहीं है। अखबार पुराना है तो क्या हुआ? सूरज तो नया है, हवा तो नई है, सामने खिले हुए रजनीगंधा के फ़ूल तो नए हैं। चाय का प्याला पुराना है लेकिन चाय तो नई है, उसमें निकलती भाप भी नई है। फ़िर क्यों पुराना-पुराना की रट लगाए बैठे हो?

नए का स्वागत करो, स्वागत करने के लिए सजना संवरना भी पड़ेगा। सजना के स्वागत के लिए सजना भी जरुरी है। जब आएगें सजना तो होगा सजना। सजना नहीं आए तो क्या हुआ, पर पुरवाई जरुर चली। चाय के प्याले की भाप उड़ कर मुंह तक आने लगी, ठंड से थोड़ी राहत मिली, गर्माहट तो आई, प्रतीक्षा है खुमारी उतरने की।

रजनीगंधा की खुश्बू वजूद पर छा गयी है, वातावरण में भीनी-भीनी महक घुल कर सुबह का स्वागत कर रही है। सुबह तो हुई, रात कैसी बीती? चाय की चुस्की के साथ जरा पीछे भी पलट कर देख लो। कुछ छोड़ तो नहीं आए खुमारी में? नहीं तो, ऐसा नहीं हो सकता? आपे में था, आपे में रहना भी इतना आसान नहीं है।

कह रहे थे कि फ़िर न आऊंगा यहाँ। ओह, कुछ याद नहीं। स्लेट साफ़ हो गयी है। कुछ लिखा हुआ नहीं दिखाई देता। जब तुम कहते हो तो लगता है कि लिखा बहुत कुछ था। मिटा किसने दिया? स्वत: ही मिट गया। बुराईयाँ स्वत: नहीं मिटती। उसे तो जग जाहिर होना पड़ता है।

अच्छाई पर तो कालिख लगाई जा सकती है, पर कालिख पर कालिख कैसे लगे। चाय गले के नीचे ही नहीं उतर रही।

ओह! क्यूँ होता है यह सब? लाख मना करने पर भी न माना। हमने कैसा पैमाना बना लिया है? अच्छाई और बुराई को तोलने का। सभी के पैमाने अलहदा हैं।

वैसे भी पैमाने एक जैसे नहीं होते। देश-काल के अनुसार पैमाने तय होते हैं। हमने गढने भी सीख लिए हैं। किसी की मजबूरी किसी के तरक्की का बायस बन जाती है।

सौ बुराइयों में एक अच्छाई को मान्यता मिल जाती है। सौ अच्छाईयों में एक बुराई वैसा ही काम करती है जैसे दरिया में विष की एक बूंद।

चाय ठंडी हो गयी। भाप ही पहुंची थी मुझ तक। गर्माहट का सुखद अहसास है, रजनीगंधा की खुश्बू एवं तुम्हारी याद के मध्य।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

संस्कृति एवं परिवार की धूरी चूल्हा

“चूल्हा जलना” मुहावरा मानव सभ्यता के साथ जुड़ा है। कहावत है “घर-घर में माटी का चूल्हा” सहस्त्राब्दियां बीत गयी, चूल्हे को जलते, अब चूल्हा नहीं रहा। उसके अवशेष ही बाकी हैं, इस मुहावरे को बदलने की जरुरत है।

ये वही चूल्हा है जिसने मानव के प्राण बचाए, संस्कृतियों एव सभ्यता को बचाया, चूल्हा जलाकर मानव सभ्य कहलाया।

उसने अग्नि को वश में किया। प्रतिकूल अग्नि विनाश करती थी उसे अनुकूल बनाकर उपयोगी बनाया। वर्तमान-भूत-भविष्य सभी में चूल्हे का स्थान माननीय है।

कैसी विडम्बना है अब चूल्हे को अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए जद-ओ-जहद करनी पड़ रही है। क्या इस मिट्टी के चूल्हे को हम भूल सकते हैं?

रात को ही माँ चूल्हे को लीप-पोत कर सोती थी और भोर में ही चूल्हा जल जाता था। पानी गर्म करने से लेकर भोजन तैयार होने तक चूल्हा जलता ही रहता था।

गांव में किसी बदनसीब का ही घर होता था जिसके कवेलुओं या छप्पर से धूंवा नहीं निकलता था। लोग जान जाते थे किसके घर में आज चूल्हा नहीं जला है और कौन भूखा सोने की तैयारी में है। किसके बच्चे भूख से विलाप कर रहे होगें।

चूल्हा घर की सारी खबर गाँव तक पहुंचा देता था। कोई उस घर की मदद कर देता था तो उसका चूल्हा जल जाता था। मनुष्य से अधिक चूल्हे को भूख असहनीय हो जाती थी। वह अपने प्राण होम कर घर मालिक की जान बचाता था।

आज भी माँ सुबह उठती है और चूल्हा जला देती है। चूल्हे पर खाना तैयार भले ही न हो लेकिन गर्म पानी तो हो जाता है। चूल्हे की भूभल (गर्म राख) में सेके हुए बैंगन के भरते का आनंद और कहीं नहीं मिल सकता।

इसमें सेंके हुए आलू, शकरकंद, बिल्वफ़ल (बेल) के स्वाद के तो क्या कहने। अब तो गुजरे जमाने की याद हो गयी है। चूल्हे पर मिट्टी के तवे पर बनी हुई रोटियों की सोंधी खुश्बू रह-रह कर याद आती है।

गाँव में किसी के यहाँ उत्सव होता था तो घर के  चूल्हे को ही न्योता जाता था। जिसे चुलिया नेवता कहते थे।गुजरे जमाने की जैसी यादें मुझे आ रही हैं, शायद चूल्हा भी गुजरे जमाने को याद करके तड़फ़ता होगा। जब उसका जलवा कायम था।

चूल्हे का जलना उसके इंधन पर कायम है। गाँव में आज भी चूल्हा जलाने के लिए इंधन की व्यवस्था करनी पड़ती है।

चूल्हा इसलिए जलता था कि घर में बहुत सारे पेड़ हैं,  वातावरण साफ़ सुथरा होता था, हरियाली रहती थी  और सूखी हुई शाखाएं उसके इंधन के काम आ जाती थी, आज भी आती हैं।

जलावन की लकड़ियों के लिए रुपए खर्च नहीं करने पड़ते। पेड़ों की शाखाएं काटी भी न जाएं तो भी वह वर्ष भर के चूल्हा जलाने के लायक लकड़ियाँ उपलब्ध करा ही देती हैं।

चूल्हे का अस्तित्व बचा रहता है। सुबह-शाम उसकी लिपाई हो जाती है और साप्ताहिक मरम्मत भी। 

चूल्हे का निर्माण आसान काम नहीं है। कोयले की सिगड़ी के साथ चूल्हे का निर्माण कोई विशेषज्ञ महिला ही करती है। उसे सुंदर मांडने से सजाया भी जाता है।

घर में चूल्हे स्थान महत्वपूर्ण है और इससे महत्वपूर्ण है “पूरा घर एक ही चूल्हे पे भोजन करता है”। चूल्हे ने परिवार का विघटन नहीं होने दिया। नया चूल्हा रखना बहुत कठिन होता है परिवार को तोड़ कर।

घर में दूसरा चूल्हा रखने से पहले लाख बार सोचना पड़ता है क्योंकि उसके साथ बहुत कुछ बंट जाता है। विश्वास के साथ आत्मा, कुल देवता, पीतर और भगवान भी।

इसलिए बड़े बूढे कहते थे-अपना-अपना धंधा बांट लो लेकिन चूल्हे को एक रहने दो। संयुक्त परिवार में दो कमाने वालों के सहारे एक निखट्टू के परिवार का निर्वहन भी यही चूल्हा कर देता था।

जब भी चूल्हे की ओर देखता हूँ तो मन में एक कसक जन्म लेती है। टीस सी उठती है। कभी इसी चूल्हे पे परिवार के 40 लोग आश्रित थे। आए-गए अतिथियों का भरपूर मान मनुहार होता था।

गाँव में शहर में इज्जत और धाक कायम थी। क्योंकि सारा घर का सामान थोक में ही आता था। जब भी किसी दुकान पर चले जाते थे तो मोटा आसामी देखकर दुकानदार का चेहरा खिल उठता था।

शहरों में लोग लाखों करोड़ों रुपए कमाते हैं, उनके यहाँ चूल्हा नहीं जलता। गाँव में 100 रुपए रोज कमाने वाले के यहाँ भी चूल्हा जलता है। 

इसका मतलब यह नहीं है कि शहरों में खाना नहीं बनता। गैस या बिजली हीटर चलता है खाना बनाने के लिए। अब एक चूल्हे के 10 गैस सिलेंडर हो गए हैं।

कई चूल्हा प्रेमियों के ड्राईग रुम में चूल्हे का माडल शोभा दे रहा है। उन्हे लगता है कि चूल्हे के माडल से वे अपने गाँव की संस्कृति से जुड़े हैं।

अपनी धरती से जुड़े हैं। गैस ने माटी के चूल्हों को अपनों से दूर कर दिया। अब उसकी जड़ों मठा डाल रही है। चूल्हा बंटने के साथ लोगों के मन भी बंट गए। दूर की राम-राम भी खत्म हो गयी है।

चूल्हे ने जिस परिवार को बांध रखा था वह अब खंड-खंड हो गया। कोने में पड़ा हुआ चूल्हा अपनी बेबसी पर सिसक रहा है।

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

झलकियाँ गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम की

गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम 25 जनवरी से ही प्रारंभ हो गया था। शासकीय कन्या स्कूल अभनपुर में विद्यार्थियों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया।

26 जनवरी को अशोक बजाज (अध्यक्ष राज्य भंडारण निगम छत्तीसगढ)द्वारा स्थानीय भंडारण निगम, सरस्वती शिशु मंदिर, एवं नगर के मुख्य कार्यक्रम में ध्वजारोहण किया गया। इस अवसर उन्होने परेड की सलामी ली।

हाईवे पर दुर्घटनाओं को देखते हुए मुख्यमंत्री ने डायल 108 एम्बुलेंस की नि:सेवा उपलब्ध कराई। जिसका लोकार्पण अशोक बजाज ने  किया।

ललित शर्मा, राधाकृष्ण (अध्यक्ष नगर पंचायत अभनपुर) साहू जी(प्राचार्य)
शा.कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की छात्राएं 25 जनवरी
देव अंगिरस वैदिक स्कूल के विद्यार्थी 26 जनवरी
नगर के मुख्य कार्यक्रम में अशोक बजाज जी
धव्जारोहण के पश्चात राष्ट्र गीत प्रस्तुत करती छात्राएं
डायल 108 एम्बुलेंस नि:शुल्क सेवा लोकार्पण हेतु तैयार
मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए हृदय लाल गिलहरे(व्याख्याता)

मुख्यमंत्री का जनता के नाम संदेश वाचन करते अशोक बजाज
 सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए विद्यार्थी
कार्यक्रम के पश्चात हम बसंत साहू से मिलने कुरुद चले गए।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से ओतप्रोत नाटक राजा फ़ोकलवा

सुमित दास, ललित शर्मा, श्याम बैस(अध्यक्ष बीज विकास निगम)
डोकरी दाई (दादी) और ममा दाई (नानी) का अपने नाती-पोतों पर अत्यधिक स्नेह होता है। उनसे सुनते थे कि-“मूल से ब्याज प्यारा होता है”। इसलिए बेटे से अधिक स्नेह नाती-पोतों पर होता है।

दादी-नानी से कहानी-किस्से बचपन में सभी ने सुने होगें। उस जमाने की भूत-प्रेत की फ़ंतासियाँ बहुत पसंद आती थी।

भूत प्रेतों के पास असीमित शक्तियां होती थी, यह सुनकर हम भी शक्ति पाने की की कल्पना करने लगते थे। लेकिन लोक कहानियों के पीछे छिपा जनकल्याणकारी संदेश बचपन में समझ नहीं आता।

बड़े होने पर उनका रंग दिखाई देता है। ऐसी “राजा फ़ोकलवा” नामक कहानी राकेश तिवारी जी ने अपनी दादी से सुनी थी। इस लोक कहानी ने उन्होने कुछ परिवर्तन किया और “राजा फ़ोकलवा” के नाम से नाटक तैयार कर मंचन प्रारंभ किया। जिसे आशातीत सफ़लता मिली।

अमित दास(पार्षद) ,सुमित दास,ललित शर्मा, श्याम बैस
मैने नाटक के विषय में सुना था, लेकिन उसका मंचन देखने का संयोग प्राप्त नहीं हुआ था। प्रयास जारी था राजा फ़ोकलवा से मिलने का और वह अवसर आ ही गया।

भनपुरी युवा समिति के तत्वाधान में 23/1/2011 कबीर कुटी में मंचन तय हुआ। हमें राजा फ़ोकलवा से मिलने का अपाईंटमेंट मिल चुका था। भीड़ भरी सड़कों से गुजर कर भनपुरी कबीर कुटी तक पहुंचने में विलंब हो चुका था।

जब पहुंचे तो नाटक का मंचन प्रारंभ होने ही वाला था। साजिन्दे अपने साज संभाल चुके थे। हरमोनियम, बेंजो, ढोलक, खंजरी की जुगलबंदी प्रारंभ हो चुकी थी। राकेश तिवारी जी हरमोनियम पर निर्देशक की भूमिका में थे।

राजा फ़ोकलवा का मंचन प्रारंभ होने ही वाला था, हमारी विलंबित आमद ने खलल डाल दिया। मैं सुमीत दास, अमित दास (पार्षद वार्ड नं-53) साथ ही साथ पहुंचे। स्वागत इत्यादि की औपचारिकताओं ने 10 मिनट और ले लिए। लेकिन संतोष था कि आज मंचन देखने मिलेगा तथा राजा फ़ोकलवा से मिल कर ही जाएंगे।

हारमोनियम पर निर्देशक गायक राकेश तिवारी
कार्यक्रम के मुख्य अथिति श्याम बैस ( अध्यक्ष बीज निगम) से हमारी राम राम जोहार के पश्चात कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।

हमारे पौराणिक संस्कारों के अनुसार किसी भी कार्यक्रम का प्रारंभ गणेश वंदना से होता है। यहां भी दो विदुषकों द्वारा गणेश वंदना की गयी।

इसके पश्चात कहानी आगे बढती है। गाँव में फ़ोकलवा नामक एक लड़का अपनी माँ के साथ रहता है। आयु तो उसकी बढ जाती है, लेकिन दिमागी विकास नहीं हुआ रहता। हरकतें उसकी बच्चों वाली ही रहती हैं।

दिन भर गुल्ली-डंडा और डंडा पचरंगा इत्यादि खेलों में रमा रहता था। एक दिन उसकी माँ ने उसे जंगल से लकड़ी लाने भेजा तो उसे वहाँ नरभक्षी राक्षस और राक्षसनी का जोड़ा मिलता है। फ़ोकलवा की उनसे लड़ाई होती है। फ़लस्वरुप राक्षसनी के एक पैर का तोड़ा (पैर में पहने वाली वाली मोटी कड़ी या कड़ा) और साड़ी छीनने में कामयाब हो जाता है।

रक्सा-रक्सिन याने राक्षस और राक्षसनी
फ़ोकलवा साड़ी और तोड़ा लेकर अपनी माँ के पास पहुंचता है उसे साड़ी देता है और कहता है कि-देख तेरे लिए साड़ी लेकर आया हूँ और सारी घटना माँ को बता देता है।

एक दिन उसकी माँ साड़ी पहन कर घर के दूवार पर बैठी रहती है तो राजा की बेटी की सवारी उधर से निकलती है।

राजकुमारी को साड़ी पसंद आ जाती है। वह सेनापति को साड़ी की मांगने भेजती है। फ़ोकलवा की माँ साड़ी देने से इंकार कर देती है।

राज हठ बाल हठ और तिरिया हठ के सामने दुनिया झुकी है। यह समाचार राजा तक पहुंचता है। राजकुमारी ने साड़ी न मिलने तक भोजन का त्याग करने की धमकी दी।

राजा बिना माँ की राजकुमारी की सभी जिद पूरी करते थे। उन्होने साड़ी लेने के लिए महामंत्री को फ़ोकलवा की माँ के पास भेजा। फ़ोकलवा ने कहा कि साड़ी नहीं मिलेगी।

यह साड़ी तो मेरी माँ पहनेगी या मेरी पत्नी। महामंत्री निराश होकर राजा के पास लौट आता है।राजा को क्रोध आ जाता है। महामंत्री उसे सलाह देता है कि एक ही रास्ता बचा है राजकुमारी का विवाह फ़ोकलवा से करा दिया जाए।

सेनापति, राजकुमारी और फ़ोकलवा की माँ
फ़ोकलवा का विवाह राजकुमारी से हो जाता है। फ़ोकलवा राजकुमार बनकर राज महल में आ जाता है। उसकी यारी राज्य के व्यापारियों से हो जाती है।

वह उनसे रुपए पैसे लेकर अनैतिक कार्यों में लग जाता है। इसी बीच राजा की हत्या हो जाती है। फ़ोकलवा को राजा बना दिया जाता है।

राजा बनते ही फ़ोकलवा राज्य के प्राकृतिक संसाधन व्यापारियों को बेच देता है। उनसे धूस लेता है। उसे पता चल जाता है कि राजा की हत्या किसने की है।

जब महामंत्री और सेनापति को राजा की हत्या का रहस्य पता चलता है कि  राजा की हत्या के षड़यंत्र में फ़ोकलवा राजा शामिल है। तब फ़ोकलवा महामंत्री और सेनापति को बर्खास्त कर देता है।

राजा फ़ोकलवा के पात्र में हेमंत वैष्णव
एक दिन खुश होकर राक्षसीन का तोड़ा(कड़ा) वह राजकुमारी को दे देता है। तब राजकुमारी उसके जोड़े की मांग करती है।

आखिर में वह जंगल में जाकर राक्षसनी और राक्षस से लड़ता है। उनसे ताबीज और तोड़ा छीन कर ले आता है। तोड़ा राजकुमारी को देता है और ताबीज स्वयं धारण करता है।

धारण करते ही दोनो राक्षस और राक्षसनी में बदल जाते हैं। जंगल के राक्षस और राक्षसनी प्रेत योनि से मुक्त हो जाते हैं।

कहानी का उपसंहार यही निकलता है कि जिस राजा के राज में प्रजा सुखी नहीं है और राजा कुकर्मों में लगा हुआ है वह राक्षस योनि को ही प्राप्त होता है।

कुकर्मों की सजा एक न एक दिन मिलती ही है। वर्तमान से इसे जोड़कर देखें तो जन सेवा की आड़ में इस तरह का नाटक ही चल रहा है।

राक्षस योनि में बदलते राजा फ़ोकलवा और रानी
कहानी के पात्र दर्शकों को अंत तक बांधे रहते हैं। इस नाटक का प्रथम मंचन 2002 में रंग मंदिर रायपुर में हुआ था। इसके पश्चात के देश में 78 मंचन हो चुके हैं।
कहानी के मुख्य पात्र का जीवंत अभिनय हेमंत वैष्णव ने किया जिसका दर्शकों ने खूब आनंद उठाया।

पात्र परिचय- फोकलवा~हेमन्‍त वैष्‍णव, रानी~ आरती ठाकुर, दाई~ लक्ष्‍मी पाण्‍डेय, राजा, सेवक~ सुदामा शर्मा, मंत्री~ हेमलाल पटेल,
सेनापति ~ मनोज मिश्रा, गणेश,पण्डित, सेवक ~ डा. पुरूषोत्‍तम चन्‍द्राकर, रक्‍शा ~ नरेन्‍द्र यादव, रक्शिन ~ सरिता पाठक
चेरिया, परी ~ शारदा ठाकुर, सेठ ~ उत्‍तम ठाकुर, उद्योगपति ~ दीपक ताम्रकार, जोकर1 ~  दुष्‍यन्‍त द्विवेदी, जोकर 2~  नरेन्‍द्र यादव, सुवासिन ~ पूजा पाठक, गांववाले ~ हेमन्‍त शुक्‍ला, गायन पक्ष ~ राकेश तिवारी, विनोद शर्मा, विजया राउत, मिनाक्षी राउत, वादन पक्ष्‍ा ~ मनीष लदेर, उत्‍तम ठाकुर, मोहन साहू । नाटक के संगीत में कमाल की विविधताएं थी। सरगुजिहा,बस्तरिया लोकधुन के साथा चंदैनी, बिहाव, पंडवानी, पंथी, राऊत नाच का सुंदर मिश्रण किया था।

इस कार्यक्रम के आयोजक भनपुरी युवा समिति के संचालक उदय दास मानिकपुरी को साधुवाद देते हैं। सबसे खास बात रही कि दर्शकों ने बिना किसी शोर गुल से राजा फ़ोकलवा प्रहसन का आनंद लिया। इस नाटक में दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता है।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

इश्क है दरिया प्यार का-जो डूबा सो पार

दिन ढलते ही तुम्हारी यादों का साया घेरने लगता है। मन मानता ही नहीं। बहाना यार का होता है और बह हम जाते हैं। दरिया गहरा है। कदम मानते नहीं, स्वत: बढने लगते हैं। तलाशते हैं तेरा दर मिल भी जाता है।

एक दिन वादा लिया था तुमने दर पे न आने का। फ़िर भी चला आया, वादा तोड़ कर। वैसे भी दुनिया कहती है, वादे तोड़ने के लिए होते हैं। मेरे से भी टूट गया। शर्मिन्दा हूँ, अपराध बोध के साये में डूबता उतराता हुआ।

लौ लगाई थी, उजास के लिए। तम दूर हुआ लेकिन तामस बाकी है। बाधा है मेरी राह की। प्रयास है इस राह के पत्थर को हटाने का पुरजोर। एक छोर पकड़ता हूँ तो दूसरा छूट जाता है।कभी तो दोनों छोर हाथ आएगें आशा है। निराश नहीं हूँ।

रात खिड़की से देखता हूँ बाहर अंधेरा गहरा है। किसी ने बत्तियाँ बुझा दी। झींगुरों की आवाज एक रहस्य हैं, आती कहाँ से हैं कुछ ज्ञात नहीं।

पर सुना है कि ऐसी आवाजे झींगुरों की होती हैं। कभी-कभी सोचता हूँ कि ढूंढ लूँ कुछ झींगुर, कांच कूप्यक में बंद रखुं, जब मन आए, सुनने लगुं उनका शास्त्रीय गान।

आरोह अवरोह का अच्छा अभ्यास हैं इन्हें। दीर्घ-हस्व-प्लूत स्वर में सामवेदी गान करते हैं। जैसे गुरुकुल के बटुक सस्वर पाठ कर रहे हों संध्या वेला में।

कहाँ से सीखा है झींगुरों ने यह गान? स्वत: ही प्रज्ञा जागृत हुइ होगी। डूब कर पाया होगा स्वर और आरोह अवरोह का सामुहिक अभ्यास किया होगा। डूबता हूँ मैं भी। स्वर पकड़ने को।

रात गहराती है, खिड़की खुली है। पारिजात फ़ूलों की खुश्बू का एक झोंका आता है,  गुंजने लगता है “बहुत कठिन है डगर पनघट की”। गला सूखता है और पनघट की याद आती है।

उनींदे बेसुध कदमों से पनघट की ओर चलता हूँ। सामने अंधेरा और पनघट का न मालूम रास्ता। पहुचे कैसे पनघट तक? पनघट को पता है कोई प्यासा राहगीर तलाश में है उसकी।

सहसा पायल की ध्वनि सुनाई देती है। जैसे कहीं रश्क हो रहा हो, दूर कहीं मृदंग की ताल पर रक्काशा थिरक रही हो। चांदी की घंटियाँ मृदंग की ताल पर संगत कर रही हों।

कहीं पनघट से भटकाने की चाल तो नहीं है किसी की। पथिक प्यासा रह जाए। बस एक बार पनघट तक पहुंचना है। दूबारा शर्मिन्दा नहीं होना चाहता पथिक। वादा तोड़ने का अपराध बोध लेकर जीयेगा कैसे?

बस बात एक रात की है, रात कट जाए तो सवेरा हो । यह रात मन बोझ बनती जा रही है। जैसे एक पहाड़ किसी ने मेरे वजूद पर पटक दिया हो।

प्याले में मय तड़फ़ती है, लबों तक आने के लिए बेताब। डूबो देना चाहता हूँ अपने को। लेकिन इस प्याले में नहीं, दरिया में, दरिया जो इंतजार कर रहा है मेरा।

पनघट तक न पहुंच पाया तो कोई बात नहीं। प्यास तो कभी बुझेगी। रात इतनी काली क्यों है? शायद यह एक इम्तिहान है। इम्तिहान कितने भी हों, पर तेरे पथ पर पथिक चलता ही रहेगा। किसी न किसी चौराहे पर मुलाकात तय है।
 

इश्क है दरिया प्यार का ,वा की उलटी धार।
जो उबरा सो डूब गया,और जो डूबा सो पार॥


शनिवार, 22 जनवरी 2011

नाटक से दूरदशन का सफ़र, रंग शिल्पी का अयोजन

नयी फ़िल्में मैने गिनती की देखी हैं। दूरदर्शन पर आने वाली बिना टिकट की फ़िल्म प्रति रविवार श्रद्धा भाव से देखी थी।

जब 1973-74 में टीवी आया गाँव के स्कूल में तो रविवार को शाम 4 बजे से ही अपना बोरा सामने में बिछाकर बैठ जाते थे।

उसके बाद गाँव में नाटक और नौटंकी वालों का भी डेरा लगता था। वहाँ भी जाते थे देखने। इस तरह नाटकों से लगाव रहा है बचपन से।

अब भी कहीं नाटक के मंचन के जानकारी मिल जाती है तो अवश्य ही चला जाता हूँ एक दर्शक की हैसियत से। मित्र बालकृष्ण अय्यर नाटकों  के कुशल चितेरे हैं। नामारुप वर्ष भर कुछ न कुछ प्रयोग और लीलाएं होते रहती हैं। नाटकों का मंचन भी।

कुछ माह पूर्व श्री बालकृष्ण अय्यर ने मुझे बताया था कि “रंगशिल्पी” नामक संस्था का निर्माण किया जा रहा है। बस इतनी ही चर्चा हुई थी।

उसके पश्चात रंगशिल्पी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह का निमंत्रण ही प्राप्त हुआ। 7 से 9 जनवरी तक नेहरु हाऊस में नाटकों के द्वारा कलारंग बिखेरा गया।

7 जनवरी को व्यस्तता के कारण इस कार्यक्रम में नहीं पहुंच पाया पर 8 जनवरी को जाने का दृढ निश्चय कर लिया था।
अल्पना  भी बहुत दिनों से भिलाई जाने के लिए कह रही थी लेकिन संयोग 8 तारीख को ही बना। हम भिलाई पहुंच गए।

पाबला जी को फ़ोनियाए तो पता चला कि वे नागपुर जाने की तैयारी कर रहे हैं। संजीव तिवारी जी को फ़ोन लगाए तो वे ऑफ़िस कार्य में व्यस्त थे।

हमने दोपहर का खाना बालकृष्ण जी यहाँ ही खाया ।एक बार नेहरु हाऊस जाकर आ गए। वहाँ खाली कुर्सियाँ ही मिली। उनसे ही बतियाने लगे।

नेहरु हाऊस की कुर्सियाँ भी अब कुंठित हो गयी हैं। उन्होने बताया कि एक जमाना था कि यहाँ  फ़िल्मों का आयोजन होता था।

कुर्सियाँ कम पड़ जाती थी तो लोग खड़े-खड़े पूरी फ़िल्म देखते थे। यही हाल नाटकों का भी था। लोग दीवाने थे नाटकों के। नाटकों के मंचन के समय तो हाल छोटा पड़ जाता था।

अब तो कोई दर्शक आ जाते हैं तो सैकड़ों कुर्सियां लपक जाती हैं उनका स्वागत करने। ऐसी स्थिति में कुंठा अवसाद आ ही जाता है।

कुर्सियों की व्यथा सुनने के पश्चात संजीव तिवारी जी का फ़ोन आ गया। हम पहुंचे सिविक सेंटर के रेस्टोरेंट में। दोसा के साथ विचार विमर्श चला।

सांझ ढलने लगी। नाटक प्रदर्शन का समय हो चुका था। पुन: नेहरु हाऊस पहुंचे। प्रवेश द्वार पर ही शरद कोकास जी से भेंट हुई। क्या कहने उनके अंदाज के। बस यूँ कहिए की घायल होते होते बचे चाय की दुकान पर।

पता चला कि नागपुर की नाट्य संस्था द्वारा श्री उदय प्रकाश के नाटक “राम सजीवन की प्रेम कथा” का मंचन होना है। शरद भाई कहाँ चूकने वाले थे, सीधे उदय प्रकाश जी को ही फ़ोनिया दिए, पान ठेले पर ही फ़ोन वार्ता शुरु हो गयी।

उदय प्रकाश जी ने अपनी कहानी के मंचन पर सभी को शुभकामनाएं दी। हमे भी महान कथाकार से फ़ोनालाप करने का सौभाग्य मिला व्हाया शरद कोकास।

भीतर हाल में मंचन की तैयारी चल रही थी। कुर्सियाँ व्यग्र थी दर्शकों को गोद में बिठाने के लिए। एक-एक करके दर्शक आ रहे थे। कुर्सियों को खुश करने के लिए। हम सब चाय-पान करके पहुंच गए हॉल में। 

शरद भाई ने माईक संभाल लिया। रामसजीवन के दल के विषय में जानकारी दी और हमें (अल्पना जी और मुझे) मंच पर बुलवा लिया

कार्यक्रम का शुभारंभ करने के लिए। हमें भी शुभारंभ करने की जल्दी थी क्योंकि जितनी देर नाटक प्रारंभ होने में होगी उतनी देर से हम घर पहुंचेगें।

अल्पना जी ने रंग शिल्पी द्वारा आयोजित किए गए नाट्य समारोह के लिए शुभकामनाएं दी। हमने भी दो शब्द रंग में जोड़ दिए शिल्प के।

अब नाटक शुरु हो चुका था। मंच पर कलाकार एक-एक करके आते गए और मंच जमने लगा। कुर्सियाँ भी शांत चित्त थी। मुंह फ़ाड़े देख रही थी मंच की ओर।

रामसजीवन गाँव का लड़का था, शहर में उच्च शिक्षा ग्रहण करने आया था। गाँव से शहर आकर उसे शहरिया हवा लग जाती है।

गाँव में घुंघट वाली लजीली-शर्मीली लड़कियाँ देखी थी। लेकिन शहर में फ़र्राट जींस टॉप वाली देख कर घायल हो जाता है।

बस वह प्रेम नामक प्रेत बाधा से ग्रसित हो जाता है। हम भी सामने बैठे बैठे यह प्रेम कथा कहीं और घटित होते देख रहें हैं। चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। जिसे संजीव भाई पढ लेते हैं।

क्योंकि एक देहाती दूसरे देहाती की मुस्कान भी पहचान जाता है। हम दोनो तीसरे देहाती का दर्द समझ जाते हैं आखों में ही। लेकिन जुबां चुप रहती है। आंखे ही बोलती हैं।

कहानी आगे बढती है, रामसजीवन दिन में भी सपने देखते हुए चलता है। कमरे में पड़े-पड़े अकेले से बातें करता है। वह जींस टॉप वाली छलावा बनकर उसके सामने आते-जाते रहती है।

वह समझता है कि हकीकत में घट रहा है। वह मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है। हास्टल के वार्डन रामसजीवन की हालत देख कर उसे घर पहुंचा देते हैं।

रामसजीवन कुछ सालों बाद वहीं फ़िर वापस आता है। तब तक चिड़िया उड़ चुकी होती है। उसके साथी नौकरी लग चुके होते हैं।

लेकिन अधूरी प्रेम कहानी रामसजीवन को कहीं का नहीं छोड़ती। इस तरह एक देहाती के निश्छल प्रेम की वाट लग जाती है।

मुझे एक हरियाणी फ़िल्म चंद्रावल का एक गीत याद आता है – “ परदेशी की प्रीत की रे कोई मत ना करियो होड़, बनजारे की याद यूँ भाई गया सुलगती छोड़”। अब रामसजीवन सुलगते रहता है। पर्दा गिर जाता है।

हम भी भाई बालकृष्ण से घर जाने की इजाजत लेते हैं। लेकिन वे हमें रोकना चाहते थे। रुकने का सब इंतजाम कर रखा था।

हमारी कुछ मजबूरियाँ थी। नाटक के शुरु होते ही उन्होने सारे गेट बंद करा दिए थे कि कोई दर्शक भाग न जाए।

हमें बड़ी मुश्किल से उन्होने घर जाने की इजाजत दी वह भी इस शर्त पर कि हम दुबारा आएंगे। सबसे बड़ी खुशी की बात यह रही कि अब नाटकों में नई पीढी भी रुचि लेने लगी है।

नाटकों मंचन जारी रहेगा। राष्ट्रीय स्तर पर नाट्य समारोह के सफ़ल आयोजन पर मैं रंग शिल्पी परिवार को साधुवाद देता हूँ।

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

छत्तीसगढ में खुले आम लूट, मुद्राराक्षसों की पौ बारह

जब से छत्तीसगढ राज्य का निर्माण हुआ है तब मुद्राराक्षसों की पौ बारह हो गयी है। दुनिया भर के धन पशुओं ने प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर इस प्रांत की ओर रुख कर लिया। 

जो भी आता है वह यहाँ जमीन खरीदना चाहता है। देखते ही देखते जमीन के दलालों की एक बड़ी फ़ौज तैयार हो गयी।

किसानों की जमीनें खरीदी जाने लगी। साम-दाम एवं प्रलोभन देकर किसानों की जमीन हथियाई जाने लगी। आज हालात यह हैं कि राजधानी के आस-पास खेती पर विराम लग गया है। जहाँ चारों ओर धान की फ़सल लहलहाती थी वहाँ बड़ी बिल्डिंग दिखाई देती है या बंजर धरती। 

कहते हैं जहाँ विकास आता है अपने साथ विनाश भी लेकर आता है, चाहे सामाजिक हो या सांस्कृतिक विनाश हो। ऐसा ही कुछ राजधानी में हो रहा है।

लोग जमीन बेच कर वह सारी सुविधाएं और बुराइयाँ खरीद लेना चाहते हैं जो कि एक मुद्रा राक्षस के पास होती हैं। भले ही उसका मजा क्षणिक हो और हानि दीर्घकालिक हो।

किसान का परिवार अपने खेत किसी बिल्डर या भू माफ़िया को बेचकर वह सब कर लेना चाहता है जो उसने फ़िल्मों में देखा था या किसी बड़े आदमी के यहाँ पाया। इसका परिणाम अब परिलक्षित होने लगा है।

रुपया दिखने पर युवा अपने माँ-बाप की भी नहीं सुनते। उन्हे अय्याशी की मरीचिका दिखाई देने लगती है। खाओ पीयो और मौज करो वाली प्रवृत्ति बढते जा रही है।

खेत बेचकर मिले रुपयों से सबसे पहले मोबाईल, मोटर सायकिल खरीदा जाता है। उसके बाद खर्च करने लिए पैसों की जरुरत पड़े तो प्राप्त करने के लिए एटीएम।

एक घर में यदि 4 लड़के हैं तो चारों के पास मोटर सायकिल होनी चाहिए। सायकिल के दर्शन तो कुछ दिनों में दुर्लभ हो जाएंगे। इसके बाद एटीएम से पैसा निकालो और नव धनाढ्यों की तरह ऐश करो।

इसका दुष्परिणाम यह हुआ की एक पीढी ही पूरी नकारा होते दिख रही है। एक समय तो मैने ऐसा देखा कि गाँवों के प्रत्येक घर में जमीन दलाल पैदा हो गए थे। जिसको देखो वही जमीन का सौदागर बना फ़िर रहा था,छत्तीसगढ को अपने ही लूट रहे हैं दोनो हाथों से। 

जिसने कभी हजार रुपए नहीं देखे हों और उसे करोड़ों मिल जाए तो उसमें उन्माद पैदा हो जाता है, जिसे वह संभाल नहीं सकता। इसे हमारी स्थानीय भाषा में “धन बइहा” (अकस्मात मिले धन से बौराया हुआ) कहते हैं।

कई तो धन बइहा हुए घूम रहे हैं। हमारे गाँव में एक घर में यहाँ शाम को 4 बजे करीब एक व्यक्ति पहुंचा। घर में सिर्फ़ बच्चे थे। उसने लड़के को बुलाकर दस हजार रुपए दिए और कहा कि ये तेरे पिताजी की तनखा है।

लड़के ने रुपए रख लिए और वह आदमी चला गया। उसके जाते ही घर मालिक पहुंचे। तो लड़के ने रुपए दिए और उस आदमी का जिक्र किया।  वे भौंचक रह गए। मैने तो किसी को रुपए दिए नहीं, वो आदमी कौन था और ऐसा क्यों किया?

अज्ञात आशंका से कुछ लोगों के साथ उसकी तलाश शुरु की गयी। ढूंढते-ढूंढते 10 किलो मीटर दूर एक गाँव में वह मिला। लड़के ने उसे पहचान लिया। जब उससे रुपयों के विषय में पूछा गया तो उसने साफ़ इंकार कर दिया कि उसने किसी को रुपए दिए हैं।

उस गांव के सरपंच को  बुलाया गया और इन लोगों ने रुपए उसके सुपुर्द कर दिए कि गाँव के विकास में कहीं खर्च कर देना। उस आदमी के विषय में जानकारी मिली कि उसने करोड़ों रुपए की जमीन बेची है। इसलिए धन बइहा हो गया है। अगर कोई लड़का चना-चबेना के लिए भी पैसे मांगता है तो 500 का नोट थमा देता है।

मेरा रायपुर जाना लगभग प्रतिदिन ही हो जाता है। कई बार मैने एक इंडिका कार में एक लड़के को सामने सीट पर बैठकर डेशबोर्ड पर पैर रखे आते देखा। ड्रायवर गाड़ी चलाता और वह सामने सीट पर बैठता। उसकी गाड़ी मुझे अक्सर दारु के ठेके के आस-पास ही मिलती थी।

एक दिन मैने गाँव वालों से पूछा तो उन्होने बताया कि इस लड़के ने बाप के मरने के बाद लाखों की जमीन बेची है। उससे एक इंडिका कार, एक ट्रेक्टर और दो होन्डा मोटर सायकिल खरीदी। एक ड्रायवर रखा है और बाकी गाड़ी घर में खड़ी जंग खा रही है।

दो साल से इसका यही काम है, इंडिका में सिर्फ़ दारु पीने देशी ठेके तक आता है, दिन में चार-पांच बार। कुछ दिन पहले पता चला कि बीमार है। इस तरह के उदाहरण गाँव-गाँव में मिल जाएगें।

इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम अपराध एवं वाहन दुर्घटना के रुप में सामने आया है। इसका शिकार सबसे ज्यादा नवयुवक ही हो रहे हैं। जो कि बाईक दुर्घटना से असमय काल के गाल में समा रहे हैं।

रायपुर से अभनपुर हाईवे पर औसतन प्रतिदिन 3 दुर्घटनाएं होती हैं जिसमें से अनुमानित एक मौत तो मान ही लेते हैं। यह आंकड़ा तो महज बीस किलो मीटर का है।

राजधानी बनने के बाद तो गाड़ियों की बाढ आ गयी है। परिवहन विभाग के सुत्रों के अनुसार रायपुर जिले में 6लाख 68 हजार गाड़ियाँ पंजीकृत हैं। लेकिन लायसेंस कितनों के पास है इसकी जानकारी जानकारी नहीं है। बिना किसी प्रशिक्षण के वाहन लेकर हाईवे पर निकल जाते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

घर में बुढी आखें पथराई बाट जोहते रहती है। जिन्दा जाता है और मुर्दा घर लौटता है। युवाओं की अकाल मृत्यु के कारण गावों में विधवाओं की संख्या में वृद्धि हुई है।

धन अपने साथ बुराई भी लेकर आता है, फ़लस्वरुप रायपुर में (खास कर राजधानी के चारों तरफ़ )अपराधों में वृद्धि हुई है। सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। यही स्थिति रही तो मैदानी इलाके में खेती की जमीन नहीं रहेगी। धान का कटोरा रीता रह जाएगा।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता अनाज उपजाने की है। बिना अनाज के पेट की भूख रुपए खाने से नहीं मिट सकती। भूख मिटाने के लिए अन्न की आवश्यकता ही पड़ेगी। कल कारखानों में अनाज नहीं उपजाया जा सकता। साथ ही नव युवकों को सही दिशा देने की। नवयुवकों की जान और खेती के प्राण बचाने के लिए कदम उठाने ही पड़ेगें। अन्यथा देर हो जाएगी।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के दस्तावेज उपन्यास को प्रकाशन का इंतजार

इंतजार की सीमा क्या हो सकती है? जीवन पर्यंत देहावसान तक या उसके पश्चात भी? कभी-कभी इंतजार की घड़ियाँ लम्बी हो जाती हैं और अंतिम यात्रा के पश्चात भी चलते रहती हैं। ऐसा ही कुछ एक उपन्यास के साथ हुआ।

इस उपन्यास को मैने पढा। छत्तीसगढ अंचल की संस्कृति की अमिट छाप है इसमें। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन का प्रथम आंचलिक उपन्यास है पढते हुए लगता है कि मैं समय के उस काल खंड में पहुंच गया हूँ।

सन् 1965 में लिखे गए इस उपन्यास का नाम है “धान के देश में”। इसकी भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी ने लिखी थी। लेकिन यह उपन्यास काल की गर्त में दब गया। प्रकाशित न हो सका।

धान के देश की भूमिका में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि “हरिप्रसाद अवधिया जी की रचनाओं से मैं पहले ही परिचित हो चुका था यद्यपि मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य तब हुआ जब मैं महाकोशल में काम करता था।

उनका जन्म स्थान रायपुर है। सन् 1918 में उनका जन्म हुआ था। सत्रह वर्ष की अवस्था से ही वे कहानियाँ लिखने लगे। उनकी 'नौ पैसे' शीर्षक कहानी पहली रचना है। वह इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'नई कहानियाँ' नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वे आज तक बराबर लिखते जाते हैं। उनकी रचनायें 'सरस्वती', 'माधुरी', 'विशाल भारत', 'नव भारत' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुई हैं। सन् 1948 में वे एम.ए. हुये और साहित्य के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अवतीर्ण हुये।

जब मैंने उनकी रचनायें पढ़ीं तब मैंने उन्हें उपन्यास लिखने के लिये कहा। सच तो यह है कि उस समय जो भी तरुण साहित्यकार मेरे पास आते थे, उन सभी को मैं उपन्यास लिखने के लिये प्रेरित करता था।

लमनहर चौहान जी ने मुझको अपना एक उपन्यास दिखलाया। उस छोटी अवस्था में भी उनका रचना-कौशल देखकर मैं विस्मित हो गया।

विश्वेन्द्र ठाकुर और परमार जी कहानियाँ लिखा करते थे। उनसे भी मैंने छत्तीसगढ़ के जन-जीवन को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने "धान के देश में" नाम देकर पहली बार उपन्यास की रचना की है।

उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते।

मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरात्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।“

एक अर्ध शताब्दी भी बीत गयी लेकिन “धान के देश में” की सुध लेने कोई नहीं आया। सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूस लेखकों ने शासकीय अनुदान से अपनी घटिया से घटिया रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवा लिया।

लेकिन जो इस दुनिया से चला गया है उसकी सुध कौन ले? धान के देश में नामक उपन्यास अपने प्रकाशन की बाट आज भी जोह रहा है। इकबाल का एक शेर याद आता है मुझे-

हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुस्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

मेरे धान के देश में उपन्यास का जिक्र करने का कारण यही है कि कोई संस्था व्यक्ति या शासन अगर इस महत्वपूर्ण उपन्यास को प्रकाशित करना चाहता है तो उसे इसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध कराई जा सकती है।

जिससे यह उपन्यास अपने काल खंड की अंधेरी कोठरियों से निकल कर प्रकाशित हो और उपन्यासकार स्व: हरिप्रसाद अवधिया जी का उपन्यास प्रकाशन का इंतजार मरणोपरांत समाप्त हो सकें।

बुधवार, 19 जनवरी 2011

पैमाना लबालब न भरा हो तो कैसी तृप्ति?

“मन लागो मेरो यार फ़कीरी में” – फ़कीरी का आनंद अलमस्ती में है। शाम के धुंधलके में एक-एक कर प्रकाशित होती दीप मालिकाएं तम हरण की भरपूर कोशिश में है।

कार में बजता हुआ स्टिरियो ले जा रहा है मुझे फ़कीरी की ओर। शब्द–शब्द अंतर पर चोट कर रहे हैं। बस मैं हूँ और तू है। दूसरा कोई नहीं।

कबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। बाहर जो बज रहा है वह अनहद बन कर अंतर में भी बज उठा होगा। अंतर भी बज उठा होगा। अनहद नाद के साथ हजारों दीपों का सूर्य सा प्रकाश अंतर को आलोकित कर गया होगा। कुछ ऐसी ही अनुभूति होने लगी। 

तेरे साथ बिताए कुछ पलों का स्मरण आते ही। गर्दन पर झुरझुरी होने लगती है। एक थरथराहट के साथ गर्दन को झटकाता हूँ। सामने से आती वाहनों की हेड लाईटें सुहाती नहीं हैं। जैसे पार्क के किसी कोने में बैठे होने पर जनता हवलदार डंडा हाथ में लिए आते दिखाई देता है।

ध्यान भंग होने लगता है। आनंद के सागर में गोते लगाते हुए एक कड़ुवाहट सी मुंह में आ जाती है। इन वाहनों में हेड लाईटें क्यों हैं? बिना लाईट के वाहन क्यों नहीं चलते? क्यों न मैं अपनी कार की हेड लाईटें बंद कर लूँ?

अंधेरा सुहाना लगता है तो कभी डरावना भी। किसी से टक्कर हो सकती है? लेकिन लाईटें क्यों बंद हों? वे तो अंधेरे के विरुद्ध लड़ाई में सैनिक सी डटी हैं। अंधेरा दूर करने का संकल्प जो किया है।

बाहरी दुनिया को देखने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। हम अंधेरे में भी देखना चाहते हैं प्रकृति के विरुद्ध। अंधेरा होना भी आवश्यक है। अंधेरा न होगा तो प्रकाश का मोल कौन समझेगा?

दु:ख न होगा तो आनंद उत्सव का मोल कौन समझेगा? अंधेरे की दुनिया भी अलग ही है। जो प्रकाश में नहीं मिल पाता वो अंधेरे में मिल जाता है।

खुली आँखें होते हुए भी हम देख नहीं पाते। जब आँखें बंद करते हैं तो सब कुछ दिख जाता है। एक चलचित्र सा चलता हुआ। भूत-भविष्य और वर्तमान। जहाँ खुली आँखों से पहुंचना संभव नहीं। वहाँ हम बंद आँखों से घूम आते हैं। कितना विस्मयकारी है। बंद आँखों से देखना।

प्रकृति के विरुद्ध भी हम चलना चाहते हैं। हमारी फ़ितरत है यह। हम अपने आपको सर्वशक्तिमान समझते हैं। हमारी मेधा के आगे सब बौने हैं। लेकिन कभी उस ओर भी झांकने की कोशिश की?

जहाँ से मेधा आई है। नहीं, गदह पचीसी से अवकाश मिले तब न। प्रकृति से बड़ा कोई नहीं। उसे हमारी छेड़ छाड़ पसंद नहीं है। हम अपने कबीले का कानून बना लेते हैं और उसके सहारे दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं।

 बस यहीं मुंह की खा जाते हैं। जिस सर्वशक्तिमान प्रकृति के कानूनों के आगे किसी भी कबीले का कानून नहीं चलता। वह बौना है इसके सामने। आनंद में यही बाधा है, हम प्रकृति को अपने अनुरुप चलाना चाहते हैं।

शाम ढलने लगती है। सोचता हूँ कि वह बाट देख रही होगी।  आज न मिलुं तो कैसा रहेगा? कल ही तो मिला था। प्रतिदिन की मुलाकातें आनंद में बाधा है।

व्यग्रता न हो मिलन की, अधीरता न हो, तो कैसा प्रेमानंद? बाट तो देखना ही है। पैमाना लबालब न भरा हो तो कैसी मयकशी? कैसी तृप्ति?

सुरुर का अहसास रग रग में समाने लगा। रोम-रोम पुलकित होने लगा । आनंद का सागर हिलोरें लेता है। मांझी की नाव अंधेरे में उफ़नती हुई लहरों के बीच डूबती-उतराती पार जाना चाहती है। पार तो लगना ही है उसे एक दिन। मझधार में डूबने वालों को कौन याद रखता है?

मेड़ में छिपी बैठी फ़न फ़ैलाए काली नागिन उन्मत्त होकर लहरानी लगी। उन्मुक्त हो गयी  है अंधेरे में।कितना सौंदर्य है उसके बलखाने में? एक जोड़ी आँखे उसे ताक रही हैं। हाथ बढाते ही फ़ुफ़कार एक झपट्टा मारा उसने। मैने हाथ पीछे खींच लिया। बहुत सारा विष धरा पर फ़न मारते वमन किया उसने।

लेकिन आज मैं भी आर-पार की हद तक पहुंचना चाहता हूँ, विष को रगों में बहते हुए देखना चाहता हूँ। मेरी नजर चूकते ही, लिपट गयी वह देह से, ढेर सारा विष उसने उड़ेल दिया, मेरी रगों में बहने लगा। बेसुधी आने लगी, विषाक्त होकर भी आनंद आने लगा। विषाक्त होकर भी आनंदित होना पराकाष्ठा है।

प्रकृति ने विष दिया तो जीवनामृत भी। सूर्योदय होने लगा। क्षितिज पर लालिमा दिखाई देने  लगी। सुध आई तो नागिन बेसुध पड़ी थी। विष कोष रिक्त जो हो गया था।

मैं अपनी विषाक्त देह लिए चल पड़ा था कि फ़िर कभी नहीं आना है इस ओर। रमे रहना है फ़कीरी में, वही जीवन का शास्वत सत्य है। यही जीवन का शास्वत सत्य है। "तेरे ईश्क नचाया,करके थैया थैया"

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

देख लूँ तो चलूँ: पुस्तक समीक्षा

उत्तिष्ठ! जागृत चरैवेति चरैवेति! प्राप्निबोधत। उठो जागो और चलते रहो, उन्हे प्राप्त करो जो तुम्हारा मार्ग दर्शन कर सकते हैं। कहा गया है कि जीवन चलने का नाम है,चलती का नाम गाड़ी है, चलते-चलते ही अनुभव होते हैं, चलते रहना एक जीवित होने का प्रमाण है।  

हर जाना समाप्त हो जाना है। मार्ग में हम कुछ देर रुक सकते हैं, आराम कर सकते हैं, अपने आस पास को निहार सकते हैं उसका जायजा ले सकते हैं।

सुंदर दृश्यों को अपनी आँखों में भर सकते हैं जिससे वे मस्तिष्क के स्मृति आगार में स्थाई हो सके। एक यायावर जीवन भर चलते रहता है, चलते चलते ही सत्य को पा जाता है -
“ये भी देखो वो भी देखो, देखत-देखत इतना देखो, मिट जाए धोखा, रह जाए एको” 

दुनिया को जानने एवं अपने को पाने के लिए यात्रा जरुरी है, भ्रमण जरुरी है।

भ्रमण बुद्धू भी करता है और बुद्ध भी करता है। वैसे भी भ्रमण शब्द में भ्रम प्रथमत: आता है। बुद्धू भ्रमित तो पहले से ही है, भ्रमण करते हुए उसका भ्रम और भी बढ जाता है। वह सत्यासत्य निर्णय नहीं कर पाता, बुरा-भला में अंतर नहीं कर पाता। लेकिन बुद्ध के भ्रमण करने से उसकी सत्यासत्य के निर्णय करने की क्षमता बढती है। बुद्ध को यदि कोई भ्रम रहा हो तो वह भी भ्रमण से नष्ट हो जाता है। उसका भ्रम दूर हो जाता है, बुद्ध की बुद्धि निर्मल हो जाती है। बुद्धि या विवेक का निर्मल हो जाना ही जीवन का सार है। वह पहुंच जाता है यार के निकट, जिसकी खोज में आज तक के मुनि भटकते रहे हैं, यायावर भटकते रहे हैं।

समीर लाल "समीर" की पुस्तक” देख लूँ तो चलूँ” मुझे प्राप्त हुई। तो मैने भी सोचा देख लूँ तो चलूँ। देखने लगा, उसके पन्नों की सैर करने लगा तो किस्सागोई शैली में रचित इस पुस्तक को पूरा पढ कर ही उठा। एक प्रवाह है लेखन में जो आपको दूर तक बहा ले जाता है। सहसा जब घाट पर नाव लगती है तो एक झटके से ज्ञात होता है अब किनारे आ पहुंचे। बैक मिरर में सिगरेट पीती महिला और उसकी उम्र का सटीक अंदाजा लगाना कार ड्राईव करते हुए, गजब का अंदाज है। अपने घर और वतन को छोड़ते हुए शनै शनै सब कुछ पीछे छूट जाना, इनके छूटने से असहज हो जाना एक प्रेमी की तरह। प्रियतम  पीछे छूट रहा है, फ़िर मिलेंगे वाली बात है।  

“कार अपनी गति से भाग रही है, माईलोमीटर पर नजर जाती है। 120 किलो मीटर प्रति घंटा। मैं आगे हूँ। रियर मिरर में देखता हूँ, वो पीली कार बहुत देर से मेरे पीछे चली आ रही है, दुरी उतनी ही बनी है।“ 

यही जीवन का संघर्ष है। समय के साथ चलना। अगर समय से ताल-मेल न बिठाएगें तो वह हमें बहुत पीछे छोड़ देगा। जीवन की आपा-धापी में अपना स्थान बनाए रखने के लिए कुछ अतिरिक्त उर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अगर अनवरत आगे रहना है तो गति बनाए रखना जरुरी है। यक्ष के प्रश्न की तरह अनेक प्रश्न उमड़ते-घुमड़ते हैं, जिनका उत्तर भी चलते-चलते ही मिलता है।

“अम्मा बताती थी मैं बचपन में भी मोहल्ले की किसी भी बरात में जाकर नाच देता था। बड़े होकर भी नाचने का सिलसिला तो आज भी जारी है।“ 

“नर्तकी” शब्द को उल्टा पढे तो “कीर्तन” होता है। जब तक चित्त में विमलता नहीं होगी, कीर्तन नहीं होगा। चित्त की विमलता से ही कीर्तन का भाव मन में प्रकट होता है। कीर्तन से ही मन का मयूर नाचता है। जब मन का मयूर नृत्य करता है आनंदोल्लास में, तो देह स्वत: नृत्य करने लगती है। लोग समझते हैं कि वह नाच रहा है। वह नाच नहीं रहा है, वह स्व के करीब पहुंच गया है। तभी नर्तन हो रहा है। नर्तन भी तभी होगा जब वह अपने अंतस की गहराईयों में उतर जाएगा मीरा की तरह। “पग घुंघरु बांध मीरा नाची थी हम नाचे बिन घुंघरु के।“ बस यही विमल भाव जीवन भर ठहर जाएं, बस यूँ ही नर्तन होते रहे जीवन में। बिन घुंघरु के नृत्य होगा, अनहद बाजा बजेगा। रोकना नहीं कदमों को थिरकने से। प्रकृति भी नृत्य कर रही है, उसके साथ कदम से कदम मिलाना है। अपने को जान लेना ही नर्तन है।

“देख लूँ तो चलूँ” पढने पर मुझे इस में आध्यात्म ही नजर आ रहा है। “आध्यात्म याने स्वयं को जानना।“ लेखक अपने को जानना चाहता है। प्रत्येक शब्द से आध्यात्म की ध्वनि निकल रही है। मंथन हो रहा है। मंथन से ही सुधा वर्षण होगा।

दादू महाराज कहते हैं –
“घीव दूध में रम रहया, व्यापक सबही ठौर
दादू वक्ता बहुत हैं, मथ काढे ते और।
दीया का गुण तेल है राखै मोटी बात।
दीया जग में चांदणा, दीया चाले साथ।“

बस कुछ ऐसा ही मंथन मुझे “देख लूँ तो चलूँ” में दृष्टिगोचर होता है। दीया ही साथ चलता है। साहिर का एक शेर प्रासंगिक है –
दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में,
जो कुछ मुझे दिया वह लौटा रहा हूँ मैं।

समीर लाल "समीर" भी यही कर कर रहे हैं। दुनिया से मिले अनुभव को दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। साधु भाव है। मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ लेकिन “देख लूँ तो चलूँ” को पढकर जो भाव मेरे मन में सृजित हुए उन्हे शब्दों का रुप दे दिया। इस पुस्तक को दो-बार,चार बार फ़िर पढुंगा और मंथन करने के पश्चात जो नवनीत निकलेगा उसे आप तक पहुंचाने का प्रयास करुंगा। समीर लाल "समीर" को पुस्तक के विमोचन पर हार्दिक शुभकामनाएं। सफ़र यूँ ही जारी रहे।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

समीर लाल आ रहे हैं रायपुर


भाषायी एकता और समरसता के लिए छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के 'हम भारतीय अभियान' की शुरुआत छत्तीसगढ़ में रायपुर से 16 जनवरी को हो रही है, जहां गांधी जी ने बैठक ली थी की।

इस अभियान के अंतर्गत भाषा, संस्कृति और साहित्य के भारतीय-प्रतिमानों को पुन: स्थापित करना है । इस अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है

जिसका शीर्षक है - सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता ।संगोष्ठी में भाषाविद्, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी के अलावा समाज-सेवी और आमजन भी शिरकत करेंगे । इस विषय पर मुख्य वक्ता होंगे-देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार-हिंदी सेवी श्री कैलाशचन्द्र पंत।

साथ ही श्री पंत के 75 वें जन्मदिवस पर छत्तीसगढ़ की ओर से उनका सम्मान भी करेंगे। इस अवसर पर शीर्ष ब्लॉगर समीर लाल (उड़न तश्तरी) भी उपस्थित रहेंगे। समीर लाल 16 जनवरी को सुबह 7 बजे अमरकंटक एक्सप्रेस से रायपुर पहुंचेगें।

छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के प्रांतीय अध्यक्ष गिरीश पंकज एवं मंत्री-संचालक डॉ. सुधीर शर्मा ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि गांधी भवन, जैतूसाव मठ मंदिर पुरानी बस्ती में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रात. 11 बजे से संगोष्ठी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता विषय पर श्री कैलाशचंद्र पंत मुख्य वक्तव्य देंगे ।

समारोह के विशिष्ट अतिथि ख्यातिलब्ध साहित्यकार श्री रमेश दवे होंगे । इस विषय पर वक्तागण बसंत कुमार तिवारी, श्री विश्वरंजन, रमेश नैयर, सुशील त्रिवेदी, सुश्री आशा शुक्ला भोपाल होंगे । दोपहर 12 बजे से आयोजित अमृत महोत्सव में छत्तीसगढ़ के 21 साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा कैलाशचंद्र पंत जी का सम्मान किया जाएग।

अपराह्न 3 बजे से "हम भारतीय सम्मेलन" होगा जिसमें विभिन्न रचनाकारों की बीस पुस्तकों का लोकार्पण भी होगा ।इस सम्मेलन की अध्यक्षता कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशी अध्यक्षता करेंगे ।

कनाडा से पधारे शीर्षस्थ ब्लॉगर समीर लाल एवं छत्तीसगढ के लोकप्रिय ब्लॉगर ललित शर्मा जी का सम्मान किया जाएगा। पदमश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे, शिक्षाविद श्री एस के जैन, श्री उमेश उपाध्याय आदि अपने विचार व्यक्त करेंगे ।सभी ब्लॉगर बंधुओं से निवेदन है कि कार्यक्रम में उपस्थित होकर उड़न तश्तरी सानिध्य का लाभ उठाएं।

लखपति से मुलाकात,राम झरना की सैर

एक गीत सुना था 'जाना था जापान पहुंच गए चीन, समझ गए ना' कुछ ऐसा भी हमारे साथ भी घटित होता है, हम गए थे पारीवारिक कार्य से खरसिया और पहुंच गए राम झरना।

सक्ती, खरसिया होते हुए रायगढ बहुत बार जाना हुआ है कार से लेकिन रास्ते में सिंघनपुर की गुफ़ाएं भी हैं। इसका कभी भान नहीं रहा।

खरसिया और रायगढ के मध्य में मांड नदी के पार सिंघनपुर आता है। सामने एक विशाल पर्वत दिखाई देता है और उसी में हैं सिंघनपुर की गुफ़ाएं जहाँ आदिम शैल चित्र हैं।

जिसकी खोज एन्डरसन द्वारा 1910 ईं के लगभग की गयी थी। जिसकी तिथि लगभग ईसापूर्व ३० हज़ार वर्ष निर्धारित की है।इंडिया पेंटिग्स १९१८ में तथा इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटेनिका के १३वें अंक में रायगढ़ जिले के सिंघनपुर के शैलचित्रों का प्रकाशन पहली बार हुआ था। 

कुछ वर्षों पूर्व इन गुफ़ाओं में शैलचित्रों को देखने गए एक डॉक्टर सैलानी की मृत्यु मधुमक्खी के हमले से हुई थी। तब सिंघनपुर एक बार सुर्खियों में आया था।

इस जगह को देखने की तमन्ना मेरी वर्षों से थी जो इस यात्रा में भी पूरी नहीं हुई। खरसिया पहुंचने पर हमारे भतीजी जंवाई (आनंद बाबु) ने कहा कि वापसी के लिए ट्रेन आने में विलंब हैं तब तक नजदीक ही राम झरना देख कर आते हैं अच्छी जगह।

इस तरह कहीं घूमने के आग्रह को मैं कभी टाल नहीं सकता। यदि मुझे किसी अन्य आवश्यक कार्य को भी छोड़ना पड़े तो सैर के लिए उसे भी त्याग सकता हूँ। मैने तुरंत हां कर दी और कार से भाई साहब (के सी शर्मा) के साथ चल पड़े राम-झरना की ओर।

खरसिया और रायगढ के बीच में मांड नदी पड़ती है। नजदीकि रेल्वे स्टेशन भूपदेवपुर है। नहर पाली के पास जिंदल ने मोनेट नाम से फ़ैक्टरी लगा रखी है।

पहाड़ियों के बीच स्पंज आयरन के अन्य कारखाने भी लगे हैं। गाड़ी में चलते-चलते मैने राम झरना के ऐतिहासिक महत्व के विषय में जानने की चेष्टा की।

लेकिन कुछ खास जानकारी प्राप्त नहीं हुई। अब सोचा कि वहीं चल कर पता करेंगे। सामने पहाड़ी मोड़ पर पहुंचे तो सिंघनपुर का यात्री प्रतीक्षालय नजर आया।

अब मन में इच्छा हुई कि पहले सिंघनपुर ही चला जाए लेकिन आनंद बाबु ने बताया कि वहां जाने के लिए बहुत समय लगेगा। इसलिए सिंघनपुर जाने का इरादा त्याग दें तो अच्छा ही है और 4 बज रहे हैं, इतने कम समय में सिंघनपुर के से वापस नहीं सकते। हमने कहा फ़िर देखा जाएगा उसे।

थोड़ी ही देर बाद हम राम झरना के मुख्य द्वार पर थे। सड़क के किनारे से जंगल के बीच जाने लिए सुंदर दरवाजा बनाया गया है।

साथ ही दो मंदिर भी नजर आए। एक मंदिर गेंरु से पुता हुआ हनुमान जी का था। तभी वहां पर बहुत सारे लाल मुंह के बंद दिखाई दिए।

उसके साथ ही चेतावनी देता हुआ बोर्ड भी। जिस पर लिखा हुआ था कि बंदर को कोई भी खाने की वस्तु दें अन्यथा वे आपको घायल भी कर सकते हैं।

राम झरना के मुख्यद्वार पर टिकिट खिड़की है। जहां पर प्रवेश की दरें लिखी हुई हैं। एक कोने में बने टिकिट घर में फ़ारेस्ट के कर्मचारी लखपति पटेल बैठ कर टिकिट काट रहे हैं। लेकिन हमारे से उन्होने 30 रुपए लिए और टिकिट नहीं दी और द्वार उन्मुक्त कर दिया।

भीतर पहुंचने पर भी विभिन्न तरह के सूचना फ़लक लगाए हुए थे। जिसमें जानकारियाँ और आदेश लिखे हुए थे।

भीतर वन परिक्षेत्र में एक जगह हमें सिंघनपुर जाने के पहाड़ी रास्ते का इशारा करते हुए बोर्ड दिखाई दिया। लेकिन मन मसोस कर ही रह जाना पड़ा।

अगर सुबह पता चल जाता तो हम सिंघनपुर की गुफ़ाओं के चित्र आप तक अवश्य पहुंचाते। आगे चलने पर रेस्ट हाऊस दिखा जहाँ 250 रुपए में रुम बुक किया जाता है।

रुम बुक कराने के लिए वन विभाग के रेंजर से सम्पर्क करना पड़ेगा। फ़िर एक जगह चीतल होने की जानकारी मिली। कच्चे रास्ते के किनारे लोहे की बाड़ लगा रखी थी। बाड़ के भीतर हमें एक भी चीतल दिखाई नहीं दिया।  

आनंद बाबु ने बताया कि पहले बहुत सारे थे। लगता है कि धीरे-धीरे उन्हे उदरस्थ कर लिया गया। जंगल में कौन देख रहा है कि कितने चीतल गायब हो गए।

स्वीमिंग टैंक बनाया हुआ है। स्वीमिंग पुल को तरण पुष्कर का नाम दिया गया है। यहाँ जल किलोल करने का चार्ज 5 रुपया घंटा है साथ में ठन्डे पानी का आनंद मुफ़्त में लिया जा सकता है।

गर्मी के मौसम के लिए ठीक है। सर्दी के मौसम में तो 5 रुपए में कुल्फ़ी जम जाएगी। एकाध किलो मीटर चलने पर एक नाका फ़िर दिखाई दिया। एक खाखी वर्दीधारी गार्ड ने गाड़ी देखकर नाका खोला।

हम राम झरना के निकट पहुंचे तो वहां बहुत सारी गाड़ियाँ खड़ी दिखाई दे रही थी। अर्थात लोग पिकनिक रत थे। इस जंगल में एक बड़े तालाब जैसा भी है जिसे लोग झील कहते हैं।

आनंद बाबु ने बताया कि इस झील में एक बार आस-पास की 7 लड़कियाँ एक ही दिन डूब गयी थी। तब से लोग इस झील के किनारे कम ही जाते हैं।

राम झरना के विषय में किंवदन्ती है कि-"जब भगवान राम इधर आए तो सीता जी को प्यास लगी। सीता जी ने राम जी से कहा कि उन्हे प्यास लग रही है। तो राम जी ने इसी स्थान पर धरती में तीर मारा और जल धारा फ़ूट पड़ी सीता जी ने यहाँ अपनी प्यास बुझाई। तब से यहाँ पहाड़ी से पानी का झरना निकल रहा है।"

इस तरह जनमानस के आस्था के केन्द्र बना हुआ है राम झरना। लोग यहाँ पिकनिक मनाने आते हैं। जल का प्राकृतिक स्रोत राम झरना के नाम से प्रवाहित हो रहा है। जो यहाँ की भूमि को भी सिंचित कर रहा है। वन्य प्राणियों को भी जल उपलब्ध करवा रहा है।  

इस झरने पास बंदर बहुत ज्यादा हैं लगभग सैंकड़ों बंदर तो मैने देखे हैं जो अपनी करतूतों से सैलानियों को भयभीत कर रहे थे।

वन विभाग ने तो सैलानियों के देखने के लिए कई प्वाईंट चिन्हित कर रखे हैं। आप दिन भर का समय यहाँ वन में आराम से गुजार सकते हैं यह स्थान एक पिकनिक स्पॉट के रुप में स्थापित हो चुका है।

शुरुवाती प्रवेश द्वार पर ईको पार्क राम झरना का बोर्ड लगा है। अंदर आकर देखा तो लोग झरने के पास ही गंदगी फ़ैला रहे हैं।

वहीं खाना बना कर पत्तल इत्यादि फ़ेंक रहे हैं। पालीथिन जगह-जगह पड़ी हैं। कूड़ा-करकट ही सब तरफ़ फ़ैला हुआ है। समझदार कहाने वाले ही अधिक बेवकूफ़ी करते हैं।

भीतर एक व्यक्ति ने पान की दुकान लगा रखी है।  जिससे गुटखा के रैपर यत्र-तत्र फ़ैले हुए हैं। सुंदर प्राकृतिक रमणीय स्थान के चित्र को विकृत कर रहे थे।

बोर्ड भर लगा देने से यह ईको पार्क नहीं बनने वाला इसके लिए आने वाले सैलानियों को अपनी जिम्मेदारी समझ कर इसे साफ़ एवं स्वच्छ रखने का प्रयास करना पड़ेगा।

समयाभाव में हम सिंघनपुर नहीं जा सके। लेकिन हमारा प्रयास रहेगा कि आगामी यात्रा में सिंघनपुर अवश्य जाएगें। मुझे वहां पर एक लम्बी गुफ़ा के विषय में भी पता चला है जिसके ओर-छोर का पता नहीं है। कई लोग प्रयास कर चुके हैं भीतर जाकर लेकिन नाकाम रहे हैं। कभी वहाँ भी प्रकाश की व्यवस्था करके भीतर जाएगें नजारे देखने लिए। इस तरह हमने अल्प समय में राम-झरना देखने का आनंद लिया।