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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

टीम चायना गेट मिशन सुंदरबन पर : सुंदरबन यात्रा

सुबह मेरे उठने से पहले ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, प्रवीण सिंह, प्राण चड्डा जी रिसोर्ट के आस पास फ़ोटो खींचने चले गए। गाँव वालों ने बताया कि चार दिन पहले बाघ उनके गाँव तक आ गया था। कभी कभी बाघ बफ़र जोन में भी आ जाते हैं इसलिए गांव से दूर सावधानी के साथ जाना चाहिए। वैसे दूर जाने के मनाही भी है।  
तीन पहिया जुगाड़ में जेट्टी की ओर 
सुबह हम तैयार होकर सफ़ारी के लिए तीनगोड़िया फ़टफ़टिया में बैठकर जेट्टी की ओर चल पड़े। जेट्टी पर हमारा स्टीमर प्रतीक्षा कर रहा था। यह दो मंजिला बड़ा स्टीमर था, जिसमें शौचालय के साथ भोजन बनाने की सुविधा भी थी। सोमनाथ दा ने हमारा भोजन जेट्टी पर चढवा दिया साथ ही आरो वाटर की बोतलें भी। इस गाँव का पानी खारा होने के कारण सभी लोग आरो वाटर का प्रयोग करते हैं।
टीम चायना गेट :)
हर हर महादेव के उद्घोष के साथ हमारी सुंदरबन यात्रा प्रारंभ हो गई। हमारे साथ नबारुन दत्ता एवं उनकी पत्नी भी इस सफ़ारी में शामिल हो गए। यहाँ पर हम विद्याधरी नदी से समुद्र की ओर बढ रहे थे। विद्याधरी नदी का पाट बहुत चौड़ा है, इसमें पहुंचने के बाद यही समुद्र सा अहसास करवाती है। 
टीम चायना गेट मिशन पर 
सभी ने बोट में अपना स्थान ग्रहण कर लिया और कैमरा लेकर मुस्तैद हो गए, अभी तो सफ़र शुरु ही हुआ था। परन्तु लग रहा था कि पानी में बहुत दूर आ गए और अभी ही हम लोगों को बाघ दिख जाएगा। जबकि बाघ का कोसों दूर कोई पता नहीं था। प्राण चड्डा जी ने गाईड को कहा कि अगर वो बाघ दिखाएगा तो उसे पाँच सौ रुपए देंगे।
कमांडर ऑफ़ टीम चायना गेट प्राण चड्डा जी 
अचानक प्राण चड्डा जी का मन बोट ड्राइव करने का हो गया और काकपिट से पायलेट को बाहर निकाल खुद ही बोट उड़ाने लगे। खैर हम तो अनुभवी हैं इसलिए कोई खास अंतर नहीं पड़ा परन्तु बोट का असली पायलेट सदमे में आ गया क्या पता फ्लाइट के दौरान पायलेट को बाहर निकाल प्लेन उड़ाने लग जाएं तो सवारियों का क्या होगा? भले ही हमें सफ़ारी बाघ दिखे या न दिखे, परन्तु प्राण चड्डा जी ने बोट चला कर बाघ देखने के इतना रोमांचित तो जरुर कर दिया। जब सफ़र में साथ जिन्दादिल हों तो उसका मजा ही कुछ और है। 
समंदर में स्टीमर 
हम देखते हैं कि डेल्टा क्षेत्र में कई द्वीपों को मिलाकर सुंदरबन का निर्माण प्रकृति ने किया है। मैनग्रोव के वृक्षों से भरे ये द्वीप बंगाल टाइगर की आदर्श शरणस्थली बने हुए हैं। पानी में तैरकर शिकार करने वाले ये बाघ आदमखोर कहे जाते हैं एवं मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर हमला करने में भी नहीं चूकते। बड़ा शिकार न मिलने पर ये बाघ मत्स्य आखेटकर भक्षण करने में भी सिद्ध हैं। 
मैंग्रोव जंगल 
सबसे पहले हम सजनेखाली वाच टावर में उतरे। यहाँ तारघेरा लगाकर कुछ मगरमच्छ एवं गोहों (मानिटर लिजार्ड) को रखा गया है। इसके साथ ही एक छोटी सी प्रदर्शनी सुंदरबन के विषय में लगाई गई है। जिससे आने वाले को सुंदरबन की सम्पूर्ण जानकारी मिल सके। 
सजने खली वाच टॉवर 
बंगाल हैडीक्राफ़्ट का छोटा सा विक्रय केन्द्र भी है। मुझे यहां बहुत बड़ी गोह दिखाई दी। इतनी बड़ी गोह मैने नहीं देखी भी। हम लोगों ने कुछ फ़ोटो लिए और फ़िर लौटने का समय हो गया। जेट्टी पर हमारा स्टीमर लग चुका था। स्टीमर में सवार होकर हम आगे बढ गए।
मॉनिटर लिजार्ड - गोह 
सुंदरबन सफ़ारी के दौरान दूर सुनसान किनारे पर दलदल में एक धब्बा सा दिखाई दिया। पहचान में नहीं आ रहा था कि वह मनुष्य है या जानवर। मैने कैमरा जूम करके एक चित्र लिया तब तक बोट आगे बढ गयी और वह धब्बा आँखों से ओझल हो गया। खींची गई फ़ोटो देखने पर पता चला कि वह धब्बा सा एक महिला है। जो उकड़ू बैठकर केकड़े फ़ंसा रही है। 
केकड़े पकड़ती महिला मौत की आहट से बेखबर 
जिस वन में आदमखोर बाघ रहते हैं और वे कब हमला कर दें इसका पता नहीं वहां जान पर खेलकर केकेड़े पकड़ना बहादुरी का नहीं विवशता का कार्य है। इस अंचल के निवासियों का मुख्य व्यवसाय मछली, झींगे, केकड़े आदि पकड़ कर एवं शहद निकालकर जीवन निर्वहन है। आसपास के गाँव के मछुवारे ज्वार भाटे एवं मौसम का ध्यान रखते हुए अपनी नाव लेकर मछली पकड़ने निकल जाते हैं एवं बाघ का शिकार बनते हैं।
 यह भी एक अंदाज है कातिलाना 
गत वर्ष ही कैनिंग के समीप दत्ता झील के किनारे केकड़े पकड़ रहे एक मांझी पर बाघ हमला करके उसे खींच कर जंगल में गायब हो गया। उसके मांझी के साथियों ने बाघ का पीछा किया, लेकिन वह मांझी को अपने जबड़ों में दबाए जंगल में कहीं गायब हो गया एवं उसका शव तक बरामद नहीं हुआ। आखिर पेट की भूख प्राणों पर भारी पड़ ही जाती है परन्तु यह विवशता है कि इनके पास इसके अतिरिक्त जीवन निर्वाह करने के लिए अन्य कोई कार्य भी नहीं है। 
बंगाल का बाघ 
वैज्ञानिकों का मानना है कि पानी में खारे पानी की अधिकता के कारण मैन्ग्रोव की सुंदरी प्रजाति नष्ट होते जा रही है, जिसके कारण हिरणों की संख्या भी कम होने की आशंका जताई जा रही है। जहाँ हिरण कम होंगे तो वहां बाघों के लिए भोजन की समस्या प्रारंभ हो जाएगा और बाघों पर वैसे ही शिकारियों का खतरा मंडराता रहा है.
टाइग्रेस इन एक्शन : श्री दत्ता 
अब यह नई समस्या भी जन्म लेने लगी हैं। मानव एवं बाघ दोनों का बसेरा है सुंदरबन में। दोनों को एक दूसरे के अस्तित्व स्वीकार कर अपना निर्वहन करना है। फ़िर व्यक्ति कितनी भी चतुराई कर ले, जंगली जानवर का शिकार बन ही जाता है। न मानव जंगल छोड़ सकता न बाघ।  जारी है, आगे  पढ़ें  

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपने सुंदरवन की याद ताजा कर दी अबकी ठंड में फिर एक बार चलेंगे।

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  2. वाकई टीम चायना गेट लग रही है । सुंदरी मैंग्रोव की प्रजाती है या मैंग्रोव को ही हिंदी में सुंदरी कहा जाता है ?

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  3. टीम चाईना को प्रणाम।वैसे बाघ आपके सामने आने की हिम्मत अभी तक नही जुटा पाया।

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  4. सुंदरवन के अंदर भी मनुष्य रहते है, ये मालूम नही था।

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  5. आलेख पढ़ कर यात्रा के रोमांच का सहज आनंद लिया जा सकता है।

    शानदार एवं जीवंत प्रस्तुति....����

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  6. आलेख पढ़ कर यात्रा के रोमांच का सहज आनंद लिया जा सकता है।

    शानदार एवं जीवंत प्रस्तुति...

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  7. आलेख पढ़ कर यात्रा के रोमांच का सहज आनंद लिया जा सकता है।

    शानदार एवं जीवंत प्रस्तुति...

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  8. ये डेल्टा क्या होता है ? बचपन से पढ़ रही हूँ आज तक समझ नहीं आया 😊 क्या बाघ पानी में भी शिकार करता है ? रोमांचक यात्रा .. जारी रखो

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  9. केकडा पकडती महिला का फोटो देखकर अच्छा लगा। यह उसका रोजाना का कार्य होगा इसलिए बाघ, मगरमच्छ या कोई अन्य जानवर उस पर जब तक हमला नही करते तब तक वह अपने आप को सुरक्षित मानती होगी। उसका हर दिन ऐसा ही बीतता होगा।

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  10. कुछ तो मजबूरियां रही होंगी , कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता ! जीवन है , गुजारना होता है ! वो धब्बा जो आपको बाद में महिला दिखा , वो धब्बा पल भर में किसी बाघ का ग्रास बन चूका होता और उसकी मौत पर दो आंसू बहाना भी शायद ही किसी को स्वीकार होता ! खैर चाइना गेट टीम गज़ब उत्साह में लगी !!

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