Menu

मंगलवार, 31 मई 2011

साला! कोई बेवजह हमें गुर्राए और उसे हम छोड़ दें? कदापि नहीं !------ ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें  शाम को जब हम नूरपुर से धर्मशाला पहुंचे तो केवल ने पूछा कि-"आपने कभी मोमो खाया है? मैने कहा नहीं। तो वह बोला चलो आज मोमो खाते हैं। तिब्बतियन स्पेशल है। मैने कहा- "देख रे भाई! मोमो के चक्कर में कहीं अंट-शंट खा लिया तो मुझे 2 हजार किलो मीटर से भी अधिक की यात्रा करनी है और बस भी नहीं रुकती रास्ते में।" मोमो की दुकान में पहुंच गए। पता चला कि मोमो 2 तरह के बनते हैं। वेज और नानवेज। हमने वेज मोमो का आर्डर दिया। नानवेज का क्या भरोसा? मोमो लाते तक मैं उसके विषय में तस्दीक करते रहा कि कैसे बनता है और उसमें क्या मसाला डाला जाता है।

मोमो का आर्डर आ चुका था। कुछ-कुछ गुझिया जैसी आकृति थी और गर्म था। इसे गुझिया जैसे बेल कर हरी सब्जी का मसाला भर दिया जाता है और फ़िर भाप में पकाया जाता है। साथ में लालमिर्च और लहसुन की चटनी के साथ परोसा जाता है। स्वाद तो अच्छा लगा। लेकिन मैदा की चिंता सदा रही थी, कहीं परेशानी का कारण न बन जाए। मोमो यहाँ समोसे जैसे फ़ास्ट फ़ुड के रुप में प्रचलित है। जहाँ थोड़ी भूख लगी और मोमो खा लिए। तिब्बती अपने साथ अपनी पाक कला भी लेकर आए। जो परम्पराएं तिब्बत में थी, उन्ही परम्पराओं में अभी भी जी रहे हैं। अब मोमो बनाने का काम भारतीय लोग भी करने लगे हैं, बड़े बड़े रेस्टोरेंट खोल कर मोमो और तिब्बतियन फ़ुड बेच रहे हैं।

मैं और केवल 1 मई शाम से 7 मई शाम तक साथ ही रहे। कभी नहीं लगा कि किसी अलग कुनबे-कबीले से हैं। अंतरताना माध्यम बना हम दोनो के रुबरु होने का। हँस-मुख स्वभाव होने के कारण केवल मनमोहन हो जाता है और मैं ललित ही रहता हूँ। मैं आस-पास को अच्छी तरह परखता हूँ। प्राकृतिक सौंदर्य में रम जाता हूँ बाकी सब भूल कर। समस्याओं की गठरी सर पर धर कर नहीं चलता। जहाँ का सामान था वहीं छोड़ दिया और आगे बढ लिए। समस्याएं तो हर जगह पर मिल जाती हैं और चिंता करने का सबब जब चाहे तब। यही मेरी यायावरी है। लोग भ्रम में रहते हैं कि वे दुनिया को चला रहे हैं। लेकिन जो दुनिया को चला रहा है वह जानता है कि यह कैसे चल रही है।

केवल का रुम अच्छी जगह है। सामने धौलाधार की बर्फ़ से आच्छादित पहाड़ियाँ और चारों तरफ़ हरियाली। पास ही बड़ा सा खेल का मैदान और रुम के सामने तैनात मालिक-ए-मकान का झबरीला स्वान। पहले एक दो बार तो देख कर गुर्राया। फ़िर पहचान लिया कि कोई मेहमान है जो रोज सुबह जाता है और शाम-रात को वापिस आता है। एक दिन सुबह मकान वाली अंटी जी ने चेरी लाकर दी। रंग तो उनका बहुत सुंदर था। कटोरी में उन्हे धोया और एक चेरी मुंह में डाली तो उसका स्वाद बहुत ही खट्टा था। उसे खाना मेरे तो बस की बात नहीं थी। केवल के हवाले कर दिया। चेरी मीठी हो तो उसका स्वाद ही कुछ अलहदा होता है। लेकिन रंग तो गजब का ही होता है।

रोज सुबह उठने के लिए घड़ी में अलार्म भरने की जरुरत नहीं थी। केवल के रुम के साथ ही मुर्गियों का दड़बा था। उसमें 20-25 तगड़ी-तगड़ी मुर्गियाँ थी। वे बांग देना शुरु कर देती थी। फ़िर दोपहर में भी बांग देती थी। मैने पूछा कि-क्या इनके लिए दो बार सवेरा होता है। सुना है कि जब मुर्गियाँ बीमार होती हैं तो बासते रहती हैं। केवल ने बताया कि दोपहर में अन्डे देने के बाद भी बांग देती हैं। मतलब ईमानदारी से मालिक को सूचित करती हैं, अन्डे बाहर आ गए हैं, फ़िर मत कहना कि बताया नहीं। जानवरों एवं पक्षियों में ईमानदारी होती है। चचा की मुर्गियां जैसे ये मुर्गियां चतुर चालाक बेईमान नही थी। एक आदमी ही बेईमान है जिसकी ईमानदारी कब फ़ना हो जाए उसका पता ही नहीं चलता।

अन्डे देने के बाद मालकिन मुर्गियों को आजाद कर देती थी। उनके लिए आंगन मे दाने बिखेर देती थी और उधर अन्डों को उठा लेती थी। मुर्गियाँ भी मालिक को पहचानती हैं। केवल मुझे कई दिनों से चिकन के लिए कह रहा था। इसको वो मुर्गियाँ भी सुन रही थी। जब भी यह बाहर निकलता इसे देख कर गुर्राने लगती थी। मैं मना कर देता था, अभी तो घास-फ़ूस ही खाने का मन है। मुर्गियाँ भी खुश थी। एक दिन केवल ने फ़िर पूछ लिया सुबह-सुबह और मैने भी हाँ कर दी। बस फ़िर क्या था। वो लाल वाली मुर्गी, जो मुर्गियों की सरदार थी। क्रोधित होकर मेरी ओर जोर से गुर्राई और मेरे कैमरे मे कैद हो गयी। मैने उसे आश्वस्त किया कि माल तुम्हारे दबड़े से नहीं आएगा, निश्चिंत रहो। केवल मार्केट से ही लेकर आएगा।

शाम को लौटते समय सब सामान साथ था बिरयानी बनाने का। बटर, दही, मसाला, चावल, मैजिक मुव्हमेंट, सोडा चखना इत्यादि। बिरयानी बनाने लगे। घन्टा लग गया बिरयानी बनाने में। गिरीश दादा बोले-"हमारे लिए थोड़ी चैट बाक्स में ही डाल दीजिए।" कभी-कभी बचपना कर ही जाते हैं। अब पराठे बनाने का नम्बर था। मैने कई लेयर वाला पराठा बनाना बताया केवल को। बस फ़िर क्या था, केवल ने वैसे ही देशी घी में कई पराठे बना डाले। सुबह के नाश्ते में भी वही पराठे बनाए। बहुत दिनों के बाद पसंदीदा पराठे खाकर आनंद आ गया। सुबह हुयी तो फ़िर वही मुर्गी सामने आ गयी। देख कर गुर्राई। मैने केवल से कहा कि अब इसका भी इंतजाम करना पड़ेगा। साला! कोई बेवजह हमें गुर्राए और उसे हम छोड़ दें ,कदापि नहीं । यह बेइन्साफ़ी नहीं हो सकती। मुर्गी ने सुन लिया, समझ गयी कि परदेशी को बिला वजह गुर्राना ठीक नहीं है। वरना खतरा हो सकता है। पता नहीं कब आधी रात को काम तमाम हो जाए।

अन्डों का रेट भी बहुत बढ गया है। मैने तो सोचा भी नहीं था कि 30 रुपये दर्जन होगें। सुनकर बड़ा झटका लगा। जब मैं कॉलेज में पढता था तो 3 रुपए दर्जन थे। एक दर्जन से तीन दिन का काम चल जाता था। सुबह बेकमेंस की ब्रेड के साथ आमलेट का नास्ता काफ़ी होता था। कभी सब्जी के भी काम आ जाते थे। जब वर्जिस करते थे और 3 घंटे रोज व्हाली बॉल की प्रैक्टिस, तो 1 दर्जन अन्डो की नित्य की खुराक थी। शाम को जब खेल कर वापस आता तो गोवर्धन आमलेट बनाकर और उबाल कर तैयार रखता था। उसके बड़े ग्राहक हम ही थे। उसके बाद आज तक कभी खरीदने की नौबत ही नहीं आई। क्योंकि खाए ही नहीं। जब से पढा कि इसमें "सालमोनेला" एवं "डी डी टी" होता है जो शारीरिक नुकसान करता है।

7 मई शाम को 6 बजे मेरी बस थी दिल्ली के लिए, जो मुझे 6 बजे आई एस बी टी पहुंचा देती। फ़िर वहाँ से शाम 5/25 को मेरी ट्रेन रायपुर के लिए थी। मैने अविनाश जी को मोबाईल पर कहा कि रविवार है और समय भी है कहीं बैठ कर गपिया लेते। बोले ठीक है, मैं फ़ोन करता हूँ। मैने निजामुद्दीन वाले पंडित जी को भी फ़ोन किया। केवल ने मुझे आराम करने कहा और नाश्ता करके कालेज चला गया। मै जब घर से चला था तो लाहौल स्पिति जाने की सोच रखी थी। अजय से बात करने पर पता चला कि रोहतांग पास अभी खुला नही हैं। 80 फ़ीट बर्फ़ जमी है। बी आर ओ बर्फ़ काट रहा है अभी एकाध हफ़्ता और लग जायेगा। मेरी योजना पर तुषारापात हो चुका था। फ़िर तय किया कि जुलाई में पांगी घाटी और लाहुल दोनो जगह जाएगें और ब्लॉगिंग पर एक कार्यशाला वहीं करेंगे।

दोपहर तक नेट पर गपशप होते रही। कुछ मित्र नित्य का हाल चाल ले लेते थे और सुबह-शाम श्रीमति जी भी। सभी से सम्पर्क बना रहा। दोपहर आकर केवल ने खाना बनाया, मैने खाना खा कर मुर्गियों से विदा ली। लाल वाली मुर्गी ने भी संतोष की सांस ली कि अब खतरा टल गया। परदेशी चला गया। रास्ते हमारे छत्तीसगढिया बंधु लोग पुन: मिल गए, हम बस स्टैंड पहुंचे। अभी बस नही आई थी। केवल ने 11 नम्बर की सीट बुक करवा रखी थी। यह सीट बस की सबसे अच्छी सीट होती है। सीट देखकर ही आनंद आ गया। केवल ने आगे के मार्ग की जानकारी दे दी थी कि कहां खाना खाना है और कहाँ लघुशंका की जगह मिलेगी। बस आ गयी, हमने सीट संभाली। देखा तो वही काणा कंडेक्टर था जो जिसकी बस में हम दिल्ली से आए थे और वही बस थी।
केवल से विदा लेना भी कठिन था। वह बड़े ही भावुक मन का है। उसकी भावुकता को मैं समझ रहा था। तभी बस में एकतारा बजाने वाला लड़का आ गया। उसने धुन बजाई और मैने रिकार्ड कर लिया। बस चल पड़ी, केवल कचहरी के समीप उतरा। मैने भी भारी मन से उसे छोड़ा। एक हरियाणवी फ़िल्म का गाना याद आ रहा था-"परदेशी की प्रीत की रे, कोई मत न करियो होड़, बनजारे की आग यूँ भई, गया सुलगती छोड़"। कुछ ऐसा ही घट रहा था। धर्मशाला में बिताए 6 दिन जीवन की धरोहर बन गए। रात को 9 बजे बस ढलियारा पहुंची। यहीं खाने का इंतजाम था। सभी यात्रियों को खाना खिला कर बस चल पड़ी। रास्ते में निर्मला कपिला जी गाँव आया नंगल। काफ़ी बड़ा गाँव है। नंगल देखकर निर्मला जी याद किया। चलो घर न देखा तो कोई बात नहीं पिंड तो देख लिया। कभी रब ने चाहा तो वो भी देख लेंगे।

मेरी बगल वाली सीट पर एक तिब्बती प्रोफ़ेसर थे। उन्होने धर्मशाला में ही टी शर्ट और हाफ़ पैंट पहन ली थी। उन्होने बताया कि पहाड़ों से नीचे आने पर गर्मी बढ जाती है, इसलिए हाफ़ पैंट पहन ली। मैने कहा-दिल्ली पहुंचकर तो यह भी उतारनी पड़ेगी हा हा हा"। उनसे तिब्बती संस्कृति के विषय में मुझे बहुत कुछ जानने मिला। नंगल के बाद झपकी आने लगी, पैर फ़ैलाकर सो गया। उन्ना में बस रुकी तब आँख खुली। उसके बाद अगला स्टापेज चंडीगढ था। एक झपकी के बाद हम दिल्ली पहुंच चुके थे। बस ने आई.एस.बी.टी. उतार दिया। मैने निजामुद्दीन के लिए मुद्रिका पकड़ी और निजामुद्दीन की ओर चल दिया। अविनाश जी की खबर नहीं आई थी। आगे पढें 

सोमवार, 30 मई 2011

नूरपुर की नूरजहाँ और खचाखच भरी बस---------ललित शर्मा

रास्ते का मैप, धर्मशाला से नूरपुर
आरम्भ से पढ़ें  आज 6 मई है, हम जा रहे हैं नूरपुर। सुबह से ही अक्षय तृतीया की बधाई के मैसेज आने शुरु हो गए थे। यह दिन विशेष इसलिए भी है कि परशुराम जयंती के साथ मेरी शादी की देशी सालगिरह भी है। हम साल में दो बार वैवाहिक वर्षगांठ मना लेते हैं। दोनो तिथियों में जब भी घर पर रह गए। शादी की वर्षगाँठ मना ली। हमने धर्मशाला बस स्टैंड से गगल के लिए बस पकड़ी। गगल पहुंच कर पठानकोट वाली बस। बस कन्डक्टर कह रहा था-"लोकल सवारी मत बैठणा भई। गड्डी रुकेगी नहीं। हमने भी सोचा कि बढिया नान स्टाप बस मिल गयी अब जल्दी पहुंच जाएगें। हमारे बस में बैठने के बाद यह खुशी थोड़ी ही देर की रही। ड्राईवर ने अगले गाँव में ब्रेक लगा दिए। उसके बाद तो हर गांव और अड्डे पर उसने ब्रेक लगाए। सवारी चढाई और उतारी। हमसे दो सवारियों के 120 रुपए लिए गगल से नूरपुर तक के।

वादियों की निराली छटा
बस खचाखच भरी थी। मेरे और केवल को सीटें अलग-अलग मिली थी। उसके बाजु एक मेडम थी और हमारे बाजु दो छोरे-छिछोरे। सामने एक सरदार जी थे। जब मैं बैठने लगा तो उसने कहा कि-सीट खाली नहीं है।" थोड़ी देर बाद किसी और को बैठा लिया। अगले गाँव में बस रुकी एक मैडम और चढी, गले में पट्टा बांध रखा था। कन्डेक्टर ने उसे बैठाने के लिए सरदार जी को सीट से उठा दिया। ले भाई मजा आ गया। सरदार जी को अपनी करनी का फ़ल मिल गया। अब वे खड़े थे बस में और हम बैठे आनंद ले रहे थे। सरदार जी एक घंटे खड़े रहे तब कहीं जाकर उनको सीट मिली। पहले ही हमें बैठा लेते तो सजा नहीं मिलती ना। यहां के रास्ते घुमावदार और पहाड़ियों में बड़े-बड़े कटाव हैं।

पहाड़ों में गोल पत्थर और रेत मिट्टी
गगल से हम शाहपुर पहुंचे रास्ते में द्रम्मण, कोटला, नागणी होते हुये नूरपुर पहुंचे। रास्ते में बड़े-बड़े खड्ड और घाटियाँ थी, घुमावदार रास्ते में ड्राईवर कुशलता से गाड़ी हांक रहा था। सड़क के किनारे की कई पहाड़ियाँ सीधी कटी हुई थी। जिन पर पेड़ पौधे या घास नहीं थी। इन पहाड़ियों में मुझे नदी के गोल पत्थर और रेत मिट्टी दिख रही थी। मैं सोच रहा था कि नदी के गोल पत्थर पहाड़ियों पर कैसे पहुंच गए? हिमाचल क्षेत्र में इसी तरह के पत्थर सभी पहाड़ियों में पाए जाते हैं।भूस्खलन का मुख्य कारण भी यही गोल पत्थर और रेत मिट्टी हैं। 

पहाड़ बनने की दास्तान एवं काल गणना के स्तर
मैनें देखा कि पहाड़ियों पर मिट्टी के जमे हुए स्तर अपने बनने की कहानी आप ही कह रहे थे।भू विज्ञानियों के अनुसार हिमालय क्षेत्र पहले समुद्र था। समुद्र में नदियां अपने साथ रेत मिट्टी और गोल पत्थर लेकर आती हैं। जो समुद्र के तल में जमा हो जाती हैं। धरती की जब दोनो प्लेट टकराई तो हिमालय क्षेत्र का निर्माण हुआ। उसमें से समुद्र का यह भू-भाग पहाड़ों में बदल गया। इसलिए यहाँ के पहाड़ों में नदी के गोल पत्थर पाए जाते हैं। लाहौल स्पिति क्षेत्र में तो समुद्री जीव जंतुओं के बहुत सारे फ़ासिल्स पाए जाते हैं। पुरातत्वविद अतुल प्रधान ने वहाँ फ़ासिल्स की खुदाई की है। वे बता रहे थे कि उन्होने चीन की सीमा पर स्थित क्षेत्र में 6 माह गुजारे हैं। यहाँ फ़ासिल्स बहुतायत में पाए जाते हैं।

नूरपुर के किले का सिंहद्वार
हम नूरपुर पहुंचे। रास्ते में पहाड़ी के किनारे बस रुक गयी, वहीं से हम पैदल ही नूरपुर के किले की ओर चल पड़े। इसी बहाने यहाँ का बाजार भी हमें देखने मिला। वैसे पठानकोट से नूरपुर की दुरी 25 किलोमीटर है। हम धर्मशाला से आए थे इसलिए हमें लगभग 66 किलोमीटर आना पड़ा। बताते हैं कि पहले इस जगह का नाम धमड़ी था। राजा जगत सिंह के शासन काल में एक बार जहाँगीर और नूरजहाँ कांगड़ा जाते समय यहां रुके थे। फ़िर उनके ही नाम नुरुद्दीन से धमड़ी का नाम नूरपुर हो गया। यह किला 11 वीं शताब्दी में भी मौजुद था तथा दिल्ली के शासक जेतपाल के छोटे लड़के ने इसे बसाया था। हम किले के की ओर चल रहे थे। बाजार से बाहर निकलने पर दो लाईम स्टोन के बने बुर्ज दिखाई दिए। मुझे लगा कि बस अब किले तक पहुंच गए। सोच रहा था कि किले के साथ नूरजहाँ की कुछ विशेष यादें जुड़ी होगीं। लेकिन ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया।

किले के भीतर बड़ा तालाब-कभी इसका भी वैभव था
प्रवेश द्वार के अगल बगल में किले के परकोटे के अंदर दो स्कूल हैं। एक प्रायमरी एवं एक 10 जमा 2 तक का स्कूल है। दो शिक्षिकाएं पढा रही थी। किले अंदर भग्नावेश बिखरे पड़े हैं। पहले एक बड़ा तालाब दिखाई दिया। इसके बाद एक परकोटा और था। मुझे एक द्वार लिपा-पुता सलामत दिखाई दिया। हम उसमें प्रवेश करने लगे तो भीतर एक कार्यक्रम चल रहा था। बहुत से नर-नारी भीतर आ  जा रहे थे। मुझे अंदर जाने में संकोच हुआ। बिना जान पहचान के किसी के कार्यक्रम के बीच हम कैसे जा सकते थे। वहाँ से वापस आकर हमने बगल वाले द्वार से अंदर गए। अंदर एक बहुत बड़ा चौक था। उसके बायें तरफ़ एक सलामत इमारत थी। वहां पुरातत्व विभाग की तरफ़ से जीर्णोद्वार हो रहा था। किले में अंदर एक तालाब और था। बहुत सारे कुंए बने हुए थे।

किले के परकोटे के भीतर देवी मंदिर
बीच के चौक में सीमेंट का बना हुआ मंदिर था। जो उस प्राचीन बनावट से बिलकुल अलग था। जैसे मखमल में टाट का पैबंद लगा हो। यह देवी का मंदिर है और नव निर्माण सा लगता है। वर्तमान में तो पुरातत्व विभाग ने किले आसपास 100 मी तक सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी है। हम किले का निरीक्षण करते रहे। इसके पिछले परकोटे की तरफ़ एक बड़ा गहरा खड्ड है। उसका नाम मुझे पता नही चला। लेकिन चित्र में गोल चक्कर लगा कर आती दिखाई दे रहा है। राजस्थान के किलों को देखने के बाद इन खंडहरों में आनंद नहीं आता। इन पर काल का प्रहार कुछ अधिक हुआ है। राजस्थान के सभी किले सलामत हैं और आकाश से जुगलबंदी करते हुए उसी रौब-दाब से अभी तक खड़े हैं। यहाँ के किले जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। भीतर के सभी निर्माण ध्वस्त हो चुके हैं। सिर्फ़ परकोटे ही खड़े है।

ताऊ जी की सेना-हमारी आगवानी में
किले के पीछे से हम मंदिर तक पहुंचे। ब्रजराज स्वामी मंदिर का वास्तु मुझे अलग ही दिखाई दिया। इसमे दो तरफ़ बुर्ज बनी हुयी हैं। हम मंदिर की ओर चले तो ताऊओं की फ़ौज दिखाई दी। पता चला कि नूरपुर के लोग इन ताऊओं से बहुत परेशान हैं।10,000 आबादी वाले इस कस्बे में इनकी बदमाशी का असर स्थानीय चुनाव और विधानसभा चुनाव पर भी पड़ा। किसी का भी सामान उठाकर ले जाते हैं। मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों का सामान उठा ले जाते हैं। हमें जाते ही यह शिकायत मंदिर में मिल चुकी थी और इनकी फ़ौज भी दिखाई दे गयी। अब सावधान होना जरुरी था। अगर नुकसान करते तो ताऊ जो फ़ोन करके शिकायत करते कि संभालो अपनी सेना को। यहाँ भी चैन नही लेने दे रहे।

ब्रजराज स्वामी मंदिर के पुजारी
मंदिर में अगती या अक्षय तृतिया का कार्यक्रम चल रहा था। नूरपुर ब्राह्मण समाज द्वारा भगवान परशु राम जयंती मनाई जा रही थी। हमें भी रायपुर में कार्यक्रम में सम्मिलित होना था। यहाँ बटुकों का सामुहिक जनेउ संस्कार हो रहा था। कोट पैंट में सेहरा बांधे बटुक अपने रिश्तेदारों के साथ फ़ोटो खिंचवा रहे थे। केवल ने मुझसे पूछा था कि यहां शादी हो रही है क्या? यज्ञोपवीत संस्कार का कार्य शादी जैसा ही हो जाता है। हम मंदिर में पहुचे। मंदिर उपरी तल पर है। जहां काले पत्थर की ब्रजराज स्वामी की मूर्ती रखी है। मेरे पुछने पर पुजारी ने बताया कि मुर्ती यहाँ 400 साल से स्थापित है। दान पेटी में दान चढा एवं प्रसाद लेकर हम नीचे आ गए।

भक्त केवल और भगवान
नीचे फ़लक पर लिखा था-हिमाचल प्रदेश का प्रवेश द्वार समुद्र तल से 2125 फ़ीट की उंचाई पर बसा नगर नूरपुर आज भी एतिहासिक पृष्ठों को अपने में समेटे हुए है। राजा जगत सिंह ने दरबार-ए-खास को मंदिर का रुप दिया और कृष्ण लीला के भित्ति चित्रों से इसे सजाया।1619-1623 के बीच राजा जगत सिंह चितौड़ के राणा के निमंत्रण पर पुरोहित के साथ चित्तौड़ गए थे। उन्हे रहने के लिए जो कमरा दिया गया था उसके साथ एक मंदिर भी था। आधी रात के वक्त मंदिर से घुंघरुओं की आवाजें एवं संगीत की धूनें राजा के कानों में सुनाई पड़ी। राजा ने दरवाजा खोलकर देखा तो एक औरत बंद कमरे में गाते हुए नाच रही थी। उसने पुरोहित को जगाया और उसे भी वह दृश्य दिखाया।

नूरपुर ब्राह्मण सभा
राजा जगत सिंह को अपने राज्य वापस आना था। चित्तौड़ के राणा उन्हे विदाई स्वरुप कोई न कोई उपहार अवश्य देगें। पुरोहित ने राजा से कहा कि जाते वक्त उपहार के रुप में इस मंदिर में स्थापित मूर्ति राजा से मांग लेना। यहा मूर्ति साक्षात कृष्ण एवं मीरा का रुप है। राजा जगत सिंह ने ऐसा ही किया। विदाई के वक्त राणा से यही मुर्ती मांगी। राणा ने सम्मान पुर्वक यह मुर्ती और एक मौलसरी का पेड़ उपहार में दिया। जिसे राजा जगत ने किले में लाकर स्थापित करवाया। दरबार-ए-खास में स्थापित राजस्थानी शैली की काले संगमरमर की इस मुर्ती के हम दर्शन कर आए थे। साथ में चित्र भी लिए। इस एतिहासिक स्थान पर हमारा आना सार्थक रहा। 

किले के पीछली ओर नदी
नीचे पहुंचने पर एक सज्जन ने हमसे कहा कि बिना प्रसाद लिए आप यहाँ से नहीं जाएगें। आपको प्रसाद लेना ही पड़ेगा। केवल और मैने दरी में स्थान ग्रहण कर लिया। हिमाचली धाम जैसा ही मामला यहां भी था। पेट भर कर प्रसाद ग्रहण किया। सामने पंडित लोग रसीद बुक लेकर बैठे थे। आने वाले सदस्यों की वार्षिक सदस्यता को रीनिवल कर रहे थे। प्रसादोपरांत हम उनसे आज्ञा लेकर वापस चल पड़े। रास्ते में कुछ और सज्जन भी मिले। लेकिन किले के विषय में चाहत के अनुसार जानकारी नहीं दे सके। पुरातत्व विभाग का भी कोई कर्मचारी वहाँ पर नही था। मैने भी सोच लिया कि चलो कोई यह तो नहीं कहेगा कि नूरपुर का किला देखा ही नहीं। हम पुन: पैदल बस स्टैंड की ओर चल पडे। जैसा की स्थान का नाम नूरपुर है वैसी यहाँ की नारियाँ सुदर्शन और सुशील हैं। पुरुष भी पुरुषार्थी और मेहनती नजर आए। समय होता तो कुछ करीब से जानने समझने का मौका मिलता।

बंदुक मरम्मत की दुकान
डुन्गा बाजार में पहुचे तो महाबीर जी का मंदिर दिखाई दिया। येल्लो भाई, हम तो गद-गद हो गए। भगवन यहाँ भी मिल गए। मैने एक चित्र लिया बजरंगबली का और जैसे ही मुड़ा ठीक सामने एक दुकान दिखाई दी। जिसमें एक कारीगर बंदुक के हत्थे बना रहा था। मैं उसकी दुकान में घुस गया। चलो एक काम का बंदा मिला। वह टाली की लकड़ी के हत्थे बना रहा था। कई बंदुके उसके पास रखी थी। मैने पुछा कि हत्थे की कीमत क्या है? तो उसने जवाब दिया कि बंदुक के दाम देखकर हत्थे की कीमत होती है जी। मजदूरी का यह पैमाना भी बढिया था। 10 हजार की बंदुक का 1500 सौ का हत्था। क्योंकि बन्दुक में लोहे के पाईप के अलावा हत्था ही होता है जो उसे बंदुक का रुप देता है। वह हत्थे की घिसाई कर रहा था। केवल फ़ोटो लेने लगा तो उसने बुसशर्ट के बटन बंद किए।

बंदुक का निरीक्षण चल रहा है तसल्ली से
मैने उसकी जाति पूछी तो उसने सुनार बताया। मैने जीवन में पहली बार किसी सुनार को लकड़ी का काम करते देखा था। उसने बताया कि पहले वह भी सुनारी का काम करता था लेकिन वह काम रास नही आया। मजदूरी कम मिलती थी।मशीनी युग एवं महंगाई के जमाने में घर चलाना कठिन हो जाता है। यह एक कटु सत्य था। भारत के सभी परम्परागत शिल्पकारों की यही स्थिति है। इनके व्यवसाय को बड़ी व्यवसायी जातियों ने अपना लिया है। ये सिर्फ़ मजदूरी कर शोषण का ही शिकार हो रहे हैं। सुनार ज्वेलरी शॉप के पाटे पर बैठा चिमनी फ़ूंक-फ़ूंक कर टीबी का शिकार हो जाता है। बड़ी मुस्किल से उसका घर चल पाता है। अच्छा किया मंजीत कुमार वर्मा ने समय रहते अपना धंधा बदल लिया। यही समय की मांग है। वैसे उसके पास मुझे अधिक भरमार बंदुके ही दिखाई दी। एक दो 12 बोर और प्वाईंट 22 की थी।

वापस धर्मशाला की ओर
बस स्टैंड पहुंच कर हमने धर्मशाला के लिए बस ली। लक्जरी बस थी और ड्रायवर भी सपाटे के साथ बस चला रहा था। पुशबैक सीट पर यात्रा करने का आनंद मुझे इस पहाड़ी इलाके में ही आया। हमारे यहाँ भी एक से बढकर एक लक्जरी बसें चलती हैं लेकिन उनमे स्वारी करने का मौका कभी लगता ही नहीं। शाम साढे पाँच बजे हम गगल पहुंच चुके थे। गगल से धर्मशाला के लिए व्हाया यौल वाली बस में चढे। 1849 में ब्रिटिश भारतीय सेना ने योल में छावनी स्थापित की थी। इस स्थान का नाम योल YOL (Young Officers Leave camp) छावनी होने के कारण ही पड़ा। रास्ते में एक सवारी जानी पहचानी मिली। वह मोटी मोटी कजरारी आँखों वाली दक्षिण भारतीय। शायद किसी कम्पनी में नौकरी कर रही थी। उसके साथ एक लड़का और एक लड़की भी थी। तभी एकतारा और डफ़ली लेकर दो गाने बजाने वाले बालक चढे, हम धर्मशाला के लाल किले तक उनके गाने बजाने का मजा लेते रहे। मैने उनकी धुन रिकार्ड करना चाही  लेकिन रिकार्ड नही कर सका। 7 बजे तक हम नूरपुर का किला देख कर घर पहुंच चुके थे। आगे पढें……

शुक्रवार, 27 मई 2011

मुझे तेरा इंतजार आज भी है.-- कांगड़ा फोर्ट से..........ललित शर्मा

गगल का गूगल हुआ 
आरम्भ से पढ़ें  कांगड़ा फोर्ट का काफी नाम सुना था, देखने की इच्छा बहुत दिनों से प्रबल थी. सकोह से हम कांगड़ा के लिए बस में चढ़े. पहला स्टाप था गगल. स्थानीय लोग इसका उच्चारण गग्गल भी करते हैं. गगल तिराहे पर बसा एक  गाँव है, जहाँ से हम एक तरफ पठानकोट और दूसरी तरफ कांगड़ा होते हुयी दिल्ली जा सकते हैं. तीसरी सड़क धर्मशाला को गयी है. गगल नाम देखते ही मुझे गूगल याद आया. अमेरिकियों ने  यह नाम चुरा लिया और होशियारी से नाम में थोडा परिवर्तन कर गूगल कर दिया. जिस तरह लेख चुराने वाले महानुभाव सिर्फ इंट्रो बदल कर अपनी पत्रिका या अखबार में  किसी का लेख छाप देते हैं. कादम्बिनी के अप्रेल अंक में पेज नंबर २१ पर "नदी भी सिसकती है "नामक लेख में मेरे द्वारा ली गयी राजिम मेले की एक तश्वीर छाप दी. जिसमे मेरा नाम ही नहीं है. जैसे इनके बाप का मॉल हो. लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक ने भी गत दिनों मेरे लिट्टी चोखा वाली पोस्ट से रायपुर स्टेशन के बाहर बैठने वाले दुकानदार की फोटो छाप दी. इस तरह की चोरी अब आम सम्माननीय कर्म हो गया है.

देशी अमिताभ बच्चन 
गगल से हम कांगड़ा पहुचे तो लग-भग २ बज रहे थे. धर्मशाला से कांगड़ा १८ किलो मीटर है. बस स्टैड से हमें फोर्ट तक जाना था. ऑटो वाले से पूछा तो उसने १०० रुपये बताये. बहुत ही अधिक किराया बता रहा था.आखिर हमने फिर बस से जाना तय किया. बस स्टैंड से निकलकर बस कांगड़ा तहसील के स्टाप पर रूकती है सवारियों के लिए. यहाँ बहुत सारी फलों की दुकाने हैं, एक व्यक्ति को लोग अमिताभ बच्चन कह रहे थे. उसने एक बोरी में बहुत सारे तरबूज भरकर बस में लाकर रखे. पंजाबी से मिलती जुलती होने के कारण कांगड़ी मेरी समझ में आ रही थी. वह कह रहा तह ८ रूपये किलो लिए  हैं १५ रूपये किलो बेचूंगा तो आज की दिहाड़ी(मजदूरी) ३०० रुपया निकल आएगी. फिर बिल-बुक निकाल कर हिसाब लिखने लगा. कंडेक्टर जब उसे छेड़ने लगा तो वह भनभना गया."अरे यार फालतू पंगा मत करो. मुझे हिसाब करने दो".

बरगद बाबा 
बस चली, १० मिनट बाद हम दोनों खड्ड (बाणगंगा और मांझी) के बीच बने पुल के पास उतर चुके थे. अब यहाँ से हमें पहाड़ पर चढ़ना था. चढ़ाई शुरू की. सामने ही एक पुराना बरगद का पेड़ था. जिसकी जटाएं विशाल रूप ले चुकी थी. मैं कल्पना कर रहा था कि इस बरगद ने जाने कितने राजा-महाराजाओं के वैभव को देखा होगा. इस सड़क पर गुजरते हुए उनका लाव-लस्कर कभी इसकी छाँव में भी रुका होगा. कुछ पल हम भी यहीं विश्राम कर लेते. बूढ़े बाबा का आशीर्वाद ले लेते. कुछ तत्व ज्ञान ही मिल जाता. जिसके लिए ऋषि-मुनि-संत यहाँ भटकते रहे होंगे. जहाँ कही भी जाता हूँ वहां के बरगद-पीपल मुझसे बतियाते हैं, मैं उनकी सुनता हूँ. झोली में उनका अनुभव भर कर लाता हूँ और अपने कोष में जमा कर लेता हूँ.

यहीं से कांगड़ा फोर्ट के लिए पैदल रास्ता है.
सडक पर सामने से कुछ स्कूली बच्चे आ रहे थे. आस पास कहीं भी स्कूल नहीं दिख रहा था न ही कोई गाँव. तभी मैंने ऊपर पहाड़ी पर दृष्टि डाली तो सीधी चढाई से बच्चे उछलते-कूदते नीचे उतर रहे थे. मैंने स्कूल के बारे में पूछा तो पता चला कि उनका स्कूल पहाड़ी के ऊपर है. रोज वहीँ पढने जाते हैं. हम चढ़ते जा रहे थे ऊपर, घुटनों पर जोर पद रहा था. कोई साधन नहीं था. इसलिए पैदल तो जाना ही पड़ेगा, मज़बूरी जो थी. सामने पहाड़ी पर किला दिख रहा था. नीचे पुरातत्व वाले टिकिट बेच रहे थे. भारतियों के लिए १० रूपये और विदेशियों के लिए २ डालर. हमने टिकिट ली और परिसर के भीतर पहुचे. वहां एक चश्मा बह रहा था.उसके नीचे एक पुरानी बावड़ी थी. चश्मे से लोग पानी भर रहे थे. हमने भी अपनी बोतल मिनरल वाटर से भरी.

किले का सिंह द्वार
किले के सिंह द्वार पर लकड़ी के बड़े किवाड़ चढ़े थे. किले में लगने वाले पत्थर लाइम स्टोन ही थे. जैसे हमारे यहाँ बासिंग और नदी मोड़ पर मिलते हैं. शाम होने वाली थी. क्योंकि वादियों एवं जंगलों में रात जल्दी हो जाती है. घडी के हिसाब से चलें तो धोखा खाने की संभावना रहती है. कुछ पर्यटक और मिले. किले के स्वागत द्वार के आगे एक ढही हुयी दीवार थी. देख कर सोचा कि इतनी विशाल दीवार कैसे ढह गयी? ढही हुयी दीवार के बीच से रास्ता है. इसके नीचे एक रास्ता और दिखाई दे रहा था. जिसके ऊपर चीड तख्ते लगे हुए थे. इस पर चल कर हम ऊपर पहुंचे. वहां भी खंडहर ही दिखाई दिए. एक भी भवन सलामत नहीं था.मुझे आशंका हो गयी थी कि इस किले के साथ कुछ अनहोनी हुई है. भीतर जाने पर सामने एक बड़े मंदिर के भग्नावेश एवं सलामत दो छोटे मंदिर दिखाई दिए.

मुझे तेरा इंतजार आज भी है.
किले की प्राचीर में बने झरोखे से हम विशाल खड्डों को देखने लगे. दृश्य मनमोहक था. किला लगभग 4 किलो मीटर के दायरे में हैं. इसके ३ तरफ वाणगंगा एवं मांझी नामक नदियाँ हैं जिन्हें स्थानीय लोग खड्ड ही कहते हैं. इनकी गहराई बहुत अधिक है. झरोखे में बैठ कर हमने तश्वीरें ली. तभी दो युवतियां पहुची, मुझसे उन्होंने झरोखे पर तश्वीर लेने को कहा. मुझे लगता है कि वे किले से पहले जा चुकी थी. हमें झरोखे में बैठ कर तश्वीर लेते देखा होगा तो याद आया होगा कि यहाँ पर भी तश्वीर लेनी चाहिए. मैंने उनकी दो बढ़िया तस्वीरें खींच दी. वे भी खुश और केवल भी खुश :))) मंदिर के आमलक यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे. हम सलामत मंदिर के पास पहुचे तो अन्दर से बतियाने की आवाज आ रही थी. वापसी में इनसे चर्चा करेंगे सोच कर हम आगे बढ़ लिए. 

कांगड़ा किले की पेंटिंग
पूछ ताछ करने पर पता चला कि कांगड़ा को नगरकोट भी कहा जाता है. इतिहासकारों के अनुसार इस स्थान पर पाषण कालीन मानव सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं. इस क्षेत्र की प्राचीनता 5०००० से 2०००० वर्ष पुरानी सिद्ध हुई है.जब मानव शिकारी और संग्रहकर्ता का जीवन व्यतीत कर रहा था. ढेर नामक स्थान से २०००० से १०००० वर्ष पुराने नव पाषण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं. यहाँ से प्राप्त प्राचीन अभिलेखीय साक्ष्यों में प्रथम एवं दितीय सदी ई.पू. के तीन शिलालेख मिलते हैं. जो पठयार और कनियारा नामक स्थानों से मिले हैं. इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में कुषाण, त्रिमर्त, इंडो-ग्रीक, कुनिंद, औदुम्बर, कांगड़ा राजाओं के अलावा दिल्ली के मुस्लिम शासकों के ताम्बे एवं चांदी के सिक्के मिले हैं. जिन्होंने यहाँ समय-समय पर शासन किया था. कांगड़ा राज्य सतलुज, रावी एवं व्यास नदियों के बीच के पठारी भू भाग से लेकर जालन्धर के मैदानी इलाके तक था.

केवल नीचे बैठे मित्रों की प्रतीक्षा में
कहा जाता है कि कांगड़ा राज्य की स्थापना राजा सुसर्मा चंद ने महाभारत की समाप्ति के तुरंत बाद की. यहाँ के विषय में प्राप्त अभिलेख १००९ में गजनी के महमूद की विजय के प्राप्त होते हैं.उसने यहाँ पर अपना एक गवर्नर  जैसा प्रतिनिधि रखा था. जिसे बाद में दिल्ली के तोमर शासकों ने पराजित कर निकाल दिया और किले का नियंत्रण कटोच शासकों के हाथ में दे दिया. इसके बाद मुहम्मद तुगलक ने १३३७ में और उसके उत्तराधिकारी ने १३५१ में किले पर राज किया. १६२१ में १५ महीने के घेरे के बाद जहाँगीर ने इसे जीता.इसके गवर्नर सैफ अली की मृत्यु के पश्चात् शातिशाली पहाड़ी राजा संसार चंद ने अधिकार कर लिया. संसार चंद की महत्वकांक्षाओं के कारण उसका युद्द अमरसिंह थापा एवं महाराजा रणजीत सिंग के साथ हुआ. यह किला १८०९ में सिक्खों के अधिकार में चला गया.१८४६ से यह किला अंग्रेजों के अधिकार में आ गया.४ अप्रेल १९०५ को कांगड़ा में भीषण भूकंप आया. जिसमे यह किला तबाह हो गया.१९२० में इस किले का जीर्णोद्धार किया गया. तब से लेकर यह आज तक उसी स्थिति में है.

विष्णु मंदिर की सलामत एक दीवार
देवी के मंदिर में पुरातत्व विभाग का एक चौधरी पूजा करता है. यहाँ सभी धर्मों के मंदिर हैं. जैन मंदिर और बौद्ध मंदिर भी. विशाल विष्णु मंदिर के भूकंप में तबाह होने के बाद इसकी पीछे की दीवार ही खड़ी है. जिस पर मूर्तियाँ खुदी हुई हैं. पहले मेरी समझ में नहीं आया क्या बला है. फिर गौर से देखने से पता चला कि  मंदिर की दीवार है. अब हम देवी के मंदिर में बैठे लोगों से मिले. उनसे चर्चा हुयी. उसने भूकंप की भयानकता के विषय में बताया. जो बाबा-दादा से सुना था. कहने लगा कि - बाबा बताते  थे, जब भूकंप आया तो खड़े पेड़ धरती तक झुक गए. इस मंदिर का पत्थर कलश नीचे जंगल में एक पेड़ पर अभी तक लटका है. मैंने वहां जाने के लिए पूछा तो उसने कहा कि- जंगल में अभी जाना ठीक नहीं है. शाम हो रही है. हम किले से नीचे उतर आये. समय धीरे-धीरे बीतते जा रहा था. हमें धर्मशाला भी पहुचना था.७ बजे के बाद बस नहीं मिलती.

शिला लेख 
संग्रहालय टिकिट खिडकी के पास ही है. यहाँ कुछ  प्रस्तर प्रतिमाएं रखी हैं, कम ही हैं. इससे कई गुनी तो हमारे छत्तीसगढ़ अंचल में बिखरी पड़ी हैं,जिन्हें अभी सहेजना है. प्रस्तर मूर्तियों के संग्रह के हिसाब से छत्तीसगढ़ का संग्रहालय बहुत समृद्ध है. कुछ चित्र भी लगा रखे है. एक चित्र भूकंप से पहले का और भूकंप के बाद का भी था. दोनों चित्रों से हम भूकंप की भयावहता का अंदाजा लगा सकते है. मैं चित्र लेना चाहता था. लेकिन संग्रहालय कर्मी ने मना कर दिया. फिर भी हम एक दो चित्र तो ले चुके थे. संग्रहालय के सामने पठयार और कनियारा में मिले शिलालेखों की प्रतिलिपि बनी हुयी है और विद्वानों ने लिपि को क्या पढ़ा. इसका भी उल्लेख बोर्ड में किया गया है.

किले से खड्ड का नजारा
हमने चश्मे से एक बार फिर पानी पिया और बस पकड़ने के लिए चल पड़े नीचे की ओर. कुछ देर बाद मैं पीछे मुड कर देखता हूँ तो मंदिर का पुजारी और एक बंदा उसके साथ चले आ रहे है. नीचे आते-आते उनसे चर्चा होने लगी. उसने एक राजा के बारे में कमाल की बात बताई. इस बात को मैंने सेंसर कर दिया. मेल से पूछ सकते हैं. नीचे सड़क पर पहुँच कर हमें बस का इंतजार करना पड़ा. दो बस वालों ने तो बैठाया ही नहीं. तीसरी बस चंडीगढ़ से आ रही थी. उसने हमें लिफ्ट दी. आगे चलने पर सकरे मोड़ पर सफारी वाले ने अपनी गाड़ी घुसेड दी. बस वाले ने गाड़ी रोक दी. दोनों की तू-तू मैं-मैं होने लगी. दोनों में से कोई भी अपनी गाड़ी बैक करने को तैयार नहीं था. दोनों तरफ जाम लग गया. बस ड्राईवर ने इंजन बंद कर दिया. येल्लो गयी भैंस पानी में. अब दो-चार घंटे खड़ा रहना पड़ेगा. फिर किसी बुद्धिमान ने इनकी सुलह करायी और गाड़ी आगे बढ़ी.

दो गेयर लीवर की बस
हम ड्राईवर की पीछे वाली सीट पर ही बैठे थे. अचानक मेरी निगाह बस के गेयर के पास रखे हुए एक सुन्दर खरादी लठ पर पड़ी. मैंने तश्वीर उतार ली. केवल ने भी देखा और मुझे फोटो लेने को कहा. लेकिन मैं तो अपना काम मुस्तैदी से कर चूका था. मैंने ड्राईवर से पूछ ही लिया कि तुम्हारी गाड़ी में दो-दो गेयर लीवर कैसे हैं? वह कहने लगा कि जब इस गेयर से गाड़ी नहीं चलती तो दुसरे स्पेशल गेयर लीवर से चल जाती है. गाड़ी में बढ़िया पंजाबी गाने बज रहे थे और उसके साथ-साथ एक सरदार जी भी बज रहे थे. हमारा बढ़िया टाइम पास हो रहा था. धर्मशाला पहुँच रहे थे. लाल किला आ चूका था. वहीं बस रुकी और हम चल पड़े.... लाल किले से डेरे की ओर......लौट कर। आगे पढें 
   

गुरुवार, 26 मई 2011

है किसी के दिमाग में फितूर-हिमाचली धाम ---ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें  आज ५ मई २०११ दिन गुरुवार है. एक हिमाचली शादी का निमंत्रण मिला है. हमने रेडियो स्टेशन के पास से बस पकड़ी, हमारे साथ कालेज के विद्यार्थी भी थे. बस चल पड़ी कांगड़ा की ओर, रस्ते में एक गाँव है सकोह. केवल ने बताया की हमें वहीँ जाना है. सकोह पहुँच कर दो मकानों के बीच की सकरी गली में चढ़ाई करते हुए एक मैंदान में पहुंचे. जहाँ गेहूं की फसल सीढ़ीदार खेतों में लहलहा रही थी. अगर किसी ने खेतों को सोना उगलते नहीं देखा हो तो यहाँ देख सकता है. हरियाली के बीच सोने जैसी आभा लिए गंदुम के खेत आँखों को भा रहे थे. फसल पक चुकी थी और काटने की तैयारियां हो रही थी.

एक सीमेंट की पतली पगडण्डी गाँव की ओर जा रही थी. रस्ते में कुछ पक्के मकान थे तो एक जगह साँझा चूल्हा भी देखने मिला. शायद सांझे चूल्हे से ही सहकारिता प्रारंभ हुयी होगी. एक ने तंदूर लगाया और आस पास के घरों की सभी ने रोटियां सेंक ली. लेकिन जब से परिवार का विघटन हुआ है, तब से लोगों में समाई (धैर्य) तिरोहित हो गया. सबको अपनी ही पड़ी है. साँझा चूल्हा गया भाड़ में. यह साँझा चूल्हा भी अपने बीते स्वर्णिम काल को याद करके धाड़ें मार-मार कर रो रहा है. उसकी धाड़ें कोई सुनने वाला नहीं है. जिस तरह खाट पर पड़ा बूढ़ा दिन रात पुकारता रहता है. लेकिन आस-पास से गुजरने वाला भी नहीं सुनाता. कौन परवाह करता है बीते हुए ज़माने की.

लो जी आ गया शादी वाला घर. यह भी एक टीले पर ही है. जैसे राजस्थान में ढाणी होती है ठीक वैसे ही एक परिवार का ही मोहल्ला है. पक्के घरों के साथ कुछ परम्परागत पुराने पहाड़ी घर भी दिखाई दे रहे हैं. जिनकी छतें स्लेट पत्थरों की है. एक ऐसी ही छत मेरे पापा जी ने भी बनवाई थी. हमारे यहाँ ऐसे स्लेट पत्थर तो होते नहीं इसलिए वह लकड़ी की थी. कितनी ही बरसात हो उससे एक बूंद पानी नहीं चुहता था. पापा जी ने फ़ौज में रहते हुए जीवन के कई बरस इधर ही काटे थे. यहाँ आकर मुझे पता चला कि लकड़ी के छोटे-छोटे स्लेट के आकार के फट्टों की छत बनाने का आइडिया उन्होंने यहीं से लिया था. यह छत बहुत मजबूत होती है.इसके नीचे सहारे के लिए बांस का उपयोग किया गया था.

शादी पूर्व पारिवारिक भोज (जिसे कुछ इलाकों में मेल कहा जाता है) को यहाँ धाम कहते हैं. पहुचने पर लड़की के पिताजी आकर मिले. राम राम हुयी. सुदर्शन व्यक्तित्व था उनका. फिर एक मूंछ वाले मर्द को देखकर प्रसन्नता ही हुयी. कभी दिनों के बाद किसी बराबरी के आदमी से मुलाकात हुयी थी. संतोष हुआ मन में. प्राम्भिक जल-पान के बाद खाना तैयार था. टाट पट्टी बिछ चुकी थी..भोजनाग्रह पर हम टाट पट्टियों पर जम गए. पत्तलें बिछाई गयी और सबसे पहले चावल परोसा गया. फिर छोले की सब्जी. मैं इंतजार करते रहा की और भी सामान आये तो भोजन शुरू किया जाय. जब सामने देखा तो लोग शुरू हो चुके थे.

हमने भी भोजन शुरू कर दिया. थोड़ी देर दूसरी राजमा की सब्जी आ  गयी. फिर मुंग की दाल. फिर चने की दाल, फिर और फिर पनीर की सब्जी. मतलब अब समझ में आया कि हमें चावल के साथ ८-१० तरह की सब्जियां ही खानी है. बाकि कुछ नहीं मिलेगा. सामने बच्चे बैठे थे. वो सब्जी इकठी करते जा रहे थे. पनीर की सब्जी से पनीर गायब कर रहे थे. मैं उनका खाना देख कर मजे ले रहा था. फिर किसी ने एक हरी मिर्च लाकर दी. चावल खाकर पेट भर चूका था. अंतिम में बंसती मीठे चावल दिए गए थोड़े से. केवल ने बताया की अब यह फिल्म का क्लाइमेक्स है. इसके बाद जय राम जी की ही है. मतलब मीठे चावल आ गए तो दावत संम्पन्न हो गयी. खास बात देखने में यह थी कि सभी सब्जियां सूखी थी, हरी सब्जी कोई भी नहीं थी और कड़े तेल (सरसों) में ही बनायीं गयी थी. बरसों के बाद सरसों के तेल में बना साग खाया.

अब चलने की बारी थी. चलते-चलते मेरी निगाह पाषण युग के यंत्र पर पड़ती है. शायद इस यंत्र को इस स्थान पर रखे सदियाँ बीत गयी. सदियों से यह परिवार के पेट भरने का साधन बना हुआ है. धनकुट्टी मशीन आने के बाद भी इसकी उपयोगिता यहाँ बने रहना आश्चर्य की बात है. हमारे छत्तीसगढ़ में धान कूटने के लिए ढेकी होती है. अब यह भी गाँव में एकाध घर में मिल जाती है. बाकि तो सब धनकुट्टी में धान कुटा लाते हैं. हिमाचल के घरों में अभी तक इसका उपयोग हो रहा है. जब धाम में चावल ही परोसा गया तो मुझे इसकी उपयोगिता का पता चल गया था. मैंने यादगार स्वरूप इसकी एक फोटो ली. किसी ज़माने में यह महत्वपूर्ण यंत्र था. जो आज भी उपयोग में लाया जा रहा है. 

मेहमान किसके-खाए पिए खिसके. हम भी खिसकने की तैयारी में थे. मेजबान से विदा लेकर पुन: उसी रास्ते से गुजरते हुए सड़क पर आ गए. औरों को धर्मशाला जाना था और हमें कांगड़ा फोर्ट. हम सडक के इस तरफ खड़े थे. और विद्यार्थी उस तरफ. तभी सामने गली से एक वीर बहादुर आ रहे थे चिल्लाते हुए."है किसी के दिमाग में फितूर, फाड़ के रख दूंगा." मैंने सोचा कि इसे भरी दुपहरी में क्या हो गया? कहीं गर्मी तो दिमाग में नहीं चढ़ गयी? जब वह नजदीक आया तो दिखा कि आनंद आश्रम से आ रहा है, इसलिए गर्मी कुछ ज्यादा ही चढ़ गयी थी उसके दिमाग में. वह फिर बोला "बता दो अगर किसी के दिमाग में कोई फितूर हो तो, फाड़ के रख दूंगा." अब कोन फितूर बताकर फडवाये, जहाँ परदेश में सिलवाने के लिए दरजी का भी पता न हो. हाँ एक मोची जरुर था. हा हा हा. हमारी बस आ गयी थी. कांगड़ा का धाम खा कर हम चल पड़े कांगड़ा फोर्ट की ओर.....   आगे पढें  

बुधवार, 25 मई 2011

दलाई लामा का घर मैक्लोडगंज और अमेरिकी डालर --- ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें आज ४ मई २०११ है, हमने मैक्लोडगंज घुमने का कार्यक्रम बनाया. दाड़ी से बस से धर्मशाला बस स्टैंड पहुचे.  फिर हमने धर्मशाला के लिए जीप टैक्सी पकड़ी. अब धर्मशाला से मैक्लोडगंज की दुरी १० रूपये की हो गयी है. केवल ने मैक्लोडगंज में अपने एक मित्र को फोन कर दिया था. हमने तय किया थी कि दोपहर का खाना मैक्लोडगंज में ही खायेंगे. रास्ते में एक जगह पर आर्मी कैम्प भी है. मैक्लोडगंज पहुच कर केवल ने मित्र को फोन किया तो वह आ गया. वह एक अच्छे होटल में भोजन करने के लिए ले गया. हमने वहां रूफ टॉप पर ही डेरा जमाया. हमारे पहुचने से पहले एक एंग्लोइन्डियन जोड़ा पहले से मौजूद था. जो हमारे पहुचने पर थोडा असहज महसूस कर रहा था. अब उनके चक्कर में हम अपना टाइम क्यों ख़राब करें? हम भी वहीँ जम गए.खाने का आर्डर दिया गया. सबने आखिर तय किया कि बिरयानी का मजा लिया जाये.

रूफ टॉप से मैक्लोडगंज का नजारा देख रहे थे. सामने धौलाधार की पहाड़ियों पर जमी हुयी चमकदार बर्फ के बीच त्रिउंड भी दिख रहा था. वहां तक बहुत सारे यात्री जाते हैं. केवल के मित्र का पेशा ही ट्रेकिंग करना है. वह त्रिउंड तक यात्रियों के दल को लेकर जाता है. जब मैंने वहां तक जाने का इरादा जताया तो उसने कहा कि अभी मौसम ठीक नहीं है. पहाड़ों पर जमी हुयी बर्फ मनमोहक होती है. पहाड़ हमेशा मनुष्यों को चुनौती देकर आकर्षित करते हैं. लेकिन होते बड़े क्रूर हैं. थोड़ी ही गफलत में जान ले लेते हैं. कभी कोई यात्री दल फंस गया तो बर्फीला तूफान उन्हें निगल जाता है. लाश भी मिलना कठिन हो जाता है. इसलिए पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने के लिए उत्साह और जोश के साथ सावधानियां भी बरतनी आवश्यक हो जाती हैं.

आस पास तिब्बती मन्त्र लिखे ध्वज लहरा रहे थे. इसके पीछे मान्यता है कि हवा में मन्त्रों का प्रसार होते रहे और वे कल्याणकारी हों. पास में ही एक व्यक्ति छत पर  कपडे रंग कर सुखा रहा था. यहाँ तिब्बतियों ने अपने धंधे खोल रखे हैं, आने वाले पर्यटकों से इन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. केवल का कहना था कि खाने का खर्च इन्हें भारत सरकार है और कपडे अमेरिका से आ जाते हैं. कुल मिला कर मौज है. लेकिन वतन से बिछुड़ने का इनका दर्द भी इसके साथ जुड़ा है. यही विश्वविख्यात दलाई लामा भी रहते हैं. हमने संपर्क किया था तो पता चला कि वे अमेरिका गए  हैं. इसलिए मुलाकात नहीं हो सकती थी. फिर कभी मुलाकात करने की कोशिश करेंगे.

खाना आ चूका था. खाने के साथ-साथ चर्चा भी हो रही थी. केवल ने बताया कि जाट जी भी आने वाले हैं. वे झरना देखना चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर अभी आ लेते तो झरना दिखा ही देते. हमारे आस-पास बहुत से झरने हैं. वैसे भी सभी के अपने-अपने झरने होते हैं. जरा सा दुःख आया नही की झरने शुरू हो जाते हैं, दुःख के झरने एवं सुख के झरने के जल का स्वाद एक जैसा ही होता है. दुःख के झरने का जल आदमी पी जाता है और सुख के झरने का जल छलक जाता है. छलकता हुआ जल दिख ही जाता है. चाहे लाख कोशिश करो रुकता ही नहीं है. जाट जी थे नहीं. अन्यथा एक झरना तो बह ही जाता खली वाला. उसके फोटो-शोटो लग जाते ब्लॉग पर. नीरज भी सयाना बंदा है. खली का नाम सुनते ही डर गया. बोला कि खली के जाने के बाद ही आऊंगा.

भोजन के बाद हम पहुच गए बुद्ध मंदिर में. वहां एक पुस्तकालय भी है. मैंने उस पुस्तकालय में कुछ तिब्बती साहित्य देखना चाहा. क्योंकि तिब्बती तंत्र विद्या की काफी चर्चा होती है. लेकिन वहा पर हिंदी में कुछ भी नहीं था. तिब्बती या अंग्रेजी में पुस्तकें थी. मैंने उनसे पूछा कि और कहाँ मिल सकती हैं तो उसने कोई माकूल जवाब नहीं दिया. हम मंदिर में ऊपर की तरफ बढ़ गए. तिब्बती लोग मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे. बीचों बीच स्वर्ण मंडित बुद्ध की प्रतिमा लगी है और उसके सामने ही दलाई लामा की गद्दी भी है. उसे अभी ढक कर रखा गया था. शायद दलाई लामा के आने के बाद उसकी चादर हटाते होंगे. एक बूढ़ा लामा सर पर विचित्र सी टोपी लगाये हुए था. जो उलटे सूप या छाज जैसी थी. मैंने पूछा तो पता चला कि सामने की और बढ़ी हुयी टोपी से चहरे पर बरसात का पानी नहीं गिरता. इसलिए टोपी का डिज़ाइन इस तरह का बना है.

मंदिर के सामने लाइन से बड़े-बड़े पट रखे हुए थे. जिस पर एक लामा और एक लड़की दंडवत कर  रहे थे लगातार. मैं खड़े होकर देखता रहा. तब तक उन्होंने ५० दंडवत तो कर ली होगी. इस विषय पर कोई ठोस जानकारी देने वाला नहीं मिला. शायद इनकी उपासना का एक अंग होगा. जिसमे शरीर सौष्ठव बना रहे. पहाड़ी लोग वैसे भी मजबूत होते हैं. पहाड़ की जिन्दगी बड़ी कठिन होती है. दिनचर्या मेहनत भरी होती है. लकड़ी काटने से लेकर पानी भरने तक सिर्फ चढ़ना और उतरना ही है. मैदानी इलाके के लोगों को पहाड़ों में थकान हो जाती है तो पहाड़ी इलाके के लोगों को मैदानों में. दोनों ही एक दुसरे के वातावरण में कठिनाई से ही चल पाते हैं. इसलिए शारीरिक रूप से मजबूत होना भी आवश्यक है.

बुद्ध मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बोर्ड लगा है. जिसमे पेंछन लामा के विषय में लिखा है और बताया गया है कि पंछेन लामा चीन की कैद में विश्व का सबसे कम उम्र का बंदी है. पेंछन लामा का जन्म २५ अप्रेल १९८९ को हुआ था.१८ मई १९९५ को दलाई लामा ने गेंधुन छोयकी नीमा को १० वें पेंछन लामा के स्थान पर पेंछन लामा घोषित किया. २८ मई १९९६ को चीनी अधिकारियों  ने स्वीकार किया कि पेंछन लामा उनके पास है, चीन सरकार ने एक बार उसकी फोटो जारी की थी उसके बाद उसकी कोई खोज-खबर नहीं है. तिब्बती उन्हें कैद से छुड़ाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं. उन्हें पेंछन लामा की जान की चिंता सता रही है.

आज से ५० वर्ष पूर्व तिब्बती शरणार्थी असम के रस्ते भारत में आये थे. ठन्डे प्रदेशों में रहने वालों को भारत की गर्म आब-ओ-हवा रास नहीं आई. जिसके कारण कईयों की मृत्यु भी हो गयी. तब भारत सरकार ने इन्हें ठन्डे प्रदेशो एवं उनके अनुकूल वातारवरण में रहने की इजाजत दे दी, इसके पश्चात् तिब्बतियों ने कर्णाटक, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, छत्तीसगढ़ के मैनपाट, एवं अन्य ठन्डे स्थानों में बसेरा किया. धर्मशाला को मुख्यालय बनाया गया. यहाँ इनकी निर्वासित सरकार भी निवास करती है. जिसके प्रधानमंत्री लोबसंग सांगये हैं. इनका मंत्री मंडल भी है जो तिब्बत की आजादी को लेकर ५० वर्षों से गाँधीवादी तरीके आन्दोलन कर रहा है.

तिब्बत से आये हुए अधिकांश शरणार्थी अब मर-खप गए. उनकी संताने भारत में बसी हुयी हैं. एक तिब्बती प्रोफ़ेसर से मेरी मुलाकात हुयी, वे अब केंद्रीय विश्वविध्यालय से सेवानिवृत हो चुके हैं. उन्होंने बताया कि वे भारत आये थे तब माँ के पेट में थे, उन्होंने भारत आकर ही जन्म लिया. ल्हासा के बारे में सुना है. देखा कभी नहीं. अब तो हम भारत के ही होकर रह गए हैं. तिब्बत की स्वतंत्रता की आस लगाये एक पीढ़ी तो ख़त्म ही हो गयी.दलाई लामा बुद्ध की 2500 वीं जयंती के अवसर पर 1956 में जब वे भारत आये थे. तब २४ बरस के थे. अब वे ७४ बरस के हो गए हैं. अर्ध शताब्दी बीत गयी भारत में.    

मंदिर की हमने भी परिक्रमा की, वहां पर बड़े-बड़े घुमने वाले डोलों में मंत्र भरे थे. उन्हें एक बार घुमाने से लाखों मन्त्रों के जाप का फल मिलता है."ॐ मणि पद्मे हूँ " बीज मंत्र है. इसी का जप सारे तिब्बती करते हैं. वैसे तो मैं पूर्ण आस्तिक हूँ, लेकिन मूर्ति पूजा के प्रति मेरी आस्था कम ही है. कर्मकांड भी नहीं झेलता...."दिल के आईने में है तश्वीरे यार, जब जरा गर्दन झुकाई देख ली." बस यही स्थिति है अपनी. हमने भी घुमा लिए डोले, जब घुमाने से ही फल मिल जाता है कौन करे फालतू मेहनत. मामला आस्था का ही है. केवल ने लिए चित्र और फिर हम मंदिर से चल पड़े. हमारे सामने दो गोरियां थी. लेकिन इन लोगों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. भारतीय परिधानों का कोई जवाब नहीं है.

यहाँ मंदिर में भी मुझे छत्तीसगढ़िया परिवार काम करते मिला. मेरे यहाँ आने से पहले अगर ये मिल जाते और बताते कि दलाई लामा के घर में काम करके आये हैं तो मैं विश्वास नहीं करता और उनको लबरा घोषित कर देता. लेकिन अब मानना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़िहा की पहचान दूर-दूर तक है. दलाई लामा के घर से चल कर हम बाज़ार में आ गए. जिसे जोगीवारा सडक कहते हैं. इस सड़क पर दोनों तरफ दुकाने हैं. तिब्बती दुकानदार ग्राहकों से मोल भाव करते नजर आ रहे थे. तो कुछ विदेशी गोरे मौज मस्ती में थे. उन्हें यहाँ पर मौज मस्ती के सारे साधन उपलब्ध हो जाते हैं. दम मरो दम कुसंस्कृति के लोग धार्मिक स्थलों को ख़राब कर रहे हैं. हमने तो अधिक अन्दर तक झाँकने की कोशिश नहीं कि वरना सारा भेद पता लगा लेते और उतना समय भी नहीं था मेरे पास..

बाज़ार में एक गोरी तो अधनंगी ही घूम रही थी. पता नहीं उसके कपडे किसी ने चुरा लिए या उसे गर्मी अधिक लग रही थी. आखिर वह मेरे गुप्त कैमरे की जद में आ ही गयी. लोग मुंह फाड़े देख रहे थे बिना टिकिट का तमाशा. भले ही गोरों की संस्कृति वैसी ही हो पर भारत में आकर उपहास का हेतु तो बन ही जाते हैं. फिर इनकी देखा देखि हमारे काले भी गोरे होने की राह पर चल पड़ते है. धोती से तो कच्छे में आ ही गए. एक गोरी दुकान के सामने उदास बैठी थी. शायद किसी आने वाले ने वादा करके धोखा दे दिया था. मुंह उतरा हुआ था. बार-बार सड़क की तरफ देख रही थी. अब परदेश में कोन सहाय हो. अगर कोई हो गया तो उसके ही गले पड़ सकती है. हमने तो राम राम की और आगे बढ़ लिए.

बस स्टैंड के चौराहे पर एक बौद्ध मंदिर है.यहाँ भी दर्शनार्थी पहुचते हैं.  बुद्ध का दर्शन था कि शरीर को इतना कष्ट मत दो कि साधन ही ख़त्म हो जाये और इतना भी इस पर आश्रित न होवो कि गुलाम ही हो जाओ. उन्होंने माध्यम मार्ग सिखाया. धम्म की शरण में ले गए. बाज़ार से निकलते हुए हमने दुकानों में बिकते सामान देखे. ये सामान सभी टूरिस्ट प्लेस पर मिल जाते हैं. सभी जगह एक जैसे ही सामान मिलते हैं. हिन्दुस्तानी ग्राहकों पर दूकानदार कम ही निगाह डालते हैं. उन्हें तो गोरों की जेब खली करवानी रहती है और फिर उन्हें तो गोरों से डालर मिलते हैं. सारा मामला डालर का ही है.

अब हमने बस स्टैंड से टैक्सी पकड़ी और वापस नीचे धर्मशाला की ओर चल पड़े.टैक्सी में पीछे सीट पर कुछ महानुभाव थे. वे भारतीय राजनीती पर गरमा गरम चर्चा कर रहे थे. मैंने भी अपने कान उनकी तरफ लगा दिए. एक ने कहा कि भ्रष्ट्राचार ने देश का बेडा गर्क कर दिया. दुसरे कहा कि बाबा रामदेव अच्छा काम कर रहे हैं. वो आन्दोलन चला रहे हैं, विदेशी बैंकों से धन वापस लाने के लिए. अच्छा काम कर रहे हैं. देश में बिना घूस दिए तो जायज काम भी नहीं होता. साले सभी चोर हैं. लाखों करोड़ रुपया राजा खा गया. मनमोहन सिंह कुछ कर नहीं रहे हैं. एक ने कहा कि वह तो रबर स्टेम्प है, क्या कर सकते हैं? मैं भी सोच रहा था कि भ्रष्ट्राचार की चर्चा अब आम आदमी के द्वारा भी होने लगी है. इसका अर्थ यही है कि आने वाले दिनों में देश कि जनता कुछ माकूल कदम उठाएगी. हम मैक्लोडगंज की यात्रा सम्पन्न करके डेरे पर आ रहे थे.......दक्षिण के मैक्लोडगंज बायालकूपे की सैर यहाँ करेंआगे पढें