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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

सरगुजा का सतमहला

प्रारंभ से पढ़े 
खनपुर फ़ोन लगाने पर पता चला कि अमित सिंह देव को अम्बिकापुर आना है। इसलिए हम अम्बिकापुर के रायपुर आने वाले चौक पर ही रुक गए। उनके साथ कलेक्टर दफ़्तर तक जाकर वापस लखनपुर आए। अमित लखनपुर के जमीदार परिवार से हैं। लखनपुर में इनकी जमीदार कोठी है, जिसे अंचल वासी महल कहते थे। अब वह पुराना महल हो चुका है। महल के सामने ही इनका नया घर और बगीचा है। जिसमें आम आदि के वृक्ष लगे हैं। महल अब खंडहर हो चुका है। सामने का परकोटा बस बचा है। बाकी धराशायी हो चुका है। पुराने जमाने की ईंटों, सुरखी एवं चूने से निर्मित यह महल कभी स्थानीय सत्ता का केन्द्र हुआ करता था। लोकशाही की स्थापना के साथ-साथ जिस तरह राजशाही, जमीदारियां नेपथ्य में चली गयी, उसी तरह महलों की ड्योढी का महत्व भी घटता चला गया। जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन हो गया। राजा और प्रजा सब एक बराबर हो गए। मजदूर एवं बेगार को भी एक वोट देने का हक मिला और राजा को भी एक वोट का ही अधिकार मिला। 
लखनपुर का महल 
हम इनके निवास पर चाय पीने के लिए पहुंचे, जहाँ बाबूजी अजीत प्रताप सिंह देव से मुलाकात हुई। चाय के साथ चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि उनकी उच्च शिक्षा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में हुई। उसके साथ ही बनारस के संस्मरणों का खजाना खुल गया। उनसे मिल कर ज्ञान रंजन हुआ। कभी समय मिला तो अवश्य ही उनके अनुभव की पिटारी से कुछ चुराना चाहुंगा। इस उम्र में भी लगातर पढते हैं। स्वाध्यायाम  न प्रमदति की सुक्ति को चरितार्थ करते हुए उनका स्वाध्याय का सफ़र जारी है। यहीं स्थानीय प्रत्रकार मुन्ना पाण्डे से भेंट होती है। उन्हे क्षेत्र की भौगौलिक स्थिति की अच्छी जानकारी है। अमित सिंह देव की रुचि भी अपने इतिहास एवं संस्कृति में है। जो व्यक्ति अपने इतिहास और संस्कृति को संजोने का प्रयास करता है वही सही  मायने त्रिॠणों के उॠण होने का अभ्यासी होता है। 
लखनपुर के मंदिर 
कहावत है कि लखनपुर में लाख पोखरा। कभी लखनपुर जमीदारी में लाख तालाब थे। लेकिन वर्तमान में 360 तालाबों मे    लखनपुर बस्ती के आस-पास बैगाई डबरी, मटकोरना डबरी, ढोड़िहा डबरी, सेमर मुड़ा, सिंवार तलवा, भावा ढोड़हा, देव तालाब, केसरुवा डबरी, दलदली तालाब इत्यादि हैं। राजमहल के रास्ते में ही प्राचीन शिवालय है, जिसकी रेख देख ट्रस्ट करता है। इसकी स्थापना स्थानीय जमीदारों ने ही कराई थी। परिसर में बजरंग बली भी विराजमान हैं। यहां जलकुंड है, कहते हैं कि इस स्थान के समस्त तालाब एक दुसरे से भूमिगत जल मार्ग से जुड़े हुए हैं। महल के दायीं तरफ़ महामाया मंदिर है। महामाया रकसेल राजवंश की कुल देवी हैं। इसके समीप  ही ठाकुर बाड़ी है।
श्री अजीत प्रताप सिंह देव
कोरिया राज्य के दीवान रघुबीर प्रसाद द्वारा लिखित झारखंड झंकार में सरगुजा की पाँच रियासतों सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगभखार का वर्णन किया है। ये रियासतें 1905 तक बंगाल प्रांत के अतंर्गत थी फ़िर इन्हे मध्यप्रदेश में शामिल किया गया। उपरोक्त पांचो रियासतों के नरेश क्षत्रिय थे। सरगुजा नरेश को "महाराजा" की एवं उदयपुर नरेश  को "भैया" की उपाधि वंशानुगत है। 1905 मे उदयपुर राज्य की एक सड़क के अलावा किसी भी राज्य में सड़क नहीं थी। आज हम उसी सड़क से चाय के उपरांत हम सतमहला की ओर चल पड़े। लौटकर उदयपुर के रेस्ट हाऊस में पंकज एवं राहुल से भेंट होनी थी।
देवगढ़ 
लखनपुर से थोड़ा आगे चलकर हम बायी तरफ़ नहर के कच्चे रास्ते पर चल पड़े। मुन्ना पांडे हमें छोटे रास्ते से सतमहला ले जा रहे थे। सतमहला से पूर्व हम देवगढ पहुंचे। यह स्थान रेंड नदी के किनारे पर स्थित हैं। दूर से देखने पर नवीन निर्माण दिखाई दे रहा था। समीप पहुंचने पर वट वृक्ष की जड़ो में फ़ंसे हुए मंदिर के अवशेष दिखाई दिए। यहाँ पर बलुई पत्थरों  से निर्मित शिव मंदिर समूह दिखाई दिया।। निर्माण में प्रयुक्त हुए पत्थरों रेत के मोटे दानों से बने हैं। जिसके कारण भुरभुरे एवं घिसे हुए दिखाई दे रहे थे। भग्न मंदिरों के अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए पड़े हैं। मंदिर विनष्ट होने के कारण स्थानीय निवासियों ने एक मुखी शिवलिंग पर नवीन मंदिर का  निर्माण करवा दिया। यहाँ प्रतिवर्ष शिवरात्रि को तीन दिवसीय मेला भरता है। पास ही एक मंदिर के गर्भगृह में हनुमान की प्रतिमा स्थापित है। भग्न मंदिरों के आमलक भूमि पर पड़े हुए हैं।
सतमहला का शिवालय 
हम यहां से सतमहला की ओर चल पड़े। गांव के कच्चे रास्ते से चलकर सतमहला मंदिर समूह पहुंचे। कलचा-भदवाही ग्राम स्थित इस स्थान को सतमहला नाम दिया गया है। इससे प्रतीत होता है कि कभी यहाँ पर सप्त प्रांगण का महल रहा होगा। लेकिन वर्तमान में जो मंदिरों के समुह दिखाई देते हैं उनसे लगता है कि सप्त मंदिरों के समुह होने के कारण इस स्थान का नाम सतमहला रुढ हुआ होगा। यहाँ पर तालाबों की भरमार हैं। तालाबों में कमल खिले हुए दिखाई दे रहे थे। मंदिर समूह के समीप ही ईंटों से निर्मित एक षटकोणिय प्राचीन बावड़ी दिखाई देती है। एक ग्रामीण ने बताया कि इस स्थान पर संरक्षित करने का कार्य जी एल रायकवार तत्कालीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के द्वारा हुआ है। मैने रायकवार जी को फ़ोन लगा कर उनसे इस स्थान के विषय में जानकारी ली। यहाँ उत्खनन का कार्य ताला डीपाडीह वाली जोड़ी रायकवार जी एवं राहुल सिंह जी ने किया। 
अष्टकोणिय प्राचीन बावड़ी
ग्राम सतमहला में सन् 1964-65 में बैजनाथ गिरी गोस्वामी के द्वारा स्थानीय लोगों की मदद से टीलों की खुदाई कराई गयी। इस स्थान पर देवबोरा तालाब, पखना तालाब, मांझी तालाब, मंझियाईन तालाब, डोकरा डबरी, आदि तालाबों के नाम गिनाए जाते हैं। इस स्थान पर पंचायतन शिव मंदिर दिखाई देता है जिसके स्तंभ खड़े हैं और अधिष्ठान सलामत हैं। द्वार पर नदी देवियाँ बनी हुई हैं। देखने से लगता है कि यह मंदिर भव्य रहा होगा। इस मंदिर समूह के अवशेष पूरे टीले में बिखरे हुए हैं। साथ ही आवासीय संरचना भी दिखाई देती है। इसके साथ ही पंचायतन शिवालय के सामने दाईं तरफ़ वृक्ष के नीचे बड़े पत्थरों से निर्मित एक संरचना में छत बनी हुई  है जिसमें शिवलिंग के साथ त्रिशुल इत्यादि भी रखे हुए हैं। कुछ पत्र पुष्प भी अर्पित किए हुए दिखाई दिए।
ताराकृति मंदिर 
इस स्थान से थोड़ा आगे चलने पर प्रस्तर के अधिष्ठान पर निर्मित भग्न ताराकृति मंदिर दिखाई देते हैं। एक मंदिर पूर्वाभिमुख है तथा दूसरा मंदिर पश्चिमाभिमुख। इस मंदिर के खंडित अवशेषों से कोई जानकारी नहीं मिलती कि यह किस देवता को अर्पित था और यहां कौन देवी देवता विराजते थे। हम लोग यहाँ कयास लगाते रहे लेकिन जानकारी नहीं मिल पाई। देवगढ़, सतमहला एवं ताराकृति मंदिर 8-9वीं शताब्दी के कलचुरी कालीन माने जाते हैं। अब यहाँ दोपहर हो चुकी थी और हमें वापसी की यात्रा के लिए काफ़ी मार्ग तय करना था। अब पक्की सड़क से हम उदयपुर विश्राम गृह पहुंचे जहाँ पर पंकज एवं राहुल प्रतीक्षा में थे। दोपहर का नाश्ता करके मित्रों से विदा लेते हुए हम अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए। अभी सरगुजा का भ्रमण सम्पन्न नहीं हुआ है। मिलते हैं अगले दौरे के बाद कुछ ही दिनों में।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

सरगुजा राज


मैनपाट से पहुच गए अम्बिकापुर, इस नगर को राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। सरगुजा राज का मुख्यालय यही था। हजारों  वर्षों  पूर्व से लेकर अद्यतन तक लोग सतत् निवास कर रहे हैं । ग्राम की रक्षा करने एवं शक्ति का पुंज ग्राम देवता आदि होते हैं तो राजा की रक्षा करने के लिए कुल देवता और कुल देवी। प्रत्येक राजवंश के कुल देवता और कुल देवी रक्षार्थ उपस्थित रहते हैं। जहाँ से राजा शासन करने की शक्ति प्राप्त करता है। विश्रामपुर का नाम महाराज अम्बिका शरण सिंह देव के शासन काल में कुल देवी अम्बिका (महामाया) के नाम पर अम्बिकापुर परिवर्तित किया गया। यह शहर इतिहास का गवाह है।  पोखर की पार पर खड़े महावटवृक्ष गवाह है कभी इनकी छाया में योद्धाओं ने विश्राम किया था तो कोई राहगीर घोड़े की  पीठ पर चढे-चढे ही रोटियाँ खाकर क्षूधा शांत कर आगे बढ गया होगा। किसी की डोली तनिक विश्राम करने बरगद की ठंडी छांह में ठहरी होगी।
यायावर 
सरगुजा राजवंश के इतिहास पर फ़ोन पर चर्चा करते हुए रकसेल राजवंश के 117 वीं पीढी के अद्यतन शासक  एवं विधायक महाराज त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव कहते हैं कि रक्सेल राजवंश का प्रारंभ सन् 197 ईं में राजा विष्णुप्रताप सिंह से प्रारंभ होता है। इसका जिक्र डी ब्रेट द्वारा लिखित गजेटियर में है। साथ ही राजिम नगर स्थित राजीव लोचन मंदिर में कलचुरी शासक पृथ्वी देव द्वितीय के 1145 के शिलालेख  के अनुसार किसी जगपालदेव द्वारा पृथ्वी देव (ईं 1065-1090) प्रथम के लिए दंदोर पर विजय प्राप्त करने का उल्लेख है। सरगुजा को पहले 22 दंदोर कहा जाता था क्योंकि इसमें 22 जमींदारियाँ थी। इससे ज्ञात होता है की सरगुजा का रकसेल राजवंश लगभग दो शहस्त्राब्दियों से चला आ रहा है।
महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव

डॉ रामकुमार बेहार अपनी किताब छत्तीसगढ़ का  इतिहास में लिखते हैं कि 1906 से पूर्व सरगुजा क्षेत्र छोटा नागपुर के अंतर्गत आता था। मि रफ़शीड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सरगुजा राज्य पर रक्सेल राजपूतों ने अपना अधिकार स्थापित किया। उन्होने गोंर, कंवर, खैरवार जैसी आदिम जातियों से इसे जीता। सरगुजा का प्रारंभिक इतिहास अस्पष्ट है। यहां द्वविड़ सरदारों का छोटे-छोटे भूभाग पर कब्जा था। आपस में लड़ाई होती थी। पलामू जिले के कुंण्डरी के रक्सेल राजपूतों ने इन पर आक्रमण किया। अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगभखार के क्षेत्र पर इनका अधिकार हुआ। उदयपुर एवं सरगुजा रियासत का गहरा पारिवारिक नाता है। त्रिभुनेश्वर शरण सिंह कहते हैं कि सरगुजा रियासत के वंशज ही दत्तक के रुप में उदयपुर रियासत के राजा बनाए जाते थे। 
महाराजा शस्त्र पूजा करते हुए 
इतिहास भी गवाह है कि रकसेलों द्वारा सरगुजा की जीत के बाद उदयपुर का एक हिस्सा भी रकसेल राजपूतों के अधिकार में आया। सरगुजा राजपरिवार का एक सदस्य यहाँ शासक बना। 1857-58 में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने वाले उदयपुर के शासक भाईयों  में कल्याण सिंह एवं धीरज सिंह की मृत्यु हो गयी और शिवराज सिंह को रायगढ़ के राजा देवनाथ ने धोखे पकड़वा दिया, उसे कालापानी की सजा दी गयी तब 1860 में सरगुजा नरेश के पुत्र लाल विंधेश्वरी प्रसाद सिंह को अंग्रेजों ने उदयपुर का सामंत राजा बनाया। विंधेश्वरी प्रसाद सिंह को विद्रोह शांत करने में भूमिका निभाने के कारण अंग्रेजों ने लाल से राजा बना दिया। राज बहादुर एवं सितारे हिन्द की दो उपाधियाँ दी गई।सन 1876 ई में उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र धर्मजीत सिंह  उदयपुर के राजा बने। रामको  नामक गांव को राजधानी बनाकर धर्मजयगढ़ का नाम दिया गया।
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सरगुजा इतिहास प्राचीन है। डॉ केपी वर्मा छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में सरगुजा की जानकारी देते हुए कहते हैं कि पौराणिक प्रमाणों के अनुसार माना जा सकता है कि चौथी शताब्दी में मौर्यों के आगमन पूर्व इस क्षेत्र पर नंद वंश का आधिपत्य था। इसके पश्चात 324 ईं में मौर्य ने नंदों को परास्त किया सरगुजा जिले की सीमा को छूने वाले अहिक्षेत्र, जिला मिर्जापुर से प्राप्त अशोक के शिलालेख, रामगढ़ पहाड़ी के जोगीमाड़ा गुफ़ा के शिलालेख एवं बिलासपुर के अकलतरा एवं ठठारी से प्राप्त नंद एवं  मौर्य काल के स्वर्ण एवं चांदी के सिक्के मौर्य साम्राज्य के शासन के प्रतीक हैं।
महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव
सरगुजा अंचल कलचुरियों के आधिपत्य में भी रहा वर्तमान सरगुजा के महेशपुर से प्राप्त प्रस्तर लेख के आधार पर प्रोफ़ेसर केडी बाजपेयी के अनुसार लेख की रचना 9 वीं शताब्दी ईं के मध्य की प्रतीत होती है। अभिलेख में तीन राजाओं यथा युवराज, आदित्यराज एवं लक्ष्मण का उल्लेख हैं जिसके मध्य पिता-पुत्र के संबंध की जानकारी होती है। सरगुजा में कलचुरी राजवंश से संबंधित कई ग्राम आज भी हैं। जैसे लखनपुर (लक्ष्मण राज से संबंधित) शंकर गढ़ (शंकरगण से संबंधित) आदि यह प्रमाणित करते हैं कि सरगुजा में त्रिपुरी कलचुरियों का आधिपत्य था। डॉ एस के पाण्डेय के अनुसार कलचुरि नरेश युवराज प्रथम के महेशपुर अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र पर डाहल के कलचुरियों का 9 वीं सदी में आधिपत्य हो चुका था।
महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव
कलचुरी शासकों में वंश परम्परा के अनुसार द्वितीय लक्ष्मणराज के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शंकरगण सिंहासन पर बैठा। इसके सभी पूर्वज शैव मतावलम्बी थे परन्तु शंकरगण वैष्णव था। सम्भवत: यह पुत्रहीन दिवंगत हुआ और उसके बाद अनुज  युवराज देव द्वितीय उत्तराधिकारी हुआ। कलचुरियों की कहानी कुछ लम्बी है। इसके बाद कोकल्ल द्वितीय फ़िर उसका पुत्र गांगेयदेव शासक बना। तीसरी शताब्दी ई सन् में बिहार राज्य के पलामउ जिले के कुंदरी के रकसेल राजपूत ने किसी समय छोटे-छोटे  सरदारों पर आक्रमण कर उन्हे अपने अधीन कर लिया। पलामउ में प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार रकसेल राजपूतों ने प्रदेश के इस भाग पर 1613 ईं तक शासन किया। जिन्हे चेरों ने अपदस्थ किया।
हर्रा टोला बेलसर  शंकरगढ़ 

भगवंतराय चेरो जनजाति का प्रमुख था। 1612 में चैनपुर से भाग कर पलामउ आया और वह पलामउ के रकसेल राजा मान सिंह के साथ इस अभिप्राय से मिल गया कि मौका पाते ही सत्ता स्थापित कर ले। सन् 1613 ईं में जब मानसिंह सरगुजा प्रमुख की पुत्री के साथ अपने पुत्र का विवाह करने गया था तो उसकी अनुपस्थिति में भगवंतराय ने अपने अनुयायियों के साथ विद्रोह कर दिया तथा मानसिंह के परिवार की हत्या कर अपने को पालामउ का प्रथम चेरो राजा घोषित कर दिया। मानसिंह ने अपने राज्य की वापसी हेतु कोई प्रयास नहीं किया लेकिन विरोध स्वरुप  सरगुजा के प्रधान की हत्या कर राज्य को अपने अधीनस्थ कर लिया। यह रकसेल राजवंश की शुरआत थी।
ड़ीपाडीह 
छत्तीसगढ़ फ़्युडेटरी स्टेट्स गजेटियर 1909 से ज्ञात होता है कि सरगुजा अधिपति कभी उदयपुर, जशपुर, कोरिया और चांग भखार के समीपस्थ राज्यों का शासक था। सरगुजा जिले के गजेटियर से प्राप्त जानकारी के अनुसार विक्रम संवत 251 में भोजकुरपुर के एक रकसेल चंद्रवंशी राजपूत राजा विष्णु प्रताप सिंह ने सरगुजा जिले के डीपाडीह ग्राम में प्रवेश किया तथा आस-पास के स्थानों पर आक्रमण किया तत्पश्चात उसने द्रविण प्रधान सामनी सिंह  को पराजित किया। इसके बाद विष्णु प्रताप सिंह ने रामगढ़ में एक किले का निर्माण कर 35 वर्षों तक शासन किया तथा वि सं 286 में उसका पुत्र देवराज उत्तराधिकारी बना। महाराजा रामानुज शरण सिंह देव मूल शासक महाराजा विष्णु  प्रताप सिंह के 114 वंशज थे एवं महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव 117 वें वंशज हैं।
रामगढ की गुफा 
डॉ रामकुमार बेहार लिखते हैं कि उदयपुर रियासत का इतिहास सरगुजा रियासत से जुड़ा हुआ है। 1857-58 के संग्राम में उदयपुर के शासकों ने सक्रीय भागीदारी निभाई। 1818 की संधि के दौरान अप्पा साहब भोंसले ने संधि की शर्तों के अनुसार उदयपुर का भाग अंग्रेजों को सौंप दिया। कल्याण सिंह उस समय उदयपुर के राजा थे। 1857-58 के विद्रोह में उदयपुर के राजपरिवार ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। ह्त्या के आरोप में सजा काट रहे तीनो भाई कल्याण सिंह, शिवराज सिंह और धीरज सिंह रांची जेल से छुटकारा पाकर अपनी रियासत में आए और आधिपत्य स्थापित किया। विद्रोही राजा कल्याण सिंह और धीरज सिंह की मृत्यु हुई और विद्रोही राजा शिवराज सिह को रायगढ़ राजा देवनाथ सिंह की सहायता से पकड़ा गया तथा कालापानी की सजा दी गई।1857-58 के काल  में उदयपुर के पूर्व राजा व उसके भाईयों का विद्रोह एतिहासिक महत्व रखता है। छत्तीसगढ़ की अन्य रियासतें भी उनका साथ देती तो छत्तीसगढ़ भी राष्ट्रीय परिदृश्य में चर्चित क्षेत्र होता। अगली कड़ी में सरगुजा रियासत की वर्तमान स्थिति के विषय में चर्चा करेगें। आगे पढ़ें 

(महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव के चित्र विष्णु सिंह देव की वाल से साभार)

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

वेलसर गाँव का हर्रा टोला

भोजन के वक्त विष्णु सिंह से शंकर गढ के समीप अन्य पुरातात्विक स्थानों के विषय में जानकारी ली तो उन्होने शंकरगढ के समीप ही स्थित हर्रा टोला बेलसर का जिक्र किया। हमने भोजनोपरांत हर्राटोला जाना तय किया। शंकरगढ से 5-6 किलोमीटर की दूरी पर वेलसर गाँव का हर्रा टोला एक मोहल्ला है।  रास्ते में एक नदी आती है जिसका नाम पूछने पर महान नदी बताया गया। हमें दूर से ही ऊंचे आयताकार टीले पर एक भग्न मंदिर दिखाई देता है। यह स्थान चार दिवारी से घिरा हुआ है। गाड़ी रोकने पर एक व्यक्ति से मुलाकात होती है। शायद वह यहाँ का चौकीदार है।
सामत सरना का दृश्य 
प्रवेश द्वार के समीप ही भग्न मंदिर की सामग्री पड़ी हुई है। थोड़ा आगे बढने पर किसी मंदिर के द्वार का सिरदल दिखाई देता है। मुख्य टीले पर स्थित मंदिर का शीर्ष भाग इस तरह दिखाई दे रहा था जैसे किन्ही आदिम मनुष्यों ने पत्थरों को एक दूसरे के उपर रख कर वर्तमान संरचना खड़ी कर दी हो। मंदिर के समीप पहुंचने पर दिखाई दिया कि यह कोई अकेला मंदिर नहीं है। यह तो मंदिरों का समूह है। चौकीदार ने बताया कि पहले यह मंदिर पूरा मिट्टी के टीले में दबा हुआ था। लगभग बीस साल पहले रायकवार साहब ने इसका उद्धार किया था। चलो यह तो अच्छा हुआ मैने रायकवार साहब को फ़ोन लगा कर इस स्थल के बारे में जानकारी ली और जिज्ञासा की शांति की।
अमित सिंह, ललित शर्मा, विष्णु सिंह, बादशाह खान हर्रा टोला में 
पूर्वाभिमुखी मुख्य मंदिर के समीप ही ईष्टिका निर्मित मंदिर के अवशेष दिखाई देते हैं साथ ही छोटे-छोटे अन्य मंदिर भी हैं। मुख्य मंदिर का मंडप गिर चुका है। सरसरी तौर पर देखने से ज्ञात होता है कि मंदिर द्वार के सिरदल पर नंदीआरुढ शिव पार्वती के साथ शिव परिवार का अंकन है। जिसमें गरुड़ पर सवार कार्तिकेय एवं गणेश जी प्रदर्शित हैं। इसके साथ ही कीर्तिमुख, देवी, भारवाहक विष्णु लक्ष्मी के साथ नदी देवियों का भी अंकन किया गया है। मंदिर के द्वार के समीप ही एक प्रतिमा के केश बुद्ध की प्रतिमा जैसे दिखाई  दिए, लेकिन उसके अलंकरण से बुद्ध प्रतीत नहीं होते। जी एल रायकवार ने जिज्ञासा शांत करने हेतु बताया कि यह शिव की सेना का ही एक किरदार है।
हर्रा टोला बेलसर का भग्न शिवालय 
उन्होने बताया कि स्थापत्य शैली के अनुसार इसे आठवीं सदी के आस-पास का माना गया है। इस स्थल से प्राप्त कूछ प्रतिमाएं अम्बिकापुर स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय में रखी हुई हैं। आस-पास देखने और चौकीदार से पता चला कि यह मंदिर केराकछार एवं महान नदी के संगम पर स्थित है। अब सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा था और हमे अम्बिकापुर तक का सफ़र तय करना था। समीप ही एक व्यक्ति टाट लगा कर बनाई हुई छोटी सी दुकान में भजिया तल रहा था। शायद चखना जैसा ही कोई उपक्रम था। हमने कुछ चित्र लिए और हर्रा टोला से अम्बिकापुर की ओर प्रस्थान किया। 
हर्रा टोला मंदिर समूह का  शिवालय 
रास्ते में महान नदी के कटाव पर रेत मिश्रित मिट्टी की कई परतें जमी हुई दिखाई दी। जिज्ञासावश गाड़ी रोक कर हमने देखने का प्रयास किया। क्योंकि नदी के तटों पर ही सभ्यताओं का विकास एवं अवसान हुआ है। इस तरह के कटाव पर ही उनके अवशेष प्राप्त होते हैं। आदिम कालीन प्राचीन प्रस्तर के मानवोपयोगी उपस्कर एवं आयुध इन परतों में स्थित होते हैं। इन्हे देखने एवं पहचानने के लिए भरपुर समय की आवश्यकता होती है। वह हमारे पास नहीं था। हम तो सिर्फ़ घुमक्कड़ है, शोध तलाश और अनुसंधान का कार्य विषय विशेषज्ञों एवं संबंधित विद्याथियों के लिए छोड़ देना सही है। हर्रा टोला पहुंच कर आनंद आया। हमने विष्णु सिंह देव को मन ही  मन धन्यवाद दिया।
भग्न मंदिर के अवशेष 
आज की रात अम्बिकापुर में विश्राम करके सुबह मैनपाट जाने का कार्यक्रम बनाया गया था। अमित सिंह देव ने अपनी सफ़ारी गाड़ी को मरम्मत के लिए गैरेज में छोड़ा था। गैरज पहुंचने पर पता चला कि गाड़ी की मरम्मत का कार्य चालु है। हम अब रात्रि विश्राम के लिए सर्किट हाऊस पहुंचे। पूर्व के अनुभवानुसार पता चला कि कोई भी रुम खाली नहीं है। हमारा मोबाईल गुम होने के कारण एस डी एम तीर्थराज अग्रवाल का नम्बर गुम गया था। साथियों ने प्रयास किया लेकिन बात नहीं बनी। अब हमने तय किया कि वापस उदयपुर चला जाए। वहीं के विश्राम गृह में एक रात और काटी जाए। भोजन का इंतजाम हमने अमित सिंह देव की सलाह पर अम्बिकापुर के अच्छे माने जाने वाले रेस्टोरेंट विरेन्द्र प्रभा से किया। उक्कड़-कुक्कड़ खाने का मन नहीं था। सिर्फ़ अंडा करी, सादी सब्जी के साथ रोटियों और पुलाव का पार्सल लिया।
शिव सेवक बुद्ध के रूप में 
अब हम अमित सिंह देव के साथ उदयपुर के मार्ग पर थे।  रास्ते में ही इनकी जमीदारी लखनपुर आती है। हमने उन्हे घर छोड़ा और उदयपुर के विश्राम गृह पहुंचे। यहाँ पहुचने पर चौकीदार ने बताया कि एक कमरा तो बुक हो गया है। अन्य कोई शासकीय कर्मचारी ठहरे हैं। उसने हमारे लिए 1 नम्बर रुम खोल दिया। मैंने सुबह जाते वक्त चौकीदार को कहा था कि रात्रि विश्राम करने के लिए हम इधर लौट कर आएगें तो बात बन गयी थी। जब विरेन्द्र प्रभा होटल के भोजन का पार्सल खोला गया तो सब्जी में उपर तक तेल भरा हुआ था। देखते ही माथा ठनक गया। जैसे-तैसे जितना तेल सब्जी में से गिराया जा सकता था उतना फ़ेंका और भोजन किया और बिस्तर के हवाले हो गया। ठंड अच्छी थी, इसलिए सोना ही ठीक था। राहुल काफ़ी देर तक माउथ आर्गन बजा कर ब्लंडर करते रहा। पंकज और राहुल कब सोए इसका मुझे पता नहीं चला।

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