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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट

राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है। 

मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है। 

इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।

मैनपाट
मैनपाट जलजली

जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं। 

जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है। 

यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। 

इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
मैनपाट
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया. 

करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी। 
मैनपाट जलजली
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है। 

नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

बौद्ध मठ एवं तिब्बती औषधालय Manpat


सुबह जल्दी हो गयी, सूर्योदय हो रहा था। सूर्योदय का यही नजारा देखने हम जल्दी उठे थे। ठंड ऐसी थी कि रुम से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था। पंकज पहले ही उठकर जोगिंग के लिए जा चुका था। मेरे बाईं तरफ़ सूर्योदय हो रहा था, पहाड़ियों के बीच से। आज धुंध भी अच्छी थी। सूर्योदय की लालिमा क्षीतिज पर बिखर कर अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रही थी। पंकज जोगिंग से लौट आया था और राहुत बिस्तर में ही था। चौकिदार से नहाने लिए गर्म पानी करने कहा। मैं आँवले की दातौन तोड़ी। सुबह दातौन करने में ही मजा है। दांत भी स्वस्थ रहते हैं और स्वास्थ्य भी उत्तम बना रहता है। एक घंटे में हम नहा धोकर तैयार हो गए। क्योंकि आज लौटने का दिन था।
सूर्योदय
इस जंगल में साही भी हैं। जिसके कांटे यत्र-तत्र बिखरे पड़े रहते हैं। साही का कांटा बहुत नुकीला और हड्डी के जैसा मजबूत होता है। चौकिदार कहीं से एक कांटा उठा लाया था। काले और भूरे रंग का कांटा खूबसुरत दिखाई देता है। साही अपने प्राणों की रक्षा इसी से ही करती है। ग्रामीण इससे टोटका भी करते हैं। कहते हैं कि साही के दो कांटे किसी के घर के दरवाजे की चौखट दोनो तरफ़ लगा दिए जाएं तो उसके घर में कलह प्रारंभ हो जाता है। जब तक कांटे वहाँ रहेगे तब तक कलह जारी रहेगा। खैर हमने तो कभी प्रयोग करके देखा नहीं और न ही प्रयोग करने का मन है। क्यों किसी बेचारे के घर में कलह कराया जाए। सोच रहा था कि यदि इसका उपयोग ब्लॉग पर होता तो किसी के ब्लॉग टेम्पलेट के दोनो तरफ़ खोंच देते और मौज लेते रहते। :)
मेहता पाईंट का रेस्ट हाउस
रेस्ट हाऊस से चलते-चलते लगभग 9 बज गए। यहाँ से हमें कैम्प नम्बर 1 के बौद्ध मठ एवं तिब्बति दवाखाना देखना था। मर्करी रिसोर्ट से आगे चलने पर कैम्प नम्बर एक आता है। सबसे पहले हमें तिब्बती औषधालय दिखाई दिय। एक व्यक्ति वहाँ झाड़ू लगा रहा था। डॉक्टर के विषय में पूछने पर वह किसी को बुलाने गया। एक तिब्बती बाहर निकल कर आया और बोला कि डॉक्टर साहब नहीं है वे धर्मशाला गए हैं। मैने थोड़ी देर अस्पताल का निरीक्षण किया। आम अस्पतालों जैसे ही यहाँ भी रजिस्ट्रेशन काऊंटर, ओपीडी, दवाई देने का स्थान एवं औषधालय बना रखा था। 
तिब्बती औषधालय
मेरी जिज्ञासा थी कि जिस तरह चीन में पशु पक्षियों के मांस, मज्जा, रक्त इत्यादि से दवाईयाँ तैयार की जाती है। उसी तरह की दवाईयाँ देखने मिलेगीं पर यहाँ तो शीशियों में बंद गोलियाँ ही दिखाई दी। सारी गोलियाँ एक जैसी थी और उनका रंग भी सभी शीशियों पर तिब्बती भाषा में पहचान लिखी थी। शायद वह व्यक्ति कम्पाऊंडर था। मेरे पूछने पर कहने लगा कि डॉक्टर साहब जिस दवाई का नाम बताते हैं वह मरीजों को निकाल कर दे देते हैं। मुझे नहीं पता कि कौन सी दवाई किस मर्ज में काम आती  है। डॉक्टर होते तो दो चार बीमारियों की तिब्बती चिकित्सा पर बात होती लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
लामा
औषधालय थोड़ा आगे चलकर बांए हाथ पर केन्द्रीय विद्यालय है जहाँ पर 8 वीं तक तिब्बतियों के बच्चे पढते है। रास्ते में एक शिक्षिका बच्चों को स्कूल ले जाती हुई दिखाई दी। आगे बढने पर दांए हाथ की तरफ़ के रास्ते में थोड़ी दूर चलने पर बौद्ध मठ दिखाई देता है। हमने कार वहीं दरवाजे पर खड़ी  की और बौद्ध मठ में पहुंचे। बौद्ध मठों में चटख गहरे रंगों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ पर भी चित्रकारी उन्ही रंगों  का प्रयोग किया गया है। मठ में प्रवेश करने पर युवा लामा से मुलाकात होती है। 50 बरस हो गए तिब्बतियों को भारत में लेकिन हिन्दी अभी तक नहीं सीख पाए हैं। बोलेगें तो वही हमेशा की तरह टूटी फ़ूटी। जिसे समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। दो स्थानों पर गुरु गद्दी जैसी बनाई गई है जिसके सामने चाँदी की थाली में एक घंटी रखी है उसमें चावल और रुपए चढाए गए हैं।
इस पर ही चावल और रुपया चढाते हैं
पीछे वाली गद्दी के पास इस घंटी के अतिरिक्त एक पात्र भी रखा है। तभी एक तिब्बती आता है उसके हाथ में इम्पिरियल ब्लू का क्वाटर है। गद्दी को प्रणाम कर 10 रुपए का नोट चढाता है और शीशी खोल कर पात्र में मद्यपेय अर्पण कर देता है। इस प्रक्रिया को राहुल दृष्टि गड़ाए हुए देख रहा था कि ये कैसा मठ है जहाँ एक पात्र रखा है और उसमें दारु दारु डाली जा रही है। शाम तक तो लामा महाराज का फ़ुल इंतजाम हो जाता होगा टुन्न होने का। उससे रहा नहीं गया तो लामा से पूछ ही लिया। लामा ने बताया कि वह दारु नहीं चाय है। तिब्बती सुबह चाय लेकर आते हैं और इस पात्र में डाल देते हैं। सामने ही वज्र रखा था। ठीक वैसा ही वज्र जैसा सिरपुर में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ है। इससे जाहिर होता है बौद्ध मठों में धातू का वज्र एवं घंटी रखने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। 
वज्र एवं घंटी- ऐसा ही सिरपुर के उत्खनन में प्राप्त हुआ
मठ में बड़े आकार के तिब्बती लामाओं द्वारा पहने जाने वाले टोपे रखे हैं। राहुल एक टोपा पहन कर फ़ोटो खिंचाना चाहता था। परन्तु लामा ने मना कर दिया कि आप उसके पात्र नहीं है। इसे दीक्षित लामा ही पहन सकते हैं। मठ के प्रांगण में सौर उर्जा से भोजन इत्यादि पकाने का चलित सौर उर्जा यंत्र रखा हुआ है। इसे सूर्य की किरणो को परवर्तित करने के लिए चलित बनाया गया है। डिस्क जैसी छतरी उपर-नीचे और अगल-बगल घुमाई जा सकती है। इसके मध्य में एक बर्तन रखा हुआ है। जिसमें पकाने वाली सामग्री रखी जाती है। बौद्ध मठ से निकल कर हम बस स्टैंड पहुंचते है, यहाँ एक होटल में गर्मा गरम आलु गुंडे बन रहे थे। सुबह का नाश्ता हमने यहीं पर किया। आलु गुंडे के साथ टमाटर और हरी मिर्च की चटनी बहुत ही उम्दा थी। मजा आ गया नाश्ता करके। अब हम यहाँ से अम्बिकापुर की ओर चल पड़े। जहाँ अमित सिंह देव से मुलाकात होनी थी और आगे की यात्रा में चलना था। आगे पढ़ें 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

टाईगर पाईंट और मर्करी रिसोर्ट ... Mainpat


मलेश्वरपु्र से सीतापुर जाने वाले मार्ग पर थोड़ी दूर जाने पर टाइगर पाईंट आता है। यहां छोटी पहाड़ी नदी पर एक झरना है जिसकी खाई में कभी शेर इत्यादि जंगली जानवर पानी पीने आते होगें। अब तो सिर्फ़ टाईगर नाम ही रह गया है। पर्यटक सोचते होगें कि टाईगर दिखेगा। लेकिन अब कहाँ टाईगर दिखाई देगें। नदी के पानी गिरने के स्थान पर रेलिंग लगा कर सुरक्षित कर दिया गया है। यह घाटी मनोरम दिखाई देती है। जब हम पहुचे तब धुंधलका होने लगा था और पहाड़ी की छाया घाटी पर पड़ने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। राहुल और पंकज घाटी  में उतरना चाहते थे। उपर से गिरते हुए झरने के समीप खड़े होकर आनंद जो लेना था।
मैनपाट का गुगल व्यु
वे तीनों नीचे घाटी में उतर गए, मौसम में शीतलता आ रही थी। झरने के पानी गिरने से नीचे जंगल में  थोड़ी धुंध भी बन रही थी। मै और विष्णु उपर ही रह गए। नीचे उतरने से ठंड लगने की समस्या थी और मैं अपने साथ कोई गर्म कपड़े नहीं लाया था। लेकिन मैनपाट की ठंड का अहसास होने लगा था। कुछ लोग वहां पिकनिक मना रहे थे। पास ही एक मंदिर बना हुआ था। लोगों ने बड़े हंडे चढा रखे थे। किसी का खाना बन रहा था तो कोई भोजन करके पत्तलें समेंट रहा था पत्तलें और डिस्पोजल गिलास यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। इंसान की अजब फ़ितरत है, जहां भी जाएगा वहीं गंदगी फ़ैलाएगा। इससे तो जानवर ही भले हैं जो गंदगी साफ़ करते  हैं। इस सुंदर प्राकृतिक स्थल को प्लास्टिक से पाट रखा है।
टायगर प्वांईट पर टायगर 
लैला मजनु की सयुंक्त औलादों के कारनामों के तो क्या कहने। पत्थर तो पत्थर ग्वारपाठे के पत्तों पर भी दिल चिपका रखा  है। साथ ही विरदावली लिख रखी  है। जैसे जब कभी भी यह सभ्यता नष्ट होगी तो आने वाली नयी सभ्यता को इनकी प्रेम कहानी पत्तों पत्तों पर लिखी मिलेगी फ़ासिल्स के रुप में। मैं कुछ यही सोच रहा था इस स्थान पर, तभी साथी भी आ गए घाटी में से घूम कर, बोले बहुत ठंड है  नीचे। अच्छा हो गया आप उपर ही रह गए। अब मैं इन्हे मना करता तो मानते नहीं। आज कल के छोकरों का यही रोना है। मनमानी ही करते हैं। अब संध्या नास्ते के लिए समोसे निकाले गए। समोसों  की चटनी उम्दा थी। सभी के हिस्से दो-दो समोसे आए। सांझ होने को थी अब हमे लौटना था कमलेश्वरपुर की ओर।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल तुम्हारा जाने हे
राहुल के सिर पर सुबह से ही मैनपाट में रात्रि विश्राम करने का भूत सवार था। मैनपाट के हालात देखते हुए मेरा रुकने का मन नहीं था और  न ही विष्णु सिंह और उसका साथी रुकना चाहता था। राहुल ने जिद पकड़ ली कि उसे मैनपाट में ही रुकना है वरना अपने दोस्तों को क्या मुंह देखाएगा कि मैनपाट गया और वहां रात नहीं रुका। बात मुंह दिखाने तक पहुंच गयी थी। हमारे रुकने की व्यवस्था मेहता पाईंट स्थित विश्राम गृह में की गयी थी। हम सब एक बार यह स्थान देखना चाहते थे। टाईगर पाईंट से मेहता पाईंट दक्षिण दिशा की ओर है। कमलेश्वरपुर से लगभग 7-8 किलोमीटर की दूरी होगी। ढूंढते हुए हम मेहता पाईंट पहुचे तो सूर्यास्त होने को था। 
रेस्ट हाऊस में पहुंचने पर कोई दिखाई नहीं दिया। 
टाईगर प्वाईंट की ढलती हुई सांझ
थोड़ी देर तक आवाज देने पर एक चौकीदार निकल कर आया और आते ही बोला कि यहाँ के नल की मोटर खराब हो गयी है और सुबह आपको नहाने के लिए पानी नहीं मिलेगा। राहुल को तो रात मैनपाट में काटनी थी। वह इस स्थिति में भी तैयार था। हमने थोड़ी देर रुक कर प्राकृतिक नजारे का आनंद लिया। दाई तरफ़ सूर्यास्त हो रहा था। बड़ा ही मनमोहक दृश्य था। अंदाजा लग गया था कि जब सुबह होगी तो घाटी में बाईं तरफ़ सूर्योदय होगा। ऐसा दुर्लभ नजारा कम ही स्थानों पर मिलता है जब एक तरफ़ सूर्यास्त हो और सुबह दूसरी तरफ़ सूर्योदय हो। सामने घाटी में छोटा सा बांध दिखाई दे रहा था। सूरज की लालिमा पहाड़ों से होते हुए घाटी तक जाना चाहती थी।
पिकनिक के अवशेष टाईगर प्वाईंट पर
यह दृश्य देख कर मैने भी यहीं रात्रि विश्राम करने का मन बना लिया। यहाँ दो भवन हैं एक में 2 कमरे हैं और दूसरे में तीन चार कमरे बने हुए हैं। लेकिन रुकने के लायक कोई व्यवस्था दिखाई  नही दी। फ़िर भी हम चौकीदार को वापस आने की कहकर विष्णु सिंह एवं उसके साथी को तिब्बती कैंप नम्बर 1 के समीप स्थित बस स्टैंड छोड़ने के लिए आए। वापस अम्बिकापुर जाने का  कोई साधन तो दिखाई नहीं दिया। तभी एक बोलेरो वाले से चर्चा करने पर वो विष्णु सिंह एवं उसके साथी को  अम्बिकापुर ले जाने को तैयार हो गया। वे जब बोलेरो में बैठ गए और  वह चल पड़ी तब हमने राहत की सांस ली। क्योंकि उन्हे रात अम्बिकापुर में किसी मित्र के यहाँ शादी में जाना था।
मर्करी रिसोर्ट की छोलदारी का इंटिरियर
रेस्ट हाऊस में खाना बनाने की व्यवस्था नहीं होने के कारण अब हमें खाना ढूंढना था। पूछने पर पता चला कि थोड़ी दूर पर मर्करी रिसोर्ट है अब खाना वहीं मिल सकता है। हम मर्करी रिसोर्ट पहुचें। बरसाती नाले के किनारे पर 6 टैंट (छोलदारी) लगा कर रुकने का इंतजाम किया गया है। किचन एवं रेस्टोरेंट बांस से बनाया हुआ है। रेस्टोरेंट की टेबल एंव कुर्सियां भी बांस की ही हैं। पूरा इंटीरियर ही बांस का बनाया हुआ है। सामने लॉन में कुछ टेबल और कुर्सियाँ लगा रखी हैं। रात रुकने के लिए एक स्विस कॉटेज का किराया 1800 रुपए बताया। बार्गेनिंग करने पर 1500 तक बात पहुच गयी। एक बैड अलग डालने के 300 रुपए अतिरिक्त लगेगें। हमने छोलदारियाँ देखी, उनमें लैट्रिन-बाथरुम अटैच था। साथ ही एसी की व्यवस्था भी थी।
मर्करी रिसोर्ट का रेस्टोरेंट
हमने खाना पार्सल करने का आदेश दिया और तब तक चाय की व्यवस्था करने कहा। मैनपाट में यही एक मात्र रेस्टोरेंट हैं जहाँ खाना मिल सकता है। चाय में शुगर फ़्री डालने कहा तो वेटर के मैनेजर ने भी असमर्थता जता दी। इससे मुझे पता चल गया कि इस रिसोर्ट का क्या स्तर है। सिर्फ़ नाम का ही रिसोर्ट लगा। पूछने पर पता चला कि बाकी सब व्यवस्था हो जाएगी लेकिन शुगर फ़्री नहीं मिलेगी। चाय लेकर आया तो वह ठंडी पड़ी थी और बाहर का टेम्परेचर लगभग 3-4 डिग्री के आस पास था। ठंडी चाय की घुंट लेते ही खोपड़ी घूम गयी। मन ही मन सोचा कि कहाँ फ़ंस गए आकर। एक तरफ़ सरकार मैनपाट नहीं देखा तो क्या देखा के बोर्ड लगा रही है और इधर मैनपाट पहुंचने पर ये हालात हो रही है।
मेहता प्वाईंट का सूर्यास्त
हमने खाने का पार्सल लिया। बिल पूछने पर थोड़ा मंहगा ही लगा। अब मैनपाट में जब और दूसरी जगह खाना नहीं मिलना है तो एकाधिकार रहेगा ही। जो भी जिस भाव में मिल जाए लो और मौज करो। हम अपने रेस्ट हाऊस  की तरफ़ चल पड़े। रात के लगभग साढे आठ बज रहे थे। मैनपाट सुनसान पड़ा था। जहाँ पर हमें रुकना था वहाँ दो-तीन किलोमीटर तक बस्ती का कोई नाम निशान नहीं था। आस पास भी कोई आबादी नहीं थी। एक तरफ़ खाली मैदान और दूसरी तरफ़ खाई के साथ जंगल और जंगली जानवर। चौकीदार भी रामसे बदर्स की पुरानी हवेली के चौकीदार जैसा ही था। अब जो होगा सो देखा जाएगा। रात तो यहीं गुजारनी है। 

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

तिब्बत से निर्वासन की टीस बाकी है आज तक ………

मैनपाट पर पहुचने पर एक स्थान पर दूर से ही हवा में लहराती हुई रंग बिरंगी पताकाएं दिखाई देने लगी। लगभग 12 बजने को थे। पताकाओं लिखे तिब्बती बौद्ध प्रार्थना मंत्र हवा के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे। बस मुझे तो इस गाँव में पहुंचना है। साथियों को चेता दिया मैने। छत्तीसगढ अंचल में बनने वाले कवेलू और मिट्टी के घरों को चटक भड़कीले रंगो से पोता गया था। दूर से ही देखने से पता चल जाता है कि यह कोई तिब्बती बस्ती है। जब मैं धर्मशाला गया था तब वहाँ से लौटते हुए बस में एक तिब्बती सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर से मुलाकात हुई थी। रास्ते में धर्मशाला से खजियार तक मेरी उनसे तिब्बत के विषय पर चर्चा हुई। जिससे तिब्बतियों के विषय में भरपूर जानकारी मिली।
मोनेस्ट्री की दीवार पर तिब्बती भाषा
इस तिब्बतियों की बस्ती को कमलेश्वरपुर कह्ते हैं एवं शरणार्थियों की बसाहट के हिसाब से इसे कैम्प नम्बर 2 नाम दिया गया है। यहाँ प्रार्थना करने के लिए छोटा मठ भी है। मंदिर परिसर में मैने छोटे मनौती स्तूपों से लेकर एक दीवार पर निर्मित सहस्त्र बुद्ध प्रतिमाएं भी देखी। मैनपाट में तिब्बतियों के 7 कैम्प हैं। प्रत्येक कैम्प का एक मुखिया है और सभी 7 कैम्पों  का एक प्रधान मुखिया है। यहाँ से निर्वासित तिब्बती सरकार का एक सांसद चुना जाता है। शरणार्थी होने के कारण ये भारत के निर्वाचन में मतदान नहीं कर सकते। भारत में इनकी  कई पीढियाँ हो चुकी है फ़िर भी इन्होने बांग्लादेशियों  जैसे भारत की नागरिकता के लिए कोई आवेदन नहीं किया है। इनकी आशा अभी तक लगी हुई है कि चीन से तिब्बत को आजादी मिलने के बाद अपने वतन को वापस चले जाएगें।
तिब्बतियों के गाँव की सुनसान गली
इस कैम्प में मेरी मुलाकात तिब्बतियों के बुजुर्ग लोतेन से होती है। मैं गलियों में घुमते हुए उनके घर के पास पहुचता हूँ। टीन शेड का सुंदर मकान में बड़ा सा आंगन है। आँगन के भीतर एक मचान पर खाल में भुसा भरा हुआ बछड़ा रखा है। एक अरसे के बाद यह दृश्य देखने मिला। शावक की मौत होने पर भैंस या गाय दूध देना बंद कर देती  हैं। इसलिए उस शावक की खाल में भूसा भरवा कर उसके समक्ष रखने से भैंस और गाय दूध देने लगती हैं। इस बछड़े के पुतले का उपयोग इसी प्रयोजन से किया जाता है। एक मचान पर मक्का के भुट्टे सुखाने के लिए लटकाए हुए थे। आँगन में धान सुखाया हुआ था जिसे दो मजदूर बोरों में भरकर घर के भीतर रख रहे थे। इससे जाहिर होता है कि तिब्बती खेती करने में भी माहिर हैं।
सरसों की फ़सल एवं हवा में तैरती मंत्र पताकाएं
तिब्बतियों का यह गाँव सुनसान दिख रहा था। सिर्फ़ कुछ बुजुर्ग एवं कुछ बच्चे ही दिखाई दे रहे थे। मुझे देखकर लोतेन की  पत्नी कुर्सियाँ लेकर आती है और 1942 में तिब्बत के खम्नांचिन में जन्मे लोतेन मेरे पास आकर बैठ जाते हैं। उनसे चर्चा प्रारंभ होती है। वे बताते हैं कि तिब्बत 1961 में निर्वासित होने के बाद सबसे पहले वे नेपाल के मोनकोट में आए। उसके पश्चात 1963 में नेपाल से भारत में प्रवेश किया। इनके परिवार ने नेपाल से भारत में पैदल ही प्रवेश किया। तब भारत सरकार ने इन्हे शरणार्थी मान कर भारत में शरण दी। ठंडे प्रदेशों में रहने के कारण तिब्बतियों की भारत की गर्म जलवायु रास नहीं आई। जिससे कईयों की मृत्यु हो गयी। दलाई लामा के प्रयास से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भारत के प्रदेशों में ठंडे स्थान की खोज करवा कर वह स्थान इनके रहने के लिए आबंटित किए।
सहस्त्र बुद्ध 
उनमें से एक स्थान छत्तीसगढ का मैनपाट भी था। मैनपाट में तिब्बतियों की बसाहट 1965 में हुई। एक परिवार के 7 सदस्यों के हिसाब से इन्हे जीवन यापन के लिए 5 एकड़ भूमि दी गयी। मकान बनाकर देने के साथ 3 साल तक फ़्री राशन दिया गया। लोतेन भारत सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। वे बताते हैं कि इन्होने ने यहाँ आलू, मक्का, टाऊ आदि की कम पानी की खपत वाली फ़सलें लगाना प्रारंभ किया। जिससे जीवन यापन होने लगा। साथ ही कालीन एवं स्वेटर का निर्माण का परम्परागत व्यवसाय भी प्रारंभ किया गया। महिलाएं हाथ से स्वेटर बनाकर अम्बिकापुर में बेचकर आती थी। अब हाथ की बनी मोटी स्वेटर को कोई पहनता नहीं है। इसलिए लुधियाना से मशीन की बनी हुई स्वेटर लाई जाती है। अभी गाँव के सारे जवान स्त्री पुरुष स्वेटर बेचने के लिए छत्तीसगढ एवं मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में गए हुए हैं।
बौद्ध मठ  की पीठिका
लोतेन की उत्त्मार्ध चाय बनाकर ले आती हैं। चीनी बड़े-बड़े मग चाय के भरे हुए थे। एक कप चाय पीना कठिन था। लेकिन उनके आग्रह को देखते हुए चाय पीनी पड़ी। उन्होने बताया कि सारे कैम्पों मे। लगभग ढाई हजार तिब्बती निवास करते हैं। यहाँ पर परम्परागत तिब्बती औषधियों से युक्त अस्पताल भी है। जिसमें धर्मशाला से तिब्बती डॉक्टर आकर ईलाज करते  हैं। कैम्प नम्बर 1 में मुख्य मठ है जहाँ लामा निवास करते हैं। मुख्य धार्मिक कर्मकांड वहीं सम्पन्न कराए जाते हैं। उन्होने मुझे अपना और पत्नी का पासपोर्ट दिखाया जिसमें उनका  नाम पता एवं उम्र के साथ नेपाल के रास्ते पैदल भारत आने का विवरण दर्ज है। यह भारतीय पासपोर्ट इन्हे भारत का शरणार्थी होने का जिक्र करते हुए जारी किया गया।
लोतेन के साथ यायावर 
मै लोतेन से चर्चा कर रहा था और राहुल, पंकज एवं विष्णु वहाँ से गायब हो चुके थे। शायद मेरी और लोतेन की चर्चा उन्हे निरर्थक लगी होगी। क्योंकि यह चर्चा उनके कोई काम की नहीं थी। ये निर्वासित लोग बड़ी मेहनत के बाद परदेश में अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लेकर आए हैं। एक बात गौर करने योग्य है। 50 बरस बाद भी इन लोगों ने अपनी भाषा, कर्मकांड, संस्कृति को नहीं छोड़ा है। मैनपाट में तिब्बतियों के लिए केन्द्रीय स्कुल है, जहाँ पढाई 8 वीं तक होती है इसके पश्चात आगे की कक्षाओं की पढाई के लिए हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला जाना पड़ता है। मैनपाट स्थित तिब्बतियों का संबंध इनकी निर्वासित सरकार के साथ सतत बना रहता है। उनके निर्देशों के अलावा भारत सरकार के कानूनों का पालन करते हैं। अपनी मिट्टी से उजड़ने का दर्द इनके मन को कचोटता है। दर्द इनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है। भले ही यहाँ जन्म लेने वाली इनकी अगली पीढी ने तिब्बत नहीं देखा पर जंतर मंतर तक तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए इनकी आवाज गुंजती  है।
इहै है सिक्छा कर्मी परतापपुर के
लोतेन से विदा लेकर बाहर गली में निकला तो ये चारों गायब थे। गलियों में दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिए। मै पैदल ही पैदल मोनेस्ट्री तक आ गया। वहाँ लगी मूर्तियों को निहारने लगा। थोड़ा समय व्यतीत होने पर आगे बढा तो एक चौराहा दिखाई दिया। जहाँ सायकिल की दुकान पर कुछ तिब्बती युवा महफ़िल जमाए हुए थे। समीप ही आदिमजाति कल्याण विभाग का छात्रावास था। छात्रावास के मैदान में बड़ी बड़ी घास उगी हुई थी। वातावरण में ठंडक होने के कारण शिक्षक ने अपनी कुर्सी मैदान में ही डाल रखी थी। बच्चे सब खेल रहे थे। मैंने आश्रम परिसर में प्रवेश किया और शिक्षक के पास पहुंचा। उसने मेरे आगमन पर कोई ध्यान नहीं दिया। टेबल पर रखे रजिस्टर में कुछ लिखता रहा। चर्चा करने पर पता चला कि एक शिक्षा कर्मी है और प्रतापपुर से यहाँ पढाने के लिए आता है। इतनी देर में पंकज का फ़ोन आ गया कि वे गरम समोसे बनवा कर ला रहे हैं। थोड़ी देर में आ पहुंचे और हम टाईगर प्वांईट की ओर चल पड़े।

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बुधवार, 23 जनवरी 2013

तिब्बतियों का टाउ……

सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी। सूरज भी रजाई ओढे गुड़ की लाल चाय की ताक में था। चाय आई तभी वह रजाई से बाहर निकला और सूर्योदय हुआ, इसके बाद मैने आंवला की दातौन का प्रयोग दांत मांजने के लिए करते हुए विश्राम गृह के लॉन के दो तीन चक्कर लगाए। राहुल और पंकज भी सोकर उठ गए। कमरे में यत्र-तत्र गुजरी हुई रात को बजे माउथ आर्गन के ब्लंडर की निशानियाँ मौजूद थीं। राहुल मोबाईल उठा कर दूर एक कोने में बतियाने लगा।  हम मार्निंग वाक करते हुए उसके समीप से गुजरे तो उसकी धीमी-धीमी आवाज सुनाई दी लेकिन समझ में नहीं आया क्या बतिया रहा था। समझ में नहीं आया कि उसकी कौन सी गर्लफ़्रेंड एक दम फ़ुरसत में थी जो अल सुबह ही इसे फ़ुसफ़ुसाने का मौका दे रही थी। चलो छोड़ा जाए इन बातों को, क्या रखा है, अगर हमारे जमाने में ऐसे फ़ोनवा होता तो ………:)
उदयपुर  का  विश्राम गृह 
स्नानाबाद अमित सिंह देव का फ़ोन आया और उन्होने जानकारी दी कि किसी विशेष कार्य से आज उपस्थित नहीं रहेगें। हमारे साथ विष्णु सिंह देव जाएगें मैनपाट के लिए। नाश्ता करने का मन नहीं था। रात का खाया ही हजम नहीं हुआ था। विरेन्द्र प्रभा होटल का कमाल था एक बार खाओ तो कई दिन तक भूख न लगे। शायद कोई नया फ़ार्मुला विकसित किया है।  अम्बिकापुर पहुंचने पर विष्णु सिंह देव मिल गए, साथ ही उनका एक साथी भी था। ये कांग्रेस की छात्र राजनीति में सक्रीय हैं और राजनीति को ही कैरियर बनाने के पक्ष में अधिक दिखाई दिए। थोड़ी जिज्ञासु प्रवृति होना इनके लिए लाभदायक है। जिज्ञासु होने से ही ज्ञान बढता है और उचित मार्ग दिखाई देता है।
मैनपाट का रास्ता  
हमने रास्ते के नाश्ते के लिए केले लिए और दरिमा होते हुए मैन पाट की ओर चल पड़े। मैनपाट को छत्तीसगढ का शिमला या धर्मशाला मान सकते हैं। शिमला इसलिए कि यहाँ का मौसम ठंडा है और धर्मशाला इसलिए कि यहाँ शरणार्थी तिब्बतियों का बसेरा है। अम्बिकापुर से मैनपाट जाने के लिए 2 रास्ते हैं। पहला अम्बिकापुर व्हाया सीतापुर होते हुए दूसरा अम्बिकापुर व्हाया दरिमा होते हुए। अम्बिकापुर से मैनपाट की दूरी 75 किलोमीटर है। पाट से तात्पर्य है पठार, मैनपाट विंध्य पर्वतमाला पर समुद्र तल से 3781 फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी लम्बाई 28 किलो मीटर एवं चौड़ाई लगभग 13 किलोमीटर है। मैनपाट से रिहन्द एवं मांड नदी का उद्गम हुआ है।
टाऊ  के खेत में भविष्य  का ताऊ 
दरिमा के बाद मैनपाट की चढाई प्रारंभ हो जाती है। वन क्षेत्र से होते हुए हम मैनपाट की ओर बढ रहे थे। रास्ते में बड़े ट्रक मिलने लगे। पता चला कि यहां पर बाक्साईट की खदाने हैं जिनसे कच्चा माल निकाला जा रहा है। 1993 से बाक्साईट की  खदाने खुलने के कारण अंधाधुंध वनों को काटा गया जिससे यहाँ के प्राकृतिक परिवेश को नुकसान पहुंचा है। इन भारी ट्रकों के कारण सड़क का भी सत्यानाश हो गया है। बीच में सड़क निर्माण का कार्य भी चालु है। पठार पर पहुंचने के बाद गुलाबी सफ़ेद फ़ूलों से भरे हुए खेत दिखाई देने लगे। ये खेत टाऊ के थे। टाऊ का आटा बनता है जिसका उपयोग व्रत उपवास में फ़लाहार के लिए किया जाता है। 
टाऊ 
टाऊ को कुट्टु कहा जाता है। उत्तर भारत में इसके आटे का उपयोग नवरात्रि इत्यादि व्रत उपवास के समय फ़लाहारी के रुप में प्रयोग में लाया जाता है।  2011 की नवरात्रियों के दौरान  दिल्ली, बुलंदशहर और मुजफ्फरनगर, नोयडा आदि शहरों में कुट्टु  के मिलावटी आटे का कहर बरपा, जिसके कारण नोयडा में एक व्यक्ति की मौत हो गयी एवं लगभग 600 अस्पताल में भरती कराया  गया। कुट्टु  चावल की एक प्रजाति मानी जाती है जिसका बाटनिकल नाम फ़ैगोपायरम-एफ़क्युलैंटम है। यह एक हाई प्रोटीन फ़ुड है और इसे संग्रहित करने पर इसमें फ़ंगस लग जाती है और यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाता है। इसके आटे को घर में ही तैयार करना चाहिए। हमने कुट्टु की फ़ोटो ली और आगे बढे।
देवानंद ने 3 किलो सोना ख़रीदा 
मैनपाट में वनों से हवा के साथ आने वाली प्राकृतिक फ़ूलों की खुशबू मन और आत्मा को तरंगित कर देती है। पक्षियाँ का कलरव एवं झरनों की कल-कल स्वर्गिक वातावरण का निर्माण  करती है। लगता है कि यही आकर धूनी रमाई जाए। सोचना तो ठीक है लेकिन निर्वहन करना कठिन वातावरण में ठंडक बनी हुई है और लगता है शाम तक अच्छी ठंड होने वाली है। रात का तापमान तो लगभग मायनस डिग्री में पहुंच जाता है जिससे पाला भी पड़ जाता है। तिब्बतियों के निवास के लिए यह मौसम आदर्श है। सड़क के किनारे साल के बड़े-बड़े वृक्ष आसमान से होड़ यहीं लेते हैं। रात को इस पठार में भालुओं का भ्रमण भी होता है। यदा कदा निवासियों से उनकी मुड़भेड़ होने के समाचार मिलते रहते हैं।