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रविवार, 21 अगस्त 2016

सम्राट अशोक का धौली एवं रुपनाथ शिलालेख

अशोक का रुपनाथ शिलालेख
सम्राट अशोक के शिलालेख उड़ीसा के समुद्र तट से लेकर अफ़गानिस्तान तक पाए जाते हैं। इन शिलालेखों से धर्मादेशों के साथ शासन व्यवस्था की भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। अशोक का यह शिलालेख तहसील बहोरीबंद के ग्राम पडरिया जिला कटनी में स्थित है जो कि जबलपुर से लगभग 83 किलोमीटर दूर है। सम्राट अशोक शिलोत्कीर्ण धर्मादेशों में एक तीसरी शताब्दी ईस्वीं पूर्व का शिलालेख यहां प्राप्त हुआ है। यह शिला लेख साढ़े चार फुट लंबा, और 1 फुट चौड़ा है तथा उसमें 6 पंक्तियां है। जिनके विषय में विश्वास किया जाता है कि वे ई0 पूर्व लगभग 232 में उत्कीर्ण की गई थी। धर्मादेश में स्थानीय बौद्ध संध को संबोधित किया गया है जिससे यह पता चलता है कि उसे जारी करने के ढाई वर्ष पूर्व महान् मौर्य सम्राट बौद्ध बन चुका था। उसका उद्देश्य संध के सदस्यों को उत्साही बनने तथा कर्तव्य परायण जीवन व्यतीत करने के लिये प्रोत्साहित करना था। उक्त शिलालेख ब्राम्हीलिपि तथा पाली भाषा में है।
अशोक का रुपनाथ शिलालेख
रूपनाथ के शिलालेख का हिन्दी अनुवाद
(क) देवानांप्रिय ने ऐसा कहाः-
(ख) ढाई वर्ष और कुछ अधिक व्यतीत हुये मैं प्रकाश रूप से शाक्य था।
(ग) किन्तु मैनें अधिक पराक्रम नहीं किया।
(घ) किन्तु एक वर्ष और कुछ अधिक व्यतीत हुए जबकि मैंने संघ की यात्रा की है (तबसे) अधिक पराक्रम करता हूं।
(ड) इस काल में जम्बू दीप में जो देवता (मनुष्यों से) अमिश्र थे वे इस समय (मेरे द्वारा) (उनके साथ) मिश्र किये गये है।
(च) पराक्रम का ही यह फल है।
(छ) यह (केवल) उच्च पदवाले (व्यक्ति) से प्राप्त नहीं होता (किन्तु) क्षुद्र (व्यक्ति) से भी पराक्रम द्वारा विपुल स्वर्ग की प्राप्ति शक्य है।
(ज) और इस प्रयोजन के लिये श्रावण (उद्घोषणा) की व्यवस्था की गई जिससे क्षुद्र और उदार सभी पराक्रम करे और (मेरे) सीमावर्ती लोगा भी (इसे) जानें (और) यह कि यहीं पराक्रम चिरस्थायी हो।
(झ) यह प्रयोजन (मेरे द्वारा) अधिकाधिक बढ़ाया जायेगा, और विपुलतया बढ़ाया जायेगा कम से कम डेढ़ गुना बढ़ाया जायेगा।
(झ) इस विषय को अवसर के अनुकूल पर्वत पर उत्कीर्ण करावें और यहां जहां भी शिलास्तंभ हों, शिला-स्ंतभों पर लिखवायें।
(ट) और इस श्रावण (उद्घोषणा) के अक्षर के अनुसार (आप) सर्वत्र (एक अधिकारी) भेजें जहां तक आपके आहार (जिले) का विस्तार हो।
(ठ) यह श्रावण (उद्घोषणा) मेरे द्वारा यात्रा (व्युष्ट) के समय किया गया जब
(ड.) 256 पडाव (निवास) यात्रा में बीत चुके थे।

अशोक का धौली शिलालेख

भुवनेश्वर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर धौली नामक टेकरी है, जहाँ पर मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक द्वारा अंकित करवाए हुए कुल ३३ अभिलेखों में से एक प्राप्त हुआ हैं। यह ब्राह्मी शिलालेख अशोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफ़ाओं की दीवारों में अपने २६९ ईसापूर्व से २३१ ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाए। ये आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं। इस ब्राह्मी शिलालेख को 1837 में लेफ़्टिनेंट मार्कम किट्टो द्वारा ढूंढा गया था। इस शिलालेख में अशोक के चौदह अनुशासनों में से 11 को लिपिबद्ध किया गया है। कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ, उसने जनसाधारण पर अपनी सहृदयता की छाप छोड़ने के उद्देश्य से इस आदेश का प्रचार करवाया। इसमें लिखा है कि - 
अशोक का धौली शिलालेख
1 - किसी पशु का वध न किया जाए और राजकीय पाकशाला एवं मनोरंजन उत्सव न किए जाएं।
2 - मनुष्यों एवं पशुओं के चिकित्सालय खुलवाए जाएं एवं उसमें औषधि की व्यवस्था की जाए। मनुष्यों एवं पशुओं की सुविधा के लिए मार्ग में छायादार वृक्ष लगवाए जाएं एवं राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था कुंए खुदवा कर की जाए।
3 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि प्रति पांच वर्ष पश्चात धर्म प्रचार के लिए जाएं।
4 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि व्यवहार के सनातन नियमों यथा नैतिकता एवं दया का सर्वत्र प्रचार किया जाए।
5 - धर्ममहामात्रों की नियुक्ति एवं धर्म एवं नैतिकता का प्रचार प्रसार किया जाए।
6 - राजकीय पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश है कि सर्वलोकहितकारी कुछ भी प्रशासनिक सुझाव एवं सूचना मुझे प्रत्येक स्थान एवं समय पर दें।
7- सभी जाति एवं धर्मों के लोग सभी स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे आत्म संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं।
8-राज्याभिषेक के दसवें वर्ष अशोक सम्बोधि (बोध गया) की यात्रा कर धर्म यात्राओं का प्रारंभ किया जाए। ब्राह्मणों एवं श्रमणों का दर्शन एवं गरीबों के नैतिक कल्याण का प्रचार किया जाए।
9- दास तथा अनुचरों के प्रति शिष्टाचार का पालन करें, जानवरों के प्रति उदारता एवं ब्राह्मणो तथा श्रमणों के प्रति उचित व्यवहार करने का आदेश दिया गया।
10- अशोक ने घोषणा कि यश एवं कीर्ति के लिए नैतिकता होनी चाहिए।
11- धर्म प्रचारार्थ अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर शिलाओं पर धम्म लिपिबद्ध कराया जिसमें धर्म संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं का वर्णन है।
एक अन्य पृथक शिलालेख ;में अशोक तोशाली के महामत्तों को आदेश देता है कि सभी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान के लिए इच्छा करता हूं कि इहलोक एवं परलोक में उनकी सुख समृद्धि हो,उसी प्रकार सम्पूर्ण प्रजा के लिए मेरी यही इच्छा है। बिना उचित कारण के किसी को शारीरिक दंड, ईर्ष्या, क्रोध आदि दुर्गुणों से रहित निष्पक्ष मार्ग का अनुशरण करने का आदेश देता हूँ।
तोशाली के महामात्रों को आदेश है कि सीमांत राज्यों के लोगों के हित - कल्याण को ध्यान में रखा जाए एवं उनपर अनुग्रह की नीति अपनाई जाए।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

सम्राट अशोक से एक मुलाकात - कलिंग यात्रा

भुवनेश्वर एक ऐसा नगर है जहाँ हम कोई भी सड़क पकड़ कर किसी भी तरफ़ निकल जाएं दर्शनीय एवं पुरातत्वीय स्मारकों के दर्शन हो जाएगें। अब हम धौली जा रहे थे, जो भुवनेश्वर से लगभग किमी की दूरी पर है। चलते मेरे ध्यान में ध्यान में नहीं था कि यह महत्वपूर्ण स्थान है और इसके बिना मेरी भुवनेश्वर यात्रा अधुरी रह जाएगी। यह एक टेकरी/ डूंगरी पर स्थित है। ऑटो वाले ने डूंगरी से थोड़ी दूर पर ही उतार दिया। पैड़ियों से ऊपर जाने पर  स्तूपनुमा इमारत दिखाई दी। यह नई बनी प्रतीत हो रही थी। इसकी चारों दिशाओं में बुद्ध को विभिन्न आसनों में दिखाया गया है। पहली प्रतिमा धम्म परिवर्तन मुद्रा, दूसरी प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा, तीसरी प्रतिमा गणिका द्वारा खीर प्रदान करते हुए, चौथी प्रतिमा अभय मुद्रा, पांचवी प्रतिमा निर्वाण मुद्रा में स्थापित की गई है। इस स्तूप का निर्माण बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा कराया गया है। बड़ी संख्या में लोग इस स्थान का भ्रमण करने आते हैं।
धौली स्तूप भुवनेश्वर 
धूप सिर पर चढ रही थी और भूख का समय भी हो गया था। शरीर की उर्जा चूक रही थी। इसलिए हमने लौटने की योजना बना ली। जल्दी ही ऑटो तक पहुंच गए। पहाड़ी से उतरते समय बांए तरफ़ एक स्थान को फ़ेंसिग से घेरा गया देख कर मैने ऑटो रुकवा लिया। उतरने पर देखा कि वहाँ पुरातत्व सर्वेक्षण का सूचना फ़लक लगा हुआ है अर्थात यह स्थान महत्वपूर्ण है इसे देखना जरुरी है। पता चला कि यहाँ सम्राट अशोक का शिलालेख है। बस इतना जानना था कि शरीर में चूकी हुई उर्जा पुन: आ गई और हम टेकरी पर चढ गए। यहाँ एक चट्टान को काटकर हाथी का शिरोभाग निर्मित किया गया है और इसी चट्टान पर एक बड़ा शिलालेख अंकित है। शिलालेख को कांच से ढक दिया गया है जिससे फ़ोटो स्पष्ट नहीं ली जा सकती। 
अशोक शिलालेख धौली 
यह शिलालेख सवा दो हजार वर्ष पूर्व  मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक द्वारा अंकित करवाया गया था। उसके कुल ३३ अभिलेखों में से यह एक प्राप्त अभिलेख हुआ हैं। इसे ब्राह्मी शिलालेख अशोक ने स्तंभों, चट्टानों और गुफ़ाओं की दीवारों में अपने २६९ ईसापूर्व से २३१ ईसापूर्व चलने वाले शासनकाल में खुदवाया था। अशोक के शिलालेख आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं। इस ब्राह्मी शिलालेख को 1837 में लेफ़्टिनेंट मार्कम किट्टो द्वारा ढूंढा गया था। इस शिलालेख में अशोक के चौदह अनुशासनों में से 11 को लिपिबद्ध किया गया है। कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ, उसने जनसाधारण पर अपनी सहृदयता की छाप छोड़ने के उद्देश्य से इस आदेश का प्रचार करवाया। इसमें लिखा है कि - 
कांच से घिरा हुआ शिलालेख 
1 - किसी पशु का वध न किया जाए और राजकीय पाकशाला एवं मनोरंजन उत्सव न किए जाएं। 
2 - मनुष्यों एवं पशुओं के चिकित्सालय खुलवाए जाएं एवं उसमें औषधि की व्यवस्था की जाए। मनुष्यों एवं पशुओं की सुविधा के लिए मार्ग में छायादार वृक्ष लगवाए जाएं एवं राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था कुंए खुदवा कर की जाए। 
3 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि प्रति पांच वर्ष पश्चात धर्म प्रचार के लिए जाएं। 
4 - राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि व्यवहार के सनातन नियमों यथा नैतिकता एवं दया का सर्वत्र प्रचार किया जाए। 
5 - धर्ममहामात्रों की नियुक्ति एवं धर्म एवं नैतिकता का प्रचार प्रसार किया जाए। 
6 - राजकीय पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश है कि सर्वलोकहितकारी कुछ भी प्रशासनिक सुझाव एवं सूचना मुझे प्रत्येक स्थान एवं समय पर दें।
7- सभी जाति एवं धर्मों के लोग सभी स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे आत्म संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं।
8-राज्याभिषेक के दसवें वर्ष अशोक सम्बोधि (बोध गया) की यात्रा कर धर्म यात्राओं का प्रारंभ किया जाए। ब्राह्मणों एवं श्रमणों का दर्शन एवं गरीबों के नैतिक कल्याण का प्रचार किया जाए।
9- दास तथा अनुचरों के प्रति शिष्टाचार का पालन करें, जानवरों के प्रति उदारता एवं ब्राह्मणो तथा श्रमणों के प्रति उचित व्यवहार करने का आदेश दिया गया।
10- अशोक ने घोषणा कि यश एवं कीर्ति के लिए नैतिकता होनी चाहिए।
11- धर्म प्रचारार्थ अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर शिलाओं पर धम्म लिपिबद्ध कराया जिसमें धर्म संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं का वर्णन है।
राजा एवं राणा  सम्मुख 
एक अन्य पृथक शिलालेख ;में अशोक तोशाली के महामत्तों को आदेश देता है कि सभी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान के लिए इच्छा करता हूं कि इहलोक एवं परलोक में उनकी सुख समृद्धि हो,उसी प्रकार सम्पूर्ण प्रजा के लिए मेरी यही इच्छा है। बिना उचित कारण के किसी को शारीरिक दंड, ईर्ष्या, क्रोध आदि दुर्गुणों से रहित निष्पक्ष मार्ग का अनुशरण करने का आदेश देता हूँ। तोशाली के महामात्रों को आदेश है कि सीमांत राज्यों के लोगों के हित - कल्याण को ध्यान में रखा जाए एवं उनपर अनुग्रह की नीति अपनाई जाए। -  इस तरह सम्राट अशोक से भेंट हो गई शिलालेख के माध्यम से, अब हम धौली से चलकर भुवनेश्वर अपने डेरे में पहुंच गए। जारी है आगे पढें…॥

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

बूढ़ा नीलकंठ में सूतल विष्णु : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
शुपतिनाथ मंदिर के बाद हमारा अगला पड़ाव बूढ़ा नीलकंठ था। काठमांडू की गलियों के बीच वातानुकूलित बस का ड्रायवर कुशलता का परिचय दे रहा था। बड़ी लक्जरी बस को आसानी के साथ चौड़े चौक चौराहों पर मोड़ लेता था। हमारी बस काठमांडू की सड़कों पर चक्कर काटते हुए बूढ़ा नीलकंठ मंदिर पहुंची। मंदिर से थोड़ी दूरी पर बस को विश्राम दिया गया और हम गली से होते हुए मंदिर तक पंहुचे। काठमांडू के मध्य से 10 किलोमीटर की दूरी पर शिवपुरी हिल के समीप यह मंदिर स्थित है। पूजन सामग्री की दुकाने नीचे ही गली में लगी हुई थी। इन दुकानों  में अधिकतर महिलाएं काम करते दिखाई दी। 
   खाई - खाजा की दुकान 

मंदिर के प्रवेश द्वार की चंद्रशिला के उपर पद्मांकन दिखाई दिया। उसके पश्चात पैड़ियों के बीच में चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा स्थानक मुद्रा में स्थापित है। मुख्य द्वार के किवाड़ों पर पीतल का पतरा चढा हुआ है तथा उसके एक किवाड़ पर  शिव परिवार के सदस्य कार्तिकेय एवं दूसरे किवाड़ पर गणेश जी विराजमान हैं। इस स्थान पर हमने कुछ चित्र लिए। द्वार पर पुष्प पत्र बेचने वालों ने कब्जा जमा रखा था तथा इस मंदिर में भी एकमात्र हिंदुओं को ही प्रवेश की अनुमति है। अन्य धर्म के लोग यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते। 
कार्तिकेय 

प्रवेश द्वार के समक्ष जल का विशाल कुंड बना हुआ है, जिसमें शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा है। प्रतिमा का निर्माण काले बेसाल्ट पत्थर की एक ही शिला से हुआ है। प्रतिमा का शिल्प मनमोहक एवं नयनाभिराम है। शेष शैया पर शयन कर रहे विष्णु की प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई 13 मीटर बताई जाती है। शेष नाग के 11 फ़नों के विष्णु के शीष पर छत्र बना हुआ है। विष्णु के विग्रह का अलंकरण चांदी के किरीट एवं बाजुबंद से किया गया है। प्रतिमा के पैर विश्रामानंद की मुद्रा में जुड़े हुए हैं। शेष नाग भी हष्ट पुष्ट दिखाई देते हैं।
 सुनीता यादव, रविन्द्र प्रभात, राजीव शंकर मिश्र, नमिता राकेश, मनोज भावुक, मनोज पाण्डे 

जलकुंड को चारदीवारी से घेरा गया है सभी ब्लॉगर शंख, चक्र पद्म एवं गदाधारी चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा के चित्र ले रहे थे तथा मैं इस जुगत में था कि इस विशाल प्रतिमा का एक बढिया सा चित्र लिया जाए। मैंने कुंड की चार दिवारी में प्रवेश करके एक चित्र लिया तो एक व्यक्ति ने मुझे वहाँ लिखी चेतावनी की ओर इंगित किया। जिस पर लिखा था कि चार दिवारी के भीतर चित्र लेना वर्जित है। फ़ोटो खींचने के बाद सभी ब्लॉगर एक वृक्ष की छांव में बैठ गए तथा सुनीता सभी के विडियो बनाने लगी। अभी हमारे दल का नेतृत्व राजीव शंकर मिश्रा बनारस वाले कर रहे थे। 
अक्षिता पाखी, आकांक्षा यादव, कृष्ण कुमार यादव, मुकेश तिवारी, सुनीता यादव

मंदिर से लौटते हुए उन्होनें उपस्थित ब्लॉगर्स को रुद्राक्ष के कुछ फ़ल भेंट किए तथा बताया कि इन फ़लों से रुद्राक्ष निकालने के लिए कैसी साधना करनी पड़ती है। अब यहाँ पर समस्या यह थी कि मंदिर का नाम बूढ़ा नीलंकठ है तथा शेष शैया पर भगवान विष्णु विराजे हैं, द्वार पर जय विजय की तरह शिव परिवार के उत्तराधिकरी कार्तिकेय एवं गणेश पहरा दे रहे हैं और भगवान विष्णु क्षीर सागर में मजे से आनंद ले रहे हैं। बूढ़ा नीलकंठ महादेव तो कहीं दिखाई नहीं दिए। जब बूढा नीलकंठ ही इस स्थान पर नहीं है तो यह नाम इस स्थान के लिए रुढ कैसे हो गया? यह प्रश्न दिमाग में कौंध रहा था।
बूढ़ा नीलकंठ

विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे गोंसाईकुंड झील का निर्माण हुआ। सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है गोसाईंकुंड झील जो 436 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. काठमांडू से 132 उत्तर पूर्व की ओर स्थित गोसाईंकुंड पवित्र स्थल माना जाता है। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में उसी गोसाईन कुंड का जल आता है, जिसका निर्माण भगवान शिव ने किया था। श्रद्धालुओं का मानना है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब जल में दिखाई देता है। इसके दर्शन एक मात्र श्रावण माह में होते हैं।
चतुर्भुजी विष्णु

बूढ़ा नीलकंठ प्रतिमा की स्थापना के विषय में स्थानीय स्तर पर दो किंवदंतिया प्रचलित हैं, पहली प्रचलित किंवदंती है कि लिच्छवियों के अधीनस्थ विष्णु गुप्त ने इस प्रतिमा का निर्माण अन्यत्र करवा कर 7 वीं शताब्दी में इस स्थान पर स्थापित किया। अन्य किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसके हल का फ़ाल एक पत्थर से टकराया तो वहाँ से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो इस प्रतिमा का अनावरण हुआ। जिससे बूढ़ा नीलकंठ की प्रतिमा प्राप्त हुई तथा उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन पूजन कर रहे हैं। 
सरोज सुमन, मुकेश तिवारी, रविन्द्र प्रभात, मनोज भावुक विश्रामासन में 

नेपाल के राजा वैष्णव धर्म का पालन करते थे, 12 वीं 13 वीं शताब्दी में मल्ल साम्राज्य के दौरान शिव की उपासना का चलन प्रारंभ हुआ तथा 14 वी शताब्दी में मल्ल राजा जय ने विष्णु की आराधना प्रारंभ की एवं स्वयं को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। 16 वीं शताब्दी में प्रताप मल्ल ने विष्णु के अवतार की पराम्परा सतत जारी रखी। प्रताप मल्ल को दिखे स्वप्न के आधार पर ऐसी मान्यता एवं भय व्याप्त हो गया कि यदि राजा बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करेगें लौटने पर उसकी मृत्यु अवश्यसंभावी है। इसके पश्चात किसी राजा ने बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन नहीं किए। इस मंदिर में देवउठनी एकादशी को मेला भरता है तथा श्रद्धालु भगवान विष्णु  के जागरण का उत्साह पूर्वक आशीर्वाद लेकर जश्न मनाते हैं। 
काठमांडू नगर 

काठमांडू में इसके अतिरिक्त विष्णु की शयन प्रतिमाएं हैं, एक प्रतिमा बालाजु बाग में स्थापित है जिसका दर्शन आम जनता कर सकती है तथा दूसरी प्रतिमा राज भवन में स्थापित है, जिसके दर्शन आम आदमी के लिए प्रतिबंधित हैं।बौद्ध धर्मी नेवारी समुदाय इसे बुद्ध मान कर पूजा करता है तथा हिन्दुओं के द्वारा मना करने पर उनकी पूजा करने की परम्परा चली आ रही है। हम बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करने के उपरांत आगे की नेपाल दर्शन यात्रा में चल पड़े। अब हमारा अगला पड़ाव पाटन दरबार चौक था।

नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें……

रविवार, 12 मई 2013

तरीघाट में प्राचीन सभ्यता के अवशेष

 जे. आर. भगत 

भनपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित खारुन नदी के बांए तट पर बसा है तरीघाट गाँव। तरीघाट जैसा की नाम से प्रतीत होता है कि यह कोई नदी का निचले किनारे स्थित घाट होगा, इसलिए तरीघाट कहलाता है। खारुन नदी रायपुर एवं दुर्ग जिले को विभाजित करती है। एक किनारा रायपुर जिले में है और दूसरा किनारा दुर्ग जिले में। खारुन नदी में पानी बारहों महीने रहता है और भिलाई या पाटन जाने के लिए इस नदी को डोंगी से पार करके जाना पड़ता था। फ़िर एक दशक पूर्व पास के गाँव वाले रपटा बना लेते थे और उससे जाने वाले से कुछ शुल्क लेकर कमाई करते थे। मैने मोटर सायकिल से खारुन नदी को कई बार पार किया और कभी इसके काई लगे पत्थरों पर बाईक सहित गिरकर घुटने भी फ़ोड़वाए। कुछ वर्षों पहले इस नदी पर पुल बन गया और आवागमन सहज होने लगा।

अतुल प्रधान, नरेन्द्र शुक्ल, जे. आर. भगत उत्खनन का शुभारम्भ  
अभनपुर से दुर्ग जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग सदियों से हो रहा है। अब इस अंचल से प्राचीन कालीन मानव बसाहट के अवशेष मिलने लगे हैं। रास्ते  के गाँव चंडी में देवी का प्रसिद्ध मंदिर है तथा इसका निर्माण भोसला राजाओं द्वारा किया प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिण दिशा में तालाब का भी निर्माण हुआ है तथा सैनिक बसाहट के भी चिन्ह मिलते हैं। इससे आगे चलने पर नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है। परसुलिडीह से ही नदी के उस पार बड़े बड़े टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जाते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी। ग्रामीणों ने यहाँ महामाया का मंदिर बना रखा है और एक टीले पर रावण भी विराजमान होने से यह रावण भाटा भी है।

पॉटरी यार्ड
छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग के उप संचालन जे आर भगत ने विधिवत सर्वे कर शासन से इस स्थान पर उत्खनन की अनुमति प्राप्त की। 17 मार्च को लगभग सांय 4 बजे तत्कालीन पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ला ने उत्खनन का शुभारंभ किया और इस स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। उत्खनन सहयोगी के रुप में अतुल प्रधान यहाँ मुस्तैदी से तैनात हैं। कुछ दिनों के बाद रावण भाटा वाले स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। 23 मार्च को मैं यहाँ पहुंचा तो बसाहट के चिन्ह उजागर हो चुके थे। यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं।

टीले पर उत्खनन और पार्श्व में खारुन नदी 
उत्खनन में सिरपुर जैसी कोई बड़ी संरचना तो प्राप्त नहीं  हो रही, परन्तु टेराकोटा के बर्तन, मूर्तियाँ, बीटस बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही लोहा, तांबा से बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। मानवोपयोगी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएं दिया, मटकी, सुराही, मर्तबान, सिल-बट्टा, सिरेमिक का एड़ी घिसने का बट्टा इत्यादि भी प्राप्त हो रहा है। सुत्रों से प्राप्त सूचना के आधार ज्ञात हुआ है कि कुषाण वंशीय तांबे के सिक्कों के साथ गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। लोहे के औजारों में भालों के फ़ाल, ठेकी के मुसल का लोहा इत्यादि प्राप्त हुआ है। इन प्राप्तियों से छत्तीसगढ़ के इतिहास में परिवर्तन होगा एवं इतिहास समृद्ध भी होगा। जे आर भगत उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से उत्साहित है और कहते हैं कि हो सकता है यहाँ 16 महाजनपदों में से किसी एक जनपद के अवशेष प्राप्त हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस साईट की तिथि सिरपुर से भी आगे निकल गई है।

उत्खनन में प्राप्त संरचना का स्तर 
तरीघाट के आस-पास के गाँवों में भी पुरा सामग्रियाँ प्राप्त हो रही हैं। जिसका तत्त्कालिक उदाहरण ग्राम पंदर में मनरेगा के दौरान उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं हैं। इससे जाहिर होता है कि सातवाहनों का प्रसार पाटन तक था एवं गाँव का पंदर नाम बंदर का अपभ्रंश हो सकता है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। तरीघाट में स्थित इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट थी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते थे। उत्खनन के दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ के मिट्टी के दैनिक उपयोग के बर्तन प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के दीये बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। उत्खनन सतत चल रहा है तथा प्राचीन सभ्यता के चिन्ह निरंतर अनावृत हो रहे हैं। मेरा अनुमान है कि नदी के किनारे इस स्थान पर सैनिक छावनियाँ हो सकती हैं। आगे उत्खनन से और भी स्थिति साफ़ होगी तथा ज्ञात होगा कि इस स्थान का इतिहास में क्या महत्व  था?