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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

तिब्बत से निर्वासन की टीस बाकी है आज तक ………

मैनपाट पर पहुचने पर एक स्थान पर दूर से ही हवा में लहराती हुई रंग बिरंगी पताकाएं दिखाई देने लगी। लगभग 12 बजने को थे। पताकाओं लिखे तिब्बती बौद्ध प्रार्थना मंत्र हवा के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे। बस मुझे तो इस गाँव में पहुंचना है। साथियों को चेता दिया मैने। छत्तीसगढ अंचल में बनने वाले कवेलू और मिट्टी के घरों को चटक भड़कीले रंगो से पोता गया था। दूर से ही देखने से पता चल जाता है कि यह कोई तिब्बती बस्ती है। जब मैं धर्मशाला गया था तब वहाँ से लौटते हुए बस में एक तिब्बती सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर से मुलाकात हुई थी। रास्ते में धर्मशाला से खजियार तक मेरी उनसे तिब्बत के विषय पर चर्चा हुई। जिससे तिब्बतियों के विषय में भरपूर जानकारी मिली।
मोनेस्ट्री की दीवार पर तिब्बती भाषा
इस तिब्बतियों की बस्ती को कमलेश्वरपुर कह्ते हैं एवं शरणार्थियों की बसाहट के हिसाब से इसे कैम्प नम्बर 2 नाम दिया गया है। यहाँ प्रार्थना करने के लिए छोटा मठ भी है। मंदिर परिसर में मैने छोटे मनौती स्तूपों से लेकर एक दीवार पर निर्मित सहस्त्र बुद्ध प्रतिमाएं भी देखी। मैनपाट में तिब्बतियों के 7 कैम्प हैं। प्रत्येक कैम्प का एक मुखिया है और सभी 7 कैम्पों  का एक प्रधान मुखिया है। यहाँ से निर्वासित तिब्बती सरकार का एक सांसद चुना जाता है। शरणार्थी होने के कारण ये भारत के निर्वाचन में मतदान नहीं कर सकते। भारत में इनकी  कई पीढियाँ हो चुकी है फ़िर भी इन्होने बांग्लादेशियों  जैसे भारत की नागरिकता के लिए कोई आवेदन नहीं किया है। इनकी आशा अभी तक लगी हुई है कि चीन से तिब्बत को आजादी मिलने के बाद अपने वतन को वापस चले जाएगें।
तिब्बतियों के गाँव की सुनसान गली
इस कैम्प में मेरी मुलाकात तिब्बतियों के बुजुर्ग लोतेन से होती है। मैं गलियों में घुमते हुए उनके घर के पास पहुचता हूँ। टीन शेड का सुंदर मकान में बड़ा सा आंगन है। आँगन के भीतर एक मचान पर खाल में भुसा भरा हुआ बछड़ा रखा है। एक अरसे के बाद यह दृश्य देखने मिला। शावक की मौत होने पर भैंस या गाय दूध देना बंद कर देती  हैं। इसलिए उस शावक की खाल में भूसा भरवा कर उसके समक्ष रखने से भैंस और गाय दूध देने लगती हैं। इस बछड़े के पुतले का उपयोग इसी प्रयोजन से किया जाता है। एक मचान पर मक्का के भुट्टे सुखाने के लिए लटकाए हुए थे। आँगन में धान सुखाया हुआ था जिसे दो मजदूर बोरों में भरकर घर के भीतर रख रहे थे। इससे जाहिर होता है कि तिब्बती खेती करने में भी माहिर हैं।
सरसों की फ़सल एवं हवा में तैरती मंत्र पताकाएं
तिब्बतियों का यह गाँव सुनसान दिख रहा था। सिर्फ़ कुछ बुजुर्ग एवं कुछ बच्चे ही दिखाई दे रहे थे। मुझे देखकर लोतेन की  पत्नी कुर्सियाँ लेकर आती है और 1942 में तिब्बत के खम्नांचिन में जन्मे लोतेन मेरे पास आकर बैठ जाते हैं। उनसे चर्चा प्रारंभ होती है। वे बताते हैं कि तिब्बत 1961 में निर्वासित होने के बाद सबसे पहले वे नेपाल के मोनकोट में आए। उसके पश्चात 1963 में नेपाल से भारत में प्रवेश किया। इनके परिवार ने नेपाल से भारत में पैदल ही प्रवेश किया। तब भारत सरकार ने इन्हे शरणार्थी मान कर भारत में शरण दी। ठंडे प्रदेशों में रहने के कारण तिब्बतियों की भारत की गर्म जलवायु रास नहीं आई। जिससे कईयों की मृत्यु हो गयी। दलाई लामा के प्रयास से भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भारत के प्रदेशों में ठंडे स्थान की खोज करवा कर वह स्थान इनके रहने के लिए आबंटित किए।
सहस्त्र बुद्ध 
उनमें से एक स्थान छत्तीसगढ का मैनपाट भी था। मैनपाट में तिब्बतियों की बसाहट 1965 में हुई। एक परिवार के 7 सदस्यों के हिसाब से इन्हे जीवन यापन के लिए 5 एकड़ भूमि दी गयी। मकान बनाकर देने के साथ 3 साल तक फ़्री राशन दिया गया। लोतेन भारत सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। वे बताते हैं कि इन्होने ने यहाँ आलू, मक्का, टाऊ आदि की कम पानी की खपत वाली फ़सलें लगाना प्रारंभ किया। जिससे जीवन यापन होने लगा। साथ ही कालीन एवं स्वेटर का निर्माण का परम्परागत व्यवसाय भी प्रारंभ किया गया। महिलाएं हाथ से स्वेटर बनाकर अम्बिकापुर में बेचकर आती थी। अब हाथ की बनी मोटी स्वेटर को कोई पहनता नहीं है। इसलिए लुधियाना से मशीन की बनी हुई स्वेटर लाई जाती है। अभी गाँव के सारे जवान स्त्री पुरुष स्वेटर बेचने के लिए छत्तीसगढ एवं मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में गए हुए हैं।
बौद्ध मठ  की पीठिका
लोतेन की उत्त्मार्ध चाय बनाकर ले आती हैं। चीनी बड़े-बड़े मग चाय के भरे हुए थे। एक कप चाय पीना कठिन था। लेकिन उनके आग्रह को देखते हुए चाय पीनी पड़ी। उन्होने बताया कि सारे कैम्पों मे। लगभग ढाई हजार तिब्बती निवास करते हैं। यहाँ पर परम्परागत तिब्बती औषधियों से युक्त अस्पताल भी है। जिसमें धर्मशाला से तिब्बती डॉक्टर आकर ईलाज करते  हैं। कैम्प नम्बर 1 में मुख्य मठ है जहाँ लामा निवास करते हैं। मुख्य धार्मिक कर्मकांड वहीं सम्पन्न कराए जाते हैं। उन्होने मुझे अपना और पत्नी का पासपोर्ट दिखाया जिसमें उनका  नाम पता एवं उम्र के साथ नेपाल के रास्ते पैदल भारत आने का विवरण दर्ज है। यह भारतीय पासपोर्ट इन्हे भारत का शरणार्थी होने का जिक्र करते हुए जारी किया गया।
लोतेन के साथ यायावर 
मै लोतेन से चर्चा कर रहा था और राहुल, पंकज एवं विष्णु वहाँ से गायब हो चुके थे। शायद मेरी और लोतेन की चर्चा उन्हे निरर्थक लगी होगी। क्योंकि यह चर्चा उनके कोई काम की नहीं थी। ये निर्वासित लोग बड़ी मेहनत के बाद परदेश में अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लेकर आए हैं। एक बात गौर करने योग्य है। 50 बरस बाद भी इन लोगों ने अपनी भाषा, कर्मकांड, संस्कृति को नहीं छोड़ा है। मैनपाट में तिब्बतियों के लिए केन्द्रीय स्कुल है, जहाँ पढाई 8 वीं तक होती है इसके पश्चात आगे की कक्षाओं की पढाई के लिए हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला जाना पड़ता है। मैनपाट स्थित तिब्बतियों का संबंध इनकी निर्वासित सरकार के साथ सतत बना रहता है। उनके निर्देशों के अलावा भारत सरकार के कानूनों का पालन करते हैं। अपनी मिट्टी से उजड़ने का दर्द इनके मन को कचोटता है। दर्द इनकी आँखों में स्पष्ट झलकता है। भले ही यहाँ जन्म लेने वाली इनकी अगली पीढी ने तिब्बत नहीं देखा पर जंतर मंतर तक तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए इनकी आवाज गुंजती  है।
इहै है सिक्छा कर्मी परतापपुर के
लोतेन से विदा लेकर बाहर गली में निकला तो ये चारों गायब थे। गलियों में दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिए। मै पैदल ही पैदल मोनेस्ट्री तक आ गया। वहाँ लगी मूर्तियों को निहारने लगा। थोड़ा समय व्यतीत होने पर आगे बढा तो एक चौराहा दिखाई दिया। जहाँ सायकिल की दुकान पर कुछ तिब्बती युवा महफ़िल जमाए हुए थे। समीप ही आदिमजाति कल्याण विभाग का छात्रावास था। छात्रावास के मैदान में बड़ी बड़ी घास उगी हुई थी। वातावरण में ठंडक होने के कारण शिक्षक ने अपनी कुर्सी मैदान में ही डाल रखी थी। बच्चे सब खेल रहे थे। मैंने आश्रम परिसर में प्रवेश किया और शिक्षक के पास पहुंचा। उसने मेरे आगमन पर कोई ध्यान नहीं दिया। टेबल पर रखे रजिस्टर में कुछ लिखता रहा। चर्चा करने पर पता चला कि एक शिक्षा कर्मी है और प्रतापपुर से यहाँ पढाने के लिए आता है। इतनी देर में पंकज का फ़ोन आ गया कि वे गरम समोसे बनवा कर ला रहे हैं। थोड़ी देर में आ पहुंचे और हम टाईगर प्वांईट की ओर चल पड़े।

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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

तीवरदेव बौद्ध महाविहार ......Sirpur Chhattisgarh........... ललित शर्मा

भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध 
प्राम्भ से पढ़ें 
तीवरदेव महाविहार सिरपुर का प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, दक्षिण कोसल में उत्खनन से प्राप्त अब तक का बड़ा विहार है, इसका उत्खनन 2002-2003 में अरुण कुमार शर्मा ने किया था। उत्खनन के दौरान उपलब्ध प्रमाणों एवं उपलब्ध अभिलेखों से इस महाविहार को महाशिवगुप्त तीवरदेव के शासनकाल में छठी शताब्दी के मध्य में निर्मित माना जाता है। बौद्ध विहार में प्रवेश करने पर बहुत ही सुन्दर अलंकृत प्रवेश द्वार दिखाई देता है। प्रवेशद्वार का शिल्प अद्भुत है, शिल्पकार ने विभिन्न विषयों पर अपनी छेनी चलाई है। मगर और बन्दर की  पंचतंत्र की कथा के साथ बिल से निकल कर सांप का मेंढक को पकड़ना, पुष्प पर बैठी हुई मधुमक्खी का अंकन, चाक पर बर्तन बनता हुआ कुम्हार, प्रेमासक्त चुम्बन आलिंगनरत युगल का अंकन आकर्षक है।

तीवरदेव विहार की प्रतिमा 
प्रवेशद्वार की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है। शिल्पांकन महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि यहाँ पशु मैथुन का दृश्य है, इसमें हाथियों को मैथुन मुद्रा में दिखाया गया है। विशिष्ट इसलिए भी है की बौद्ध विहारों में इस तरह के शिल्पांकन का अभाव रहता है। प्रणयरत  युगल मूर्तियाँ विशेष आकर्षण का केंद्र है। भीतर प्रवेश करने पर 16 अलंकृत स्तम्भ दिखाई देते हैं, इन पर ध्यान मुद्रा में बुद्ध, सिंह, मोर, चक्र आदि का मनोहर शिल्पांकन है। गर्भ गृह के पश्चिम में भूमि स्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त रत्न संभव तथा पद्मपाणि की प्रतिमाएं भी प्राप्त हुयी हैं। जल निकासी के लिए भूमिगत नालियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इससे  होता है कि जल निकासी की व्यवस्था वास्तुकारों ने उत्तम बनायीं थी।

विहार की ईंटों की दीवारें 
इस विहार के उत्त्खन्न के दौरान मेरा सिरपुर दौरा हुआ था। तब नहीं लगता था कि यह इतना विशाल होगा। यह भी आभास नहीं था कि कभी मुझे इस पर लिखना भी होगा। प्रस्तर के स्तम्भ देख रेख के आभाव में खंडित हो रहे है। बंदरों की उछल कूद के कारण एक स्तम्भ तो दो भागों में बंटा दिखाई दिया। भारतीय पुरातत्व संरक्षण के पास बड़ा अमला है, उन्हें इसका रासायनिक संरक्षण करना चाहिए। यह विहार 902 वर्ग मीटर के परिक्षेत्र में बना हुआ है। इस स्थान पर अन्य विहार के साथ बौद्ध भिक्षुणी विहार भी स्थित है। कहते हैं कि जब वज्रयान संप्रदाय का उद्भव हुआ तब से भिक्षुणियों को भी पृथक विहार बना कर विहार संकुल में उनके रहने की व्यवस्था की गयी। उत्खनन में वज्रयान का प्रतीक धातु का वज्र भी प्राप्त हुआ है।

विहार का विस्तार 
अरुण कुमार शर्मा कहते हैं कि इस विहार के कक्षों को कालांतर में पूजाकक्षों में परिवर्तित कर दिया गया लगता है. इस परिवर्तन के बाद इस विहार का दक्षिण दिशा में विस्तार किया गया है। अनेक नवीन कक्षों का निर्माण किया गया, पूर्व की अपेक्षा एक बड़े मंडप का भी निर्माण किया गया तभा चारों ओर 36 मी लम्बा और 1.5 मी चौड़ा गलियारा है। इस विहार में सीढियाँ भी मिली हैं, जिससे उत्खननकर्ता अनुमान लगते हैं की यह विहार दो मंजिला रहा होगा। मेरा अनुमान है की यह विहार बहुमंजिला भी हो सकता है, क्योंकि व्हेनसांग ने 10,000 बौद्ध भिक्षुओं के सिरपुर में निवास करने का जिक्र किया है। उनके रहने की व्यवस्था करने के लिए इस विहार को अन्य विहारों की अपेक्षा विशाल और प्रमुख बनाया गया होगा।

मुख्य द्वार पर कुम्हार की मूर्ति 
यह विहार कसडोल जाने वाले मार्ग पर सिरपुर चौराहे से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। राजीव  और मैंने यहाँ चित्र लिए। मेरे कानों में बौद्ध धर्म के मन्त्रों की गूंज हो रही थी। "ॐ मणि पद्मे हूँ" के बीज मंत्र का जाप हो रहा है, जाप की ध्वनि से सारा वातावरण गुंजायमान है। कषाय वस्त्रों में बालक, युवा बौद्ध भिक्षु बुद्ध सरीखे दिखाई दे रहे हैं। शुद्धो असि, बुद्धो असि, निरंजनो असि, के दर्शन यही हो रहे हैं। तीवरदेव महाविहार के मुख्यद्वार से निकलते हुए सोचा रहा था कि अनीश्वरवादी बुद्ध को कितनी सफाई से हिन्दूधर्म में अवतार घोषित कर समाविष्ट कर लिया गया। परन्तु ये तो तय है कि बौद्ध धर्म की स्थापना के पूर्व बुद्ध हिन्दू ही थे। भारत में यह ऐसा अवतार हुआ जिसके सिद्धांतों को देश से अधिक विदेशों में माना और समझा गया। तीवरदेव विहार से हम नागार्जुन के विहार और राजमहल के अवलोकनार्थ चल पड़े। ......... जारी है ........ आगे पढ़ें ........

मंगलवार, 31 मई 2011

साला! कोई बेवजह हमें गुर्राए और उसे हम छोड़ दें? कदापि नहीं !------ ललित शर्मा

आरम्भ से पढ़ें  शाम को जब हम नूरपुर से धर्मशाला पहुंचे तो केवल ने पूछा कि-"आपने कभी मोमो खाया है? मैने कहा नहीं। तो वह बोला चलो आज मोमो खाते हैं। तिब्बतियन स्पेशल है। मैने कहा- "देख रे भाई! मोमो के चक्कर में कहीं अंट-शंट खा लिया तो मुझे 2 हजार किलो मीटर से भी अधिक की यात्रा करनी है और बस भी नहीं रुकती रास्ते में।" मोमो की दुकान में पहुंच गए। पता चला कि मोमो 2 तरह के बनते हैं। वेज और नानवेज। हमने वेज मोमो का आर्डर दिया। नानवेज का क्या भरोसा? मोमो लाते तक मैं उसके विषय में तस्दीक करते रहा कि कैसे बनता है और उसमें क्या मसाला डाला जाता है।

मोमो का आर्डर आ चुका था। कुछ-कुछ गुझिया जैसी आकृति थी और गर्म था। इसे गुझिया जैसे बेल कर हरी सब्जी का मसाला भर दिया जाता है और फ़िर भाप में पकाया जाता है। साथ में लालमिर्च और लहसुन की चटनी के साथ परोसा जाता है। स्वाद तो अच्छा लगा। लेकिन मैदा की चिंता सदा रही थी, कहीं परेशानी का कारण न बन जाए। मोमो यहाँ समोसे जैसे फ़ास्ट फ़ुड के रुप में प्रचलित है। जहाँ थोड़ी भूख लगी और मोमो खा लिए। तिब्बती अपने साथ अपनी पाक कला भी लेकर आए। जो परम्पराएं तिब्बत में थी, उन्ही परम्पराओं में अभी भी जी रहे हैं। अब मोमो बनाने का काम भारतीय लोग भी करने लगे हैं, बड़े बड़े रेस्टोरेंट खोल कर मोमो और तिब्बतियन फ़ुड बेच रहे हैं।

मैं और केवल 1 मई शाम से 7 मई शाम तक साथ ही रहे। कभी नहीं लगा कि किसी अलग कुनबे-कबीले से हैं। अंतरताना माध्यम बना हम दोनो के रुबरु होने का। हँस-मुख स्वभाव होने के कारण केवल मनमोहन हो जाता है और मैं ललित ही रहता हूँ। मैं आस-पास को अच्छी तरह परखता हूँ। प्राकृतिक सौंदर्य में रम जाता हूँ बाकी सब भूल कर। समस्याओं की गठरी सर पर धर कर नहीं चलता। जहाँ का सामान था वहीं छोड़ दिया और आगे बढ लिए। समस्याएं तो हर जगह पर मिल जाती हैं और चिंता करने का सबब जब चाहे तब। यही मेरी यायावरी है। लोग भ्रम में रहते हैं कि वे दुनिया को चला रहे हैं। लेकिन जो दुनिया को चला रहा है वह जानता है कि यह कैसे चल रही है।

केवल का रुम अच्छी जगह है। सामने धौलाधार की बर्फ़ से आच्छादित पहाड़ियाँ और चारों तरफ़ हरियाली। पास ही बड़ा सा खेल का मैदान और रुम के सामने तैनात मालिक-ए-मकान का झबरीला स्वान। पहले एक दो बार तो देख कर गुर्राया। फ़िर पहचान लिया कि कोई मेहमान है जो रोज सुबह जाता है और शाम-रात को वापिस आता है। एक दिन सुबह मकान वाली अंटी जी ने चेरी लाकर दी। रंग तो उनका बहुत सुंदर था। कटोरी में उन्हे धोया और एक चेरी मुंह में डाली तो उसका स्वाद बहुत ही खट्टा था। उसे खाना मेरे तो बस की बात नहीं थी। केवल के हवाले कर दिया। चेरी मीठी हो तो उसका स्वाद ही कुछ अलहदा होता है। लेकिन रंग तो गजब का ही होता है।

रोज सुबह उठने के लिए घड़ी में अलार्म भरने की जरुरत नहीं थी। केवल के रुम के साथ ही मुर्गियों का दड़बा था। उसमें 20-25 तगड़ी-तगड़ी मुर्गियाँ थी। वे बांग देना शुरु कर देती थी। फ़िर दोपहर में भी बांग देती थी। मैने पूछा कि-क्या इनके लिए दो बार सवेरा होता है। सुना है कि जब मुर्गियाँ बीमार होती हैं तो बासते रहती हैं। केवल ने बताया कि दोपहर में अन्डे देने के बाद भी बांग देती हैं। मतलब ईमानदारी से मालिक को सूचित करती हैं, अन्डे बाहर आ गए हैं, फ़िर मत कहना कि बताया नहीं। जानवरों एवं पक्षियों में ईमानदारी होती है। चचा की मुर्गियां जैसे ये मुर्गियां चतुर चालाक बेईमान नही थी। एक आदमी ही बेईमान है जिसकी ईमानदारी कब फ़ना हो जाए उसका पता ही नहीं चलता।

अन्डे देने के बाद मालकिन मुर्गियों को आजाद कर देती थी। उनके लिए आंगन मे दाने बिखेर देती थी और उधर अन्डों को उठा लेती थी। मुर्गियाँ भी मालिक को पहचानती हैं। केवल मुझे कई दिनों से चिकन के लिए कह रहा था। इसको वो मुर्गियाँ भी सुन रही थी। जब भी यह बाहर निकलता इसे देख कर गुर्राने लगती थी। मैं मना कर देता था, अभी तो घास-फ़ूस ही खाने का मन है। मुर्गियाँ भी खुश थी। एक दिन केवल ने फ़िर पूछ लिया सुबह-सुबह और मैने भी हाँ कर दी। बस फ़िर क्या था। वो लाल वाली मुर्गी, जो मुर्गियों की सरदार थी। क्रोधित होकर मेरी ओर जोर से गुर्राई और मेरे कैमरे मे कैद हो गयी। मैने उसे आश्वस्त किया कि माल तुम्हारे दबड़े से नहीं आएगा, निश्चिंत रहो। केवल मार्केट से ही लेकर आएगा।

शाम को लौटते समय सब सामान साथ था बिरयानी बनाने का। बटर, दही, मसाला, चावल, मैजिक मुव्हमेंट, सोडा चखना इत्यादि। बिरयानी बनाने लगे। घन्टा लग गया बिरयानी बनाने में। गिरीश दादा बोले-"हमारे लिए थोड़ी चैट बाक्स में ही डाल दीजिए।" कभी-कभी बचपना कर ही जाते हैं। अब पराठे बनाने का नम्बर था। मैने कई लेयर वाला पराठा बनाना बताया केवल को। बस फ़िर क्या था, केवल ने वैसे ही देशी घी में कई पराठे बना डाले। सुबह के नाश्ते में भी वही पराठे बनाए। बहुत दिनों के बाद पसंदीदा पराठे खाकर आनंद आ गया। सुबह हुयी तो फ़िर वही मुर्गी सामने आ गयी। देख कर गुर्राई। मैने केवल से कहा कि अब इसका भी इंतजाम करना पड़ेगा। साला! कोई बेवजह हमें गुर्राए और उसे हम छोड़ दें ,कदापि नहीं । यह बेइन्साफ़ी नहीं हो सकती। मुर्गी ने सुन लिया, समझ गयी कि परदेशी को बिला वजह गुर्राना ठीक नहीं है। वरना खतरा हो सकता है। पता नहीं कब आधी रात को काम तमाम हो जाए।

अन्डों का रेट भी बहुत बढ गया है। मैने तो सोचा भी नहीं था कि 30 रुपये दर्जन होगें। सुनकर बड़ा झटका लगा। जब मैं कॉलेज में पढता था तो 3 रुपए दर्जन थे। एक दर्जन से तीन दिन का काम चल जाता था। सुबह बेकमेंस की ब्रेड के साथ आमलेट का नास्ता काफ़ी होता था। कभी सब्जी के भी काम आ जाते थे। जब वर्जिस करते थे और 3 घंटे रोज व्हाली बॉल की प्रैक्टिस, तो 1 दर्जन अन्डो की नित्य की खुराक थी। शाम को जब खेल कर वापस आता तो गोवर्धन आमलेट बनाकर और उबाल कर तैयार रखता था। उसके बड़े ग्राहक हम ही थे। उसके बाद आज तक कभी खरीदने की नौबत ही नहीं आई। क्योंकि खाए ही नहीं। जब से पढा कि इसमें "सालमोनेला" एवं "डी डी टी" होता है जो शारीरिक नुकसान करता है।

7 मई शाम को 6 बजे मेरी बस थी दिल्ली के लिए, जो मुझे 6 बजे आई एस बी टी पहुंचा देती। फ़िर वहाँ से शाम 5/25 को मेरी ट्रेन रायपुर के लिए थी। मैने अविनाश जी को मोबाईल पर कहा कि रविवार है और समय भी है कहीं बैठ कर गपिया लेते। बोले ठीक है, मैं फ़ोन करता हूँ। मैने निजामुद्दीन वाले पंडित जी को भी फ़ोन किया। केवल ने मुझे आराम करने कहा और नाश्ता करके कालेज चला गया। मै जब घर से चला था तो लाहौल स्पिति जाने की सोच रखी थी। अजय से बात करने पर पता चला कि रोहतांग पास अभी खुला नही हैं। 80 फ़ीट बर्फ़ जमी है। बी आर ओ बर्फ़ काट रहा है अभी एकाध हफ़्ता और लग जायेगा। मेरी योजना पर तुषारापात हो चुका था। फ़िर तय किया कि जुलाई में पांगी घाटी और लाहुल दोनो जगह जाएगें और ब्लॉगिंग पर एक कार्यशाला वहीं करेंगे।

दोपहर तक नेट पर गपशप होते रही। कुछ मित्र नित्य का हाल चाल ले लेते थे और सुबह-शाम श्रीमति जी भी। सभी से सम्पर्क बना रहा। दोपहर आकर केवल ने खाना बनाया, मैने खाना खा कर मुर्गियों से विदा ली। लाल वाली मुर्गी ने भी संतोष की सांस ली कि अब खतरा टल गया। परदेशी चला गया। रास्ते हमारे छत्तीसगढिया बंधु लोग पुन: मिल गए, हम बस स्टैंड पहुंचे। अभी बस नही आई थी। केवल ने 11 नम्बर की सीट बुक करवा रखी थी। यह सीट बस की सबसे अच्छी सीट होती है। सीट देखकर ही आनंद आ गया। केवल ने आगे के मार्ग की जानकारी दे दी थी कि कहां खाना खाना है और कहाँ लघुशंका की जगह मिलेगी। बस आ गयी, हमने सीट संभाली। देखा तो वही काणा कंडेक्टर था जो जिसकी बस में हम दिल्ली से आए थे और वही बस थी।
केवल से विदा लेना भी कठिन था। वह बड़े ही भावुक मन का है। उसकी भावुकता को मैं समझ रहा था। तभी बस में एकतारा बजाने वाला लड़का आ गया। उसने धुन बजाई और मैने रिकार्ड कर लिया। बस चल पड़ी, केवल कचहरी के समीप उतरा। मैने भी भारी मन से उसे छोड़ा। एक हरियाणवी फ़िल्म का गाना याद आ रहा था-"परदेशी की प्रीत की रे, कोई मत न करियो होड़, बनजारे की आग यूँ भई, गया सुलगती छोड़"। कुछ ऐसा ही घट रहा था। धर्मशाला में बिताए 6 दिन जीवन की धरोहर बन गए। रात को 9 बजे बस ढलियारा पहुंची। यहीं खाने का इंतजाम था। सभी यात्रियों को खाना खिला कर बस चल पड़ी। रास्ते में निर्मला कपिला जी गाँव आया नंगल। काफ़ी बड़ा गाँव है। नंगल देखकर निर्मला जी याद किया। चलो घर न देखा तो कोई बात नहीं पिंड तो देख लिया। कभी रब ने चाहा तो वो भी देख लेंगे।

मेरी बगल वाली सीट पर एक तिब्बती प्रोफ़ेसर थे। उन्होने धर्मशाला में ही टी शर्ट और हाफ़ पैंट पहन ली थी। उन्होने बताया कि पहाड़ों से नीचे आने पर गर्मी बढ जाती है, इसलिए हाफ़ पैंट पहन ली। मैने कहा-दिल्ली पहुंचकर तो यह भी उतारनी पड़ेगी हा हा हा"। उनसे तिब्बती संस्कृति के विषय में मुझे बहुत कुछ जानने मिला। नंगल के बाद झपकी आने लगी, पैर फ़ैलाकर सो गया। उन्ना में बस रुकी तब आँख खुली। उसके बाद अगला स्टापेज चंडीगढ था। एक झपकी के बाद हम दिल्ली पहुंच चुके थे। बस ने आई.एस.बी.टी. उतार दिया। मैने निजामुद्दीन के लिए मुद्रिका पकड़ी और निजामुद्दीन की ओर चल दिया। अविनाश जी की खबर नहीं आई थी। आगे पढें 

मंगलवार, 24 मई 2011

वो कालेज के दिन, वो तितलियाँ और भंवरे --- ललित शर्मा

डॉ.कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री जी ,जय प्रकाश जी एवं ललित शर्मा
आरम्भ से पढ़ें  रात को ही केवल ने चेता दिया था की आज सुबह जल्दी तैयार होना है. उनके स्टडी सेंटर में हिंदी विभाग, पत्रकारिता विभाग एवं अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वाधान में "हिंदी भाषा एवं न्यू मीडिया: चुनौती और संभावनाएं" विषय पर सेमिनार रखा गया है. सुबह हम जल्दी तैयार हो गए थे ११ बजे हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय के क्षेत्रिय स्टडी सेंटर धर्मशाला में पहुँच गए. यहाँ हमारी मुलाकात पत्रकारिता विभाग के जय प्रकाश जी से हुयी. बनारस के रहने वाले अच्छे व्यक्ति है. इनकी पत्रकारिता जैसे विषय पर गहरी पकड़ है. इन्होने मुझसे बस्तर की घटनाओं के विषय में चर्चा की. इसके पश्चात् केंद्र के निदेशक डॉ.कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री जी से भेंट हुयी.

अंग्रेजों के ज़माने का कालेज 
बिलासपुर जिले के बिल्हा अग्रसेन महाविद्यालय के समाजशास्त्र के सेमिनार में व्याख्यान के पश्चात काफी दिनों बाद कालेज के विद्यार्थियों से रूबरू होने का मौका मिला था. यहाँ पहुच कर मुझे भी अपने कालेज के बीते दिन याद आ गए. कालेज के दिनों की यादें किताब में दबे हुए किसी फूल की खुशबु जैसी ही थी. इस कालेज की स्थापना अंग्रेजों के समय में १९२६ में हुयी थी और २००० में यह अपनी प्लेटिनम जुबली मना चूका है. वैसे अध्ययन की दृष्टि से अच्छी जगह है और मौसम भी अच्छा है. कालेज कैम्पस भी बहुत सुन्दर है. अभी भी अंग्रेजो की बनायीं हुयी ईमारत में ही लगा रहा है. जिसमे ठण्ड में गर्मी के लिए बुखारी लगी हैं, जिसकी चिमनियाँ ईमारत की छत से नजर आती हैं. कालेज कैम्पस हरा-भरा है. तरह-तरह के फुल खिले हैं. तितलियाँ और भंवरे भी पुष्प रज का आनंद ले रहे हैं. इस कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट यहाँ और यहाँ भी पढ़ सकते हैं.

केवल राम जी- राम राम जी
कार्यक्रम के पश्चात केवल राम जी विद्यार्थियों के लिए कालेज केंटिन में स्वल्पाहार की थी. एक बात तो कहनी पड़ेगी, केवल अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हैं. उन्हें अपने विषय की अच्छी समझ है. विद्यार्थी भी उनका प्रेमादर करते हैं. जब कैंटीन में पंहुचा तो ऐसा लगा के हमारे ज़माने की कैंटीन और आज की कैंटीन में कोई खास फर्क नहीं है. थोडा सा तो बदलाव हुआ है. अब लड़के और लड़कियां बेझिझक साथ बैठते हैं और २५ साल पहले थोड़ी दूरी थी. यहाँ मेरा एक नए शब्द से परिचय हुआ "संघी चबूतरे". अच्छा शब्द है और अपनी व्याख्या स्वयं ही कर देता है. कैंटीन में संघ के प्रचारक संजीव से भी मुलाकात हुयी. हमें भी वो दिन आये जब आपात काल के समय शाखा लगाया करते थे और दक्ष होकर "नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।" गाया करते थे. बाद में हमारा संघ लिंक टूट गया था.

IPL- क्रिकेट स्टेडियम 
अपरान्ह हम पैदल-पैदल घुमने निकले. पुलिस लाइन होते हुए क्रिकेट स्टेडियम तक गए. जहाँ IPL के मैच होने थे.स्टेडियम सुन्दर चटक रंगों से सजाया गया है. इस स्टेडियम का मैदान उलटी रकाबी की तरह है. ३० गज के दायरे के बाहर बाल निकलने के बाद पकड़ में नहीं आने वाली, चौका पक्का मानकर चलो. पुलिस ग्राउंड में फुटबाल का मैच चल रहा था. आर्मी का बैंड बज रहा था. अफसर भी मौज लेने के सारे तरीके लगा ही लेते हैं. धर्मशाला में पैदल चलना याने चढ़ाई और उतराई ही है. चढ़ते समय घुटनों पर जोर पड़ता है और उतारते समय एडियों की मरम्मत हो जाती है. तिब्बती लामा घूमते हुए मिल रहे थे. एक हाथ में माला लिए जप चल रहा था."काम करते रहो, नाम लेते रहो. प्रभु के प्रति समर्पित रहो."

ग्राउंड प्लेन -- शहीद स्मारक
वैसे धर्मशाला कांगड़ा जिले का जिला मुख्यालय है. धौलाधार की घाटियों के बीच बसा सुन्दर नगर है. जगह-जगह पानी की टंकियां लगी हैं जहाँ से यात्री जल ले सकते हैं. ठंडा पानी चश्मे से आता है. चश्मे का पाने निर्मल होता है. जिसमे खजिन यौगिक भी होते हैं. हमने देखा कि एक जगह कालेज का नया ओडोटोरियम बन रहा है. डिज़ाइन तो अच्छा था. पैदल चलते-चलते हम शहीद स्मारक आ गए. जहाँ शहीदों की याद में स्मारक बना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. शहीद स्मारक के सामने एक फाईटर प्लेन खड़ा है. साथ ही टैंक और हस्तचालित तोपें, जो युद्ध में काम आ चुकी हैं यहाँ रखी है. आस-पास हरियाली है और इस मौसम में तो पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा जवान हो जाता है. यहाँ एक ओपन थियेटर भी बना हैं, जहाँ नाटक खेले जाते हैं. हमारे यहाँ भी है मुक्ताकाश.

भूतपूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश शांता कुमार जी और मैं
शहीद स्मारक का निर्माण तत्कालीन मुख्यमंत्री शांताकुमार जी ने कराया था. शांताकुमार जी से मेरा परिचय १९९८ में हुआ था. बड़े ही सज्जन व्यक्ति हैं. उनके यहाँ कोई अनजान भी समस्या लेकर चला जाये, उसे वही सम्मान मिलता है जो परिचित को मिलता है और उनका काम तत्काल होता है. इस स्मारक पर शहीद सैनिको के नाम खुदे हैं. मैंने भी ह्रदय से शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. यहाँ शाम के समय बहुत सारे सैलानी आते हैं. शहीद स्मारक में ५ रूपये की टिकिट लगती है. साथ ही एक रेस्टोरेंट भी है. जब हम पहुचे तो दो ही टेबलों पर लोग थे. एक टेबल पर दो तिब्बती लेपटोप पर कुछ देख रहे थे और दूसरी टेबल पर मोटी-मोटी कजरारी आँखों वाली दक्षिण भारतीय त्वंगी मोबाइल पर लगी हुयी थी. हमने भी वहीँ डेरा डाल लिया. एक-एक आइसक्रीम लेकर कुछ टाइम पास किया. इसके सामने ही रेडिओ स्टेशन है. मोबाइल पर एक गीत " आज पीने की दावत है यारों, चाँद पर बैठ कर हम पीयेंगे" हमने भी सुना.

बहुत स्पीड है हिमाचल में
अब फिर ११ नंबर की सवारी से चल पड़े ठिकाने की ओर.... रास्ते में एक बोर्ड लगा देखा, मैंने उसका एक चित्र लिया. सोचा की कभी काम आ जायेगा. घर पहुचने पर खाना बनाया गया. केवल कुछ नानवेज बनाना चाहता था और मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. साग-भाजी से ही काम चलाया जाये वही ठीक है. लाल किले के सामने से निकले तो वही भीड़ लगी हुयी थी. यहाँ भीड़ कम ही नहीं होती. कुछ हमारे छत्तीसगढ़िया बंधू भी खड़े सोच रहे थे कि अब खरीद ही लिया जाय. आज तो इतना कमा ही लिए हैं. घर पहुच कर अगले दिन की प्लानिंग में जुट गए. कल जाना है मैक्लोडगंज याने दलाई लामा के घर उसके पश्चात एक हिमाचली धाम में जाना है. सोचा की इसी बहाने हिमाचली गाँव की सैर भी कर लेंगे. ग्रामीण जन-जीवन के विषय में कुछ जानेगे....... आगे पढें…

सोमवार, 23 मई 2011

मेट्रो पिलर नंबर 420 और दाड़ी के लिए बस --- ललित शर्मा

ललित,संजीव,राजीव,गिरीश,अवधिया,बी.एस.पाबला
आरम्भ से पढ़ें  दिल्ली की सुबह हुई.. गुरुदेव जल्दी स्नान करके झोला लेने चले गए. सामान काफी हो गया था. इसलिए झोले की जरुरत पड़ गयी. मैंने आधा सामान गुरुदेव को थमाया और आधा अल्पना जी को. पाबला जी के रूम में पहुचे तो गिरीश बुलेरो लिहाफ में थे. चाय-चाय चिल्ला रहे थे. बिना चाय के इनकी नींद ही नहीं खुलती. चाय थोड़ी देर में आई. गिरीश जी ने आँखें खोली. फिर स्नानादि के पश्चात दही पराठों का आर्डर दिया गया. छक के नाश्ता किया. तब तक राजीव तनेजा जी पहच चुके थे. मुझे उनके यहाँ जाना था. और पाबला जी, संजीव तिवारी जी, जी.के अवधिया जी को सुनीता जी के यहाँ स्नेह भोज पर, अल्पना जी को फ्लाइट पकडनी थी. इसलिए वे होटल में ही रुक रही थी. इनकी फ्लाइट शाम की थी. गिरीश जी की ट्रेन दोपहर को थी. उन्हें जबलपुर जाना था, निजामुद्दीन से, हम साथ साथ ही चले. चलते-चलते सब से विदा ली. फिर मिलने के वादे के साथ.

ब्लॉगर मस्ती-- आ जा जरा नच के दिखा.
सुनीता+पवन जी के यहाँ कल की शार्ट मीट यादगार रहेगी. काफी आनंद आया. राजीव जी के साथ चल पड़े उनके घर की ओर. रास्ते में मशहूर दही-भल्ले की दुकान थी. वहीँ से राजीव जी ने दही भल्ले लिए. कहा कि ब्लोगिंग करते हुए बैठ कर खायेंगे. घर पहुचने पर बच्चों से मुलाकात हई. माणिक भी अब बड़ा हो गया. एकाध वर्ष में कद राजीव जी के बराबर हो जायेगा. थोड़ी देर नेट पर बिताने के बाद भाभी जी (संजू तनेजा) का आदेश आ गया था, खाना तैयार है. मैंने तो नाश्ता ही भरपूर कर लिया था. थोड़ी बहुत भी जगह खाली नहीं थी. फिर भी चावल, राजमा ले ही लिया. दही भल्ले भी लिए. भोजनोपरांत राजीव जी के कारखाने गए. मैं ड्राईविंग लायसेन्स घर भूल आया था. सोचा की इसकी फोटो का प्रिंट निकलवा कर लेमिनेशन करवा लूँ तो कम चल जायेगा. एक कलर लेब में गए तो उसने कहा कि १०० रूपये लगेगे और मेरे पास मोटा पेपर नहीं है. मतलब कि दिन दहाड़े डाका. हमने मना कर दिया.

नांगलोई मेट्रो स्टेशन
मेट्रो से नागलोई पहुचे. राजीव भाई का कारखाना मेट्रो पिलर नंबर 420 पर है. आज कल दिल्ली में पता मेट्रो के पिलर से ही बताया जाता है. नांगलोई स्टेशन के सामने ही राजीव जी का कारखाना है. पिछली बार यहीं पर यशवंत मेहता जी से मुलाकात हुयी थी. अब वो मुंबई बैंक ऑफ़ बड़ोदा में है. कभी-कभी फोन कर लेते है. राजीव भाई नांगलोई से काम निपटा कर मुझे कश्मीरी गेट छोड़ने आये. यहीं पर केवल राम से मुलाकात होनी थी. तब तक हमने मेक्डोनाल्ड में बर्गर खाया. टाइम पास करने के लिए ६.२० बजे केवल पहुँच चुके थे. राजीव जी से विदा लेकर हम बस स्टैंड चले गए. वहां धर्मशाला के लिए बस पकडनी थी. बस ६.५० पर चलती है. टिकिट खिड़की में लाइन लगी थी. हमें ३३-३४ नंबर सीट मिली 2x2  मामला पीछे की सीट का था. केवल के कंडेक्टर से गुजारिश करने के बाद भी सामने की सीट नहीं मिली. बस चल पड़ी.

केवल राम का बढ़ा हुआ कद
मेरी बस में पहली लम्बी यात्रा थी. जो लग-भग १२ घंटे की होने वाली थी. बस का पहला स्टापेज पिपली था. बस खड़ी होते ही होटल वालों ने पुकारना शुरू किया, खाना-खाना-खाना. हमें भी खाना ही था. होटल में सामने ही टायलेट बना रखा था. ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहाँ होटलों भट्ठी होती है. इसका फायदा उस होटल वाले को बहुत मिलता है. ३ घंटे की यात्रा के पश्चात सवारियां बस रुकने पर सबसे पहले टायलेट ही ढूंढ़ती है और उसके बाद खाने की तरफ बढ़ती है. हमने भी टेबल संभाली और खाने का ऑर्डर दिया. राजमा का साग लिया. मदरस के लिए पूछा तो बेयरे ने कहा की नगद १२०/- दीजिये. अभी लाता हूँ. उसका भी इंतजाम किया गया. जब बिल पेमेंट करने पहुचे तो एक सवारी होटल वाले से जूझ रही थी. ४ रोटी आधा चावल और सब्जी के उससे १२६ रूपये का बिल बना दिया था. सवारी कह रही थी "मैंने सब्जी मांगी ही नहीं, वेटर बोला कि चावल के साथ आती है, इसलिए मैंने खा ली." होटल वाला कहाँ छोड़ने वाला था. उसने पूरे पैसे वसूल कर लिए.

डीजल यहाँ से डलबायें
अब यहाँ से चलने पर हिचकोले खाती सीट पर नींद आ गयी. कब चंडीगढ़ निकल गया पता ही नहीं चला. अगले स्टॉप उन्ना में बस रुकी, वहां सरकारी पेट्रोल पंप है जहाँ हिमाचल प्रदेश रोडवेज की गाड़ियाँ डीजल लेती है. यहाँ विसर्जन करके फिर बस चल पड़ी. अगला स्टॉप था ढलियारा. यहाँ एक होटल में तरह-तरह की मिठाइयाँ सजी थी. कोई रात के ३ बज रहे थे. कुछ ठण्ड का अहसास होने लगा था. हमने चाय बनवा कर पी. इसके बाद केवल सोने लगा. बस चक्करदार रस्ते में चक्कर काट रही थी. चक्कर सा आने लगा और पसीने भी. आँख बंद कर के सीट पर पड़ गया. बस जवाला जी में रुकी. जैसे तैसे सुबह ६ बजे धर्मशाला पहुचे.बस स्टैंड से हमने दाड़ी  के लिए बस ली. ३ रुपये का किराया लगा दोनों सवारियों का. केवल के रूम पर पहुच कर सबसे पहले तो चाय पी और सोने का मन था. रात भर की थकान से बेहाल था.

पोस्ट ऑफिस चौक 
केवल खाना खिला कर कालेज चला गया और मैं सो गया. दिन भर सोया रहा. उठने का मन ही नहीं किया. फिर शाम को केवल के आने के बाद खाना खाया और फिर सो गया. रात को कुछ बदन में हरारत सी हो गयी थी. थकन इतनी थी की उठने की हिम्मत ही नहीं थी. आज नहाया भी नहीं. सुबह डॉ.श्रीधर को फोन लगा कर दवाई पूछी तो पता चला कि वो दार्जलिंग में है. उसकी भी घुमाई चल रही है. उसने एंटीबायोटिक बताई. शाम को केवल दवाई लेकर आया. २५०/- की ६ टेबलेट. पता नहीं डॉ. ने भी कौन से जनम की दुश्मनी निकाली थी. सोच रहा होगा.. कि "साले फोन पर दवाई पूछते हैं, थोडा झटका दे ही दिया जाये." 

छत्तीसगढ़िहा-सबले बढ़िया 
शाम को एक खुराक लेने के बाद हम लोग धर्मशाला में घुमने निकले.बाज़ार में घुमते हुए मुझे कुछ  हमारे छत्तीसगढ़ के मजदूर मिले. मुझे आश्चर्य हुआ. मैंने जब उनसे चर्चा करने की कोशिश की तो उन्होंने बात नहीं करना चाहा. थोड़ी देर बाद देखा तो बाजार में हर जगह यही दिख रहे है. स्थानीय लोगों से चर्चा के पश्चात पता चला कि ये लोग यहाँ निर्माण के काम में संलग्न हैं. नीव खोदने से लेकर लेंटर ढलने तक इनके अलग ग्रुप हैं. भाटापारा, सरसींवा के लोग अधिक मिले. सरकार छत्तीसगढ़ में भरपूर रोजगार दे रही है. १ रूपये किलो में ३५ किलो चावल, मुफ्त में नमक और चरण पादुका तक बांटी जा रही है. ऐसी स्थिति में मजदूरी के लिए पलायन तो नहीं  हो सकता. हाँ कुछ लोग हैं जिन्हें बहार की आब-ओ-हवा पसंद है. इसलिए काम करने चले आते हैं, मजदूरी भी अधिक मिलती है. इसका लालच भी इन्हें खींच लाता है. जबकि हमारे यहाँ  बिहार, उड़ीसा एवं आँध्रप्रदेश के मजदुर काम कर रहे हैं.

लाल किला खरीदने के लिए लगी लाइन
शहर का एक चक्कर लगते हुए. गुरुद्वारे की तरफ से हम कचहरी, डाकखाना देखते हुए, हनुमान जी के दरबार में पहुच गए. हनुमान जी ही सकल कष्टों को दूर करते हैं. इनके दर्शन होते ही, हरारत और थकान गायब हो गयी. बाज़ार से सब्जी लेते हुए. हम लाल किले की दुकान में पहुच गए. यहाँ लाल किला मिलता है. मूल्य साईज के हिसाब से है. और जो दुकान दार मुंह से कह दे वही देना पड़ेगा. मर्जी है उसकी. नए लोगों से अधिक मूल्य लिया जाता  है. यह मुझे बाद में पता चला. साथ में संतरा भी मिलता है. स्वाद उत्तम है, यहाँ का संतरा मीठा है. अधिक खंटास नहीं है. कुल मिलकर मैजिक मूवमेंट (जादू) ठीक है.... अभी तो भ्रमण प्रारंभ ही हुआ है.......आगे जारी........ बिना गोले की तोप 

शनिवार, 7 मई 2011

अमर उजाला में सेमीनार का समाचार

हिमाचल(धर्मशाला) के अमर उजाला में सेमीनार का समाचार
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गुरुवार, 5 मई 2011

हिंदी भाषा और न्यू मीडिया: संभावनाएं एवं चुनौतियाँ--सेमिनार धर्मशाला में

तबियत ठीक है, कल दिनांक ४/५/२०११ को "हिंदी भाषा और न्यू मीडिया: संभावनाएं एवं चुनौतियाँ" विषय पर   हिमाचल प्रदेश विश्व विद्यालय क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला में हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग द्वारा सेमिनार का आयोजन किया गया था.

आज जा रहे हैं कांगड़ा की ओर, मिलते हैं वापस लौट कर ..........

मंगलवार, 3 मई 2011

चक्करदार रास्तों ने चक्कर में डाल दिया --- ललित शर्मा

दिल्ली का कार्यक्रम बढ़िया रहा, सभी ब्लॉगर मित्रों से मुलाकात हुयी, बात हुयी. इस कार्यक्रम के साथ मैंने हिमाचल यात्रा का कार्यक्रम भी जोड़ रखा था. इसलिए केवल राम के साथ धर्मशाला आ गया. शाम ६ बजे राजीव तनेजा जी ने ISBT छोड़ा और हम हिमाचल प्रदेश रोड वेज की डीलक्स बस से धमर्शाला के लिए ६.५० को चल पड़े. 2x2 की बस में 33-34 नंबर की सीट मिली. सीट देखते  हे मुड उखड गया. लेकिन किया भी कुछ नहीं जा सकता था. इन्ही सीटों से संतोष करना पड़ा. चंडीगढ़ तक तो ठीक-ठाक पहुचे, उना के बाद चक्करदार रास्तों ने चक्कर में डाल दिया. बस का यह सफ़र लगभग १२ घंटे का है. इतनी लम्बी दूरी  तक पहली बार बस में जाना हुआ. 

सुबह हम धर्मशाला पहुचे तो खासी ठण्ड थी. मैंने गर्म कपडे निकाल लिए. केवल ने चाय बना कर पिलाई और मैं सो गया. दिन भर सोया रहा. शाम को शहर में घुमने गए तो तबियत ठीक नहीं लग रही थी. हरारत सी बदन में थी. थोड़ी देर बाद बुखार सा चढ़ गया. सुबह तक तबियत वैसी ही थी. डॉ. को फोन करके टेबलेट लिखाइ और सुबह टेबलेट ले कर फिर सो गया. बस के सफ़र ने तोड़ कर धर दिया. दो दिनों से खाट छोड़ी ही नहीं है. आस-पास घुमने का सारा उत्साह ठन्डे बस्ते में चला गया. देखते हैं कल तक तबियत कुछ ठीक हो गयी तो आगे की यात्रा की जाएगी. घर के सामने से धौलाधार के शिखर पर बर्फ जमी हुयी है. नजारा बहुत ही अच्छा है. अभी तो इसे ही देख रहा हूँ. हालत देख कर त्रिउंड जाने का इरादा स्थगित कर दिया. इसे नीरज जाट जी के लिए छोड़ दिया.हो सका तो शाम को करमापा से मिला जायेगा. दलाई लामा के यहाँ से सन्देश मिला कि वे धर्मशाला में नहीं है. मेरे यहाँ रुकने तक आ गए तो उनसे भी मुलाकात करने का इरादा है. मिलते हैं ब्रेक के बाद....