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शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

सावधान: अब हाथियों ने राजधानी देख ली है।

हाथियों ने अब राजधानी का रास्ता देख लिया गजदल दो बार राजधानी रायपुर के समीप पहुंच चुका है, यह हाथियों एवं मानवों दोनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। हालिया तौर पर हाथियों को वन विभाग ने जंगल की ओर खदेड़ दिया, परन्तु जो रास्ता हाथियों ने देख लिया है, उस पर वे फ़िर लौटेंगे। अभी तक तो सरगुजा अंचल, जशपुर, कोरबा एवं सिरपुर क्षेत्र के ग्रामीण हाथियों के उत्पात से परेशान हैं तथा हाथी एवं मानव संघर्ष में एक दूसरे को जान गंवानी पड़ रही है। अब यही स्थिति राजधानी रायपुर में भी बनने के आसार दिख रहे हैं।
 फ़ोटो सांकेतिक है, यह मेरे द्वारा राजा जी पार्क हरिद्वार के चिल्ला रेंज में ली गई थी
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात हाथियों की समस्या के निदान के लिए तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने असम से हाथी प्रशिक्षक पार्वती बरुआ को छत्तीसगढ बुलाया था, जिसके द्वारा हाथियों को साधकर हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष को कम किया जाता। परन्तु इस कार्य में एक हाथी मौत के कारण विधानसभा में प्रश्न उठने के बाद इस कार्य को बंद कर दिया गया। हाथियों के हमले से आम ग्रामीणों की जान लगातार जा रही तथा इस संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। फ़सलों का नुकसान को आम बात है, पर हाथियों के दल के सामने अचानक कोई मनुष्य पड़ जाता है तो उसे हाथी पटक कर मार डालते हैं।
ऐसा नहीं है कि हाथियों के दल कहीं दूसरे स्थान से अचानक छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर गए और उत्पात मचा रहे हैं। यहाँ इनकी बसाहट प्राचीनकाल से ही रही है। सरगुजा अंचल के हाथियों को ऐरावत के सदृश उत्तम माना गया है। पहले के राजा महाराजा इन्हें प्रशिक्षित करके अपने काम में लेते थे तथा अन्य राजाओं को भी भेंट करने के उल्लेख मिलते हैं। हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष तो तब भी आमना सामना होने पर रहा होगा, पर इस हद तक नहीं क्योंकि उनके पर्यावास क्षेत्र में मानव का कोई सीधा दखल नहीं था, वे स्वच्छंद विचरण करते थे। कालांतर में मानव द्वारा हाथियों के पर्यावास क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के परिणाम को ही अब भुगतना पड़ रहा है।
अभी तक हाथी और मानव संघर्ष के कारण राजधानी से दूर सरगुजा, प्रतापपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा, बार नवापारा क्षेत्र से से ही धन-जन हानि के समाचार आते थे। तब राजधानी के लोगों को पता नहीं चलता था कि हाथियों की समस्या क्या है और हाथी प्रभावित अंचल के लोग किस तरह भय के वातावरण में अपनी राज गुजारते हैं, किस तरह उनकी फ़सल को हाथी नुकसान पहुंचाते हैं, किस तरह उनके घर फ़ोड़ कर बेघर कर डालते हैं। अब हाथियों ने राजधानी के समीप अपनी आमद दे दी तो उनके पहुंचने की धमक ही होश उड़ाने के लिए काफ़ी है।
हाथियों का शहरी क्षेत्र में पहुंचना अनायास नहीं है। इसके लिए मानव ही जिम्मेदार है। सरकारों की अदूरदर्शी नीतियों के कारण अंधाधुंध कटते जंगल एवं खनिज निकालने के लिए खदानें खुलने के कारण हाथियों के प्राकृतिक रहवास क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ जिम्मेदार है। जंगल कटने एवं जल के प्राकृतिक स्रोत सूखने के कारण हाथियों के सामने भोजन पानी की समस्या खड़ी हो गई है तथा हाथियों के रहवास क्षेत्र में मानवीय दखल बढ़ने एवं उसके नष्ट होने के कारण अब हाथियों को भोजन-पानी के लिए शहरी क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा था। जिससे हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है। 
राजधानी के आस पास हाथियों के पहुंचने की आशंका साल भर पहले से ही जताई जा रही थी। वन्य प्रेमी श्री प्राण चड्ढा ने गत वर्ष अपनी अप्रेल 2016 की ब्लॉग पोस्ट में संकेत दिया था कि "सरहदी इलाके से बढ़ते हुए एक हाथी रुद्री-[धमतरी] के इलाके की रेकी कर आया है।" इस एक वर्ष में ही हाथियों ने अपनी उपस्थिति राजधानी में दे दी। हाथियों के राजधानी में पहुंचने से सरकार की नींद खुलनी चाहिए, क्योंकि मामला अब सुदूर अंचल का नहीं रहा, जो राजधानी चैन की नींद ले सके। शीघ्र ही कोई योजना बनाकर हाथी संकट निदान करना आवश्यक है। खतरा अब सिर पर मंडरा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब राजधानी के लोगों को अपनी जानमाल की सुरक्षा के लिए रतजगा करना पड़ेगा। इसलिए चैन से सोना है तो जाग जाइए वरना बहुत देर हो जाएगी।   

रविवार, 28 अगस्त 2016

जंगल, हाथी और किसान

प्राचीन काल से छत्तीसगढ के वन हाथियों की आदर्श शरण स्थली रहे हैं। विशेषकर सरगुजा अंचल हाथियों के लिए प्रसिद्ध रहा है। मान्यता है कि इंद्र के एरावत जैसे सुंदर गजों के स्वर यहां के वनों में गूंजने के कारण इस अंचल का नाम सरगजा (surgaja) लोक प्रसिद्ध हुआ। यहां के हाथियों का दर्शन लाभ मुझे भी हुए। अबकि बार की सरगुजा बाईक यात्रा के दौरान प्रतापपुर के घाटपेंडारी में 32 हाथियों के दल की उपस्थिति मिली।

उड़ीसा एव॔ झारखंड से हाथियों के आने-जाने का कारीडोर बना हुआ है । इन तीनो राज्यों मे हाथी स्वच्छन्द विचरण करते हैं। बार नवापारा के जंगल में उड़ीसा से आए हुए एक गजदल ने कुछ वर्षों से स्थाई निवास बना लिया है। जंगल कटने के कारण इनका रहवास क्षेत्र निरंतर छोटा होते जा रहा है। नित्य ही हाथियों और मनुष्यों की आपसी मुड़भेड़ के समाचार मिलते रहते हैं। जिनमें कभी हाथियों के हमले से मनुष्य मारे जाते है तो कभी मनुष्यों के हमले से हाथी। दोनो में आपसी मुड़भेड़ सतत जारी है।

खबर है कि जशपुर क्षेत्र के ठाकुरटोली ग्राम में एक हाथी खेत की सुरक्षा के लिए खींचे गये विद्यूत तारों की चपेट में आकर मारा गया। आज आदमी जीत गया, एक खेत की फसल बचाने में कामयाब रहा और एक हाथी की पुन: बलि हो गयी। विडम्बना है कि दोनों को ही वनवास करना है पर दोनो को ही एक दूसरे की उपस्थिति फूटी आंख भी नहीं सुहा रही। जिसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ग्रामीण मानते हैं कि हाथी उनके क्षेत्र का अतिक्रमण कर रहे हैं और जंगल हाथियों की बपौती है। निर्वहन करने कहां जाएगें?

झारखंड राज्य के प्रमुख सचिव सतपथी का कहना था कि वे छत्तीसगढ की सीमा पर हाथियों के आवा गमन के लिए उनके रास्ते मे प्राकृतिक जैसे दिखाई देने वाले सेतू का निर्माण कर रहे हैं जिससे हाथियों को रहवास एवं विचरण के लिए बड़ा क्षेत्र मिल जाएगा तथा आदमी और हाथियों की मुड़भेड़ कम हो जाएगी। छत्तीसगढ सरकार ने भी भी असम से हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूवा को बुलाया था। करोड़ों खर्च हुए पर वह भी कुछ विशेष नहीं कर पाई।

इस आपसी मुड़भेड़ में प्रतिवर्ष कईयों के प्राण हरण होते हैं। ऐसी स्थिति में वनांचल निवासियों को हाथियों को स्वीकार करना होगा तथा सह अस्तित्व मानकर निर्वहन करना होगा। तुम उनके रास्ते मे न आओ वे तुम्हारे रास्ते हे नहीं है। जब तक दोनो एक दूसरे की उपस्थिति स्वीकार नहीं करेगें तब तक दोनो का ही जीना कठिन है। अब हाथी मेरे साथी बनाकर ही जीने से समस्या का हल निकल सकता है।
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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

भानगढ़ की नर्तकियाँ

आरम्भ से पढ़ें 
भानगढ़ पहुंचने से पहले मैने आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के एक मित्राधिकारी को फ़ोन लगाया। कम से कम भानगढ़ में पुरातत्व विभाग के कोई अधिकारी मिल जाते तो हमें सहूलियत हो जाती। थोड़ी देर में उन्होने सब लाईनअप कर दिया और मिस्टर हरिनारायण का नम्बर दे दिया और कहा कि ये आपको साईट पर ही मिल जाएगें। भानगढ़ के किले की ओर जाने से पहले एक गाँव है, जहाँ बहुत सारे शिल्पकारों के परिवार रहते हैं। वे मार्बल की मूतियाँ बनाते हैं। देखने से ही लगता है कि इस गाँव में सिर्फ़ शिल्प का ही काम होता है। कारखानों के सामने बड़े बड़े पत्थरों को छीलते काटते हुए शिल्पकार दिखाई देते हैं। कुछ जगहों पर संगमरमर के बड़े-बड़े हाथी खड़े थे। पूछने पर पता चला कि मायावती की सरकार के समय इनको बनाने का आदेश दिया था। जब से मायावती की सरकार चली गई तब से हाथियों की कोई पूछ नहीं है। हमारी मजदूरी इन हाथियों के रुप में दरवाजे पर पड़ी है। 
जन पत्रकार (ब्लॉगर) - रतन सिंह शेखावत, प्रदीप सिंह शेखावत, ललित शर्मा
हमारे सामने से एक खुली जीप में रंग बिरंगी कैपरी पहने लफ़ाड़ूओं का एक झुंड हो हल्ला करते जा रहा है। उनकी निगाह हमारी तरफ़ पड़ी तो वे चुपचाप निकल लिए। अन्यथा रतनसिंह जी तो हमारे साथ ही थे, फ़िर वे कहीं के नहीं रहते। खेतों से होकर गुजर रही सड़क पे हम चल रहे थे। रास्ते में एक दुकान से कोल्ड ड्रिंक, पानी एवं कुछ स्नेक्स लिए, क्योंकि गढ़ में से तो कुछ मिलने से रहा। थोड़ी दूर सामने पहाड़ियों के बीच गढ़ दिखाई देने लगा। गढ़ की सुरक्षा के लिए मजबूत प्राचीर बनी है। इसके मुख्य द्वार पर हनुमान जी का मंदिर है। यहां कुछ लोगों की भीड़ दिखाई दी, कोई जाजम बिछा रहा था तो कोई कड़ाही उठा रहा था। लगता था आज लाल लंगोटे वाले के रोट की तैयारी हो रही है। आज मंगलवार का ही दिन था। गाँवों में बजरंग बली का रोट करने की परम्परा है। 
उत्खनन में प्राप्त हलवाई की भट्टी
भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है। सामरिक दृष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के यह उपयुक्त स्थान है। सुरक्षा की दृष्टि से इसे भागों में बांटा गया है। सबसे पहले एक बड़ी प्राचीर है जिससे दोनो तरफ़ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है। इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। इसके पश्चात बाजार प्रारंभ होता है, बाजार की समाप्ति के बाद राजमहल के परिसर के विभाजन के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है। इसके पश्चात राज महल स्थित है। किसी जमाने में त्रिपोलिया द्वार सुदृढ सुरक्षा रही होगी। फ़ोन लगाने पर हरिनारायण जी ने मुख्यद्वार से आगे आने कहा तथा गेट पर मिला चौकीदार भी साथ आ गया।

प्रथम द्वार स्थित हनुमान मंदिर और भक्तगण
एक स्थान पर उत्खनन हो रहा था। वहाँ काफ़ी मजदूर कार्य कर रहे थे, यहीं हमारी मुलाकात हरिनारायण जी से  हुई। उत्खनन के स्थान को हमने देखा। उत्खनन में पॉटरी मिल रही थी, यह बाजार का क्षेत्र होने के कारण आज हलवाई की दूकान का उत्खनन हो रहा था। उत्खनन भट्ठियाँ और मृदा भांड निकले हुए दिखाई दिए। समीप ही एक खंडहर संचरना भी दिखाई दी। जिसे मोडा सेठ की हवेली कहा जा रहा था। राजस्थान हरियाणा में मोडा "घर छोड़ सन्यासी" को कहा जाता है। मोडा सेठ नाम के पीछे लगता है किसी ने बचपने में इसका नाम बिगाड़ दिया होगा। मोडा मोडा करते मोडा ही रुढ़ हो गया होगा। वरना मोडा को हवेली बनाने की क्या जरुरत है? मोडा की तो वैसे ही मौज रहती है। एक कहावत है " गाछी, बाछी और दासी, तीनों संतों की फ़ांसी।"
मोडा सेठ की हवेली
बाजार क्षेत्र के प्रारंभ में नर्तकियों की हवेली दिखाई देती है। यहाँ आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने सूचना पट लगा रखा है। महल क्षेत्र से अलग बाजार में नर्तकियों की उपस्थित होने का तात्पर्य है कि इन्हें यहाँ विशुद्ध मनोरंजन के लिए बसाया गया होगा तथा तत्कालीन समाज में इनका उच्च स्थान था। अन्यथा ये नर्तकियाँ वर्तमान की तरह गली-कूचों की ही जीनत रहती। हवेली काफ़ी बड़ी है तथा प्रस्तर निर्मित है। अनुमान है कि यह भी बहुमंजिली रही होगी। मनोरंजनार्थ आवश्यकता पड़ने पर राजा इन्हें रनिवास में आमंत्रित करते होगें तथा मुख्य मार्ग पर इनकी हवेली होने से यह भी अनुमान लगता है कि राज्यातिथियों का स्वागत नृत्यादि एवं पुष्प वर्षा से होता होगा।  
नर्तकियों की हवेली
यहाँ से हमारा भानगढ़ का भ्रमण प्रारंभ हुआ। हनुमान द्वार से सीधी सड़क मुख्य बाजार के मध्य से होकर राजमहल तक जाती है। मार्ग के दोनो तरफ़ स्थित दुकानों का निर्माण बलुए पत्थर से हुआ है। वास्तु की दृष्टि से यह निर्माण उत्तम है। मेहराबों के आधार पर सभी दुकानें दुमंजिला हैं। जिनकी छतों को पत्थर के किरचों एवं चूने से बनाया गया है। ये छतें इतनी मजबूत हैं कि आज भी ज्यों की त्यों विद्यमान हैं। दुकानों में पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों को आधार देने के लिए उनके नीचे मेहराब बने हैं। सभी दुकानों में एक परछी, एक अंतराल एवं एक गर्भ गृह है। सामान रखने के लिए ताक बने हैं। बाजार क्षेत्र को देखने से लगता है कि कभी इसकी रौनक बुलंदी पर होगी। बाजार का निर्माण सुव्यवस्थित तरीके से योजनानुसार किया गया है। जिससे उस काल खंड के वास्तुविदों की प्रवीणता का परिचय मिलता है। ......... आगे पढ़ें ..........

बुधवार, 13 जून 2012

दंतैल हाथी से मुड़भेड़ ----------- ललित शर्मा

हेशपुर के मंदिरों के पुरावशेष देख कर जंगल के रास्ते से लौट रहे थे। तभी रास्ते में सड़क के किनारे हाथी दिखाई दिया। एक बारगी तो दिमाग की बत्ती जल गयी। सरगुजा के जंगलों में हाथी का दिखना और देखना दोनो ही खतरनाक होता है। छत्तीसगढ के रायगढ, कोरबा, जशपुर और सरगुजा के जंगलों में हाथियों के उत्पात से प्रतिवर्ष बहुत सी जाने जाती हैं और जंगलवासियों के घर तबाह हो जाते हैं। इन हाथियों से मुकाबला करने एवं बचाव के लिए सरकार के प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। एक बार आसाम से 2003 में ही हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूआ के नेतृत्व में जशपुर में हाथियों को पकड़ने का प्रयोग किया जा चुका था, जिसमें एक हाथी पकड़ा गया और अठारह दिनों में ही मर गया। हाथी के मरने पर प्रदेश सरकार ने पार्वती बरूआ के साथ अपने अनुबंध को समाप्त कर उन्हें वापस भेज दिया। परन्तु जंगली हाथियों से बचाव का कोई हल नहीं निकला। ये वनों के प्राकृतिक वातावरण में स्वछन्द विचरण कर रहे हैं। जिस गांव में प्रवेश कर गए उसे तो पूरा ही तबाह करके छोड़ते हैं। आज इन हाथियों से तकरीबन पूरा एक जिला ही नहीं पूरा संभाग आतंकित है। मानवीय छेड़छाड़ और धान, महुआ शराब के प्रति इनकी रूचि इतनी बढ़ गई है कि हाथियों के एक दल ने जिला मुख्यालय के मायापुर मुहल्ले में अपनी उपस्थिति बताकर शहरी लोगों को भी सावधान रहने चेतावनी दे डाली है।
मेरे द्वारा हाथी का पहला चित्र- सड़क पार से

आज 122 हाथियों का दल पांच दलों में बंटकर इन प्रभावित जिलों में लूटपाट एवं आतंक पैदा कर रहा है। इनमें से लगभग पचास हाथियों के तीन दलों ने जिले में भ्रमण कर सरगुजा जिले को अपने प्रभाव क्षेत्र में कैदकर रखा है। पिछले कुछ सालों में हाथियों ने 72 लोगों को कुचल डाला है।हाथियों का प्राकृतिक आवास और उदरपूर्ति का क्षेत्र लगभग समाप्ति की ओर है इसलिए हाथी सरगुजा में घुस रहे हैं। सिंहभूमि के हाथी भी इन्हीं कारणों से झारसुगुड़ा होकर यहां अपना रहवासी क्षेत्र खोजने आ रहे हैं। स्थानीय जंगलों में इन हाथियों को कुछ सुकून मिल रहा है इसलिए यहां ये बार-बार दस्तक दे रहे हैं। जिले में अवैध कटाई, बस्तियों का अतिक्रमण एवं वनभूमि अधिकार पत्र पाने की होड़ में जंगल रातों-रात साफ हो रहे हैं। इन्हीं कारणों से हाथियों का दल अब मानवीय बस्तियों से भी गुरेज नहीं कर पा रहा है। सरगुजा के नामकरण के पीछे हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इससे ऐसा भान होता है कि सरगुजा में भारी तादाद में हाथियों की उपस्थिति रही होगी। सरगुजा शब्द सुरगज, सरगजा या स्वर गजा का विकृत रूप हो सकता है। सुरगज- जहां इन्द्रदेव के हाथी ऐरावत जैसे हाथी पाए जाते हों। सरगजा- जहां हाथियों के विशालकाय सिर ही सिर दिखते हों। स्वरगजा- जहां हाथियों का स्वर चिंघाड़ गुजता रहता हो। इस प्रकार सरगुजा नाम की व्युत्पत्ति इन शब्दों से विकृत होकर हो सकती है।
दूसरा चित्र - हाथी के नजदीक जाकर, इसके बाद मेरे मोबाईल की बैटरी धोखा दे गयी

हम हाथी तो बचपन से देखते आए हैं।पालतु हाथी देखे और उसकी सवारी भी की। लेकिन हाथी के प्राकृतिक आवास में उसे पहली बार हम सभी ने देखा। हाथियों का झुंड नहीं था वह अकेला ही सड़क उस पार पेड़ों के बीच खड़ा था। कुछ वनवासी भी सड़क के इस पार खड़े होकर हाथी की गतिविधि देख रहे थे। हमने थोड़ी दूर पर कार रोक दी क्योंकि फ़ोटो लेने का लोभ नहीं छोड़ पा रहे थे। मै, राहुल सिंह, बाबू साहब, के पी वर्मा ने अपना-अपना हथियार(कैमरा) संभाला और चित्र लेने लगे।
बाबू साहब के मोबाईल कैमरे का चित्र

मेरे मोबाईल में दूरी होने के कारण हाथी का चित्र ठीक से नहीं आ रहा था। हाथी को चित्र में कैद करने के लालच से मै सड़क पार करके उसके समीप चला गया। मुस्किल से 20-25 फ़ुट की दूरी होगी। तब हाथी का पार्श्व भाग दिख रहा था। जैसे ही मैने कैमरा साधा उसने मुंह सीधा करके कैमरे की तरफ़ कर लिया जैसे फ़ोटो खिंचाने के लिए पोज दे रहा हो। लेकिन जैसे ही उसने आगे मेरी ओर कदम बढाया, मुझे लगा कि दौड़ाने वाला है। जान बचाकर भागने में ही भलाई है। बस मैने दौड़ लगा दी। मेरे कार के समीप पंहुचते तक सभी साथी कार में समा चुके थे।
समीप से फ़ोटो लेने  के लिए जाते हुए- बाबू साहब के मोबाईल कैमरे का चित्र

हमारे सामने हाथी और कार को उसके सामने से निकालना खतरे से खाली नहीं था। हाथी तो बड़ी-बड़ी बस को टक्कर मार कर पलटा देते हैं। फ़िर उसके सामने कार की क्या बिसात है? तभी लोगों के मना करने के बाद भी एक मोटर सायकिल सवार हाथी के सामने वाले रास्ते से गुजर गया। हाथी का ध्यान उधर बंटते ही हमारे ड्रायवर ने कार आगे बढा दी। डब्लु बी एम रोड़ होने के कारण स्पीड भी नहीं चला सकते थे। पर जीवन में पहली बार जंगली हाथी को इतने करीब से देखा और उसकी फ़ोटो लेना रोमांचित कर गया। फ़ोटो लेते वक्त सभी मित्रों के कैमरे की फ़्रेम ऐसे फ़िट थी कि मजा आ गया।
पोजिशन लेकर मुझे और हाथी को कैद करते बाबु साहब - चित्र: राहुल सिंह जी द्वारा

मै हाथी को फ़ोटो ले रहा था तो बाबु साहब का कैमरा मेरी और हाथी की। फ़िर राहुल सिंह जी का कैमरा मेरी, हाथी और बाबु साहब की फ़ोटो ले रहा था। इसके बाद केपी वर्मा जी अपने एस एल आर कैमरे से हम सबकी फ़ोटो ले रहे थे। मतलब इस मुड़भेड़ के सभी गवाह थे। जंगली हाथी खतरनाक ही होते हैं और एक बार पीछे पड़ गए तो जान बचाना नामुमकिन है। कुछ दिनों पूर्व तीन हाथी हाईवे पर बैठ गए थे। 6 घंटे तक ट्रैफ़िक जाम रहा। सारा प्रशासनिक अमला लगा रहा उन्हे हटाने के लिए, पर वे गए अपनी मर्जी से। जंगली हाथी यह मुड़भेड़ जीवन भर याद रहेगी। क्योंकि जंगली हाथी शेर से भी खतरनाक होता है।
हाथी के आगे बढते ही  रवानगी डालते मैं और बाबु साहब - चित्र: राहुल सिंह जी द्वारा
डॉ के पी वर्मा के पास SLR (रील वाला) कैमरा था, उसके चित्र डेवलप होकर नहीं आए हैं। फ़ुल साईज में देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें.
पोस्ट अपडेट - डॉ कामता प्रसाद वर्मा के एस एल आर कैमरे की फ़ोटो