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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

पृथ्वी पर जीवोत्पत्ति के चिन्ह छत्तीसगढ़ में…Sirpur……… ललित शर्मा

रती का निर्माण कैसे हुआ? धरती पर जीव कैसे आए? यह जिज्ञासा साधारण मनुष्य के मन में उत्पन्न होती है। इस विषय पर विभिन्न धर्मों के निजी दर्शन है तो वैज्ञानिकों ने शोध द्वारा अपने विभिन्न मत प्रगट किए। परन्तु सभी विज्ञानिक यह मानते हैं कि पृथ्वी पर प्रथम जीवोत्पत्ति एक कोशिय थी। अरबों वर्ष पूर्व वातावरण जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं से कोएसरवेट्स  नामक संरचना बनी और धीरे-धीरे इसमें जीवन के लक्षण आ गए। इन्ही से प्राथमिक जीवन की उत्पत्ति हुई जिनमें जीवन के सारे लक्षण थे।
राम मंदिर राजिम का स्तम्भ 
इन पदार्थों से प्रोटोवायरस,, वायरस, प्रोकैरियाटिक कोशिकाएं रसायन संश्लेषी  कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषी कोशिकाएं, युकैरियाटिक कोशिकाएं क्रमश: बनी होगीं। प्राणिजगत्‌ में दो प्रकार के जीव, एककोशिक और बहुकोशिक, होते हें। एककोशिक जीव प्रोटोज़ोआ (Protozoa) हैं, जो एक कोशिका में ही सभी प्रकार के जीवनव्यापार संपन्न कर लेते हैं। बहुकोशिक जीव मेटाज़ोआ (Metazoa) हैं, जिनमें प्रत्येक कार्य के लिये अलग अलग कोशिकासमूह होता है।वैज्ञानिकों ने चट्टानों का रेडियोमएट्रिक डेटिंग कर अध्ययन किया।
राजीव लोचन मंदिर का स्तम्भ 
जिससे जीवश्मों द्वारा पृथ्वी के निर्माण का काल निर्धारण हुआ। एक अरब वर्ष से पूर्व एक कोशिय जीवों का धरातल पर जन्म हो चुका था। धरती पर जीवन के प्रथम चिन्ह छत्तीसगढ में एककोशिय जीवाणुओं के जीवाश्मों के रुप में प्राप्त होते हैं। सिरपुर में शिल्पकारों द्वारा निर्माण में प्रयुक्त किए गए पाषाणों में कुछ का क्षरण विशेष तरह से हो रहा है। आनंद प्रभ कुटी की मूर्तियाँ और प्रस्तर स्तम्भों में चकते दिखाई दे रहे थे तथा चकतों के आस पास के पत्थर का क्षरण हो रहा है और चकते इतने कठोर हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ा है। अगर हम ध्यान से देखेगें तो यह दिखाई देता है। लगता है कि ये पत्थर कमजोर हैं।
सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त प्रतिमा 
भूविज्ञानी ग़्यानी बादाम से चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि इन पत्थरों का निर्माण एककोशिय जीवों के जीवाश्म से हुआ है। जीव निर्माण के समय अरबों वर्ष पूर्व छत्तीसगढ यह भूमि कटोरे जैसी थी। इसमें अमीबा जैसे एककोशिय जीव उतपन्न हुए। जीवों के मल एवं पेड़ पौंधों के पत्ते करोड़ों वर्षों तक एक ही स्थिति में रहे जिससे दलदल धीरे-धीरे चट्टान में परिवर्तित हो गया। इन पत्थरों जो चकते दिखाई देते हैं वे अमीबा जैसे एक कोशिय जीवों का मल है।  मल के जीवाश्म कठोर है जिससे वे स्पष्ट दिखाई देती हैं। उनका क्षरण नहीं हुआ है। इस तरह इन चट्टानों के रुप में पृथ्वी पर प्रथम जन्म लेने वाले जीवाणुओं के चिन्ह जीवाश्म के रुप में मिलते हैं।
सुरंग टीला का स्तम्भ 
सिरपुर के लगभग सभी स्मारकों में इस जीवाश्म युक्त पाषाण पर निर्माण दिखाई देता है। जबकि चूना पत्थर एवं बलुई पत्थर एवं अन्य पत्थरों पर भी निर्माण मिलता है। आनंद प्रभ कुटी, सुरंग टीला, तीवरदेव विहार, गंधेश्वर मंदिर के स्तंभ, नदी तट पर स्थित युगल शिवमंदिरों के स्तम्भों एवं मूर्तियों में तथा अन्य संरचनाओं में इसी जीवाश्म युक्त पत्थर का प्रयोग हुआ है। सिरपुर के अलावा राजीव लोचन मंदिर, कुलेश्वर महादेव मंदिर, राम मंदिर राजिम इत्यादि में निर्माण में इसी पत्थर का प्रयोग  हुआ है। रतनपुर की बीस दुवरिया के द्वारों की चौखट में इस पत्थर के टुकड़ों का प्रयोग हुआ है। सिंघा धुरवा में भी मुझे इसी पत्थर से निर्मित एक प्रतिमा देखने मिली। इससे सत्यापित होता है कि छत्तीसगढ में पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति के प्रथम चिन्ह जीवाश्म के रुप में हमें प्राप्त होते हैं।

आनंद प्रभ कुटी सिरपुर का जीवाश्म स्तम्भ 
महानदी के त्रिवेणी संगम स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर की प्रतिमाओं एवं स्तम्भों में भी इसी पत्थर का उपयोग हुआ है। अवश्य ही जीवाश्म युक्त पत्थरों का उत्खनन स्थल (खदान) इन इलाकों के आस पास ही होगी।

श्री ज्ञानी बादाम एवं ब्लॉगर सेमीनार स्थल रायपुर में

शनिवार, 1 सितंबर 2012

इति श्री रतनपुर यात्रा ----------- ललित शर्मा

किरारी गोढी शिव मंदिर की चामुंडा प्रतिमा
पाली पहुंचते पहुंचते बरसात होने लगी थी। पंकज सुबह से बरसात के बालहठ में लगा था आखिर उपरवाले ने अर्जी स्वीकार ही कर ली। रतनपुर से दो चार किलोमीटर आगे निकलने पर लैपटॉप के नेट ने नेटवर्क पकड़ लिया। बस बात बन गयी, दिन भर का अपडेट देखने का काम चलता रहा, साथ ही वेरना भी। चलती गाड़ी में जब फ़ेसबुक खोला जाए तो कमेंट करने में समस्या होती है, इसलिए माकूल कमेंट ढूंढ कर कापी पेस्ट करना पड़ता है। कभी-कभी चूक भी हो जाती है, कहीं का सामान कहीं और पहुंच जाता है। दिन भर की हाहाकार मेहनत के बाद अब एक नींद सुकून की चाहिए। अब एक नयी समस्या खड़ी हो गयी, दाढ के मसूडे में दर्द शुरु हो गया। लगा कि फ़िर वहीं कसाई के पास जाना पड़ेगा, जिसने एक बार पहले भी 1500 का फ़टका लगाया था। बिलासपुर पहुंच कर पहला काम एक  दर्द  निवारक टेबलेट लेने का किया। फ़ौरी तौर पर उससे कुछ राहत मिल गयी।

शिवमंदिर का पार्श्व भाग
हमारे घर पहुंचने तक खाना बन चुका था। खाना खाकर पंकज तो चले गया अपने दौलतखाने और हम अरविंद झा जी के गपियाते रहे। सुबह जाने की प्लागिंग करने लगे। बिलासपुर से सुबह साढे छ: बजे लोकल गाड़ी रायपुर को जाती है। उसी से जाने का मन बनाया। रात को मच्छरों के हमले से बचने के लिए पूरी व्यवस्था की गयी थी। पलंग के चारों तरफ़ कछूवा चल रहा था। तब भी मच्छरों का आतंक जारी था। उलटते-पलटते आँख लग गयी, सुबह छ: बजे का अलार्म सुनकर आँख खुली। हाथ मुंह धोकर हम स्टेशन पहुंच गए। वहाँ पहुच कर सोचा कि बिल्हा के पास का देवकिरारी का भग्न मंदिर भी देख लिया जाए। इसलिए सिर्फ़ बिल्हा तक की ही 3 रुपए की टिकिट ली। मुसाफ़िरी की दृष्टि से रेल्वे ही सबसे सस्ता साधन है। इससे सस्ता साधन भारत में और कोई दूसरा नहीं अधिक सस्ता चाहिए तो फ़िर 11 नम्बर की सवारी करनी पड़ेगी।

सप्तरथी सूर्य
ट्रेन में बैठते ही बरसात शुरु हो गयी। मुसलाधार बरसात होने लगी, अब बिना छतरी और रेनकोट के समस्या होने वाली थी। हमने बिल्हा में भाई साहब को बता दिया कि पुशपुल से आ रहे हैं, उनको भी उसी ट्रेन से रायपुर जाना था। बिल्हा स्टेशन पर वे रेनकोट धारण किए हुए मिले, लेकिन स्टेशन तक बाईक लेकर नहीं आए। गजब कर दिया, क्या करें अब बरसते पानी में घर तक पैदल ही जाना पड़ा। बिल्हा के पास के गाँव मोहभट्ठा में आज सावन सोमवारी का भंडारा था। भाभी जिद करने लगी कि मोहभट्ठा प्रसाद लेने जाना है। पर भगवान को मंजूर हो तब न, एक बार घर से निकले तो बरसात होने लगी, वापस आना पड़ा। अब जाने का मन नहीं हुआ। दोपहर बाद बरसात थमी तो बिल्हा से लगभग 5-6 किलोमीटर पर किरारी गोढी नामक गाँव गए। वहीं पर प्राचीन शिव मंदिर है।

गर्भ गृह
यह शिव मंदिर 12 शताब्दी में रतनपुर के कलचुरी राजाओं द्वारा निर्मित है। प्रस्तर निर्मित इस मंदिर का गर्भगृह एवं जंघा का कुछ भाग ही बचा है, बाकी काल की मार से बच न सका। पश्चिमाभिमुख इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। जिसमें मूल जलहरी स्थापित है पर मंडप पूर्णत: नष्ट हो गया है। मूल संरचना के तल विन्यास में मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह मुख्य अंग रहे हैं। उर्ध्व विन्यास पंचरथ प्रकार का है, अधिष्ठान भाग पर खुर, कुंभ, कलश संयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर उर्ध्वक्रम में द्विस्तरीय देव प्रतिमाएं सयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर शिव के विभिन्न स्वरुप, दिग्पाल, सुर-सुंदरियाँ, मिथुन युगल तथा अन्य अलंकार दिखाई देते हैं। य मंदिर कलचुरी कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट एवं अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की पूर्व दिशा का दीवाल ही बची है।

यायावर
मंदिर के अवशेष रखे हुए हैं। जिनमें विभिन्न मूर्तियां भी हैं। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। घनघोर बादल छाने के कारण बरसात होने के आसार बने हुए थे। मैने जल्दबाजी में ही कुछ चित्र लिए और बि्ल्हा आ गया। अब मेरी ट्रेन रायपुर के लिए 5 बजे थी। बिल्हा से रायपुर 18 रुपए की टिकिट ली। 5 बजे शाम को भी बिलासपुर से रायपुर पुशपुल जाती है। लोकल होने के कारण एक्सप्रेस और मेल गाड़ियों से भी जल्दी रायपुर पहुंचा देती है। रास्ते में शिवनाथ नदी जल से लबालब भरी उफ़नते हुए बह रही थी। एक दो चित्र लेते हुए आगे बढे। लोकल गाड़ी ने शाम को 7 बजे रायपुर पहुंचा दिया। घर पहुंचते तक नौ बज चुके थे। इस तरह एक और पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों की यात्रा निर्विघन सम्पन्न हो गयी।

बुधवार, 29 अगस्त 2012

लाफ़ागढ जमींदारी ---------- ललित शर्मा

लाफ़ागढ का सिंहद्वार
म लाफ़ागढ पहुंच गए, कुछ लोगों ने बताया था कि यहाँ प्राचीन मंदिर है, हमारी कल्पना में पाली, जांजगीर, भोरमदेव, शिवरीनारायण जैसा ही मंदिर था। इसे भी देख लिया जाए। छत्तीसगढ के गढों में सम्मिलित लाफ़ागढ का नाम सुना था। आज देखने का अवसर भी आ गया। लाफ़ागढ वनस्थली में बसा हुआ गाँव हैं। गांव में प्रवेश करने पर हमने मंदिर की पड़ताल की तो बताया गया कि थोड़ा आगे बढने पर आपको मंदिर दिखाई देगा। कच्ची सड़क पर चल कर आगे बढने पर छोटा सा ग्रामीण बाजार दिखाई दिया, जहाँ दो चार दुकाने हैं। सामने लाफ़ागढ जमीदारी का विशाल सिंहद्वार बना हुआ है। जिसके दोनो तरफ़ संतरियों के लिए कमरे हैं और उपर दो सिंह खड़ी हुई मुद्रा में बने हुए हैं। वहीं पर हमने कार खड़ी की और मंदिर में प्रवेश किया। मंदिर कोई अधिक पुराना नहीं है।


श्रीमती दुलौरिन कुंवरि द्वारा निर्मित मंदिर
लगभग 90 साल पहले यहाँ की जमीदार दहराज सिंह की बेवा जमीदारिन दुलौरिन कुंवर ने बनवाया था। ईंटों के बने इस मंदिर पर पीले चूने से पुताई की हुई है। भीतर राम लक्ष्मण सीता की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहीं पर दहराजसिंह ने तेंदू के वृक्ष के समीप माँ काली का मंदिर बनवाया था। हमने मंदिर के चित्र लिए। गर्भगृह में अंधेरा होने के कारण वहां के चित्र नहीं ले सके। यह मंदिर जमीदार की संपत्ति है।सिंहद्वार से भीतर का हाल लाफ़ागढ जमीदारी का हाल बयान कर रहा था। चारों तरफ़ ढही हुई ईमारतें अपने स्वर्णिम काल को याद करके सिसकियाँ ले रही थी। कभी इस जमीदारी का रौब-दाब 84 गाँवों में हुआ करता था। उन गाँवों की जनता के भाग्य का फ़ैसला इसी गढ से होता था। चैतुरगढ भी लाफ़ागढ जमीदारी में ही शामिल है। लाफ़ागढ की जमीदारी काफ़ी दूर तक थी।

जमींदार का घर
वहाँ का कुल देवी महामाया मंदिर इनके पूर्वजों ने बनाया था। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक पहटिया दिखाई दिया, उससे पूछने पर पता चला की लाफ़ागढ के जमीदार के वंशज यहीं रहते हैं और अभी मिल सकते हैं। भीतर प्रवेश करने पर कवेलू की छत वाला एक घर दिखाई दिया। वहाँ दो कुर्सियाँ थी, एक कुर्सी पर बनियान पहने और पंछा बांधे अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे, हमने नमस्कार कर वर्तमान जमींदार के विषय में पूछा तो उन्होने हमे अपने पास बुलाया और बताया कि वहीं वर्तमान जमीदार हैं। खस्ता हाला लाफ़ागढ के जमींदार इस हाल में मिलेगें, मुझे आश्चर्य हुआ, हम तीन थे, तो उन्होने नौकर से और कुर्सियाँ मंगवाई और हमें बैठने कहा। उनसे चर्चा होने लगी। उनके पूछने पर हमने बताया कि चैतुरगढ घूमने आए थे, लेकिन वहाँ रास्ते की खराबी के कारण पहुंच नहीं पाए, इसलिए लाफ़ागढ का मंदिर देखते हुए लौटने का इरादा है। अब आपसे भेंट हो गयी तो और जानकारी मिल जाएगी।

चर्चारत- अरविंद झा, एरमशरण सिंह,  ललित शर्मा
उन्होने नौकर को पानी लाने के लिए आवाज दी, हमसे पूछा कि आप लोग पत्रकार हैं क्या? हमने कहा- इंटरनेटिहा पत्रकार हैं, नेट पर लिखते हैं। वे बोले-पहले भी बहुत पत्रकार आएं है, कुछ भी लिखते हैं, कई बार तो कहाँ लिखते हैं, इसका ही पता नहीं चला। मैने अपना कार्ड दिया और कहा कि मेरा लिखा आपको कार्ड में लिखे पते पर मिल जाएगा। मैने उनसे जमीदारी के विषय में पूछना शुरु किया। कहने लगे अब जमींदारी कहाँ रही? जमीन सीलिंग में निकल गयी। कुछ का हिस्सा बंटवारा हो गया, जैसे तैसे गुजर-बसर हो रहा है। तभी मुझे कुर्सी सरकाने को कहते हैं, दीवाल में ततैयों ने छत्ता बना रखा है। एक ततैये ने भी चुम्मा ले लिया तो एक दिन नाचना ही पड़ेगा खुशी में। कुर्सी सरका कर बैठने पर चर्चा आगे बढी। उन्होने बताया कि दुलौरिन कुंवर ने पर्वत दान किया था। मैने पर्वत दान का अर्थ पूछा तो पता चला कि एक बड़े पोले स्तम्भ में हजारों गाड़ी धान भर कर पूजा-पाठ के बाद लोगों को ले जाने की छूट दे दी। जिसके हिस्से जितना लगा वो ले गया।

90 वर्ष पुराना पर्वत दान का चित्र
ये अपने को तंवर कहते हैं। थोड़ी देर के बाद उठ कर एक किताब लेकर आए, जिसे हम स्मारिका कह सकते हैं, यह स्मारिका विक्रम संवत 2000 (1943 ईं) में रतनपुर में हुए विष्णु महायज्ञ के समय प्रकाशित की गयी थी। इसमें लाफ़ागढ जमीदारी का जिक्र करते हुए पृष्ठ क्रं 121 पर लिखा है- लाफ़ा- कुल रखबा 359 वर्गमील, मकान संख्या 16,357, जमींदार का पद - दीवान, ग्राम संख्या - 86 । आगे वर्णन है - यह जमीदारी रतनपुर के उत्तर दिशा में फ़ैली हुई है। लाफ़ा का गढ, पाली का मंदिर, तुमान के खंडहर ये सब इसके प्राचीन वैभव हैं। इसका प्राचीन इतिहास नहीं मिलता।

विष्णु महायज्ञ की स्मारिका का पृष्ठ 121
जमींदार परिवार का कहना है कि - हम असल क्षत्रिय हैं, हमारा आगमन 100 वर्ष (शायद यह छपाई की त्रुटि है 1000 वर्ष होगा) से भी अधिक हुए दिल्ली से हुआ था। सबूत के लिए ये एक ताम्रपत्र पेश करते हैं। इस ताम्रपत्र में लिखा है कि - राज पृथ्वीदेव लुंगाराव को 120 गाँव प्रदान करते हैं। ताम्रपत्र में 806 की मिती पड़ी है। इस प्रकार लाफ़ा जमींदारी इस परिवार के अधिकार में 1173 वर्षों से है। रायबहादुर हीरालाल इस ताम्रपत्र को सच्चा नहीं मानते। मृत जमींदार का कथन था कि यह जमींदारी उनके वंश में 21 पुश्तों से चली आ रही है। जबकि उनका पिता केवल 16 पुश्तों का दावा करता था। पर ये दोनो आँकड़े गलत हैं।

श्री हेरम्बशरण सिंह लाफ़ागढ जमींदार
यदि यह सच भी मान लिया जाए तो 1173 वर्षों की लम्बी अवधि को 16 या 21 पुश्तों में बांट कर अपनी बातों पर लोगों का विश्वास संपादन नहीं करा सकते। लाफ़ागढ जमींदारी में पहाड़ अधिक हैं, निवासी अधिकतर मांझी, महतो, बिंझवार एवं धनुहार जाति के हैं। लाफ़ागढ जमींदारी से होते हुए एक सड़क रतनपुर को चली गयी है। इसी रास्ते से प्राचीन समय में मिरजापुर तक व्यापार होता था। इस जमींदारी में लोहा बहुत मिलता है, जिससे बहुत से अघरियों का गुजर-बसर हो जाता है। यहाँ की मुख्य पहाड़ियाँ चित्तौरगढ (जिस पर लाफ़ा ग़ढ का किला है) पलमा और धितौरी हैं। काम काज श्रीमती दीवानिन दुलौरिन कुंवरि देखती हैं। सरवराकार दीवान रामशरण सिंह हमारे महायज्ञ के सभापतित्व का कार्य बड़ी योग्यतापूर्वक अपनी माता जी के प्रतिनिधि स्वरुप करते रहे। महायज्ञ को सानंद संपन्न करने में जो सहायता आप लोगों ने दी है वह बहुमूल्य है। हम लाफ़ागढ जमींदार के वंशज श्री हेरम्बशरण सिंह से बात कर रहे थे। ये पिछ्ली पंचवर्षी में कोरबा जिला के जिलापंचायत अध्यक्ष थे। इनके चाचा लाल कीर्तीकुमार सिंह यहाँ से 3 बार विधायक बने।

संवत 806 का विवादित ताम्रपत्र
बातचीत में रस आने लगा, हमारे युवा छायाचित्रकार पंकज सिंह जमीदारी के चित्र लेने लगे। हेरम्बशरण सिंह मुझे कुछ विशेष दिखाना चाहते हैं। वे उठकर भीतर गए और साथ कुछ लेकर आए। दो पट्टियों के बीच बंधा हुआ ताम्रपत्र उन्होने मुझे खोल कर दिखाया। मैने ताम्रपत्र को देखा और प्रथम दृष्टया ही मुझे इसके नकली होने का आभास हो गया। तब मैने स्मारिका में लाफ़ागढ के विषय में नहीं पढा था। इसकी भाषा देवनागरी है, प्राचीन भाषाओं का मुझे ज्ञान नहीं है पर प्रत्युत्पन्न मति से मैने खोपड़ी खुजाई। ताम्रपत्र में संवत 806 लिखा है वर्तमान में 2069 संवत चल रहा है अर्थात यह ताम्रपत्र 1263 वर्ष पूर्व टंकित किया गया था।

 गरमा गरम चर्चा
मैने ताम्रपत्र का भली भांति निरीक्षण किया। यह मशीन से निर्मित तांबे की प्लेट पर टंकित है। मशीन से निर्मित होने का अनुमान इसलिए है कि इसकी मोटाई सब तरफ़ एकसार है। 1263 वर्ष पूर्व ऐसी कोई मशीन नहीं थी जिससे तांबे की एकसार प्लेट बनाई जा सके। उस समय हथौड़े से पीट कर तांबे को फ़ैलाया जाता था। जिससे वह प्लेट कहीं मोटी और कहीं पतली होती थी। तथा हथौड़े की चोट के निशान उस पर स्पष्ट दिखाई देते थे। मैने कहा कि यह ताम्रपत्र मशीन से बना हुआ है। उन्होने भी स्वीकार किया कि कुछ लोग कहते हैं यह ताम्रपत्र असली नहीं है। पर मेरे पूर्वजों से मुझे यही प्राप्त हुआ है।

 एरमशरण सिंह जी का निवास
हेरम्बशरण सिंह सरल स्वभाव के गंभीर व्यक्ति हैं। उन्होने बताया कि कोरबा पुरातत्व संग्रहालय को उन्होने बहुत सामान दिया है। मैने सोचा कि बहुत का अर्थ बहुत होता है, शायद ट्रक भर के। उनका कहना था कि दो तलवार, एक कालीन, 2 फ़ोटो, 5 मूर्तियाँ उन्होने पुरातत्व संग्रहालय को दी। ये भी अच्छा रहा कम से कम कुछ तो पुरातत्व संग्रहालय के पास पहुंचा। जिससे लाफ़ागढ का नाम भी वहाँ प्रदर्शित हो गया। लाफ़ागढ का सरपंच इनके परिवार का ही कोई सदस्य है। घर के सामने जंग लगा हुआ एक ट्रेक्टर भी खड़ा है। हम लोगों की चर्चा को अरविंद झा डायरी में लिखते जा रहे हैं।

जमींदारी के खंडहर
हम लोगों को यहाँ लगभग एक घंटा हो गया था अगर एक अदद चाय मिल जाती तो बातचीत का आनंद आ जाता। शायद जमींदार साहब ही पिला दें। लेकिन जितनी देर हम रहे अंत:पुर से किसी के चाय लाने की आहट सुनाई नहीं दी। पंकज अब हमारे फ़ालतु झमेले से ऊब गया है लगता है। उसके चेहरे से ऊब झलकने लगी, अगर हम उठ कर नहीं चलते तो शायद देशी तमंचे की तरह फ़ट पड़ती। हमने हेरम्बशरण सिंह से विदा ली। उन्हे अपना पता ठिकाना दिया और उनसे मोबाईल नम्बर लिया। उन्होने मोबाईल के दो नम्बर लिखाए।

मंदिर का शिखर
हम पुन: पाली की ओर चल पड़े। लाफ़ागढ से बाहर निकलने पर दोराहा आता है, दायीं तरफ़ का रास्ता पोंडी जाता है और बांए तरफ़ का पाली। यहीं पर हमारी भेंट कोटवार लक्षमण दास से हुई। हमारे गाड़ी रोकने पर कोटवार लक्ष्मण दास ने कोटवारी सलाम बजाया। मैने सोचा कि लाफ़ागढ के बारे में कोटवार से अधिक कोई नहीं जान सकता। इसकी कई पीढियों से कोटवारी का काम चला आ रहा है। लेकिन इलाके की जानकारी के विषय में बोदा ही निकला। हाँ इससे गाँव के किसी भी व्यक्ति की जानकारी ली जा सकती थी।

 लक्ष्मणदास कोटवार
इनकी नजर तो लोगों पर ही रहती है जिसकी सूचना सप्ताह में एक बार थाने में जाकर देनी पड़ती है। मैने पूछा कि तुम्हारे गांव में लाफ़ा के मंदिर के अतिरिक्त और कौन-कौन से देवी-देवता हैं तो उसने बताया, रक्सा, बुड़हर, महामाया, ठाकुरदेवता, चूल्हादेव, अगिनदेव इत्यादि हैं। बाकी के विषय में बैगा से जानकारी मिल सकती है। अब इतना समय नहीं था कि हम बैगा से जानकारी लेने जाएं। लक्ष्मण दास को राम-राम करके हमने पाली का रास्ता पकड़ा। अरविंद के चेहरे पर अब राहत के भाव दिख रहे थे क्योंकि चल पड़े तो अब बिलासपुर पहुंच कर ही दम लेगें। आगे पढें……

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

चैतुरगढ से लाफ़ागढ की ओर --------- ललित शर्मा

पहाड़ की सुंदरता
चैतुरगढ से लौटते हुए रास्तों की ढलान से सामने सीना ताने खड़े विशालकाय पहाड़ अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। पहाड़ का जो दृश्य मेरे सामने था, कमाल का था, वह पहाड़ चोटी से लेकर तराई तक सीधा खड़ा था अर्थात कोई ढलान नहीं थी, जैसे किसी ने इसे चोटी से लेकर नीचे तक आरी से काट दिया हो। बंजी जम्पिंग या रॉक क्लाईम्बिंग करने वालों के आदर्श स्थान लगा। रॉक क्लाईम्बर्स के लिए तो चुनौती भी हो सकता है। इसकी ऊंचाई पर विशाल गुफ़ानुमा आकृति बनी हुई दिखाई दे रही थी। इस सुहाने दृश्य को कैमरे में कैद करने से स्वयं को रोक न सका। पंकज से कार रुकवाई और पहाड़ का चित्र लेने जंगल में घुस गया। जीवन चक्र सही चलता रहे तो पहाड़ सी जिंदगी भी कट जाती है खेलते कूदते। कहीं विघ्न हो जाए तो पल भी नहीं कटता। जीवन का फ़लसफ़ा यही है, पहाड़ को काटते रहो, छांटते रहो, चढते रहो ऊपर, बिना विश्राम के। एक दिन अवश्य ही विजय मिल जाएगी।


कृष्ण कुमार गोंड और ब्लागर जेमरा गांव में
रास्ते में आदिवासी गाँव जेमरा आया, तो यहाँ रुकने का मन हो गया, जैसे हारा हुआ सिपाही कहीं छांव में बैठ कर विश्राम कर ले और आगे की लड़ाई के लिए शक्ति विश्राम से शक्ति अर्जित कर फ़िर दुगनी शक्ति से जीतने के लिए युद्ध के मैदान में अग्रसर हो। रास्ते पर ही मुझे कृष्ण कुमार घ्रुव मिल गए। उनसे गाँव का नाम पूछो तो उन्होने जेमरा का नेवरिया पारा (जेमरा गाँव नया बसा मोहल्ला) बताया। उससे चर्चा होने लगी, आदिवासी गाँव में महुआ की दारु की चर्चा न हो ये तो हो ही नहीं सकता। परन्तु कृष्ण कुमार ने बताया कि उनके गाँव में कोई दारु नहीं बनाता। जिन्हे पीना होता है सरकारी भट्ठी से ही लाकर पीते हैं। हो सकता है कि वह हमारे रौब-दाब को देखकर झूठ बोल रहा होगा। क्योंकि आदिवासी गाँवों में स्वसेवन के लिए प्रति घर 5 लीटर तक महुआ की दारु बनाने की छूट है।

 चैतुरगढ की महामाया गाँव में 
मुख्य मार्ग से एक गली सामने के मोहल्ले में जाती है। वहाँ बने तिराहे पर एक पत्थर गड़ा है। उस स्थान को साफ़ सुथरा देखकर मैने कृष्ण कुमार से जिज्ञासावश पूछ लिया। तो उसने बताया कि इन्होने यह पत्थर चैतुरगढ की महामाया के नाम पर गड़ाया है। हम यहाँ पर महामाया का ही स्थान मानते हैं। क्योंकि त्यौहारों के अवसर पर चैतुरगढ दूर होने के कारण जाना कठिन हो जाता है। इसलिए इसी स्थान पर सभी पूजा-पाठ करके बकरों या अन्य जानवरों की बलि देते हैं। जहाँ मान लो वहीं देवी-देवता उपस्थित हैं। हमें चैतुरगढ की पहाड़ी पर दर्शन नहीं हुए महामाई के तो यहीं दर्शन कर लिए। मेरे पूछने पर उसने बताया कि यहाँ से थोड़ी दूर आगे जाने पर आदिवासी हास्टल है। वहाँ के गुरुजी के पास मोटरसायकिल है। हमने सोचा कि यह मिल जाए तो अधूरी यात्रा पूरी हो जाएगी। हम दुविधा में थे कि जाएं या नहीं। मन हमेशा जाने के पक्ष में ही रहता था।

ढेकी (प्राचीन यंत्र)
आस-पास धनकुट्टी या आटा चक्की नहीं दिखने पर मैने कृष्ण कुमार से गाँव में ढेकी के बारे में पूछा। तो उसने बताया कि गाँव में बहुत सारे घरों में ढेकी है। बस मेरा काम बन गया क्योंकि ढेकी की फ़ोटो मैं बहुत दिनों से लेना चाहता था पर मेरे गाँव में भी अब किसी के घर में ढेकी नहीं रही। सिर्फ़ फ़ोटो के लिए ही 5-7 गाँवों में चक्कर लगाना पड़ता। तब कहीं जाकर एकाध घर में धूल मिट्टी खाती हुई ढेकी मिलती। ढेकी सम्पन्न गृहस्थ का प्रतीक प्राचीन यंत्र हैं। लोग मुसल से कूट कर धान का छिलका निकालते थे। जिसमें समय और श्रम अधिक लगता था। इसके बाद ढेकी का अविष्कार हुआ, इसे सिर्फ़ एक आदमी खड़े-खड़े अपने पैरों से चलाता है और एक घंटे में दो-तीन बोरा धान से चावल निकाल लेता है। इसे चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती। घर गृहस्थी खेती किसानी के प्राचीन यंत्रों को संजोने के क्रम मुझे यहाँ ढेकी का मिलना सुखद लगा। कृष्ण कुमार के घर में हमने जाकर जी भर ढेकी के फ़ोटो खींचें।

जेंजरा का आदिवासी छात्रावास
यहां से अगला पड़ाव था, आदिवासी आश्रम के गुरुजी का घर। आगे बढने पर कुछ ईमारतें दिखाई दी। हमने कार उधर ही मोड़ ली। जहाँ कार रुकी, उसी कमरे के सामने मोटर सायकिल खड़ी थी। झांकने पे पीछे टेबल कूर्सी डाल कर दो-तीन खाकी बर्दी धारी दिखाई दिए। लग रहा था संध्या वंदन की तैयारी है। ये फ़ारेस्ट के अधिकारी कर्मचारी थे, जंगल में इनका रोल किसी पुलिस से कम नहीं होता। जिसे चाहे धर ले, जिसे चाहे छोड़ दे। हमें देख कर एक बंदा बाहर आया। पंकज के पूछने पर उसने गुरुजी का घर दूसरी जगह बताया। वहाँ पहुंचने पर पता चला कि गुरुजी नहीं हैं, पाली गये हैं।

हम वहाँ से आगे बढे तो एक बाईक वाले ने हमारे से आगे निकाल कर हमें रोका। मैने सोचा कि यह बाईक देने आया होगा। उसका कहना था कि यहां से तीन किलोमीटर उसका गाँव है। वहाँ ठेकेदार घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग कर पुल बना रहा है। आप फ़ोटो खींच कर अखबार में छाप दीजिए। मैने सिर हिलाया और हम आगे बढे। यहाँ पत्रकारी करने थोड़ी आए हैं। सरकार में बैठे लोग लाखों करोड़ खा जाते हैं। एक ठेकेदार लाख-दो लाख भी खा लेगा तो क्या फ़र्क पड़ने वाला है? यह मुकदमा हमने बाबा रामदेव की एवं अन्ना की सेना के लिए छोड दिया।

चलो भाई ढेकी कुरिया में
तिराहे पर पहुंचने पर जिस दुकानदार की बाईक की आस लगा कर यहां तक आए थे उससे बाईक मांगी तो उसने मना कर दिया। बोला कि बाईक इंजन खराब है लोड नहीं ले रहा है। मैने कहा - यार अभी तो बाईक बदले कार रख ले। हमारे चैतुरगढ से लौटते तक तुझे कार का मालिक बना देते हैं। इतने पर भी लेकिन वह नहीं माना। आखिर में हमें वापस ही पाली की तरफ़ लौटना पड़ा। चैतुरगढ जाने के सारे रास्ते हमारे लिए बंद हो चुके थे। मन मार कर सोचा कि आज नहीं जा पाए तो कोई बात नहीं, मौसम खुलने के बाद फ़िर कभी आएगें चैतुरगढ के लिए। रात तक हमें बिलासपुर भी पहुंचना था। झा जी ने फ़ोन पर निर्देश देकर खाने की व्यवस्था अपने बंगले पर कर ली। पंकज और हमको उनके घर का निमंत्रण था। यहाँ से थोड़ी दूर पर पुरानी जमीदारी लाफ़ागढ है। जिसका नाम मैने सुना था। अब फ़ैसला लिया गया कि चैतुरगढ न सही तो लाफ़ागढ ही सही। वहीं चला जाए, अपने पास अभी एक-डेढ घंटा और था बिताने के लिए। आगे पढें………

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

रतनपुर का गोपल्ला बिंझवार --------------- ललित शर्मा

रतनपुर किले का द्वार
दोपहर के 12 बज रहे थे हम बस स्टैंड के पास स्थित हाथी किला की ओर चल पड़े। यह किला केन्द्रीय पुरातत्व के संरक्षण में है। यहाँ केन्द्रीय पुरातत्व के 3 कर्मचारी हैं, पर मुझे एक भी नहीं मिला। किले के भव्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करने पर तालाब के बगल से दो-तीन गंजेड़ी बाहर निकलते दिखाई दिए। इससे लगा कि यह असमाजिक तत्वों का मुफ़ीद अड्डा हो सकता है। कहते हैं कि जब किला पुरातत्व के संरक्षण में नहीं था और उजाड़ पड़ा था तब रतनपुर के निवासी नगर के घरों में निकलने वाले सांपों को किले में छोड़ जाते थे। यहां कई प्रकार के सांप होने की बात सामने आई। पर पूरा किला घूमने पर भी हमें एक भी सर्प दिखाई नहीं दिया। यह किला राजा पृथ्वी देव ने बनाया था। यह चारों ओर खाईयों से घिरा हुआ है। किले में 4 द्वार सिंह द्वार, गणेश द्वार, भैरव द्वार तथा सेमर द्वार बने हुए हैं। सिंह द्वार के बांयी ओर गंधर्व, किन्नर, अप्सरा एवं देवी देवताओं के अलावा लंकापति रावण भी अपना सिर काटकर यज्ञ करते हुए दिखाई देता है।

गोपल्ला बिंझवार
सिंह द्वार में प्रवेश करने पर बायीं ओर एक विशाल पाषण प्रतिमा है, जिसके सिर और पैर ही दो भागों में दिखाई देते हैं। मान्यता है कि इस प्रतिमा का धड़ मल्हार में रखा है। अब इस प्रतिमा का धड़ मल्हार कैसे पहुंचा इसका कोई पता नही है। यह प्रतिमा गोपल्ला बिंझवार (गोपाल राय वीर) की मानी जाती है, इसे देवार गीतों में भी गाया जाता है। कहा जाता है कि गोपाल की वीरता से प्रभावित होकर मुगलबादशाह जहांगीर ने राजा कल्याणसाय को अनेक उपाधियां दी तथा रतनपुर से लगान लेना बंद कर दिया। आगे गणेश द्वार है, जहाँ हनुमान जी प्रतिमा है, कहते हैं कि इस प्रतिमा के पीछे सुरंग का द्वार है। जिसे प्रतिमा से बंद कर दिया गया है। इसके आगे थोड़ी दूर पर मराठा साम्राज्ञी आनंदीबाई द्वारा निर्मित लक्षमीनारायण मंदिर है। किले के मध्य में जगन्नाथ मंदिर स्थित है, इसका निर्माण राजा कल्याणसाय ने कराया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा, एवं बलभद्र की प्रतिमा एवं भगवान विष्णु, राजा कल्याण साय एवं देवी अन्नपूर्णा की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित है।

रनिवास-रतनपुर
मंदिर के पार्श्व भाग में रनिवास एवं महल के अवशेष विद्यमान हैं। रनिवास में माल खाना, हथियार खाना एवं सुरक्षा प्रहरियों के रहने के स्थान भी हैं। किले के पिछले द्वार पर ताला लगा था, यह रास्ता मोतीपुर की ओर जाता है। ताला बंद होने पर हम फ़ेन्सिग को उपर से पार करके मोतीपुर की ओर गए। कुछ दूरी पर यहाँ खाई से बने तालाब के किनारे एक बीसदुवरिया और बनी है। यहाँ राजा लक्ष्मणसाय की बीस रानियां सती हुई थी, उन्ही के स्मृति में यह स्मारक बनाया गया है। यह बीस दुवरिया क्षतिग्रस्त है। इस में अभी भेड़-बकरियों का डेरा होने से यह बीसदुवरिया खंडहर भी ध्वस्त होने के कगार पर है। कहते हैं कि मलयगिरि की भीलनी चूल्हा जलाने के लिए चंदन की लकड़ियों को उपयोग में लाती थी वैसे ही इस भव्य किले को समीप के रहवासियों ने हागालैंड बना दिया है। वापसी के दौरान कुछ लोटाधारी महिलाएं पुरुष किले में दिखाई दिए। हम सिर झुकाए उनके आगे से निकल गए। लोगों ने अभी तक अपनी महत्वपूर्ण पुराधरोहरों को सम्मान देना एवं सुरक्षित रखना नहीं सीखा है।

रामटेकरी- रतनपुर
हाथी किला से हम रामटेकरी की ओर चल पड़े। रामटेक की राम टेकरी तो हमने देखी थी। रतनपुर की रामटेकरी के दर्शन एवं निर्माणकर्ता की जिज्ञासा लिए हम रामटेकरी पहुंच रहे थे। टेकरी के समीप ही एक तालाब है, जिसे टेकरी पर से देखने पर भारत का नक्शा तालाब में दिखाई देता है। आसमान में बादल घिर आए थे, सुबह से पंकज बारिश की मांग कर रहा था। मैने उससे वादा किया था कि बरसात बुलाना मेरी जिम्मेदारी है और उसे रोकना तुम्हारा काम। अगर रोक सकते हो तो अभी घनघोर घटा छाकर बरस जाएगी। पर कितनी देर बरसेगी यह मैं नहीं बता सकता। अरविंद झा भी मौज ले रहे थे, बार-बार घर फ़ोन लगा कर रात के खाने का इंतजाम कर रहे थे। भूख का समय हो गया था, झा जी एक दर्जन केले लेकर आए पर उन्होने खाए नहीं। रात को ही इतनी ओवरडोज हो गयी थी उसका असर दोपहर तक बना हुआ था। अर्थात संडे का पूरा-पूरा फ़ायदा लेने के चक्कर में थे, पर क्या करें? हमारे जैसे घनचक्करों के चक्कर में फ़ंस कर रह गए।

ब्लॉगर ललित शर्मा एवं पार्श्व में रामटेकरी
रामटेकरी पर पहुंचे तो यहां काफ़ी पर्यटक आए हुए थे, इस पहाड़ी पर राम दरबार का भव्य एतिहासिक मंदिर है। समीप ही खुंटाघाट जलाशय भी है, इस बांध का निर्माण अंग्रेजों ने 1926 में कराया था। यहां सुंदर उद्यान भी है। बरसात में खुंटाघाट जलाशय लबालब भरा हुआ दिखाई दे रहा था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर नारियल, फ़ूल अगरबत्ती वगैरह पूजा सामग्री के एक दुकान लगी थी। संभवत: यह मंदिर के पुजारी का कोई अनुग्रही लगता है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम, देवी सीता, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न की प्रतिमा पंचायत शैली में विद्यमान हैं। भगवान राम की प्रतिमा के अंगूठे से जल की धारा प्रभावित होती है। साथ ही सभा मण्डप में भगवान विष्णु तथा हनुमान जी की प्रतिमा हैं। सभागृह के आगे रानी आनन्दी बाई द्वारा निर्मित राजा बिंबाजी का मंदिर है। मंदिर में फ़ोटो खींचने की मनाही है। मैने फ़ोटो लेने की कोशिश की, लेकिन पुजारी ने मना कर दिया और मेरे पीछे ही लगे रहे, कहीं फ़ोटो न उतार ले।

रामटेकरी से खुंटाघाट उद्यान का दृश्य
उनका कहना था कि फ़ोटो खींचने की मनाही सुरक्षा की दृष्टि से है। पूर्व में कभी मूर्ति चोरों ने यहाँ धावा बोल दिया था। फ़िर बाद में पता चला कि इस मंदिर को लेकर इसकी सर्वराकार चंद्रकांता और राज्य सरकार के बीच न्यायालय में संपत्ति के अधिकार को लेकर वाद विचाराधीन है। इसलिए मंदिर का पुजारी चित्र लेने से मना कर रहा था। इस पहाड़ी से रतनपुर का मनोरम दृष्य दिखाई देता है साथ ही हाथी किला भी, लेकिन वृक्ष आड़े आने के कारण हाथी किले की फ़ोटो नहीं ली जा सकी। जब हम जाने लगे तो पुजारी जी ने तीनों के लिए अलग से प्रसाद भिजवाया। आधे नारियल के साथ फ़ल और मिष्ठान भी थे। मैने मंदिर के परकोटे से एक चित्र खूंटाघाट बांध के समीप बने हुए उद्यान का लिया। नागपुर के समीप स्थित रामटेक के जैसे ही यहाँ पर भोसला राजा ने इस रामटेकरी मंदिर का निर्माण किया। रामटेक (महाराष्ट्र) का मंदिर भी मैने देखा है।

बूढा महादेव का  जलाभिषेक
 रामटेकरी से लौटकर हम बूढ़ा महादेव के प्राचीन मंदिर के दर्शन करने के लिए गए। पुराने शहर में संकरी गलियों से सिर्फ़ एक ही गाड़ी निकल सकती है। सामने से दो गाड़ियाँ आ गयी जिससे रास्ता जाम हो गया। हमने पास की गली में अपनी कार को बैक करके घुसाया तब कहीं जाकर भीतर जाने का रास्ता बन पाया। वृद्धेश्वर महादेव को बूढा महादेव कहते हैं। इस मंदिर के सामने बावड़ी बनी हुई है। मंदिर प्रस्तर से निर्मित है, तथा एक खम्बे पर उत्कीर्ण कुछ अभिलेख भी दिखाई दिया। यहाँ स्थापित लिंग बीच में खोल है। इसमें जितना भी जलाभिषेक करिए, जल का स्तर सामान्य ही बना रहता है। थोड़ा सा भी जल का स्तर नहीं बढता, जितना पहले था उतना ही रहता है। हमने भी सावन में शिवजी का जलाभिषेक किया। पुजारी जी ने केले एवं सेव का प्रसाद दिया।

बूढा महादेव
रतनपुर में देखने के लिए अभी बहुत कुछ बचा था लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं था कि सब कुछ देख सकें। महालक्ष्मी मंदिर, जूना शहर तथा बादल महल, हजरत मुसे खाँ बाबा की दरगाह, गिरजावर हनुमान, रत्नेश्वर महादेव मंदिर, भुवनेश्वर महादेव मंदिर, कृष्णार्जुनी तालाब इत्यादि अनेक दर्शनीय स्थल हैं। पुरातत्व में रुचि रखने वाले के लिए रतनपुर दर्शन करना एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए कम से कम दो दिनों का समय होना चाहिए। फ़िर कभी अधिक समय लेकर आना होगा तभी सारे रतनपुर का भ्रमण हो सकता है। अब हमें पाली होते हुए चैतुरगढ एवं तुम्माण जाना था। पूछने पर पता चला कि बरसात में चैतुरगढ का मार्ग बंद हो जाता है और कार से जाना संभव नहीं होगा। तब हमने विचार किया कि रतनपुर से मल्लार होते हुए बिलासपुर चला जाए। मल्लार की दूरी भी यहां से 70 किलोमीटर के लगभग है तो हमने पाली और चैतुरगढ जाने का निश्चय किया और दीपक को छोड़ कर पाली की ओर चल पड़े। आगे पढें……

बुधवार, 22 अगस्त 2012

प्राचीन राजधानी रतनपुर ----------- ललित शर्मा

बिलासपुर से चलने की तैयारी
29 जुलाई 2012 की सुबह सप्ताहांत का रविवार लेकर आई, आसमान में बादल छाए हुए थे रिमझिम बरखा के आसार बने हुए थे। लाल चाय से सुबह हुई, स्नानाबाद से आकर बाबू साहब को फ़ोन लगाए तो पता चला कि उनकी तबियत नासाज हो गयी है और ओबामा के गोले ओसामा पर बरस रहे हैं। पहला झटका यहीं लग गया, हमने सारे गुदड़े बाबू साहब पर ही लाद रखे थे। नोकिया का चार्जर भूल आया, कैमरे वाले चलभाष की बैटरी अंतिम सांसे ले रही थी। कोई हॉट चार्जर मिल जाता तो चलभाष जल्दी चार्ज हो जाता। रास्ते के लिए जरुरी सामान समेट कर हम आगे के सफ़र के लिए चल पड़े। नाश्ता करने के लिए देवकीनंदन चौक की चौपाटी पर पहुंचे, वहां फ़टाफ़ट पोहा-जलेबी उदरस्थ की और अरविंद झा को फ़ोनियाए तो पता चला कि वे अभी भी निद्रासन में हैं। मैने उन्हे 15 मिनट में तैयार होने कहा और उनके घर की ओर चल पड़े।


पंकज सिंग
हमारे पहुंचने पर अरविंद झा किसी से फ़ोन पर चर्चा कर रहे थे। असनान-ध्यान का तो कहीं पता ही नहीं था। थोड़ी हुड़की लगाने के बाद भी 20 मिनट और जाया हुए और ब्लॉग कोतवाल तैयार हो गए चलने के लिए। हमने गाड़ी रतनपुर की ओर बढाई। बरसात में घूमने का आनंद ही कुछ और है। अरपा के साथ-साथ सफ़र हो रहा था, हमेशा की तरह नदी के किनारे सब्जी वाले बैठे थे। हमारी पहली मंजिल रतनपुर थी। वैसे तो रतनपुर का प्रवास सैकड़ों बार हुआ है पर आज सैलानी की नजर से देखने की इच्छा थी। इच्छा क्यों न हो भाई, रतनपुर छत्तीसगढ की चारों युगों की राजधानी थी इसलिए रतनपुर को चतुर्युगी नगरी भी कहा जाता है। राजे-रजवाड़ों के अवशेष देखने हैं। कम समय में अधिक स्थान देखने की गरज से राहुल भैया को फ़ोन लगाया और फ़िर समाधान हो गया। शहर के प्रवेश में खंडोबा मंदिर है। यहाँ शिवजी और भवानी की अश्वारोही प्रतिमा विराजमान है। इसे तुलजा भवानी मंदिर भी कहते हैं। इस मंदिर को मराठा नरेश बिंबाजी राव भोसला की रानी ने अपने भतीजे खांडो की स्मृति में बनवाया था। मंदिर के पीछे प्राचीन दुलहरा तालाब है।

महामाया मंदिर के पार्श्व में महाकाली
इसके बाद आगे चलने पर दाहिनी ओर भैरव मंदिर स्थित है। मंदिर के बाहर पूजा सामग्री और गानों की सीडी कैसेट बेचने वालों की पचासों दुकाने सजी हुई हैं। यहां काल भैरव की 9 फ़िट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। देवी दर्शन करने के पश्चात श्रद्धालु काल भैरव की पूजा अवश्य करते हैं। किंवदंती है कि मणिमल्ल नामक दैत्य के संहार के लिए भगवान भोलेनाथ ने मार्तण्ड भैरव का रुप बनाकर सहयाद्री पर्वत पर उसका संहार किया था। रतनपुर कौमारी शक्ति पीठ होने के कारण कालांतर में यहाँ तंत्र साधना भी होने लगी तब बाबा ज्ञानगिरी ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।रतनपुर महामाई मंदिर पहुंचे तो वहाँ हमें दीपक दुबे मिले। अब रतनपुर दर्शन उनके साथ ही करना था। रतनपुर दर्शन करके पाली होते हुए चैतुरगढ से तुम्माण तक पहुंचना था। रतनगढ में ही पूरा दिन बीत सकता था।

महासरस्वती एवं महालक्ष्मी
बिलासपुर, अम्बिकापुर मुख्य मार्ग पर बिलासपुर से 26 किलोमीटर की दूरी पर रतनपुर स्थित है। बिलासपुर से चलकर आधे घंटे के बाद हम रतनपुर आदिशक्ति महामाया के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो एक स्कार्पियो सपाटे से हमारे सामने से आगे निकल खड़ी हो गयी। इसमें दो तीन सज्जन बाहर आए। मंदिर के दरवाजे तक गाड़ी आने का तात्पर्य था कि कोई न कोई पॉवर हाऊस है, तभी गाड़ी यहाँ तक आई है। गर्भ गृह में दर्शनार्थ पहुंचने पर पुजारी उन सज्जन को विशेष पूजा करा रहे थे। उन्हे पद्महार पहनाया गया तथा उत्तरीय धारण कराया गय। जब वे बाहर आने के लिए घूमे, तब तक मैं पहचान चुका था। ये ट्रस्ट के अध्यक्ष बलराम सिंह जी थे। राम-राम हुई वे अपने काम में लग गए और हम अपने काम में। हमने महामाई के दर्शन किए और प्रसाद लिया। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाया। इस स्थान को महाभारत एवं जैमिनी पुराण आदि में राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।

अरविंद झा एवं पंकज सिंह
त्रिपुरी के कलचुरियो ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। इसे चर्तुयगी नगरी भी कहा जाता हैं जिसका तात्पर्य है कि इसका अस्तित्व चारो युगो में विद्यमान रहा है। इस मंदिर के निर्माण के पीछे कथन है कि 1045 ई में राजा रत्नदेव प्रथम तुम्माण से मणिपुर नामक गाँव में आए, यहाँ उन्होने रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया। अर्धरात्रि में जब राजा की नींद खुली तो उन्होने वट वृक्ष के नीचे अलौकिक प्रकाश देखा, वे आश्चर्य चकित रह गए कि वहाँ आदिशक्ति महामाया की सभा लगी हुई थी। यह सब देख कर राजा अपनी चेतना खो बैठे। सवेरा होने पर वे अपनी राजधानी तुमान लौट आए तथा रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला किया। 1050 ई में महामाया के भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

नीलकंठेश्वर - कंठी देवल मंदिर
इस मंदिर में तीन देवियाँ हैं, महासरस्वती एवं महालक्ष्मी मंदिर के गर्भ गृह में विराजित हैं और महाकाली बाहरी दीवाल पर पार्श्वभाग में विराजित हैं। मान्यता है कि यह मंदिर कभी तंत्र-मंत्र का केन्द्र रहा होगा। कहते हैं कि रतनपुर में सती का दाहिना स्कंध गिरा था तब भगवान शिव ने स्वयं इसे कौमारी पीठ का नाम दिया। जिसके कारण यहाँ माँ के दर्शन से कुंवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि यह जागृत पीठ है, कुछ वर्षों पूर्व चंद्रास्वामी का यहाँ आगमन काफ़ी चर्चित रहा। पटौदी के बाबा सतबीर नाथ ने भी यहाँ के प्रभाव को महसूस किया तथा मुझे बताया था। यहाँ मनोकामना ज्योतियाँ भी जलाई जाती हैं।

बीस दुवरिया
महामाया मंदिर के परिसर में स्थित तालाब के के किनारे नीलकंठेश्वर महादेव का भव्य एवं शिल्पकला से परिपूर्ण मंदिर है। इसे कंठी देवल मंदिर भी कहते हैं, इस मंदिर के समीप एक प्रतिमा विहीन मंदिर भी है। कंठी देवल मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। इस मंदिर का बड़ी खुबसूरती के साथ जीर्णोद्धार किया गया है। अब हम महामाया मंदिर से थोड़ी ही दूर स्थित मधुबन की ओर जाते हैं, यहाँ पर तालाब के किनारे भगवान नर्मदेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है एवं दूसरी तरफ़ राजा राजसिंह का भव्य स्मारक बना हुआ है, जिसे बीस दुवारिया कहते हैं। यह मंदिर प्रतिमा विहीन है तथा इसमें 20 दरवाजे हैं। प्रत्यके दरवाजों की चौखट की खड़ी पाटी में दो-दो फ़ुट के वही पत्थर दिखाई दिए जो हमने सिरपुर में देखे थे। बाकी पत्थर जामुनी रंग के थे। वैसे ही एक पत्थर का खम्बा मैने राजिम के कुलेश्वर महादेव के मंदिर में भी देखा था। अभी यह मंदिर जीर्ण शीर्ण अवस्था में है, इसे संरक्षण की आवश्यकता है वरना समय की मार से धराशायी हो सकता है। इसके चारों तरफ़ गंदगी फ़ैली हुई है। बैरागवन के समीप खिचरी केदारनाथ का प्राचीन मंदिर भी दर्शनीय है।आगे पढें………

सोमवार, 20 अगस्त 2012

हसीन मौसम के साथ सुहाने सफ़र पर यायावर -------------- ललित शर्मा

काली दास का मेघदूत
28 जुलाई 2012 का दिन तय हुआ दो दिन की घुमक्कड़ी के लिए। पंकज सिंग ने नयी वेरना कार ली, तब से चलभाष और लिखचित पर बिलासपुर से घूमने के लिए चलने की तारीखें छ: माह से तय हो रही थी। पर संयोग नहीं बन रहा था। 27 जुलाई को पंकज ने फ़िर लिखचित की तो मैने बिलासपुर पहुंचने के लिए हाँ कर दी। बारिश लगातार जारी थी और वह बारिश में ही घूमना चाहता था। साथ ही हमें भी लपेटे में लेने की चाह थी। 28 को बिलासपुर पहुंचना तय हुआ। सुबह से घनघोर बारिश हो रही थी। मेरा मन, चौधरी अजित सिंग हो गया था। कभी इधर डोल रहा था कभी उधर। 11 बजे तक मन नहीं बना जाने के लिए, स्नानाबाद से आते ही मन बन गया और दोपहर 1 बजे की लोकल से बिलासपुर जाने का मुहूर्त निकल ही गया। मतलब यू पी ए हो या एन डी ए अपने को तो केबिनेट मंत्री बना दो बस। बाकी किसी से कोई लेना देना नहीं। पंकज को फ़ोन आने का समाचार दिया और चल पड़े बिलासपुर की ओर।

लोकल की सवारी
रिमझिम वर्षा के बीच स्टेशन पहुंचे, ट्रेन समय पर आ गयी थी। बैठने के लिए सीट भी मिल गयी आराम से, अब नो टेंशन, चिंता नको। तीन घंटे आराम से बीत जाएगें बरसाती फ़ुहारों के बीच। मेरी सामने की सीट पर एक बिहारी युवा दो-दो चलभाष लिए चुहल कर रहा था। उसने अपने पास कई सिम रखे थे। कभी ये सिम तो कभी वो सिम। मैं आराम से बैठ कर उसकी गतिविधियाँ देख रहा था। पहले तो वह किसी को मिस कॉल करता, फ़िर जवाब आने पर 10-20 मिनट खूब बतियाता। उसकी बातें सिर्फ़ उसके काम को लेकर थी। बातें भी ऐसी कि जैसे पूरी कम्पनी का काम उसने ही संभाल रखा हो। छुटका बाबू से लेकर बड़का बाबू सबकी मानसिक हलचल उसने पढ़ रखी थी। किसका व्यवहार कैसा है? सभी की जानकारी दे रहा था। सीट पर पैंतरा बदलने के साथ चलभाष का सिम भी बदल रहा था। लोकल गाड़ी का मजा यह है कि सभी तरह की मूर्तियाँ इसमें मिल जाती हैं। दूध वाले स्टेशनों पर अपने डिब्बे चढा उतार रहे थे। साथ ही किन्नर भी चिकनों पर हाथ फ़ेर रहे थे। चिकने भी हाथ फ़ेरते ही डरकर 10-20 का नोट निकाल कर उनके हवाले करने लगे। कितना आतंक होता हैं किन्नरों का, चिकनों के चेहरे पर। उनकी दशा देखते ही बनती थी।

शिवनाथ नदी
खरामा-खरामा ट्रेन चलते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ रही थी। मांढर, सिलयारी, बैकुंठ, तिल्दा, भाटापारा, निपनिया के बाद शिवनाथ नदी का पुल आ जाता है। शिवनाथ भी पानी से भरी लबालब चल रही है, कुछ नाविक डोंगी लेकर नदी में मछली मारने में लगे थे। उफ़नती नदी के बीच मछली मारना दुस्साहस ही काम है। बिल्हा स्टेशन पहुंच कर पंकज को फ़ोन लगाया और बिलासपुर पहुचने के समय की सूचना दी। बिलासपुर जाओ और अरविंद झा से न मिलो, ऐसा नहीं हो सकता। वे बिलासपुर के ब्लॉग कोतवाल हैं। उन्हे नमस्कार तो कहना ही पड़ता है, अगर यात्रा की खैर चाहते हो तो। उन्होने बताया कि वे शनि मंदिर गए हैं। लेकिन ट्रेन के समय तक स्टेशन पहुंच जाएगें। ट्रेन बिलासपुर पहुंच गयी। पंकज को एक बार फ़िर फ़ोन लगाया। वह स्टेशन पहुंच गया था। अपनी काली घोड़ी पर शिरस्त्राण लगाए मुख्य द्वार पर तैयार था। हम स्टेशन के समीप स्थित अरविंद झा के घर गए, वहाँ चाय के साथ साहित्य चर्चा चलते रही। साथ ही आज मुझे संज्ञा जी से भी मिलना था। उन्हे भी फ़ोन कर दिया था। चर्चा के दौरान उनका फ़ोन दो बार आ चुका था। हमने अरविंद से कल पुन: मिलने का वादा किया और संज्ञा जी के दौलतखाने की ओर चल पड़े।

संज्ञा टंडन
बिलासपुर के लिए पंकज  उतना ही नया है जितना मैं। कॉलेज के प्रथम वर्ष में बिलासपुर में आयोजित राज्य स्तरीय व्हाली बाल टूर्नामेंट में खेलने के लिए पहली बार रायपुर संभाग की टीम से बिलासपुर पहुंचा था प्रतियोगिता के साप्ताहिक कार्यक्रम में। लाल बहादुर शास्त्री स्कूल में डेरा था हम लोगों का। उन दिनों की यादें चलचित्र सी चलने लगी दिमाग में। साथ ही कोतवाली के सामने का सिट डाऊन हेयर कंटिग सेलून भी याद आ गया। प्रतिदिन अरपा नदी में नहाते और तैयार होकर प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाते थे। बिलासपुर के रास्तों को पहचानने की कभी कोशिश ही नहीं की। क्योंकि कोई न कोई स्थानीय बंदा हमेशा साथ होता था। संज्ञा जी से चलभाष पर संपर्क में थे। उन्होने जिस मंदिर का लोकेशन दिया, उसे पंकज ने कुछ और समझा तथा किसी दूसरे मंदिर में ले गया। आखिर हम आधे घंटे चक्कर लगाने के बाद ठिकाने पर पहुंच गए। संज्ञा जी बालकनी में खड़ी हमारी राह देख रही थी। घर में प्रवेश करते ही सीधे अपने स्टूडियों में ले गयी। यह स्टूडियो कम ब्लॉगर हाऊस भी हैं। यहीं से अपने ब्लॉग के द्वारा ग्लोबल होती हैं।

संज्ञा टंडन स्टुडियो  में
संज्ञा जी की आवाज हमेशा हवा में गुंजती रहती है। उनके फ़ैंस की कोई कमी नहीं, बिलासपुर से उनकी आकाशवाणी सभी सुनते हैं और सी जी स्वर के माध्यम से हम। उनके पीसी से हम ओन लाईन हो गए। रेडियो पर चर्चा चालू थी। उनके कम्पोज किए कार्यक्रम सुन रहे थे। साथ ही उनके फ़ैंस के फ़ोन भी चल रहे थे, चिट्ठी-पत्री एवं फ़रमाईशी कार्यक्रमों में पत्रों को शामिल न करने की नाराजी को लेकर। ग्रामीण अंचल में रेडियो का जलवा आज भी कायम है। निठल्लों से लेकर कार्य में व्यस्त रहने वाले सभी लोग रेडियो सुनते हैं। एफ़ एम के आने के बाद रेडियो का चलन बढ चुका है। रेडियो खरीदना भी आसान और सस्ता हो गया। प्रत्येक चलभाष में रेडियो है। बस ट्यून कीजिए और सुनिए मनपसंद गीत और कार्यक्रम। चर्चा के बीच सही समय पर पकोड़े भी आ जाते हैं, इनकी मुझे जरुरत थी, साथ ही शुगर फ़्री चाय भी। पकोड़ों और चाय के बीच आगामी प्रोजेक्ट पर चर्चा होते रही। पंकज चलभाष पर चर्चारत था। उसके आते तक पकोड़े गायब हो गए। शाम ढलने लगी, अंधेरा होने लगा था। हमने संज्ञा जी से विदा ली और चल पड़े पंकज के दौलत खाने की ओर।

चलो भाई, खाना हुआ तैयार
पंकज का कहना था कि रात का खाना किसी होटल में खाया जाए क्योंकि उसका कुक छुट्टी पर था। मैने होटल में खाने से मना कर दिया और कहा कि घर चल कर दोनो मिलकर खाना बना लेगें। मेरे प्रस्ताव पर वह राजी हो गया। मनपसंद सब्जी ली। लेकिन बनाना दोनों को नहीं आता था। पंकज ने कहा कि मसाले के पैकेट पर रेसिपी लिखी है। उसे पढ कर बना लेगें, यह भी आईडिया कोई बुरा नही। घर पहुंच कर लिफ़ाफ़े में आ गए और भोजन की तैयारी करने लगे। रोहतक के बाद खुद बना कर नहीं खाया था। पंकज ने चिकन साफ़ किया और हमने विशेषज्ञ को फ़ोन लगा कर बनाने का तरीका पूछा। चिकन बनने लगा, पंकज का कहना था उसे आटा गुंथना नहीं आता तो हमने ही आटा गुंथा और पंकज ने रोटियाँ सेकी। दूसरी तरफ़ के चूल्हे पर थोड़े चावल भी चढा लिए। इस तरह सम्पूर्ण डाईट का इंतजाम हो गया। भोजन करते हुए तय हुआ कि रतनपुर होते हुए चैतुरगढ एवं तुमान चला जाए। साथ में बाबू साहब भी रहेगें। उन्होने सुबह 9 बजे नेहरु चौक पहुंचना तय किया था। भोजन करके 12 बजे तक नेटियाते हुए अगले दिन की यात्रा के लिए भरपूर नींद लेने चले गए। आगे पढें ……