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सोमवार, 18 जून 2012

केरा तबहिं न चेतिया जब ढिंग लागी बेर…………… ललित शर्मा

रामगढ से लौटते हुए
कॉलेज के दिनों से ही प्रकृति का सामिप्य एवं सानिध्य पाने, प्राचीन धरोहरों को देखने और उसकी निर्माण तकनीक को समझने की जिज्ञासा मुझे शहर-शहर, प्रदेश-प्रदेश भटकाती रही। कहीं चमगादड़ों का बसेरा बनी प्राचीन ईमारतें, कहीं गुफ़ाएं, कंदराएं, कहीं उमड़ता-घुमड़ता ठाठें मारता समुद्र, कही घनघोर वन आकर्षित करते रहे। मेरा तन और मन दोनों प्रकृति के समीप ही रहना चाहता है। जब भी समय मिलता है, प्रकृति का सामीप्य पाने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता। संसार विशाल है, यातायात तथा संचार के आधुनिक साधनों ने इसे बहुत छोटा बना दिया। एक क्लिक पर हम हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर लेते हैं, एक क्लिक पर मंगल एवं चंद्रमा की सैर पर पहुंच जाते हैं। पर ये आधुनिक साधन है जिनसे हम सिर्फ़ उतना ही देख पाते हैं जितनी कैमरे की आँख देखती है। मनुष्य की आँखे कैमरे के अतिरिक्त भी बहुत कुछ और उससे अलग देखती हैं। कैमरे की आँख में पूरा विषय नहीं समाता। किसी भी दृश्य को आँखों से देखने के बाद उसे सहेजने के लिए निर्माता (ईश्वर) कोई साधन नहीं बनाया। अगर बनाया होता तो कैमरे का अविष्कार ही नहीं होता। इसलिए इन्हे अपनी आँखों से ही देखने की मेरी कोशिश रही है।

अयोध्या में सरयु के किनारे फ़ैली हुई थैलियां
मनुष्य की एक प्रवृति यह भी है कि वह अपने घर का आँगन साफ़ रखना चाहता है पर अपने आँगन का कचरा दूसरे के आँगन में फ़ेकना भी चाहता है। घुमंतु होने के कारण मैने पर्यटन स्थलों पर देखा है कि लोगों को पर्यावरण की तनिक भी समझ नहीं है। वे अपने साथ लाया हुआ कचरा उपयोग के पश्चात जहाँ जाते हैं वहीं फ़ैला देते हैं, छोड़ आते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ हों या पानी की बोतले, यह कचरा कभी भी खत्म नहीं होता। इससे पर्यावरण को हानि पहुंचती है। लोग नदियों के उद्गम, समुद्र के किनारे, नदियों के किनारे बसे हुए धार्मिक स्थलो पर प्लास्टिक का कचरा छोड़ आते हैं। चारों तरफ़ हवा में प्लास्टिक की थैलियाँ ही थैलियाँ उड़ते रहती है। पानी की बोतलें पड़ी रहती है। कचरे को साफ़ करने वाले हाथ सीमित होते और फ़ैलाने वाले लाखों। इन्हे देखकर पर्यावरण एवं प्रकृति प्रेमी सिर्फ़ सिर ही पीट सकता है, दु:खी हो सकता है इसके अलावा कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि समझने, समझाने वा्ले कम है, बर्बाद करने वाले लाखों। प्रदूषण से पवित्र गंगा का जल भी प्रदूषित हो चुका है। अब तो गंगा जल का आचमन करने में संक्रमित होने का डर बना रहता है। प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ गया है, जल-थल-वायु प्रदुषण से मुक्त नहीं है। यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रदूषण ही फ़ैला हुआ है।

वृक्ष के वक्ष पर गोदना 
प्रकृति का श्रंगार वन हैं, हरियाली है, जब मनुष्य शहरी जीवन से ऊब जाता है तो वनों की ओर भागता है, लेकिन वहाँ भी प्रदुषण फ़ैलाने में यहां भी नहीं चूकता, कहीं पेड़ों के तने को खोद कर अपना नाम लिखेगा तो कहीं प्लास्टिक का कचरा फ़ैलाकर वनस्पति को हानि पहुंचाएगा। प्लास्टिक के कचरे में खाने का सामान होने पर लोभवश पशु उसे थैली सहित ही खा लेते हैं जो पशुओं के अमाशय में जमा होकर उनकी मृत्यु का कारक बनता हैं। वनों की अंधाधुन्ध कटाई के साथ बढते हुए शहर और गाँव के कारण वनों में मनुष्य हस्तक्षेप बढते जा रहा है। पशु, पक्षी, अपने प्राकृतिक निवास में असुरक्षित हो गए हैं। पर्यावरण असंतुलन होने के कारण उन्हे भोजन-पानी नहीं मिल पाता और वे शहर,गाँव की ओर आकर ग्रामीणों द्वारा मारे जाकर अकारण ही काल का ग्रास बन जाते हैं। अगर यही स्थिति रही तो कुछ वर्षों में धूप से सिर छिपाने के लिए भी जगह नहीं मिलेगी एवं पीने के लिए पानी नहीं। मनुष्य अपने हाथों ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है। जिस सभ्यता पर उसे गर्व है, उसे अपने हाथों ही खत्म कर रहा है। वह दिन दूर नहीं जब यह सभ्यता भी समाप्त होकर किसी बड़े टीले के नीचे हजारों साल बाद किसी पुराशास्त्री को उत्खनन में प्राप्त होगी और वे इसका काल निर्धारण कर कयास लगाएगें कि इस सभ्यता का विनाश कैसे हुआ?

प्राचीन नाट्य शाला सीता बेंगरा रामगढ सरगुजा
जहाँ कहीं भी पुरातात्विक धरोहरे हैं वहाँ पर मैने देखा है कि कुछ बेवकूफ़ किस्म के पर्यटक दीवारों पर अपने नाम गोद देते हैं। अपने नाम के साथ किसी लड़की का नाम जोड़ कर लिखना  नहीं भूलते, और हद तो तब हो जाती है जब वे दीवालों पर तीर से बिंधा हुआ दिल का चिन्ह बनाते हैं। इस कुकृत्य (इसे कुकृत्य ही कहुंगा) पीछे इनकी मंशा पत्थर पर अपना नाम गोद कर अमर हो जाने की रहती है। जैसे हीर-रांझा, सीरी-फ़रहाद, सस्सी-पुन्नु, लैला-मजनुं, सोहनी-महिवाल, लोरिक-चंदा आदि की प्रेम कहानियाँ अमर हो गई, उसी तरह इतिहास में ये भी याद रखे जाएं। परन्तु इन्हे पता नहीं कि वे जिस पुरातात्विक धरोहर के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं वह उनकी गलती के कारण आने वाली पीढी के लिए असुरक्षित हो गयी है। जिस दिन से उन्होने उसके साथ छेड़खानी की, उसी दिन से पुरातात्विक धरोहर के नष्ट होने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी। मैने कई जगह देखा कि उत्त्खनन से प्राप्त मूर्तियों पर लोग धार्मिक भावना से सिंदूर पोत देते हैं, रोली लगा देते हैं। अक्षत या फ़ल फ़ूल चढाते हैं, इससे सड़न होकर बैक्टीरिया पैदा होते हैं जिससे कालांतर में प्राचीन मूर्तियों का क्षरण होता है। इनकी सुरक्षा को लेकर लोग संबंधित विभागों पर चढाई करते हैं, लेकिन ध्यान में यह भी होना चाहिए कि देश का नागरिक होने के कारण पर्यावरण, एवं पुरातात्विक धरोहरों की सुरक्षा की महती जिम्मेदारी उनकी भी है।  

सीता बेंगरा रामगढ में मंच का निर्माण कर प्राकृतिक सौदर्य का खात्मा
जिन किलों और महलों के द्वार पर खड़े होने की हिम्मत किसी ऐरे-गैरे इंसान की नहीं होती थी वह मजे से पर्यटक बनकर जाता है और अपनी दुर्बुद्धि का चिन्ह वहाँ छोड़ आता है। अभी मैने रामगढ में ही देखा, गुफ़ा तक पहुचने के लिए सीढियाँ बना दी गयी हैं। गुफ़ा के सामने मंच बना दिया है। जिससे गुफ़ा की प्राकृतिक पहचान खो गयी है। पर्यटक सीढियों से चढ कर सीधे ही गुफ़ा में प्रवेश कर जाते हैं। जहाँ बेशकीमती भित्ति चित्र है, उनका भी क्षरण हो रहा है। नाट्यशाला के सामने चट्टानों पर लोगों ने अपने नाम गोद दिए हैं। जो दूर से ही दिखाई देते हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित चट्टानों का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है। महेशपुर में बड़े देऊर मंदिर में शिव की प्रतिमा के समक्ष किसी ने संगमरमर का नंदी स्थापित कर दिया है। वहाँ पूजा पाठ शुरु है। ग्रामीण चौकीदारों का कहना नहीं मानते, उनसे लड़ने पर उतारु हो जाते हैं। मामला धार्मिक आस्था पर जाकर खत्म हो जाता है। मेरी राय में पुरातात्विक धरोहरों तक पहुचने के लिए जब से सड़क का निर्माण हुआ है, तब से पर्यटकों की पहुंच आसान हुई है। इससे धरोहरों को हानि अधिक पहुंची है। पुरातात्विक धरोहरों को बचाने के लिए आम नागरिक को भी इनके प्रति संवेदनशील एवं जागरुक होकर अपना योगदान करना पड़ेगा।  

सिरपुर: चेतावनी के बाद भी कोई नहीं चेतता
दुनिया बहुत बड़ी है, अनेक सभ्यताओं ने यहां जन्म लिया, फ़ली-फ़ूली और फ़ना हो गयी। कोई नहीं बता सकता यह संसार कितनी बार बसा और कितनी बार उजड़ा। संसार के बसने का कारण प्रकृति और ईश्वर है तो विनाश का कारण मनुष्य ही है। अपनी कुबुद्धि से मनुष्य ने इस सुंदर संसार का विनाश ही किया है। इसने पूर्ववर्ती गलतियों से कोई सीख नहीं ली और आज भी नहीं ले रहा है। धरती को उजाड़ने एवं विनाश करने के सारे संसाधन जुटा लिए हैं, परन्तु इसे सुरक्षित रखने की दृष्टि से मनुष्य सभ्य नहीं हुआ है। अगर मनुष्य का बस चलता तो पुरातात्विक महत्व की कोई भी धरोहर इससे बच नहीं पाती, चाहे मोहन जोदडो, हड़प्पा कालीन सभ्यता हो, चाहे मिस्र के पिरामिड हो, चाहे प्रागैतिहासिस काल की प्राचीन खगोल वेधशाला स्टोनहेंज हों, वर्तमान में मनुष्य के समक्ष अपने पूर्वजों के निर्माण एवं उनकी सभ्यता पर गौरव करने के लिए कुछ नहीं बचा होता। इन सबका विनाश अगर प्रकृति ने किया है तो इनका संरक्षण भी प्रकृति ने अपने गर्भ में किया है। कहीं मिट्टी के टीलों में दबी हुई पुराधरोहरें मिली तो कहीं समुद्र की तलहटी में सुरक्षित। परन्तु जैसे ही उत्खनन या अन्य प्रकार से प्रकाश में आईं, इनके विनाश का आगाज़ हो गया और यह अनवरत जारी है। धरोहरों को बचाने की दिशा में समाज को भी जागरुक होना पड़ेगा। तभी हमारी गौरवशाली विरासत बच पाएगी, तभी हम अपनी आने वाली पीढी को सौंप पाएगें।

रामगढ से लौटते हुए तीन ब्लॉगर 
सरगुजा भ्रमण को यहीं विराम देते हैं, अब मिलेगें हम शीघ्र ही मनसर (महाराष्ट्र) में राजा प्रवरसेन एवं महारानी प्रभावती से तथा रामटेक का भी भ्रमण करेगें।

पोस्ट अपडेट: 18/5/12 के सांध्य दैनिक छत्तीसगढ में पोस्ट का प्रकाशन, (पढने के लिए न्युज क्लिप पर क्लिक करें।)

शुक्रवार, 15 जून 2012

रामगढ: सुतनुका देवदासी और देवदीन रुपदक्ष ------------ ललित शर्मा

रामगढ में लगे सरकारी स्टाल
रामगढ छत्तीसगढ के एतिहासिक स्थलों में सबसे प्राचीन है, यह अम्बिकापुर से 50 किलोमीटर दूरी पर समुद्र तल से 3202 फ़ुट की ऊंचाई पर है। रामगढ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, भित्तिचित्रों एवं गुफ़ाओं से सम्पन्न होने के कारण इस स्थान पर प्राचीन भारतीय संस्कृति का परिचय मिलता है। यहाँ सात परकोटों के भग्नावेश हैं। रामगढ पहाड़ी पर स्थित सीता बेंगरा गुफ़ा के समीप ही रामगढ महोत्सव का स्थायी मंच बनाया गया। इस मंच पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन होना है। मंच के समीप से ही बना हुआ कांक्रीट का रास्ता सीता बेंगरा गुफ़ा तक जाता है जिसे प्राचीन नाट्य शाला कहते हैं। कार्यक्रम प्रारंभ होने में विलंब था तब हमने तय किया गुफ़ा देख कर आया जाए। जंगल में महोत्सव स्थल पर शासन की ग्रामोन्मुख एवं विकासोन्मुख जानकारियाँ देने के लिए सभी विभागों के स्टाल लगे हुए थे। जिसमें पांम्पलेट फ़ोल्डर के साथ जानकारियाँ दी जा रही थी। समीप ही मेले जैसे उत्सव था, खाई-खजानी (मेले के चटर-पटर मिष्ठान) के साथ घरेलु उपयोग में आने वाली वस्तुओं की दुकाने सजी हुई थी। वनवासी मेले एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने आए हुए थे। पहाड़ के पास कोई बसाहट नहीं है, दुरस्थ वनवासी मेले में शिरकत करने करमा नाच करने अपने मांदर, ढोल के साथ साज श्रृंगार करके बाजे गाजे के साथ अतिथियों का स्वागत करने के लिए आए हुए हैं।

जोगीमारा गुफ़ा  में सुतनुका और देवद्त्त की कथा कहता शिलालेख
हम सीता बेंगरा गुफ़ा में पहुचे। सीता बेंगरा नाम सीता जी से संबंधित होने के कारण पड़ा। पहाड़ में ऊंचाई पर खोद कर इसे बनाया गया है। सामने मुख्य नाटय मंच है तथा दांयी तरफ़ जोगी मारा गुफ़ा है जिसमें हजारों साल पुराने शैल चित्र हैं। जो समय की मार से अछूते नहीं रहे। धीरे-धीरे इनका क्षरण हो रहा है। लाल रंग से निर्मित कुछ शैल चित्र अभी भी स्पष्ट हैं। जोगीमारा गुफ़ा में मौर्य ब्राह्मी लिपि में शिलालेख अंकित है, जिसे राहुल भैया ने पढ कर सुनाया। जिससे सुतनुका तथा उसके प्रेमी देवदीन के विषय में पता चलता है। जोगीमारा गुफ़ा की उत्तरी दीवाल पर पाँच पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं - पहली पंक्ति-शुतनुक नम। दूसरी पंक्ति-देवदार्शक्यि। तीसरी पंक्ति-शुतनुक नम देवदार्शक्यि। चौथी पंक्ति-तंकमयिथ वलन शेये। पांचवी पंक्ति-देवदिने नम। लुपदखे। अर्थात सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में),सुतनुका नाम की देवदासी को प्रेमासक्त किया। वरुण के उपासक(बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रुपदक्ष ने। जोगीमारा गुफ़ा की नायिका सुतनुका है। जोगीमारा की गुफ़ाएं प्राचीनतम नाट्यशाला और कवि-सम्मेलन के मंच के रुप में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सीता बेंगरा नाट्य शाला का विहंगम दृश्य
हम जोगीमारा गुफ़ा से सीता बेंगरा गुफ़ा में चढते हैं। आज मेला होने के कारण काफ़ी ग्रामवासी पर्यटक आए हुए हैं। गुफ़ा में राम दरबार की मूर्तियां सजा दी गयी हैं। यहां एक पुजारीनुमा बैगा बैठा है जो मुर्तियों सहारे कुछ आमदनी की आस लगाए हुए है। गुफ़ा के भीतर दोनो तरफ़ कक्ष बने हुए हैं जो सामने से दिखाई नहीं देते। मुझे बताया गया कि नाटक करने वाले कलाकार यहीं पर बैठ कर सजते थे और अपनी पात्र की प्रस्तुतिकरण की प्रतीक्षा करते थे। विद्वानों का कहना है कि भारतीय नाट्य के इस आदिमंच के आधार पर ही भरतमुनि ने गुफ़ाकृति नाट्यमंच की व्यवस्था दी होगी- कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यामण्डप:। सीता बेंगरा गुफ़ा पत्थरों में ही गैलरीनुमा काट कर बनाई गयी है। यह 44.5 फ़ुट लम्बी एवं 15 फ़ुट चौड़ी है। दीवारें सीधी तथा प्रवेशद्वार गोलाकार है। इस द्वार की ऊंचाई 6 फ़ुट है जो भीतर जाकर 4 फ़ुट ही रह जाती हैं। नाट्यशाला को प्रतिध्वनि रहित करने के लिए दीवारों को छेद दिया है। प्रवेश द्वार के समीप खम्बे गाड़ने के लिए छेद बनाए हैं तथा एक ओर श्रीराम के चरण चिन्ह अंकित हैं। कहते हैं कि ये चरण चिन्ह महाकवि कालीदास के समय भी विद्यमान थे। मेघदूत में रामगिरि पर सिद्धांगनाओं(अप्सराओं) की उपस्थिति तथा उसके रघुपतिपदों से अंकित होने का उल्लेख भी मिलता है।

सीता बेंगरा में शिलालेखा
पिछले दिनों मै रामटेक की यात्रा पर गया था, वहां भी कहा गया कि कालीदास ने मेघदूत की रचना यहीं रामटेकरी पर की थी। विद्वानों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रो वी वी मिराशी द्वारा रामटेक(नागपुर) में रखे गए दो लकड़ी के खड़ाऊं आदि के आधार पर उसे रामगढ बनाने का प्रयास किया था। पर 1906 में पूना से प्रकाशित श्री वी के परांजपे के शोधपरक व्यापक सर्वेक्षण के "ए फ़्रेश लाईन ऑफ़ मेघदूत" द्वारा अब यह सिद्ध हो गया कि रामगढ(सरगुजा) ही श्रीराम की वनवास स्थली एवं मेघदूत का प्रेरणास्रोत रामगिरी है। इस पर्वत के शिखर की बनावट आज भी वप्रक्रीड़ा करते हाथी जैसे है। सीता गुफ़ा के प्रवेश द्वार के उत्तरी हिस्से में तीन फ़ुट आठ इंच लम्बी दो पंक्तियाँ(जिसमें 2.5 इंच अस्पष्ट) उत्कीर्ण हैं। जो किसी राष्ट्र स्तरीय कवि सम्मेलन का प्रथम प्रमाण कही जा सकती हैं। "आदिपयंति हृदयं सभाव्वगरु कवयो ये रातयं… दुले वसंतिया! हासावानुभूते कुदस्पीतं एव अलगेति। अर्थात हृदय को आलोकित करते हैं, स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में… वासंती दूर है। संवेदित क्षणों में कुन्द पुष्पों की मोटी माला को ही आलिंगित करता है।" इस पंक्ति का मैने छाया चित्र लिया। 

सीताबेंगरा नाट्य शाला के समक्ष लेखक
गुफ़ा को भीतर से अच्छे से देखा तथा वहां बैठ कर अहसास किया कि उस जमाने में जब यहां नाटक खेले जाते होगें तो यहां से पहाड़ी के नीचे का दृश्य कैसा दिखाई देता होगा? पात्रों के संवाद बोलने के समय उनकी आवाज कहां तक जाती होगी? गुफ़ा तक जाने के लिए पहाड़ियों को काटकर पैड़ियाँ बनाई गयी हैं। नाट्यशाला(सीता बेंगरा) में प्रवेश करने के लिए दोनो तरफ़ पैड़ियाँ बनी हुई हैं। प्रवेश द्वार से नीचे पत्थर को सीधी रेखा में काटकर 3-4 इंच चौड़ी दो नालियाँ जैसी बनी हुई है। शायद यहीं पर नाटक करने के लिए मंच बनाया जाता होगा। कालीदास के मेघदूत का यक्ष इसी जोगीमारा गुफ़ा में रहता था जहां उसने प्रिया को प्रेम का पावन संदेश दिया था यही के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कालीदास ने मेघदूत में किया है। यहीं पर जल का कुंड है। वनौषधियाँ, कंदमूल फ़ल भी इस स्थान पर प्रचूर मात्रा में मिलते हैं। गुफ़ा के सामने शासन द्वारा मंच बनाकर इसके प्राकृतिक सौंदर्य को समाप्त कर दिया गया है। सीमेंट से बना यह मंच मखमल में टाट का पैबंद नजर आता है। पर्यटकों की सीधी पहुंच गुफ़ा तक होने के कारण इसका भी क्षरण हो रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो इसका प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो सकता है।

180 फ़ुट लम्बी सुरंग"हाथी पोल"
गुफ़ा के नीचे पहाड़ी में हाथी पोल नामक सुरंग है। इसकी लंबाई 180 फ़ुट है। पहाड़ी उस पार के निवासी इस गुफ़ा सुरंग के रास्ते सीता बेंगरा तक आते हैं। यह सुरंग इतनी ऊंची है कि इसमें हाथी आसानी से पार हो जाते हैं। इसीलिए इसे हाथी खोल या हाथी पोल कहा जाता है। हम सीता बेंगरा गुफ़ा से नीचे उतर कर हाथी पोल सुरंग में पहुचे, यहाँ सामने खड़े होने पर सुरंग से दूसरे सिरे आता हुआ प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है। सुरंग के भीतर प्रवेश करने पर जानी पहचानी गंध आती है। यह गंध सभी पुरातात्विक स्थलों पर मिलती है। दिमाग भन्ना जाता है, इस गंध से मुझे प्राचीन जगह की पहचान होती है। यह गंध चमगादड़ के मल-मुत्र की है। जहाँ भी गुफ़ाओं या पुरानी इमारतों में अंधेरा रहता है चमगादड़ उसे अपना आदर्श बसेरा समझ कर निवास कर लेते हैं। सुरंग में पहाड़ी से कई जगह पानी रिस रहा है, आए हुए लोग इस पानी को पी रहे हैं। कुछ लोग धूप से बचने के लिए सुरंग में नींद ले रहे है, एक महिला और उसकी बेटी पत्थरों का चुल्हा बनाकर भोजन बना रही है और खाने के लिए ताजा पत्तों की पत्तल का निर्माण हो रहा है। इससे प्रतीत होता है कि आदिम अवस्था में मनुष्य इन कंदराओं में ऐसे ही गुजर बसर करता होगा।

रामगढ पहाड़ी का दृश्य
महाकवि  कालिदास का रामगिरि और सीतबेंगरा से गहरा नाता है। यह पुरातात्विक प्रमाण और कालिदास द्वारा रचित मेघदूत से मिलते हैं। हम कालिदास से तो मिले नहीं पर उनके द्वारा रचित मेघदूत के छंद और यक्ष-प्रिया की प्रेम कथा अभी तक रामगढ के वनों में पहाड़ियों में गुंज रही है। आज भी मधुमक्खियों के छत्तों से उत्तम मकरंद झर रहा है। महुआ के वृक्ष फ़ल फ़ूल रहे हैं, सरई (साल) के वन गर्व से सिर उठाकर आकाश की ऊंचाई से होड़ लगा रहे हैं। गजराज आज भी अपनी उपस्थिति इस अंचल में बनाए हुए हैं। यहां के हाथी इंद्र के एरावत से कम नहीं है। डील-डौल और कद में उतने ही मजबूत है। आषाढ के प्रथम दिन वर्षा का आगमन नहीं हुआ है। बदला है तो सिर्फ़ प्रकृति का चक्र बदला है। मानसून के आगमन की तिथि पीछे रह गयी। वही मांदर की थाप वनवासियों का नाच हो रहा है। जो रामगढ की गौरव गाथा गा रहे हैं उल्लासित होकर। रामगढ से लौट आया पर मेरा मन उन्हीं कंदराओं में अटका हुआ है जहाँ भगवान श्रीराम के चरण पड़े थे, सीता माता ने निवास किया था। महाकवि कालीदास ने मेघदूत रचा था, जहाँ सुतनुका देवदासी और रुपदक्ष (मेकअप मेन) श्रेष्ठी देवदीन का प्रेम हुआ था। फ़िर कभी लौट कर आऊंगा रामगढ यक्ष बनकर प्रिया से मिलने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस में।