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शनिवार, 12 जनवरी 2013

शरभराज का शरभपुर ……………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
बार-नवापारा के जंगल में कांसा पठार एवं रमिहा पठार के बीच में हटवारा पठार स्थित है। इस पठार को सिंघा धुरवा कहा जाता है। मान्यता है कि जंगल में स्थित पठार पर वन देवी चांदा दाई का वास है। यहाँ तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक रास्ता ग्राम अवंरई होकर जाता है तथा दूसरे रास्ते से सघन वन से होकर नाले को 7 बार पार करने के पश्चात पहुंचा जाता है। इस पहाड़ी पर प्राचीन किले के अवशेष मिलते हैं तथा वन में बस्ती के अवशेष मिलते हैं। जहाँ पर प्राचीन ईंटों से बनी संरचना धरती की सतह पर दिखाई देती है। हो सकता है कि यहाँ प्राचीन काल में कोई नगर या बसाहट रही होगी। ईंटों का आकार वही है जैसा सिरपुर में उत्खनन  के दौरान प्राप्त हुई हैं। यहाँ की भौगौलिक स्थिति से प्रतीत होता है कि यह कोई राजधानी रही होगी। जो वर्तमान में प्रकाश में नहीं आई है।
सिंघा धुरवा  का गुगल चित्र
ग्रामीणों से सिंघा धुरवा के विषय में चर्चा करने पर एक किंवदंती सुनने  में आई। कहते हैं  कि इस किले में कोई "चोरहा राजा" निवास करता था। जो अमीरों को लूटकर उनका माल-असबास और धन गरीबों में बांटता था। अर्थात राबिन हुड जैसा ही कोई पात्र था। "चोरहा राजा" की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वह पाँव-पाँव जाता था और पाँव-पाँव ही लौटता था। उसके पैरों के चिन्ह आते हुए के तो दिखते थे परन्तु लौटते हुए के पद चिन्ह नजर नहीं आते थे। वह इतना सिद्धहस्त था कि अपने पैरों के पड़े हुए चिन्हों पर उल्टा लौटता था, जिसके कारण उसके लौटते हुए के पदचिन्ह नजर नहीं आते थे और पकड़ा नहीं जाता था। किंवदंतियों के मूल में भी कुछ सच होता है बस जरुरत होती है सच पर सदियों के लगे गर्द को झाड़ने की।
सिरपुर का गुगल दृश्य
इसके लिए हमें इतिहास की ओर मुड़ना होगा। वर्तमान छत्तीसगढ याने प्राचीन दक्षिण कोसल के इतिहास में शरभपुरीय वंश का जिक्र आता है। शरभपुरियों की 8 पीढियों ने 11 दशकों तक शासन किया था। इन्होने अपने अधिकांश ताम्रपत्र शरभपुर से जारी किए हैं। जाहिर है कि शरभपुर इनकी राजधानी रही होगी।  लेकिन अभी तक शरभपुर की पहचान नहीं हो पाई है कि शरभपुर कहाँ पर स्थित था। शरभपुरियों का शासन का सही काल निर्धारण नहीं हो पा रहा है क्योंकि इन्होने अपने ताम्र अभिलेखों में सन् या संवत का प्रयोग नहीं किया है। इन्होने न ही अपना नया संवत जारी किया और न ही गुप्त संवत का प्रयोग किया। शरभपुरीयों की यह बहुत बड़ी चूक है जिसके कारण उनका काल निर्धारण नहीं हो पा रहा है। प्रसिद्ध इतिहासकार स्व: श्याम कुमार पाण्डेय इनका शासनकाल 342 ईं से प्रारंभ मानते वहीं पी.एल.मिश्रा 470 ईं वी मानते हैं।

सिंघा धुरवा के द्वार का पुराना चित्र  
शरभवंश का संस्थापक शरभराज को माना जाता है। कहते हैं ये स्थानीय थे,जो पहले वाकाटक राजाओं के अधीन सामंत रहे। फ़िर वाकाटक राजाओं के आपसी झगड़े का लाभ उठाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफ़ल रहे। शरभपुरीय वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, ताम्रपत्र में इन्होने ने स्वयं को परमभागवत अंकित किया है। शरभपुरियों की राजमुद्रा गजलक्ष्मी थी, इसे ताम्रपत्रों एवं सिक्कों में अंकित किया गया है। ताम्रपत्रों के माध्यम से राजा दान देता था जिससे इनके इतिहास का पता चलता है। शरभपुरीय शासक जयराज ने अपने नाम के आगे "महा" लगाकर "महागजराज" नाम का प्रयोग किया। इसके बाद के शासकों ने अपने नाम के साथ "महा" शब्द का प्रयोग किया। यथा महादुर्गराज, महासुदेवराज, महाप्रवरराज, आदि आदि।
सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर ब्लॉगर
शरभपुरीय वंश के शासक नरेन्द्र का ताम्रपत्र पीपरदुला (सारंगढ) से प्राप्त होता है जिससे ज्ञात होता है कि वह शरभ राज का पुत्र था। यह दान पत्र शरभपुर से जारी किया गया है। शरभपुरीय राजवंश के शासकों द्वारा अधिकांश ताम्रपत्र, सिक्के शरभपुर से जारी किए गए हैं। इनके सिक्कों पर प्राकृत भाषा के स्थान पर संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है। नरेन्द्र ने अपने शासन काल में कुरुद (महासमुंद) से अपने शासन काल के 24 वें वर्ष में ताम्रपत्र जारी किया। इससे प्रतीत होता है कि इसने दीर्घकाल तक समृद्धिपूर्वक शासन किया। इसका शासन छत्तीसगढ के विशाल भूभाग के अलावा वर्तमान उड़ीसा के कुछ भूभाग पर भी था।  नरेन्द्र  के पश्चात प्रसन्न मात्र गद्दी पर बैठा। इसका नरेन्द्र से संबंध ज्ञात नहीं होता। उड़ीसा के कटक क्षेत्र से लेकर महाराष्ट्र के चांदा तक प्रसन्न मात्र के सोने के सिक्के प्राप्त होते हैं।
सिंघा धुरवा के द्वार की वर्तमान स्थिति
प्रसन्न मात्र की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र जयराज सिंहासनारुढ हुआ। इसके बाद मानमात्र गद्दी पर बैठा। इसके पुत्र महासुदेवराज के ही सबसे अधिक 8 ताम्रपत्र प्राप्त होते हैं। जिनमें 6 शरभपुर से और 2 सिरपुर से जारी किए गए हैं। अनुमान है कि शरभपुरियों ने शरभपुर के पश्चात अपनी राजधानी सिरपुर विस्थापित की हो। सुदेवराज का आरंग पर अधिकार था इसलिए राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से सिरपुर को दूसरी राजधानी बनाया गया  हो।  सुदेवराज के पश्चात उसका छोटा भाई प्रवरराज शासक हुआ। उसने शरभपुर के स्थान पर अपने भाई द्वारा स्थापित सिरपुर को राजधानी बनाया। उसने ताम्रपत्रों में अपने को  मानमात्र का पुत्र बताया है। इसने अपने भाई व्याघ्रराज को  सिरपुर में सर्वराकार  के रुप में नियुक्त कर दिया। डॉ श्याम कुमार पाण्डेय के अनुसार 510 से 515 ईस्वी के बीच शरभपुरीय राजवंश का अवसान हो गया। पाण्डुवंशियों से शरभपुरियों के निर्णायक युद्ध में कोसल से इनका शासन समाप्त हो गया।
सिंघा धुरवा पर प्रतिमावशेष
शरभपुर की पहचान पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम ने प्रथम महाराष्ट्र के वर्धा जिले आर्वी को फ़िर सम्बलपुर को शरभपुर माना। रायबहादुर हीरालाल ने श्रीपुर को ही शरभपुर बताया। पं लोचनप्रसाद पाण्डेय ने इसे उड़ीसा के शरभगढ से जोड़ा। एम जी दीक्षित इसे सिरपुर के समीप ही मानते हैं। डॉ श्याम कुमार पाण्ड़ेय के अनुसार मल्हार ही  शरभपुर है। डॉ पीएल मिश्रा सिरपुर के आस-पास ही शरभपुर मानते हैं। डॉ विष्णु सिंह ठाकुर सिरपुर के पास ही शरभपुर मानते हैं। अरुण कुमार शर्मा ने गत वर्ष संस्कृति विभाग द्वारा  आयोजित सेमिनार में कहा था कि हमने शरभपुर ढूंढ लिया है वह सिरपुर के पास ही जंगलों में है। सिंघ धुरवा को डॉ एल एस निगम शरभपुर नहीं मानते।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के साथ प्रसन्नता के पल
सिंघा धुरवा के शरभपुर होने न होने पर विद्वानों में मत भिन्नता है। लेकिन इस इलाके की भौगौलिक स्थिति एवं वहाँ बिखरी हुई पुरातात्विक सामग्री को देखते हुए यह तो तय है कि यह कोई महत्वपूर्ण प्राचीन नगरी रही होगी। इसके साथ ही किंवदंतियों एवं ग्रामीणों द्वारा सिंघा धुरवा की पहाड़ी के नीचे की संरचनाओं को हटवारा एवं किसबिन डेरा कहना यह साबित करता है  कि कभी यह इलाका आबाद था। जहाँ बाजार लगता था और गृहस्थी के उपयोग की वस्तुओं की खरीदी बिक्री होती थी। सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर स्थित द्वार इसका प्रमाण हैं कि कभी यहाँ पर किसी ने अपनी सुरक्षा के लिए गढ का निर्माण किया था। उस काल में गढ का निर्माण भी वही करेगा जो शासक होगा। जिस तरह से शरभपुरियों  ने सिरपुर एवं शरभपुर दोनो स्थानों से ताम्रपत्र जारी किए उसे देखते हुए  अनुमान है कि यही शरभगढ हो सकता है। इसकी प्रमाणिकता उत्खनन में प्राप्त सामग्री एवं अभिलेखों से ही सिद्ध होगी। तब तक शरभपुर इतिहास के नक्शे से गायब ही रहेगा। … जारी है  … आगे पढें

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

सिंघा धुरवा का गुमशुदा

प्राम्भ से पढ़ें 
बोरिद पहुंचकर भूख लगने लगी थी पर हमारे पास भोजन का कोई साधन नहीं था। स्कूल के समीप हैंडपंप पर पानी पीने के लिए रुकना पड़ा। मैं मंगतु यादव की परछी में जाकर कुछ देर के बैठ गया। डोकरी केजा बाई फ़िर वहीं पर मिल गयी। गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था। दो चार बच्चों के अलावा सिर्फ़ केजा बाई ही दिखाई दे रही थी। पूछने पर पता चला कि ग्रामवासी थाना गए हैं। कारण पूछने पर ज्ञात हुआ कि सिंघा धुरवा से नवरात्रि के अवसर पर एक व्यक्ति देवनरायण गोंड़ गायब हो गया है। उसका पता वर्तमान में भी नहीं चला पाया है। मैने जिज्ञासावश ग्रामीणों से चर्चा की। तो यह नरबलि की आशंका सामने आई।
सिंघन गढ का मुख्य द्वार
ग्रामीणों से चर्चा करने पर ज्ञात हुआ कि बोरिद एवं एक अन्य गाँव के युवकों ने समिति बनाकर सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर चांदा दाई की पूजा एवं नवरात्रि पर्व मनाने का निर्णय लिया। जिसके लिए मंगतु जगत को बैगा एवं बोरिद के ही देवनारायण को सेऊक की जवाबदारी दी। ज्योति कलश की देखभाल करने के लिए जंगल में स्थित निर्जन पहाड़ी पर देवनारायण एवं बैगा रहते थे। श्रद्धालु दिन में ही दर्शन करके आ जाते थे। क्वांर नवरात्रि 2 अक्टुबर 2011 पंचमी के दिन देवनारायण रहस्यमय ढंग से लापता हो गया। उसके बाद आज तक उसका पता नहीं चला कि वह कहाँ गया। जंगली जानवर खा गए या उसकी हत्या हो गयी?
सिंघनगढ की चढाई
50 वर्षीय देवनारायण के दो पुत्रियाँ एवं एक पुत्र है। तब से इसका परिवार अपने बाप को ढूंढते हुए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। घर का एक मात्र कमाऊ सदस्य लापता हो जाने से भूखों मरने की नौबत आ गयी है। अर्थाभाव में बच्चों की पढाई भी छूट गयी है। दो जून की रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। देवनारायण के लापता होने के विषय में जब मंगतु बैगा से पूछताछ की गयी तो उसने ग्रामवासियों को गुमराह किया। उन्हे सही जवाब नहीं दिया और कहा कि देवनारायण ने अपनी पुत्रियों को पंचमी के दिन धोती एवं दूध लेकर चान्दा दाई आने को कहा था। स्थिति यह बन गयी की बैगा के झांसे में आकर देवनारायण के परिजन 3 अप्रेल 2012 तक उसकी गुमशुदा की रिपोर्ट थाने में दर्ज नहीं कर पाए।
किले का पठार
बैगा मंगतु राम ने उसके परिजनों से कहा कि नवमी को आ जाएगा। जब नवमी को नहीं आया तो कहा कि एक महीने बाद आ जाएगा। इसी तरह बैगा के गुमराह करने के कारण दिन गुजरते गए और देवनारायण वर्तमान तक लौट कर  नहीं आया। थक हार कर देवनारायण के परिजनों ने 3 अप्रेल 2012 को पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंप कर जांच कराने की मांग की। उनकी मांग  को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। देवनारायण की गुमशुदगी का मामला दो थाना क्षेत्रों में फ़ंस कर रह गया है। बोरिद गाँव तुमगाँव थाना क्षेत्र में आता है और घटना स्थल कसडोल थाना क्षेत्र में। थाना क्षेत्र के विवाद में देवनारायण की गुमशुदगी की जाँच को लेकर उसका परिवार फ़ुटबाल बना हुआ है।
किले पर अवैध निर्माण।यहीं से देवनारायण गायब हुआ था।
कहा जाता है कि देवनारायण के बल्दाकछार निवासी दामाद खुमान सिंग एवं ग्रामीणो ने शपथ पत्र देकर कहा है कि चांदा दाई के प्रबंधक एवं पुजारी मंगतु राम ने की देवनारायण के गायब होने में मुख्य भूमिका है। कहते हैं कि मंगतु राम पूजा-पाठ के साथ बलि प्रथा में विश्वास रखता है। इसलिए देवनारायण की नरबलि देने की प्रबल आशंका है।  साथ ही यह भी आशंका है कि मंगतु राम ने देवनारायण की हत्या कर दी है और देवनारायण के परिजनों एवं ग्रामवासियों को गुमराह कर रहा है। पंचमी के दिन देवनारायण के गायब होने के बाद मंगतुराम भी घटना स्थल से दो दिन के लिए गायब हो गया था और गाँव वालों को गुमराह कर रात-रात भर जंगल में उसे ढूंढने के लिए भटकाता रहा।
सिंघनगढ का उत्तरी द्वार
मंगतुराम पर हत्या या बलि देने का शक ग्रामवासियों को इसलिए भी है कि सिंगा धुरवा में चांदा दाई की पूजा के दौरान चढावा और ज्योति कलश जलाने के लिए लाखों रुपया दान आता था। मंगतुराम द्वारा दान की राशि में घपला करने की आशंका व्यक्त की जा रही है। हो सकता है देवनारायण के गायब होने के मूल में दान राशि के बंटवारे की विवाद हो। ग्रामीणों ने देवनारायण के गायब होने की रिपोर्ट पुलिस में कर दी है। अब पुलिस की जांच से ही सामने आएगा कि सिंघा धुरवा से देवनारायण के गायब होने के पीछे किसका हाथ है? ग्रामवासियों की आशंकाओं के अनुसार नरबलि हुई है या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर पुलिस को ढूंढना है। सिंगा धुरवा के साथ एक  नरबलि की दास्तान भी जुड़ गयी।


दो दिनों तक प्रयास करने के बाद जंगल में स्थित सिंघन गढ में ऐसा क्या था जिसे मैं देखना चाहता था इसके विषय में ऐतिहासिक जानकारी आगामी आलेख में प्राप्त होगी। … आगे पढें……

बुधवार, 9 जनवरी 2013

सघन वन में सिंघा धुरवा ………… ललित शर्मा

प्राम्भ से पढ़ें 
सुबह मदिरों का भ्रमण कर रहे थे तभी शैलेन्द्र दुबे पहुंच गए। 9 बज रहे थे और अभी हमें स्नान के साथ नाश्ता भी करना था। घर पहुंच कर फ़टाफ़ट तैयार हुए और होटल से नाश्ता करके पानी की बोतलें लेने के बाद हम सिंघा धुरवा (सिंगन गढ)  की तरफ़ रवाना हुए। खरखरा एवं महमल्ला नाला पार करने के बाद हम अमलोर के स्कूल में पहुंचे। वहाँ से पाण्डे जी को साथ लिया। एक से भले दो और दो से भले हम चार हो चुके थे। बोरिद गाँव के बाहर की सड़क पर चल कर हम सुकलई नाले के पास पहुंचे। नाले में पानी एवं रेत होने के कारण हमें बाईक से उतर कर नाला पार करना पड़ा। नाला पार करके हम जंगल में प्रवेश कर गए।  मैं सोच रहा था कि जल्दी ही सिंगा धुरवा पहुंच कर शाम ढलते तक लौट आएगें।मेरे साथ आदित्य सिंह, पाण्डे जी, शैलेन्द्र तीनो ही इस जंगल का अनुभव रखने वाले थे। वे पूर्व में भी कई बार इस स्थान पर आ चुके थे। मैं आशवस्त था कि जब 3 अनुभवी गाईड हैं तो जंगल में कोई समस्या नहीं होने वाली। जंगल में प्रवेश करने पर सबसे पहले बांस का जंगल मिला। बांस के जंगल में पतली पगडंडी दिखाई दे रही थी और उस पर ही हम चल रहे थे। आगे-आगे मै और आदित्य सिंह और पीछे-पीछे शैलेन्द्र दूबे और पांडे जी। बरसात के समय जंगल भयानक हो जाता है। कीड़े-मकोड़े, मकड़ियाँ, सांप-बिच्छू आदि का पता नहीं चलता कि घास में कहाँ छिपे हैं। सिर्फ़ एक ही दंश काफ़ी है इनका आदमी को खाट पकड़ाने के लिए।
जंगल का प्रवेश द्वार सुकलई नाला पार करते हुए 

घास के पत्तों की आड़ में छिपी पगडंडी दिखाई दे रही थी। पर उस पर लगातार मनुष्य के चलने के चिन्ह नहीं दिख रहे थे। बांस की झाड़ियाँ पगडंडी पर झूल रही थी। हमें झुक कर निकलना पड़ रहा था। साथ बड़ी मकड़ियों ने जाले बुन कर रास्ता बंद कर रखा था। उनके बीच से निकलने पर सारा जाला ही मुंह पर आ जाता था। इससे बचने के लिए मैने बांस की एक टहनी ले ली और उसे आगे करने से जाले टूट जाते थे। सिंगा धुरवा जाने के लिए नाले को सात बार पार करना पड़ता है ऐसा आदित्य सिंह ने बताया। यह एक ही  नाला है जो सात भांवर पहाड़ी की तलहटी में घूमता है। यह बार नवापारा का घनघोर जंगल है। आगे बढने पर रास्ते में मनुष्यों की उपस्थिति के चिन्ह दिखाई देने लगे।कमार आदिवासियों ने बांस काट कर पगडंडी पर फ़ेंक रखे थे। इसके कारण बाईक निकालने में परेशानी हो रही थी। अब हमने नाले को एक बार पार कर लिया था। नाले में गाड़ी पार करने के लिए वृक्षों की शाखाएं डाली हुई थी। अन्यथा उनके बिना रेत में नाला पार करना संभव नहीं था। नाला पार कर रहे थे और गिनती कर रहे थे कि कितनी बार पार कर लिया। 5 बार नाला पार करने के बाद आदित्य सिंह ने बाईक रोक ली और कहने लगे कि बस सिंघा धुरवा के समीप आ गए हैं। इधर से रास्ता बाघ माड़ा जाता है और आगे नाला पार करने के बाद सिंगा धुरवा आ जाएगा। हम आगे बढते जा रहे थे। लगभग 2 घंटे हो गए थे हमें जंगल में चलते हुए। अब हम भूल चुके थे कि  नाला कितनी बार पार किया है। एक स्थान पर बाईक रोक कर आदित्य सिंह और पाण्डे जी ने मंत्रणा की। फ़ैसला किया कि आगे चलना चाहिए, सिंघा धुरवा आगे है।
जंगल के मध्य में अफ़्रीका के जंगलों जैसी बांबी

हम इनके ही भरोसे थे, जब जानकार आदमी हो तो उनके विवेकानुसार चलना ही धर्म है। आगे चलने पर हमें सागौन एवं अन्य वृक्षों का प्लांटेशन दिखाई दिया। प्राकृतिक जंगल की जगह कृत्रिम जंगल में आ गए थे। यहाँ रास्ता बना हुआ था। एक जगह हमें दो टांगीधरी चरवाहे मिले, हमने उनसे सिंघा धुरवा जाने का रास्ता पूछा। उन्होने कहा कि आगे चल कर फ़ारेस्ट के चौकीदार की झोंपड़ी आएगी उससे बाएं तरफ़ जाने से सिंघा धुरवा आएगा और दाएं तरफ़ जाने से छेरी  गोधनी। हमने दाएं तरफ़ जाकर सबसे पहले सिंगा धुरवा जाने का निश्चय किया। अब हम आगे बढकर दाएं मुड़ गए। कच्चे रास्ते पर फ़िर से बांस का घना जंगल शुरु हो गया था।रास्ते के  दोनो तरफ़ आदमकद से भी ऊंची बांबियाँ दिखाई देने लगी। बांस के घने जंगल से बाईक निकालना भी भारी पड़ रहा था। नाले को दो - तीन बार फ़िर पार किया। आगे बढने पर हम एक पठार पर पहुंच गए। लगभग जंगल के भीतर 22-25 किलोमीटर चल चुके थे। पठार के चारों तरफ़ पहाड़ियाँ दिख रही थी। दृश्य मनमोहक था। लेकिन जंगल में हमारे अलावा कोई दूसरा आदमी दिखाई नहीं दे रहा था। नाले से गाड़ी पार करते थक चुके थे। पठार से थोड़ा आगे बढने पर एक बैल या गाय का कंकाल दिखाइ दिया। अब इसका मतलब यह था कि यहाँ बड़े शिकारी जानवर भी हैं। जो शिकार करके मांस खा गए। यहाँ से आगे बढने पर हमें सिंघा धुरवा जाने का रास्ता नहीं मिला।
घने जंगल में रास्ता

आगे पहुचने पर टी एन्ड आ गया। हम एक तरफ़ बढ रहे थे। नाला पार करने के बाद रास्ता पथरीला था। जगह-जगह पत्थर बिखरे पड़े थे। हमने यहाँ पत्थरों में पुरावशेष तलाश करने का प्रयत्न किया। मुझे भूख लगने लगी थी। सुबह जब सिरपुर से चले थे तो हमने 8 आलु बड़े ले लिए थे। अन्य साथियों ने तो खाने से मना कर दिया। मैने बैठे-बैठे सारे ही बड़े खा लिए। पानी पीकर डकार ली तो कुछ जान में जान आई। आदित्य सिंह और पाण्डे जी लौटकर दूसरे रास्ते पर तलाश करने लगे और हम पत्थरों  में सिर फ़ोड़ने लगे। पुरावशेषों के कोई चिन्ह नहीं मिले। बरसात के कारण घास अधिक थी और पत्तों से धरती ढकने के कारण दिखाई भी नहीं दे रह था।हम भी लौट चले, नाला पार करने के बाद आदित्य सिंह और पाण्डे जी मिल गए। हमने निर्णय किया कि अब 3 बज रहे हैं वापस चला जाए। जंगल में सूर्यास्त भी  जल्दी हो जाता है और दिन भी छोटे हैं। कहीं रास्ता भटक गए तो मुश्किल हो जाएगी। यहाँ मोबाईल भी काम नहीं कर रहा था। अगर मोबाईल काम भी करता तो हम क्या पता बताते अपना कि कहाँ पर खो गए हैं। ऐसा कुछ चिन्ह भी नहीं दिखाई दे रहा था जिसे पता बनाया जा सकता। नाला पार करने के बाद एक पहाड़ी के किनारे आदित्य सिंह ने फ़िर गाड़ी रोकी और कहा कि सही जगह पहुंच गए। यहीं कहीं से रास्ता होना चाहिए सिंघा धुरवा की पहाड़ी पर चढने का। यहाँ भी काफ़ी दूर तक जंगल में पैदल ही भटके लेकिन रास्ता नहीं मिला।
रास्ते में बांस के घने झुरमुट

अपनी बाईक पर सवार होकर हम वापस चले। फ़िर नाला पार करने के बाद नाले के किनारे टीले पर  प्रस्तर के स्तम्भ दिखाई दिए। वहाँ पर लाल झंडा लहरा रहा था। वहाँ पहुचने पर एक दुर्गा की मूर्ती रखी हुई दिखाई दी। साथ ही भवन में लगने वाले दो भारवाहक भी रखे हुए थे। इससे अंदाजा लगाया कि हम सही स्थान पर हैं। यहीं कहीं पर सिंघा धुरवा के पुरावशेष होने चाहिएं। जिसकी खोज हम 5 घंटों से कर रहे थे। ये दोनो प्रस्तर के स्तंभ लगभग 8 फ़ुट के थे और किसी कुशल कारीगर द्वारा तराशे हुए दिखाई दे रहे थे। उन्हे कहीं आस-पास से ही लाकर रखा गया होगा। मैने दो-तीन चित्र लिए और वहाँ से हम लौट चले। जिस रास्ते से आए थे उसी रास्ते पर जंगल को पार करते हुए हम बोरिद पहुंचे।पास के ही गाँव में खाने का इंतजाम था।
आदित्य सिंह जी

बोरिद पहुंचने पर स्कूल के पास बोरिंग से पानी भरती केजा बाई मिल गयी। उसके पूछने पर आदित्य सिह ने बताया कि सिंघा धुरवा गए थे और जंगल में रास्ता भटकने के कारण उस स्थान तक नहीं पहुच पाए। केजा बाई ने कहा कि उसके नाती प्रमोद को ले जाना था वह पहुचा देता आप लोगों को। बस यही गलती हो गयी थी। दिन भर भटकने बाद भी मनवांछित स्थान पर नहीं पहुंच पाए। बोरिद से अब हम सिरपुर के लिए लौट चले थे। शैलेन्द्र को महासमुंद जाना था और मुझे फ़िर एक रात सिरपुर में गुजारनी थी। अगले दिन फ़िर सिंघा धुरवा जाने का प्रबंध करना था। अगर सिंघा धुरवा नहीं पहुंच पाया तो यहाँ आना ही व्यर्थ हो जाएगा। हमने तय किया कि अगले दिन किसी जानकार को ही साथ लेकर जाएगें। जारी है …… आगे पढें……