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शनिवार, 9 नवंबर 2013

तिरपट पंडित दर्शन एवं ब्लॉगर मिलन

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
त्तीसगढ़ की सीमा समीप आ रही थी, घर पहुंचने की व्यग्रता बढते जा रही थी। शहडोल से हम अनूपपुर की ओर बढ रहे थे। तभी पाबला जी को याद आया कि हमारे ब्लॉगर साथी धीरेंद्र भदौरिया जी  व्यंकटनगर में निवास करते हैं। तो मैने झट उन्हें फ़ोन लगाया। फ़ोन पर वे मिल गए, मैने बताया कि हम लौट रहे हैं नेपाल से। व्यंकटनगर से पेंड्रा होते हुए जाएगें। तो उन्होनें घर आने का निमंत्रण दिया। मैने हिसाब लगाया कि दोपहर तक हम वहाँ पहुंच जाएगें। उन्हे भोजन व्यवस्था के लिए कह दिया और कहा कि ठाकुर भोजन नहीं करेगें। तो उन्होने हँसते हुए कहा कि हम आपको ब्राह्मण भोजन ही कराएगें। 
शहडोल ( सहस्त्र डोल)
एक स्थान पर हमने नाला देख कर इसे दिशा मैदान के लिए उपयुक्त स्थान समझा। यहां से निवृत होने पर आगे बढे। इसके बाद धीरेंद्र भदौरिया जी बार बार फ़ोन पर हम लोगों का लोकेशन लेते रहे। उन्होने कहा कि अमलाई चचाई होते हुए आप व्यंकट नगर पहुंचिए। एक बारगी तो मैने व्यंकटनगर जाना त्याग दिया था। हम लोग अमरकंटक की राह पर बढ गए थे। लेकिन धीरेन्द्र जी के पुन: आग्रह को त्याग नहीं सके। अमलाई और चचाई की तरफ़ चल पड़े। यहां से बिलासपुर लगभग 200 किलोमीटर था और बिलासपुर से रायपुर 110 किलोमीटर। आज हमें किसी भी हालत में घर पहुंचना था। मालकिन का फ़ोन आने पर हमने कह दिया था कि रात तक हम घर पहुंच जाएगें। रास्ते में एक तिरपट पंडित दिखाई दिया। बस लग गया था कि आगे का सफ़र अभी भी कठिनाईयों भरा है।
नाले किनारे दो ब्लॉगर
व्यंकटनगर छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। व्यंकट नगर से छत्तीसगढ़ की सीमा प्रारंभ हो जाती है। भदौरिया जी ने बताया कि वे व्यंकट नगर में सड़क के दांई तरफ़ की दुकान पर बैठे हैं। व्यंकट नगर में प्रवेश करने पर भदौरिया जी प्रतीक्षा करते दिखाई दिए। यहाँ पहुंच कर पता चला कि उनका गाँव पोंड़ी यहाँ से 6-7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब एक रेल्वे लाईन पार करके हम इनके गांव पहुचे। भदौरिया जी यहाँ के सरपंच भी रह चुके हैं तथा राजनीति में अच्छा रसूख बना रखा है। गाँव से बाहर आने पर इनका फ़ार्म हाऊस दिखाई दिया। किसी फ़िल्म के बंगले की तरह बाग बगीचा सजा रखा रखा है। पुराने जमाने के ठाकुरों जैसी नई हवेली बनी हुई है।
उच्चासनस्थ धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
भदौरिया जी के घर पहुंचने पर पाबला जी तो सोने चले गए और हमने स्नान करने का कार्यक्रम बना लिया। कैसी भी परिस्थितियाँ हो दैनिक स्नान के बिना रहा नहीं जा सकता। एक बार भोजन न मिले, स्नान होने से फ़ूर्ति आ जाती है। इधर भोजन भी तैयार हो गया था। गिरीश भैया और हमने स्नान किया। भोजन लग गया तो पाबला जी भी उठ गए। भोजनोपरांत भदौरिया जी ने ब्लॉगिंग रुम दिखाया। उनकी कुछ तकनीकि समस्या का हल पाबला जी ने किया। अब हमारा लौटने का समय हो रहा था। आसमान में बारिश के आसार दिखाई दे रहे थे। पाबला जी ने पालिथिन की आवश्यक्ता महसूस की। लेकिन भदौरिया जी के यहाँ इंतजाम नहीं हो सका। उन्होने कहा कि व्यंकट नगर में मिल जाएगी, नहीं तो पेंड्रारोड़ में तो मिलना तय है।
बरसात शुरु
जैसे ही हम पोंड़ी से बाहर निकले, बूंदा बांदी शुरु हो गई। व्यंकट नगर के बाद पेंड्रा रोड़ तक की सड़क बहुत खराब निकली। इकहरी सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे थे। धीरे-धीरे हम आगे सरकते रहे। लगभग 4 बजे हमने गौरेला में प्रवेश किया। अब पेंड्रा में हमने पालिथिन ढूंढनी प्रारंभ की। तब तक बरसात बढ चुकी थी। 10 मिनट की मूसलाधार वर्षा में ही पेंड्रा की सड़कों पर पानी भर चुका था। नाली और सड़क बराबर हो चुकी थी। सुरभि लाज वाले चौराहे पर हमने कई दुकानों पर पालिथिन तलाश की, नहीं मिली। फ़िर एक दुकानदार ने बताया कि चौराहे पर फ़लां दुकान में मिल जाएगी। मैने पाबला जी से गाड़ी में छाता होने के बारे में पूछा तो उन्होने छाता निकाल कर दिया।
गांव की डगर पर मातृशक्ति
मैं छतरी लेकर बरसते मेह में पालिथिन लेने गया। बरसात बहुत अधिक हो रही थी। दुकानदार से 2 मीटर पालिथिन ली और बांधने के लिए साथ में सुतली भी। गिरीश भैया ने चद्दर पकड़ रखी थी। पानी गाड़ी के भीतर आने लगा था। जिससे बैग भीग रहे थे। हमने बैग बीच वाली सीट पर रख लिए। अब बरसात रुके तो पालिथिन भी लगाई जाए। नगर की गलियों में चक्कर लगाते रहे, न रास्ता मिला, न पालिथिन लगाने के लिए स्थान। पेंड्रा से बिलासपुर जाने के लिए 3 रास्ते हैं। पहला जटका पसान कटघोरा होते हुए बिलासपुर। 2सरा कारीआम, मझगंवा होते हुए रतनपुर से बिलासपुर और 3सरा अचानकमार के जंगलों से कोटा होते हुए बिलासपुर। इसमें पहला मार्ग लम्बा है। दूसरा मार्ग खराब है, एक बार हम पहले भुगत चुके थे। तीसरे मार्ग पर जाना था।
तेरा पीछा न छोड़ूंगा………
मुझे याद था कि रेल्वे लाईन पार करने के बाद दो रास्ते निकलते हैं बांई तरफ़ बिलासपुर के लिए तथा दांई तरफ़ अमरकटंक के लिए। जब हम रास्ता ढूंढ रहे थे तब मालकिन का फ़ोन आया - कहां तक पहुचे हैं? अभी पेंड्रा में है, बिलासपुर के लिए निकल रहे हैं। - इतनी देर कैसे हो गई? अभी फ़ोन बंद करो, हम बारिश में फ़ंसे हैं बाद में बात करते हैं। - हमारा दिमाग भन्ना गया। जैसे तैसे करके हमें रास्ता मिल गया। एक जगह गाड़ी खड़ी करके डिक्की पर पालिथिन चढा ली। चलो अब बरसात भी होती है तो अधिक हानि नहीं होगी। जीपीएस वाली बाई ने कई बार धोखे से खराब रास्ते में डाल दिया था इसलिए उस पर सहज विश्वास नहीं हो रहा था। अगर रात को कोटा वाले जंगली रास्ते पर पड़ गए तो फ़िर लक्ष्मण झूला झूलते हुए रात काटनी पड़ती तथा इस मार्ग पर रात में अन्य वाहन भी नहीं चलते।
बढते कदम
अब हम रास्ते पर बढ चले थे। केंवची पहुंचते तक शाम ढल चुकी थी। केंवची के होटल में हमने चाय पी और अचानकमार के जंगल में प्रवेश कर गए। भारी वाहनों के लिए शाम छ: बजे के बाद प्रवेश वर्जित है। केंवची के प्रवेश करने पर घाटी पर ही गाड़ी चलती है। एक स्थान पर सड़क किनारे महिला दिखाई दी। उसने सलवार सूट पहन रखा था। सुनसान सड़क पर महिला दिखाई देने से सबसे पहले ध्यान आता है चमड़े के जहाज का व्यवसाय तथा दूसरा ध्यान आता है कोई परेतिन हो सकती है। हम परीक्षण करने के लिए रुके तो नहीं, लेकिन गिरीश भैया के साथ चर्चा अवश्य शुरु हो गई। नारी विमर्श पर गहन चर्चा के साथ हास परिहास होते रहा और गाड़ी आगे बढते रही।
चलती है गाड़ी उड़ती है धूल
पहाड़ी समाप्त होने पर वन विभाग का चेक नाका आता है। वहाँ गाड़ी का नम्बर और आने का समय दर्ज किया जाता है। फ़ारेस्ट वाले ने एक सवारी भी लाद दी हमारे साथ। उसे अचानकमार गाँव जाना था। लाठीधारी अनजान आदमी को हमने गाड़ी में बैठा लिया। उसके बैठते ही दारु का भभका सीधा नाक से टकराया। लगा कि चौकी से ही हैप्पी बर्थ डे मना कर आ रहा है या हो सकता है चौकी तक महुआ पहुंचाने गया होगा। उसे हमने अचानकमार में छोड़ा और आगे बढ़े। रात के 8 बजे होगें। लग रहा था कि 9 बजे तक बिलासपुर पहुंच पाना संभव नहीं है। मौसम बरसाती हो गया था। कोटा होते हुए हम बिलासपुर रिंग रोड़ से निकल लिए। यह रिंग रोड़ लगभग 15 किलोमीटर का है और सीधे हिर्री मांईस के समीप जाकर निकलता है। 
नेपाल से लौटते तक लौकी 60 रुपए किलो हो गई 
पिछली गर्मी में आया था तो सड़क की हालत अच्छी थी लेकिन बरसात में ओव्हर लोड गाड़ियों ने इसकी गत मार दी। हमारी गाड़ी की चाल नहीं सुधरी। हम वैसे ही लड़खड़ाते हुए आगे बढते रहे। आधे - पौन घंटे के बाद हम मुख्य मार्ग तक पहुच चुके थे। रायपुर बिलासपुर मार्ग का निर्माण चल रहा है। इसे 4 लाईन बनाया जा रहा है। नींद की झपकी आने लगी थी। हिर्री के आगे चलकर एक स्थान पर ढाबा दिखाई दिया। यहाँ हमने उड़द की काली दाल के साथ तंदूरी रोटियों से पेट भरा। ढाबे वाले सरदार जी पुराने पत्रकार निकले। गिरीश जी ने वर्षों के बाद भी उन्हें पह्चान लिया। सड़क पर ढाबा चलाने के लिए एक - दो अखबारों की एजेंसी लेने से धौंस जम ही जाती है।
गुड़हल का फ़ूल धीरेंद्र भदौरिया जी के बगीचे में
भोजन के बाद हमें नींद आने लगी। मेरी तो आँखे खुल ही नहीं रही थी। आंखे खोलने का प्रयत्न करता लेकिन आँखों को बंद होने से नहीं रोक पा रहा था। पाबला जी की हालत भी कुछ वैसी ही थी। हमने गाड़ी सड़क के किनारे लगा कर सोने का फ़ैसला किया। जब आँख खुल जाएगी तो आगे चल पड़ेगें।  सीट लम्बी करके सो गए। लेकिन नींद आती कहाँ है ऐसी परिस्थितियों में। थोड़ी देर बाद पाबला जी हड़बड़ा कर उठे। मेरी आँख खुल गई, लगा कि जैसे उनकी सांस बंद हो गई है। उन्होने हाथ के इशारे मुझसे पानी मांगा। मैने तुरंत पानी की बोतल उन्हे पकड़ाई। जब उन्होने सांस ली तो मेरी जान में जान आई। वे बोले- रात को सोने भी नहीं देता, रेल पटरियों पर बिखरा नजर आता है। मैं चुप हो गया और उनसे सोने का प्रयत्न करने को कहा।

हिर्री मांइस के पास के ढाबे में
थोड़ी देर आराम करने के बाद हम फ़िर चल पड़े। रात गहराती जा रही थी। बिलासपुर रायपुर मार्ग पर रात में गाड़ी चलाना भी खतरे से खाली नहीं है। सारी हैवी लोडेड ट्रकें चलती है और रोज कोई न कोई हादसा होते ही रहता है। अगर आप सही चल रहे हैं तो कोई भरोसा नहीं ट्रक वाला ही आपसे भिड़ जाए। धरसींवा चरोदा से आगे बढने पर हम विधानसभा वाले रोड़ पर मुड़ गए। इधर से जल्दी पहुंचने की संभावना थी। सड़क और प्लाई ओव्हर के कारण लाईटों की चकाचौंध में रोड़ ही समझ नहीं आया। थोड़ी देर तक पाबला जी से नोक झोंक होते रही। फ़िर उन्होने चुप करवा दिया और आगे बढे। थोड़ी देर में गिरीश जी के घर पहुंच गए। गिरीश जी को घर छोड़ा। मेरा नेट श्रेया रायपुर ले आई थी। बिना नेट के जग सूना।
ब्लेक बाक्स सफ़र का साथी
नेट लेने के लिए हमने फ़ैसला किया कि कृषक नगर से नेट लेकर नई राजधानी होते हुए घर पहुंच जाएगें। भाई को फ़ोन करके बता दिया कि हम पहुंच रहे हैं वो नेट लेकर घर के बाहर मिले। वैसा ही हुआ, हम अब नई राजधानी होकर अभनपुर पहुंच गए। लगभग सुबह के 4 बज रहे थे। पाबला जी को यहाँ से 50 किलोमीटर दूर भिलाई जाना था। मैं घर के गेट के सामने उतर गया। पाबला जी सत श्री अकाल कह कर मेरी यात्रा को विराम दिया और आगे बढ गए। सत श्री अकाल के उद्भोष के साथ हमारी यात्रा प्रारंभ हुई थी। करतार ने हमारी साप्ताहिक यात्रा को सफ़ल बनाते हुए सकुशल घर पहुंचा दिया। इस तरह हमारी नेपाल यात्रा सम्पन्न हुई। मारुति इको ने विश्वास के साथ इतना लम्बा सफ़र निभाया। उसके साथ जीपीएस वाली बाई को भी धन्यवाद। आज भी सज्जे-खब्बे की उसकी मधुर आवाज मेरे कानों में गुंजती है। 

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

सुनसान भयावह सड़क पर भटकते ब्लॉगर

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
नेपाल से जैसे ही हमारी गाड़ी ने भारतीय सीमा में प्रवेश किया वैसे ही हमारी सहचरी बोल पड़ी। बहुत सुकून मिला उसकी मधुर आवाज सुन कर। भले ही मैं उसे गाहे-बगाहे कोसता रहा परन्तु नेपाल में उसकी जरुरत हमें महसूस होते रही। जब वह गडढों भरे रास्ते पर ले जाती थी तो उसका मुंह तोड़ने का मन करता था क्योंकि समय खराब होता था गाड़ी हिचकोले लेते हुए चलती थी। फ़िर भी उस आभासी साथी का संग कभी भूला नहीं जा सकता। एक हिम्मत बनी रहती थी, किसी भी शहर में रास्ता भटकने नहीं देती थी। जैसे ही हम सोनौली गाँव से बाहर निकले तो मैने पाबला जी से कहा कि भारत में प्रवेश कर गए हैं और इसकी पहचान स्वरुप लोटाधारी एवं लोटाधारिणियाँ सड़क के किनारे बैठे/बैठी दिखाई दिए। भारत की यही पहचान है कि सुबह शाम रास्ते के किनारे शौच करते महिला पुरुष दिखाई दे जाएगें।
बढ़ते चलो बी.एस.पाबला जी 
नौतनवा बायपास से निकलने पर पाबला जी ने कहा कि अब क्या प्रोग्राम बनाया जाए गोरखपुर में रात्रि विश्राम करने के लिए। तो मैने कहा कि - गोरखपुर में नहीं रुकते, सीधे ही चलेगें और रात भर गाड़ी हांकेगें। जहाँ नींद आएगी वहीं गाड़ी खड़ी करके सो लेगें। जब जाग गए तो आगे बढ जाएगें। सबने सहमति जताई और हम आगे बढते रहे। जीपीएस के कारण रास्ता याद करने की जरुरत नहीं थी। हम इलाहाबाद होकर आगे बढना चाहते थे। पिछला रास्ता छोड़ना था। जीपीएस वाली बाई को इलाहाबाद जाने का बोल कर हम निश्चिंत हो गए। उसने गोरखपुर से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व ही बायपास से गाड़ी मोड़ दी। लगभग नौ बजने को थे। इस मार्ग पर ट्रकों का परिवहन दिखाई दे रहा था। 

उस समय चाय की दरकार हुई। भोजन का मन नहीं था। हमने चाय के लिए एक होटल में गाड़ी रोकी तो उसने बताया कि दूध नहीं है। कारण पूछने पर पता चला कि कोई त्यौहार है, इस दिन सभी घरों में दूध की जरुरत पड़ती है इसलिए होटलों में दूध नही मिलता। आगे बढ कर एक होटल में फ़िर चाय पूछी तो उसने भी मना कर दिया। हम आगे बढे ही थे कि किसी गाड़ी के जोरों से ब्रेक मारने की आवाज आई। साथ ही गाड़ी के टायरों के घर्षण से जलने गंध। हम अपनी साईड में थे और सामने से एक ट्रक आ रहा था। पाबला जी ने साईड की और मैने ब्रेक लगा दिए, ब्रेक क्या लगाना, लगभग अपनी जगह पर खड़ा ही हो गया था। सामने पुलिया थी और सायकिल वाले दो बच्चे भी। वे भौंचक निगाहों से हमारी गाड़ी की तरफ़ देख रहे थे। ये सब कुछ सेकंडों में घट गया ब्रेक मारने वाली उसी रफ़तार से हमारे बगल से गुजर गई।
कृष्ण कुमार यादव, बी.एस.पाबला, महफूज अली, गिरीश पंकज
कुछ दे्र हम अपने आपको संयत करते रहे। अगर वह कार वाला गाड़ी नहीं संभाल पाता तो हमें टक्कर मारता या सीधे सामने से आ रहे ट्रक से टकराता तो उसके चिथड़े उड़ने तय थे। पता नहीं कैसे लोग अपनी जान खतरे में तो डालते हैं साथ ही दूसरे को परलोकवासी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम आगे बढ गए, रास्ते में एक बड़ा ढाबा दिखाई दिया। जहाँ सफ़ेद कुर्ता पैजामाधारक टेबलों पर जमें  हुए थे। हमने भोजन के लिए यह जगह उपयुक्त समझी। खुले में बैठ गए, लेकिन होटल जितना बड़ा दिखाई, उतना ही घटिया था। रोटी चावल और भटे और आलू की सब्जी के अलावा कुछ था ही नहीं। जैसे तैसे हमने थोड़ा बहुत भोजन किया और आगे के सफ़र में चल पड़े। यह रास्ता अच्छा था, गाड़ी 50-60 की गति से मजे से चले जा रही थी।

जीपीस वाली बाई ने सज्जे मुड़ने कहा और सामने किसी नदी का बड़ा पुल था। पुल के पहले पुलिस की चौकी थी। एक कच्छाधारी पुलिस वाला लोटा लेकर जा रहा था तथा 3 पुलिस वाले डंडा लेकर पुल पर तैनात थे। 3 खटिया भी पड़ी थी मच्छरदानी लगाई हुई। पुल पार करते ही पुन: बड़े बड़े गड्ढे वाली सड़क मिली। हमने सोचा कि थोड़ी दूर होगी यह सड़क, फ़िर अच्छी सड़क आ जाएगी। यह रास्ता हमें बस्ती ले जा रहा था। बस्ती से अयोध्या फ़ैजाबाद होते हुए हमें इलाहाबाद पहुंचना था। यह सड़क तो बिलकुल बरबाद थी। घुप्प अंधेरे में अन्य कोई ट्रैफ़िक भी दिखाई नहीं दे रहा था। आधी रात के सन्नाटे में 4 लोग गाड़ी धकियाते चल रहे थे। 
कृष्ण कुमार यादव एवं ललित शर्मा सिरपुर के साथ 
एक स्थान पर तालाब के किनारे की सड़क ही गायब थी, उस पर नई मिट्टी डाली गई थी। पाबला जी ने गाड़ी रोक ली। अगर यहाँ गाड़ी फ़ंस जाती तो कोई निकालने वाला भी नहीं मिलता। मैने नीचे उतर कर देखा तो पहियों के निशान पर की मिट्टी सख्त थी। बस उन्ही निशान पर चलकर गाड़ी निकाली गई। गाड़ी निकल गई तो चैन की सांस आई। हम सड़क का ट्रेलर देख चुके थे। आगे बढे तो सड़क के किनारे मुसलमानों के घर, मदरसे इत्यादि दिखाई देने लगे। लगा कि हम मुसलमानों की घनी आबादी से निकल कर जा रहे हैं। सड़क दो कौड़ी और रात के एक बज रहे थे। अभी मुज्जफ़रनगर वाले मामले से हवा गर्म है और आपातकाल में इस इलाके में कोई पानी देने वाला भी नहीं मिलेगा। सियासत का क्या भरोसा? कब कौन शिकार हो जाए। सन्नाटा गहराता जा रहा था और रात रहस्यमयी होती जा रही थी। सड़क के आस पास की घास से निकल कर सियार सड़क पर दिखाई दे रहे थे, गाड़ी की रोशनी पड़ते ही भाग जाते थे। इस रास्ते पर 8 सियार दिखाई दिए।

मेरी आँखे लगातार सड़क पर लगी हुई थी। पाबला जी गाड़ी चलाते जा रहे थे। गिरीश भैया पिछली सीट पर शायद हमें कोसते हुए आराम कर रहे थे। क्योंकि उन्होने भी नहीं सोचा होगा कि इतने खतरनाक बियाबान रास्ते पर हमें चलना पड़ सकता है। शायद यह रास्ता बस्ती तक 40 किलोमीटर का रहा होगा। एक छोटे से गाँव में लगभग बहुत सारी लक्जरी बसें खड़ी दिखाई दी। पाबला जी ने कहा - ललित जी बसें देखिए। मैने कहा - यह कोई मुख्य स्टैंड होगा, जहाँ से चारों तरफ़ बसें जाती होगीं इसलिए इतनी सारी बसें एक साथ दिखाई दे रही हैं। हम आगे बढते गए और सड़क के किनारे खड़ी बसों की कतार खत्म ही नहीं हो रही थी। इतने अधिक खराब रास्ते पर लक्जरी बसें देख कर हम चौंक गए। लगभग 100 से अधिक बसें रही होगी। शायद इस इलाके में बड़ा ट्रांसपोर्ट माफ़िया होगा। तभी इतनी सारी बसें एक साथ दिखाई दी।
महफूज अली एवं गिरीश पंकज
बस्ती पहुंचने पर मैने आगे की सीट गिरीश भैया को सौंप दी तथा कुछ देर आराम करने के लिए पिछली सीट पर आ गया। पैर मोड़ कर नींद भांजने लग गया। मेरी आँख तब खुली जब हम अयोध्या से सरयू पर बने बड़े पुल से गुजर रहे थे। आगे फ़ैजाबाद हवाई अड्डे के किनारे से होते हुए हम आगे बढे। फ़ैजाबाद देख कर मुझे अमरेंद्र त्रिपाठी याद आए। यह उनका गृह जिला है। अगर समय होता तो अयोध्या का एक चक्कर फ़िर लगा लेते लेकिन हमें तो 17 तारीख तक किसी भी हालत में घर पहुंचना था। सुल्तानपुर 25 किलोमीटर था तब पाबला जी ने एक पैट्रोल पंप के किनारे गाड़ी को ब्रेक लगाया और बोले कि मैं सो रहा हूँ। जब थकान दूर हो जाएगी तो हम चल पड़ेगें। पैट्रोल पंप में एक चाय की दूकान थी और वहां कई तख्त पड़े थे। पहले तो चाय बनवाकर पी और मैं भी एक तख्त पर ढेर हो गया। गिरीश भैया पैदल घूम कर मौसम का आनंद ले रहे थे।

पाबला एक नींद पूरी करके उठे और मुझे जगाया। मौसम को देखते हुए उन्होने कहा कि डिक्की को ठकना चाहिए। आगे धूल भरा रास्ता है। वैसे भी रात भर चलने से पूरी गाड़ी में और बैग इत्यादि में धूल भर चुकी थी। गिरीश भैया की चादर को हमने डिक्की पर लपेट कर कांच बंद कर दिया। यह जुगाड़ हमें पहले ही कर लेना था। कैमरे को भी धूल से खतरा था, इसलिए मैने चित्र लेने के लिए बैग से निकाला ही नहीं। पर हमारा दिमाग तो काम नहीं किया पर सरदार का दिमाग काम आया। बात बन गई। यहां से हम आगे बढे। तभी ध्यान आया कि अपने प्रसिद्ध ब्लॉगर दम्पत्ति तो इलाहाबाद में ही रहते हैं और हमें अब नहाने और फ़्रेश होने की जरुरत थी। वैसे भी ब्लॉगर्स को मैं अपने पिछले जन्म का संबंधी ही मानता हूँ। जो इस जन्म में मुझे आभासी रुप से प्राप्त हुए। इस जन्म वाले सखा तो साथ पले बढे और खेले कूदे। पिछले जन्म के जो साथी छूट गए थे उन्हे भगवान ने इंटरनेट के माध्यम से मिलवा दिया। ये हुई न कोई बात।
महफूज अली, कृष्ण कुमार यादव, ललित शर्मा एवं  गिरीश पंकज
मैने 9 बजे मैसेज से कृष्णकुमार जी को इलाहाबाद आगमन की सूचना दी। उन्होने तुरंत मैसेज का जवाब देते हुए अपना पता भेज दिया और तत्काल मुझे फ़ोन लगाकर आने को कहा। मैने पाबला जी को बताया तो उन्होने सहचरी को जीपीओ पहुंचाने कह दिया। तभी महफ़ूज का फ़ोन भी आ गया। वह भी इलाहाबाद में था, पाबला जी ने मुझे बताया। चलो ये भी खूब रही, छोटा सा ब्लॉगर मिलन ही हो जाएगा। एक घंटे बाद हमने इलाहाबाद में प्रवेश किया। गंगा पार करने के बाद हमें एक नाका मिला। जहाँ टोल टैक्स लिया जा रहा था। छत्तीसगढ़ सरकार का पत्रकार का कार्ड दिखाने पर उन्होने कहा कि यहाँ नहीं चलेगा, ई यूपी है। चलो भई नहीं चलाओगे तो हमारा क्या जाएगा। घाटा तो यूपी सरकार का ही है। हम ब्लॉगर तो वैसे भी तुम्हारे यूपी की सड़कों को कोसते आ रहे हैं।

इलाहाबाद के ट्रैफ़िक सेंस की चर्चा क्या करुं? अगर नहीं करुंगा तो लोग कहेगें कि बताया नहीं। नाका से आगे बढने पर ट्रैफ़िक का जो हाल देखा, ऐसा कहीं देखने नहीं मिला। दांए, बांए, आगे, पीछे कोई कहीं से भी घुस जाता था। ऑटो वाले बीच सड़क से ही ऑटो मोड़ लेते थे। ट्रैफ़िक की हालत देख कर पाबला जी का दिमाग पर प्रेसर बढ रहा था और मेरा पैर पर। जी पी एस वाली बाई नगर के बीचों बीच लेकर चल रही थी। कृष्ण कुमार जी हम लोगों की लोकेशन ले रहे थे फ़ोन पर। लालबत्ती देख कर चौक पर हमारी गाड़ी रुकी। लेकिन बाकी ट्रैफ़िक नहीं रुका। हम हरी बत्ती का इंतजार करते रहे, चौक पर हमारी गाड़ी के बगल में ही सिपहिया खड़ा था। पाबला जी बोले - जब कोई नहीं रुक रहा तो हम क्यों रुकें। चलो बढा जाए, कह कर गाड़ी बढा दी।
ब्रिटिश क्राउन 
हम सिविल लाईन पहुंच गए। अब सिविल लाईन बहुत बड़ी है। किधर जाएं, जीपीएस वाली बाई जीपीओ, पोस्ट ऑफ़िस कमांड देने पर कई पोस्ट ऑफ़िस दिखाने लगी। जीपीओ की कमांड देने पर उसने हेड पोस्ट ऑफ़िस के पिछले दरवाजे पर पहुंचा दिया। वहाँ पर एक स्कूल था, लेकिन प्रवेश द्वार दिखाई नहीं दिया। हमने गाड़ी आगे बढाई तो गोल चक्कर पर चर्च दिखाई दिया। वहां से आगे बढने पर मुख्य प्रवेश द्वार दिखाई दे गया। द्वार पर पहरा लगा था, हमारी गाड़ी ने प्रवेश किया तो एक व्यक्ति हमें वहाँ मिल गए, जो हमें रिसीव करने के लिए खड़े थे। हमने गाड़ी खड़ी की तो धूल ही धूल भरी हुई थी समान में। तभी कृष्ण कुमार जी भी आ गए साथ आकांक्षा जी भी अलग कार में थे। नन्ही ब्लॉगर अक्षिता पाखी और अपूर्वा स्कूल से आए थे। हम गेस्ट रुम में पहुंच गए। पाबला जी सो गए और मैं स्नानाबाद चला गया।

खाना तैयार था, मैं पाबला जी को नींद से जगाना नहीं चाहता था, गिरीश भैया को खाने के लिए बुला लाया। हम दोनों ने भोजन किया और मैं भी एक नींद लेना चाहता था। यादव जी ने कहा था कि - जब आप लोग फ़्री हो जाएं तो मुझे फ़ोन कर लीजिएगा, मैं यहीं हूँ। मैं सोफ़े पर सो गया। पाबला जी का फ़ोन बजने लगा। 3 बार किसी का फ़ोन आया, वे गहरी नींद में थे। मैं भी निद्रा रानी के आगोश में जाने वाला था फ़ोन की घंटी बज गई। देखा तो महफ़ूज अली थे। आ जाओ भाई सीधे ही उपर। और वो पट्ठा भी सीधा ही उपर आ गया। :) थोड़ी देर में मैं नींद की खुमारी से बाहर आया। महफ़ूज ने पाबला जी को भी जगा दिया। पाबला जी ने स्नान करके भोजन किया। फ़िर मैने तीन बजे कृष्ण कुमार जी को फ़ोन लगाया। वे भी आ गए और ब्लॉगर्स की महफ़िल जम गई। मैने उन्हे सिरपुर सैलानी की नजर से पुस्तक भेंट की।
बी. एस. पाबला, महफूज अली, कृष्ण कुमार यादव, गिरीश पंकज एवं अन्य 
कृष्ण कुमार जी का जनसम्पर्क बहुत तगड़ा है, उन्होने तुरंत ही फ़ोन करके एक पत्रकार को बुला लिया। नेपाल ब्लॉगर सम्मान समारोह पर बात होने लगी। पत्रकार ने हम सबके विचार लिखे। फ़िर हम पोस्ट ऑफ़िस घूमने गए। जहाँ बहुत सारी चीजें मुझे देखने मिली। मेरी रुचि वहां मौजूद ब्रिटिश क्राऊन में अधिक थी। कृष्ण कुमार यादव जी ने बताया कि यह प्रस्तर निर्मित ब्रिटिश क्राऊन पोस्ट ऑफ़िस के कबाड़ में पड़ा हुआ था। उसे जोड़ कर उन्होने पोस्ट ऑफ़िस में रखवाया। इसका एक भाग टूट चुका है तथा लैटिन भाषा में लिखे हुए अक्षर टूटने के कारण लिखा हुआ पढा नहीं जा सका। कुछ पुरानी डाक टिकटें, हरकारों के हथियार इत्यादि यहां प्रदर्शित किए गए है। अब हमारा आगे बढने का समय हो रहा था।

हमने कुछ चित्र 1872 में निर्मित लेटर बॉक्स के साथ खिंचवाए और कृष्ण कुमार जी धन्यवाद देते हुए उनसे विदा ली। यह एक अविस्मरणीय भेंट थी, जो हमेशा याद रहेगी। अब हमें इलाहाबाद के ट्रैफ़िक से फ़िर जूझना था। चौराहे पर फ़िर वही घटना हुई। अबकि बार पाबला जी अड़ गए कि बिना हरी बत्ती हुए गाड़ी आगे नहीं बढाएगें। लाल बत्ती में भी पीछे की गाड़ियाँ वाले आगे बढने के लिए हार्न बजा रहे थे। बत्ती हरी होने पर आगे बढे। बाजार के बीचे से चलते हुए गाड़ी वाली आगे पीछे अगल-बगल से निकलने लगे। हमारी गति एकदम कम ही थी। एक सुजूकी वाले ने बाईक हमारी गाड़ी के सामने अड़ा दी और पाबला जी ने उसे हल्की की टक्कर दी। वह बाईक लेकर घूरते हुए आगे बढा। बाजार से निकल कर हम गंगानदी के पुल पर पहुंचे तो वहां खूंटे गड़े हुए मिले। मतलब इधर से लोहापुल से आगमन का रास्ता था, जाने वाला बंद था। गाड़ी वापस मोड़ी। जीपीएस ने फ़िर उसी रास्ते पर पहुंचा दिया।
तीन ब्लॉगर रास्ते में (कैम्प टी)
फ़िर हमें बंगाल के नम्बर की एक मारुति दिखाई दी। मैने कहा कि इसके पीछे पीछे चलते हैं ये भी पुल पार करेगा। इसके पीछे गाड़ी लगाने पर वह नदी के रास्ते पर गया और वहाँ से लौटती हुई सड़क से पुल पर चढने का रास्ता था। काफ़ी मशक्कत के बाद हमें पुल पार करने का रास्ता मिल गया। यहां पर जी पी एस वाली बाई फ़ेल हो गई। मुझे मालकिन ने फ़ोन करके कहा था कि घर में गंगाजल खत्म गया है। इसलिए गंगाजल लेकर आना। अब क्या बताएं गंगाजल की कहानी। एक बार इलाहाबाद में गंगा त्रिवेणी में स्नान करने के बाद 5 लीटर के डिब्बे में गंगाजल भर कर लाए थे। रायपुर पहुंचने पर देवी शंकर अय्यर मुझे स्टेशन लेने आए। गंगा जल उनकी बाईक की डिक्की में रख कर भूल गया और वो उनके घर पहुंच गया। फ़िर उनसे मांगा नहीं और न ही उन्होने मेरे घर पहुंचाया।

मैं बाजार में आस पास 5-10 लीटर का जरीकेन देखता रहा, लेकिन कहीं नहीं दिखाई दिया। गिरीश भैया कहने लगे कि डिब्बे में भरा हुआ गंगा जल बिकता है। कहीं दिख जाएगा तो ले लेगें। मैने तो आज तक डिब्बे में भरा गंगाजल बिकते नहीं देखा। हाँ डिब्बे जरुर बिकते हैं जिन पर गंगा जल लिखा रहता है। अगर कहीं डिब्बा मिल जाता तो नदी किनारे गाड़ी रोक कर भर लेते। गंगा की अथाह जल राशि से एक डिब्बा गंगा जल भी नसीब में नही था। हम पुल पार करके गंगा के किनारे भी पहुंचे, लेकिन गंगा जल लेकर किसमें जाएं। बिना गंगा जल लिए हमने इलाहाबाद छोड़ दिया और रींवा मार्ग पर चल पड़े। सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। घरों में रोशनी हो चुकी थी। हमें इलाहाबाद से रींवा मार्ग पर आने में 1 घंटे से अधिक समय लग गया। एक होटल में रोक कर चाय बनवाई और पान खाए, बंधवाए और आगे बढे।

नेपाल यात्रा आगे पढे……… जारी है। 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

ज्योतिष का प्रभाव

लोकसभा चुनाव 2009 में छत्तीसगढ़ की कोरबा लोकसभा सीट से चरणदास महंत जी कांग्रेस के उम्मीद्वार  थे, सुमित दास ने मुझसे कोरबा चुनाव प्रचार के दौरान साथ चलने कहा तो मैंने भी घुमक्कड़ी दृष्टि से इलाके का सर्वेक्षण करने के लिए हां कर दी। उसका भी काम हो जाएगा और मेरा भी। 16 अप्रेल को मतदान सम्पन्न हुआ और 17 अप्रेल को मैं अत्यावश्यक कार्य से शाम की फ़्लाईट से दिल्ली आ गया। गुड़गाँव के होटल में रात्रि विश्राम कर रहा था तभी लगभग रात्रि 11 बजे महंत जी का फ़ोन आया और चर्चा के दौरान मैने उन्हे बताया कि मेरा आंकलन है कि कांग्रेस सिर्फ़ एक सीट पर ही विजयी रहेगी और 10 सीटों पर भाजपा का कब्जा रहेगा। 16 मई को चुनाव परिणामों की घोषणा हुई, जिसमें मेरा आंकलन सही निकला।

48 डिग्री सेल्सियस की एक महीने की चुनाव प्रचार की कड़ी मेहनत के बाद परिणाम आ ही गया, चरण दास जी विजयी रहे।  चुनाव के पश्चात कांग्रेस को बड़ा दल होने के कारण सरकार बनाने का मौका मिला। 26 मई को केबिनेट का शपथ ग्रहण होना था। चरणदास महंत जी को मंत्रिमंडल में स्थान मिलने की चर्चाएं हवा में गर्म थी। स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी उत्साह था और वे अपने साधनों से दिल्ली पहुंच रहे थे। सुमित दास के मन में दिल्ली जाने की थी जिससे शपथ ग्रहण कार्यक्रम को वह करीब से देख सके। हम 26 मई को दिल्ली पहुंच गए और पहाड़गंज में डेरा जमाया। स्नानाबाद पता चला कि आज होने वाला शपथ ग्रहण स्थगित हो गया है अब अगला कार्यक्रम 28 को होगा।

हम दो दिन दिल्ली और गुड़गाँव घूमे-फ़िरे। 28 तारीख को होने वाले मंत्रिमंडल में शपथ लेने वालों की सूची में चरणदास महंत का नाम नहीं था। दोपहर सभी मंत्रियों ने शपथ ले ली थी। अब हमने वापसी का कार्यक्रम बनाया। मैं और सुमित संध्या काल में चरण दास महंत जी के फ़्लैट पर गए, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के काफ़ी नेता वहाँ एकत्रित थे। हमारी मुलाकात महंत जी से हुई और हमने अपनी वापसी के विषय में बताया। उन्होने टिकिट कन्फ़र्म कराने के लिए रेलमंत्री के नाम चिट्ठी लिख दी। गर्मी के दिन थे, हमने 3900 रुपए में एसी की 2 टिकिटें ली और स्वयं जाकर रेल मंत्रालय के डिब्बे में चिट्ठी डाल कर आए। अब हम मौज में थे, गाड़ी का समय अगले दिन सवा तीन बजे के लगभग था। पालिका बाजार की सैर करके कुछ इलेक्ट्रानिक आयटम खरीदे और शाम पंचकुईया रोड़ पर फ़ैशन डिजायनर रोहित बल की बार में गुजारी।

अगले दिन जब नेट से पता किया तो टिकिट कन्फ़र्म नहीं हुई थी। सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता, अभी चार्ट क्लियर नहीं हुआ है स्टेशन पर जब चार्ट लगेगा तो उसमें कन्फ़र्म दिखाएगा। स्टेशन पहुंचने पर चार्ट में देखा तो तब भी 15-16 वेटिंग बता रहा था। मतलब एसी में सीट नहीं होने के कारण हमारा आरक्षण कन्फ़र्म नहीं हुआ। टी टी से चर्चा होने पर उसने बताया कि आगे भी कन्फ़र्म होने की कोई गुजांईश नहीं है। आपको स्लीपर में बैठना होगा। हो गया सत्यानाश, 39 सौ रुपए देने के बाद भी स्लीपर में भी जगह नहीं थी। हम एसी 2 के बगल वाले स्लीपर में चढ गए। लैट्रिन खोली के पास दो तीन सवारियाँ बैठी थी। हमने भी बैग रख कर वहीं डेरा जमा लिया। सोच रहा था कैसा दुर्भाग्य है कि इस स्थान पर तो 200 में बैठकर सफ़र कर सकते थे। 39 सौ में भी यही स्थान मिला। सुमित ने टी टी से चर्चा की, लेकिन उसने भी स्थान नहीं होने की बात कहकर अपना पीछ छुड़ाया। 

हम टट्टी खोली के पास टिके रहे क्योंकि किसी की आरक्षित सीट पर जाकर बैठने से रात को उठना ही पड़ता और आरक्षित सीट का मालिक भी नहीं चाहता कि कोई अन्य सीट पर बैठे, सभी सवारियाँ उसे चोर उचक्के नजर आती हैं। इसलिए हमने यहीं बैठने का फ़ैसला लिया। यह जीवन में पहली बार घटा था। दिल्ली से रायपुर तक का 23 घंटे का लम्बा सफ़र होने के कारण बैठने का स्थान भी जरुरी था। साथी सवारियों से बात-चीत करते आगरा पहुंच गए। आगरा पहुंचने के बाद सुमित मुझे कह कर गया कि सीट का इंतजाम करके आता हूँ। थोड़ी देर बाद लड़का मेरे पास आया और कहने लगा कि सुमित भैया ने भेजा है, आप कृपया मेरे बारे में कुछ बताईए न, ऐसा कहकर वह हाथ की हथेली खोल कर बैठ गया। मैं समझ गया कि सुमित ने टाईम पास मुर्गा भेज दिया है और अब इसका भविष्य जांचना पड़ेगा।

मैने उसकी जन्म तिथि का आंकलन करते हुए 2-4 भूतकाल की बातें और 2-4 वर्तमान की घटनाओं पर तुक्का छोड़ा, जो एकदम सही फ़िट हो गया। अब वह लड़का पूरे प्रभाव में आ चुका था। वहीं मेरे पास बैठा ही रहा। थोड़ी देर में सुमित का भेजा हुआ दूसरा बंदा भी पहुंचा। उस पर भी मेरा आंकलन सटीक बैठ गया। वह भी वहीं बैठकर चर्चा करने लगा। अगली बार तीसरा बंदा आया, यह कोई 35-40 की उमर का रहा होगा। उसने भी मुझसे कुछ बताने कहा। मैने उसकी जन्मतिथि से आंकलन लगाया तो इस समय उसकी किडनी में स्टोन होना चाहिए था। मैने कहा कि आपकी किडनी में स्टोन है और परेशान है उससे। डॉक्टर ने आपरेशन करवाने की सलाह दी है। सुनकर वह भौंचक्क रह गया, सीधे पैर ही पकड़ लिए। बोला महाराज आपको कैसे पता चला कि मेरी किडनी में स्टोन है और डॉक्टर ने आपरेशन कराने कहा है? मैने कहा कि फ़िर मेरे पास क्यों आए थे, अपने आस पास की किसी सवारी से ही पूछ लेते।

उसने विनय पूर्वक निवेदन किया कि आप यहाँ सवारियों की ठोकर में मत बैठिए, मेरी सीट पर चलिए, एक साईड बर्थ आपको देता हूँ, हम पति-पत्नी और एक बच्चे के पास तीन सीट हैं एक सीट पर आप विराजिए, बच्चे को हम अपने साथ सुला लेगें। मेरे मना करने पर भी नहीं माना और मेरा बैग उठा कर आगे आगे चल पड़ा। मैं उसके पीछे पीछे पहुंचा। उसने साईड लोवर वाली बर्थ मेरे नाम कर दी। सुमित सीट पर बैठा था और उसके चेहरे पर विजयी भाव की हल्की हल्की स्मित थी। इस तरह भविष्याकांक्षी जिज्ञासु लोगों के कारण हमारा उद्धार हुआ, अन्यथा टट्ठी खोली के पास बैठकर ही रात कटती। जब मैने एसी 2 की टिकिट ली थी तभी संदेह हो गया था कि कन्फ़र्म होनी मुश्किल है, क्योंकि गोंडवाना में एसी 2 की एक ही बोगी लगती है और सवारियाँ सैकड़ों होती है। उस दिन के बाद मैने जब भी एसी की टिकिट ली तो कन्फ़र्म ही ली वरना स्लीपर की विश्वसनीय सवारी करने का ही आनंद लिया।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

सुअरमार गढ़


त्तीसगढ़ अंचल में मृदा भित्ति दुर्ग बहुतायत में मिलते हैं। प्राचीन काल में जमीदार, सामंत या राजा सुरक्षा के लिए मैदानी क्षेत्र में मृदा भित्ति दुर्गों का निर्माण करते थे एवं पहाड़ी क्षेत्रों में उपयुक्त एवं सुरक्षित पठार प्राप्त होने पर वहाँ दुर्ग का निर्माण किया जाता था। दुर्गों के चारों तरफ़ गहरी खाई (परिखा) हुआ करती थी। जिसमें भरा हुआ पानी गढ की सुरक्षा एवं निस्तारी के काम आता था। ऐसा ही एक दुर्ग रायपुर से लगभग 115 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित है, जिसे सुअरमाल गढ़ या सुअरमार गढ़ कहा जाता है। इसे रायपुर राज का 13 वां गढ़ माना जाता है। वर्तमान महासमुंद जिले की बागबाहरा तहसील से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गढ़ गोंड़ राजाओं के आधिपत्य में था। वर्तमान में कोमाखान में इन गोंड़ राजाओं के वंशज निवास करते हैं। कोमाखान में जीर्ण शीर्ण अवस्था में इनका महल भी है।
चित्र पर चटका लगा कर देखें

जनश्रुति है कि इस गढ़ के गढ़पति राजा भईना को को गोंड बंधु डूडी शाह एवं कोहगी शाह ने परास्त कर सुअरमार जमीदारी की नींव डाली थी। इस जमीदारी का सुअरमार नाम होने के पार्श्व में रोचक किंवदन्ती है कि इस गढ़ को कलचुरियों जीतने का काफ़ी प्रयास किया परन्तु सफ़लता नहीं मिली। पलासिनी (जोंक) नदी के किनारे डूडी शाह एवं कोंहंगी शाह नामक भाईयों ने 8 एकड़ भूमि पर चने की फ़सल उगाई थी। इस फ़सल को कोई जानवर रात्रि में आकर नष्ट कर जाता था। भाईयों ने उस जानवर का पता करने के लिए रात्रि की चौकीदारी के दौरान उन्हे विशालकाय पाँच पैर वाला सुअर फ़सल नष्ट करता हुआ दिखाई दिया। उन्होने तीर चलाकर उसे घायल कर दिया। 
सुअरमार गढ़ का आकाशिय दृश्य

वह जानवर चिंघाड़ कर भागा, पीछा करने पर वह गढ़ पटना पहुंचा। वहां जाने पर इन्हे पता चला कि यह पाँच पैर का सुअर नहीं हाथी है। उन्होने दरबार में पहुंच कर शिकार पर दावा किया और हाथी को खींच कर बाहर निकाल लाए। गढ़ पटना का राजा इनके दुस्साहस से चकित था, उसने कूटनीति खेली। इन्हे सजा देने की बजाए सोनई गढ़ (नर्रा) को इनसे कब्जा करवाने की सोची। उसने सोनई गढ के राजा भोईना को मार कर राज्य जीतने कहा। दोनों भाईयों ने वीरता पूर्वक लड़कर राजा भोईना को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद गढ पटना के राजा ने इन भाईयों को वह राज्य सौंप दिया। हाथी को सुअर समझ कर मारने के कारण सोनई गढ़ का नाम सुअरमार गढ़ पड़ा।
सुअरमार गढ़ की पहाड़ी

छत्तीसगढ़ अंचल में सोनई रुपई की चर्चा प्रत्येक जगह पर मिल जाती है। गत वर्ष देऊरपारा (नगरी) जाने पर वहाँ तालाब के किनारे सोनई रुपई की चर्चा सुनने मिली। वहाँ मंदिर के पुजारी राजेन्द्र पुरी ने इन्हें धन से जोड़ दिया था और बताया था कि इस स्थान पर हंडा ढूंढने वाले आते हैं और यह सोनई और रुपई है। सुअरमारगढ़ का प्राचीन नाम सोनई डोंगर था। इसे भी सोनई रुपई के साथ संबंध किया गया है। किंवदन्ती है कि सोनई रुपई नामक दो बहनें गोंडवाना राज्य की पराक्रमी योद्धा थी। ये बहनें प्रजावत्सल होने के साथ न्यायप्रिय होने के कारण प्रजा में सम्मानित थी। इनका नाम सोना और रुपा था जो कालांतर में सोनई और रुपई के रुप में प्रचलित हो गया। इन बहनों कि बहादुरी के चर्चे दक्षिण कोसल में सभी स्थानों पर होने के कारण इन्हें देवी के रुप में पूजा जाने लगा। इसलिए अन्य स्थानों पर भी सोनई रुपई की कहानी मिलती है।
सुअरमार गढ़ में अतुल प्रधान

सुअरमारगढ़ की परिखा 25 एकड़ में फ़ैली हुई है। पहाड़ी के पठार पर राजनिवास के अवशेष मिलते हैं। यह हिस्सा दो भागों में विभाजित है जिसे खोलगोशान कहा जाता है इसके अगुआ को गणपति कहते हैं। देवियाँ गढ पर विराजा करती हैं, यहाँ की गढ देवी को महामाया कहा जाता है। कहा जाता है कि पूर्व में देवी को खुश करने के लिए नरबलि दी जाती थी। कालांतर में भैंसों की बलि दी जाने लगी अब बकरों और मुर्गों की बली दी जाती है। खोलगोशान के नीचे संत कुटीर है। राजा गुप्त मंत्रणा करने लिए इस कुटी में राजगुरु से मिलने आते थे। यहाँ का दशहरा प्रसिद्ध है, दशहरा मेला दस दिनों तक चला करता था। वर्तमान में नरबलि की प्रथा समाप्त हो चुकी है।
खंडहर होता कोमाखान का महल

गढ का राजा न्यायप्रिय था, वह न्याय पाखर पर बैठ कर प्रजा की फ़रियाद सुना करता था और न्याय दिया करता था। दंड देने के लिए अपराधी को पत्थर से बांध कर पहाड़ी से नीचे फ़ेंक दिया जाता था। कहते हैं कि जो अपराधी पहाड़ी से गिरकर भी जिंदा बच जाता था उसे कुलिया गांव के सरार में दफ़ना दिया जाता था। इसलिए तालाब को टोनही सरार कहा जाने लगा। वैसे भी मान्यता है कि टोनहीं मृत शरीर की साधना करके उसे जीवित कर लेती हैं और साधना करने के लिए एकांत के रुप में श्मशान या सुनसान स्थानों का उपयोग करती हैं। टोनही सरार की मान्यता के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है। किसी जमाने में यह स्थान दुर्गम वनों से आच्छादित क्षेत्र था। वर्तमान में सारे वन कट चुके हैं। गढ़ के एक स्थान को रानी पासा कहा जाता है, किंवदन्ती है कि पूर्व में रानियाँ मनोरंजनार्थ यहां पर पासा खेला करती थी।
कोमाखान का महल

कोमाखान रियासत के ठाकुर उमराव सिंह द्वारा सन 1856 में गढ परिसर में खल्लारी माता के मंदिर का निर्माण किया गया। जिसकी पूजा अर्चना सतत जारी है। वर्तमान में सुअरमार गढ़ के पूर्व जमींदार ठाकुर भानुप्रताप सिंह के प्रपोत्र ठा उदय प्रताप सिंह एवं ठाकुर थियेन्द्र प्रताप सिंह मौजूद हैं तथा कोमाखान में निवास करते हैं। इनका पुराना राजमहल भी मौजुद है जो वर्तमान में खंडहर हो चुका है। इन्होने सुअरमार गढ़ के विकास के लिए 33 एकड़ भूमि का दान किया है। सुअरमार जाने के लिए  बस एवं रेल्वे की सुविधा उपलब्ध है। सुअरमार गढ़ के मुख्यालय कोमाखान से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर रेल्वे स्टेशन हैं। जहां प्रतिदिन 6 रेलगाड़ियों का ठहराव है। रायपुर एवं महासमुंद से यहाँ के लिए बस एवं टैक्सी सेवा भी उपलब्ध है। किसी जमाने में सुअरमार गढ़ छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण रियासत थी। जिसके अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं।

फ़ोटो - अतुल प्रधान से साभार 

शनिवार, 30 मार्च 2013

चंगोरा भाटा से लौटकर …………


आज शाम चंगोरा भाठा हायर सेकेन्डरी स्कूल द्वारा आयोजित एवं संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा  प्रायोजित सेमीनार से थका हारा घर पहुंचा। ऐसा लग रहा था कि दिमाग का दही हो गया। थकान दूर करने चाय का सहारा लेना पड़ा। कप हाथ में लेने के बाद गर्म चाय की उड़ती हुई भाप के साथ सेमीनार की स्मृति भी उमड़ने घुमड़ने  लगी। सैकड़ों सेमीनार में उपस्थिति देने बाद भी मैने ऐसा अव्यवस्थित सेमीनार कहीं नहीं देखा। ऐसा लगा कि जैसे खड़ी फ़सल को पाला मार गया हो। छत्तीसगढ की वाचिक परम्परा वाले सेमीनार में डॉ प्रभा शर्मा ने "छत्तीसगढ़ का इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति" विषय पर संगोष्ठी में शोध आलेख प्रस्तुत करने का आग्रह किया था। मैने शोध आलेख की समरी उन्हे नियत समय पर मेल कर दी थी और पावर पांईट प्रस्तुतिकरण तैयार करके आदतानुसार सही समय पर सांस्कृतिक भवन चंगोरा भाठा 11 बजे पहुंच चुका गया। उस समय आयोजकों के अतिरिक्त मुझे सुरेश साहु ही मिले, जो मेरे जैसे ही समय पर पहुंचे थे।

कार्यक्रम की संयोजिका डॉ प्रभा शर्मा ने स्वागत किया तथा नाश्ते के लिए पूछा। नाश्ता घर से करके आने के कारण मैने मना कर दिया। कार्यक्रम स्थल का सभागृह बड़ा था। ऐसा लग रहा था कि संगोष्ठी की जगह आमसभा का आयोजन है। 50 कुर्सियों पर मैं अकेला टिक गया। थोड़ी देर में स्कूल के बच्चे आ गए। प्रायमरी, मिडिल एवं हाई स्कूल के सभी कुर्सियां  फ़ुल हो गई। अब लगने लगा कि सेमीनार प्रारंभ हो सकता है। मेरे सहिनाव ललित मिश्रा का आगमन हुआ और उनसे "सिरपुर सैलानी की नजर से पुस्तक पर चर्चा हुई। मैने एक प्रति उन्हे समीक्षार्थ भेंट की। अल्पकाल में ही अरुण कुमार शर्मा जी, डॉ प्रभुलाल मिश्र, प्रो विवेक झा, डॉ रमेन्द्र नाथ मिश्र डॉ विष्णु सिंह ठाकुर एवं डॉ के पी वर्मा जैसे प्रख्यात पुराविद एवं इतिहासकार अतिथि एवं विशेष अतिथि के रुप में उपस्थित हो गए। पता चला कि कार्यक्रम के मुख्यातिथि श्री बृजमोहन अग्रवाल अपरान्ह 3 बजे आएगें। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्कूल के बच्चों ने सुंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम कर छत्तीसगढ़ की संस्कृति की झलक दिखाई।

कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रभा शर्मा ने किया। उनकी आवाज ही हमें सुनाई नहीं दे रही थी। साऊंड व्यवस्था इतनी खराब थी कि डायस पर बैठे महानुभावों को भी सुनाई नहीं दे रहा था। स्वागत भाषण में अरुण कुमार शर्मा जी ने इसका जिक्र भी किया और कहा कि इस सभागृह में उल्टे घड़े लटका दिए जाएगें तो आवाज की समस्या का निदान हो सकता है। डॉ प्रभुलाल मिश्र एवं डॉ रमेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ शिवाकांत बाजपेयी, डॉ के पी वर्मा ने क्या कहा कुछ पल्ले नहीं पड़ा। साथ ही स्कूल के बच्चों की कलरव से भी अत्यधिक व्यवधान उप्तपन्न हो रहा था। टीचर्स उन्हें चुप कराने में लगे थे। बच्चे तो आखिर बच्चे हैं कहाँ चुप रहने वाले थे। ललित मिश्रा की बुलंद आवाज सामने बैठे हम लोगों तक पहुंची। सामने बैठे बच्चों को बाहर भेज दिया गया तब भी वही स्थिति बनी रही। स्थिति को भांपते हुए प्रो विवेकदत्त झा ने बिना माईक के ही अपना अध्यक्षीय भाषण दिया। शायद उन्होने सोचा हो कि जब माईक से बोलने से समझ नहीं आ रहा, तो बिना माईक के ही बोलना ठीक है। कम से कम डायस पर बैठे महानुभावों को तो सुनाई देगा। 

स्वागत भाषण समाप्ति तक ढाई बज चुके थे। भोजन की घोषणा हुई, भोजनोपरांत प्राचार्य मैडम प्रतिभा चंदेल ने कहा कि मंत्री जी आ रहे हैं, अभी फ़ोन आया है 10 मिनट में पहुंचने वाले हैं। सुन कर सभी जन हरकत में आ गए। मैडम कुछ तनाव में दिखी। ये करो और वो करो, लगा कि थोड़ी देर के लिए तूफ़ान आ गया। उन्होने साऊंड वाले को वार्निंग दी कि साऊंड सिस्टम ठीक करो नहीं तो पैसे नहीं मिलेगें। संगोष्ठी में शोध आलेख का पठन शुरु हुआ। सर्व प्रथम मेरा ही नाम पुकारा गया, लेकिन मेरे बगल में वरिष्ठ पुराविद डॉ कामता प्रसाद वर्मा बैठे थे। उनसे ही शुभारंभ हो सोच कर मैने उन्हें भेजा। डॉ कामता प्रसाद वर्मा ने अपना शोध आलेख पावर पांईट के माध्यम से पढा एवं दिखाया। दूसरे नम्बर मैं पढना चाहता था तो बी आर साहु जी बाजी मार ले गए। तीसरे नम्बर पर मैने अपना शोध आलेख "सिरपुर के शिल्पकार" पढा एवं दिखाया इसके पश्चात डॉ वृषोत्तम साहु ने एवं डॉ महेन्द्र कुमार सार्वा ने अपना शोध आलेख पढा। इस दौरान आलेख पठन किसी को सुनाई नहीं दिया एवं एक संगोष्ठी की 4 संगोष्ठियाँ दिखाई दे रही थी। मंचासीन अतिथियों का ध्यान आलेख पढने वाले की तरफ़ नहीं था। जब सुनाई ही नहीं देगा तो वे भी क्या ध्यान देगें। वे आपस की बातों में मशगुल थे। नीचे बच्चों की, अध्यापकों की एवं आमंत्रित अन्य विद्वानों की अलग संगोष्ठी चल रही थी।

प्राचार्य मैडम कह रही थी कि संगोष्ठी का आशय स्कूल के बच्चों के अपने क्षेत्र के इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति से अवगत कराना है, जिससे वे इनके संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति अभी से तैयार हो जाएं। बहुत सुंदर विचार लगे मुझे उनके। कुछ देर में स्थानीय पार्षद ने आकर सूचना दी कि व्यस्त होने के कारण मुख्य अतिथि मंत्री जी कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके। सारा राजनैतिक कार्यक्रम धरा का धरा रह गया। मंचासीन अतिथियों को लिफ़ाफ़ों के साथ स्मृति चिन्ह पकड़ाए गए और कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा हो गई। मैने आयोजकों से विदा ली। डॉ प्रभा शर्मा शाम की चाय लेने का आग्रह कर रही थी। दो दिनों की संगोष्ठी में कल का सिरपुर भ्रमण भी सम्मिलित है। सांझ होने को थी और मुझे तो 30 किलोमीटर घर लौटना था। चाय के कप से चुस्की लेते हुए सोच रहा था इस संगोष्ठी से भी मुझे बहुत कुछ हासिल हुआ। लेकिन जिस उद्देश्य से संगोष्ठी का आयोजन किया गया था कि बच्चों को कुछ जानकारी मिले, छत्तीसगढ़ के उद्भट विद्वानों को बच्चे सुन नहीं सके। सिर्फ़ देख ही सके। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी उद्देश्य हासिल नहीं हुआ। ध्यान रखना चाहिए कि जनता की गाढी कमाई का सही इस्तेमाल होना अत्यावश्यक है साथ ही उपस्थित विद्वानों के बहुमुल्य समय का भी ध्यान रखना चाहिए।

सेमीनार एवं संगोष्ठियों के कारण मार्च का महीना अत्यधिक व्यस्तता का रहा। अगले अंक में अन्य संगोष्ठियों की चर्चा करेगें। साथ ही जानने की कोशिश करेगें कि इन संगोष्ठियों से हमने क्या हासिल किया 

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल हॉल
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।  

शनिवार, 1 सितंबर 2012

इति श्री रतनपुर यात्रा ----------- ललित शर्मा

किरारी गोढी शिव मंदिर की चामुंडा प्रतिमा
पाली पहुंचते पहुंचते बरसात होने लगी थी। पंकज सुबह से बरसात के बालहठ में लगा था आखिर उपरवाले ने अर्जी स्वीकार ही कर ली। रतनपुर से दो चार किलोमीटर आगे निकलने पर लैपटॉप के नेट ने नेटवर्क पकड़ लिया। बस बात बन गयी, दिन भर का अपडेट देखने का काम चलता रहा, साथ ही वेरना भी। चलती गाड़ी में जब फ़ेसबुक खोला जाए तो कमेंट करने में समस्या होती है, इसलिए माकूल कमेंट ढूंढ कर कापी पेस्ट करना पड़ता है। कभी-कभी चूक भी हो जाती है, कहीं का सामान कहीं और पहुंच जाता है। दिन भर की हाहाकार मेहनत के बाद अब एक नींद सुकून की चाहिए। अब एक नयी समस्या खड़ी हो गयी, दाढ के मसूडे में दर्द शुरु हो गया। लगा कि फ़िर वहीं कसाई के पास जाना पड़ेगा, जिसने एक बार पहले भी 1500 का फ़टका लगाया था। बिलासपुर पहुंच कर पहला काम एक  दर्द  निवारक टेबलेट लेने का किया। फ़ौरी तौर पर उससे कुछ राहत मिल गयी।

शिवमंदिर का पार्श्व भाग
हमारे घर पहुंचने तक खाना बन चुका था। खाना खाकर पंकज तो चले गया अपने दौलतखाने और हम अरविंद झा जी के गपियाते रहे। सुबह जाने की प्लागिंग करने लगे। बिलासपुर से सुबह साढे छ: बजे लोकल गाड़ी रायपुर को जाती है। उसी से जाने का मन बनाया। रात को मच्छरों के हमले से बचने के लिए पूरी व्यवस्था की गयी थी। पलंग के चारों तरफ़ कछूवा चल रहा था। तब भी मच्छरों का आतंक जारी था। उलटते-पलटते आँख लग गयी, सुबह छ: बजे का अलार्म सुनकर आँख खुली। हाथ मुंह धोकर हम स्टेशन पहुंच गए। वहाँ पहुच कर सोचा कि बिल्हा के पास का देवकिरारी का भग्न मंदिर भी देख लिया जाए। इसलिए सिर्फ़ बिल्हा तक की ही 3 रुपए की टिकिट ली। मुसाफ़िरी की दृष्टि से रेल्वे ही सबसे सस्ता साधन है। इससे सस्ता साधन भारत में और कोई दूसरा नहीं अधिक सस्ता चाहिए तो फ़िर 11 नम्बर की सवारी करनी पड़ेगी।

सप्तरथी सूर्य
ट्रेन में बैठते ही बरसात शुरु हो गयी। मुसलाधार बरसात होने लगी, अब बिना छतरी और रेनकोट के समस्या होने वाली थी। हमने बिल्हा में भाई साहब को बता दिया कि पुशपुल से आ रहे हैं, उनको भी उसी ट्रेन से रायपुर जाना था। बिल्हा स्टेशन पर वे रेनकोट धारण किए हुए मिले, लेकिन स्टेशन तक बाईक लेकर नहीं आए। गजब कर दिया, क्या करें अब बरसते पानी में घर तक पैदल ही जाना पड़ा। बिल्हा के पास के गाँव मोहभट्ठा में आज सावन सोमवारी का भंडारा था। भाभी जिद करने लगी कि मोहभट्ठा प्रसाद लेने जाना है। पर भगवान को मंजूर हो तब न, एक बार घर से निकले तो बरसात होने लगी, वापस आना पड़ा। अब जाने का मन नहीं हुआ। दोपहर बाद बरसात थमी तो बिल्हा से लगभग 5-6 किलोमीटर पर किरारी गोढी नामक गाँव गए। वहीं पर प्राचीन शिव मंदिर है।

गर्भ गृह
यह शिव मंदिर 12 शताब्दी में रतनपुर के कलचुरी राजाओं द्वारा निर्मित है। प्रस्तर निर्मित इस मंदिर का गर्भगृह एवं जंघा का कुछ भाग ही बचा है, बाकी काल की मार से बच न सका। पश्चिमाभिमुख इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। जिसमें मूल जलहरी स्थापित है पर मंडप पूर्णत: नष्ट हो गया है। मूल संरचना के तल विन्यास में मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह मुख्य अंग रहे हैं। उर्ध्व विन्यास पंचरथ प्रकार का है, अधिष्ठान भाग पर खुर, कुंभ, कलश संयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर उर्ध्वक्रम में द्विस्तरीय देव प्रतिमाएं सयोजित हैं। अवशिष्ट जंघा पर शिव के विभिन्न स्वरुप, दिग्पाल, सुर-सुंदरियाँ, मिथुन युगल तथा अन्य अलंकार दिखाई देते हैं। य मंदिर कलचुरी कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट एवं अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की पूर्व दिशा का दीवाल ही बची है।

यायावर
मंदिर के अवशेष रखे हुए हैं। जिनमें विभिन्न मूर्तियां भी हैं। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। घनघोर बादल छाने के कारण बरसात होने के आसार बने हुए थे। मैने जल्दबाजी में ही कुछ चित्र लिए और बि्ल्हा आ गया। अब मेरी ट्रेन रायपुर के लिए 5 बजे थी। बिल्हा से रायपुर 18 रुपए की टिकिट ली। 5 बजे शाम को भी बिलासपुर से रायपुर पुशपुल जाती है। लोकल होने के कारण एक्सप्रेस और मेल गाड़ियों से भी जल्दी रायपुर पहुंचा देती है। रास्ते में शिवनाथ नदी जल से लबालब भरी उफ़नते हुए बह रही थी। एक दो चित्र लेते हुए आगे बढे। लोकल गाड़ी ने शाम को 7 बजे रायपुर पहुंचा दिया। घर पहुंचते तक नौ बज चुके थे। इस तरह एक और पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों की यात्रा निर्विघन सम्पन्न हो गयी।

शनिवार, 28 जुलाई 2012

गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
रती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं।

चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू
ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रायपुर छत्तीसगढ के अभनपुर जनपद एवं नगर पंचायत का राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर बसा हुआ ग्राम बड़े उरला। इस गांव को लगभग200-250 वर्ष पूर्व बोधवा गौंटिया द्वारा बसाया था। इनके परिवार के 40-45 घर अभी भी यहाँ निवास करते हैं। इनके वंशज 60 वर्षिय हृदय लाल गिलहरे (गुरुजी) सेवानिवृत व्याख्याता है। ग्रामाधारित विषयों पर हमेशा इनसे चर्चा होते रहती है। उन्होने बताया कि उरला गाँव कुल रकबा (छोटे उरला एवं बड़े उरला) 1800 एकड़ का है। इनके पूर्वजों ने गाँव में ईशान कोण में दर्री तालब एवं पूर्व में बंधवा तालाब बनवाया था।


हृदयलाल गिलहरे(गुरुजी) पार्श्व में ठाकुर देव

शासकों द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से बनाए जाने वाले दुर्गों (किलों) में गिरि दुर्ग, जल दुर्ग एवं धूलि दुर्ग (मडफ़ोर्ट) प्रमुख हैं। 26 जुलाई 2012 को गुरुजी से हसदा के मडफ़ोर्ट के विषय में चर्चा हो रही थी, तो वे मुझे गाँव के पूर्व में स्थित डीह (टीला) दिखाने ले आए। शाम के समय मैंने यहाँ की संरचना देखी। देखते ही अहसास हो गया कि यह एक मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) है। मुझे गांव की पूर्व दिशा में मडफ़ोर्ट (धूलि दुर्ग) के अवशेष के साथ पुरातात्विक प्रमाणो की जानकारी मिली। इस स्थान पर मैं बचपन से जाता रहा हूँ। यहाँ पर सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष हुआ करता था।

डीह पर स्थापित ठाकुर देव
जिसकी गोलाई लगभग 30 फ़ुट रही होगी। गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि यह वृक्ष कितना पुराना है यह किसी को नहीं पता। इस स्थान को देखने पर पता चलता है कि यहां चारों तरफ़ लगभग 15 फ़ुट चौड़ी एवं 20 फ़ुट गहरी खाई है। इस मडफ़ोर्ट के पूर्व एवं पश्चिम के द्वार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उत्तर-दक्षिण के द्वार गुगल इमेज से दिखाई देते हैं। ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ग्रामवासी इसे "डीह" ( टीला या ऊंचा स्थान) कहते हैं। डीह के आग्नेय कोण में पीपल के वृक्ष के नीचे सर्वमान्य प्रमुख ग्राम देवता ठाकुर देव का स्थान है। यहाँ सदियों से किसान अक्ति (अक्षय तृतीया) को दोना में धान चढाते हैं और पूजा अर्चना करके खेती-किसानी की शुरुआत करते हैं।

पूर्व दिशा में मड फ़ोर्ट की खाई
डीह की पूर्व दिशा में किसान के खेत में एक गड्ढा है जिसमें बरसात होने के कारण पानी भरा हुआ है। गुरुजी कहते हैं कि यह सुरंग हैं, जब कोई सगा मेहमान गाँव में आता था उनके दादा उसे यह सुरंग दिखाने के लिए लाते थे। सुरंग के पास लेट्राईट में खोदे हुए 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे हैं। ऐसे ही गड्ढे बावड़ी के पास भी बने हुए हैं। सुरंग से लगभग 700 फ़ुट की दूरी पर एक 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी है। जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है। बड़े उरला के प्रवेश में 1942 में गिरधारी कहार (तत्कालीन गौंटिया) द्वारा बनाया गया पंचमुखी शिवालय भी है। गाँव के ईशान कोण में दर्री तालाब के किनारे शीतला मंदिर है और डीह के ईशान कोण में सतबहनिया देवी है। डीह के पश्चिम एवं गांव के पूर्व में सांहड़ा देव है। डीह के पूर्व में भैंसासुर है। किसानों के आधिपत्य में होने के कारण डीह की मिट्टी खुदाई कर किसान अपने खेतों में डालते थे। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ होने के कारण खेतों में दो-तीन वर्ष तक गोबर खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती। उपजाऊ भूरी मिट्टी होने के कारण किसानों ने डीह के आधे हिस्से की खुदाई करके अपने खेतों में पहुचा डाली। बताते हैं कि डीह को खोदने पर मानवोपयोगी घर-गृहस्थी के उपकरण प्राप्त होते हैं। जिनमें मिट्टी के पके लाल बर्तन, दीया, खाना पकाने के बर्तन, धान कूटने का मूसल, मसाला पीसने का सिल-लोढा इत्यादि प्राप्त हुए हैं।

सुरंग का मुहाना और पार्श्व में डीह
मडफ़ोर्ट के पूर्वी द्वार से लगभग 150 मीटर पर स्थित सुरंग का उपयोग सुरक्षा के लिए किया जाता रहा होगा। सुरंग का एक ही मुहाना दिखाई देता है। दुसरा मुहाना कहाँ पर है और कहाँ तक जाता है इसका कोई पता नहीं। डीह के आसपास की मिट्टी से बाहर निकले हुए कठोर लेट्राईट पत्थर दिखाई देते हैं तथा सुरंग भी लेट्राईट में खोद कर बनाई गयी है। अगर सुरंग की सफ़ाई की जाए तो पता चल सकता है कि इसका दूसरा मुहाना कहाँ पर है। या फ़िर यह सुरंग न होकर कोई खोह होगी जिसमें युद्ध के समय या आपातकाल में गढीदार या सैनिक छिपते रहे होगें। 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे सैनिकों के छिपने के लिए बनाए गए होगें। इन गड्ढों को तीन फ़ुट की तश्तरीनुमा प्लेट से ढका जा सकता है। इसके भीतर आराम से बैठकर एक व्यक्ति तीर इत्यादि जैसे अस्त्र चला सकता है। युद्ध की स्थिति में आस-पास का सघन वन भी सैनिकों के छिपने में सहायक होता होगा। उपर्युक्त संरचनाओं को देखने से प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था सामरिक उपयोग को ध्यान में रख कर की गयी होगी।

कोल्हान नाला का उद्गम
यहाँ का निवासी होने के कारण इलाके की भौगौलिक स्थिति से मैं पूरी तरह परिचित हूँ। बड़े उरला में मात्र 3 तालाब हैं जिसमें बंधवा तरिया, दर्री तरिया का निर्माण बोधवा गौंटिया के परिजनों द्वारा एवं बोईर तरिया का निर्माण राहत कार्य के दौरान हुआ है। यहाँ मडफ़ोर्ट में रहने वालों के लिए पानी की क्या व्यवस्था रही होगी? क्योंकि जहाँ निस्तारी के लिए पानी का साधन न हो वहाँ कोई निवास नहीं करता। यह विचार करने पर मडफ़ोर्ट के पूर्व में स्थित कोल्हान नाला याद आता है। यहाँ से कोल्हान नाला एक फ़र्लांग ही होगा। बेलडीह, गिरोला, अभनपुर, नायकबांधा, बड़े उरला का बरसात का पानी एकत्र होकर नाले का निर्माण करता है। यह नाला खरोरा के पास जाकर छोटी नदी का रुप धारण कर लेता है। इसका पाट काफ़ी चौड़ा हो जाता है। अनुमान है कि कोल्हान नाला समीप होने के कारण यहां के निवासियों को निस्तारी के लिए पानी उपलब्ध होता रहा होगा। सुरंग के समीप मिलने वाले 1.5X1.5 फ़ुट के गड्ढे झरिया के काम आते होगें। साथ ही 20X30X10 फ़ुट की बावड़ी भी निस्तारी के लिए मिलने वाले जल का प्रमाण है। कोल्हान नाला गिरोला और बड़े उरला के बीच से प्रवाहित होता है। वर्तमान में नाले पर किसानों नें अतिक्रमण करके खेत बना लिए गए हैं। नाला कहीं दिखाई नहीं देता। मैदानों का पानी खेतों के भीतर से ही प्रवाहित होता है।

खोजकर्ता ब्लॉ. ललित शर्मा पार्श्व में मडफ़ोर्ट का पूर्वी द्वार
बचपन में रामगोपाल साहू के साथ सायकिल पर इसी रास्ते से उसके गाँव गिरोला जाता था। उरला एवं गिरोला के बीच कई सौ एकड़ का भाटा (उंचाई लिए बंजर भूमि) पड़ता था। तब रामगोपाल बताता था कि उसके सियान कहते थे कि पहले उनका गाँव यहीं भाटा में बसता था। गाँव में दैवीय प्रकोप के कारण धूकी(वर्षा जनित बीमारी) से कई लोग मर गए, तब इस स्थान को छोड़कर कुछ ग्रामवासी एक किलोमीटर दूर उत्तर की तरफ़ छोटे उरला जाकर बस गए और कुछ पूर्व की ओर जाकर बस गए, उस बसाहटा को गिरोला नाम दिया। शायद बीमारी के थक हार कर गिरते पड़ते उस स्थान पर पहुंचने के कारण गाँव का नाम गिरोला प्रचलन में आया हो। जहाँ से ग्रामवासियों ने सपरिवार पलायन करके नया गाँव बसाया उस पुराने गाँव का नाम "बगबुड़ा" है। अभी यह गाँव राजस्व रिकार्ड में वीरान गाँव के नाम से दर्ज है। ऐसे वीरान गाँव छत्तीसगढ अंचल में बहुत हैं। गिरोला से लगा हुआ बड़ा तालाब है, जिससे ग्रामवासियों की निस्तारी होती है। वर्तमान में इस भाटा में नवभारत एक्सप्लोसिव कम्पनी की बारुद फ़ैक्टरी लगी हुई है। 

वन देवी कर्राबाघिन उरला एवं गातापार की सीमा में
गिरोला, बड़े उरला, बेलडीह के मैदानों में तेंदू पत्ता की भरमार है। ग्रामवासी बीड़ी बनाने के लिए गर्मी के दिनों में यहीं से तेंदू के पत्तों की तोड़ाई करते हैं। रायपुर-राजिम के  तीर्थ यात्रियों वाले पुराने रास्ते पर बड़े उरला से लगभग एक कोस पर वन देवी कर्राबाघिन का स्थान है तथा गांव के खार (खेतों) में भैंसासुर भी विराजमान है। भैंसासुर वन देवता है, त्यौहारों के विशेष अवसरों भैंसासुर का मान-दान किया जाता है। वनदेवी कर्राबाघिन वन के प्रवेश द्वार पर होती हैं। वन में प्रवेश करने के पूर्व उनकी पूजा अर्चना करके कुशलता की प्रार्थना की जाती है है। विशेष कर वीरान गाँव का "बगबुड़ा" नाम ध्यान आकृष्ट कराता है। बग=बाघ और बुड़ा=डूबना या दिखाई न देना। याने इतना सघन वन कि बाघ दिखाई न दे। साथ ही डीह पर खाद जैसी उपजाऊ मिट्टी का मिलने यह प्रतीत होता है कि यह स्थान वीरान होने पर यहाँ के वृक्ष सड़ कर कम्पोस्ट खाद में बदल गए। भैंसासुर, बगमुड़ा, वनदेवी कर्रा बाघिन, डीह से उपजाऊ मिट्टी का प्राप्त होना आदि सूत्रों को जोड़ने पर लगता है कि इस स्थान पर सैकड़ों वर्षों पूर्व सघन वन रहा होगा।

पश्चिम दिशा में मडफ़ोर्ट की खाई
बुजुर्ग ग्रामवासी बताते थे कि राष्ट्रीय राजमार्ग 30 बनने के पूर्व रायपुर से राजिम जाने वाले तीर्थ यात्री इस मार्ग से ही राजिम जाते थे तथा यह मार्ग राजिम से आगे जाने वाले यात्रियों के काम भी आता होगा। प्राचीन काल में शासक और श्रेष्ठिजन पथिकों के विश्राम एवं जल की आवश्यकता को देखते हुए मार्ग पर कुंए और सराय बनवाते थे। जहाँ यात्री जल ग्रहण कर अपनी प्यास बुझा सकें और आवश्यकता पडने पर कुछ देर विश्राम कर सकें। इस मार्ग पर कुंआ भी है जिसका अवशेष मात्र ही दिखाई देता है। इस मार्ग का सर्वे किया जाए तो अन्य स्थानों पर भी कुंए के अवशेष मिल सकते हैं, जिससे इस प्राचीन मार्ग की प्रमाणिकता सिद्ध होगी। अभी तक मैने जितने भी मडफ़ोर्ट देखे हैं वे सभी गोलाई लिए हुए हैं। बड़े उरला में प्राप्त मडफ़ोर्ट चौरस (स्क्वेयर) होना इसे विशिष्ट बनाता है, चौरस मडफ़ोर्ट मुझे पहली बार देखने मिला। इस मडफ़ोर्ट को किसने बनाया? इसमें कौन और किस काल में निवास करता था? किस राजा की यह गढी थी? इसका इतिहास क्या है? आदि प्रश्न मेरे जेहन में घुम रहे हैं। बड़े उरला के इस मडफ़ोर्ट के प्राप्त होने के बाद इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूढना पुरातत्ववेत्ताओं एवं इतिहास के अध्येताओं का कार्य है। जिससे देश-दुनिया को यहाँ के इतिहास की जानकारी मिलेगी तथा इतिहास में नवीन कड़ियाँ जुड़ेगीं।