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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

तार-तार कांच, लाल पीला प्रहरी और माओवादियों का हंगामा : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
सुबह तय समय पर आँख खुल गई, कैमरे की बैटरी चार्जिंग में लगी दिख रही थी अर्थात पाबला जी ने रात को मेरे कैमरे की बैटरियाँ चार्जिंग में लगा दी थी। मौसम पनीला बना हुआ था। हल्की हल्की बूंदा बांदी जारी थी। हम स्नानाबाद से होटल की लाबी में आ गए। राजीव शंकर मिश्रा जी ने चाय तैयार करवा रखी थी। नगरकोट जाने वाले ब्लॉगर तैयार होकर एक एक कर लाबी में एकत्र हो रहे थे। चलते चलते एक फ़ोटो हम सब ने खिंचाई और गाड़ी में सवार हुए। होटल में पार्किंग की जगह कम होने के कारण हमारी गाड़ी फ़ंसी हुई थी। पाबला जी गाड़ी निकालने की कोशिश कर रहे थे, मैं सामने की सीट पर था, गाड़ी के पीछे गिरीश भैया और राजीव शंकर मिश्रा जी थे। दुबारा रिवर्स करने पर भड़ की ध्वनि उत्पन्न हुई। लगा कि कुछ टकराया है गाड़ी से। पीछे लगे कैमरे ने कुछ नहीं दिखाया। मैने मुडकर देखा तो पीछे का कांच फ़ूट गया था।
नेपाल की सुबह
पाबला जी ने गिरीश भैया से गाड़ी में बैठने कहा और वे बिना पीछे देखे आगे बढ गए। रास्ता खराब होने के कारण ट्रैफ़िक जाम होने का अंदेशा बताया था, अगर हम पाँच बजे से पहले नहीं चलते तो 3-4  घंटे ट्रैफ़िक जाम में खराब हो जाते, सो हम जल्दी ही चल पड़े थे। कांच टूटने की बोहनी हो चुकी थी, अब आगे का दिन कैसा होगा राम ही जाने। नीली छतरी वाले का सुमिरन करके वापसी की यात्रा शुरु हो गई थी। मुंह अंधेरे हम काठमांडू से चल पड़े। राजीव शंकर मिश्रा के बताए रास्ते पर चल कर हम त्रिभुवन राज मार्ग पर पहुंच गए अब हमें मुग्लिंग में जाकर बांए मुड़ना था, तब तक सीधा ही चलना था। 
सुबह काम पर जाता किसान
ज्यों ज्यों हम काठमांडू की उपत्यका से नीचे आते जा रहे थे त्यों त्यों दिन की रोशनी दिखाई देने लगी। जिस स्थान पर जाम लगने की आशंका थी वह स्थान हम पार कर चुके थे। हमने बजे काठमांडू के बाहरी इलाके में नागधुंगा चेक पोस्ट के पास पेट्रोल डलवाया सुबह का समय हो और लोटाधारी न दिखें, ये संभव ही नही है। लेकिन हमें नेपाल में सुबह सड़क के किनारे शौच करते नर नारी नहीं दिखाई दिए। लगभग 70 किलोमीटर तक तथा आते वक्त भी कोई भी लोटाधारी दिखाई नहीं दिया। भारत में तो प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि हम भारत में हैं। सड़क के किनारे और रेलपटरियों पर शौच करना यहाँ के नागरिकों का परम धरम है और इसे कर्तव्य मान कर श्रद्धापूर्वक निपटाया जाता है।
नारायणी नदी और पुल
एक स्थान पर सुंदर दृश्य देखकर हमने गाड़ी रोकी, तब तक सूरज निकल चुका था। दुकान में चाय पूछने पर उसने मना कर दिया तो हमने लीची का ज्यूस ले लिया। चलो इसी से काम चलाया जाए। आगे चलकर हम मुग्लिंग पहुच रहे थे, यहाँ से नारायणगढ़ लगभग 35 किलो मीटर था। हमने योजना बनाई थी कि लगभग 10 बजे तक लुम्बिनी पहुंच जाएगें। लुम्बिनी में घूम कर  कुछ घंटे फ़ोटो ग्राफ़ी करेगें और शाम होते तक सीमा से पार हो जाएगें।एक स्थान पर गाड़ी रोककर हम लोगों ने नाश्ता किया। मुग्लिंग प्रवेश करने पर सड़क पर कुछ वाहन रुके हुए दिखाई दिए। मैने सोचा कि यहाँ पर कोई टोल बैरियर होगा। क्योंकि नेपाल में डंडा लगाकर बैरियर खड़ा नहीं किया जाता। टोल बैरियर होने का संकेत सड़क के बीच में मार्गविभाजक पर लगा दिया जाता है।
सीढीदार खेत
लेकिन यहाँ मामला और ही कुछ था। हमने गाड़ी रोक दी, साथ ही हमारा सोचना था कि पराए देश में किसी से उलझना ठीक नहीं है, भारत होता तो कुछ भी कर सकते थे। पराए देश के नियम कानूनों का भी पता नहीं होता। जब से राजीव शंकर मिश्रा ने मुर्गी वाला कानून बताया था तब से मैं और चौकन्ना हो गया था। सड़क पर मुर्गी देखते ही ब्रेक मार देता था। यहाँ जाम लगा हुआ दिखाई दे रहा था। तभी एक ट्रैफ़िक पुलिस वाला आया, उसने गाड़ी का नम्बर देखते हुए बगल से निकल जाने को कहा तथा बताया कि चुनाव की मांग को लेकर माओवादियों ने आज नेपाल बंद का आह्वान किया है। आप लोग चाहें तो निकल जाएं, वरना खड़े रहें। गिरीश भैया अचानक उस पर भड़क गए। मैं अंचभित हो गया, पाबला जी गिरीश भैया के मुंह की तरफ़ देखने लगे। उन्होने बात संभाली, पुलिस वाला भी तैश में आ गया था। 
सड़क किनारे नेपाली मकान (आधुनिकता का प्रभाव)
हम आगे बढे, चौराहे पर झंडे लिए भीड़ और कैमरा लिए पत्रकार उपस्थित थे। उन्होने रोकने की कोशिश की, लेकिन हम बच कर आगे बढ गए। नदी का पुल पार किया और आगे बढने पर मुझे लगा कि जिस सड़क से हम आए थे, वह सड़क नहीं है, हम किसी और रास्ते पर जा रहे हैं, क्योंकि यहाँ पर एक विद्र्युत निर्माण की युनिट भी दिखाई दी। गाड़ी रोक कर टुरिस्टर वाले से पूछा तो उसने बताया कि यह मार्ग पोखरा जाता है। हमने गाड़ी वापस की और पुन: उसी चौराहे पर आ गए जहाँ हड़ताली जमा थे। चौराहे से हमने गाड़ी सज्जे पासे मोड़ी तो कुछ लोग हल्ला करते हुए पीछे दौड़ने लगे। पाबला जी ने बैक मिरर में देखते हुए गाड़ी रोक ली। कुछ लोग मेरी खिड़की पर आए और कहने लगे कि "एक बेरामी है, उसे नारायणगढ़ तक ले जाईए।" मेरी समझ  में नहीं आया "बेरामी" क्या होता है। फ़िर उन्होने बताया कि कोई बीमार बूढा है जिसे नारायणगढ में इलाज करवाना है। मैने उन्हें गाड़ी में बैठ जाने कहा।
नारायणी नदी में गिरी जेसीबी  मशीन
हम नारायणगढ़ की ओर बढे। रास्ते में वह स्थान भी आया जहाँ पर जेसीबी लोडर नदी में गिरा हुआ था। हमने कार रोक कर उसकी फ़ोटो ली। लड़के ने बताया कि आज सब जगह हड़ताल और नेपाल के वाहन चलने नहीं दिए जा रहे। लगभग 10 बजे कुछ गाड़ियाँ फ़िर खड़ी दिखाई दी हमने उनके बगल से गाड़ी आगे बढाई, लौटते हुए एक कार वाले ने बताया कि आगे जाम लगा है, इसलिए हम रुकने के लिए होटल तलाश करने जा रहे हैं। हम आगे बढे तो जुगेड़ी के पास पुलिस थाना था, उसके सामने सिपाही खड़े थे तथा थाने के बराबर में ही एक होटल था। सिपाही ने गाड़ी आगे बढाने से मना कर दिया। वह लड़का बोला कि मैं इनसे बात करके आता हूँ। उसके प्रयास से भी गाड़ी आगे जाने नहीं दी। बताया कि भारतीय गाड़ियों के साथ तोड़ फ़ोड़ कर चालकों से साथ माओवादी मारपीट कर रहे है। लड़का और बूढा गाड़ी से उतर कर थाने के सामने बैठ गए और हमने गाड़ी होटल में लगा दी।
पाबला जी फ़ोटासन में
होटल अच्छा था, सुबह जल्दी चलने के कारण पेट भी गुड़गुड़ा रहा था, होटल मे प्रवेश करते ही टायलेट तलाशा। लौटने पर दिमाग हल्का हुआ, हाथ मुंह धोकर हम एक टेबल पर जम गए। ट्रैफ़िक खुलने की प्रतीक्षा करती अन्य सवारियाँ भी थी। बीयर की बोतल खोले समय पास कर रहे थे। नेपाली चैनल बंद के दौरान घूम धड़ाके की खबरें बता रहा था। सफ़र में 3 चीजे आवश्यक होती हैं, पहला ठहरने का सुरक्षित स्थान, दूसरा आवागमन का साधन और तीसरा खाना। मुझे तीनों आवश्यक चीजें यहाँ पर दिखाई दे रही थी। इसलिए ठहरने में कोई समस्या नहीं थी। हमने भी खाने का आडर दे दिया, आराम से खाते हुए टाईम पास कर रहे थे। वेटर भी स्मार्ट था, खाने की आपूर्ती फ़टाफ़ट करता था। खाने के बाद घड़ी देखी तो 12 बजे हुए थे। धूप इतनी चमकीली थी कि लग रहा था 2-3 बज गए। मैं वहीं बैंच पर लेट गया और झपकी आ गई।
होटल का वेटर
हल्ला सुनकर आँख खुली, जाम खुल गया चलो चलो। हमने फ़टाफ़ट अपना सामान उठाया और गाड़ी की तरफ़ दौड़े, सड़क पर ट्रैफ़िक सरक रहा था, पाबला जी ने कार एक बस के सामने डाल दी और हम भी लाईन में शामिल हो गए। थोड़ी दूर चलने पर ट्रैफ़िक फ़िर रुक गया। पाबला जी ने कहा कि गाड़ी फ़िर होटल में लगा लेते हैं।अब सैकड़ों गाड़ियों के बीच से अपनी गाड़ी निकाल कर पुन: होटल में लगाना मुझे जंचा नहीं क्योंकि गाड़ी होटल में ले जाने बाद फ़िर हम सैकड़ों गाड़ियों के पीछे चले जाते। जुगेड़ी और नारायणगढ़ के बीच रामनगर एवं चितवन का जंगल है, यहीं पर माओवादियों ने सड़क जाम कर रखी थी। यह स्थान जगेड़ी से लगभग 10 किलोमीटर दूर था। मैने गाड़ी में ही सीट सीधी कर ली और सो गया। गर्मी बहुत ज्यादा थी। पाबला जी गाड़ी से नीचे उतर कर सवारियों से बात करने लगे।
जाम के दौरान मोबाईल पर चुटकुले पढते गिरीश भैया और पाबला जी
नेपाल में अभी तक मैने एक भी सरदार नहीं देखा था। पता नहीं क्यों नेपाल तक सरदारों की पहुंच नहीं थी। नेपाल के लोगों को सरदार की पहचान नहीं है, वे पाबला जी को बाबा जी कह कर संबोधित कर रहे थे। गत हिन्दू राष्ट्र होने के कारण दाढी वाले और पगड़ीधारी इन्हें साधू महाराज ही लगते होगें। इसलिए बाबाजी का संबोधन जारी था। शाम 4 बजे ट्रैफ़िक खुला। गाड़ियाँ सरकती हुई आगे बढने लगी। चितवन के जंगल में पहुचने पर गाड़ियों के टूटे हुए शीशे सड़क पर दिखाई दिए। माओवादियों ने हमारे एक दिन का सत्यानाश कर कर दिया और लुम्बिनी देखने की हमारी योजना की भ्रूण हत्या हो चुकी थी। जाम का असर हमें नारायणगढ़ के बाद भी दिखाई दिया।
नेपाल की तरफ़ से दिखती भारतीय सीमा (सोनौली)
शाम ढलने लगी, नारायणगढ़ के साथ पहाड़ियाँ पीछे छूट रही थी। हम सीमा की ओर निरंतर बढ़ रहे थे, सीमा से पहले एक रास्ता बुटबल होते हुए भैरवाह जाता है तथा दूसरा रास्ता और है जो सीधे ही भैरवाह जाता है, हम इसी रास्ते पर चल रहे थे। भैरवाह से पहले पुलिस ने गाड़ी रोकी, कांच फ़ूटने का कारण पूछा, गाड़ी के कागजात देखे तथा कहा कि सीट बेल्ट बांध लो। नेपाल में सीट बेल्ट बांधना अनिवार्य है। हम पूरे नेपाल का सफ़र करके आ चुके थे, किसी ने सीट बेल्ट बांधने के लिए नहीं टोका। जब सीमा 20 किलोमीटर बची है, तब पुलिस वाला सीट बेल्ट बांधने का कानून समझा रहा था। पाबला जी ने कहा कि बांध लो और मैने सीट बेल्ट बांध ली। जब हम भैरवाह सीमा पहुंचे तो एक व्यक्ति ने गाड़ी के कागजात देखे और उसमें एक पेपर फ़ाड़ कर रख लिया। सीमा पर एक स्थान पर नम्बर प्लेट जमा करवाई। भारतीय सीमा में प्रवेश करने पर सीमा सुरक्षा बल के जवान ने थोड़ी पूछताछ की और हम भारतीय सीमा में प्रवेश कर नौतनवा की ओर बढ गए।

नेपाल यात्रा आगे पढें…………

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

परिकल्पना साहित्य सम्मान काठमाण्डू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
होटल पहुंचने के बाद पता चला कि आज भी हमारे जैसे बचे-खुचे लोगों के लिए छोटा सा कार्यक्रम रखा गया है। सारे ब्लॉगर साथी तो थे ही। होटल के एक हॉलनुमा कमरे में सोफ़े और कुर्सियाँ लगाई गई। पीछे परिकल्पना ब्लॉगर सम्मान का बैनर लगाया गया। हम चाय पीकर रेस्टोरेंट में गप्पे हाँक रहे थे। उधर से बार-बार बुलावा आ रहा था कार्यक्रम में शामिल होने के लिए। 
श्री सनत रेग्मी द्वारा गिरीश पंकज जी का सम्मान
मनोज भावुक, सरोज सुमन, सुशीला पुरी शैलेष भारतवासी, पाबला जी इत्यादि यहीं जमें हुए थे। लगातार फ़ोटो लेने के कारण मेरे कैमरे की बैटरी ने आखिर जवाब दे दिया। मैं कैमरे को अपने कमरे में रख आया और कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गया। सूचना मिली कि आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रतिष्ठान के सचिव सनत रेग्मी जी होगें।
श्री सनत रेग्मी द्वारा ललित शर्मा का सम्मान
कार्यक्रम प्रारंभ सुनीता यादव के सरस्वती वंदना गायन से हुआ, सुशीला पुरी, रविन्द्र प्रभात, सनत रेग्मी, गिरीश पंकज पीठासीन हुए, कार्यक्रम का संचालन लखनऊ से पधारे डॉ रामबहादुर जी ने संभाला। सबसे पहले बचे खुचे ब्लॉगर्स में बी एस पाबला, गिरीश पंकज, ललित शर्मा, संजीव तिवारी का उत्तरीय स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र से सम्मान किया गया। संजीव तिवारी की अनुपस्थिति में छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए उन्हें दी गई सम्मान सामग्री मुझे ग्रहण करनी पड़ी। 
श्री सनत रेग्मी द्वारा बी एस पाबला जी का सम्मान
इसके पश्चात सनत रेग्मी जी कहा कि इस कार्यक्रम ने दो देशों के बीच सेतू बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होने परिकल्पना की टीम को इसके लिए साधूवाद दिया तथा कहा कि समय अधिक हो चुका है और 9 बजने के बाद काठमाण्डू पूरी तरह बंद हो जाता है इसलिए मुझे जाना होगा। 
मनोज भावुक काव्य पाठ करते हुए
इस कार्यक्रम के बाद कवि एवं कवियत्रियों को अपना भौकाल टाईट करना था। सभी अपनी काव्य सामग्री साथ लाए थे। सुनीता यादव, डॉ रामा द्विवेदी, विनय प्रजापति, मुकेश सिन्हा, मुकेश तिवारी, गिरीश पंकज, सुशीला पुरी, रविंद्र प्रभात, डॉ राम बहादुर इत्यादि ने अपना कविता पाठ किया। मनोज भावुक जी ने अपनी भोजपुरी गजलों से मौसम को हरा भरा कर दिया तथा सरोज सुमन जी ने भोजपुरी गजलें गा कर माहौल जमा दिया।
मुकेश सिन्हा काव्य पाठ करते हुए
नमिता राकेश ने हिन्दी और पंजाबी में कविता पाठ किया, "आदमी से दूर होता जा रहा है आदमी, आदमी की आदमियत पर भरोसा क्या करें, अपनी हस्ती खुद मिटाता जा रहा है आदमी " तथा पंजाबी कविता के अंश - " ओह वी उडना चाउन्दी सी, पतंग वांग, पर उसदी उडारी निरबर सी,उसनू दित्ती जाण वाली ढील ते " इस तरह सभी काव्य पिपासुओं ने अपनी-अपनी कविताएं भांजी।
संपत मोरारका काव्य पाठ करते हुए
पाबला जी कार्यक्रम के बीच से उठ कर चले गए थे। शायद उन्हे भूख लग रही थी। कविता पढने का मुक्त आह्वान तो मुझसे भी किया गया था। समस्या यह थी कि कविताएं मुझे याद नहीं रहती। अगर व्यक्ति लगातार काव्य गोष्ठियों में गमनागमन करता रहे तो करत करत अभ्यास के कविताएं याद हो जाती है। मैने सोचा था कि यदि कविता पढने का मौका आएगा तो अपने ब्लॉग से निकाल लुंगा। 
सुनीता यादव काव्य पाठ करते हुए
लेकिन हम ऐसे होटल में रुके थे वहां इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। साथ ही भारत के फ़ोन यहाँ आने के बाद बंद हो गए इसलिए डॉटा कार्ड का भी इस्तेमाल नहीं हो सकता था। इस समस्या के कारण मैं चूक गया और कविता पाठ न कर सका। खैर कोई बात नहीं अब कुछ कविताएं रामचरित मानस की चौपाई की तरह याद कर लेगें। इंटरनेट पर अधिक भरोसा करना ठीक नहीं।
डॉ रामा द्विवेदी काव्य पाठ करते हुए
कार्यक्रम समापन हुआ, सभी भोजन कक्ष में पहुंचे और हमने कमरे में ही डेरा लगा लिया। राजीव शंकर मिश्रा जी बनारस वाले संग चर्चा चलते रही। थकान के कारण खाना हमने कमरे में ही मंगवा लिया। हमारी घड़ी के अनुसार रात के लगभग साढे ग्यारह बजे पाबला जी एवं गिरीश भैया पहुंचे। तब तक हमारा खाना पूर्ण हो चुका था। राजीव शंकर जी ने कहा कि मैं सुबह आप लोगों को विदा करने के बाद जाऊंगा तथा रात को होटल में ही रुकुंगा। 

सुशीला पुरी एवं नमिता राकेश जी
उनसे विदा लेने के बाद हमने अपना बिस्तर सभांल लिया। पाबला जी ने अपने कैमरे की बैटरियां चार्जिंग में लगा दी थी। मेरे कैमरे की बैटरियाँ भी ठंडी पड़ चुकी थी, उन्हे भी गर्म करना था। पाबला जी ने कहा कि आपकी बैटरियाँ भी चार्ज हो जाएगें, सो जाईए। मैने भी सोचा कि यदि चार्ज नहीं हुई तो कोई बात नहीं। कोई भी हो एक कैमरा तो कम से कम चलने लायक रहेगा ही। उसी की फ़ोटुओं से काम चला लिया जाएगा। सुबह 4 बजे चलने का वादा करके हम सभी बिस्तर के हवाले हो गए।

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

ओस कण से निर्मित मंदिर : स्वयंभूनाथ

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
रबार स्क्वेयर से हमारी बस स्वयंभूनाथ मंदिर की ओर चल पड़ी। भूखाग्नि में तो सभी झुलस रहे थे। मंदिर के समीप ही एक रेस्टोरेंट में नाश्ते का कार्यक्रम था। वहाँ पहुंचने पर थोड़ी देर के लिए विश्राम का समय मिल गया। सुशीलापुरी जी हमें दरबार स्क्वेयर में मिली थी। उनका एक ठिकाना काठमांडू में भी है, वे वहीं ठहरी हुई थी। इस रेस्टोरेंट में पहुंच कर जिसे जहाँ जगह मिली वो वहीं टिक गया। नास्ते के बतौर सिर्फ़ 2 ही विकल्प थे, चाऊमीन एवं फ़्राई राईस। किसी ने चाऊमीन का आर्डर दिया तो किसी ने चावल का। मैने चाऊमीन खाने की सोची और आर्डर दे दिया। नाश्ता आते तक हम फ़ोटो ग्राफ़ी करते रहे। पहले चावल दिया गया। हमारी चाऊमीन बाद में आई। नाश्तोपरांत स्मृतियों में संजोने के लिए एक ग्रुप फ़ोटो यहाँ ली गई।

स्वयंभूनाथ स्तूप (शाक्य मुनि मंदिर) का शिखर
दूर से ही स्वयंभूनाथ मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था। साथ ही उसमें बनी हुई बड़ी बड़ी आँखे भी। हमने स्वयंभूनाथ के मंदिर में प्रवेश करने के लिए विदेशियों के लिए 50 नेपाली रुपए का शुल्क है। स्थानीय लोगों के लिए नि:शुल्क प्रवेश है। द्वार से प्रवेश करते ही सामने हिरण्यमय धातू की चमक चढाए जल कुंड के बीच बुद्ध की मूर्ति स्थानक मुद्रा में दिखाई दी। यहाँ पर गिरीश भैया के कुछ चित्र लिया। मुकेश सिन्हा भी चित्र स्पर्धा में कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होने भी खटाखट खटका दबाया। पहाड़ी पर बने हुए स्तूप तक जाने के लिए पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों के समीप ही वज्रयान का प्रतीक चिन्ह वज्र रखा हुआ है।  जिसे लोहे की पट्टियों से बांधा हुआ है।
ब्लॉगर्स का सामुहिक छाया चित्र

ऊँची पहाड़ी पर बने इस मंदिर पर जाने के लिए पूर्व की ओर सड़क से सीढ़ियाँ बनी हैं, जिसके दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष हैं तथा दस-दस फुट के फासले पर भूमि-स्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की कई मूर्तियाँ रखी हुई हैं। इसके साथ ही बीच-बीच में गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियाँ भी हैं। इनके दोनों ओर मयूर और गरुड़ की मूर्तियाँ हैं। सीढ़ियों के लगभग मध्य में दो हाथियों की मूर्तियाँ हैं और अंत में वीरासन में बैठे दो सिहों की प्रतिमाएँ। अंतिम सीढ़ी पर धर्मधातुमंडल पर स्वर्णमंडित वज्र बना है। इस चक्र में गाय, सूअर, गेंडा, सिंह, शेर आदि बारह विभिन्न पशु-पक्षियों की सजीव मूर्तियाँ, उत्कीर्ण  मंत्रचक्र हैं। ये बारह पशु-पक्षी तिब्बती वर्ष के बारह महीनों के प्रतीक हैं। इस स्तूप के परिसर में मंदिरों और चैत्यों की भरमार है, जो काठमांडू में हिंदू-बौद्ध समन्वय का बहुत अच्छा उदाहरण है।
स्वयंभूनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार एवं टिकिट खिड़की

पैड़ियों से चल कर हम एक विशाल प्रांगण में पहुचते हैं। यहां प्रस्तर निर्मित मनौती स्तूप दिखाई देते हैं साथ ही प्रस्तर निर्मित भूमि स्पर्श मुद्रा में, ध्यान मुद्रा में, स्थानक मुद्रा में बुद्ध की भिन्न भिन्न प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। मेरे साथ संपत मोरारका जी भी पहुंच गई धीरे-धीरे टहलते हुए। उनकी हिम्मत को सलाम करना ही पड़ेगा। कई साथी तो सीढियों की चढाई देखकर नीचे रह गए, सम्पत जी को पर्यटन का बड़ा शौक है, जो उन्हें स्वयंभूनाथ तक खींच लाया। सम्पत जी के कैमरे से मैने उनके चित्र लिए। इस प्रांगण में नेपाल के शिल्प विक्रय की कई दुकाने हैं। जहाँ बौद्ध धर्म के वज्रयान से संबंधित तांत्रिक मुद्राओं वाले मुखौटे बेचे जाते हैं। मुझे एक कड़ा पसंद आया था, लेकिन उसका मालिक नहीं था दुकान में। 
दो यायावर - बंदा और बुद्ध

यह स्तूप काठमांडू घाटी का प्राचीनतम बौद्ध स्तूप (चैत्य) है। स्थापत्य-कला की दृष्टि से अद्वितीय होने के साथ-साथ प्राकृतिक स्थल की दृष्टि से भी यह अत्यंत मनमोहक है। स्थानीय लोगों की यह मान्यता है कि स्वयंभू के स्तूप के शिखर पर चारों दिशाओं में बने विशाल एवं दैदीप्यमान नेत्र काठमांडू के हर नागरिक के क्रिया-कलाप को हर पल देख रहे हैं, अतः किसी भी व्यक्ति को कोई बुरा काम नहीं करना चाहिए। स्थापत्य-कला की दृष्टि से स्वयंभूनाथ अद्वितीय है। इस स्तूप का व्यास साठ फुट है और शिखर तक की ऊँचाई लगभग तीस फुट होगी। स्तूप के शीर्ष पर दस फुट ऊँची वर्गाकार कुर्सी बनी है, जिसकी चारों दिशाओं पर धातु और हाथी-दाँत से निर्मित दो विशाल नेत्र हैं। इस वर्गाकार कुर्सी के मुंडेर के ऊपर चारों ओर पंचकोणीय फ्रेम बने हैं। इनमें हरेक में नीचे की पंक्ति में बुद्ध की ध्यान-मुद्रा में चार पीतल की चमकती मूर्तियाँ हैं। इनके ऊपर मध्य में भूमि-स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति है।
कांस्य शिल्प

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी एक कहानी है, जिसे बौद्ध पंथी मान्यता देते हैं। यहाँ उपस्थित एक लामा (जिनक नाम भूल गया) कहते हैं कि इस मंदिर का निर्माण ओस के कणों से हुआ है। शांतिवास नामक बौद्ध धर्मावलम्बी राजा था। इस स्थान पर तांत्रिक साधनाएं होती थी, जिसके लिए नर बलियाँ दी जाती थी। वह नर बलि देने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने फ़ैसला किया और अपने पुत्र से कहा, ''कल सुबह सूर्य उगने से पहले भोर के अंधेरे में तुम मेरी तलवार लेकर प्याऊ पर जाना। वहाँ मेरी मूर्ति के नीचे एक व्यक्ति सफ़ेद चादर ओढ़े सोया होगा। तुम बिना चादर को हटाए देवी का स्मरण करके उस आदमी की बलि दे देना।''
मनौती स्तूप

आज्ञाकारी राजकुमार ने पिता की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। लेकिन जब राजकुमार ने उत्सुकतावश मृत व्यक्ति की चादर हटाई, तो उसका कलेजा धक रह गया। वह मृत व्यक्ति और कोई नहीं, स्वयं उसके पिता राजा थे। राजकुमार को असीम दुःख हुआ। एक रात उसे वज्रयोगिनी देवी ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ''जहाँ पर तुमने राजा का वध किया है, उसी पहाड़ की चोटी पर तुम शाक्य मुनि (भगवान बुद्ध) का स्तूप बनवाओ। तभी तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है।''दूसरे दिन राजकुमार ने स्वप्न की बात अपने दरबारियों को बताई। सभी ने मंदिर बनवाने के विचार का अनुमोदन किया। 
पाप नाशक यंत्र और गिरीश भैया

फौरन ही मंदिर बनाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं। दूर-दूर से चूना, पत्थर, मिट्टी आदि लाई गई और हज़ारों आदमी उस सामग्री को बांस के टोकरों में भरकर पीठ पर लादकर पहाड़ की चोटी पर पहुँचाने में लग गए। परंतु दुर्भाग्य ने राजकुमार का पीछा नहीं छोड़ा। पूरी घाटी में पानी का भयंकर अकाल पड़ा। एक बूँद वर्षा नहीं हुई। सभी सरोवर, नदी, नाले और तालाब सूख गए। लोगों के घर के कुएँ भी सूख गए। ऐसे संकट में मंदिर बनाने के लिए पानी जुटाना बहुत मुश्किल हो गया। राजकुमार को एक युक्ति सूझी, उसने पहाड़ी के इर्द-गिर्द चारों तरफ़ रात में सैंकड़ों सफ़ेद चादरें बिछवा दीं। सुबह के समय आकाश से पड़नेवाली ओस-बिंदुओं से चादरें गीली हो जातीं, उन्हें निचोड़कर पानी इकट्ठा किया जाता, फिर उससे मंदिर-निर्माण किया जाता।
लेखिका सम्पत मोरारका जी

दिन में मंदिर का निर्माण कार्य होता था, तो रात में कोई राक्षस आकर उसे बिगाड़ जाता था। सभी लोग बहुत परेशान थे। एक रात लोगों ने छिपकर उस दानव को देखा। सैंकड़ों लोग मशालें जलाकर तलवार, बरछा लेकर उस दानव के पीछे भागे और उसे घाटी से दूर पहाड़ के उस पार भगाकर दम लिया। हज़ारों लोगों के रात-दिन के परिश्रम से जब स्वयंभू-मंदिर बनकर तैयार हुआ, तब उस घाटी में वर्षा हुई। पानी आया और यहाँ के निवासी खुशहाल हुए। तब से इस घाटी में कभी भी पानी का संकट नहीं आया है। इस कहानी को सुनकर बौद्ध स्तूप के निर्माण के विषय में ज्ञानार्जन हुआ। मेरे अतिरिक्त गिरीश पंकज, सुनीता यादव, शैलेष भारतवासी, मुकेश सिन्हा, सम्पत मोरारका जी ने ओ3म मणि पद्में हूँ बीज मंत्र लिखे चक्रों को घुमाया। 
इस चित्र में व्यवधान हुआ 

सुनीता यादव जी के साथ कुछ चित्र लिए तथा चित्रों के साथ प्रयोग भी किए। जूम करके चित्र लेते हुए सब्जेक्ट एवं कैमरे के बीच यदि कोई आ जाए और उसी समय क्लिक हो जाए तो दिमाग की बत्ती ही गुल हो जाती है। ऐसे ही एक चित्र खराब होने से मेरा मुड चढ गया सातवें आसमान पर। सुनीता जी ने कई चित्र लिए मेरे। लेकिन सभी चित्रों में भृकुटि तनी हुई है चेहरे से सौम्यता एवं सहजता फ़ना हो गई। यही होता है मेरे साथ, यदि मेरे मन की नहीं हो पाती और मैं कुछ कह या कर न पाऊं तो काफ़ी देर तक मानसिक स्थिति डांवा डोल रहती है। जब उस वाकये की तरफ़ से ध्यान हट जाए और कुछ हँसी मजाक इत्यादि साथियों के साथ हो जाए तब सामान्य स्थिति आती है।
लामा

सांझ हो रही थी, पक्षी अपने घोंसलों की और लौट रहे थे। स्वयंभूनाथ का रमणीय दृश्य हमें स्थान छोड़ने ही नहीं दे रहा था। थोड़ा समय होता तो इस मंदिर के प्रस्तर शिल्प की पड़ताल करता तथा स्मृति आलेख ढूंढता। परन्तु हमारे पास इतना समय नहीं था। पराधीने सपनेहू सुख नाहिं। हमारी काठमांडू यात्रा परिकल्पना के अधीन चल रही थी। हम स्तूप से बाहर आ गए और बस के समीप पहुंच गए। काफ़ी साथी बस में बैठ चुके थे। वहीं पर छोटी सी रेहड़ी पर मालाएं चूड़ियाँ इत्यादि एक लड़की बेच रही थी। उसकी दूकान पर मुझे एक बड़े मनकों वाली माला दिखाई, जिसे गाँव में हम गाय-बैलों को पहनाते हैं। 
वज्रयान का प्रतीक वज्र

ये मालाएं वर्तमान में आधुनिक नारियाँ धारण करती हैं, मनुष्य के फ़ैशन में भी प्रचलन में आ गई है। मैने सोचा कि एक माला ले ली जाए। जल्दबाजी में मोल भाव करके 100 नेपाली रुपए में सौदा पटा। माला लेकर हम बस में आए तो किसी ने देखने लिए मांगी। तो उसने बताया कि माला का लॉकेट टूटा हुआ है। हम दौड़ कर माला वापस करने गए, तो दुकान वाली लड़की को धमकाए कि धोखाधड़ी करती है। वह बोली कि माला टूटी हुई थी इसलिए हमने कम भाव में दी। उससे  पैसे लेकर हम बस में आ कर बैठ गए।
इसी चित्र में हमने कलाकारी की थी-एम एफ़ हुसैन के घोड़े जैसा बादल

सारी सवारियाँ आ चुकी थी, पाबला जी नदारत थे। अब पाबला जी की खोज शुरु हुई, कहीं दिखाई नहीं दिए। तो नेपाल की सीमा पर लिया हुआ नेपाली नम्बर अब काम आया। उन्हें फ़ोन लगा कर पूछा तो वे बोले कि आप बस लेकर आ जाईए, मैं नीचे रास्ते में मिल जाऊंगा कहीं। अब उन्हें भी काठमांडू के स्थान का नाम नहीं मालूम और हमें भी। जैसे कह देते कि राम लाल की आटा चक्की के पास खड़ा हूँ या चुनौटी लाल के पान ठेले के पास मिलुंगा। फ़िर हमने दुबारा फ़ोन मिलाया तो यही जवाब आया। हमने बस ड्रायवर को कह दिया कि चलिए, आगे कहीं रास्ते में पाबला जी मिल जाएगें। रास्ते में पाबला जी मिल गए और हम सांझ का अंधेरा होते होते होटल रिव्हर व्यू में पहुंच गए। लेकिन रिव्हर कहीं दिखाई नहीं दी।

नेपाल यात्रा आगे पढे……… जारी है।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

बूढ़ा नीलकंठ में सूतल विष्णु : काठमांडू

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
शुपतिनाथ मंदिर के बाद हमारा अगला पड़ाव बूढ़ा नीलकंठ था। काठमांडू की गलियों के बीच वातानुकूलित बस का ड्रायवर कुशलता का परिचय दे रहा था। बड़ी लक्जरी बस को आसानी के साथ चौड़े चौक चौराहों पर मोड़ लेता था। हमारी बस काठमांडू की सड़कों पर चक्कर काटते हुए बूढ़ा नीलकंठ मंदिर पहुंची। मंदिर से थोड़ी दूरी पर बस को विश्राम दिया गया और हम गली से होते हुए मंदिर तक पंहुचे। काठमांडू के मध्य से 10 किलोमीटर की दूरी पर शिवपुरी हिल के समीप यह मंदिर स्थित है। पूजन सामग्री की दुकाने नीचे ही गली में लगी हुई थी। इन दुकानों  में अधिकतर महिलाएं काम करते दिखाई दी। 
   खाई - खाजा की दुकान 

मंदिर के प्रवेश द्वार की चंद्रशिला के उपर पद्मांकन दिखाई दिया। उसके पश्चात पैड़ियों के बीच में चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा स्थानक मुद्रा में स्थापित है। मुख्य द्वार के किवाड़ों पर पीतल का पतरा चढा हुआ है तथा उसके एक किवाड़ पर  शिव परिवार के सदस्य कार्तिकेय एवं दूसरे किवाड़ पर गणेश जी विराजमान हैं। इस स्थान पर हमने कुछ चित्र लिए। द्वार पर पुष्प पत्र बेचने वालों ने कब्जा जमा रखा था तथा इस मंदिर में भी एकमात्र हिंदुओं को ही प्रवेश की अनुमति है। अन्य धर्म के लोग यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते। 
कार्तिकेय 

प्रवेश द्वार के समक्ष जल का विशाल कुंड बना हुआ है, जिसमें शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की चर्तुभुजी प्रतिमा है। प्रतिमा का निर्माण काले बेसाल्ट पत्थर की एक ही शिला से हुआ है। प्रतिमा का शिल्प मनमोहक एवं नयनाभिराम है। शेष शैया पर शयन कर रहे विष्णु की प्रतिमा की लम्बाई 5 मीटर है एवं जलकुंड की लम्बाई 13 मीटर बताई जाती है। शेष नाग के 11 फ़नों के विष्णु के शीष पर छत्र बना हुआ है। विष्णु के विग्रह का अलंकरण चांदी के किरीट एवं बाजुबंद से किया गया है। प्रतिमा के पैर विश्रामानंद की मुद्रा में जुड़े हुए हैं। शेष नाग भी हष्ट पुष्ट दिखाई देते हैं।
 सुनीता यादव, रविन्द्र प्रभात, राजीव शंकर मिश्र, नमिता राकेश, मनोज भावुक, मनोज पाण्डे 

जलकुंड को चारदीवारी से घेरा गया है सभी ब्लॉगर शंख, चक्र पद्म एवं गदाधारी चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा के चित्र ले रहे थे तथा मैं इस जुगत में था कि इस विशाल प्रतिमा का एक बढिया सा चित्र लिया जाए। मैंने कुंड की चार दिवारी में प्रवेश करके एक चित्र लिया तो एक व्यक्ति ने मुझे वहाँ लिखी चेतावनी की ओर इंगित किया। जिस पर लिखा था कि चार दिवारी के भीतर चित्र लेना वर्जित है। फ़ोटो खींचने के बाद सभी ब्लॉगर एक वृक्ष की छांव में बैठ गए तथा सुनीता सभी के विडियो बनाने लगी। अभी हमारे दल का नेतृत्व राजीव शंकर मिश्रा बनारस वाले कर रहे थे। 
अक्षिता पाखी, आकांक्षा यादव, कृष्ण कुमार यादव, मुकेश तिवारी, सुनीता यादव

मंदिर से लौटते हुए उन्होनें उपस्थित ब्लॉगर्स को रुद्राक्ष के कुछ फ़ल भेंट किए तथा बताया कि इन फ़लों से रुद्राक्ष निकालने के लिए कैसी साधना करनी पड़ती है। अब यहाँ पर समस्या यह थी कि मंदिर का नाम बूढ़ा नीलंकठ है तथा शेष शैया पर भगवान विष्णु विराजे हैं, द्वार पर जय विजय की तरह शिव परिवार के उत्तराधिकरी कार्तिकेय एवं गणेश पहरा दे रहे हैं और भगवान विष्णु क्षीर सागर में मजे से आनंद ले रहे हैं। बूढ़ा नीलकंठ महादेव तो कहीं दिखाई नहीं दिए। जब बूढा नीलकंठ ही इस स्थान पर नहीं है तो यह नाम इस स्थान के लिए रुढ कैसे हो गया? यह प्रश्न दिमाग में कौंध रहा था।
बूढ़ा नीलकंठ

विषपान करने के पश्चात जब भगवान शिव का कंठ जलने लगा तब उन्होने विष के प्रभाव शांत करने के लिए जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक स्थान पर आकर त्रिशूल का प्रहार किया जिससे गोंसाईकुंड झील का निर्माण हुआ। सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है गोसाईंकुंड झील जो 436 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. काठमांडू से 132 उत्तर पूर्व की ओर स्थित गोसाईंकुंड पवित्र स्थल माना जाता है। मान्यता है कि बूढा नीलकंठ में उसी गोसाईन कुंड का जल आता है, जिसका निर्माण भगवान शिव ने किया था। श्रद्धालुओं का मानना है कि सावन के महीने में विष्णु प्रतिमा के साथ भगवान शिव के विग्रह का प्रतिबिंब जल में दिखाई देता है। इसके दर्शन एक मात्र श्रावण माह में होते हैं।
चतुर्भुजी विष्णु

बूढ़ा नीलकंठ प्रतिमा की स्थापना के विषय में स्थानीय स्तर पर दो किंवदंतिया प्रचलित हैं, पहली प्रचलित किंवदंती है कि लिच्छवियों के अधीनस्थ विष्णु गुप्त ने इस प्रतिमा का निर्माण अन्यत्र करवा कर 7 वीं शताब्दी में इस स्थान पर स्थापित किया। अन्य किंवदन्ती के अनुसार एक किसान खेत की जुताई कर रहा था तभी उसके हल का फ़ाल एक पत्थर से टकराया तो वहाँ से रक्त निकलने लगा। जब उस भूमि को खोदा गया तो इस प्रतिमा का अनावरण हुआ। जिससे बूढ़ा नीलकंठ की प्रतिमा प्राप्त हुई तथा उसे यथास्थान पर स्थापित कर दिया गया। तभी से नेपाल के निवासी बूढ़ा नीलकंठ का अर्चन पूजन कर रहे हैं। 
सरोज सुमन, मुकेश तिवारी, रविन्द्र प्रभात, मनोज भावुक विश्रामासन में 

नेपाल के राजा वैष्णव धर्म का पालन करते थे, 12 वीं 13 वीं शताब्दी में मल्ल साम्राज्य के दौरान शिव की उपासना का चलन प्रारंभ हुआ तथा 14 वी शताब्दी में मल्ल राजा जय ने विष्णु की आराधना प्रारंभ की एवं स्वयं को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया। 16 वीं शताब्दी में प्रताप मल्ल ने विष्णु के अवतार की पराम्परा सतत जारी रखी। प्रताप मल्ल को दिखे स्वप्न के आधार पर ऐसी मान्यता एवं भय व्याप्त हो गया कि यदि राजा बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करेगें लौटने पर उसकी मृत्यु अवश्यसंभावी है। इसके पश्चात किसी राजा ने बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन नहीं किए। इस मंदिर में देवउठनी एकादशी को मेला भरता है तथा श्रद्धालु भगवान विष्णु  के जागरण का उत्साह पूर्वक आशीर्वाद लेकर जश्न मनाते हैं। 
काठमांडू नगर 

काठमांडू में इसके अतिरिक्त विष्णु की शयन प्रतिमाएं हैं, एक प्रतिमा बालाजु बाग में स्थापित है जिसका दर्शन आम जनता कर सकती है तथा दूसरी प्रतिमा राज भवन में स्थापित है, जिसके दर्शन आम आदमी के लिए प्रतिबंधित हैं।बौद्ध धर्मी नेवारी समुदाय इसे बुद्ध मान कर पूजा करता है तथा हिन्दुओं के द्वारा मना करने पर उनकी पूजा करने की परम्परा चली आ रही है। हम बूढ़ा नीलकंठ के दर्शन करने के उपरांत आगे की नेपाल दर्शन यात्रा में चल पड़े। अब हमारा अगला पड़ाव पाटन दरबार चौक था।

नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें……

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

शराब की नदी पर तैरता चमड़े का जहाज

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
काठमाण्डौ में सुबह हुई, मौसम बदलियाना बना हुआ था। होटल की खिड़की से सुबह के नजारे देखने लगा। आस-पास के भवनों की छत पर दिनचर्या प्रारंभ हो गई थी। कोई गमले में पानी दे रहा था तो कोई पानी की टंकी को झांक रहा था। किसी के हाथ में बच्चा था तो कोई झाड़ू बुहारी कर रहा था। यहां की सुबह भी आम भारतीय सुबहों जैसी थी। 

अब एक अदद चाय की अत्यावश्यकता थी। होटल का किचन अल सुबह चालू  नहीं होने के कारण चाय पीने के लिए बाहर ही जाना होगा। मैं जल्दी उठ गया, थोड़ी रोशनी होने लगी थी। होटल से बाहर निकला। शायद हमारे शहर जैसे सुबह ही कोई चाय की दूकान लग गयी हो। एक चाय पी लेता और साथियों के लिए भी 2 चाय पार्सल करवा लेता। होटल के बांई तरफ़ सड़क पर सीधे ही आगे बढता गया।

थोड़ा आगे बढने पर गली से एक चिक्की निकला और मुझसे मुखातिब होते हुए बोला - सर! मजा करेगें?  

सुनते ही रात को कही गई अंतर सोहिल जी की बात का स्मरण हो गया। वह फ़िर बोला - सर मजा करेगें क्या?

मैने नासमझ बनते हुए कहा - मजा करने ही तो आए हैं इतनी दूर। 8 बजे होटल में बस आने वाली है, फ़िर काठमाण्डू घूमेगें और मजे ही मजे करेगें।

सर ऐसे वाला मजा नहीं, वैसे वाला मजा।
  
ये वैसे वाला मजा क्या होता है? काठमाण्डू में घूमने के अलावा कुछ खास मजा है क्या? सड़क पर चलते हुए बात हो रही थी, चिक्की मेरे साथ ही चल रहा था। 

मैं चाय के मजे का तलबगार था, वैसे भी दिन में दो चाय ही पीता हूँ पहली चाय से सुबह होती है और दूसरी से शाम। वरना लगता ही नहीं है कि सुबह या शाम हो गई। चाय वाला कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। नेपाली चाय को चिया बोलते हैं। चिया की कोई दूकान दिखाई नहीं दे रही थी। सामने एक लड़का और आया, उसने नेपाली में मजा कराने वाले लड़के से कुछ कहा। कुछ तो समझ गया था, उसका कहना था कि इस ग्राहक को मैं टेकल करता हूँ।

वह बोला- सर मजा करेगें क्या? बहुत अच्छी जगह ले चलता हूँ। 

मेरे भीतर का लेखक सक्रीय हो गया। अब मेरे मन उनकी बातों में ब्लॉग रस लेने हो रहा था। कैसे मजा कराओगे?

लरकी वाला मजा सर। एक नम्बर की लरकी मिलेगी।

कितने में ?

3000 एन सी लगेगा सर। लरकी सुंदर मिलेगी। मजा न आए तो पैसा वापस। - 

कमाल हो गया, इस धंधे में पैसे वापसी की गारंटी दे रहा है। कहाँ फ़ँस गया सुबह सुबह इन भड़ूओं के चक्कर में और ये इतनी बुरी तरह पीछे पड़े हुए थे कि मुझे डर लगने लगा था। किसी तरह इनसे पीछा छुड़ाने की जुगत लगा रहा था।  

तीन हजार तो बहुत ज्यादा है, कम से कम कितने में जुगाड़ हो जाएगा?

जैसी लरकी चाहेगें वैसी मिल जाएगी। आप हमारे साथ चलकर लरकी देख लीजिए। 

कहाँ चलना होगा?

इधर ही नजदीक सर, एक बार चलिए तो आप, मजा करके तो देखिए, आपको तीन हजार भी कम लगेगा। लरकी तो 300 आई सी में भी मिल जाएगा। रुम का खर्चा आपका रहेगा और हम कोई रिस्क नहीं लेगा। सब आपका ही रहेगा। 

अरे! सुबह सुबह भगवान का नाम जपने के टाईम तुम लोग मजे के लिए पीछे पड़ गए हो। एक काम करो शाम को 6 बजे केसिनो एवरेस्ट में मिलो। तब हम लरकी देख लेगें और रेट तय कर लेगें। - उन्होने केसिनों में मिलने का आस्वासन पाकर मेरा पीछा छोड़ा। चाय की दुकान तो नहीं मिली, पर काठमांडू की हकीकत से परदा जरुर उठ रहा था।

रात अंतर सोहिल जी ने भी बताया थी कि उनके पीछे भी भड़ूए पड़ गए थे, मजा कराने के लिए। इस घटना के बाद जाहिर हैं कि नेपाल में वेश्या वृत्ति चरम सीमा पर है। यह गरम गोस्त की बड़ी मंडी बन रहा है। अब समझ आने लगा था कि नेपाल की ओर लोग क्यों भागते हैं। यहाँ दारु की खुली छूट है। छोटी सी गुमटी से लेकर किराना दुकान में भी सहज उपलब्ध है।  शराब, शबाब और कबाब की दुकानें सभी तरफ़ सजी हुई हैं।

वेश्यावृत्ति के कारण नेपाल में एडस के रोगियों की बेतहाशा वृद्धि हुई है। नेपाल की सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रकाशित हाल के आँकड़ों के अनुसार देश में एड्स रोग के फैलने का सबसे बड़ा कारण वेश्यावृत्ति है। नेपाल की दो करोड़ साठ लाख की कुल आबादी में 70,000 व्यक्ति एड्स रोग से संक्रमित हैं, इनमें 2000 बच्चे शामिल हैं। 41 प्रतिशत अप्रवासी श्रमिक हैं, 16 प्रतिशत यौन सम्बन्धों के परिणामस्वरूप संक्रमित हो गये हैं तथा 21 प्रतिशत अपने बीमार पतियों द्वारा संक्रमित हो गये हैं। सुबह सुबह नेपाल रेडियो पर समाचार भी सुना था कि एडस फ़ैलाने के आरोप में 9 गिरफ़्तारियाँ की गई।

भारत के बड़े शहरों के चकले नेपाली लड़कियों से आबाद हैं। वेश्यावृत्ति में अधिकांश नेपाली लड़कियाँ पाई जाती हैं। गरीबी  के कारण सुख सुविधा युक्त जीवन की चाह ने इन्हे वेश्या वृत्ति के दलदल में ढकेल दिया। नेपाल आने वाला प्रत्येक व्यक्ति दलालों को चमड़े के जहाज की सवारी दिखाई देता है। इसलिए वे हर व्यक्ति को टोक कर मजा कराने का ऑफ़र देते हैं।

काठमाण्डू से लौटते हुए एक होटल में भोजन के दौरान 3 ग्राहकों को इंटरटेन करती हुई एक नेपाली औरत दिखाई दी। सभी दोपहर में खुले आम शराब पी रहे थे। कुछ घटनाओं को देखने के बाद यह तो तय हो गया कि यहाँ सेक्स टुरिज्म काफ़ी फ़ल फ़ूल रहा है और एजेंसी वाले नेपाल यात्रा के लिए भारत से ही नेपाली लड़कियाँ साथ भेज देते हैं, जो पर्यटकों को नेपाल की सैर के साथ मजा कराकर लौट आती हैं।

नेपाल में चारों ओर अराजकता का माहौल दिखाई दिया। जिस देश की सत्ता ही उलझनों में उलझी हो वहाँ सुराज की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। बेरोजगारी और बेलगाम भ्रष्टाचार ने नेपाल को गारत कर रखा है। राजशाही की समाप्ति के बाद नेपाल के हालात खराब हैं। अगर भारत से इमदाद न मिले तो यहाँ के लोगों का जीना मुहाल है। मेरा अधिकतम समय घुमक्कड़ी में ही बीतता है, भारत में देहव्यापार की बड़ी मंडियाँ है, लेकिन आज तक किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि - मजा करना है क्या? यह तो पहली बार काठमाण्डू में ही घटा। 

रोशनी हो चुकी थी, रास्ते पर चहल पहल शुरु हो चुकी थी। मजा कराने वालों से पीछा छुड़ाकर वापस होटल में लौट आया। बिना चाय के ही स्नान ध्यान किए। पाबला जी और गिरीश भैया भी स्नान कर रहे थे। तभी नीचे से संदेश आ गया कि बस लग चुकी है और आप जल्दी से नाश्ते के लिए रेस्टोरेंट में पहुंचे। आज हमें काठमांडू घूमना है। 

नेपाल के वरिष्ठ साहित्यकार और नेकपा (एमाले) के सक्रीय सदस्य और नेपाल के पूर्व शिक्षा मंत्री मोदनाथ प्रश्रित अपनी पीड़ा कविता में कहते हैं…………

मैने साध्वी सीताओं को प्यार से तुम्हे सौंपा है
मेरी प्यारी बहनों को बम्बई की कोठियों से मुक्त करो
मैं तुम्हारी स्वाधीनता को लाल सलाम देता हूँ

नेपाल यात्रा की आगे की किश्त पढें……