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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

जय और वीरु पहुंचे चित्तौड़गढ़



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सुबह जय ने कहा वीरु भाई आज चित्तौड़गढ़ की सैर पर चलते हैं, बस फ़िर वीरु भी तैयार हो गए अपना अद्धा लेकर गढ़ की सैर करने।

गन भी साथ रख ली कहीं गब्बर दिख जाए तो इनाम के पैसे वसुल हो जाएं, आम के आम गुठली के भी दाम, गन तो वीरु ने शाम को ही देख भाल ली थी। कहीं गब्बर का सामना हो और गन धोखा दे जाए तो फ़ेंक कर मारने के ही काम आएगी। इसलिए साज-ओ-सामान तो चौकस रहना चाहिए।

गढ़ जाने के लिए घोड़ा धो पोंछ कर चकाचक किया गया। जब घोड़े को पता चला कि आज जय और वीरु सवारी करने वाले हैं तो उसकी हवा बंद हो गयी, लगता है पिछले जन्म का सूरमा भोपाली था। मुफ़्त में मारे जाएगें सोचकर उसका खोपड़ा गर्म हो गया, सईस ने ठंडा करने के लिए एक बार फ़िर नहलाया धुलाया।

क्योंकि चित्तौड़गढ़ जाना हो और घोड़े की सवारी न हो गन के साथ, तो बहुत नाइंसाफ़ी होगी, बहुत नाइंसाफ़ी। रानी पद्मिनी भी सोचेंगी कि ये कैसे जय वीरु हैं जिनके पास घोड़ा भी नहीं और गन भी नहीं। सो तैयारी पूरी कर ली गयी।

चित्तौड़ के गढ में प्रवेश के लिए 7 दरवाजे हैं। इन दरवाजों को अपने कार्यकाल में अलग-अलग राजाओं ने बनाया था। इन्हे पोल कहा जाता है। इन सात दरवाजों से चित्तौड़ के गढ में प्रवेश किया गया।

अंतिम दरवाजे पर पार्किंग की टिकिट कटाई जाती है। 15 रुपए खर्च किए और घोड़े समेत अंदर हुए। छोटी, नेहा और इनकी मम्मी (अनिता सिंग) भी साथ थी। सबसे पहले सवारी रुकी फ़तह प्रकाश महल में, जिसे अब संग्रहालय का रुप दे दिया गया है।

हमने संग्रहालय की सैर की और काफ़ी चित्र लिए। संग्रहालय में उस जमाने के सभी हथियार करीने से सजाए गए हैं। जिसमें भरमार और तोड़ेदार बंदुक प्रमुख है, और भी हथियार थे जिनमें छुरी, तलवार, कटार, क्रीसेंट कुल्हाड़ी, गुर्ज, दस्ता इत्यादि थे। तलवारें भी उम्दा किस्म की थी।

एक बंदुक को चलाने के लिए चार आदमियों की जरुरत पड़ती थी। एक गोलची बंदुक में सीसा भरता था, दुसरा उसे निशानची के पास लेकर जाता था, जब निशानची निशाना लगा कर फ़ायर कर लेता था तो चौथा उसे भरने के लिए गोलची के पास लेकर आता था। एक भरमार बंदुक को चलाने की यह प्रक्रिया होती थी।

तोड़े दार बंदुकों की नाल बड़ी होती थी। नाल जितनी बड़ी होगी निशाना उतनी दूर तक सटीक जाएगा और सीसा भी उसमें उतनी अधिक मात्रा में भरा जाएगा। इसके छर्रे दूर तक उड़ कर दुश्मनों को घायल कर देते थे। इसमें जहर बुझे छर्रों का भी प्रचलन था।

8-12 फ़ुट लम्बी तोड़े दार बंदुकों को चलाने के लिए बहुत ही कुशलता की आवश्यकता पड़ती थी। तोड़े दार इसे इसलिए कहा जाता था कि इसके हत्थे को अलग करके ले जाया जाता था तथा आवश्यकता पड़ने पर ही नाल फ़िट की जाती थी, जिससे लाने ले जाने में आसानी हो। संग्रहालय में भी 5 रुपए की टिकिट लगती है।

इसके बाद हम विजय स्तंभ पहुंचे। इसके आस पास बहुत लंगूर हैं। जो कि पर्यटको का खाने पीने का सामान ताकते रहते हैं और मौका पाकर हमला ही कर देते हैं। शरीफ़े की कहानी तो जय ने आपको बता ही दी है। लेकिन हमने भी एक शरीफ़े का इस्तेमाल कर ही लिया। चाहे लंगूर कितने ही बदमाश ठहरे। हम भी उनके बाप ठहरे।
विजयस्तंभ की फ़ोटुएं ली गई। यह स्तंभ तो हमने कोर्स की किताबों में ही देखा था। बरसों के बाद अब प्रत्यक्ष देख लिया। यह वही धरती है जहां राणा सांगा ने 80 घाव खाने के बाद भी युद्ध का मैदान नहीं छोड़ा।

बड़ी जीवटता है यहां के पानी में। यहां का पानी तीन दिनों तक हमने पीया। शायद कुछ असर हो। वैसे भी चंबल का पानी पीकर आए ही थे कोटा से। कहिए तो युद्ध भूमियों की सैर हो रही थी। जहां अंतिम में पहुंचा जाता है समर के बाद, वहां हम पहले ही हो आए थे।

इसके बाद हम पहुंचे रानी पद्मिनी के महल में। उनके निमंत्रण पर तो हम चित्तौड़गढ़ आए थे। उनके महल में प्रवेश करते ही तीन चार कमरे बने हैं जिनकी अभी छत नही है। समय की मार ने उसे धराशाई कर दिया।

रानी पद्मनि का महल कोई वास्तु की सुंदर कारीगरी तो नहीं है जैसे उदयपुर, आमेर या जोधपुर के महलों में देखने को मिलती है। बस दो चार चौक थे और एक झरोखा उसके बाद एक तालाब में दो कमरे और एक छतरी थी, बस हो गया रानी पद्मिनी का महल।

सामने सैनिको के रहने के लिए एक बारह दरी थी, जिसमें उनके सुरक्षा सैनिक रहते थे। एक जगह सिंटैक्स की टंकी फ़ूटी हुई दिखी जिससे लगा कि रानी पद्मिनी के जमाने से इन टंकियों का उपयोग होते आ रहा है।

साथ ही लगा हुआ एक टायलेट था अंग्रेजी स्टाईल का। लेकिन उन कमरों में देशी स्टाईल के टायलेट भी नजर आए। मतलब रानियों की सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता है।

महल में मुझे कुछ विचित्र सा लग रहा था। एक बार इस तरह की घटना मेरे साथ नाहरगढ के किले में भी हो चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि यहां मेरा सब देखा भाला है।

नाहरगढ में मुझे उपर की मंजिलों से नीचे भागना पड़ा, वहाँ मैं अकेला ही था, जब वहां से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा तो रास्ते ही गायब हो गए, बहुत देर तक अकेला भटकता रहा। फ़िर कहीं जाकर रास्ता मिला।

यहाँ रास्ता भटकने की बात तो नहीं थी। पर कुछ तो था जो मेरे करीब से गुजर रहा था। दीमाग में एक चित्र पट चल रहा था। उसमें किसी की तश्वीर उभर रही थी। लेकिन पहचान नहीं पा रहा था वह कौन है और कहां देखी या मिली थी। मैं काफ़ी देर तक उस स्थान पर रहा और पद्म सिंग को भी बताया।

मुझे इस जगह फ़िर कभी आना पड़ेगा। शायद कुछ अवचेतन के साथ जुड़ा हो। तभी वह दिख गयी, पद्मसिंग को इशारा किया तश्वीर लेने के लिए। पद्मसिंग ने तश्वीर ली, जब तश्वीर देखी तो उसका चेहरा उसमें नहीं था। इस “मिली” की कहानी विस्तार से लिखुंगा।

यहां से हम पूरे किले का चक्कर काटते रहे। रास्तें छोटी,छोटी झरबेरियाँ लगी थी, और शरीफ़े का तो पुरा बाग ही था। यूँ ही पूरे किले में बिखरे पड़े थे। कुछ हमने भी तोड़े, लेकिन उनकी आँखे नहीं खुली थी। पकने के चांस कम ही थे।

गढ में एक जैन मंदिर भी है, जिसे जैनियों ने बनाया होगा। खातन रानी का महल भी है, जो कि एक प्रसिद्ध रानी थी। समय बीतता जा रहा था।

एक जगह हमें पहुंच कर बहुत ही सुंदर दृश्य दिखाई दिया। ऐसा लगा की जैसे यह अमेजान की घाटी में आ गए, उसी तरह से पहाड़ों का आकर्षक कटाव था। हमने उतर कर वहां का नजारा देखा। मैने पद्मसिंग और अनिता की तश्वीर ली। बहुत ही सुंदर लगी। तश्वीर के रंग भी अद्भुत हैं।

गढ यात्रा करके हमें 4 बजे तक घर (निम्बाहेड़ा) पहुंचना था। क्योंकि उसके बाद शादी में शामिल होना था। गढ में हमने वहां के प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़रों से चित्र भी खिंचाए। यहां पोशाके और जेवर मिलते हैं किराए पर, आप अपनी पसंद की मेवाड़ी पोशाक पहन कर चित्र ले सकते हैं।

यहां शिव को समर्पित परमार शासक भोज द्वारा ग्याहरवीं सदी में निर्मित समाधीश्वर मंदिर दर्शनीय है।  मंदिर में सुंदर विग्रह है, लेकिन सारे लंगूर यहीं पर मंडराते रहते हैं इसलिए आप सावधानी अवश्य बरतें, नहीं तो घायल करने से भी नहीं चूकेंगे। बस पब्लिक ही तमाशा देखेगी।

हमारे पास समय कम होने से एक चूक हो गयी, मीरा रानी की धरती पर आकर मीरा मंदिर नहीं जा पाए। मीरा जी के दर्शन नहीं कर पाए। इसका बहुत ही अफ़सोस है। शायद फ़िर कभी आना होगा, इसलिए हम गढ में जाकर मीरा रानी को भूल गए। मीरा रानी भरोसा रखो अबकि बार सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही आएंगे और बिना मिले नहीं जाएंगे। ये जय - वीरु का वादा रहा।  आगे पढ़ें 

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

मीरा रानी दीवानी कहाने लगी, चित्तौड़गढ़ की इंदू पुरी


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ट्रेन शनै:-शनै: सरकती है चित्तौड़ की ओर, रास्ते में जलती हुई बत्तियाँ कह रही हैं कि आगे कोई इंतजार कर रहा है तुम्हारा, इसलिए आज राह-ए-रौशन की हुई हैं जिल्ले इलाही ने।

लगभग चार घंटे का सफ़र और आँखों में नींद। सोने का प्रयास करता हूँ, डर भी है अगर सोता रह गया तो उदयपुर पहुंच जाऊंगा। चलो कोई बात नहीं उदयपुर पहुंच भी गया तो बहुत मित्र हैं पुरानी यादें नयी हो जाएगीं। यही सोचते सोचते एक झपकी आ जाती है।

जब आँख खुलती है तो गाड़ी चंदेरिया पहुंच चुकी होती है। बस अगला स्टेशन चित्तौड़गढ ही है। वहाँ गाड़ी अपने समय से लगभग डेढ घंटे विलंब से पहुंच रही है।

हैंड बैग से मोबाईल निकालता हूँ तो पद्मसिंग की 3 मिस कॉल दिखाई देती है। मैं फ़ोन करके उसे बताता हूं कि सो गया था। गाड़ी चंदेरिया पहुंच चुकी है। रास्ते भर बरसात होते रही। गुना कोटा और चित्तौड़ तक। पद्मसिंग ने बताया कि वे स्टेशन पहुंच चुके हैं। जब तक बोगी के विषय में बताता नेटवर्क चला गया था।

पुरानी यादें चित्तौड़ग़ढ की आने लगती हैं चित्रपट की तरह। मैं 20 वर्ष पूर्व रघुनाथ जी राजपुरोहित के साथ उदयपुर से बस से आकर भीलवाड़ा जाने के लिए काचीगुड़ा एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा था।

प्लेट फ़ार्म पर गर्मी के दिनों में ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। रात के कोई एक बज रहे थे। आँखों की नींद अब बैठने नहीं दे रही थी। स्टेशन के सामने साफ़ सुथरी जगह थी। कुछ लोग चाय दुकान में बैठकर बीड़ी फ़ूंक रहे थे। अनजान जगह में भी मैं अखबार का बिछौना कर सिरहाने बेग लगाकर फ़ुटपाथ पर ही सो गया।

वैसे निश्चिंतता की नींद आज तक नहीं आई। बेफ़्रिक होकर सोया। अब वही स्टेशन फ़िर आने वाला है। बस कयास लगाए जा रहा था कि इंदू और पद्मसिंग दोनो को पहचान लुंगा। इतना तो तय था।

ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर पहुंची, हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही है। मैने मीरा दीवानी की धरती पर पहला कदम वैसे ही रखा जैसे नीलआर्मस्ट्रांग ने चाँद पर रखा होगा।

मैने दूर से ही सवा छ:फ़ुटे पद्मसिंग को देख लिया भीड़ में,लेकिन इंदू कही दिखाई नहीं दी। मैने आवाज देकर हाथ हिलाया। पद्मसिंग मेरी ओर चल पड़े।

जब भीड़ से बाहर निकले तो दिखा इंदू भी साथ थी। बस इन्होने देखते ही गले लगा लिया। माँ भाई बहन आदि रुप सारे यहीं देखने मिल गए।

शायद पिछले जन्मों का ही कोई रिश्ता है जो इतनी दूर खींच ले गया। प्रेममयी वात्सल्य की देवी से साक्षात मिल रहा था। जिसके ह्र्दय में हर प्राणी के लिए अथाह प्रेम का सागर हिलोरें लेता है कहुंगा तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
अद्भुत अनुभव था। निम्बाहेड़ा घर पहुंच कर पूरा परिवार मिल गया। बहुत सारी बातें होते रही है जैसे सारी बातें अभी ही एक दुसरे को कह देंगे। कल समय मिले या न मिले। 

वहां और भी ब्लागर्स का इंतजार था, जिनके चित्रों के साथ कमरे बुक थे। समीर दादा, महफ़ूज, सतीश सक्सेना, इत्यादि के लिए भी। एक फ़्लैट ब्लागर हाऊस ही बना रखा था और सजावट देख कर तो कई रिश्तेदारों के सीने पर सांप लोट गए होगें।

उन्होने भी सोचा होगा कि ये ब्लागर क्या बला है भाई, क्या रिश्ते-नातेदारों से भी बढकर हो गए? हा हा हा ऐसा ही कुछ था, जो मुझे महसूस हुआ। लेकिन हमारी तो चूल्हे तक पहुंच थी। इसलिए नो टेंशन।

शादी के घर में 11 बजे तक तो यूं ही गप्पें मारते रहे जैसे कि किसी को कोई चिंता ही नही है और शाम को शादी है। बस बिंदास बोल हा हा हा।

ठहाके ब्लॉगर हाऊस की छत से टकरा कर फ़र्श पर गिरते रहे। ढेर लग गया ठहाकों का। सिर्फ़ ठहाके ही ठहाके गुंजते रहे। शादी के बाद सभी को सीख में ठहाकों का वितरण किया जाएगा ऐसा लग गया था। 

दोपहर में बरसात शुरु थी और हम आदित्य बिरला सीमेंट के चीफ़ श्री तिवारी जी के निमंत्रण पर फ़ैक्टरी देखने गए। हमारे साथ इंदू की मुंबई से आई सहेली और उनके पतिदेव उनका भाई प्रत्युष और भतीजी पिऊ, पद्मसिंग और उनकी बेटी नेहा भी थी।

प्लांट में पहुंचने से पहले हमे नए नकोर हेलमेट दे दिए। मन तो था कि हेलमेट साथ घर भी ले चलूं क्योंकि 20 दिन के बाद घर पहुंचने पर इसकी जरुरत पड़ सकती थी।

नहीं ला सका। उसके लिए हमने दूसरी जुगत भिड़ा ली थी। इसके विषय में बाद में बताऊंगा। शायद किसी के काम आ जाए। अपने चेम्बर में तिवारी जी ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया और सबसे पहले सीमेंट बनाने की प्रक्रिया और प्लांट के विषय में व्हाईट बोर्ड पर समझाया।

यहां विद्युत का निर्माण भी होता है। इनका अपना पावर प्लांट भी है। इसके बाद हमने पुरा पावर प्लांट और सीमेंट प्लांट देखा। पानी लगातार बरस रहा था। कार में बैठे बैठे ही प्लांट के चक्कर काटते रहे। दोपहर के खाने पर हम घर पहुंचे।
शाम अपूर्वा की शादी थी। लेडिज संगीत भी, भोजन के साथ साथ हमारे लिए टीचर्स का भी इंतजाम था और फ़िर डांस का। अरे कहें तो नाच-नाच के धरती फ़ोड़ दी।

वो तो 53 ग्रेड बिरला सीमेंट का कमाल था वरना समारोह स्थल का स्टेज भी टें बोल जाता। बिरला सीमेंट वाले अपने ग्रेड की क्वालिटी इसी तरह चेक करते हैं जिससे गुणवत्ता बनी रहे।

पद्मसिंग और हमने भी साथ दिया, बस मत पूछो। इंदू दिल खोल कर नाची। शायद ही मैने किसी शादी का इतना आनंद लेते किसी को देखा हो। जिसके घर में शादी होती है वह तो बरसों से बोझा लाद कर रखता है खोपड़ी पर। जाने हरक्युलिश ने सारी धरती सिर पर उठा रखी हो।

यहां छोटे से कस्टम से शादी सम्पन्न हुई। फ़िर संगीत की महफ़िल जमी, गीत चलते रहे, पद्म सिंग ने भी गाए। मेरे से बस यही एक काम नहीं होता फ़िर भी मैने साथ दिया। शादी की कमेंट्री पद्म सिंग सुनाएगे। हम कल आपको चित्तौड़गढ ले चलेंगे रानी पद्मनी से मिलाने। आगे पढ़ें 

अपडेट -- पद्मसिंग की पोस्ट एक घर,दो जोड़े,तीन दिन,चार शादियाँ और पाँच ब्लॉ्गर

बुधवार, 17 नवंबर 2010

एक दिन के वकील--फैसला ऑन दी स्पाट


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रोहतक यात्रा प्रारंभ हो चुकी है. कल रायपुर से ४.५० को दुर्ग जयपुर एक्सप्रेस से रवाना हुए कोटा के लिए. स्टेशन पहुच कर देखा तो अपार भीड़ थी.

इतनी भीड़ मैंने कभी रायपुर रेलवे स्टेशन पर नहीं देखी थी. मैंने सोचा कि यदि ये सभी जयपुर की सवारी है तो आज की यात्रा का भगवान ही मालिक है. तभी रायपुर डोंगरगढ़ लोकल गाड़ी आ कर खड़ी हुई. आधी सवारी उसमे चली गई. थोडा साँस में साँस आया.

अपनी गाड़ी भी आकर स्टेशन पर लगी. अपनी सीट पर हमने कब्ज़ा जमा लिया. तभी एक बालक भी आकर बैठा. खिड़की से उसके मम्मी-पापा उसे ठीक-ठाक यात्रा करने की सलाह दे रहे थे.

उसके पापा ने मुझे मुखातिब होते हुए कहा-"सर जरा बच्चे का ध्यान रखना और इसके पास मोबाइल और रिजर्वेशन नहीं है. कृपया टी टी को बोल कर कन्फर्म करवा देना और आप अपना नंबर भी दे दीजिये मैं इससे बात कर लूँगा.

मैंने भी हां कह कर एक मुफ्त की जिम्मेदारी गले बांध ली. क्या करें अपनी आदत ही ऐसी है. दिल है की मानता नहीं है. दो चार सवारियां और आ गई हमारी बर्थ पर. 

हम प्रखर समाचार की दीवाली स्मारिका पढ़ने लगे. उसमे मानिक विश्वकर्मा जी की ४ उम्दा गजले छपी थी. हम रह ना सके और उन्हें फोन लगा बैठे. ग़ज़लों के लिए शुभ कामनाएं दी और काफी दिनों से चर्चा नहीं हुयी थी इसलिए लम्बी चर्चा भी कर बैठे.

पाबला  जी का भी फोन आया की गाड़ी में बैठा की नहीं. मैंने उन्हें अपने सकुशल स्थान प्राप्ति की सूचना दे दी और यात्रा की सफलता के लिए शुभकामनायें भी ग्रहण की.

घर से चले थे तो श्रीमती जी ने यात्रा के लिए सब्जी के विषय में पूछा था. तो मैंने उनसे मेरी प्रिय सब्जी जिमीं कंद बनाने के लिए कहा और उसे ठीक से पैक करने की सलाह भी दी, जिससे सब्जी कोटा तक पहुच जाये. क्योंकि वकील साहब को जिमीं कंद की सब्जी जो खिलानी थी.

बिलासपुर स्टेशन में ट्रेन २० मिनट रुकती है. वहां श्याम (उदय) भाई भी पहुच गए, बहुत दिन हो गये थे उनसे मिले. बिलासपुर में मिलकार अच्छा लगा. अरविन्द झा जी तो दरभंगा गए होए थे. ट्रेन चल पड़ी. तभी पेंड्रा रोड से गुड्डू को फोन लगाया ट्रेन वहां ८.३० को पहुचती है. लेकिन लेट होने पर मैंने उसे आने से मना कर दिया.

रास्ते में मैंने खोंगसरा स्टेशन देखा तो पुरानी घटना याद आ गई. १६ जुलाई १९८१ गुरुवार को यहाँ एक भीषण रेल दुर्घटना हुई थी, जिसकी श्री रमेश नैयर दिनमान में रिपोर्टिंग की थी. मैंने उसे पढ़ा था.

यहाँ ट्रेन रुकी तो मुझे एक रेलवे ड्राईवर जगदीश प्रसाद निर्मल कर मिल गाय. उन्होंने बताया कि मैंने ७ जुलाई १९८१ को पदभार ग्रहण किया और १६ जुलाई की घटना होने के कारण मुझे इसकी पूरी जानकारी है. इस ट्रेक पर इंदौर जाने वाली गाड़ी थी. उसके पीछे एक माल गाड़ी जा रही थी जिसमे असिस्टेंट ड्राईवर था.

रास्ते में गाड़ी रोल हो गयी. असिस्टेंड ड्राईवर को अधिक जानकारी नहीं थी. इसलिए पता नहीं की उसने लोको ब्रेक लगाया की नहीं. वह चलती ट्रेन से उतर गया और गाड़ी धडधडाते सामने जा रही ट्रेन से जा टकरायी सैकड़ों लोग मारे गए. इस दुर्घटना के कारण एक छोटा सा स्टेशन खोंगसरा अभी तक याद किया जाता है.  

ट्रेन में खाटू श्याम जी जाने वाले बहुत से भगत मौजूद थे. उन्होंने खंजरी और सुर ताल के साथ भजन गाना शुरू कर दिया. हमने भी मौके का फायदा उठाया और पहुच गए उनके पास और २ घंटे तक भजन गाते सुनते रहे. भरपूर आनंद आया.

इस तरह की सवारियां रहे तो सफ़र मजे से कट जाता है और यदि कोई मनहूस शक्ल लिए बैठा हो तो सफ़र बहुत भारी पड़ जाता है. ऐसे लगता है जैसे हम फ्लाईट या एसी क्लास की सवारी कर रहे हैं. जो मजा स्लीपर क्लास में है वह इन सबमे कहाँ.

इस क्लास में तो असली भारत देखने मिलता है. सीट पर बैठते ही लोग ईज्जत से पूछते हैं कि "भाई साहब आप कहाँ जा रहे हैं?"

लेकिन फ्लाईट या एसी क्लास में कोई भी नहीं पूछता. सारे ही १२ सेर के होते हैं. भोजन करते वक्त भी एक बार मनुहार कर ही लेते हैं, चाहे सामने वाला अपरिचित क्यों ना हो.

भोजन-भजन करने के बाद देखा तो एक मोबाइल की बैट्री उतर रही है. हमने सोचा अब चार्ज ही कर लिया जाये. ४ बोगी में जाने के बाद एक जगह सही प्लग मिला लेकिन वह भी ढीला था उसमे पिन लगाने के बाद पिन को पकड़ कर खड़ा होना पड़ता था.

कुछ देर खड़े रहे फिर हिम्मत जवाब दे गई. दुसरे फोन में बैटरी फुल है सोचकर दरवाजे के पास पहुचे दो देखा एक सज्जन फुल तन्न हुए वहां खड़े खड़े हिल रहा था. कही थोडा झटका लगा और समझो हैप्पी बर्थ डे हुआ.

उसे हटा कर दरवाजा बंद किया और चल दिये अपनी सीट का किराया वसूल करने के लिए. सुबह नींद खुली तो अपने को गुना स्टेशन पर पाया. यह वही गुना है जहाँ से राजमाता विजया राजे चुनाव लडती थी. उसके बाद दिग्विजय सिंह से भाई लक्षम्ण सिंग चुनाव जीते थे.

सुबह के ८.२५ हुए थे ये वहां की घडी बता रही थी. हमें चाय की तलब लगी तो स्टेशन के काउंटर से चाय बेचने वाले के पास पहुचे वहां लाइन लगी थी. जैसे राशन की लाइन लगी हो. बड़ी मशक्कत के बाद एक कफ चाय मिली. उसे पीने के बाद यही सलाह दूंगा की कभी भी गुना में चाय नहीं पीना.

दिनेश जी का भी फोन आया, तो हमने बताया कि गुना पहुचे हैं. उन्होंने बताया की कोटा में बरसात हो रही है. मतलब मौसम खुशगवार हो गया है. लेकिन कहीं ज्यादा बरसात हो गयी तो इससे ज्यादा खुशगवार मौसम नहीं होना है.

रास्ते में बारां के बाद दो स्टेशन और आये. सरदारों वाले टाइम पे हम कोटा पहुच चुके थे. दिनेश जी फोन करके प्लेट फार्म पे ही रहने को कहा. थोड़ी देर में वे भी पहुच गए. स्टेशन से सीधा घर आये.....

आज उनकी कार हास्पिटल में लीवर का इलाज करने गई है. बस थोड़ी ही देर में आने वाली है फिर हम जरा कोटा शहर के एक चक्कर लगायेंगे. हां हमने मशहूर रतन लाल की कचौरियां जरुर खाई. कुछ तो दम है इन कचौरियों में, अभी तक भूख नहीं लगी है.

दिनेश जी ने बताया कि अमिताभ बच्चन भी कोटा की कचौरिया खाकर ही कोलाईटिस होने से अस्पताल में दाखिल हुए थे. लेकिन हमारे हाजमे पर कोई संदेह नहीं है. हमने आते ही दिनेश जी को कुर्सी संभाल ली. एक दिन के वकील बन गए. कोई मुक़दमा हो तो ले आओ. फैसला ऑन दी स्पाट, हा हा हा, मिलते हैं एक ब्रेक के बाद कल सुबह  में ....... आगे पढ़ें