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गुरुवार, 19 मई 2011

जाट का नया अविष्कार --आपस में प्रेम करो, मेरे ब्लॉग प्रेमियों.... ...

आरम्भ से पढ़ें  हमारे गाँव में एक अखाड़ा था, नाग पंचमी को कुश्ती की प्रतियोगिता हुआ करती थी. चार आने से लेकर १० रुपये तक के इनाम हुआ करते थे. बच्चों को चार आने, आठ आने से १ रूपये तक के इनाम मिला करते थे. जब किसी को पछाड़ कर कुश्ती जीत जाते थे, तो चार आने का इनाम पाने की ख़ुशी का बयान करना मुश्किल हो जाता था. परिकल्पना सम्मान समारोह की तो बात ही कुछ और थी. गाँव से दिल्ली तक का सफ़र और साथ में सम्मान पुरस्कार भी, मित्रों से मिलने की ख़ुशी आनन्द ही कुछ और है. २९ अप्रेल को रायपुर प्रेस क्लब में सृजन गाथा सम्मान का आयोजन था. जिसमे दो ब्लोगर्स मुझे और राजकुमार सोनी को यह सम्मान लेना था. लेकिन पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की वजह से मैं इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सका. मैंने जय प्रकाश मानस जी को फोन पर उपस्थित न होने के कारन खेद व्यक्त किया. 

हिंदी भवन में सम्मान समारोह प्रारंभ हो चूका था. प्रारंभ निर्मला कपिला जी से हुआ. लेकिन उन्हें प्रमाण पत्र काजल कुमार जी का दे दिया गया था. वे उसके बाद थोड़ी चिंतित दिखाई दी. उनका प्रमाण पत्र फिर मिल गया.मंच पर सम्मान ग्रहण करते नए-पुराने चेहरों ने ऐसी शमा बांधी कि आन्नद ही आ गया. खटीमा वाले परम मित्र शास्त्री जी ने मुझे बधाई दी, अच्छा लगा उनसे रूबरू होना. ब्लॉगर मित्रों से मिलन जारी रहा. आडोटोरियम के प्रवेश द्वार पर हिंदी निकेतन का स्टाल लगा हुआ था. जहाँ से ब्लॉगर्स को पुस्तकें दी जा रही थी और वहीँ पर पुस्तकों के लिए राशी भी जमा हो रही थी. मैंने और संगीता जी ने अपनी पुस्तकों की  बुकिंग राशी जमा करायी और हाल के अन्दर आ गए.

काजल कुमार जी कब आये और कब गए पता ही चला, दुसरे दिन उनका व्यंग्य चित्र देख कर समझ आया कि वे भी मौजूद थे. पहले तो सिर्फ एक जाट ही मिला करता था, नीरज जाट जी, इब तो एक जाट देवता (संदीप पवार) और मिला. नीरज ने खोपड़ी सफाचट करवा रखी थी.कहने लगा कि इस पे सोलर प्लेट लगवानी है. पहाड़ों पर बिजली की समस्या होती है. मोबाइल और कैमरे की बैटरी चार्ज नहीं होती तो बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है. सोलर प्लेट लगाने से बैटरी लगातार रिचार्ज होती रहेगी तो घुमने का आन्नद ही कुछ और होगा. यह पर्वतारोहियों और घुमतु लोगों के लिए एक बड़ी खोज है. जरुरत पड़ने पर इसकी एनर्जी से मेट्रो को भी चलाया जा सकता है. इस आइडिये को नीरज जाट को तुरंत पेटेंट करना चाहिए.अन्यथा अमेरिका पेटेंट करा सकता है. नहीं तो नूंए टापता रह ज्यागा.

भीतर हम चर्चा कर रहे थे, तभी खुशदीप भाई आये और मुझे बताया कि पुण्य प्रसून जी आ चुके हैं और बाहर गेट के पास हैं, चलिए उन्हें ले आते है.मैं,खुशदीप भाई, शाहनवाज सिद्धकी और संजीव तिवारी बाहर गेट पर आये. मैंने संजीव भाई से इस मौके की तश्वीर लेने कहा. पुण्य प्रसून जी दो नवोदित पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे. दोनों पत्रकार उनसे मिल कर बहुत ही उत्साहित थे. उन्होंने खुशदीप भाई को कहा कि समय का ध्यान नहीं रखा जा रहा है और मंच पर नेता जी को बैठा रखा है. खुशदीप भाई ने उन्हें भीतर आने का निवेदन किया. लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया. संजीव भाई तश्वीर लेने की बजाय आस-पास कहीं चले गए. तभी रणधीर सिंह सुमन जी आ गए. उनसे चर्चा हुयी और हम लोग चौक तक चाय पीने चले गए. उसके पश्चात वहां पर क्या घटा मुझे पता नहीं.

इसके पश्चात् चाय का समय हो गया. जहाँ चाय का इंतजाम था वहां बहुत भीड़ हो गयी. हम इंतजार में खड़े रहे. जब भीड़ कम हुयी तो नाश्ता ख़त्म हो चूका था. संजय भास्कर ने एक चाय लाकर मुझे दी. गुरुदेव कहने लगे "बेरा होगे हे महाराज, इंहे-कहीं दू दू ठीक मार लेथन, फेर टैम नई मिलय." मैं मुस्कुरा कर रह गया. अब नाटक शुरू होने वाला था. सब आडोटोरियम में पहुँच चुके थे. नाटक शुरू हुआ, एक-एक दृश्य पर ब्लॉगर्स के कमेन्ट आ रहे थे. "बेहतरीन, उम्दा, आपके अभिनय हम कायल है, सुन्दर प्रस्तुति, वाह वाह, कमाल कर दिया." और हम सुन-सुन कर हँसे जा रहे थे. ब्लॉगर्स हैं वहां टिप्पणियों की कमी नहीं रहेगी. भरपूर मिलेगी. नाटक के कलाकारों को भी भरपूर टिप्पणी मिली और साधुवाद. नाटक बढ़िया था. मनोरंजन हुआ.

नाटक समाप्ति के बाद भोजन के लिए चल पड़े. वहां भी लाइन लगी थी. लाइन में लग कर भोजन करना बहुत ही तकलीफदेह हो जाता है मेरे लिए,  इसलिए हम अन्दर ही बात करते रहे. संगीता जी, गिरीश दादा, पवन चन्दन जी, केवल राम चर्चाएँ चलती रही. गिरीश दादा संगीता जी से मिल कर अभिभूत हो गए और ताई आशीर्वाद दीजिये कह कर साष्टांग प्रणाम किया.हमने इस अवसर को कैमरे में कैद कर लिया. यहीं पर दिवेदी जी और संगीता जी की ज्योतिष चर्चा हुयी. फिर नीचे भोजन के लिए आ गए. लाइन कम हो गयी थी. हमें भी होटल तक जाना था. रात हो रही. ११ बजे के बाद ऑटो मिलने की भी संभावना नहीं थी. गिरीश दादा भी हमारे होटल में ही जाना चाहते थे.इसलिए उन्हें मिलाकर हम ६ हो गए. 

चलते चलते एक फोटो और ली गयी. भोजन करके होटल चलने के लिए वहां साधन देखते रहे, तभी खबर मिली की पद्म सिंग हमें होटल तक हमें छोड़ने जा रहे हैं, संगीता जी भी भाई के साथ कार से आई थी. हमने उन्हें भी रोक लिया.सवारी अधिक थी इसलिए दो गाड़ियों की जरुरत थी. कनाट प्लेस के बाद बसंत रोड वाले चक्कर पर हम लोग घूम गए..पद्म सिंह एक तरफ निकल गए और हम एक तरफ मैट्रो के साथ हो लिए. रास्ते में संगीता जी ने बताया की भाई साहब ने नयी कार ली है और एक महीने पहले ही चलाना सीखा है. मान गए उनके हौसले को, दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी चलाने के. पदम् सिंह भी इन्हें होटल पंहुचा आये थे. संगीता जी से विदा लेकर रात १२ बजे हम होटल पहुचे. सम्मान पत्र के साथ ५-५ किलो पुस्तकों का भी वजन था और उसे भी हमें ही उठाना था.

रात जब रूम में पहुचे तो गुरुदेव मुस्कुराये.२-२ हो गया था, चहरे पर मुस्कान कायम थी, आँखों की रौशनी बढ़ चुकी थी, अँधेरे में भी चंद्रकांता पढ़ रहे थे. कमाल की चीज है, सब मर्जों की एक दवाई...जहाँ दवा दुआ काम नहीं आई, वहां ये काम आई. इस तरह परिकल्पना उत्सव, हिंदी निकेतन, नुक्कड़ डोट कॉम की तरफ से हुए आयोजन के मूक दर्शक बने. मूक दर्शक इसलिए की परिकल्पना उत्सव के सहयोगियों का भी परिचय मंच से होना चाहिए था. कार्यक्रम गरिमामय रहा. ब्लॉग जगत के इतिहास में अभी तक तो कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं हुआ है.आडोटोरियम खचाखच भरा हुआ था. इसके लिए परिकल्पना ब्लॉग उत्सव, हिंदी निकेतन, नुक्कड़ डोट कॉम साधुवाद के पात्र है.ब्लोगोत्सव के पश्चात धडाधड प्रतिक्रियाने आने लगी, उत्तरी ध्रुव -दक्षिणी ध्रुव एक हो गए. अलबेला भाई की पोस्ट आ गयी. विरोध के स्वर भी मंडराने लगे. 

खुशदीप भाई ने भी गुस्सिया कर एक पोस्ट लिख मारी. हम सोच में पड़ गए, ये क्या हो रहा है भाई, इतना शोर शराबा काहे मचा है? क्या करते हम, धीरज धर कर बैठे रहे. तुलसी आज्ञा से -"धीरज धर्म मीत अरु नारी, आपात काल बिचारिये चारी." छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड,महाराष्ट्र, से ब्लॉगर्स पहुचे थे. परिकल्पना ब्लॉग उत्सव के माध्यम से हमें सभी ब्लॉगर्स से मिलने का मौका मिला और ऐसा कोई भी रसायन नहीं है जो सभी को संतुष्ट कर सके. हल्ले-गुल्ले से जाहिर होता है कि दिल्ली का ब्लॉग उत्सव सफल रहा. दिल्ली ब्लॉग उत्सव की सफलता पर चीयर्स करते हैं और मिलते हैं अगले ब्लॉगर मिलन में.. आपस में प्रेम करो, मेरे ब्लॉग प्रेमियों....  चीयर्स…।  आगे पढें

बुधवार, 18 मई 2011

1ड्राईवर-2 नेविगेटर-३ देवियाँ -हिंदी भवन की ओर-------ललित शर्मा

संजीव तिवारी जी 
आरम्भ से पढ़ें 
रूम में पहुचने पर अवधिया जी स्नान में लगे थे और संजीव भाई फोन पर.... सुनीता जी का फोन आ रहा था कि "आप लोग तैयार रहिये.मैं लेने आ रही हूँ". पवन जी भी फोन पर संपर्क में बने हुए थे. गिरीश दादा एयर पोर्ट पर इंतजार कर रहे थे कि कोई लेने आएगा... मैंने उन्हें कहा कि टेक्सी पकडिये और चले आइये. उन्होंने कहा कि महफूज अली ने कहा है कि वे सीधे एयर पोर्ट आयेगे. इधर महफूज ने फोन पर बताया कि उनकी गाड़ी लेट चल रही है. अभी आनंद बिहार में खड़ी है. मैंने गिरीश बुलेरो जी को कहा कि किसी का इंतजार न करें और सीधे चले आयें. नहीं तो एअरपोर्ट पर ही रह जायेंगे.

गर्म हवा
इधर कमरे में लगा ए.सी. काम नहीं कर रहा था. पंखे से भी गर्म हवा आ रही थी. पाबला एवं मेडम के भी कमरे का यही हाल था. शिकायत करने पर होटल का एक कर्मचारी आया और  उसने ए.सी में पानी डाला. अवधिया जी को  उसने कहा-"अब ठंडा हो जायेगा सर. थोडा इंतजार करें और कमरे का दरवाजा बंद कर लें. थोड़ी देर ठंडी हवा  आई और फिर ए.सी बंद हो गया. वो तो हमने एक मित्र को वचन दे दिया था कि अन्दर का ए.सी. नहीं चलाएंगे, वर्ना ८००/- देने की बजे १००/- में ही सब ठंडा हो जाता कूल-कूल, फिर चाहे पीपल के नीचे ही सो जाओ. ताजगी का अहसास ही रहता. आखिर हमने कमरा बदल दिया. लेकिन हाल वही रहा.

दोनों -पाण्डे
इधर खुशदीप भाई और सतीश जी का फोन आ गया, वे हमारा लोकेशन ले रहे थे. दिनेश राय दिवेदी जी, खुशदीप भाई, सतीश सक्सेना जी, और शाहनवाज़ जी हमारे होटल पहुच गए. पाबला जी से हाथ मिलाना मतलब अपना हाथ जान बूझ कर शिकंजे में देना  है और जो एक बार हाथ मिला लेता है. फिर दूर से ही राम राम कर लेता है. हम ठहरे अनाड़ी भुलक्कड बार-बार शिकंजे में हाथ दे देते है. मेरे दिमाग में यही था कि वे जान बुझ कर हाथ हो कस के दबाते हैं. तो क्या सभी के साथ यही करते हैं? जरा आजमा लिया जाये. सुनीता जी पहुची तो मैंने चुपचाप उन्हें पाबला जी से हाथ मिलाने कहा. जब उन्होंने पाबला जी कि ओर हाथ बढाया तो पाबला जी ने हाथ गीला है कह कर उल्टा कर दिया. मेरी परिक्षण करने की योजना धरी-धरी रह गयी.

तख्ते ताउस पर सीनियर ब्लॉगर
जब रायपुर से चले  थे तो अल्पना जी ने दिल्ली के एक-दो काम बताये थे. उन्हें चावडी बाजार कुछ खरीदना था. मैंने सोचा कि रविवार को दिन भर का समय है. खरीद लेगे. आज ब्लॉगर्स से ही मिल भेंट लिया जाये. सभी दूर-दूर से आये हैं. सुनीता जी के साथ उनके रथ में चल पड़े घर की ओर हमारे साथ  दिल्ली वाले साथी भी थे. घर पहुच कर सभी से मिले. नाश्ते का उम्दा इंतजाम था और मेजबान भी मेहमानों की खातिरदारी में मुस्तैद. समोसे, कचौरी, मिठाइयाँ, और  ढोकले भी थे. ये तो शाहनवाज जी की पोस्ट देखने से पता चलेगा. प्लेट की फोटो उन्होंने ही ली थी. अल्पना जी ने सुनीता जी से अपने सामान के बारे में बताया तो पता चला कि चावडी बाजार रविवार को बंद रहेगा. ब्लॉगर धमा-चौकड़ी में ३ बज चुके थे. हिंदी भवन का कार्यक्रम ३बजे शुरू होना था.इसलिए मज़बूरीवश काम कल पर टाल दिया और सभी चल दिए हिंदी भवन की ओर....

चर्चा जारी है
रस्ते में गाड़ी का ड्राईवर रविन्द्र भवन की ओर चला गया. इधर गाड़ी में ड्राईवर एक था और नेविगेटर दो थे. पाबला जी सामने की सीट पर बैठ कर मोबाइल पर रास्ता ढूंढ़ रहे थे और इधर संजीव तिवारी भी मोबाइल पर रास्ता बता रहे थे. दोनों के कॉम्पटीशन में ड्राईवर चकरा गया. इधर-उधर चक्कर काटते-काटते . सुनीता जी कह रही थी अल्पना जी को "आप भी पाण्डे और मैं  भी पाण्डे, इस लिहाज से दोनों बहन ही हुयी. हम बैक सीटर बने हुए पण्डे की तरह दोनों जजमानो का मुंह ताक रहे थे. काफी रस्सा कसी के बाद आखिर हम हिंदी भवन पहुच ही गए. सुनीता जी की दार्जलिंग की चाय का असर कुछ कम होने लगा था. हिंदी भवन के बाहर बेनर लगा हुआ था. अर्थात हम सही जगह पर थे. अन्दर पहुचने पर हाल भर चूका था. ई पंडित जी का प्रवचन चल रहा. बिना पंडित के प्रवचन के कोई भी शुभ काम नहीं होता हमारे देश में. अग्रे अग्रे ब्राह्मणा:

ओ तेरे क्या कहने - दूर दृष्टि
हमने पांचवी छटवी पंक्ति की सीट संभाली, आगे सीटों पे आरक्षित का बोर्ड लगा था. फिर पहले आओ और पहले पाओ वाला सिस्टम सब जगह लागु है.  संगीता स्वरूप जी एवं स्वरूप जी से राम-राम हुयी और हम भी उसी पंक्ति में जम गए केवल राम के साथ. तभी रतन सिंग जी भी आ गए. उनसे मैंने उबंटू की सीडी मंगाई थी और वे वादे के अनुसार लाये भी थे. स्टेज पर रविन्द्र जी झमाझम शेरवानी जैसे कुरते पैजामे में बारात के दुल्हे की तरह जाँच रहे थे. अविनाश जी काम के बोझ के तले दबे थे. कार्यक्रम बड़ा था, बोझ तो होना ही था और इतने सारे ब्लॉगर इकट्ठे कर लेना और उनके आगामी वारों को झेलने के लिए तैयार रहना कोई मामूली बात नहीं है. राजीव तनेजा जी तो बाहर ही मिल गए थे. मुस्कुराता हुआ दमकता चेहरा कोई कैसे भूल सकता है. एम.एम. वर्मा जी से भी एक वर्ष में मुलाकात हुयी.पवन चन्दन जी आरक्षित सीट पर विराजमान थे.

एक पंक्ति में तीन देवियाँ संजू भाभी, संगीता पुरी जी, बंदना जी, विराजमान थी. सभी से नमस्ते हुयी. मैंने एक चक्कर लगा कर सभी से मिलने की कोशिश की. थोड़ी देर में गोलियों के सौदागर लव बाय महफूज भी पहुच गए . महफूज मेरे पास ही आकर बैठ गए. सामने खुशदीप भाई, निर्मला जी विराजमान थे. पीछे पाबला जी और अजय झा जी. सामने कुछ धुरंधर ब्लॉगर भी थे. गिरीश दादा और पद्म सिंह बम बजर पर लगे हुए थे. इन सब ब्लॉगर्स को ही पहचानते थे. बाकि तो प्रायोजकों को तो हमने पहचाना नहीं था.मुख्यमंत्री के आने में कुछ विलम्ब था. इसलिए मंच से घोषणाएं चल रही थी. थोड़ी देर में सुगबुगाहट हुयी तो समझ गए की मुख्यमंत्री जी पहुच रहे है. उनके आते ही पावर पॉइंट प्रजेंटेशन शुरू हुआ. तब यही लगा कि कार्यक्रम ब्लॉगर्स का न होकर प्रकाशन का है. लेकिन थोड़ी ही देर में धुंध छंट गयी और कार्यक्रम ब्लॉगर्स के हाथ में पहुँच गया.सभी के साथ हमने भी तसल्ली की गहरी साँस ली.

आसंदी पर मुख्यमंत्री के साथ प्रख्यात कवि अशोक चक्रधर, श्री रामदरश मिश्र जी, श्री प्रभाकर श्रोत्रिय जी, गिरिराज शरण अग्रवाल जी एवं दो अन्य महानुभाव शोभायमान थे. कार्यक्रम दो घंटे विलम्ब से प्रारंभ हुआ. कुछ पुस्तकों का धडाधड विमोचन हुआ. इसके पश्चात सम्मान होने लगे. ब्लॉगर आपस में चर्चिया रहे थे. मिलन होने पर एक दुसरे से रु-ब-रु हो रहे थे. जय कुमार झा जी से पुन: भेंट हुयी. कुछ भी हो अपने मिशन के पक्के हैं. उनके जज्बे को सलाम है..

खुशदीप सहगल, मोहिंदर कुमार जी
जब मैं पीछे की और गया तो डॉ.दराल भाई साहब नज़र आये. उनसे आशीर्वाद लिया. प्रसन्न मुदित मन से उन्होंने गले लगा लिया. एक चित्र भी राजीव भाई ने लिया. बलबीर पुंज हरियाणा वाले और ई पंडित जमुना नगर, दीपक बाबा, राजीव कुमार जी, अरुण राय जी से पहली बार मुलाकात हुयी. मेरे सामने खुशदीप भाई के साथ  बैठे एक ब्लॉगर को पहचानने की कोशिश करता रहा, लेकिन नाम याद नहीं आया, वे मुड़ कर पीछे देखते थे, लेकिन हम दोनों में से किसी ने परिचय करने की जहमत नहीं उठाई. खुशदीप भाई ने भी परिचय नहीं कराया. घर आ कर याद आया की मोहिंदर कुमार जी थे :). इनसे मेरी कई बार बात भी हो चुकी थी. क्या करें? फ्लाईट की सवारियों का यही हाल होता है...........  आगे पढें…