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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

भूटान में पहला दिन : भूटान यात्रा 3

प्रारम्भ से पढ़ें 
मिड टाऊन होटल पांच मंजिला था। रुम औसत दर्जे के ही थे। हमारे पहुंचने तक गरम पानी आना बंद हो गया था। होटल के साथ बार रुम भी अटैच था और उसके पीछे तरणताल भी। उपर कमरे की खिड़की से तरण ताल का पानी नीला और सुंदर दिखाई दे रहा था। कुछ बच्चे पानी में उछल कूद कर रहे थे। उनके साथ दो-चार बड़े बच्चे भी थे। मेरी इच्छा तरणताल में कुछ समय गुजारने की थी परन्तु वातावरण में ठंडक थी और सांझ ढलने के साथ टेम्परेचर भी  मायनस में जाने वाला था। पर कुछ जुगाड़ लगा कर मैने तरणताल में छलांग लगा ही दी। ओह … पानी इतना ठंडा था कि एक बार तो सांस बंद होने को आ गई। जल्दी जल्दी पानी में हाथ पैर मारे और इस कोने से उस कोने तक 5 बार तैराकी की। शरीर में कुछ गर्माहट बनी। पर पानी बर्फ़ जैसा ही रहा।
होटल मिड टाऊन एवं गगन शर्मा जी
हमारे साथी मुझे पानी में तैरते देख कर उत्साहित हो गए। पूछने लगे पानी कैसा है? मैने कह दिया कि गुनगुना है और थोड़ा जलकिलोल करके दिखाया तो उन्हे विश्वास हो गया। अब वे भी धड़ाम धड़ाम। कूदते ही उनकी नानी याद आ गई। बहुत ठंडा पानी है, आपने धोखा दिया है शर्मा जी। अरे मैने तुम्हें कहा धोखा दिया। अगर मैं कहूंगा तो तुम बिल्डिंग से कूद जाओगे क्या? जब तक व्यक्ति के मन में इच्छा का अंकुरण नहीं होता तब तक वह किसी काम को नहीं करता। तुम्हारे मन में थी स्वीमिंग पुल में नहाने की इच्छा। बस उसे मैने थोड़ी सी हवा दी है। इतनी देर में तरणताल का केयर टेकर आ गया और चिल्लाने लगा कि यहाँ तैरने के लिए ड्रेस कोड है, आप लोग कुछ भी पहन कर कूद गए पानी में। भाई हमने तो अंडर वियर पहन रखी है, अब बिकनी वाला कास्ट्यूम ये लोग कहां से लाएं। इसी में काम चलाओ। ठंड के कारण अधिक देर पानी में नहीं रहे। मै तो रुम में आकर बिस्तर में घुस गया और एक नींद जम कर ली। अगलों की राम जाने।
फ़्यूसलिंग की सुहानी सांझ 
जब नींद खुली तो सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। होटल की बालकनी से नदी के किनारे डूबता हुआ सूरज बहुत ही खूबसूरत छटा बिखेर रहा था। शनै: शनै: रात हो रही थी। खाने के समय तक गिरीश पंकज जी भी आ चुके थे। उनका कहना था कि उत्तर प्रदेश वालों की ट्रेन 9 घंटे विलंबित है इसलिए मुझे बस से भेज दिया। रात को ठंड बढ चुकी थी और केटरिंग वाले ने सब्जी, दाल सब में मीठा डाल दिया था। एक तरह का गुजराती खाना बना दिया। मेरा मन नहीं था खाने का। होटल का रेस्टोरेंट भी बंद हो चुका था। अब खाने में कोई मजा नहीं रहा। मैने अपने पास रखे कुछ फ़ल खाए और बिस्तर के हवाले हो गए। रात को सोना भी जरुरी है। आगे के सफ़र का कुछ पता नहीं था। हमें सोने के पहले बता दिया गया था कि सुबह 7 बजे यहां से बस थिम्पू के लिए रवाना हो जाएगी। सभी को समय पर ही तैयार रहना है।
फ़्युशलिंग का प्रवेश द्वार
सुबह रुम में चाय दी गई। इस होटल के सभी कर्मचारी भारतीय ही थे। मैने अपनी आई डी देकर भूटान का एक टुरिस्ट सिम मंगवाया। इसमें 220 रुपए खर्च हुए। होटल के मैनेजर ने बताया कि इस सिम में आपका नेट भी चलेगा और सिम की वैलीडिटी एक माह थी। नेट चलने की बात सुनकर मैं खुश हो गया कि सभी से सतत सम्पर्क बना रहेगा। पर आखिर में यह एक छलावा ही निकला। कहीं पर भी नेट नहीं चला और 220 रुपए गए मुफ़्त में ही पानी में। उत्तर प्रदेश से आने वाला दल रात को पहुंच चुका था, इसमें पूर्व परिचित डॉ रामबहादूर मिश्र जी, रणधीर सिंह सुमन जी और मनोज पाण्डे जी ही थे। बाकी सभी नए लोग थे। जिनसे मैं परिचित नहीं था। परिचय से पहले व्यक्ति नया ही होता है। परिचय पश्चात सौ जान-पहचान एवं रिश्तेदारियाँ निकल आती है। यही हमारी भारतीयता और भारतीय संस्कृति है।
श्री ओमप्रकाश जयंत, डॉ राम बहादूर मिश्र, श्री बिसम्भर शर्मा, श्री गिरीश पंकज, श्री रणधीर सिंह सुमन, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री समर बहादुर एवं निसिहर जी
नाश्ते के उपरांत सभी का सामान बस में चढ़ा कर बांद दिया गया। सभी ने बस में अपना स्थान ग्रहण कर लिया। अब छत्तीसगढ़ एवं उत्तर प्रदेश को मिलाकर कुल 18 नग सवारियाँ हो चुकी थी, ट्रैवल एजेंट रजत मंडल हमारे साथ ही थे। इस तरह भूटान यात्रा के लिए कुल 19 लोगों का परमिट बना था जो थिम्पू और पारो की 15 जनवरी से 18 जनवरी तक 4 दिन की यात्रा करेगा। यह परमिट में दर्ज किया गया था। हमारी बस अब थिम्पू के लिए चल पड़ी। थोड़ी दूर जाने के बाद रास्ते में जांच चौकी आई। जहाँ हम सब के परमिट की जांच कर मुहर लगाई गई । अब इससे आगे बस चल पड़ी। बस में बहुत ही अधिक विस्फ़ोटक सामग्री भरी हुई थी। एक-एक कवि बड़े परमाणू बम की मारक क्षमता रखता है। :) सारे असलहा जांच बच गया :)। अगर भूटान के अधिकारियों को पता चलता कि कवि आ रहे हैं तो शायद परमिटानुमति ही नहीं मिलती। इतनी सारी विस्फ़ोटक सामग्री के सामने भूटान की क्या बिसात है? :)
भूटान के सहचर - कुछ जागते कुछ ऊंघते
सफ़र के दौरान काव्य गोष्ठी का आयोजन भी कर लिया गया। जिसके संचालन की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी गई। इस बहाने एक दूसरे के साथ परिचय भी हो रहा था और उनकी काव्य प्रतिभा का भी स्वाद मिल रहा था। ये सभी हिन्दी भाषा के साथ अवधि के भी अच्छे कवि थे। कार्यक्रम का प्रारंभ गिरीश पंकज जी की गजल से किया गया। इसके पश्चात ओमप्रकाश जयंत, डॉ अशोक गुलशन, डॉ विनय दास, श्री बिसम्भर शर्मा,  निसिहर जी, कुसुम वर्मा, के साथ गगन शर्मा जी ने भी पुराने गीत गाए। अरविंद देशपांडे में भौंक कर कुत्ते की मिमिक्री कर के सबका मनोरंजन किया। मैने भी एक दो हिन्दी छत्तीसगढ़ी कविताएं मौका पाकर पेल दी। इस तरह मनोरंजन के साथ सफ़र कटते रहा। हमारा रास्ते का खाना पैक करके लाया गया था। एक स्थान पर सभी लोग खाना दिया गया। लोगों ने खाने बाद खाली पैकेट वहीं पर फ़ेंक दिए तो वहां रहने वाले भूटानी नाराज हो गए। उसने डिब्बा लाकर दिया और सारा कचरा उसमें फ़ेंकने कहा। यह भारत नहीं है कि कहीं भी हग दिए और मूत दिए।
चलित काव्य गोष्ठी में कुसुम वर्मा जी सोहर गाते हुए
भूटान में पर्यावरण की तरफ़ विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ सावर्जनिक स्थानों पर कचरा फ़ैलाने पर कठोर दंड दिया जाता है जिसमें जुर्माने के साथ सश्रम कारावास की भी सजा है। अब हमारे भोले साथियों को कौन सा भूटान के कानूनों का इल्म था। जहाँ खाए, वहीं फ़ेंके। आखिर में सभी ने अपना कचरा समेट कर डिब्बे के हवाले किया। भोजनोपरांत हम थिम्पू की ओर बढ़ चले। पहाड़ी रास्ते को किलोमीटर में नहीं, घंटे मे नापा जाता है। 4 घंटे के सफ़र के बाद सभी की बैटरी डाऊन हो गई और सीटों से लग गए। सफ़र लम्बा था। थिम्पू प्रवेश करने के पूर्व एक स्थान पर पुन: परमिट चेक किए गए और मुहर मार कर विदा किया गया। यहाँ पर जांच चौकी वाले देखते हैं कि पर्यटकों के अलावा कोई अवांछित तत्व भूटान में प्रवेश न कर जाए। मजदूर टाईप के व्यक्तियों को भूटान में प्रवेश नहीं दिया जाता। क्योंकि ये भूटान में आकर मजदूरी करने लगते हैं और यहाँ की नस्ल को भी बिगाड़ते हैं। भूटान का शासन अपनी नस्ल की शुद्धता के विषय में अत्यधिक जागरुक है।
हमारी बस का पायलट परम्परागत भूटानी वेष में, संग डॉ विनय दास जी
आखिरकार हमने थिम्पू में प्रवेश कर लिया। उस समय सांझ हो रही थी। हमारा अस्थाई निवास एक ऊंची पहाड़ी पर बना वांगचुंग रिसोर्ट था। यह रिसोर्ट ताबा में स्थित है। सुंदर ब्लू पाईन के वृक्षों से घिरा रिसोर्ट बहुत ही सुंदर है। इसके साथ इसमें एक कांफ़्रेस हाल भी है। रिसोर्ट में पहुंचने के बाद हमें अपने-अपने रुम की चाबियाँ थमा दी गई। रुम भी बहुत सुंदर डेकोरेटेड थे। प्रत्येक रुम में हीटर वाला बेड एवं चाय की केटली के साथ आवश्यक सभी वस्तुए उपलब्ध थी। हमारे पहुंचने से पूर्व फ़्लाईट से आने वाले साथी भी पारो से आ चुके थे। पहुंचते ही शाम को नास्ते का इंतजाम था। इस दौरान ही अन्य पुराने साथियों से भेंट हुई, जिसमें संपत मुरारका जी, सुनीता यादव जी, कृष्णकुमार यादव जी, रविंद प्रभात जी एवं उनकी बेटी जवांई थे। इंदौर से प्रकाश हिन्दूस्तानी जी, दिल्ली से ब्लॉगर सर्जना शर्मा जी एवं सिलचर से प्रो नित्यानंद पाण्डे एवं उनकी धर्मपत्नी शुभदा पाण्डे जी भी थी। सभी से परिचयोपरांत बताया गया कि आज कोई कार्यक्रम नहीं है, शाम को आपको मार्केट घुमाया जाएगा, फ़िर खाना और सोना ही है, बाकी कार्यक्रम अगले दिन किया जाएगा।
कल के बिछड़े हुए हम आज यहाँ आ के मिले ( ललित शर्मा-सुनीता यादव-कृष्ण कुमार यादव)
थिम्पू की मार्केट अधिक बड़ी नहीं है, होटल ताज से लेकर मुख्यचौराहे तक सड़क एक तरफ़ दुकाने बनी हुई हैं। जिनमें अधिकतर मालकिने ही दिखाई देती हैं। जैसी अन्य टुरिस्ट स्थानों पर दुकाने होती है वैसी ही मुझे यहाँ भी दिखाई दी। सामान का मुल्य भी सामान्य से अधिक दिखाई दिया। मेरा कैमरा काम नहीं कर रहा था इसलिए मुझे सेल लेने थे। आखिर मोल भाव करने के बाद मुझे 800 रुपए में 4 सेल लेने पड़े। मुझे कैमरा चालू करना बहुत ही आवश्यक था। बाजार में गर्म कपड़ों का मूल्य भी बहुत अधिक था। सुनीता ने एक-दो लेदर के जैकेट खरीदे। मुझे तो बच्चों का नाप ही याद नहीं रहता। इसलिए बाहर से कोई भी सामान खरीदने का रिस्क नहीं लेता। धीरे-धीरे बाजार घूमते हुए रात होने लगी और बस ड्रायवर का फ़ोन आने लगा। नई जगह में किसी तरह एक स्थान पर एकत्रित हुए और पुन: रिसोर्ट में आ गए। ……… जारी है, आगे पढ़ें 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

करंज का बोधिवृक्ष: सोधी खोकर बोधि की ओर …………

रात तो गुजर गई, आँख खूली तब हिरण्यगर्भ के स्वर्णिम प्रकाश से शयनकक्ष परिपूरित था। घड़ी की ओर निगाहें फ़ेरी तो उसने 8 बजने के संकेत दिए। आज तो इन्तिहा हो गई, काफ़ी देर के बाद जागा। बिस्तर से उठने का मन नहीं, लग रहा था जैसे कंधों का भारी बोझ उठने नहीं दे रहा। कंधे ही क्यों रोम-रोम बोझिल था। बोझ ही नहीं, रग-रग दर्द से टूट रही थी। दर्द अहसास दिला रहा था कि अर्थी का बोझ उठाना देह के लिए बहुत पीड़ादेयक होता है। जब अर्थी अरमानों की हो तो पीड़ा का बोध नहीं हो पाता देह को। संज्ञाहीन देह को हिरण्यमय स्वर्णिम किरणों ने सींच कर पुष्ट किया, देह में रक्त संचार होने से बिस्तर छोड़ने का मन हुआ। बिछौना बनी देह जागृत हो गई।

अबीदा परवीन को सुनने का मन हुआ, जब वो "इक नुक्ते विच गल मुकदीए" … गहरे उतर कर गाती है तो लगता है कि सुर और साज एक हो गए। इश्क-ए-हकीकी सुनकर चेतना जागृत हो सातवें आसमान पे होती है और अवचेतन के पट भी खुल जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कभी कबीर, दादू, बुल्लेशाह के सहज ही खुल गए होगें। वरना सारी जिन्दगी साज ठोक-पीट कर सुर मिलाने में ही निकल जाती है। बार-बार गला खखारने के बाद भी सुर और साज कहाँ मिल पाते हैं मेरे से। कभी बहर छोटी पड़ जाती है तो कभी काफ़िया नहीं मिल पाता। कभी नुक्ते का झोल, क्या जिंदगी है। जब जिंदगी एक नुक्ते का ही खेल है तो इस काली बिंदी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है…… इक नुक्ते विच गल मुकदीए…… शायद तभी कहा गया है "इक नुक्ते से खुदा, ज़ुदा होता है। बड़ा झोल है जीवन में, मीत मिताई मिलाई का।

उम्दा कलाम के नशे की गिरफ़्त में सरकते हुए करंज के पेड़ की घनी छांव में कुर्सी पर पसर जाता हूँ, उत्तमार्ध चाय बनाकर ले आती है, मुझे जागे हुए देख कर। चाय का कप हाथ में लेते ही लगता है कि चारों धाम की परिक्रमा पूरी हो गई। प्रेम का रस चाय में मीठे का काम करता है, वरना मेरी चाय भी बेस्वाद हो गई। तुलसी की पवित्र पत्तियों से युक्त भाप सर्दी से बंद नथूने खोल देती है, गंगा-नर्मदा का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है, लगा अंतर से झरना फ़ूट पड़ा, जहाँ प्रेम का सोता फ़ूट पड़े समझो रब वहीं मिल गया। बुद्धत्व की प्राप्ति हो गई। करंज का वृक्ष मेरे लिए बोधिवृक्ष हो गया। सोधी खोकर बोधि को प्राप्त करना प्रचंड उपलब्धि हो सकती है, बस बात एक नुक्ते ही है। 

नुक्ता ही जीवन में कसौटी पर कसा जाता है। नुक्ता ही क्यों जूते भी मुझे सहन शक्ति की कसौटी पर कस रहे हैं। पहाड़ियों की पथरीली चढ़ाई को ध्यान में रख कर मोटे तले के खरीद लिए थे। उन्होने 2-3 सफ़र में ही मुझे तले से लगा दिया। कल रात जब से उन्हे पैरों से जुदा किया तब से तलवे भड़ककर आग बबूले हो रहे हैं। अगर मोचड़ी होती या भंदई होती तो छाछ में डूबा कर तेल पिला देता है। कम से कम तलवों को ठंडक मिलती और जूतों की सद्गति हो जाती। मशीनी जूतों में ये संभव नहीं है। अगर पाँव सलामत रहे तो जूते जीवन पर्यंत साथ निभाते हैं। जब मानव संतान धरती पर लड़खड़ाते कदमों से चलने लगती है तो जूते ही उसके चरणों के रक्षक बन प्रथम सहचर होते हैं फ़िर ताउम्र सांस छूटते तक साथ निभाते हैं, बिना वादा किए ही। किए गए वादे थोड़ी सी धूप पड़ने पर कुम्हलाकर फ़ना हो जाते हैं। 

क्या सोच रहे हो? कुछ नहीं। चाय ठंडी हो रही है? हाँ! हो तो गई है। सोच रहा हूँ कुछ दिन आराम करुं गालिब की तरह…… रहिए अब ऐसी जगह, चलकर जहाँ कोई न हो। हम सुखन कोई न हो और जुंबा कोई न हो। दिमाग भी खाली हो और मन भी स्थिर, चित्त विश्राम में। नींद ऐसी आ जाए कि सुबह होने पर तरोताजा हो जाऊं, हिरणों के छौने की तरह कुलाचें मारता फ़िरूँ। 10 मील बिना रुके लगातार दौड़ता जाऊं। किसी को यह बताने की जरुरत न पड़े कि फ़लां फ़लाँ तेल की चम्पी से एकदम तरोतजा हो सकते हैं। जैसमीन की खुश्बू वातावरण में फ़ैल रही है। सारे वजूद पर छाते जा रही है। लम्बी सांस लेकर उसे फ़ेफ़ड़ों में भर लेना चाहता हूँ जिससे वो मेरी रगों में दौड़ने लगे ताजगी बन कर।

कहाँ आराम है जिन्दगी में? बस चलते ही जाना और चलते ही जाना। पता नहीं कितने जन्मों तक निरंतर-अनवरत। गौरेया की चहचहाट के बीच करंज के पेड़ पर बैठे कौंवे भी सुर मिलाने के पुरजोर प्रयास में लगे हैं। सुर मिल जाए तो सद्गति हो जाए। कौंवे आदत से, प्रवृत्ति से मजबूर हैं। सोधी खोए हुए बोधि प्राप्ताकांक्षी पर भिष्ठा और बींठ डाल कर भाग जाते हैं। यही परीक्षा की घड़ी होती है यायावर के लिए। वह कौवों की कारस्तानी को ध्यान दिए बगैर सोधी से बोधि की ओर चलता रहे। जिस दिन बोधि की उपसम्पदा मिल गई, उस दिन के बाद आराम करने की जरुरत ही नहीं  होगी। काफ़िया मिल जाएगा, बहर सूत में होगी। नुक्ता सही जगह लगेगा। जिन्दगी गजल हो जाएगी। इक नुक्ते से गल मुक जाएगी……… देह तरोताजा हो जाएगी, आगे के सफ़र के लिए………। 

सोमवार, 28 जनवरी 2013

बौद्ध मठ एवं तिब्बती औषधालय Manpat


सुबह जल्दी हो गयी, सूर्योदय हो रहा था। सूर्योदय का यही नजारा देखने हम जल्दी उठे थे। ठंड ऐसी थी कि रुम से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था। पंकज पहले ही उठकर जोगिंग के लिए जा चुका था। मेरे बाईं तरफ़ सूर्योदय हो रहा था, पहाड़ियों के बीच से। आज धुंध भी अच्छी थी। सूर्योदय की लालिमा क्षीतिज पर बिखर कर अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रही थी। पंकज जोगिंग से लौट आया था और राहुत बिस्तर में ही था। चौकिदार से नहाने लिए गर्म पानी करने कहा। मैं आँवले की दातौन तोड़ी। सुबह दातौन करने में ही मजा है। दांत भी स्वस्थ रहते हैं और स्वास्थ्य भी उत्तम बना रहता है। एक घंटे में हम नहा धोकर तैयार हो गए। क्योंकि आज लौटने का दिन था।
सूर्योदय
इस जंगल में साही भी हैं। जिसके कांटे यत्र-तत्र बिखरे पड़े रहते हैं। साही का कांटा बहुत नुकीला और हड्डी के जैसा मजबूत होता है। चौकिदार कहीं से एक कांटा उठा लाया था। काले और भूरे रंग का कांटा खूबसुरत दिखाई देता है। साही अपने प्राणों की रक्षा इसी से ही करती है। ग्रामीण इससे टोटका भी करते हैं। कहते हैं कि साही के दो कांटे किसी के घर के दरवाजे की चौखट दोनो तरफ़ लगा दिए जाएं तो उसके घर में कलह प्रारंभ हो जाता है। जब तक कांटे वहाँ रहेगे तब तक कलह जारी रहेगा। खैर हमने तो कभी प्रयोग करके देखा नहीं और न ही प्रयोग करने का मन है। क्यों किसी बेचारे के घर में कलह कराया जाए। सोच रहा था कि यदि इसका उपयोग ब्लॉग पर होता तो किसी के ब्लॉग टेम्पलेट के दोनो तरफ़ खोंच देते और मौज लेते रहते। :)
मेहता पाईंट का रेस्ट हाउस
रेस्ट हाऊस से चलते-चलते लगभग 9 बज गए। यहाँ से हमें कैम्प नम्बर 1 के बौद्ध मठ एवं तिब्बति दवाखाना देखना था। मर्करी रिसोर्ट से आगे चलने पर कैम्प नम्बर एक आता है। सबसे पहले हमें तिब्बती औषधालय दिखाई दिय। एक व्यक्ति वहाँ झाड़ू लगा रहा था। डॉक्टर के विषय में पूछने पर वह किसी को बुलाने गया। एक तिब्बती बाहर निकल कर आया और बोला कि डॉक्टर साहब नहीं है वे धर्मशाला गए हैं। मैने थोड़ी देर अस्पताल का निरीक्षण किया। आम अस्पतालों जैसे ही यहाँ भी रजिस्ट्रेशन काऊंटर, ओपीडी, दवाई देने का स्थान एवं औषधालय बना रखा था। 
तिब्बती औषधालय
मेरी जिज्ञासा थी कि जिस तरह चीन में पशु पक्षियों के मांस, मज्जा, रक्त इत्यादि से दवाईयाँ तैयार की जाती है। उसी तरह की दवाईयाँ देखने मिलेगीं पर यहाँ तो शीशियों में बंद गोलियाँ ही दिखाई दी। सारी गोलियाँ एक जैसी थी और उनका रंग भी सभी शीशियों पर तिब्बती भाषा में पहचान लिखी थी। शायद वह व्यक्ति कम्पाऊंडर था। मेरे पूछने पर कहने लगा कि डॉक्टर साहब जिस दवाई का नाम बताते हैं वह मरीजों को निकाल कर दे देते हैं। मुझे नहीं पता कि कौन सी दवाई किस मर्ज में काम आती  है। डॉक्टर होते तो दो चार बीमारियों की तिब्बती चिकित्सा पर बात होती लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
लामा
औषधालय थोड़ा आगे चलकर बांए हाथ पर केन्द्रीय विद्यालय है जहाँ पर 8 वीं तक तिब्बतियों के बच्चे पढते है। रास्ते में एक शिक्षिका बच्चों को स्कूल ले जाती हुई दिखाई दी। आगे बढने पर दांए हाथ की तरफ़ के रास्ते में थोड़ी दूर चलने पर बौद्ध मठ दिखाई देता है। हमने कार वहीं दरवाजे पर खड़ी  की और बौद्ध मठ में पहुंचे। बौद्ध मठों में चटख गहरे रंगों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ पर भी चित्रकारी उन्ही रंगों  का प्रयोग किया गया है। मठ में प्रवेश करने पर युवा लामा से मुलाकात होती है। 50 बरस हो गए तिब्बतियों को भारत में लेकिन हिन्दी अभी तक नहीं सीख पाए हैं। बोलेगें तो वही हमेशा की तरह टूटी फ़ूटी। जिसे समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। दो स्थानों पर गुरु गद्दी जैसी बनाई गई है जिसके सामने चाँदी की थाली में एक घंटी रखी है उसमें चावल और रुपए चढाए गए हैं।
इस पर ही चावल और रुपया चढाते हैं
पीछे वाली गद्दी के पास इस घंटी के अतिरिक्त एक पात्र भी रखा है। तभी एक तिब्बती आता है उसके हाथ में इम्पिरियल ब्लू का क्वाटर है। गद्दी को प्रणाम कर 10 रुपए का नोट चढाता है और शीशी खोल कर पात्र में मद्यपेय अर्पण कर देता है। इस प्रक्रिया को राहुल दृष्टि गड़ाए हुए देख रहा था कि ये कैसा मठ है जहाँ एक पात्र रखा है और उसमें दारु दारु डाली जा रही है। शाम तक तो लामा महाराज का फ़ुल इंतजाम हो जाता होगा टुन्न होने का। उससे रहा नहीं गया तो लामा से पूछ ही लिया। लामा ने बताया कि वह दारु नहीं चाय है। तिब्बती सुबह चाय लेकर आते हैं और इस पात्र में डाल देते हैं। सामने ही वज्र रखा था। ठीक वैसा ही वज्र जैसा सिरपुर में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ है। इससे जाहिर होता है बौद्ध मठों में धातू का वज्र एवं घंटी रखने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। 
वज्र एवं घंटी- ऐसा ही सिरपुर के उत्खनन में प्राप्त हुआ
मठ में बड़े आकार के तिब्बती लामाओं द्वारा पहने जाने वाले टोपे रखे हैं। राहुल एक टोपा पहन कर फ़ोटो खिंचाना चाहता था। परन्तु लामा ने मना कर दिया कि आप उसके पात्र नहीं है। इसे दीक्षित लामा ही पहन सकते हैं। मठ के प्रांगण में सौर उर्जा से भोजन इत्यादि पकाने का चलित सौर उर्जा यंत्र रखा हुआ है। इसे सूर्य की किरणो को परवर्तित करने के लिए चलित बनाया गया है। डिस्क जैसी छतरी उपर-नीचे और अगल-बगल घुमाई जा सकती है। इसके मध्य में एक बर्तन रखा हुआ है। जिसमें पकाने वाली सामग्री रखी जाती है। बौद्ध मठ से निकल कर हम बस स्टैंड पहुंचते है, यहाँ एक होटल में गर्मा गरम आलु गुंडे बन रहे थे। सुबह का नाश्ता हमने यहीं पर किया। आलु गुंडे के साथ टमाटर और हरी मिर्च की चटनी बहुत ही उम्दा थी। मजा आ गया नाश्ता करके। अब हम यहाँ से अम्बिकापुर की ओर चल पड़े। जहाँ अमित सिंह देव से मुलाकात होनी थी और आगे की यात्रा में चलना था। आगे पढ़ें 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

करबीन टीले में दबे (unexplore) प्राचीन युगल मंदिर ..Sirpur Chhattisgarh......... ललित शर्मा

अवैध कटाई 
प्राम्भ से पढ़ें 
रबा-करबीन टीला के विषय में प्रभात सिंह से पूर्व में चर्चा हुई थी। पूर्व में जब सिरपुर आया था तो समय नहीं था कि सभी जगहों पर जा सकूँ। इस दौरे में हमने दो दिन निर्धारित किये थे।दिन में भ्रमण करना और रात में देखी गयी जगहों पर चर्चा करना। इन दो दिनों में विभिन्न विषयों पर खूब चर्चा हुयी। तीवरदेव विहार परिसर में बौद्ध भिक्षुणियों के लिए निवास के लिए पृथक व्यवस्था थी। जहाँ तक देखा गया है सन्यासियों के साध्वियों के निवास नहीं रहते। महिलाओं को विहारों में निवास को अनुमति बुद्ध ने ही दी थी और अनुमति देते हुए अपने शिष्य आनंद से  कहा था ..... आनंद! मैंने जो धर्म चलाया वह पांच हजार वर्ष तक टिकने वाला था लेकिन अब वह सिर्फ पांच सौ वर्ष तक ही चलेगा, क्योंकि हमने स्त्रियों को संघ में शामिल होने की प्रथा चला दी है।"

जंगल के राही, प्रभात सिंह और राजीव 
सिरपुर से लगभग 5-6 किलोमीटर दक्षिण में मुख्य मार्ग से लगभग आधे किलोमीटर पर करबीन तालाब है। छत्तीसगढ़ी में करबा-करबीन हिजड़ों को कहा जाता है। अनुमान है सिरपुर राजधानी में हिजड़ों के निवास की व्यवस्था आम रिहायश से पृथक होगी या इस तालाब का निर्माण किसी हिजड़े ने कराया होगा या हिजड़ों के निवास के समीप होने के कारण इस तालाबा का नाम करबिन तालाब रूढ़ हुआ होगा। मुख्य मार्ग से जंगल में जाने के लिए कार का मार्ग नहीं है। हमने कार सड़क पर ही छोड़ दी और पैदल ही जंगल में प्रवेश कर गए। नई जगह देखने का लालच यहाँ तक खींच लाया था। धूप सिर पर चढ़ रही थी। बरसात के मौसम में विभिन्न तरह के कीटों का जन्म होता है, कुछ का प्रजनन काल बरसात के बाद शरद के मौसम में। इनमे मकड़ियाँ प्रमुख हैं, जगह-जगह बड़ी-बड़ी मकड़ियों ने जले बना रखे हैं। इनसे बचते हुए चलना जरुरी है, अन्यथा थोडा सा भी मकड़ी का जहर विकलांग बनाने के लिए काफी है।

शिव मंदिर के भग्नावशेष - स्तम्भ 
जंगल में लकड़ियों की चोरी वन विभाग के सहयोग से बेखटके होती है, पहले वृक्ष को सुखा लिया जाता है, जड़ कमजोर होने पर काट कर इस्तेमाल कर लेते हैं। अगर कोई दबंग है तो हरे-भरे वृक्ष ही ईमारती लकड़ी में तब्दील हो जाते हैं। ऐसा ही नजारा हमें जंगल में दिखाई दिया। एक जगह बीजा का वृक्ष काट कर पटक रखा था। समय मिलते ही उसे पार किया जाएगा। आगे चलने पर कुछ वृक्ष और कटे दिखाई दिए। करबीन तालाब का दृश्य मनोहारी लगा। तालाब में कमल-कुमुदिनी खिले हुए थे। उसके आस पास की झाड़ियों में पिकनिक कर्ताओं के छोड़े गए अवशेष दिखाई दे रहे थे। जहाँ एक मुर्गा और एक बोतल दारू का इंतजाम हो जाये, वहीँ पिकनिक हो जाती है। मुर्गे के पंख उड़ रहे थे, साथ ही अंग्रेजी के एक ब्रांड की बोतल डिस्पोजल गिलासों के साथ दिखाई दे रही थी।

शिव मंदिर की चौखट के अवशेष 
थोड़ी दूर चलने पर मकोई की कटीली घनी झाड़ियाँ प्रारंभ हो गयी, यहाँ तो जंगल में कोई पगडंडी भी नहीं थी। इस स्थान पर कोई आता हो तो पगडंडी बनेगी। हम सामने टीला देख कर उसी दिशा में चल रहे थे। इस स्थान पर गर्मियों के मौसम में प्रभात सिंह पूर्व में आ चुके हैं, उस समय सभी झाड़ियाँ सूख जाती हैं, रास्ता दूर से ही दिखाई देता है। टीले में कुछ दूरी तक ईंटों के टुकड़े बिखरे हुए हैं साथ ही चारों तरफ पत्थरों का भंडार भी लगा हुआ है। यह स्थान भी खजाने के चोरों से सुरक्षित नहीं है। टीले पर पहुँचने पर पत्थरों एवं ईंटों के दो ऊँचे ढेर दिखाई दिए। ढेर पर चढ़ने पर दिखा की यहाँ किसी ने पहले ही खुदाई कर डाली है। एक गड्ढे में काली हांड़ी और स्टील की छोटी कटोरी पड़ी थी। इससे अनुमान है कि यह "हंडा" (सोने की मोहरों से भरी हांड़ी) ढूंढने वालों की करतूत है।

यायावर टीले पर 
दूसरे ढेर पर दो स्तम्भ दिखाई दे रहे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर शिव मंदिर में जल निकासी के लिए बने गई जलहरी दिखाई दे रही थी , पत्थर पर खोद कर नाली को जलहरी का रूप दिया गया है। ढेर के ऊपर मंदिर की चौखट के दो पत्थर भी स्पष्ट दिख रहे थे। उत्तर दिशा में जलहरी होने पर अनुमान है कि यह मंदिर पूर्वाभिमुख रहा होगा। प्रभात सिंह ने बताया कि यहाँ किसी बाबा ने भी कुटिया बना कर डेरा डाल लिया था, जोत भी जलाने लगा था, लेकिन दाल नहीं गलने पर डेरा-डंडा उठा कर चलते बना। पहले टीले से तो स्पष्ट है कि यह विशाल शिव मंदिर रहा होगा। इसके स्तम्भ भी विशाल हैं। दूसरे टीले के विषय में उत्खनन के उपरांत ही जानकारी मिल पायेगी कि उसके नीचे क्या दबा हुआ है। हमने कुछ चित्र लिए और लौट चले।

गुल्लू  का पेड़ (गिदोल)
मंदिर टीले से लौटते हुए मुझे एक बांस की लाठी मिल गयी, पसीने आने के कारण पसीना चुसने वाली छोटी मक्खियों ने परेशान कर दिया। झाड़ियों के बीच से निकलने के कारण पसीना खुजा रहा था। बांस की लाठी का उपयोग मैंने मकड़ियों का जाला हटाने में किया। रास्ते में एक खूबसूरत वृक्ष दिखाई दिया, जिसका तना सफेद एवं चिकना था, बड़े बड़े पत्ते सुन्दर दिख रहे थे। इस पर लगे फल शायद गर्मी के मौसम में फूट चुके थे, उसका खोल चार भागों में बंट कर सुन्दर फूल की तरह दिखाई दे रहा था। मैंने पहले कभी देखा नहीं था इस प्रजाति का वृक्ष। इसकी हमने फोटो ली, मकड़ियों के जालों से बचते हुए हम रास्ता भटक कर दूसरी जगह पर पहुच गए, यहाँ हमारे और सड़क के बीच  नाला होने के कारण पार करना मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं। हमने उचित जगह की तलाश आकर ध्यान से नाला पार किया। अगला पड़ाव था सिरपुर का पर्यटन सूचना केंद्र .................
   

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

आमचो बस्तर के साथ राजिम यात्रा ............. ललित शर्मा

राजीवलोचन मंदिर परिसर 
तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना ......... चलभाष गाने लगा, कोई बात करना चाहता है, चलभाष पर नया नम्बर दिखाई दिया। चलो बात कर लेते हैं, नम्बर नया हो या पुराना और कौन से हम किसी के कर्जदार हैं जो फोन पर नया नम्बर देख कर न उठाएं, हेलू.........सर! मैं राजीव रंजन बोल रहा हूँ, 14 अक्टुबर को रायपुर पहुँच रहा हूँ, आपके साथ राजिम और सिरपुर चलना है, साथ चलेगें तो अच्छा लगेगा।...... क्यों नहीं, जरुर चलेगें। फिर घरेलू बातचीत होते रही, कुछ चर्चा "आमचो बस्तर" भी हुई। हमने १६ तारीख का सुबह जल्दी चलकर जाने का कार्यक्रम बना लिया। इधर 15 तारीख को पितृमोक्ष अमावस्या थी और भाई अशोक बजाज की माता जी का बारहवां और पगड़ी रस्म भी। 14 को राजीव रायपुर पहुँच गए और हमारा कार्यक्रम पहले ही बन गया। १५ तारीख को राजीव रंजन "आमचो बस्तर" के साथ दोपहर मे अभनपुर पहुँच गए। इनके पहुँचने से पहले विवेक विश्वकर्मा डीजीएम बीएसएनएल पहुँचे हुए थे। हम सभी चाय पीकर अशोक भाई के यहाँ कार्यक्रम में पंहुचे। वहाँ प्रसादी का कार्यक्रम चल रहा था। अशोक भाई से मिलकर हम राजिम चल पड़े।

राजेश्वर-दानेश्वर मंदिर 
राजिम नगर सोंढूर-पैरी-महानदी के त्रिवेणी संगम पर रायपुर से 45 कि मी एवं अभनपुर से 18 कि मी  पर देवभोग जाने वाले मार्ग पर स्थित है। रास्ते  में हसदा के मोड़ पर साहू चाट वाला अपनी दुकान लगाए तैयार था, मन तो ललचाया, पर समय की कमी होने से आगे बढ़ गए। नयापारा पहुँच कर पहला काम खाने का किया। महानदी पार करके राजीव लोचन मंदिर पहुँचे। पहले राजीव लोचन मंदिर के ईर्द गिर्द लोगों ने कब्जा कर रखा था। दुकानों के बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करना पड़ता था। यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। एतिहासिक मंदिर परिसर से अवैध कब्जा हटाने का एतिहासिक कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल के तत्कालीन अधीक्षण डॉ प्रवीणकुमार मिश्रा ने किया। आज राजीव लोचन मंदिर अपने पुराने रूप के करीब पहुँच चुका है। राजीव लोचन मंदिर महानदी (चित्रोत्पला गंगा) के पूर्वी तट  पर स्थित है। लोक मान्यता है कि  महानदी के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के सारे कष्ट मिट जाते हैं और वह मृत्युपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यहाँ का कुम्भ मेला जग प्रसिद्ध हो चुका है, यह मेला माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि  जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा न कर ली जाए।

महामंडप, मुख्य द्वार एवं मूर्ति शिल्प 
महाशिव तीवरदेव के ताम्रपत्र एवं राजीव लोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि  राजिम के विष्णु मंदिर (राजीव लोचन) का निर्माण 8 वीं सदी में नलवंशी राजा विलासतुंग ने कराया था। शिलालेख में रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की कुछ विजयों का उल्लेख है। उनके सामंत (सेनापति) जगतपालदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। हम मंदिर के पश्चिमी द्वार पर पहुच गए। द्वार पर ही नारियल एवं पूजा सामग्री वालों ने अपनी दुकाने सजा रखी हैं। कार के रुकते ही पूजा सामग्री वाले झपट पड़े, मुझे देखते ही पहचान गए कि यह पण्डा कुछ नहीं देने-लेने वाला। मंदिर प्रांगण में निर्माण कार्य चल रहा है। आगामी नवम्बर की 19 तारीख से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल रायपुर, विश्व दाय सप्ताह का आयोजन कर रहा है। पश्चिम दिशा से प्रवेश करने पर सबसे पहले राजेश्वर एवं दानेश्वर मंदिर दिखाई देते हैं। इन मंदिरों के सामने राजीवलोचन का भव्य प्रवेश द्वार महामंडप है। इसकी चौखट के शीर्ष भाग में शेषशैया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं लतावल्लरियों के मध्य विहाररत यक्षों की विभिन्न भाव भंगिमाओं एवं मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गयी हैं। बायीं दीवाल के स्तम्भ पर एक पुरुष की खड़ी प्रतिमा है, जिसका एक हाथ ऊपर है तथा दूसरा हाथ ह्रदय को स्पर्श कर रहा है। कमर पर कटार एवं यज्ञोपवित धारण किए हुए है। 

रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका
पुरुष मूर्ति के दोनों तरफ नारियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक मूर्ति स्त्री और पुरुष की युगल है। इसमें पुरुष स्त्री से छोटा दिखाया गया है, वह हाथ में सर्प धारण किये हुए है। लोग इसे सीता की प्रतिमा मानते हैं पर सर्प के साथ पुरुष काम का प्रतीक है, इसलिए इसे रतिसुखअभिलाषिणी अभिसारिका नायिका की प्रतिमा माना जा सकता है। इसके साथ ही यहाँ पर आकर्षक मिथुन मूर्तियाँ भी दिखाई देती है। इनके वस्त्र अलंकरण भी नयनाभिराम हैं। अंतराल में ललाट बिम्ब पर गरुडासीन विष्णु की प्रतिमा है। यहाँ पर राजीव अपनी नायिका की तलाश में आये हैं, उसका वस्त्र अलंकरण देख रहे हैं। हमने यहाँ के चित्र लिए और मुख्य मंदिर की तरफ चल पड़े। मंडप एवं मुख्य मंदिर के बीच अन्तराल है। पिछली बार गए थे तो यहाँ भागवत महापुराण का पाठ हो रहा था और भगवताचार्य अपने प्रवचन में से क्विज पूछ रहे थे श्रोताओं से, सही उत्तर देने वाले को इनाम भी दिया जा रहा था। यह तरीका मुझे पसंद आया, इनाम के लालच में श्रोता भागवत का श्रवण ध्यान लगा कर करते हैं और अंत में प्रश्नों का उत्तर देकर इनाम भी पाते है।

राजा जगतपालदेव के रूप में बुद्ध 
मुख्य मंदिर आयताकार प्रकोष्ट के बीच में निर्मित है। भू विन्यास योजना में राजिम का मंदिर महामंडप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा मार्ग में बंटा हुआ है। गर्भ गृह में प्रवेश करने के लिए पैड़ियों पर चढ़ना पड़ता है। सामने ही एक स्तम्भ पर पूर्वाभिमुख गरुड़ विराजमान है। सामने काले पत्थर की बनी चतुर्भुजी विष्णु की मूर्ति है। जिसके हाथो में शंख, गदा, चक्र एवं पद्म दिखाई देते है। इसे ही भगवान राजीवलोचन के नाम से जाना जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। बायीं भीत पर दो शिलालेख लगे है, इनसे ही इस मंदिर के निर्माताओं एवं जीर्णोद्धारकर्ताओं की जानकारी मिलती है। राजीव लोचन की नित्य पूजा क्षत्रिय करते है, विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है। इस मंदिर के उत्तर में जगन्नाथ मंदिर है। इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के वामन अवतार की प्रतिमा लगी है। जिसमें तीसरा पग राजा बलि पर के शीश पर रखते हुए विष्णु को दिखाया है। मैंने पुजारी से पूछा कि लोगों से सुना है कि यहाँ पर राजा जगतपाल की प्रतिमा भी है। तो उसने महामंडप में बायीं तरफ लगी एक प्रतिमा की तरफ संकेत किया। यह प्रतिमा भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की दिखाई पड़ी। राजीव ने कहा कि कोंडागांव में जिस तरह बुद्ध आदिवासी देवता भोंगापाल बन गए उसी तरह यहाँ भी बुद्ध जगतपाल हो गए। परन्तु राजीवलोचन मंदिर में अकेली बुद्ध की प्रतिमा का मिलना समझ से परे है।

राम मंदिर की मिथुन मूर्तियाँ 
पुजारी जी से प्रसाद ग्रहण कर हम राम मंदिर के दर्शनों को चल पड़े। यहाँ से बस्ती के बीच 50 कदम की दूरी पर राम मंदिर है। यह मंदिर भी ईंटों का बना है, इसके स्तम्भ पत्थरों के हैं।अधिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण भी कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपालदेव ने कराया था। मंदिर के महामंडप में प्रस्तर स्तंभों पर प्राचीन मूर्तिकला के श्रेष्ठतम उदहारण है। इन स्तंभों पर आलिंगनबद्ध मिथुन मूर्तियों के साथ शालभंजिका, बन्दर परिवार, माँ और बच्चा तथा संगीत समाज का भावमय अंकन है। मकरवाहिनी गंगा,  राजपुरुष, अष्टभुजी गणेश, अष्टभुजी नृवाराह की मूर्ति है। मिथुन मूर्तियाँ का शिल्प उत्तम नहीं है। जैसे नौसिखिये मूर्तिकार ने इसे बनाया हो। हमने चित्र लिए, दो सज्जन वहां पर थे, राममंदिर के केयर टेकर के विषय में पूछने पर पता चला की वह कहीं गया है। वे दोनों भी यहीं के केयर टेकर थे। एक ने बताया की वह मलार से स्थानांतरित होकर यहाँ आया है। 

प्राचीन यंत्र
राम मंदिर के प्रदक्षिणापथ से सम्बंधित प्रवेश द्वार शाखाओं से युक्त है, इनके अधिभाग पर गंगा-यमुना नदी देवियों की मूर्तियाँ हैं, राजिम के किसी भी मंदिर के प्रवेश द्वार में नदी देवियों की मूर्तियाँ नहीं है। राजीव ने टिप्पणी दी कि राजिम के मंदिरों का शिल्प सर्वोत्तम भव्य एवं बहुत ही सुन्दर है। मंदिर से बाहर निकलते हुए मुझे एक प्राचीन यंत्र दिखाई दिया। जिसका प्रयोग निर्माण के दौरान होता था, पता नहीं किसने उस भारी भरकम यंत्र को भी तोड़ कर रख दिया। दुनिया में उत्पाती लोगों की कमी नहीं है। बेमतलब ही नुकसान करने में इन्हें मजा आता है। सीमेंट आने के कारण अब यह काम में नहीं आता। वर्ना इसके बिना निर्माण कार्य संभव नहीं था। कभी इस यन्त्र के विषय में विस्तार से लिखूंगा। 

कुलेश्वर महादेवमंदिर में संध्या जी 
राजिम दर्शन कर अब हमें सिरपुर की और चलना था, लेकिन कुलेश्वर महादेव की चर्चा न हो तो राजिम यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। पुराविद डॉ विष्णु सिंह ठाकुर के अनुसार कुलेश्वर महादेव का प्राचीन नाम उत्पलेश्वर महादेव था जो कि अपभ्रंश के रूप में कुलेश्वर महादेव कहलाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है। यह अष्टभुजाकार जगती पर निर्मित है। नदी के प्रवाह को ध्यान में रखते हुए वास्तुविदों ने इसे अष्टभुजाकार बनाया। इसकी जगती नदी के तल से 17 फुट की ऊंचाई पर है। कुल 31 सीढियों से चढ़ कर मंदिर तक पंहुचा जाता  है। कहते हैं कि मंदिर के शिवलिंग को माता सीता ने बनाया था। मंदिर में कार्तिकेय एवं अन्य देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। किंवदंती है की नदी के किनारे पर स्थित संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम से कुलेश्वर मंदिर तक सुरंग जाती है। सुरंग का प्रवेश द्वार संस्कृत पाठशाला ब्रह्मचर्य आश्रम में है, जिसमे प्रवेश करके मैंने स्वयं देखा है। प्रवेश द्वार छोटा है। सीढियों से नीचे उतरने पर दो कमरे हैं जिसमे काली माई की प्रतिमा रखी है एवं आगे का रास्ता बंद कर दिया गया है।

राजीव रंजन "आमचो बस्तर"
राजिम दर्शन करने के बाद हम चम्पारण से आरंग होते हुए सिरपुर चल पड़े। राजिम से आरंग लगभग 28 किलोमीटर है। रास्ते में हमने प्रभात सिंह को फोन लगाया तो उनके फोन से कोई उत्तर नहीं आया। क्योंकि हम तय कार्यक्रम से एक दिन पहले चल रहे थे। फिर आदित्य सिंह को फोन लगाने पर पता चला की वे महासमुंद में हैं। इस दिन पितृमोक्ष अमावश्या भी थी, इसलिए आदित्य सिंह महासमुंद पहुँच गए थे। उन्होंने कहा कि आप सिरपुर पहुचे मै  तत्काल निकल रहा हूँ। नदी मोड़, तुमगांव निकल चुका था। अब भूख लगने लगी तो रास्ते में कोई ढाबा भी दिखाई नही दे रहा था। हम सिरपुर के मोड़ से आगे निकल गए ढाबे की खोज में 5 किलोमीटर आगे जाने पर नवागांव में जंगल-मंगल ढाबा मिला। वहां तो सिर्फ जंगल मंगल ही था। चावल ख़त्म हो चुके थे, सब्जी नहीं थी, हमने रोटी बनवाई और काले उड़द चने की दाल ली। प्रभात सिंह का फोन भी आ गया, उन्होंने रेस्ट हाउस बुक कर दिया था। प्रभात सिंह रायपुर में थे, उन्हें सुबह आना था। 

"आमचो भारत" वाले यायावर 
नवागांव से चलने पर मैंने राजीव से कहा कि  सिरपुर का रेस्ट हाउस बहुत बढ़िया है और महानदी के किनारे पर स्थित है, सुबह उठने पर पुण्य सलिला महानदी के दर्शन होंगे, पर रेस्ट हाउस पहुचने पर चौकीदार ने पुराना रेस्ट हाउस खोला, जिसके कमरे को महानदी नाम दिया गया था। नए रेस्ट हाउस के बारे में कहने पर उसने बताया की वह मंत्री के लिए बुक है। बस यही खाली है, मरते क्या न करते, केयर टेकर को बुलाने कहा तो उसने आकर कहा कि उसकी तबियत ख़राब है वह नहीं आ रहा। आस-पास खेत होने के कारण कमरे में लाइट जलाते ही कीड़े भर गए। वैसे मैंने देखा है कि जितने भी रेस्ट हाउस है वे अघोषित रूप से मंत्रियों और अधिकारियों के लिए पूर्णकालिक बुक रहते हैं, रेस्ट हाउस के केयर टेकर नहीं चाहते कि कोई वहां आकर रुके। मुझे बताया गया कि रेस्ट हाउस कि बुकिंग महासमुंद के अधिकारी करते हैं, हमने अपने आप को धन्य समझा, कम से कम पुराना रेस्ट हाउस तो खुल गया, रात गुजारने के लिए। अब मंत्री जी ही जाने इन हालातों में सिरपुर को किस तरह विश्व धरोहर का दर्जा दिलाएंगे, जबकि रेस्ट हाउस के ये हाल हैं। रात्रि कालीन भोजन  में आदित्य सिंह ने कम्पनी दी, हमने सुबह के कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार की और सुबह के इंतजार में लोट-पोट हो गए। .......जारी है,  आगे पढ़ें .........