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शनिवार, 16 जुलाई 2016

हैदराबाद में भटक कर ब्लॉगर पहुंचे अपने धाम : दक्षिण यात्रा सम्पन्न 21

आज का दिन हमने विप्रो भ्रमण के लिए नियत किया था। बाहरी आगंतुकों को शनिवार को इस परिसर में प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए बाकायदा पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ती है। उसके बाद वहां से परिचय पत्र जारी किया जाता है, उसे लेकर ही परिसर में प्रवेश दिया जाता है। जाहिर है विप्रो बड़ी कम्पनी है और इसने अपने कर्मचारियों के लिए परिसर में दोस्ताना वातावरण निर्मित कर रखा है, जिसमें बहुत बड़ी कैंटिन, बगीचा एवं ओपन थियेटर भी है। 
विप्रो बैंगलोर में पाबला जी के साथ
हम लगभग एक बजे विप्रो पहुंच गए। एक लम्बे सफ़र के बाद सुबह उठने में विलंब हो गया। यहां एक आकर्षक डोम बना हुआ है, जिसकी छत में कांच लगे हुए हैं, यह बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हमने दोपहर का नाश्ता यहां की कैंटीन में ही किया और परिसर का भ्रमण किया। विप्रो ने अपने परिसर में खूब हरियाली कर रखी है। बैगलोर जैसे शहर में शुद्ध वायु एवं वातावरण के लिए इसकी निहायत ही आवश्यकता दिखाई देती है। अन्य कम्पनियों और कारखानों को भी इससे सीख लेनी चाहिए कि कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढाने के लिए अच्छे माहौल की आवश्यकता पड़ती है।
विप्रो का ग्लास डोम
विप्रो भ्रमण के बाद हम होटल आ गए। विचार विमर्श कर फ़ैसला किया कि आज की रात 9 बजे हम यहां से प्रस्थान कर लें और रात भर गाड़ी चला कर हैदराबाद में विश्राम करें। ब्लॉगर मित्र विजय सप्पति जी का भी कई बार फ़ोन आ चुका था और वे रविवार को हैदराबाद में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। दिन भर आराम करने के बाद हमने रात नौ बजे के आस पास होटल छोड़ दिया और वापसी के लिए गाड़ी चल पड़ी। वैसे रात का सफ़र करना तो नहीं चाहिए। परन्तु एक फ़ायदा यह रहता कि रात को ट्रैफ़िक कम रहता और सफ़र जल्दी कटता है। परन्तु नींद के झोंकों पर भी काबू करना पड़ता है।
रात का सफ़र, बैंगलोर से निकलते हुए
चलते मुझे भोजन करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। पाबला जी खाने के मूड में नहीं थे क्योंकि खा लिए तो फ़िर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाएगा। बैंगलोर शहर के बाहर निकलते हुए हमने सोचा कि हाईवे पर कोई ढाबा मिलेगा तो खाना खा लिया जाएगा। परन्तु चलते हुए समस्या यह रहती है कि थोड़ा और चल लिया जाए, फ़िर देखा जाएगा। यही हमारे साथ हो रहा था। रात एक बजे ढाबा दिखाई दिया, हमने गाड़ी लगाई, जैसे ही भीतर प्रवेश किया तो माहौल समझ नहीं आया। हर जगह लोग दारु की बोतल लिए बैठे थे और कुछ अजीब से संदिग्ध चेहरे भी दिख रहे थे। मैं भीतर जाकर लौट आया, लम्बे सफ़र में सुरक्षा भी जरुरी होती है। पाबला जी को मना किया और गाड़ी फ़िर स्टार्ट कर ली।
रास्ते में एक मंदिर में पर्व
आगे चलकर एक स्थान पर सरदार जी का ढाबा दिखाई दिया। हमने गाड़ी वहीं रोक ली। लेमन राईस का आर्डर दे दिया, तब तक पाबला जी ने आराम कर लिया। लेमन राईस में मुंगफ़ली इतनी अधिक डाल दी कि मेरा मन उखड़ गया। पर खाना भी जरुरी था। अधूरे मन से भोजन किया और फ़िर हम आगे की यात्रा पर चल पड़े। देश में विकास हो रहा है और हाईवे बन रहे हैं। अच्छी स्पीड वाली सड़कों का निर्माण हो रहा है। हैदराबाद बैंगलोर हाईवे भी फ़ोर लाईन का बना है। परन्तु बीच का डिवाईडर पार करके कौन, कब आपकी गाड़ी के सामने आ जाए, इसका पता ब्रह्मा को भी नहीं चलता। 
जान जाए  चाहे लूले लंगड़े हों, पर सफ़र ऐसे ही करेंगे
हमने डिवाईडर पार निकलने वालों के कई एक्सीडेंट सुबह सुबह देखे, मन खराब हो गया। थोड़ी सी जल्दी मचाने के कारण लोग जान से हाथ धो बैठते हैं और सड़क दुर्घटना में सबसे अधिक जवान मौते होती हैं। पीछे माँ बाप औलादें बिलखती रह जाती है। बैरिकेट लगाकर बनाए गए हाईवे पर भी लोग घुस जाते हैं। इस यात्रा में मेरा पूरा ध्यान सड़क पर ही रहा। जहाँ भी रोड़ क्रासिंग दिखाई देती, पाबला जो हाथ का इशारा कर स्पीड कम करवाता, वरना इनसे गाड़ी एक सौ बीस से कम चलती ही नहीं है। सारी यात्रा में मेरा यही काम रहा। कभी-कभी तो मुझे भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते थे। :)
चिकनी फ़र्राटेदार सड़क
अब हमारा टारगेट हैदराबाद था, सुबह से कई बार विजय जी का फ़ोन आ चुका था, वो समझ रहे थे कि हम सुबह नाश्ते के टैम पर पहुंच जाएगें, परन्तु हम तो झपकियां लेते हुए आ रहे थे। इसलिए इतनी जल्दी पहुंचना संभव नहीं था। हम पौने एक बजे के लगभग हैदराबाद शहर में प्रवेश कर गए। विजय जी बताए पते को ढूंढते रहे, उनसे संपर्क करते हुए। उन्होंने एक ही स्थान के तीन तीन पते बता दिए, हमारा जीपीएस और कहीं ले गया। फ़िर मुड़ कर वापस आए। एक घंटे तक सिकंदराबाद कैन्ट एरिए में ही घूमते रहे, आखिर घूमते घूमते थक गए पर उनका घर का पता नहीं मिला। 
हैदराबार 82 किमी और नागपुर 562 किमी
मैने उनसे फ़ोन पर कहा कि हम हमारी जगह बता देते हैं, आप यहां आ जाओ। वे अपना पता ही बताते रहे, लेकिन घर से निकलने को तैयार नहीं हुए। मैने उनसे जी पी एस पता मांगा, वो भी नहीं दिया, जिस तरह विवेक रस्तोगी जी ने अपना जीपीएस पता दे दिया, जीपीएस में वो पता फ़ीड करते ही हम उनके घर के ठीक सामने पहुंच गए थे, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इधर हम उनका घर ढूंढते हुए नागपुर रोड़ पर पहुंच गए। जहां से माईल स्टोन नागपुर की दूरी 500 किमी के आस पास दिखा रहा था। हम विजय जी का घर ढूंढते हुए एकदम पक चुके थे। माईल स्टोन देखकर सरदार का दिमाग सनक गया और गाड़ी नागपुर रोड़ पर बढ़ा दी। 
हैदराबाद के पार नागपुर की ओर
विजय जी का फ़िर फ़ोन आया, पूछे कहां पर हो, मैने कहा कि हम नागपुर निकल लिए और हैदराबाद से काफ़ी आगे आ चुके हैं। बोले कि मैं सुबह से इंतजार कर रहा हूँ, सारा बनाया हुआ खाना खराब हो जाएगा। मैने कहा कि अब लौटना संभव नहीं है और पाबला जी नाराज है, फ़ोन पर भी बात नहीं करेंगे। इसलिए इस मुलाकात को पेंडिग ही रखा जाए तो ठीक है। उन्होंने निराश होकर फ़ोन बंद कर दिया। नए शहर में घर तक बुलाने के लिए दो तरीके हैं, पहला तो उसे जीपीएस का अंक्षाश देशांश दे दो, जिससे वह बिना असुविधा के पते पर पहुंच जाएगा या फ़िर शहर का ऐसा कोई लैंड मार्क बता तो जहाँ तक कोइ आसानी से पहुंच जाए और उसे लेने आ जाओ। ये दोनो काम विजय जी ने नहीं किए और घर से ही निर्देश देते रहे। हमारा भी समय खराब हुआ और उनका भी खाना।
अस्ताचल  को जाता विरंचीनारायण
हैदराबाद में आराम करने का प्लान बना कर चले थे, वह फ़ेल हो गया। अब गाड़ी फ़िर हाईवे पर थी। रास्ते में एक उड़ीपी रेस्टोंरेंट में भोजन किया और आगे बढ गए। अभी भी हमको लगभग आठ सौ किमी का सफ़र करके घर पहुंचना था। रात भर गाड़ी चला कर थक चुके थे। शाम को ई टीवी की स्टेट हेड प्रियंका कौशल ने राजिम पर कार्यक्रम के प्रसारण की सूचना दी, तो कुछ मित्रों ने वीडियो बनाकर मुझे वाट्सएप पर भेज दिया। गाड़ी चलाते हुए लगातार 27 घंटे हो चुके थे, थककर बुरा हाल था, जैसे तैसे करके रात बारह बजे तक नागपुर पहुंचे और वहां रात रिश्तेदार संध्या सत्येन्द्र शर्मा जी के रात गुजारी। 
एक सेल्फ़ी हो जाए, बाय बाय दक्षिण यात्रा
यहां फ़ुल आराम कर एवं दोपहर का भोजन कर एक बजे के बाद नागपुर से निकले। शाम को भिलाई पहुंचते तक पाबला जी गाड़ी चलाने की हालत में नहीं थे। जैसे तैसे करके घर पहुंचे। मेरे पास सामान कुछ ज्यादा हो गया था। उसे लेकर बस में जाने का मेरा मन नहीं था। पाबला जी बोले कि घर पर ही रात आराम कर लो, सुबह चार बजे अभनपुर छोड़ आऊंगा। घर के समीप पहुंच कर रात रुकना मुझे जम नहीं रहा था तब हम नाम वर्मा जी को फ़ोन किया, उन्होने समस्या का हल निकाल दिया और गाड़ी लेकर पहुंच गए। इस तरह मैं रात ग्यारह बजे घर पहुंचा और हमारी दक्षिण की साप्ताहिक यात्रा निर्विघन सम्पन्न हुई।  इति दक्षिण यात्रा …

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

अभनपुर जंक्शन: सवा सौ बरस पुरानी रेल

रायपुर से चलनी वाली छुकछुक रेलगाड़ी (नेरोगेज) वर्तमान में राजिम एवं धमतरी तक का सफ़र तय करती है। देश में अन्य स्थानों पर तो अमान परिवर्तन हो गया परन्तु हमारे यहाँ अभी भी चल रही है। पहले स्टीम इंजन था अब डीजल इंजन चलता है। रायपुर राजधानी बनने के बाद इस ट्रेन के यात्रियों में बेतहाशा वृद्धि हुई। राजधानी में नवनिर्माण होने लगे तो धमतरी एवं राजिम से काम करने के लिए कम खर्च में इसी ट्रेन से रायपुर तक का सफ़र तय करते हैं। यह ट्रेन अपनी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। यह क्षेत्र वन सम्पदा से भरपूर था और उसके दोहन के लिए अंग्रेजों ने रेल लाईन बिछाई।

इस मार्ग पर 1896 में 45.74 मील लंबी रेल लाइन बनाने का काम शुरू हुआ, जो 5 साल बाद 1901 में पूरा कर लिया गया। यह रेल लाइन ब्रिटिश इंजीनियर एएस एलेन की अगुवाई में में बनाई गई। छत्तीसगढ़ में अकाल के दौरान ग्रामीणों को रोजगार देने के नाम पर इस रेल लाईन का निर्माण किया गया। बताते हैं कि धमतरी मार्ग पर नगरी तक रेल पटरियां बिछाई गई और राजिम मार्ग पर गरियाबंद के जंगलों तक। इसके परिचालन के लिए महानदी पर लकड़ी का पुल बनाया गया। तब कहीं जाकर यह ट्रेन गरियाबंद के जंगलों तक पहुंची। इस ट्रेन के माध्यम से वन संपदा का दोहन युद्ध स्तर पर किया गया। पहले इसे ग्रामीण "दू डबिया गाड़ी" कहते थे। शुरुवाती दिनों में इसमें दो डिब्बे लगाकर ही चलाया जाता था। ग्रामीण इसके इंजन की सीटी सुन कर समय का पता लगाते थे। इसमें भाप का ईंजन 1980 तक चला। इसके बाद डीजल के इंजन लगे और सफ़र थोड़ी अधिक गति से होने लगा। 

सैकड़ों साल पहले रेल परिचालन किस तरह से होता है अगर यह जानना है तो इस छोटी ट्रेन का सफ़र करना चाहिए। यातायात के उसी साधनों का प्रयोग आज भी किया जाता है जो सैकड़ों साल पहले किया जाता था। ट्रेन का ड्रायवर आज भी गोला बंधा रिंग फ़ेंकता है जिसे लोहे की मशीन में डाल कर दो बड़ी चाबियाँ लगा कर फ़िर फ़ोन किया जाता है तब लाईन क्लियर की जाती है। सड़क मार्ग के गेट आज उन बड़ी चाबियों से खुलते हैं। इस मार्ग पर अभनपुर महत्वपूर्ण जंक्शन है। यहाँ से राजिम एवं धमतरी के लिए रेलमार्ग पृथक हो जाता है। स्टेशन पर आज भी वैसा ही है जैसा सवा सौ साल पहले था, रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। सिर्फ़ टिकिट देने वाली मशीन की जगह अब कम्पयूटर लग गया है। डीजल इंजन लगने के कारण पानी की टंकियाँ हटा दी गई हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दूल कलाम जब डी आर डी ओ के हेड थे तब उन्होने अपनी एक गोपनीय यात्रा इस ट्रेन द्वारा रायपुर से धमतरी तक की थी। 

अब इस ट्रेन के दिन भी लदने वाले हैं। रायपुर से रेल्वे स्टेशन से हटा कर अब इसका परिचालन तेलीबांधा से किया जा रहा है। नई राजधानी से केन्द्री तक बड़ी रेल लाईन बिछाने का कार्य युद्ध गति से चल रहा है और समाचार मिला है कि केन्द्री से धमतरी तक भी इसका अमान परिवर्तन कर नेरोगेज को ब्राड गेज में तब्दील किया जाएगा। परन्तु छोटी गाड़ी के सफ़र का आनंद ही अलग है। इसे नए रायपुर में लोकल ट्रेन जैसे चलाना चाहिए। जिससे आने वाले पर्यटक सुबह शाम राजधानी भ्रमण का आनंद इस ट्रेन के माध्यम से कर सकें। वैसे इस ट्रेन के बंद होने में साल भर तो लग सकता है तब तक इसकी यात्रा का आनंद उठाया जा सकता है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

सैर कर गाफ़िल … भूटान

सैर कर गाफ़िल दूनिया की, जिन्दगानी फ़िर कहाँ …… सैलानियों के लिए यह आदर्श वाक्य हो गया है। देशाटन और पर्यटन करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का मन करता है परन्तु इसके रास्ते में रोड़े भी बहुत अधिक हैं। घर द्वार से निकलते निकलते भी कोई न कोई काम आ ही जाता है जो आपकी यात्रा को प्रारंभ ही नहीं होने देगा। ऐसी स्थिति में नफ़ा-नुकसान देखे बिना गाफ़िल हो कर  ही यात्रा को अंजाम देना पड़ता है। बस सब तरफ़ से आँखें बंद कर लो और चल पड़ो अपने मनचाहे स्थान की ओर, तभी यात्रा सम्पूर्ण होती है। वरना जीवन में पहेलियों के इतने जंजाल होते हैं कि एक को सुलझाते ही उसमें से दूसरी उलझन जन्म लेती दिखाई देती है।

मेरी पुस्तक "सरगुजा का रामगढ़" प्रकाशन के अंतिम दौर पर थी, तभी रविन्द्र प्रभात जी का फ़ोन आया कि अबकि बार ब्लॉग़र सम्मेलन भूटान में हो रहा है और आपकी स्वीकृति चाहिए। भूटान का नाम सुनकर मैने अपनी स्वीकृति दे दी। क्योंकि कई महीनों से बिकास और मेरे बीच भूटान भ्रमण को लेकर मंथन चल रहा था। जाना वह भी चाहता था और मैं भी। परन्तु कोई "साईत" नहीं निकल रहा था। रविन्द्र जी के फ़ोन से हमें भूटान यात्रा को लेकर गंभीरता से सोचना पड़ा। मैने जल्दबाजी में ही पुस्तक पूर्ण की एवं उसका प्रकाशन भी हो गया। अब मुद्दा विमोचन को लेकर टंगा हुआ था। इस पुस्तक का विमोचन हमारे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा होना पूर्व में ही तय हो गया था। अब उनकी तरफ़ से तिथि का निर्धारण होना था। समय धीरे धीरे सरकता जा रहा था।

इसी बीच छत्तीसगढ़ के अन्य मित्र भी इस यात्रा में सम्मिलित हो रहे थे। जिनमें गगन शर्मा, गिरीश पंकज, अल्पना देशपान्डे इत्यादि। मैं भूटान यात्रा सड़क मार्ग से तय करना चाहता था इसलिए पाबला जी को फ़ोन लगाया। तो उन्होने बताया कि पापा की तबियत ऊक-चूक रहती है, अगर ठीक लगा तो चलेगें। अर्थात तय नहीं था उनका जाना। रविन्द्र जी ने परमिट के फ़ार्म भेज दिया। इधर अल्पना भी सपरिवार तैयार हो रही थी। उसका सही जवाब नहीं आ रहा था और टिकिट करवाने में विलंब होता जा रहा था। मैने गगन शर्मा जी  को टिकिट करवाने कह दिया और अल्पना को अल्टीमेंटम दे दिया। फ़ार्म भेजने के बाद टिकिट करवाने की जिम्मेदारी उसकी थी। मुझसे यहीं पर बड़ी चूक हो गई। अपनी टिकिट अलग ही करवानी थी। यही चूक आगे चल कर मानसिक यंत्रणा का कारक बन गई।

हमारी यात्रा रायपुर स्टेशन से हावड़ा मुंबई मेल द्वारा 12 जनवरी 2015 को शाम को प्रारंभ होनी थी। सब कुछ तय समय के हिसाब से चल रहा था। परन्तु कुछ न कुछ व्यवधान मानव जीवन में आते ही रहते हैं। छोटे भाई कीर्ति की एक महीने से तबियत ठीक नहीं थी। शाम को उसको टेबलेट लेने के लिए ध्यान दिलाना पड़ता था। वरना भूल जाता था। नगर पंचायत के चुनाव भी चल रहे थे और एक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक का दायित्व भी इसी दौरान संभालना पड़ा। कुल मिला कर उलझने बढती ही जा रही थी। नगर पंचायत चुनाव में ताऊ जी के पुत्र पार्षद का चुनाव जीत चुके थे और उन्हें 13 तारीख को उपाध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ना था। उनका कहना था कि 13 को शाम की फ़्लाईट से कलकत्ता चले जाना, जिससे अपने साथियों से मिल जाओगे और यहाँ का चुनाव भी निपट जाएगा।

मैने अल्पना को वर्तमान स्थिति से अवगत करवा दिया और कह दिया कि शाम की फ़्लाईट से चल कर दार्जलिंग मेल के समय पर सियालदाह स्टेशन पर मिल जाऊंगा। उसने नाराजगी जाहिर की और मैने अपनी सफ़ाई दी। यहीं से बात से बिगड़नी प्रारंभ हो गई। उसके बाद मैने इन्हें सैकड़ों बार कॉल किया लेकिन फ़ोन पर कोई जवाब नहीं आया। 13 तारीख को दोपहर 1 बजे भाई के विजय होने का समाचार आ गया और छोटा भाई कीर्ति, भतीजा, छोटू और बेटा उदय मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आ गए। शाम 4/15 के इंडिगो विमान से सफ़र तय कर 5/40 को दमदम हवाई अड्डे पर पहुच गया। यहाँ पहुच कर भी अल्पना को फ़ोन लगाया तो कोई जवाब नहीं आया। क्योंकि मेरी आगे की टिकिट तो उनके साथ ही सम्मिलित थी। न ही उन्होने मुझे कायदे से मेरा सीट नम्बर दिया। इसके पीछे मुझे सिर्फ़ अपनी अहमियत सिद्ध करने का भाव ही समझ में आया। आएगा साला खुद पड़ गिर और ढूंढेगा अगर साथ जाना है तो।

मैं हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर सियालदाह स्टेशन की ओर चल पड़ा। मेरा टैक्सी ड्रायवर हिन्दी भाषी और बिहार के गया जिले का निवासी था। बहुत अच्छी हिन्दी बोलता था और पढने लिखने का शौकीन था। उससे चर्चा करते हुए 22 किलोमीटर का रास्ता कट गया और सियालदाह स्टेशन पहुंच गया। इस स्टेशन पर बहुत ही भीड़ भाड़ थी। सामान ढोकर थोड़ा आगे बढने पर पता चला कि कल संक्राति है और गंगासागर जाने वालों का मेला लगा हुआ था। इसलिए अत्यधिक भीड़ दिखाई दे रही थी। सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार। स्टेशन पहुंचा तो 7 बजे थे। मैने एटीएम के पास अपना डेरा लगा लिया। क्योंकि मेरे पास टिकिट भी नहीं थी जो प्लेटफ़ार्म पर पहुंच सकता। मैने एक प्लेटफ़ार्म टिकिट खरीदी और इनका इंतजार करने लगा। इन लोगों ने मुझे इस तरह से बांध दिया था कि मैं मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहा था। गुस्से का स्तर शनै शनै बढते जा रहा था। 

आठ बजे मैने गगन शर्मा जी फ़ोन लगा कर वस्तु स्थिति बताई तो उन्होने कहा कि वे 9 बजे प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएगें। इस बीच मैने घर से लाया हुआ भोजन कर लिया। वादे के अनुसार गगन शर्मा जी नौ बजे पहुंच गए। हमारी ट्रेन दार्जलिंग एक्सप्रेस दस बजे थी। गगन शर्मा जी ट्रेन एवं टिकिट की स्थिति देखने गए और मैं अपने स्थान पर ही बैठा रहा। आज अपने आप को बहुत ही मजबूर समझ रहा था। अब दिमाग सनकने के कगार पर था। चार्ट लगने में थोड़ा समय था। चार्ट लगते ही हमने देखना शुरु किया तो मेरा नाम ही नहीं दिखाई दिया। अब मैने तय किया की सामान्य टिकिट लेकर ट्रेन में ही सीट की व्यवस्था कर लुंगा। मै सामान्य टिकिट लेकर लौटा तो गगन शर्मा जी ने बताया कि मेरी टिकिट बी-3 में है और उन लोग अपनी सीट पर बैठ चुके हैं। अब पारा और अधिक चढ गया। इधर सामान्य टिकिट के पैसे फ़ालतु लग गए। मैने दौड़ कर टिकिट कैंसिल कराई और किसी तरह अपने कोच में पहुंचा। इसे कहते हैं कर भला तो हो बुरा…………। आगे पढ़ें 

सैर कर गाफ़िल … भूटान

सैर कर गाफ़िल दूनिया की, जिन्दगानी फ़िर कहाँ …… सैलानियों के लिए यह आदर्श वाक्य हो गया है। देशाटन और पर्यटन करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का मन करता है परन्तु इसके रास्ते में रोड़े भी बहुत अधिक हैं। घर द्वार से निकलते निकलते भी कोई न कोई काम आ ही जाता है जो आपकी यात्रा को प्रारंभ ही नहीं होने देगा। ऐसी स्थिति में नफ़ा-नुकसान देखे बिना गाफ़िल हो कर  ही यात्रा को अंजाम देना पड़ता है। बस सब तरफ़ से आँखें बंद कर लो और चल पड़ो अपने मनचाहे स्थान की ओर, तभी यात्रा सम्पूर्ण होती है। वरना जीवन में पहेलियों के इतने जंजाल होते हैं कि एक को सुलझाते ही उसमें से दूसरी उलझन जन्म लेती दिखाई देती है।

मेरी पुस्तक "सरगुजा का रामगढ़" प्रकाशन के अंतिम दौर पर थी, तभी रविन्द्र प्रभात जी का फ़ोन आया कि अबकि बार ब्लॉग़र सम्मेलन भूटान में हो रहा है और आपकी स्वीकृति चाहिए। भूटान का नाम सुनकर मैने अपनी स्वीकृति दे दी। क्योंकि कई महीनों से बिकास और मेरे बीच भूटान भ्रमण को लेकर मंथन चल रहा था। जाना वह भी चाहता था और मैं भी। परन्तु कोई "साईत" नहीं निकल रहा था। रविन्द्र जी के फ़ोन से हमें भूटान यात्रा को लेकर गंभीरता से सोचना पड़ा। मैने जल्दबाजी में ही पुस्तक पूर्ण की एवं उसका प्रकाशन भी हो गया। अब मुद्दा विमोचन को लेकर टंगा हुआ था। इस पुस्तक का विमोचन हमारे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के द्वारा होना पूर्व में ही तय हो गया था। अब उनकी तरफ़ से तिथि का निर्धारण होना था। समय धीरे धीरे सरकता जा रहा था।

इसी बीच छत्तीसगढ़ के अन्य मित्र भी इस यात्रा में सम्मिलित हो रहे थे। जिनमें गगन शर्मा, गिरीश पंकज, अल्पना देशपान्डे इत्यादि। मैं भूटान यात्रा सड़क मार्ग से तय करना चाहता था इसलिए पाबला जी को फ़ोन लगाया। तो उन्होने बताया कि पापा की तबियत ऊक-चूक रहती है, अगर ठीक लगा तो चलेगें। अर्थात तय नहीं था उनका जाना। रविन्द्र जी ने परमिट के फ़ार्म भेज दिया। इधर अल्पना भी सपरिवार तैयार हो रही थी। उसका सही जवाब नहीं आ रहा था और टिकिट करवाने में विलंब होता जा रहा था। मैने गगन शर्मा जी  को टिकिट करवाने कह दिया और अल्पना को अल्टीमेंटम दे दिया। फ़ार्म भेजने के बाद टिकिट करवाने की जिम्मेदारी उसकी थी। मुझसे यहीं पर बड़ी चूक हो गई। अपनी टिकिट अलग ही करवानी थी। यही चूक आगे चल कर मानसिक यंत्रणा का कारक बन गई।

हमारी यात्रा रायपुर स्टेशन से हावड़ा मुंबई मेल द्वारा 12 जनवरी 2015 को शाम को प्रारंभ होनी थी। सब कुछ तय समय के हिसाब से चल रहा था। परन्तु कुछ न कुछ व्यवधान मानव जीवन में आते ही रहते हैं। छोटे भाई कीर्ति की एक महीने से तबियत ठीक नहीं थी। शाम को उसको टेबलेट लेने के लिए ध्यान दिलाना पड़ता था। वरना भूल जाता था। नगर पंचायत के चुनाव भी चल रहे थे और एक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक का दायित्व भी इसी दौरान संभालना पड़ा। कुल मिला कर उलझने बढती ही जा रही थी। नगर पंचायत चुनाव में ताऊ जी के पुत्र पार्षद का चुनाव जीत चुके थे और उन्हें 13 तारीख को उपाध्यक्ष के लिए चुनाव लड़ना था। उनका कहना था कि 13 को शाम की फ़्लाईट से कलकत्ता चले जाना, जिससे अपने साथियों से मिल जाओगे और यहाँ का चुनाव भी निपट जाएगा।

मैने अल्पना को वर्तमान स्थिति से अवगत करवा दिया और कह दिया कि शाम की फ़्लाईट से चल कर दार्जलिंग मेल के समय पर सियालदाह स्टेशन पर मिल जाऊंगा। उसने नाराजगी जाहिर की और मैने अपनी सफ़ाई दी। यहीं से बात से बिगड़नी प्रारंभ हो गई। उसके बाद मैने इन्हें सैकड़ों बार कॉल किया लेकिन फ़ोन पर कोई जवाब नहीं आया। 13 तारीख को दोपहर 1 बजे भाई के विजय होने का समाचार आ गया और छोटा भाई कीर्ति, भतीजा, छोटू और बेटा उदय मुझे एयरपोर्ट छोड़ने आ गए। शाम 4/15 के इंडिगो विमान से सफ़र तय कर 5/40 को दमदम हवाई अड्डे पर पहुच गया। यहाँ पहुच कर भी अल्पना को फ़ोन लगाया तो कोई जवाब नहीं आया। क्योंकि मेरी आगे की टिकिट तो उनके साथ ही सम्मिलित थी। न ही उन्होने मुझे कायदे से मेरा सीट नम्बर दिया। इसके पीछे मुझे सिर्फ़ अपनी अहमियत सिद्ध करने का भाव ही समझ में आया। आएगा साला खुद पड़ गिर और ढूंढेगा अगर साथ जाना है तो।

मैं हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर सियालदाह स्टेशन की ओर चल पड़ा। मेरा टैक्सी ड्रायवर हिन्दी भाषी और बिहार के गया जिले का निवासी था। बहुत अच्छी हिन्दी बोलता था और पढने लिखने का शौकीन था। उससे चर्चा करते हुए 22 किलोमीटर का रास्ता कट गया और सियालदाह स्टेशन पहुंच गया। इस स्टेशन पर बहुत ही भीड़ भाड़ थी। सामान ढोकर थोड़ा आगे बढने पर पता चला कि कल संक्राति है और गंगासागर जाने वालों का मेला लगा हुआ था। इसलिए अत्यधिक भीड़ दिखाई दे रही थी। सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार। स्टेशन पहुंचा तो 7 बजे थे। मैने एटीएम के पास अपना डेरा लगा लिया। क्योंकि मेरे पास टिकिट भी नहीं थी जो प्लेटफ़ार्म पर पहुंच सकता। मैने एक प्लेटफ़ार्म टिकिट खरीदी और इनका इंतजार करने लगा। इन लोगों ने मुझे इस तरह से बांध दिया था कि मैं मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहा था। गुस्से का स्तर शनै शनै बढते जा रहा था। 

आठ बजे मैने गगन शर्मा जी फ़ोन लगा कर वस्तु स्थिति बताई तो उन्होने कहा कि वे 9 बजे प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएगें। इस बीच मैने घर से लाया हुआ भोजन कर लिया। वादे के अनुसार गगन शर्मा जी नौ बजे पहुंच गए। हमारी ट्रेन दार्जलिंग एक्सप्रेस दस बजे थी। गगन शर्मा जी ट्रेन एवं टिकिट की स्थिति देखने गए और मैं अपने स्थान पर ही बैठा रहा। आज अपने आप को बहुत ही मजबूर समझ रहा था। अब दिमाग सनकने के कगार पर था। चार्ट लगने में थोड़ा समय था। चार्ट लगते ही हमने देखना शुरु किया तो मेरा नाम ही नहीं दिखाई दिया। अब मैने तय किया की सामान्य टिकिट लेकर ट्रेन में ही सीट की व्यवस्था कर लुंगा। मै सामान्य टिकिट लेकर लौटा तो गगन शर्मा जी ने बताया कि मेरी टिकिट बी-3 में है और उन लोग अपनी सीट पर बैठ चुके हैं। अब पारा और अधिक चढ गया। इधर सामान्य टिकिट के पैसे फ़ालतु लग गए। मैने दौड़ कर टिकिट कैंसिल कराई और किसी तरह अपने कोच में पहुंचा। इसे कहते हैं कर भला तो हो बुरा…………। आगे पढ़ें 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

तिरपट पंडित दर्शन एवं ब्लॉगर मिलन

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
त्तीसगढ़ की सीमा समीप आ रही थी, घर पहुंचने की व्यग्रता बढते जा रही थी। शहडोल से हम अनूपपुर की ओर बढ रहे थे। तभी पाबला जी को याद आया कि हमारे ब्लॉगर साथी धीरेंद्र भदौरिया जी  व्यंकटनगर में निवास करते हैं। तो मैने झट उन्हें फ़ोन लगाया। फ़ोन पर वे मिल गए, मैने बताया कि हम लौट रहे हैं नेपाल से। व्यंकटनगर से पेंड्रा होते हुए जाएगें। तो उन्होनें घर आने का निमंत्रण दिया। मैने हिसाब लगाया कि दोपहर तक हम वहाँ पहुंच जाएगें। उन्हे भोजन व्यवस्था के लिए कह दिया और कहा कि ठाकुर भोजन नहीं करेगें। तो उन्होने हँसते हुए कहा कि हम आपको ब्राह्मण भोजन ही कराएगें। 
शहडोल ( सहस्त्र डोल)
एक स्थान पर हमने नाला देख कर इसे दिशा मैदान के लिए उपयुक्त स्थान समझा। यहां से निवृत होने पर आगे बढे। इसके बाद धीरेंद्र भदौरिया जी बार बार फ़ोन पर हम लोगों का लोकेशन लेते रहे। उन्होने कहा कि अमलाई चचाई होते हुए आप व्यंकट नगर पहुंचिए। एक बारगी तो मैने व्यंकटनगर जाना त्याग दिया था। हम लोग अमरकंटक की राह पर बढ गए थे। लेकिन धीरेन्द्र जी के पुन: आग्रह को त्याग नहीं सके। अमलाई और चचाई की तरफ़ चल पड़े। यहां से बिलासपुर लगभग 200 किलोमीटर था और बिलासपुर से रायपुर 110 किलोमीटर। आज हमें किसी भी हालत में घर पहुंचना था। मालकिन का फ़ोन आने पर हमने कह दिया था कि रात तक हम घर पहुंच जाएगें। रास्ते में एक तिरपट पंडित दिखाई दिया। बस लग गया था कि आगे का सफ़र अभी भी कठिनाईयों भरा है।
नाले किनारे दो ब्लॉगर
व्यंकटनगर छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। व्यंकट नगर से छत्तीसगढ़ की सीमा प्रारंभ हो जाती है। भदौरिया जी ने बताया कि वे व्यंकट नगर में सड़क के दांई तरफ़ की दुकान पर बैठे हैं। व्यंकट नगर में प्रवेश करने पर भदौरिया जी प्रतीक्षा करते दिखाई दिए। यहाँ पहुंच कर पता चला कि उनका गाँव पोंड़ी यहाँ से 6-7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अब एक रेल्वे लाईन पार करके हम इनके गांव पहुचे। भदौरिया जी यहाँ के सरपंच भी रह चुके हैं तथा राजनीति में अच्छा रसूख बना रखा है। गाँव से बाहर आने पर इनका फ़ार्म हाऊस दिखाई दिया। किसी फ़िल्म के बंगले की तरह बाग बगीचा सजा रखा रखा है। पुराने जमाने के ठाकुरों जैसी नई हवेली बनी हुई है।
उच्चासनस्थ धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
भदौरिया जी के घर पहुंचने पर पाबला जी तो सोने चले गए और हमने स्नान करने का कार्यक्रम बना लिया। कैसी भी परिस्थितियाँ हो दैनिक स्नान के बिना रहा नहीं जा सकता। एक बार भोजन न मिले, स्नान होने से फ़ूर्ति आ जाती है। इधर भोजन भी तैयार हो गया था। गिरीश भैया और हमने स्नान किया। भोजन लग गया तो पाबला जी भी उठ गए। भोजनोपरांत भदौरिया जी ने ब्लॉगिंग रुम दिखाया। उनकी कुछ तकनीकि समस्या का हल पाबला जी ने किया। अब हमारा लौटने का समय हो रहा था। आसमान में बारिश के आसार दिखाई दे रहे थे। पाबला जी ने पालिथिन की आवश्यक्ता महसूस की। लेकिन भदौरिया जी के यहाँ इंतजाम नहीं हो सका। उन्होने कहा कि व्यंकट नगर में मिल जाएगी, नहीं तो पेंड्रारोड़ में तो मिलना तय है।
बरसात शुरु
जैसे ही हम पोंड़ी से बाहर निकले, बूंदा बांदी शुरु हो गई। व्यंकट नगर के बाद पेंड्रा रोड़ तक की सड़क बहुत खराब निकली। इकहरी सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे थे। धीरे-धीरे हम आगे सरकते रहे। लगभग 4 बजे हमने गौरेला में प्रवेश किया। अब पेंड्रा में हमने पालिथिन ढूंढनी प्रारंभ की। तब तक बरसात बढ चुकी थी। 10 मिनट की मूसलाधार वर्षा में ही पेंड्रा की सड़कों पर पानी भर चुका था। नाली और सड़क बराबर हो चुकी थी। सुरभि लाज वाले चौराहे पर हमने कई दुकानों पर पालिथिन तलाश की, नहीं मिली। फ़िर एक दुकानदार ने बताया कि चौराहे पर फ़लां दुकान में मिल जाएगी। मैने पाबला जी से गाड़ी में छाता होने के बारे में पूछा तो उन्होने छाता निकाल कर दिया।
गांव की डगर पर मातृशक्ति
मैं छतरी लेकर बरसते मेह में पालिथिन लेने गया। बरसात बहुत अधिक हो रही थी। दुकानदार से 2 मीटर पालिथिन ली और बांधने के लिए साथ में सुतली भी। गिरीश भैया ने चद्दर पकड़ रखी थी। पानी गाड़ी के भीतर आने लगा था। जिससे बैग भीग रहे थे। हमने बैग बीच वाली सीट पर रख लिए। अब बरसात रुके तो पालिथिन भी लगाई जाए। नगर की गलियों में चक्कर लगाते रहे, न रास्ता मिला, न पालिथिन लगाने के लिए स्थान। पेंड्रा से बिलासपुर जाने के लिए 3 रास्ते हैं। पहला जटका पसान कटघोरा होते हुए बिलासपुर। 2सरा कारीआम, मझगंवा होते हुए रतनपुर से बिलासपुर और 3सरा अचानकमार के जंगलों से कोटा होते हुए बिलासपुर। इसमें पहला मार्ग लम्बा है। दूसरा मार्ग खराब है, एक बार हम पहले भुगत चुके थे। तीसरे मार्ग पर जाना था।
तेरा पीछा न छोड़ूंगा………
मुझे याद था कि रेल्वे लाईन पार करने के बाद दो रास्ते निकलते हैं बांई तरफ़ बिलासपुर के लिए तथा दांई तरफ़ अमरकटंक के लिए। जब हम रास्ता ढूंढ रहे थे तब मालकिन का फ़ोन आया - कहां तक पहुचे हैं? अभी पेंड्रा में है, बिलासपुर के लिए निकल रहे हैं। - इतनी देर कैसे हो गई? अभी फ़ोन बंद करो, हम बारिश में फ़ंसे हैं बाद में बात करते हैं। - हमारा दिमाग भन्ना गया। जैसे तैसे करके हमें रास्ता मिल गया। एक जगह गाड़ी खड़ी करके डिक्की पर पालिथिन चढा ली। चलो अब बरसात भी होती है तो अधिक हानि नहीं होगी। जीपीएस वाली बाई ने कई बार धोखे से खराब रास्ते में डाल दिया था इसलिए उस पर सहज विश्वास नहीं हो रहा था। अगर रात को कोटा वाले जंगली रास्ते पर पड़ गए तो फ़िर लक्ष्मण झूला झूलते हुए रात काटनी पड़ती तथा इस मार्ग पर रात में अन्य वाहन भी नहीं चलते।
बढते कदम
अब हम रास्ते पर बढ चले थे। केंवची पहुंचते तक शाम ढल चुकी थी। केंवची के होटल में हमने चाय पी और अचानकमार के जंगल में प्रवेश कर गए। भारी वाहनों के लिए शाम छ: बजे के बाद प्रवेश वर्जित है। केंवची के प्रवेश करने पर घाटी पर ही गाड़ी चलती है। एक स्थान पर सड़क किनारे महिला दिखाई दी। उसने सलवार सूट पहन रखा था। सुनसान सड़क पर महिला दिखाई देने से सबसे पहले ध्यान आता है चमड़े के जहाज का व्यवसाय तथा दूसरा ध्यान आता है कोई परेतिन हो सकती है। हम परीक्षण करने के लिए रुके तो नहीं, लेकिन गिरीश भैया के साथ चर्चा अवश्य शुरु हो गई। नारी विमर्श पर गहन चर्चा के साथ हास परिहास होते रहा और गाड़ी आगे बढते रही।
चलती है गाड़ी उड़ती है धूल
पहाड़ी समाप्त होने पर वन विभाग का चेक नाका आता है। वहाँ गाड़ी का नम्बर और आने का समय दर्ज किया जाता है। फ़ारेस्ट वाले ने एक सवारी भी लाद दी हमारे साथ। उसे अचानकमार गाँव जाना था। लाठीधारी अनजान आदमी को हमने गाड़ी में बैठा लिया। उसके बैठते ही दारु का भभका सीधा नाक से टकराया। लगा कि चौकी से ही हैप्पी बर्थ डे मना कर आ रहा है या हो सकता है चौकी तक महुआ पहुंचाने गया होगा। उसे हमने अचानकमार में छोड़ा और आगे बढ़े। रात के 8 बजे होगें। लग रहा था कि 9 बजे तक बिलासपुर पहुंच पाना संभव नहीं है। मौसम बरसाती हो गया था। कोटा होते हुए हम बिलासपुर रिंग रोड़ से निकल लिए। यह रिंग रोड़ लगभग 15 किलोमीटर का है और सीधे हिर्री मांईस के समीप जाकर निकलता है। 
नेपाल से लौटते तक लौकी 60 रुपए किलो हो गई 
पिछली गर्मी में आया था तो सड़क की हालत अच्छी थी लेकिन बरसात में ओव्हर लोड गाड़ियों ने इसकी गत मार दी। हमारी गाड़ी की चाल नहीं सुधरी। हम वैसे ही लड़खड़ाते हुए आगे बढते रहे। आधे - पौन घंटे के बाद हम मुख्य मार्ग तक पहुच चुके थे। रायपुर बिलासपुर मार्ग का निर्माण चल रहा है। इसे 4 लाईन बनाया जा रहा है। नींद की झपकी आने लगी थी। हिर्री के आगे चलकर एक स्थान पर ढाबा दिखाई दिया। यहाँ हमने उड़द की काली दाल के साथ तंदूरी रोटियों से पेट भरा। ढाबे वाले सरदार जी पुराने पत्रकार निकले। गिरीश जी ने वर्षों के बाद भी उन्हें पह्चान लिया। सड़क पर ढाबा चलाने के लिए एक - दो अखबारों की एजेंसी लेने से धौंस जम ही जाती है।
गुड़हल का फ़ूल धीरेंद्र भदौरिया जी के बगीचे में
भोजन के बाद हमें नींद आने लगी। मेरी तो आँखे खुल ही नहीं रही थी। आंखे खोलने का प्रयत्न करता लेकिन आँखों को बंद होने से नहीं रोक पा रहा था। पाबला जी की हालत भी कुछ वैसी ही थी। हमने गाड़ी सड़क के किनारे लगा कर सोने का फ़ैसला किया। जब आँख खुल जाएगी तो आगे चल पड़ेगें।  सीट लम्बी करके सो गए। लेकिन नींद आती कहाँ है ऐसी परिस्थितियों में। थोड़ी देर बाद पाबला जी हड़बड़ा कर उठे। मेरी आँख खुल गई, लगा कि जैसे उनकी सांस बंद हो गई है। उन्होने हाथ के इशारे मुझसे पानी मांगा। मैने तुरंत पानी की बोतल उन्हे पकड़ाई। जब उन्होने सांस ली तो मेरी जान में जान आई। वे बोले- रात को सोने भी नहीं देता, रेल पटरियों पर बिखरा नजर आता है। मैं चुप हो गया और उनसे सोने का प्रयत्न करने को कहा।

हिर्री मांइस के पास के ढाबे में
थोड़ी देर आराम करने के बाद हम फ़िर चल पड़े। रात गहराती जा रही थी। बिलासपुर रायपुर मार्ग पर रात में गाड़ी चलाना भी खतरे से खाली नहीं है। सारी हैवी लोडेड ट्रकें चलती है और रोज कोई न कोई हादसा होते ही रहता है। अगर आप सही चल रहे हैं तो कोई भरोसा नहीं ट्रक वाला ही आपसे भिड़ जाए। धरसींवा चरोदा से आगे बढने पर हम विधानसभा वाले रोड़ पर मुड़ गए। इधर से जल्दी पहुंचने की संभावना थी। सड़क और प्लाई ओव्हर के कारण लाईटों की चकाचौंध में रोड़ ही समझ नहीं आया। थोड़ी देर तक पाबला जी से नोक झोंक होते रही। फ़िर उन्होने चुप करवा दिया और आगे बढे। थोड़ी देर में गिरीश जी के घर पहुंच गए। गिरीश जी को घर छोड़ा। मेरा नेट श्रेया रायपुर ले आई थी। बिना नेट के जग सूना।
ब्लेक बाक्स सफ़र का साथी
नेट लेने के लिए हमने फ़ैसला किया कि कृषक नगर से नेट लेकर नई राजधानी होते हुए घर पहुंच जाएगें। भाई को फ़ोन करके बता दिया कि हम पहुंच रहे हैं वो नेट लेकर घर के बाहर मिले। वैसा ही हुआ, हम अब नई राजधानी होकर अभनपुर पहुंच गए। लगभग सुबह के 4 बज रहे थे। पाबला जी को यहाँ से 50 किलोमीटर दूर भिलाई जाना था। मैं घर के गेट के सामने उतर गया। पाबला जी सत श्री अकाल कह कर मेरी यात्रा को विराम दिया और आगे बढ गए। सत श्री अकाल के उद्भोष के साथ हमारी यात्रा प्रारंभ हुई थी। करतार ने हमारी साप्ताहिक यात्रा को सफ़ल बनाते हुए सकुशल घर पहुंचा दिया। इस तरह हमारी नेपाल यात्रा सम्पन्न हुई। मारुति इको ने विश्वास के साथ इतना लम्बा सफ़र निभाया। उसके साथ जीपीएस वाली बाई को भी धन्यवाद। आज भी सज्जे-खब्बे की उसकी मधुर आवाज मेरे कानों में गुंजती है। 

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

ओस कण से निर्मित मंदिर : स्वयंभूनाथ

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
रबार स्क्वेयर से हमारी बस स्वयंभूनाथ मंदिर की ओर चल पड़ी। भूखाग्नि में तो सभी झुलस रहे थे। मंदिर के समीप ही एक रेस्टोरेंट में नाश्ते का कार्यक्रम था। वहाँ पहुंचने पर थोड़ी देर के लिए विश्राम का समय मिल गया। सुशीलापुरी जी हमें दरबार स्क्वेयर में मिली थी। उनका एक ठिकाना काठमांडू में भी है, वे वहीं ठहरी हुई थी। इस रेस्टोरेंट में पहुंच कर जिसे जहाँ जगह मिली वो वहीं टिक गया। नास्ते के बतौर सिर्फ़ 2 ही विकल्प थे, चाऊमीन एवं फ़्राई राईस। किसी ने चाऊमीन का आर्डर दिया तो किसी ने चावल का। मैने चाऊमीन खाने की सोची और आर्डर दे दिया। नाश्ता आते तक हम फ़ोटो ग्राफ़ी करते रहे। पहले चावल दिया गया। हमारी चाऊमीन बाद में आई। नाश्तोपरांत स्मृतियों में संजोने के लिए एक ग्रुप फ़ोटो यहाँ ली गई।

स्वयंभूनाथ स्तूप (शाक्य मुनि मंदिर) का शिखर
दूर से ही स्वयंभूनाथ मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था। साथ ही उसमें बनी हुई बड़ी बड़ी आँखे भी। हमने स्वयंभूनाथ के मंदिर में प्रवेश करने के लिए विदेशियों के लिए 50 नेपाली रुपए का शुल्क है। स्थानीय लोगों के लिए नि:शुल्क प्रवेश है। द्वार से प्रवेश करते ही सामने हिरण्यमय धातू की चमक चढाए जल कुंड के बीच बुद्ध की मूर्ति स्थानक मुद्रा में दिखाई दी। यहाँ पर गिरीश भैया के कुछ चित्र लिया। मुकेश सिन्हा भी चित्र स्पर्धा में कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होने भी खटाखट खटका दबाया। पहाड़ी पर बने हुए स्तूप तक जाने के लिए पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों के समीप ही वज्रयान का प्रतीक चिन्ह वज्र रखा हुआ है।  जिसे लोहे की पट्टियों से बांधा हुआ है।
ब्लॉगर्स का सामुहिक छाया चित्र

ऊँची पहाड़ी पर बने इस मंदिर पर जाने के लिए पूर्व की ओर सड़क से सीढ़ियाँ बनी हैं, जिसके दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष हैं तथा दस-दस फुट के फासले पर भूमि-स्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की कई मूर्तियाँ रखी हुई हैं। इसके साथ ही बीच-बीच में गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियाँ भी हैं। इनके दोनों ओर मयूर और गरुड़ की मूर्तियाँ हैं। सीढ़ियों के लगभग मध्य में दो हाथियों की मूर्तियाँ हैं और अंत में वीरासन में बैठे दो सिहों की प्रतिमाएँ। अंतिम सीढ़ी पर धर्मधातुमंडल पर स्वर्णमंडित वज्र बना है। इस चक्र में गाय, सूअर, गेंडा, सिंह, शेर आदि बारह विभिन्न पशु-पक्षियों की सजीव मूर्तियाँ, उत्कीर्ण  मंत्रचक्र हैं। ये बारह पशु-पक्षी तिब्बती वर्ष के बारह महीनों के प्रतीक हैं। इस स्तूप के परिसर में मंदिरों और चैत्यों की भरमार है, जो काठमांडू में हिंदू-बौद्ध समन्वय का बहुत अच्छा उदाहरण है।
स्वयंभूनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार एवं टिकिट खिड़की

पैड़ियों से चल कर हम एक विशाल प्रांगण में पहुचते हैं। यहां प्रस्तर निर्मित मनौती स्तूप दिखाई देते हैं साथ ही प्रस्तर निर्मित भूमि स्पर्श मुद्रा में, ध्यान मुद्रा में, स्थानक मुद्रा में बुद्ध की भिन्न भिन्न प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। मेरे साथ संपत मोरारका जी भी पहुंच गई धीरे-धीरे टहलते हुए। उनकी हिम्मत को सलाम करना ही पड़ेगा। कई साथी तो सीढियों की चढाई देखकर नीचे रह गए, सम्पत जी को पर्यटन का बड़ा शौक है, जो उन्हें स्वयंभूनाथ तक खींच लाया। सम्पत जी के कैमरे से मैने उनके चित्र लिए। इस प्रांगण में नेपाल के शिल्प विक्रय की कई दुकाने हैं। जहाँ बौद्ध धर्म के वज्रयान से संबंधित तांत्रिक मुद्राओं वाले मुखौटे बेचे जाते हैं। मुझे एक कड़ा पसंद आया था, लेकिन उसका मालिक नहीं था दुकान में। 
दो यायावर - बंदा और बुद्ध

यह स्तूप काठमांडू घाटी का प्राचीनतम बौद्ध स्तूप (चैत्य) है। स्थापत्य-कला की दृष्टि से अद्वितीय होने के साथ-साथ प्राकृतिक स्थल की दृष्टि से भी यह अत्यंत मनमोहक है। स्थानीय लोगों की यह मान्यता है कि स्वयंभू के स्तूप के शिखर पर चारों दिशाओं में बने विशाल एवं दैदीप्यमान नेत्र काठमांडू के हर नागरिक के क्रिया-कलाप को हर पल देख रहे हैं, अतः किसी भी व्यक्ति को कोई बुरा काम नहीं करना चाहिए। स्थापत्य-कला की दृष्टि से स्वयंभूनाथ अद्वितीय है। इस स्तूप का व्यास साठ फुट है और शिखर तक की ऊँचाई लगभग तीस फुट होगी। स्तूप के शीर्ष पर दस फुट ऊँची वर्गाकार कुर्सी बनी है, जिसकी चारों दिशाओं पर धातु और हाथी-दाँत से निर्मित दो विशाल नेत्र हैं। इस वर्गाकार कुर्सी के मुंडेर के ऊपर चारों ओर पंचकोणीय फ्रेम बने हैं। इनमें हरेक में नीचे की पंक्ति में बुद्ध की ध्यान-मुद्रा में चार पीतल की चमकती मूर्तियाँ हैं। इनके ऊपर मध्य में भूमि-स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति है।
कांस्य शिल्प

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी एक कहानी है, जिसे बौद्ध पंथी मान्यता देते हैं। यहाँ उपस्थित एक लामा (जिनक नाम भूल गया) कहते हैं कि इस मंदिर का निर्माण ओस के कणों से हुआ है। शांतिवास नामक बौद्ध धर्मावलम्बी राजा था। इस स्थान पर तांत्रिक साधनाएं होती थी, जिसके लिए नर बलियाँ दी जाती थी। वह नर बलि देने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने फ़ैसला किया और अपने पुत्र से कहा, ''कल सुबह सूर्य उगने से पहले भोर के अंधेरे में तुम मेरी तलवार लेकर प्याऊ पर जाना। वहाँ मेरी मूर्ति के नीचे एक व्यक्ति सफ़ेद चादर ओढ़े सोया होगा। तुम बिना चादर को हटाए देवी का स्मरण करके उस आदमी की बलि दे देना।''
मनौती स्तूप

आज्ञाकारी राजकुमार ने पिता की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। लेकिन जब राजकुमार ने उत्सुकतावश मृत व्यक्ति की चादर हटाई, तो उसका कलेजा धक रह गया। वह मृत व्यक्ति और कोई नहीं, स्वयं उसके पिता राजा थे। राजकुमार को असीम दुःख हुआ। एक रात उसे वज्रयोगिनी देवी ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ''जहाँ पर तुमने राजा का वध किया है, उसी पहाड़ की चोटी पर तुम शाक्य मुनि (भगवान बुद्ध) का स्तूप बनवाओ। तभी तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है।''दूसरे दिन राजकुमार ने स्वप्न की बात अपने दरबारियों को बताई। सभी ने मंदिर बनवाने के विचार का अनुमोदन किया। 
पाप नाशक यंत्र और गिरीश भैया

फौरन ही मंदिर बनाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं। दूर-दूर से चूना, पत्थर, मिट्टी आदि लाई गई और हज़ारों आदमी उस सामग्री को बांस के टोकरों में भरकर पीठ पर लादकर पहाड़ की चोटी पर पहुँचाने में लग गए। परंतु दुर्भाग्य ने राजकुमार का पीछा नहीं छोड़ा। पूरी घाटी में पानी का भयंकर अकाल पड़ा। एक बूँद वर्षा नहीं हुई। सभी सरोवर, नदी, नाले और तालाब सूख गए। लोगों के घर के कुएँ भी सूख गए। ऐसे संकट में मंदिर बनाने के लिए पानी जुटाना बहुत मुश्किल हो गया। राजकुमार को एक युक्ति सूझी, उसने पहाड़ी के इर्द-गिर्द चारों तरफ़ रात में सैंकड़ों सफ़ेद चादरें बिछवा दीं। सुबह के समय आकाश से पड़नेवाली ओस-बिंदुओं से चादरें गीली हो जातीं, उन्हें निचोड़कर पानी इकट्ठा किया जाता, फिर उससे मंदिर-निर्माण किया जाता।
लेखिका सम्पत मोरारका जी

दिन में मंदिर का निर्माण कार्य होता था, तो रात में कोई राक्षस आकर उसे बिगाड़ जाता था। सभी लोग बहुत परेशान थे। एक रात लोगों ने छिपकर उस दानव को देखा। सैंकड़ों लोग मशालें जलाकर तलवार, बरछा लेकर उस दानव के पीछे भागे और उसे घाटी से दूर पहाड़ के उस पार भगाकर दम लिया। हज़ारों लोगों के रात-दिन के परिश्रम से जब स्वयंभू-मंदिर बनकर तैयार हुआ, तब उस घाटी में वर्षा हुई। पानी आया और यहाँ के निवासी खुशहाल हुए। तब से इस घाटी में कभी भी पानी का संकट नहीं आया है। इस कहानी को सुनकर बौद्ध स्तूप के निर्माण के विषय में ज्ञानार्जन हुआ। मेरे अतिरिक्त गिरीश पंकज, सुनीता यादव, शैलेष भारतवासी, मुकेश सिन्हा, सम्पत मोरारका जी ने ओ3म मणि पद्में हूँ बीज मंत्र लिखे चक्रों को घुमाया। 
इस चित्र में व्यवधान हुआ 

सुनीता यादव जी के साथ कुछ चित्र लिए तथा चित्रों के साथ प्रयोग भी किए। जूम करके चित्र लेते हुए सब्जेक्ट एवं कैमरे के बीच यदि कोई आ जाए और उसी समय क्लिक हो जाए तो दिमाग की बत्ती ही गुल हो जाती है। ऐसे ही एक चित्र खराब होने से मेरा मुड चढ गया सातवें आसमान पर। सुनीता जी ने कई चित्र लिए मेरे। लेकिन सभी चित्रों में भृकुटि तनी हुई है चेहरे से सौम्यता एवं सहजता फ़ना हो गई। यही होता है मेरे साथ, यदि मेरे मन की नहीं हो पाती और मैं कुछ कह या कर न पाऊं तो काफ़ी देर तक मानसिक स्थिति डांवा डोल रहती है। जब उस वाकये की तरफ़ से ध्यान हट जाए और कुछ हँसी मजाक इत्यादि साथियों के साथ हो जाए तब सामान्य स्थिति आती है।
लामा

सांझ हो रही थी, पक्षी अपने घोंसलों की और लौट रहे थे। स्वयंभूनाथ का रमणीय दृश्य हमें स्थान छोड़ने ही नहीं दे रहा था। थोड़ा समय होता तो इस मंदिर के प्रस्तर शिल्प की पड़ताल करता तथा स्मृति आलेख ढूंढता। परन्तु हमारे पास इतना समय नहीं था। पराधीने सपनेहू सुख नाहिं। हमारी काठमांडू यात्रा परिकल्पना के अधीन चल रही थी। हम स्तूप से बाहर आ गए और बस के समीप पहुंच गए। काफ़ी साथी बस में बैठ चुके थे। वहीं पर छोटी सी रेहड़ी पर मालाएं चूड़ियाँ इत्यादि एक लड़की बेच रही थी। उसकी दूकान पर मुझे एक बड़े मनकों वाली माला दिखाई, जिसे गाँव में हम गाय-बैलों को पहनाते हैं। 
वज्रयान का प्रतीक वज्र

ये मालाएं वर्तमान में आधुनिक नारियाँ धारण करती हैं, मनुष्य के फ़ैशन में भी प्रचलन में आ गई है। मैने सोचा कि एक माला ले ली जाए। जल्दबाजी में मोल भाव करके 100 नेपाली रुपए में सौदा पटा। माला लेकर हम बस में आए तो किसी ने देखने लिए मांगी। तो उसने बताया कि माला का लॉकेट टूटा हुआ है। हम दौड़ कर माला वापस करने गए, तो दुकान वाली लड़की को धमकाए कि धोखाधड़ी करती है। वह बोली कि माला टूटी हुई थी इसलिए हमने कम भाव में दी। उससे  पैसे लेकर हम बस में आ कर बैठ गए।
इसी चित्र में हमने कलाकारी की थी-एम एफ़ हुसैन के घोड़े जैसा बादल

सारी सवारियाँ आ चुकी थी, पाबला जी नदारत थे। अब पाबला जी की खोज शुरु हुई, कहीं दिखाई नहीं दिए। तो नेपाल की सीमा पर लिया हुआ नेपाली नम्बर अब काम आया। उन्हें फ़ोन लगा कर पूछा तो वे बोले कि आप बस लेकर आ जाईए, मैं नीचे रास्ते में मिल जाऊंगा कहीं। अब उन्हें भी काठमांडू के स्थान का नाम नहीं मालूम और हमें भी। जैसे कह देते कि राम लाल की आटा चक्की के पास खड़ा हूँ या चुनौटी लाल के पान ठेले के पास मिलुंगा। फ़िर हमने दुबारा फ़ोन मिलाया तो यही जवाब आया। हमने बस ड्रायवर को कह दिया कि चलिए, आगे कहीं रास्ते में पाबला जी मिल जाएगें। रास्ते में पाबला जी मिल गए और हम सांझ का अंधेरा होते होते होटल रिव्हर व्यू में पहुंच गए। लेकिन रिव्हर कहीं दिखाई नहीं दी।

नेपाल यात्रा आगे पढे……… जारी है।

रविवार, 12 मई 2013

तरीघाट में प्राचीन सभ्यता के अवशेष

 जे. आर. भगत 

भनपुर से 14 किलोमीटर की दूरी पर प्रवाहित खारुन नदी के बांए तट पर बसा है तरीघाट गाँव। तरीघाट जैसा की नाम से प्रतीत होता है कि यह कोई नदी का निचले किनारे स्थित घाट होगा, इसलिए तरीघाट कहलाता है। खारुन नदी रायपुर एवं दुर्ग जिले को विभाजित करती है। एक किनारा रायपुर जिले में है और दूसरा किनारा दुर्ग जिले में। खारुन नदी में पानी बारहों महीने रहता है और भिलाई या पाटन जाने के लिए इस नदी को डोंगी से पार करके जाना पड़ता था। फ़िर एक दशक पूर्व पास के गाँव वाले रपटा बना लेते थे और उससे जाने वाले से कुछ शुल्क लेकर कमाई करते थे। मैने मोटर सायकिल से खारुन नदी को कई बार पार किया और कभी इसके काई लगे पत्थरों पर बाईक सहित गिरकर घुटने भी फ़ोड़वाए। कुछ वर्षों पहले इस नदी पर पुल बन गया और आवागमन सहज होने लगा।

अतुल प्रधान, नरेन्द्र शुक्ल, जे. आर. भगत उत्खनन का शुभारम्भ  
अभनपुर से दुर्ग जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग सदियों से हो रहा है। अब इस अंचल से प्राचीन कालीन मानव बसाहट के अवशेष मिलने लगे हैं। रास्ते  के गाँव चंडी में देवी का प्रसिद्ध मंदिर है तथा इसका निर्माण भोसला राजाओं द्वारा किया प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिण दिशा में तालाब का भी निर्माण हुआ है तथा सैनिक बसाहट के भी चिन्ह मिलते हैं। इससे आगे चलने पर नदी के दांए तट पर परसुलिडीह गाँव एवं बांए तट पर तरीघाट गाँव बसा है। परसुलिडीह से ही नदी के उस पार बड़े बड़े टीले दिखाई देने लगते हैं। इन टीलों पर अकोल के वृक्षों की भरमार है। इन टीलों की सतह पर काले और लाल मृदा भांड के अवशेष पाए जाते हैं। जिससे सिद्ध होता है कि इस स्थान प्राचीन बसाहट रही होगी। ग्रामीणों ने यहाँ महामाया का मंदिर बना रखा है और एक टीले पर रावण भी विराजमान होने से यह रावण भाटा भी है।

पॉटरी यार्ड
छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग के उप संचालन जे आर भगत ने विधिवत सर्वे कर शासन से इस स्थान पर उत्खनन की अनुमति प्राप्त की। 17 मार्च को लगभग सांय 4 बजे तत्कालीन पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के संचालक नरेन्द्र शुक्ला ने उत्खनन का शुभारंभ किया और इस स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। उत्खनन सहयोगी के रुप में अतुल प्रधान यहाँ मुस्तैदी से तैनात हैं। कुछ दिनों के बाद रावण भाटा वाले स्थान पर उत्खनन प्रारंभ हो गया। 23 मार्च को मैं यहाँ पहुंचा तो बसाहट के चिन्ह उजागर हो चुके थे। यहाँ बसाहट के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल एवं गुप्त काल तक के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। इससे यह तो तय है कि छत्तीसगढ़ में मल्हार के बाद पहली बार कहीं इतनी पुरानी सभ्यता के चिन्ह प्राप्त हो रहे हैं।

टीले पर उत्खनन और पार्श्व में खारुन नदी 
उत्खनन में सिरपुर जैसी कोई बड़ी संरचना तो प्राप्त नहीं  हो रही, परन्तु टेराकोटा के बर्तन, मूर्तियाँ, बीटस बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही लोहा, तांबा से बनी वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। मानवोपयोगी दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएं दिया, मटकी, सुराही, मर्तबान, सिल-बट्टा, सिरेमिक का एड़ी घिसने का बट्टा इत्यादि भी प्राप्त हो रहा है। सुत्रों से प्राप्त सूचना के आधार ज्ञात हुआ है कि कुषाण वंशीय तांबे के सिक्कों के साथ गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। लोहे के औजारों में भालों के फ़ाल, ठेकी के मुसल का लोहा इत्यादि प्राप्त हुआ है। इन प्राप्तियों से छत्तीसगढ़ के इतिहास में परिवर्तन होगा एवं इतिहास समृद्ध भी होगा। जे आर भगत उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से उत्साहित है और कहते हैं कि हो सकता है यहाँ 16 महाजनपदों में से किसी एक जनपद के अवशेष प्राप्त हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इस साईट की तिथि सिरपुर से भी आगे निकल गई है।

उत्खनन में प्राप्त संरचना का स्तर 
तरीघाट के आस-पास के गाँवों में भी पुरा सामग्रियाँ प्राप्त हो रही हैं। जिसका तत्त्कालिक उदाहरण ग्राम पंदर में मनरेगा के दौरान उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं हैं। इससे जाहिर होता है कि सातवाहनों का प्रसार पाटन तक था एवं गाँव का पंदर नाम बंदर का अपभ्रंश हो सकता है। नदी के किनारे यहाँ पर पहले कभी डाक यार्ड रहा होगा। तरीघाट में स्थित इन 4 टीलों के चारों तरफ़ पत्थर के परकोटे बने हुए हैं। जब यहाँ बसाहट थी तो ये परकोटे सुरक्षा घेरे का काम करते थे। उत्खनन के दौरान ज्ञात हुआ कि सभी घर पंक्तिबद्ध रुप से बसे थे और उनके बीच चौड़ी सड़क के साथ गलियाँ भी थी। कई घरों से रसोई प्राप्त हुई है, जहाँ चुल्हे की राख के साथ के मिट्टी के दैनिक उपयोग के बर्तन प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के दीये बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। उत्खनन सतत चल रहा है तथा प्राचीन सभ्यता के चिन्ह निरंतर अनावृत हो रहे हैं। मेरा अनुमान है कि नदी के किनारे इस स्थान पर सैनिक छावनियाँ हो सकती हैं। आगे उत्खनन से और भी स्थिति साफ़ होगी तथा ज्ञात होगा कि इस स्थान का इतिहास में क्या महत्व  था?

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल हॉल
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।