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रविवार, 3 दिसंबर 2017

कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

हजार बार टटोलता हूँ घर से निकलने पहले आधारकार्ड को, भूल तो नहीं गया। अगर किसी ने आधार पूछ लिया और न मिला तो कहीं परग्रही करार न दे दिया जाऊं, अच्छा भला आदमी पी के हो जाएगा। भले ही और भी कुछ जरुरी सामान छूट जाए, पर आधार नहीं छूटना चाहिए वरना निराधार चपेट में आने का खतरा बना रहता है। 
सफ़र के दौरान हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर ही टिकिट के साथ पहचान पत्र दिखाना पड़ता है, अब आदमी कितने पहचान पत्र रखे, आधार दिखाने से काम चल जाता है, भले ही फ़ोटो किसी और की सी लगे, पर सुरक्षा अधिकारी आधार देखते ही भीतर जाने दे देता है, समझता है कि देश का जिम्मेदार एवं ईमानदार नागरिक है, जो निराधार नहीं है। 
पूरे सफ़र में घर लौटते तक दिमाग पर आधार ही छाया रहता है, बैठे-बैठे चौंक कर अनायास ही आधारकार्ड पर हाथ चला जाता है, जरा टटोल लूँ कहीं भूल तो नहीं आया। बैग में भी कई जेबें होती है, इधर वाली में रखकर उधर वाली में टटोलने पर अगर आधारकार्ड नहीं मिलता तो माथे से पसीने की बूंदे चूह जाती हैं। फ़िर सारा सामान उलटकर आधार मिलने पर जो संतुष्टि होती है, उसका बयान नहीं कर सकता।
एक बरस पहले ही बैंक मैनेजर ने आधारकार्ड मांग लिया था, कहा कि खाते से आधारकार्ड लिंक करना पड़ेगा, उसके बाद रसोई गैस भी आधारकार्ड से लिंक हो गई, अब तो हालात ये हो गए हैं कि सांसे भी आधारकार्ड से स्वत: लिंक हो गई हैं। चौबीस घंटे में जितनी सांसे लेता हूँ पूरी गिनती आधारकार्ड बता देता है। राशन से लेकर प्राशन तक सब आधार हो गया है। 
कुछ दिन पहले नगर पंचायत से कूड़े के दो डिब्बे (नीले-हरे) वितरण करने के लिए कर्मचारी आए। डिब्बे रखने के बाद उन्होंने पहले आधारकार्ड मांगा। पंजी में आधारकार्ड नम्बर दर्ज करने के बाद उन्होंने दोनो डिब्बे मेरे सुपूर्द किए और कहा कि आजकल तो हर चीज में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है। बिना आधार कोई भी शासकीय सुविधा नहीं मिल सकती। शासकीय अस्पताल में आधारकार्ड अनिवार्य हो गया है, जिसके पास आधारकार्ड नहीं, उसको ईलाज कराने की पात्रता नहीं।
कुछ दिनों पहले एक समाचार सोशल मीडिया में वायरल हो रहा था कि फ़रीदाबाद के श्मशान से। जहाँ बड़ा सारा सूचना पट लगा है, जिसमें लिखा है कि मृतक का आधार कार्ड लाना जरुरी है, नहीं तो संस्कार नहीं होगा। लो जी! आधार ने अब तक तो जीना मुहाल कर रखा था अब मरना भी दुष्कर हो गया। 
लगता है कि अगर बिना आधार कार्ड मर गए और जबरिया अंतिम संस्कार कर भी दिया तो ऊपर बिना आधार कार्ड के यमराज जी स्वीकार नहीं करेंगे। दुआरे से लात मार दिए जाओगे, न नीचे के रहोगे न ऊपर के। मैं तो यह सोचकर हलकान हूँ कि अब न जाने कितने त्रिशंकू ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाएंगे निराधार होकर। राम जाने कितनी कर्मनाशाएँ धराएँ पर अवतरित होंगी।
इन सब हालात को देखकर भगवान से एक ही विनती है कि अब किसी को धरती पर भेजे तो बिना आधारकार्ड के न भेजे। ऊपर से सीधे आधार नम्बर प्रिंटेट बॉडी भेजे। माथे पर लिखा हुआ आधार नम्बर दूर से ही दिख जाए। न खो ने झंझट, न ढूंढने का लफ़ड़ा। न दिल दिमाग आधार के पीछे लगा रहे। यहाँ तो जिन्दगी आधारकार्ड संभालने और नम्बर दर्ज कराने में बीत रही है। भाई इतना तो रहम करो, आधार के बिना जीने नहीं दे रहे, कम से कम मरने तो दो। कलजुग केवल नाम आधारा, टमर टमर नर उतरहिं पारा।

सोमवार, 19 नवंबर 2012

चचा छक्कन और चोर पार्टी की सदारत

सुबह की सैर के वक्त चचा छक्कन दिखाई दे गए, दुआ सलाम के साथ हाल-चाल खैरियत का आदान-प्रदान हुआ। "क्या बताएं मियाँ महंगाई ने हालत ख़राब कर दी, जीना मुहाल हो गया। वैसे भी खानदानी होने के चलते हम सरकार की किसी भी एपीएल, बीपीएल जैसे योजना के खांचे में फिट नहीं होते। ऊपर से खुदा के फजल से दर्जन भर बच्चों की फ़ौज तैयार हो गयी। कोई गरीब मानने को तैयार ही नहीं होता। ऐसे में हमारे जैसे निठल्ले साहित्यकार का तो सवा सत्यानाश समझिये। कभी-कभार एक दो मुशायरे कवि सम्मलेन मिल जाते थे, वे भी छद्म श्री की भेंट चढ़ गए। जिसकी छाती पर बिल्ला लटक गया, समझो उससे बड़ा ठेकेदार कोई नहीं। सारे के सारे धन के स्रोतों का प्रवाह उसकी जेब में जाकर गिरता है। गोया उनकी जेब ना हुई,बंगाल की खाड़ी हो गई।" चचा ने जाफरान की खुश्बू का फव्वारा मुंह से छोड़ते हुए कहा। 
"बजा फ़रमाया चचा आपने, कुछ ऐसा ही अपना भी हो गया है। 4 साल से इंटरनेट का कुंजी पटल खटखटाते जेब में छेद हो गया। ऊपर से महंगाई ने तो कनिहा ही तोड़ कर रख दिया है। एक काम करिए, किसी राजनैतिक पार्टी के मेम्बर बन जाइये। फिर धीरे से एकाध पद ले लीजिये, सत्ता वाली पार्टी हो तो पौ बारह जानिए। आपकी जेब भी बंगाल की खाड़ी से कम न रहेगी। फिर हम भी तो हैं आपके साथ ही, जिसकी भी जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने कहेगें, आपके आदेश का पालन करते हुए, तत्काल कर दी जाएगी।" मैंने चचा की जेब में झांकते हुए कहा। "चलो उस पुलिया पर बैठ कर चर्चा करते हैं, तुम्हारी सलाह पर गौर किया जाएगा।" चचा ने कहा।  पुलिया पर झाड़-पोंछ कर बैठने के बाद चचा ने जेब से खैनी निकाली और घिसने लगे। खैनी घिसने का मतलब था की वे चिंतन में व्यस्त थे। थोड़ी देर बाद मुझे खैनी दी और डिबिया जेब के हवाले की।
चलो मियाँ अब तुम्हारी सलाह मान लेते हैं, वैसे भी हम कुछ ढीठ किस्म के इन्सान हैं. एक बार जो सोच लिया वह सोच लिया। ठीक है चचा फिर मिलते हैं ब्रेक के बाद। इस मुलाकात के बाद हम अपने काम में लग गए और चचा अपने नए धंधे में। अपनी व्यस्तताओं के चलते एक-डेढ़ बरस में चचा से मुलाकात ही नहीं हुई।  एक दिन चचा के घर के बाहर बड़ी सी होर्डिंग लगे देखी। उसमे लगी फोटो में चचा ने कलफ लगी अचकन और शेरवानी पहनी हुई थी, ऐनक के पीछे से नूर टपक रहा था। चचा की आदमकद फोटो थी और बड़े नेताओं की छोटी। मैंने एक सरसरी निगाह डाली और आगे बढ़ गया। लौटते हुए मेरी निगाह होर्डिंग पर पड़ी तो गायब थी। मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया।
अगले दिन मुझे सुबह की सैर के वक्त चचा मिल गए। दुआ सलाम के बाद खैरियत पूछने पर उन्होंने मुझे ही निशाने पर ले लिया - आप भी कमाल करते हैं मियाँ, मुझे फंसा कर खुद रफूचक्कर हो लिए, उस दिन के बाद आज खैर-खबर ले रहे हो। अरे कौन सा पहाड़ टूट पड़ा चचा, जो सुबह-सुबह ही फायर हुए जा रहे हो- मैंने चचा से आँख मिलाते हुए कहा। अरे मत पूछो हमारा हाल, वो तो हम ही जानते हैं या उपर बैठा वो जानता है। सालों ने जीना हराम कर दिया, इससे तो निठल्ले ही भले थे- चचा ने पैजामे से ऐनक पोंछते हुए कहा। कुछ तो बताओगे चचा, सियासी पार्टी में तो सभी चांदी काट रहे हैं। जिनको खाने का सऊर नहीं वो भी छिलके समेत केला गटक रहे हैं। जिनके पास भुनाने को कभी दाने नहीं थे वे भाड़ के मालिक बने बैठे हैं और एक आप हैं जो मुझे ही लानत-मलानत  जा रहे हैं।
जब यही बात यही बात है तो सुनो, चचा ने आँखों पर ऐनक लगते हुए कहा - मंत्री जी के चेले ने कहा कि चचा अब आप अध्यक्ष बन गए हैं चोर पार्टी के, कम से कम अपने नेताओं को खुश करने के लिए एक दो होर्डिंग ही लगवा दो। उसमे आपकी फोटो भी रहेगी और नेताओं की भी। इससे आपके नंबर बनने के चांस बढ़ जायेगे और मंत्री जी की गुड बुक में आपका नाम दर्ज हो जायेगा। मियाँ, यहाँ के सियासी दांव-पेंच हमारी समझ से बाहर थे। हमने होर्डिंग बनवा कर लगाव दी। होर्डिंग लगवाने के एक घंटे के बाद ही छुटकू नेता जी का फोन आ गया। बोले कि बहुत बड़े नेता बनते हो चचा, होर्डिंग में अपनी फोटो बड़ी और हमारी फोटो छोटी लगवा दी। कहीं ऐसा न हो आपके पर कतरने पड़ें। हमने तुरंत होर्डिंग उतरवा दी। तभी एक नेता और पहुँच गए, वो कहने लगे कि चचा होर्डिंग हटवाने के बाद दूसरी बनवा कर लगवाइए। 
अब हमने जो होर्डिंग बनवाई, उसमे अपनी फोटो छोटी लगाई, पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं को सिर पर बैठाया। लोकल नेताओं की फोटू लगवाई। मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो लगवाई। होर्डिंग लगते ही मंत्री जी का फोन आ गया, बोले कि इतनी जल्दी बड़ी सियासत सीख गए चचा। हमारे विरोधी की फोटो बड़ी और हमारी छोटी लगाई है, हमें नीचा दिखाने के लिए, देखो कहीं आपकी लुटिया न डूब जाये। अब मियाँ हमने फिर होर्डिंग उतरवाई, दूसरी बनवाई, इसमें मंत्री जी और अध्यक्ष जी की फोटो बराबर करके लगवाई, फीते से नाप कर। होर्डिंग लगते ही जेलर के जासूस फिर सक्रिय हो गए। अध्यक्ष जी का फोन आया, क्या मजाक बना रखा है चचा आपने। मंत्री बड़ा होता है या संगठन का अध्यक्ष ? हमने उसे टिकिट दी है तब मंत्री बना है और हमारी फोटो आपने मंत्री के बराबर लगवा दी। हम आपको सस्पेंड करते है। समाचार कल के अख़बारों में देख लेना।
हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। बड़ी देर तक घिघियाए, अध्यक्ष जी हमें गरियाते रहे, फनफनाते रहे। बड़ी  मुस्किल से माने और हम सस्पेंड होने से बच गए। हमने होर्डिंग फिर उतरवा दी। अगले दिन मंत्री जी का फोन आ गया कि होर्डिंग क्यों हटवाई? हमने कहा कि कल के तूफान में होर्डिंग उड़ गयी। मंत्री जी ने कहा कि होर्डिंग फिर बनवाई जाये। उनका आदेश सुनते ही हमारी तो पुतलियाँ फिर गयी और गश आ गया। चुन्नू की अम्मा ने हमें लुढकते देख लिया और पानी के छींटे मारे तब होश आया। होश में आते ही हमने अपना इस्तीफा लिख दिया और अध्यक्ष जी को भेज दिया। हमें छक्कन मियाँ  ही बने रहने दिया जाए। साल भर से ढक्कन बने हुए थे। ये सियासत भी बड़ी गन्दी चीज है मियाँ। होर्डिंग की फोटो से ही इनके कद बड़े-छोटे हो जाते हैं, लानत है इन पर। लाहौल बिला कुव्वत, लौट कर बुद्धू घर को आए। बंगाल की खाड़ी तो नहीं बनी हमारी जेब, हाँ! कंगाल की खाड़ी जरुर हो गयी। अब हम किसी के चक्कर में नहीं फंसेंगे, हम भले और हमारा कुनबा भला।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस: लो भई हम भी सम्मानित हो गए -------------- ललित शर्मा

दो दिन से इंटरनेट सता रहा था, थक हार कर शिकायत करने मुझे बी एस एन एल (bsnl) के दफ़्तर में जाना पड़ा, वहाँ एक बैनर लगा था। जिसमें लिखा हुआ था "हिन्दी पखवाड़ा"। बैनर देख कर मुझे लगा कि अब सरकारी तौर हिन्दी को याद करने का मौसम आ गया। इसके लिए विभागों ने अलग से बजट जारी किया होगा और हिन्दी दिवस पर कोई कार्यक्रम करके हाई टी या महाभोज द्वारा खर्च किया जाएगा। दो-चार विभागीय तुक्कड़ों को सम्मान-पत्र एवं शाल श्रीफ़ल देकर सम्मानित किया जाएगा। फ़िर हिन्दी पखवाड़े की इति श्री हो जाएगी। कमोबेश सभी सरकारी आयोजन इसी तरह होगें। पान चबा कर पीक से मुंह और कुरते को रंगने वाले कुछ घिसे-पिटे झोला छाप तथाकथित साहित्यकारों की जै-जै हो जाएगी। अगले दिन से सरकारी काम काज फ़िर राज महिषी अंग्रेजी की छत्र छाया में प्रारंभ हो जाएगा। अरे! कोई हमारी जै जै करे तो बात बने। बरसों हो गए कीबोर्ड तोड़ते हुए।

दफ़्तर से बाहर आते समय एक जबरिया साहित्यकार जी से मुलाकात हो गयी, उन्होने अपने झोले से एक निमंत्रण पत्र निकाला और लिफ़ाफ़े पर बिना नाम लिखे ही मुझे सादर समर्पित किया। साथ करबद्ध कुटिल मुस्कान के साथ सरकारी सहयोग से उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रम का निमंत्रण दिया। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और कहा कि समय मिलने पर आपके कार्यक्रम में अवश्य ही पहुंचने का प्रयास करुंगा। क्योंकि हिंदी दिवस ही वर्ष में एक दिन ऐसा आता है जिस दिन कहीं से जुगाड़ कर दो चार सम्मान पत्र कबाड़ लिए जाते हैं। कम से कम साहित्य जगत के मित्रों पर रौब जमाने के काम आते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण दिन किसी फ़ोकटिया कार्यक्रम में जाकर समय खराब करना बुद्धिमानी नहीं है। अगर आपकी संस्था द्वारा सम्मान करवाएं तो मैं अवश्य आ सकता हूँ।

उन्होने कुटिल मुस्कान के साथ पान की पीक के साथ थूक छलकाते हुए कहा - भैया इस साल के तो सब सम्मान बुक हो गए हैं, कहें तो अगले वर्ष की बुकिंग अभी से कर देता हूँ। मैने हामी भर ली - अरे भाई हजार-दू हजार की जरुरत पड़े तो वह भी बता दीजिएगा, संकोच न कीजिएगा, समझे कि नहीं। उन्होने कहा - हाँ भैया, बगैर मुद्रा के मुख मुद्रा ही नहीं बनती। देखिए न कितने सारे मुद्रा राक्षस फ़िर रहे हैं, मुद्रा की थैली धर के कहीं सम्मान हो जाए तो बात बने। पर आप किंचित भी संशय न रखें। आगामी वर्ष के लिए आपका सम्मान तय समझिए। सम्मान पत्र के साथ में साथ शाल और श्रीफ़ल भी बुक रहा। मैने प्रसन्न मुद्रा में उनकी जय-जय कार की और आगे बढ लिया।

रास्ते में सम्मान के थोक व्यापारी चचा मिल गए, गालिबन वे भी पान चबाते हुए सायकिल ओंटते चले जा रहे थे। मुझे देखते ही रोक ली सायकिल और सामने के जंग खाकर टूटे हुए दांतो के बीच से एक लम्बी पीक मारी। थोड़ी ही दूरी बच गयी वरना हमारा एक्शन का चकाचक जूता शर्म से लाल हो जाता। कहाँ से आ रहे हो मियां?- पीक मारते ही सवाल की तोप दाग दी। राम राम चचा, हम तनि ई ऑफ़िस से आ रहे हैं। अच्छा अच्छा, हिन्दी दिवस का कौनो कार्यक्रम का निमंत्रण है का हिंया का? नहीं चचा, हमारा इंटरनेट खराब हो गया है, वह उसका बी पी उपर नीचे होते रहता है। कहीं रात को हृदयाघात न हो जाए यही सोच कर चले आए थे। फ़िर कल हिन्दी दिवस है। अगर एक लेख हिन्दी पर नहीं लिखेगें तो लोग बाग सोचेगें कि साल भर हिन्दी को घोरते रहते है और जब मौका आए तो लिखना ही भूल गए। बस यही सोच कर साहब से मिलने चले आए थे।

चचा कहने लगे कि - का बताएं भतीजे, बड़ा खराब जमाना आ गया है। हमने प्रतिवर्षानुसार हिन्दी दिवस पर सम्मान समारोह आयोजित किया है इस बार कोई दिख ही नहीं रहा किसका सम्मान किया जाए। जिसके पास जाते हैं वही बुक मिलता है। कहता है कि चचा विलंब से आए हम तो फ़लां-फ़लां के कार्यक्रम में बुक हो गए हैं। अब बताओ भतीजे हम इतने बरसों से सम्मान बांट रहे हैं अगर इस दिन सम्मान नहीं बांट पाए तो हमारी अंतर्रात्मा हमें धिक्कारेगी कि हिन्दी के लिए कुछ किए नहीं। सोचो जरा हिन्दी लेखन करने वाले साहित्यकार का हिन्दी दिवस के दिन शाल श्रीफ़ल से कहीं सम्मान न हो तो कितनी अपमान की बात है। वो दिन भी क्या दिन थे जब लोग सम्मान करवाने के लिए बरसों पहले सम्पर्क करके बुकिंग करवाते थे। तब कहीं जाकर उनका नम्बर आता था। हमें मालूम नहीं था कि इतने बुरे दिन भी आएगें। संकट के समय अपना ही काम आता है तो तुम्हें रोक लिए।

निराश न होईए चचा, आदेश कीजिए मैं आपका क्या प्रिय कर सकता हूँ, चचा की आँखों में झांकते हुए मैने कहा। मुझे तुमसे यही आशा थी, मुझे मालूम था कि तुम मुझे निराश नहीं करोगे। कुछ खर्चा वर्चा दो तो कोई पुराना सभागृह बुक करवा लेता हूँ एक दो अतिथि और मुख्यातिथि तय करने पड़ने पड़ेगें। बहुत काम है, अब जल्दी से कुछ नगदऊ दर्शन कराए दो- चचा जीभ से लार ट्पकाते हुए बोले। मैने कहा - का बताएं चचा, इतने बुरे दिन आ गए हैं कि गाहे-बगाहे लोग हिन्दी को गरियाते रहते हैं कि हिन्दी रोजगार देने वाली भाषा नहीं है। क्या करेगें हिन्दी सीख कर, हिन्दी बोल कर। जब रोजगार ही नहीं मिलेगा तो पेट कहाँ से भरेगा। बड़े-बड़े नामवर लोगों का हिन्दी लिख बोल कर पेट नहीं भरा, वे दिन भर पानी पीकर डकारते रहते हैं झेंप मिटाने के लिए, ताकि लोगों को अहसास हो, भर पेट खाकर आए हैं। आप कौन सा तीर मार लोगे हिन्दी की हिमायत करके ?

मेरे पास भी इतनी रकम नहीं है कि आपको देकर सम्मानित हो जाऊं, यहाँ फ़ोकट में सम्मानित करने वालों के लगातार चलभाष पर फ़ोन आ रहे हैं अब बताओ घाटे का सौदा मैं कैसे करुं? यदि आप चाहें तो मै आपकी एक सहायता कर सकता हूँ। जिससे आपका नाम भी कायम रहेगा और सम्मान भी कायम रहेगा। चचा ने अचरज भरी निगाहों से देखते हुए कहा - बताओ, क्या करना होगा। मैने कोरा सम्मान पत्र उनके थैले में देख लिया था। उनसे कहा - आपके थैले में जो सम्मान पत्र है उसमें मेरा नाम भर दीजिए और सामने जो हिन्दी पखवाड़ा का बैनर लगा है उसके सामने मुझे दे दीजिए। वहाँ उपस्थित गार्ड और चपरासी को भी बुला लेगें, चार छ: लोग साथ में दिखेगें भी और फ़ोटो भी हो जाएगी सम्मान करते हुए, आपकी इज्जत भी कायम रहेगी और बिना खर्चे के हम भी सम्मानित हो जाएगें। अखबार में भी आपकी संस्था के द्वारा किए गए सम्मान चित्र भी छप जाएगा।

चचा बोले - मान गए भतीजे, तुम्हारी खोपड़ी को, गाल पर चुम्मा लेने का दिल कर रहा है। हम ही भकवाए हुए थे कि कैसे होगा सम्मान समारोह का आयोजन। सम्मान करके भले ही हम तीर-तलवार नहीं मार लेगें पर साल भर यह बात कचोटते रहती कि किसी साहित्यकार का सम्मान नहीं कर पाए। अगर सम्मान नहीं होगा तो न जाने कितने उदयीमान कवि साहित्यकारों की भ्रूण हत्या हो जाएगी। तुमने मुझे इस कलंक से बचा लिया। अगर हिन्दी लेखन बंद कर देगें तो हिन्दी के सम्मान का दम भरने वाली इतनी सारी संस्थाओं का क्या होगा? उन्हे आयोजन करके हिन्दी के प्रति शहीद होने का भाव प्रकट करने का अवसर कैसे मिलेगा? चलो जल्दी से तुम्हारा सम्मान कर दें, फ़िर किसी और को तलाशें, जो सम्मान के तलबगार हैं। हिन्दी पखवाड़ा के बैनर के नीचे चचा ने हमें सम्मान-पत्र देकर सम्मानित किया। गार्ड ने मेरे मोबाईल फ़ोन से यादगार चित्र लिया और हम निहाल हो गए और चचा भी।

वह साहित्यकार ही क्या जिसका सम्मान नहीं। अगर कभी हमें किताब भी छपानी पड़ी घर दुआर बेचकर, अपने खर्चे से, बिना सम्मान के हम क्या लिखेगें अपनी उपलब्धि के तौर पर। वर्तमान में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, व्यंग्य संग्रह आदि में आवरण के अंतिम पृष्ठ पर साहित्यकार को मिले हुए सम्मानों की सूची प्रकाशित करना परम्परा हो गयी है। जिसकी सम्मान  सुची जितनी बड़ी वह उतना बड़ा लेखक-साहित्यकार कहलाता है। पद्म श्री इत्यादि के लिए भी अर्जी लगाते समय उसमें भी सम्मानों की सुची मय सम्मान के प्रमाण के संलग्न करनी पड़ती है। सम्मान पाकर मैं मुदित होकर चचा को धन्यवाद दे रहा था कि यदि इसी तरह बिना खर्चे के सम्मान करते रहें तो एक दिन हिन्दी अवश्य अपने उच्च स्थान को प्राप्त करेगी। अगर यही सम्मान करने का जज्बा चचा जैसे लोगों में रहा तो हिन्दी को सम्मानित होने और हमें पद्म श्री पाने से से कौन रोक सकता है। चलते चलते मेरे होंठों से नगमा फ़ूट पड़ा, हम होगें कामयाब, हम होगें कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास………। 

बुधवार, 14 मार्च 2012

और मिसाईलें धरी रह गयी ------------ ललित शर्मा

भोर में ही घोड़े की टापों जैसे फ़ोन घनघनाने लगा, आँखे मलकर कोसते हुए फ़ोन उठाया तो परम फ़ेसबुक सखा की आवाज आई, "भैया फ़ेसबुक बंद है क्या? रात को तो बंद किया था तब तो चालु था…अब पता नहीं क्या हुआ, देखता हूँ -  मैने कहा। नेट चालु करके फ़ेसबुक खोला तो बंद मिला। बंद है यार यहाँ भी नहीं खुल रहा…। अब क्या किया जाए वह बोला…। आराम करो और क्या है……इतना कहकर मैने फ़ोन काट दिया। इधर नेट शुरु होते ही दनादन चैट पर लोग आने लगे, फ़ेसबुक बंद होने का समाचार अभनपुर से अमेरिका तक, मोकामा से मास्को तक……जरवाय से जर्मनी तक…… बिलासपुर से बुर्किनाफ़ासो तक आग की तरह फ़ैल चुका था। फ़ोन पर फ़ोन बजने लगे……। सारे फ़ेसबुकियों को लग रहा था कि फ़ेसबुक बंद हो जाएगा तो क्या करेंगे? चचा भी खांसते-खंखारते अपने कमरे से मेरे पास चले आए……और सवाल दागा… फ़ेसबुक नहीं खुल रहा है भतीजे, जरा देख लो मेरे कम्पयुटर में तो कोई खराबी नहीं है? कम्पयुटर में कोई खराबी नहीं है चचा……फ़ेसबुक ने ही अपनी दुकान बढा ली……। चचा माथे पर हाथ रख कर चिंतामग्न हो गए……

फ़ोन फ़िर बजने लगा……वही सवाल……अरे मैने क्या ठेका ले रखा है फ़ेसबुक का, या कोई मेरी हिस्सेदारी है उसमें……पूछो जकर बकर बर्ग से……फ़ेसबुक बंद किया उसने और आफ़त मेरे गले पड़ रही है……एक तो सुबह ही नींद से उठा दिया। चचा कहने लगे कि बहुत बुरा हुआ, तुम्हे क्या पता है कितने करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएगें? कितने लोग आत्महत्या कर लेगें। कितनों की गर्लफ़्रेंड उड़नतश्तरी पर बैठ कर निकल लेगीं। कितनों की खड़ी फ़सल खराब हो जाएगी……मैने भी खेत में मक्का और सुरजमुखी बो रखे है। सब बरबाद हो जाएगें, पानी नहीं मिलने से……ह्म्म……चचा फ़ेसबुकिया खेती की बात कर रहे थे। जैसे देश की खाद्यान्न समस्या के समाधान में फ़ेसबुक का ही बड़ा हाथ है। धरती पर बोए अन्न से तो इनका पेट नहीं भरता… चले अब फ़ेसबुकिया खेती से पेट भरने…। इधर फ़ेसबुक बंद होने के समाचार गुगल वाले नाच रहे थे…… फ़ेसबुकिया ग्राहक अब गुगल प्लस की ओर दिखाई देने शुरु हो गए। वहाँ किसी ने लिखा कि - फ़ेसबुक का बंद होना घोर अन्याय है। सरकार को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए……। सरकार की कार्यवाही का तो पता नहीं, पर हमने एक मेल जरुर कर दी जकर बकर बर्ग को………

घंटे भर में तो ऐसा लगा कि जैसे आपातकाल लग गया हो………नेट पर आन्दोलन की खबरें आने लगी, बच्चे, युवा, बुजुर्ग, नर,नारी, किन्नर सभी आन्दोलन में शरीक होते दिखाई दिए, विपक्ष चिल्लाने लगा कि - सरकार अकर्मण्यता से फ़ेसबुक बंद हुआ है। करोड़ों बेरोजगार हो गए……इससे देश में अराजकता फ़ैल जाएगी। करोड़ों फ़ेसबुकिए कम से कम अपने लाईक और कमेंट के चक्कर में पड़े थे…। इन्हे फ़ेसबुकिया बेरोजगारी भत्ता दिया जाना चाहिए……बड़े से लेकर छुटभैइए नेता सभी अपनी रोटी सेंकने लग गए…… फ़ेसबुकियों के समर्थन में विपक्ष खड़ा होकर बयान बाजी कर रहा था……तो मोमबत्ती ब्रिग्रेड को भी काम मिल गया। सारे एक जुट होकर चौक चौराहों पर बिहाने बिहाने मोमबत्तियाँ जलाने लगे……कुछ यूवा लाल गुलाब बांट कर गेट वेल सून करने लगे…… अन्ना के आन्दोलन से बड़ा आन्दोलन देश में दिखाई देने लगा। इतना बड़ा आन्दोलन तो भ्रष्टाचार और सुशासन में मुद्दे पर कभी नही हुआ। कुछ नेता इस स्वस्फ़ूर्त आन्दोलन बता कर जेपी आन्दोलन से तुलना कर रहे थे……।

भैंस की सानी और दूध से समय मिलते ही ताई ने फ़ेसबुक खोला तो बंद मिला………प्लस पर जाने पर समाचार मिला कि फ़ेसबुक बंद हो गया है, ड्योढी पर आकर चिल्लाने लगी… किस मुए का काम है जो इसे बंद कर दिया…… अरे काम के बाद थोड़ी फ़ुरसत मिलती थी तो यार दोस्तों से मन-तन की बतिया लेते थे……अब इनसे यह भी सहन नहीं होता… सिर पर घास का भरोटा (गट्ठर) लिए चुन्नू की माँ ने सुन लिया…… उसने वहीं पर घास का गट्ठर फ़ेंक कर दहाड़ मारी………अरे किसको आग लग गयी जिसने फ़ेसबुक बंद कर दिया…… नासपीटों से आधी आबादी की खुशी नहीं देखी जाती…… एक महिला बिल तो पास नहीं कर सके, उपर से फ़ेसबुक भी बंद कर दिया। बस फ़िर क्या था आधी आबादी उखड़ गयी और आन्दोलन की राह पर चल पड़ी। सड़क पर उतरे फ़ेसबुकियों को देख कर सरकार हिल गयी, प्रधानमंत्री की कुर्सी डांवाडोल होने लगी, सरकार की सहयोगी पार्टियों ने अल्टीमेटम दे दिया कि इस समस्या का समाधान तुरंत निकाला जाए अन्यथा हम अपना समर्थन वापस ले लेगें। प्रधानमंत्री ने सुरक्षा परिषद एवं केबिनेट की आपात बैठक बुलाई और विचार विमर्श होने लगा।

थोड़ी देर बाद सरकार के प्रवक्ता ने प्रेस कांफ़्रेस बुलाकर पत्रकारों को बताया कि - सरकार फ़ेसबुक को वापस लाने का पुरजोर प्रयास कर रही है, जकर बकर बर्ग बाथरुम में है, उसके बाहर आते ही कुछ समाधान निकल आएगा………तभी प्रवक्ता के ने फ़ोन पर कुछ बात की और बोला - फ़ेसबुक बंद होने में विदेशी शक्तियों का हाथ है…… अभी फ़ोन से जानकारी मिली है कि अफ़रा तफ़री की स्थिति को देखते हुए मौके का फ़ायदा उठाने के लिए पाकिस्तान ने काश्मीर की तरफ़ कुछ मिसाईलें तैनात कर दी है। देश के सामने भयंकर समस्या खड़ी हो गयी है… संकट की इस घड़ी में समस्त देशवासियों से अपील की जाती है कि धैर्य बनाएं और हमारी सेनाएं दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब देगीं, काश्मीर को अपने हाथ से नहीं जाने देगें। एक प्रेस कांफ़्रेस में ही मुद्दा बदल गया, सारे देश में देश भक्त्ति के गाने बजने लगे…… लोग सड़कों पर नारे लगाने लगे…… जो हमसे टकराएगा…… मिट्टी में मिल जाएगा, दूध मांगोगे तो खीर देगें, काश्मीर मांगोगे तो चीर देगें। हमारी सेनाओं ने भी अग्नि और पृथ्वी मिसाईलें इस्लामाबाद और करांची को निशाने पर लेकर तैनात कर दी…… मॉक ड्रिल करके देख ली गयी……।

दो परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र आमने सामने थे, अमेरिका की इन घटनाओं पर खास नजर थी…… क्योंकि दुनिया का नम्बरदार तो वही है, कहीं भी टाँग फ़ंसाने का विशेषाधिकार उसी के पास है। उसने कहा कि हम फ़ेसबुक चालु कराने का प्रयत्न करते हैं, तब तक युद्ध स्थगित रखा जाए और पाकिस्तान धैर्य रखे तो उसे विशेष इमदाद दी जाएगी। इधर सेनाएं आमने-सामने थी। लोग फ़ेसबुक को भूल कर दो देशों के बीच बढ रहे तनाव पर नजर रख रहे थे। लाला जी दुकान बंद करके गोदाम में ताला लगा कर बैठ गए। युद्ध के समय डबल कमाई के मंसुबे बांधने लगे। लोग अपने घरों में महीने भर का राशन जमा करने के जुगाड़ में थे। अमेरिका को पाकिस्तान ने धमकी दी कि इमदाद फ़ौरी तौर पर जारी नहीं की तो वह गौरी को छोड़ देगा। अमेरिका में सीनेट की बैठक के बाद निर्णय लिया गया कि दोनो देशों के प्रधानमंत्रियों की व्हाईट हाऊस में शिखर वार्ता करवाई जाए… शायद समस्या का  कुछ हल निकले…… शिखर वार्ता प्रारंभ हुई…… पाकिस्तान अड़ा रहा इमदाद पर और हमारे प्रधानमंत्री अड़े रहे पाक अधिकृत काश्मीर पर………वार्ता जो्र शोर से शुरु थी…… तभी अमेरिकी राष्ट्रपति के पीए ने आकर उसके कान में चुपके से बताया कि "सर फ़ेसबुक शुरु हो गया है"…………   खबर लगते ही फ़ेसबुकिए अपने काम में लग चुके थे…… और मिसाईलें धरी की धरी रह गयी…  

मंगलवार, 28 जून 2011

सास-बहु गैस-चुल्हा विमर्श -- ललित शर्मा

गैस सिलेंडर के मुल्य में वृद्धि की खबर सुनकर सभी तरफ़ हाय-तौबा मच गया। अरे 2-4 रुपए बढाने की बात हो तो चल भी जाए, परन्तु यहां 50 रुपए बढा दिए गए। मोहल्ले की औरतों में भी गंभीर चर्चा चल पड़ी।  वे सरकार को लानत-मलानत भेजने लगी।चुन्नु की मम्मी कह रही थी कि-"इससे अच्छी तो बाजपेयी की सरकार थी, जब चाहो तब सिलेंडर मिल जाता था और उसने दाम भी नहीं बढाए। इस सरकार के आते ही मुए मंत्रियों की नजर सबसे पहले गैसे सिलेंडर पर ही पड़ी।" रुप्पु की मम्मी बोली-"हाँ! इनको मुफ़्त की गैस मिल जाती है जलाने के लिए, क्या पता चले इन्हें घर-गृहस्थी चलाना कितना मुस्किल है, इस मंहगाई के जमाने में। मंहगाई दिनों-दिन बढते जा रही है। लोग त्रस्त हो गए हैं इस मुई सरकार से। हमने तो ये सोच कर वोट नहीं दिया था कि हमारा ही गला कटेगा?"

"हम औरतों को सुनता ही कौन है? जब मनमोहन सिंह ने सरकार संभाली थी तो इनकी पत्नी ने टीवी पे कहा  कि वे गैस सिलेंडर का रेट कम करने के लिए कहेगीं उनसे। इसका फ़ल यह मिला की रेट कम करने के बजाय बढा दिया। एक तरफ़ तो आधी आबादी को बराबरी का दर्जा देने के की बात कहते हैं दुसरी तरफ़ बीबी की ही नहीं सुनते, क्या खाक आधी आबादी की सुनेगें।"-चुन्नु की मम्मी बोली। तभी कामवाली सहोदरा बीच में कूद पड़ी-"बहुत मंहगाई हो गयी है बीबी जी, अब मेरे से 500 सौ रुपए में झाड़ू पोंछा नहीं होता, 200 बढाओ तो ही बात बने। गैस सिलेंडर तो मुझे भी लाना पड़ता है, रेट तो सभी के लिए बढा है।" सहोदरा के अल्टीमेटम ने रुप्पु की मम्मी के पेशानी पर बल ला दिए। एक बार दिल्ली से किसी चीज का रेट बढता है तो यहाँ दूधवाला, कामवाली, धोबी, दुकानदार, सब्जीवाले, मोह्ल्ले का गोरखा सभी अपनी मजदूरी बढा देते हैं और रुप्पु के पापा की तनख्वाह तो नहीं बढती। गुस्से में बोली -" लगता है अब तो चूल्हा ही जलाना पड़ेगा।"

इनकी बातें परछी में खाट पर बैठे-बैठे प्रभाती दादी सुन रही थी, बोली -" बहु तु जुग-जुग जीए, पहली बार दिमाग से मेरे मन की बात की है तुने। अरे मैं बरसों से झीख रही हूँ कि मुझे गैस की रोटी नहीं चाहिए, खाने से पेट में अफ़ारा हो जाता है, गैस बन जाती है। रात भर नींद नहीं आती। चुल्हे की रोटी बनाए तो कुछ बात बने। भला मनमोहन सिंह का, हम बुढों का ख्याल तो किया, गैस सिलेंडर का रेट बढा कर। मैं तो कहती हूँ कि 1000 रुपए करदे, हमें चुल्हे की रोटी तो खाने मिलेगी। फ़िर दिन भर खतरा लगा रहता है कि कब सिलेंडर फ़ूट जाए और घर तबाह हो जाए। देखा नहीं क्या तुने,पप्पी की शादी में किस तरह सिलेंडर में आग लग गयी थी, पूरे मोहल्ले में हड़कम्प मच गया था। मुझे तो लगा कि मर गयी तो उपर जाउंगी, बच गयी तो जेल जाना होगा। अच्छा हो इस मुए सिलेंडर से पीछा छूट जाए।"

इतना सुनते ही रुप्पु की मम्मी बिदक गई-" आपको तो बस इंतजार रहता है जली कटी सुनाने का। इधर सिलेंडर का रेट बढ गया है और आपको खुशी हो रही है। मैं नहीं जलाने वाली चूल्हा, चाहे कुछ भी हो जाए, कह देना अपने बेटे से। सिलेंडर का रेट भी बढ गया और हमें ही बद्दुआ दे रही हो कि रेट 1000 हो जाए। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियाँ कहाँ से आएगीं? कौन चूल्हे में अपना मुंह फ़ूंकेगा? वो जमाना निकल गया, जब देखो तक खिचड़ी में अपनी ही चम्मच घुमाते रहती हो। हमेशा रायता फ़ैलाने को तैयार रहती हो।

प्रभाती ताई को रुप्पु की मम्मी की बातें तीर सी लगी-"मैं तो मनमोहन सिंह को ही आशीर्वाद दूंगी, उसने तुम्हारे जैसी बहुओं को सीधा करने का सही इंतजाम किया है जो दिन भर खाट तोड़ते रहती है, तुम्हारी उमर में तो सबके उठने के पहले 5 किलो अनाज पीस लेती थी। फ़िर गाय भैंस का काम अलग से। तुम लोग करती क्या हो, अगर हाथ से कुछ करना पड़ जाए तो जान पे बन आती है, कभी ब्लेड प्रेसर बढता है और कभी कुछ, देखो मुझे 80 बरस की हो गयी, कोई अलेड बलेड नही है। मैं तो कहती हूँ कि सिलेंडर का रेट इतना हो जाए कि लोग खरीद ही नहीं सकें। हमारे जैसे बुढों को चूल्हे के खाने का तो सुख मिलेगा।

रामकली दादी ने भी सुर में सुर मिलाया-" जब से गैस घर में घुसी है तब से हमेशा पेट में अफ़ारा बना रहता है, गैस हो जाती है, बहु चुल्हे पे रोटी सेक दे कहती हूँ तो सुनती ही नहीं है। ठंड के दिनों में हम बूढों की मुसीबत बढ जाती है, पहले चूल्हे से घर गरम रहता था, अलाव, पूर, गोरसी जला लेते थे, सेकाई भी हो जाती थी, नींद भी आ जाती थी। यही एक सहारा था बुढों का वह भी गैस ने खतम कर दिया। जिसको भी देखो वही सुगर ब्लेड का मरीज हो गया है। दिन भर गोलियां खाते रहते हैं। मैने तो कभी जिन्दगी भर में सुई नहीं लगवाई। चूल्हे के खाने के स्वाद का मुकाबला गैस क्या करेगी? हमारी तरफ़ से तो अच्छा हुआ जो गैस का रेट बढ गया। भला हो सरकार का। चुन्नु और रुप्पु की मम्मियों ने देखा कि मामला बढ रहा है, गुजरे जमाने के रेड़ियो बंद नहीं होने वाले, दोनो अपने-अपने घर की ओर खिसक गयी-"गैस का रेट बढा कर मनमोहन सिंह ने सही नहीं किया, हमारा वोट तो अब भूल जाए, उसे मिलने से रहा..........। गैस का रेट क्या बढा, अब घर चुल्हा और गैस वाली दो पार्टियों में बंट चुका था 

गुरुवार, 10 मार्च 2011

परबतिया भौजी की लाटरी

परबतिया भौजी नेता गिरी में जाती है, जब कोई पार्टी वाला बुला लेता है रैली, सभा के लिए सौ पचास रुपया दिहाड़ी में, घुम-घुम के सब जानने लगी, कि इन्टर नेट और ई मेल-फ़ी मेल क्या होता है।

एक दिन बोली-"लल्ला हमार भी, ऊ का कहत है, हाँ! ई मेल बनाई दो।"

हमने कहा-"' क्या करेंगी भौजी ई मेल का? तुमको तो सुअर चराना है और क्या।"

भौजी कहने लगी-" देखो लल्ला, सरकार के बहुत सारी इस्कीम आवत है, जौन में गाँव के लोगन का फ़ारेन लेई जात है। हमने नई बिधि से सूअर के गोबर के ईकोफ़्रेंडली गोइठा तैयार किए हैं। उसको सरकार ने मान्यता दे दी है, उर्जा का स्रोत मान के। गैस बहुत मंहगी हो रही है। इसलिए गोइठा को सिगरी में डाल के खाना बनात हैं। हमार इस्कीम सरकार ने मान ली है और फ़ारेन मा सुअर बहुत होत है, तो हमको वहाँ ईकोफ़्रेंडली गोइठा बनाना सिखाने के लिए ले जात है। तो अब ई मेल की जरुरत नइ पड़ेगी?"

मैने परबतिया भौजी का ई मेल बना दिया और उसको आई डी पास वर्ड पकड़ा के छुट्टी पाए- "जाओ भौजी तोहार ई मेल-फ़ी मेल सब तैयार है। ये कागज पकड़ो इसमें तोहार लेटरबाक्स के ताला-चाबी है। जब खोलाना होय तो ये कागज ले के आ जाओ, बाद में मैं देख दूंगा, कोई समाचार, संदेश होय तो।

तीन दिन बाद भौजी पहुंच गयी हमारे  पास और कहने लगी-" हमार लेटर बाक्स खोल के देखो जरा कोई चिट्ठी-पतरी आई है का?

मैने उनका ई मेल चेक कि्या तो एक मेल दिखा, जिसमें अंग्रेजी में लिखा था कि आप भाग्य शाली हैं आपका 500000 पौंड का लाटरी खुल गया है। अपना पता और टेलीफ़ोन नम्बर भेजें।

मैं मेल देख ही रहा था कि भौजी फ़िर बोल पड़ी-"बताते काहे नहीं हो लल्ला, का लिखा है?

मैने बता दिया कि एक चिट्ठी आई है, इंग्लैंड से, जिसमें लिखा है कि आपकी  500000 पौंड याने लगभग 4,00,00,000 की लाटरी खुली है। सुन के भौजी को गश आ गया। मै उनके मुंह पर पानी छींट कर होश में लाया।

बड़ी मुस्किल से मुंह से बोल फ़ूटे - "तो ये बताओ लल्ला पैसा कहाँ मिलेगा? "

अरे भौजी ऐसी लाटरी खुलने की चिट्ठी तो मेरे पास दिन भर 10-20 आ ही जाती है। उसे मैं कूड़े के डब्बे में डाल देता हूँ।"

भौजी को बात कुछ हजम नहीं हुई, मुझे ही गरियाने लगी, "लल्ला हम तुम्हारी सब चाल बाजी समझत हैं। हम अनपढ हैं समझ के बेवकूफ़ बना कर पुरा रुपया हड़पना चाहत हो। हमार भी नाम परबतिया है, पाई-पाई ले के छोड़ूंगी।"

अब गश खाने का समय मेरा था। समझाऊं तो समझाऊं कैसे? भौजी सड़क पर खड़े होकर होले पढी रही थी। तभी उसने कहा कि-" हमारा लेटरबाक्स का ताला चाबी लगा के हमारा कागज वापस करो। कल हम शहर जाकर देखाएगें।" मैने सोचा, चलो बला टली। उसका कागज देकर राम-राम किया। उसके बाद भौजी 2-3 महीना दिखाई ही नहीं दी।

एक दिन खेत जाते समय मिल गयी। मैंने पूछ ही लिया -" का हुआ भौजी तोहार लाटरी का, मिल गया रुपया?

बस मेरा तो ये कहना हुआ और भौजी फ़ट पड़ी -" का बताएं लल्ला, बताने में भी शरम आत है, तुमने सही कहा था। लेकिन हमारे ही दिमाग पर पत्थर पड़ गया था। ऊ लाटरी के चक्कर मा हमार सब सुअर बेचा गए। 30,000 रुपया जमा कराए बैंक में उनके खाते में। लालच पड़ गया था  कि रुपया मिलेगा तो कम से कम सुख से तो जीएगें। जब पैसा नहीं आया तो थाने में गए रपट लिखाने, दरोगा साहब बोले, इंग्लैंड का मामला है, वहीं रपट लिखाओ जाके। बताओ अब कैसे इंग्लैंड जाएं। ये अंग्रेज बहुत बदमाश हैं, पहले यहाँ रहके लूटते रहे देश को और जब छोड़ दिए तो ई मेल से लूट रहे हैं, सत्यानाश होई जाए इनका। किस मुंह से तुम्हे बताने आते।

मैने कहा-" भौजी, लतखोर बाज नहीं आते, चाहे जितना लतिया लो, जी भर के जुतिया लो। मेरे पास हजारों बार ई मेल आया है और मैने इन्हे लतियाया है, और कहा कि मुझे आपका ईनाम-ईकराम नहीं चाहिए, धरे रहो अपने पास।" अगर इनके ई मेल से रुपया मिलता तो मैं आज देश का सबसे धनी आदमी होता, ऐसे ही फ़ालतु घर में बैठ कर कम्प्युटर नहीं खटखटाता।

नोट गंवा के भौजी हालत गंभीर है, कल की महिला सभा में जाते टैम सायकिल पिचंर हो गई। अब कैसे करें?

फ़ूलचंद चचा से 14 रुपए मांग कर ले गयी। तब इनकी सायकिल का पंचर बना। घर वाला ठहरा निखट्टू। कोई काम-धाम तो करता नहीं, दिन भर बैठे ठाले ताश पीटता हैं, और मेम साहेब बिहाने-बिहाने तगाड़ी धर के सुअर चराने निकल जाती है।

बुधवार, 9 मार्च 2011

ओम…खुजाए नम:-- खजु खजुवाए स्वाहा

असीमित परिकल्पनाओं के इस देश में सफलता का यही एक मूलमंत्र है कि…तू मेरी खुजा..मैं तेरी खुजाता हूँ…इस कार्य में खुजाने वाला भी और खजुवाने वाला ..दोनों ही खुश रहते हैं…एक के हाथों की खुजली मिट जाती है और दूसरे के बदन की  खुजाल… ऐसा आज से नहीं पुरातन काल से होता चला आया है..राजा के दरबार में मंत्री से लेकर संतरी तक सभी राजा की खुजाते थे और राजा अपने मतलब के चलते पटरानियों की..समय के साथ-साथ सत्ता परिवर्तन हुए लेकिन ये खुजाने और खजुवाने की परंपरा तब से लेकर अब तक बिना किसी अवरोध के निरंतर चलती रही| अभी तक कायम है। 
ये रोग है या फिर शौक?…इस बारे में प्राय: भिन्न-भिन्न प्रकार के मत हैं ..जिन्हें इसका  शौक या शगल नहीं है..उनके हिसाब से ये एक लाइलाज बीमारी है और जो इसके जरिये फलीभूत हो रहे हैं या होने की संभावना देख रहे हैं… उनके लिए इससे बढकर कोई और नेमत नहीं ….. कुछ लोग गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले होते हैं

अपने वक्त और ज़रूरत के हिसाब से दूसरों की खुजाते तथा अपनी खजुवाने रहते हैं और कुछ को इसकी लत लग चुकी होती है…वो हर समय बिना खुजाए या खजुवाने नहीं रह सकते|। जैसे वहम का कोई इलाज नहीं है … कोई तोड़ नहीं है … ठीक वैसे ही इस बीमारी का भी कोई इलाज … कोई तोड़ नहीं है … जिसको खुजानी है वो तो हर हालत में … हर माहौल में खुजाएगा ही … या पत्थर पर घिस लेगा और जिसको अपनी खजुवानी है वो भी कोई ना कोई बकरा ढूंढ लेगा ही..

ये खुजाने की आदत राजा से लेकर रंक तक..दुर्जन से लेकर सुजान तक…संसद से लेकर विधान तक….किसी को भी हो सकती है…और लेखक जाति के करोंदे टाईप लोग भी इसका अपवाद नहीं है…नाम के साथ-साथ दाम कमाने की चाह के चलते  कुछ बजरबट्टू टाईप के लेखक अपनी रचनाओं को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपवाने के लिए प्रकाशकों इत्यादि की तन्मयतापूर्वक खुजाने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते…तो कुछ अपने पेटपोसवा टाईप की प्रत्रिकाओं के सम्पादक अपनी पत्रिका में रिक्त रह गए स्थानों की आपूर्ति के लिए “आप बहुत बढ़िया लिखते हैं…कभी हमारे लिए भी लिखिए"  कह कर इनकी खुजाने में किसी भी तरह का संकोच या परहेज़ नहीं करते… लेकिन इस सारी बन्दर बाँट में पाठक बेचारा बिना किसी कसूर के अपच शिकार हो कै करने को मजबूर हो जाता है…

हमारे देश में खजुवाने वाली सत्ता का सबसे बड़ा केन्द्र दिल्ली है…यूँ समझिए कि ये खुजाने और खजुवाने वाले दोनों के लिए स्वर्ग है…यहाँ नेता….मंत्री की और मंत्री प्रधानमंत्री की खुजाते हैं और प्रधानमंत्री हाई कमान की खुजाने के लिए बिना किसी संकोच के अपनी दाढी खुजाते हुए दस जनपथ तक पहुँच जाते हैं…कुछ ऐसे भी निर्भाग लोग भी होते हैं इस दुनिया में जो अपनी खजुवाना तो चाहते हैं लेकिन चाहकर भी महज़ इसलिए नहीं खजुवा पाते हैं कि कोई इन्हें भाव ही नहीं देता…। ये इस आस में दिल्ली  में लगे हैं कि….कभी तो खुजाने वाली सुबह आएगी…

लोकतंत्र में सत्ता के विकेन्द्रीकरण के कारण खुजली उपर से नीचे तक सभी को समान रुप से बंट जाती है…. प्रधानमंत्री से लेकर आम टटपूंजिए नेता तक..। वह इसे अपने मुंह लगे कार्यकर्ता तक पहुंचा ही देता है…. सब खुजाने में लगे हैं। आज तक किसी ने कभी कोई शिकायत नहीं की या आन्दोलन, प्रदर्शन नहीं किया कि…. खुजली उस तक नहीं पहुंची, और उसे खुजाने का सुख नहीं मिला। जिस तरह अमेरिका के गेंहूँ के साथ कांग्रेस (गाजर) घास स्वत: ही देश में वितरित हो गयी, उसी तरह बजट के साथ खुजली का भी वितरण स्वत: सुनिश्चित हो जाता है। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।

खुजली छूत की बीमारी होने की वजह से पूर्णरूप से इसका खात्मा होना लगभग असंभव है लेकिन फिर भी कुछ नासमझ टाईप के अपवादस्वरूप लोग इस उम्मीद पे अपनी दुनिया को कायम रख बेवजह जीए चले जा रहे हैं … लेकिन इनके होने या ना होने से किसी को भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ज़्यादातर लोग सपनों की दुनिया में जीने के बजाय यथार्थ के धरातल पर खुद अपनी मेहनत और लगन से जुनून की हद तक सबकी खुजाते हुए अपने सपनों को हकीकत में बदलने का माद्दा रखते हैं…इसलिए  आईए और तू मेरी खुजा…मैं तेरी खुजाऊँ की तर्ज़ पर सभी एक दूसरे की खुजाएँ…खुजाते चले जाएँ….  सितारे बुलंद अवश्य होगें .... अस्तु

सोमवार, 7 मार्च 2011

कम इनपुट में अधिक आउटपुट का अर्थ शास्त्र : व्यंग्य

हमारा भारत देश प्राचीन काल से ही तकनीक सम्पन्न रहा है। हवाई जहाज से लेकर ब्रह्मास्त्र एवं पक्षेपास्त्र तक का निर्माण वैदिक काल में ही चुका था। पत्थर और ताम्र पत्र पर लिख कर इस ज्ञान को सहेजा गया था। जैसे-जैसे धरती की खुदाई होती है वैसे-वैसे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान सामने आकर चमत्कृत करते रहता है।

सरकार की अनुंसधान शाखा भी खुदाई करने का ही काम करती है। इसकी खुदाई भी पुरातत्व विभाग से कम नहीं होती।

सरकार के विरोधियों एवं निवृतमान सरकार के करीबी अधिकारियों की जड़ तक खुदाई करके सारे रिकार्ड जमा रखती है। जैसे ही सरकार का इशारा होता है, रिपोर्ट पेश हो जाती है। खुदाई के सारे रिकार्ड अखबारों तक पहुंच जाते हैं।

सभी सरकारें यही करते आई हैं। लेकिन कभी-कभी सरकारों को अपने ही लोगों की कारगुजारियों की जानकारी रखनी पड़ती है।

हमारे देश में एक नए अर्थशास्त्र का जन्म हुआ है। इस अर्थशास्त्र के सामने विश्व के सारे अर्थशास्त्रियों के बनाए नियम फ़ेल हो गए हैं। चाणक्य से लेकर अमर्त्य सेन तक अपनी खोपड़ी खुजा रहे हैं।

कम इनपुट से अत्यधिक आउटपुट लेने के अर्थ शास्त्र से पुरी दूनिया चकित है और भारत की इस उपलब्धि की तरफ़ मूँह फ़ाड़े देख रही है। हम भी यही कर रहे हैं।

बात यहाँ से शुरु होती है। हमारे मोहल्ले में मिश्रा जी का खटाल है, उन्होने दो भैंसे पाल रखी है। जिसमें एक दूध देती है दूसरी नहीं। मतलब क्रम से एक भैंस का दूध वर्ष भर मिलता है।

एक भैंस 10 किलो दूध देती है, लेकिन ये मोहल्ले भर में सुबह शाम 30 किलो एक नम्बर का खालिश दूध बेचते हैं। इस पर भी अगर कोई नया ग्राहक पहुंच जाता है एकाध किलो दूध लेने के लिए तो उसे वापस नहीं करते, उसके लिए भी कहीं से दूध का इंतजाम कर ही देते हैं।

उसके बाद पान चबाते हुए ठससे अपने पान की दुकान में बैठ कर कत्था-चूना लगाते रहते हैं।

ये तो रही मिश्रा जी चमत्कारिक कहानी, आगे चलते हैं, लाला जी का घी मावा सेंटर है। भैंस-गाय इनके पास एक भी नहीं है। दिन भर दुकान में लाईन लगे रहती है। कई क्विंटल शुद्ध मावा और देशी घी दिन भर में बेच लेते हैं।

गाँव के छोटे व्यापारियों से 10-20 किलो शुद्ध मावा और देशी घी खरीदते हैं बाकी शुद्ध माल सीधा फ़ैक्टरी से ही आता है पैक होकर। गाँव की सेहत बना रहे हैं, दम लगा कर और पहलवान इनकी डेयरी का घी खा रहे हैं और जोर लगाकर दम निकाल रहे हैं।

पता चला कि एक चपरासी विभाग की मास्टर चाबी है। उसकी स्वीकृति बिना किसी का जायज काम भी नहीं होता। नाजायज की बात तो छोड़िए।

हमारे पहुंचते ही सबसे पहले उनकी चपरासनिन से सामना हुआ। गोल-मटोल कम से कम आधा किलो तो सोना लाद रखा होगा, गाँव की मालगुजारिन जैसे।

शानदार मार्बल के फ़र्श वाला तीन तले का मकान और उसमें 6 किराएदार। उन्होने मुझे किराए पर मकान लेने वाला समझ लिया और कहा कि-“ यह मकान देख लें, अगर पसंद आए तो ठीक नहीं, दूसरे मोहल्ले में दो मकान और हैं, वे आपको जरुर पसंद आएगें।

कुल मिला कर चपरासी ही दो-चार करोड़ की आसामी निकला। तनखा 5-10 हजार और महीने खर्च 50,000 रुपए। इसे कहते हैं अर्थशास्त्र का चमत्कार।

कुछ दिनों पहले एक उच्चाधिकारी के यहाँ छापा पड़ा। सरकारी तनखा तो उनकी 40 से 50 हजार होगी, छापे में सम्पत्ति 400 करोड़ रुपए मिलती है।

एक के अधिकारी ने गजब ही कर दिया, उसके यहाँ से छापे में डेढ क्विंटल सोना मिला। 1801.5 करोड़ रुपया नगद। इसकी पराकाष्ठा तो तब हो जाती है, जब एक मंत्री पर 1लाख 37 हजार करोड़ रुपए का घोटाला करने का आरोप लगता है। जबकि इनको हर चीज में सरकार ने छूट दे रखी है,

1 रुपए में चाय से लेकर 20 रुपए में चिकन करी मिल जाता है। इन सब तकनीक के सामने आकर तो संसार के अर्थशास्त्र का गणित ही फ़ेल हो जाता है।

कुछ दिनों पहले भारत दौरे पर आए ओबामा आश्चर्य चकित रह गए, कम इनपुट में अधिक आउटपुट लेने की पद्धति को देख कर।

उन्होने पूछा भी कि आपके यहाँ यह चमत्कार कैसे हो जाता है? हमारे वित्त मंत्री ने कहा कि-“ये मत पूछिए कैसे होता है? लेकिन इतना बता देता हूँ कि हमारे देश में जुगाड़ से सब संभव है। अब ये भी मत पूछना कि जुगाड़ क्या होता है?

यह हमारे देश का कोका कोला की तरह का टॉप सीक्रेट फ़ार्मुला है, जो किसी को भी बताया या हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता।“

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

चुटैयानंद जी का प्रज्ञावतरण: व्यंग्य

अरबी नाम से ही लगता है कि अरब जगत का प्रोडक्ट होगा। इसकी सब्जी बड़ी स्वादिष्ट बनती है। स्थानीय भाषा में इसे कोचई कहते हैं। जैसे जिमिकंद को काटने से हाथों से में खुजलाहट और  बिना पकाए खाने से मुंह में खुजलाहट होती है उसी प्रकार कोचई का भी हाल है।

अब कोचई में बिना दही-मही डाले सब्जी बना लिए तो समझो दिन भर जय जय कार करनी पड़ेगी। क्योंकि मुंह खुजाएगा और खुजली मिटाने के लिए कुछ न कुछ बोलना ही पड़ेगा और बोलने के लिए विषय न मिले तो बाबा और बीबी की जय जयकार ही सही।

कुछ लोगों के मुंह में जन्म जात खुजली के जरासीम होते हैं। उनका मुंह रुकता ही नहीं है। चाहे उसमें पैरा(धान का तूड़ा) ही घुसेड़ दो। बिना बोले मानेगें नहीं।

कई लोगों में यह बीमारी प्रज्ञा अवतरण के पश्चात आती है। प्रज्ञा अवतरण संस्कार याने (मुंडन कराने एवं कान फ़ूंका कर गुरु बनाने) के बाद आता है। इसके पश्चात प्रज्ञा जागने की सौ प्रतिशत गारंटी होती है।

जिसकी प्रज्ञा न जागे समझो वह साधना नहीं करता है और गुरु के आदेश का पालन नहीं करता है। निम्न कोटि का चेला है। अब उच्च कोटि का पट्ट चेला बनने के लिए कुछ तो उद्यम करना ही पड़ेगा। बात यूँ हुई कि चंडालानंद ओभरसियर के अंतर में खलबली मच रही थी।

उन्हे ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या दिखने लगा था। एक दिन किसी ने सलाह दे दी कि डामर, गिट्टी बहुत खा लिए अब कुछ धर्म का काम भी कर लो। पाप को पचाने के लिए सत्कर्म का चुरण भी होना चाहिए।

सलाह उन्हे जंच गयी, हरिद्वार जाकर मुंड मुंडाए और कान फ़ुंकाए, धर्म-ध्वजा के संवाहक हो गए। गुरु धारण करते ही नाम चुटैयानंद बदल लिए, सबसे पहले हमारे पास ही पहुंचे और वहाँ की सब कहानी बताए।

कहने लगे महाराज-“कुछ सत्कर्म तो करना ही चाहिए। माटी का चोला है क्या साथ लेकर जाना है। सब यहीं रह जाएगा।“ उनके अंतर में वैराग भाव जागृत हो गया। दिन भर लोगों के पास घूम-घूम कर धर्म प्रचार करते रहे।

कुछ दिनों के पश्चात इन्हे चेले चपाटी भी मिल गए। चेले भी एक से एक, सारे मिल कर ज्ञान बांटने लगे। मतलब यह हुआ कि सभी ने कोचई (अरबी) का स्वाद ले लिया। दिन रात मुंह खुजाता था इनका और ये 24X7 चैनल बन कर लोगों का दिमाग चाटते थे।

अगर कहीं इन्हे माईक मिल गया तो फ़िर क्या पूछने! धुंआधार प्रज्ञा प्रसाद वितरण शुरु हो जाता था। एक बार की बात है, इनके चेले ने पास के गाँव में प्रवचन कार्यक्रम का आयोजित कर लिया।

रात को 9 बजे हमारे पास आए और बोले –“महाराज आपको इस कार्यक्रम में चलना ही पड़ेगा। गाँव वालों ने आपको विशेष निमंत्रण दिया है। वे आपको सुनना चाहते हैं।“ मैने रात होने के कारण मना कर दिया। वे माने ही नहीं, उनके हठ करने पर मुझे जाना ही पड़ा।

जब गाँव में पहुंच कर देखा तो सुंदर मंच बना हुआ था। माईक और लाईट की शानदार व्यवस्था थी। चार-पांच चेले तैनात थे। श्रोताओं का इंतजार हो रहा था। बार-बार घोषणा होने के बाद भी श्रोता श्रद्धालु नहीं आ रहे थे।

उन्होने मुझसे कहा कि-“महाराज आप चालु करो, आपको सुन कर लोग आ जाएगें।“ मैं तो आपका मान रखने के लिए आ गया था, मेरा मन नहीं है प्रवचन करने का, आप ही करें।–मैने कहा।

उन्हे तो मन चाही मुराद मिल गयी। रात 11 बजे से जो शुरु हुए संस्कार ज्ञान बांटने के लिए तो भोर के चार बज गए। कुछ मिला कर छ: मनुष्य और 14 कुत्ते मिला कर 20 प्राणी उनका प्रवचन सुन कर निहाल होते रहे।

वे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अंत में मुझे ही उन्हे जाकर संदेश देना पड़ा कि –“ स्वामी जी, अब प्रवचन को विराम दीजिए, सारे गांव वाले घर से ही श्रवण कर कृतार्थ हो गए हैं और हम भी यहाँ बैठे बैठे  धन्य हो गए।

आपको धन्यवाद देते हैं कि आपने हमारा ज्ञानरंजन किया। रही बात इन 14 कुत्तों की तो ये आपके प्रवचन के प्रभाव से जब अगले जन्म में मनुष्य योनि में जन्म लेगें तो, आपको अवश्य ही धन्यवाद देने आएगें।

तब कहीं जाकर बड़ी मुस्किल से उन्होने माईक छोड़ा। एक ऊंघ रहे चेले ने आभार प्रदर्शन किया। चुटैयानंद बोले-“बड़ा मजा आ रहा था प्रवचन में महाराज आपने बीच में ही समापन करवा दिया।“ अब हम क्या कहते निरत्तुर थे, बेशरम की झाड़ियाँ तो दे्खी थी लेकिन बेशरम का महावृक्ष अभी देखा था। मैं तो एक सलाह देना चाहता हूँ कि अगर शांति से जीवन गुजर-बसर करना है तो इन कोचई(अरबी) खाने वालों से बचें। अगर नहीं बच सकते तो खुद भी कोचई खाना शुरु कर दें, कहा गया है”लोहे को लोहा ही काटता है।”

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

इनकम टैक्स छापा और वेवफ़ा मुर्गी : व्यंग्य

पूछ-परख दो तरह के लोगों की ही होती है, कुख्यात या विख्यात। कुख्यात होने के लिए दुष्कर्म करने पड़ते हैं, विख्यात होने के लिए सत्कर्म। जीवन भर सत्कर्म करो लेकिन कोई पूछने वाला नहीं रहता।
लेकिन एक बार किसी हवाले-घोटाले में नाम आ जाए सारा जग उससे परिचित हो जाता है। परसों की ही बात है, एक पत्थर की दूकान वाले के यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ गया। जैसे ही यह खबर शहर में फ़ैली, पड़ोसी को बुखार चढ गया। 
आते ही बोला-“महाराज किरपा करो, इनकम टैक्स वालों ने बैंड बजा रखी है।“

मैने कहा-“बढिया तो हो रहा है, जिसकी इनकम नहीं उसकी कदर नहीं और तुमने कौन सी कसर छोड़ रखी है। यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ सब खदाने तुम्हारी ही हैं। करोड़ों का कारोबार चलता है।“

“प्रभु ऐसा नहीं है, जैसा आप समझते हैं। ग्राहक फ़ंसाने के लिए रोल पट्टी तो देना पड़ता है। थोड़ा बहुत क्या झूठ बोल दिया, पंगे ही गले पड़ गए।“

“मतलब जैसा तुम कहते हो वैसा नहीं है, मतलब सरासर झूठ। कंगले के कंगले। तब तो ठीक है कि तुम्हारे यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ जाए।“

“मरवाओगे क्या प्रभु मुझे।“ माथे पर पसीना चुचवाते वह बोला।

“अरे भाई जिस कंगले के यहां इनकम टैक्स का छापा पड़ जाता है। उसकी मार्केट वैल्यु बढ जाती है। बाजार में जिसको कोई दो रुपए की उधारी न दे, छापे के बाद उसे करोड़ों की उधारी मिल जाती है। तुम्हे पता है कि नहीं कल्लु मल बनिए की बेटी का रिश्ता नहीं हो रहा था। उसका कोई रिश्तेदार इनकम टैक्स में अफ़सर है, उसने कल्लु मल के यहाँ छापा लगवा दिया। बस फ़िर क्या था दूसरे दिन से लड़के वालों की लैन लग गयी। इनकम टैक्स के छापे के बहुत फ़ायदे हैं।“

“यह तो आपने बहुत ज्ञान की बात बताई महाराज।”

“अरे मैं तो कब से चाह रहा हूँ कि मेरे घर पर भी कोई इनकम टैक्स की रेड मारे। जिससे मेरा भी नाम नामी-गिरामियों की लिस्ट में आ जाए। लेकिन ससुरे हमारा नाम का बोर्ड देख कर ही भाग लेते हैं। कहीं हम उनके गले ना पड़ जाएं, कौन कवि लेखक से पंगा ले?   कविता-व्यंग्य मार-मार मुंह सूजा देगा। न इधर के रहेंगे न उधर के।“

“हां! आज तक सुना नहीं किसी कवि-लेखक के यहाँ इनकम टैक्स का छापा पड़ा हो।“

“जिसका खुद का ही छापा खाना हो, उसे कौन कैसे छापेगा?

अब चचा को ही लो, हर कार्यक्रम में वे किसी ना किसी कवि,लेखक,साहित्यकार का सम्मान करते हैं। कार्यक्रम न भी हो तो अनुराग के साथ घर तक अभिनन्दन, सम्मान-पत्र भेज देते हैं, अब तक इतना सम्मान बाँट चुके हैं कि उनका ही सम्मान जाता रहा। 

परसों ही कह रहे थे- "कोई हमारा भी सम्मान कर दे, थोड़ा ही सही। कंगाल कर दिया सालों ने सम्मान ले-लेकर।"
हमने कहा-" इनकम टैक्स की रेड मरवा लें फ़िर देखे सम्मान की बरसा होने लगेगी चारों तरफ़ से।“

चचा को बात जंच गयी, उन्होने भी अपने रिश्तेदार से सम्पर्क किया। जल्द ही उनके यहाँ भी इनकम टैक्स की रेड पड़ जाए तो सम्मान गति को प्राप्त होएं। अब तो जिन्दगी में दो ही काम रह गए हैं सम्मान पाना और सम्मान करना। अब चैन नहीं है। रिश्तेदार भी ने भी सोचा कि इस कंगले के यहाँ इनकम टैक्स की रेड पड़वा दुंगा तो साला और भी अधिक अकड़ कर चलेगा। अभी तो अपने मतलब से पेट में घुसा जा रहा है। उसने भी बदला लिया। चचा के दुश्मन पड़ोसी के यहां इनकम टैक्स की रेड पड़वा दी।

पड़ोसी के यहाँ इनकम टैक्स की रेड की खबर सुनते ही चचा झनझना गए। कैसे-कैसे रिश्तेदार हैं विपत्ति के टैम काम भी नहीं आते। वो तो कल्लु मल बनिए का रिश्तेदार था जिसने उसका मार्केट में रुतबा बढा दिया। चचा के सगेवाले ने एक तीर से दो निशाने साध लिए। 

अब पड़ोसी रोज चचा को सुनाकर कहता और भीतर ही भीतर गदगद हुआ जाता –“ ऐसे पड़ोसी किसी को मत देना भगवान, मुंह में राम बगल में छूरी। शकल तो कृष्ण जैसी चिकनी चुपड़ी बना कर रखते हैं और काम कंस या दु:शासन जैसा करते हैं। अब देखो हमारे यहाँ इनकम टैक्स का छापा लगवा दिया। इनका सत्यानाश हो। ईर्ष्या में जल कर भस्म हो जाएगें हमें तो भगवान और कहीं दे देगा“

सुन कर चचा के तो बदन में आग लग जाती। अगर उनका बस चलता तो दो खून करते, पहला अपने रिश्तेदार का और दूसरा पड़ोसी। अब सुनिए मुकद्दर की बात, चचा ने मुर्गी पाल रखी थी। शुरु में तो दो चार अंडे दिए, फ़िर अंडे देने बंद कर दिए। चचा को शक हो गया कि मुर्गी अंडे कहीं दूसरी जगह जाकर देती है। गुस्से में आकर उन्होने मुर्गी को 5 दिन दबड़े में बंद कर दिया। मुर्गी ने अंडे नहीं दिए। चचा ने थक हार कर स्वीकार कर लिया कि यह मुर्गी अंडे नहीं देती। दो दिनों बाद हम उनके पड़ोसी के यहाँ दोपहर में पहुंचे। देखा कि एक मुर्गी सरपट आकर कुर्सी के उपर से टेबल की खुली दराज में घुस गयी।

मैने कहा -"मुर्गी दराज में घुस गयी निकालो उसे।"

चचा के पड़ोसी ने जवाब दिया कि- "यह चचा की मुर्गी है, अंडे मेरे यहां आकर देती है।"

 नसीब खराब हो तो अपनी मुर्गी ही अंडे पड़ोसी के यहाँ दे जाती है, इनकम टैक्स की रेड का सम्मान तो बहुत दूर की बात है। आदमी तो क्या मुर्गी भी बेवफ़ा हो जाती है।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

कल्लू मल घी वाले की बेटी और चचा गालिब

चचा की इश्कबाजी तो मशहूर है, कोतवाल साहब ने मौका देखकर बदला ले ही लिया था, लेकिन काजी की दोस्ती काम आ गयी। चचा हवालात की हवा खाने से बच गए।

कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां, रंग लाएगी अपनी फाकामस्ती एक दिन। गालिब चचा की कर्ज की मय बहुत रंग लाई। मुफ़्त की होती तो और भी रंग लाती। क्योंकि खुद खरीदी गई मय में रंग कहाँ होता है।

सितारे नहीं झिलमिलाते, चाँद भी नजर नहीं आता। छोड़ गए बालम जरुर याद आता है। इश्क भी गजब की शै है। इसका चढा हुआ खुमार उतरता कहाँ है। ताजिन्दगी कायम रहता है। थोड़ा सा झोंका चलते ही जख्म हरे हो जाते हैं। 

ड्रायवरी करते वक्त मनभावन संगीत चलना चाहिए। चाहे एक ही गीत बार बार बज रहा हो। अब कारों में कैसेट के जमाने लद गए। एफ़ एम रेड़ियो ने कसर पूरी कर दी।

गालिब चचा के जमाने में होता तो वे क्यों जाते चंडूखाने में। अचकन की जेब में रेड़ियो रख कर मन की मुराद पूरी कर लेते। न डोम टंटा होता, न कोतवाल से साबका। कल्लु खाँ को चुगली करने का मौका नहीं मिलता। खैर, कार का रेड़ियो रेंज से बाहर होते ही सरसराने लगा। जैसे सागर किनारे लहरों की घरघराहट होती है।

अब बिना गीत के मन नहीं करता ड्राईव करने का। खोपड़ी खुजाने लगती है, जब टेप बंद हो तो गाना कौन सुनाए? हम ही गुनगुनाने लगे, लेकिन कोई वाह-वाही करे तो मजा आए गाने का। पर गर्दभगान पर कोई वाह वाही कैसे करे?

मय भी कमाल की चीज है, बस इशारा कर दो कि “साथ चलो यार फ़ुल इंतजाम है।“ फ़िर तो ऐसे लोग मिल ही जाते हैं, जो गंगा तक पहुंचाकर आ जाएं। साथ न छोड़ें रास्ते भर। थोड़ी लगी होनी चाहिए।

चचा के पास मौरिस (फ़िएट) कार थी। उन्हे काली घोड़ी पसंद थी। लेकिन कार हरियाली होनी चाहिए। दरवाजे भी उसके उल्टे खुलते थे। केरोसिन तेल से चलाते थे इसलिए उसका कोई भरोसा नहीं था कि कहाँ खड़ी हो जाए।

चचा ने इसके लिए जुगाड़ किया। घर से कार निकालते ही दो बोतल डेशबोर्ड पर ऐसे रखते कि लोगों को दिख जाए। फ़िर तो चार-पाँच निठल्ले आदमी उन्हे मिल ही जाते थे। कार में बैठते ही बोतल उन्हे पकड़ा देते और शहर की ओर चल पड़ते।

जहाँ कार खड़ी होती, वहीं एक-एक गिलास उन्हे दे देते। वे भी मस्त और चचा भी मस्त। अब चाहे उनसे धक्के लगवा कर ही कार घर पहुंचानी पड़े तो वो भी काम हो जाएगा और किरासन तेल भी बच जाएगा। बड़ी जुगत लगाते थे। कल्लु खाँ तो स्थाई सेवा देता था एक अद्धे के बदले।

टेप बंद होते ही हमने भी उन्हे गाना सुनाने के लिए कहा। उनका कहना था कि उन्हे गाना नहीं आता। हम भी चक्कर में पड़ गए। जीवन विरथा चला गया इनका। एक गीत भी इंद्रधनुष के दिखने पर इन्हे नहीं आया।

जीवन में प्रेम उमड़ा ही नहीं, श्रंगार रस से रचे बसे गीत अंतर में ही नहीं उतरे। वह प्रेम को क्या जाने, वह तो गुंगे का गुड़ है। चचा की गज़ल नहीं सही, चना जोर गरम ही सही। कुछ तो चलता रहेगा।

अजब शेख तेरी जिन्दगानी गुजरी, एक शब भी न सुहानी गुजरी। मुझे तो कुछ याद नहीं रहता। चचा कहते थे सुनाने के लिए, लेकिन याद रहे तब न सुनाऊं। एक अंतरा सुनाकर चुप रह जाता।

शादी की पार्टी में आर्केष्टा हो रहा है। लोगों की फ़रमाईश चल रही है, सोफ़े पर लातें लम्बी किए काले अंगूर के रस की चुस्कियाँ ले रहे थे।

हमने भी “तेरे नैना हैं जादू भरे, ओ गोरी तेरा नैना हैं जादू भरे” की फ़रमाईश कर दी। गायक ने गाया भी उम्दा। डूब गए जादू भरे नयनों में।

सहसा देशी घी की खुश्बू तंद्रा से बाहर ले आई। इस मंहगाई के जमाने में देशी घी। कनखियों से देखा तो कल्लू मल घी वाले की बेटी मंहगाई टहलते हुए आ रही थी। लग रहा था कोई रोड़ रोलर आ रहा है घी के फ़व्वारे उड़ाते हुए।

पी.डी.एस का सारा माल ही जैसे उदरस्थ कर लिया हो, पहले तो ऐसी नहीं थी। सुंदर कमसिन काया का क्या हाल कर लिया। इतर की खुश्बू से दूर से ही पता चल जाता था कि कल्लु मल घी वाले की बेटी आ रही है।

अब तो कोई भी सेंट इतर का इस्तेमाल कर लेता है, समाज में बदलाव आ रहा है, अमीरी का रौब-दाब दिखाने के लिए घी की खुश्बू से उम्दा रास्ता कोई नहीं।

चचा भी दीदे फ़ाड़े ताक रहे थे, उनके जन्नत-ए-उलफ़िरदौस इतर के खुश्बू की देशी घी ने खाट खड़ी कर दी। वे कभी अपनी अचकन तो कभी रोड़रोलर को देखते हैं।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

कागभुसुंडी ज्योतिषी--वेलेन्टाईन डे--समाज सुधारक

वाह! वेलेन्टाईन बाबा, जब तुम आए हो हमारे देश में निठल्लों को काम मिल गया है। जो दिन भर बैठ कर ताश पीटते थे वे भी सजग हो गए हैं। छोकरे-छोकरी से लेकर डोकरे-डोकरी तक काम में लग गए हैं।

दोनो एक दूसरे पर निगाह रखे हुए हैं। किसका फ़ेंका हुआ गुलाब, किसके आंगन में गिरता है और मामला कोट कचहरी तक पहुंचता है यह तो वक्त ही बताएगा। बाग-बगीचों में अदृश्य कैमरे फ़िट हो चुके हैं।  

जाओ बेटा कहाँ तक जाते हो? फ़ूलों एवं टेडी बियर की दुकानें सज चुकी हैं। पुलिसिए भी अपने डंडे को तेल पिला कर तैयार हैं।

जनता हवलदार ने नयी नकोर चालान बुक निकाल ली है। कहीं हत्थे मत चढ जाना, बिना चालान के ही अंदर का रास्ता दिखा देगा। उसे पिछला वेलेन्टाईन याद है, जब कप्तान साहब ने फ़ीत उतारने की धमकी पिलाई थी।

शाम को कुछ निठल्ले समाज चिंतकों ने घेर लिया। गाहे-बगाहे टैम खराब करने चले आते हैं। इन्हे समाज सुधारने की घोर चिंता है। रोज कोई न कोई टापिक छेड़ ही देते हैं और खुद ही उसमें उलझ जाते हैं।

चौबे जी कहने लगे “इस वेलेन्टाईन ने तो सत्यानाश कर दिया। जो हरकतें खुले आम हो रही हैं, उससे तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। भारतीय संस्कृति का ह्रास हो रहा है। हमें यूँ ही हाथ पर हाथ धरे खाली नहीं बैठना चाहिए, कुछ करना चाहिए।“

“क्या करना चाहिए?”

“अरे! गाँव मोहल्ले में घर-घर जाकर युवाओं को समझाना चाहिए, इस विदेशी त्यौहार के फ़ेर में मत पड़ो। हमारी संस्कृति पर खतरा है। समझाने से कुछ लोगों में तो जागृति आएगी।“

“हां! आपका कहना तो सही है चौबे जी। तनि ये भी सोचिए, हमारी संस्कृति पर तोप, गोला, बारुद से हमला होते रहा है सदियों। तब तो नष्ट नहीं हुई। क्या त्यौहार मनाने से संस्कृति का नाश हो जाएगा।“-बालु बाबा गंभीरता ओढे हुए बोले।

“अरे भाई बसंत उत्सव मनाओ, फ़ाग गाओ, डफ़ और नंगाड़े बजाओ, नफ़ेरी तुनतुनाओ। किसने मना किया है? पर वेलेन्टाईन जैसे उल्टे काम तो छोड़ो।“

“वाह! क्या उम्दा रास्ता ढूंढा है आपने। जब आप फ़ाग में गाते हो “खिड़की से यार को बुलाए रेSSS। तो संस्कृति कायम रहती है?”

“अरे हमारा मुंह मत खुलवाओ?  बात निकरेगी तो बहुत दूर तक जाएगी। पिछले वेलेन्टाईन में हम तुम्हारे लड़के को घर में चौका बर्तन करने वाली फ़ूलमतिया के साथ फ़टफ़टिया पर नहीं पकड़े थे क्या? बड़े संस्कार और संस्कृति के पहरुवा बने हो”

“देखो! प्रवचन देना आसान है, लेकिन उस पर अमल करना बहुत मुस्किल। आपै खारी खात है बेचत फ़िरै कपूर। गए साल रामखिलावन के खेत में तुम्हारी छोकरी को सबने नहीं देखा था क्या? चोट्टे पंसारी के लड़के के साथ।

बात कहाँ समाज सुधारने की हो रही थी और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच गयी।  एक दूसरे की पोल खोलने लगे, धोती खींचने लगे, वाद, विवाद में बदलने लगा तो मुझे ही हस्तक्षेप करना पड़ा। नहीं तो इनका बेलनटाईन अभी ही मनने लगता।

“जाईए आप लोग बहुत देर हो गयी, घर पर प्रतीक्षा हो रही है। अपना-अपना घर संभालिए। समाज सुधारने की चिंता समाज पर ही छोड़ दीजिए। बेमतलब लट्ठम लट्ठा होने से कोई फ़ायदा नहीं है। वेलेन्टाईन मनाईए, प्रेम से रहिए।“

इधर वेलेन्टाईन डे की आहट सुनकर परदेशी राम के कान खड़े हो जाते हैं। हर बरस 14 तारीख को दिल से गुलाब लगाए, बगीचों, मॉल, वी आई पी रोड़ पर चक्कर लगाते रहते हैं।

कोई तो, कहीं तो मिलेगी दिलरुबा। साल भर सपने देखने के बाद 14 फ़रवरी को सपनों के हकीकत में बदलने का दिन आ जाता है। लेकिन पुलिस के डंडे और हिन्दुवादी संगठनों के अंडे ख्याल आते ही सार फ़ितूर उतर जाता है। पिछले साल पिछवाड़े में पड़े डंडों का दर्द आज तक है।

हिम्मते मर्दां मददे खुदा। अगर ईश्क की राह में दो चार डंडे और अंडे खा लिए तो क्या हुआ। कौन सी शर्म की बात है? शर्म तो आनी-जानी चीज है, बंदा ढीठ होना चाहिए।

हुआ यूँ कि पार्क में परदेशी राम को बैठे बहुत देर हो गयी थी, कोई अकेला आयटम नजर नहीं आ रहा था। सभी बुक थे, अब किसकी ओर दोस्ती का गुलाब बढाएं?

बैठे-बैठे थाह ले रहे थे। दो घंटे बुरबक जैसे बैठने के बाद इन्होने दुसरी जगह जाने की ठानी। जैसे ही बेंच से उठकर चलने लगे तो आवाज आई “परदेशी परदेशी जाना नहीं, मुझे छोड़ के, मुझे छोड़ के।“ इन्होने मुड़ कर देखा तो पेन्सिल जींस टॉप में सपनों की रानी दिख ही गयी।

परदेशी की तो बांछे खिल गयी। चलो मेहनत सफ़ल हुयी। ये बोले-“ कहाँ जा रहे हैं हम। येल्लो आही गए, हैप्पी वेलन्टाईन डे- कहते हुए उसकी ओर गुलाब बढाया। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ? तीन दिनों के बाद अस्पताल में ही होश आया।

बुजुर्ग कहते हैं कि इतिहास से सबक लेना चाहिए, तभी भविष्य और वर्तमान कारगर होता है। परदेशी राम ने तय कर लिया कि इस साल कागभुसुंडी ज्योतिषी से कुंडली पढवा कर जाएगें। जिससे खतरा कम हो जाएगा।

कागभुसुंडी ज्योतिषी महाराज सुबह से अपने स्थान पर पोथी पतरा लिए तैनात थे। क्योंकि वेलेन्टाईन डे पे ग्राहकों की संख्या बढ जाती है।  परदेशी राम को  जोतिस महाराज ने बता दिया की आज दक्षिणा का रेट बढ गया। सवा रुपया से काम नहीं चलेगा। परफ़ेक्ट नुश्खा चाहिए तो 251 रुपया लगेगा।  मरता क्या न करता परदेशी ने 251 रुपया महाराज के नजर किया। रुपया अंटी में धर के महाराज बल्लु को स्कूल छोड़ने गए हैं।

परदेशी मुंह फ़ाड़े दरवाजे पर बैठा है, आए तो नुश्खा बताएं। आपके पास कोई नुश्खा हो तो परदेशी की सहायता करें और वेलेन्टाईन का पुण्य लाभ अर्जित करें।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

डायरी के जर्द पन्नों से


बसंत का आगमन हो चुका है, पुराने जख्म फ़िर कुरेद रहा हूँ यानी की दैनन्दिनी के पन्ने पलट रहा हूँ। बांच रहा हूँ, कुछ पुरानी यादें जिसमें तुम टुबलाकड़ी की तरह जगमगा रही हो। मेरे दिल की धड़कने भी घरघंटी सी पीस रही हैं पुराने सूखे गुलाब को इत्र बनाने के लिए। जिससे महक उठे सारा वजूद। सामने झूल रहा है छीका, जिसमें रखा है यादों का स्नेह। वह छलक रहा है धीरे-धीरे। दूर कहीं सन्नाटे को चीरती नगाड़े की आवाज में स्वर उभर रहा है गायक का, :-

पृष्ठ 47 दिनांक 2 मार्च 1969

धीरे बहो नदिया धीरे बहो, धीरे बहो
धीरे बहो नदिया धीरे बहो
राधा जी उतरैं पार
नदिया धीरे बहो


काहेन के तोरे नाव-नउलिया काहेन के पतवार
कौन है तोरे नाव खिवैया कौने उतरै पार
नदिया धीरे बहो


अगर-चंदन के नाव-नउलिया सोनेन के पतवार
कृष्णचन्द्र हैं नाव खिवैया राधा उतरै पार
नदिया धीरे बहो

धीरे बहो नदिया धीरे बहो, यौवन की रुपी नदी की तीव्रता, चपलता एवं चंचलता विध्वंसक होती है। उछलती-उफ़नती, पहाड़ों को काटती, वनों को चीरती, हुई बेखौफ़ अल्हड़ सी आगे बढती है। चाहे जो भी सामने आ जाए, उसे ठिकाने लगा ही देती है। लेकिन जब यौवन का ज्वार उतरता है तो चूक सामने दिख ही जाती है। इसलिए नदिया धीरे बहो, बाद पछताना ठीक नहीं है। मेरी सलाह मानो तो जरा आँखें खोल लो।

पृष्ठ 74 दिनांक 8 मार्च 1973

होली का मौसम है, मौसम न सर्द है न गर्म है। गुलाबी ठंड है बासंती रंग में रंगी हुई। कल्पना में खोया हुआ हूँ। कल्पनाओं को रचने के लिए भी समय और एकांत चाहिए। आम के तले खाट पर पड़ा हुआ आँखें बंद कर लेता हूँ। यहाँ इसलिए कि व्यवधान न हो, आँखे बंद करते ही चलचित्र प्रदर्शित होता है। कल्पनाएं तुम्हारे साथ होली खेलने को मचलती हैं। रंगों का चयन करता हूँ जिससे रंगने के बाद तुम अलग ही नजर आओ और उस पर दूजा रंग न चढे। तैयार हूँ मैं, तभी एक सन्यासी कवि का गीत गूंजने लगता है-

एक थी लड़की मेरे गाँव में चंदा उसका नाम था
वह थी कली अछूती लेकिन हर भंवरा बदनाम था।

महानदी-सी लहराती थी
जैसे उसकी चाल में
पवन हठीला ज्यों थिरका हो
नौंकाओं की पाल में

प्रश्न चिन्ह सी लचक कमर में आगे पूर्ण विराम था
वह थी वनवासिन सीता-सी बिछड़ा जिसका राम था

उसकी गागर की लहरों से
सागर भी शरमाता था
गोरी पिंडलियों को धोने
पनघट तक आ जाता था

वह नदिया थी हर प्यासे को छलना उसका काम था
वह ढाला करती थी लेकिन खाली रहता जाम था।

गीत गूंजता अमराई में
चरवाहे की तान से
छंद-पंक्ति सी वह बलखाती
आंगन में अभिराम से

उमर दिवस की घटने लगती चढ़ता आता घाम था
उसका सपना देहरी पर बेसुध करता आराम था।

वह रुकती थी हाथ जोड़ कर
मलयालिन रुक जाता था
तुलसी की मंजरियों का
बोझिल मस्तक झुक जाता था

उसके चरणों में अर्पित सूरज का नम्र प्रणाम था
स्वपनिल चिंतन में उतराता मेरा दिवस तमाम था।

उसकी खोज में बाग का पंछी
बना हुआ बनजारा है
जब से वह ससुराल गयी है
मेरा गाँव कुंवारा है

उसका प्यार लूटने वाला हर प्रयत्न नाकाम था
मुझे स्मरण दहला देता है उस अंतिम शाम का।

पड़े-पड़े यही सोचता हूँ। एक तरफ़ पढाई का मौसम और दूसरी तरफ़ बासंती होली का धमाल। गत वर्ष तो एक घर में पहुंचा रंग खेलने तो खेलावन भैया होली खेलने के डर से घर की दीवाल कूद कर बाहर भाग गए और भौजी फ़्रंट में आ गई………….।


(नोट- चंदा उसका नाम था गीत आदरणीय संत पवन दीवान जी का है)

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

जेठू राम! कुर्सी खाली मत छोड़ो यार

दिल्ली से बड़े मंत्री पधारे हुए थे। मेरे परिचित थे और मुझे भी कुछ काम था उनसे। मेरे साथ जेठू राम भी था। जिस हॉल में मंत्री जी का कार्यक्रम था वहाँ बहुत सारी कुर्सियाँ लगी थी। हमने सामने  वाली कुर्सियों पर कब्जा जमा लिया। सारी कुर्सियाँ भर चुकी थी।

कुछ लोग कुर्सियों के खाली होने पर कब्जियाने के चक्कर में ताक रहे थे। मंत्री जी के स्वागत के लिए मंच से पुकार होने लगी। हमारा नाम आने पर स्वागत करने गए।

जब वापस लौटे तो जेठू राम की कुर्सी पर किसी ने कब्जा कर लिया। जेठू ने मेरी तरफ़ देखा, वह बताना चाहता था कि उसकी कुर्सी पर कब्जा हो गया,वह मायूस हो गया । 

मैने उसे गरियाते हुए और कुर्सी कब्जाने वाले को सुनाते हुए कहा कि-“ साले कुर्सी छोड़कर जाओगे तो ताकने वाले कब्जा कर ही लेगें। लोगों ने कुर्सियों के लिए इमान धरम बेच खाया, तुम्हें क्या छोड़ेगें।

दिन में कुर्सी और रात को खटिया कभी खाली नहीं छोड़नी चाहिए, नहीं तो कब्जा होने में टैम नही लगता। राजनीति करना है तो कुर्सी कभी खाली छोड़ कर नहीं जाओ।

उस पर अपना कब्जा बना कर रखो। खुल्ली गाय और खाली कुर्सी का मालिक वही होता है जिसका कब्जा होता है। इतना सुनकर भी खद्दरधारी कुर्सी नहीं छोड़ी और मुंह फ़ेर लिया, बड़े नेता जो ठहरे। जेठू खड़ा रह गया।

कभी-कभी बस में सफ़र करते हुए भी सोचना पड़ता है कि कोई वरिष्ठ महानुभाव न मिल जाएं, नहीं तो पूरा सफ़र खड़े-खड़े ही करना पड़ेगा। दूसरी अन्य सवारियाँ भी यही सोचती होगीं।

बस में चढते ही कोई पहचान वाला दिख जाए और उसे पहचान लिए तो मुसीबत समझो। सीट छोड़नी ही पड़ेगी। इसलिए पहचान लेने की बजाए मुंह फ़ेरना ही ठीक है, जैसे की उसे देखा ही नहीं।

अब तो साधन भी मिल गया है, आँखें फ़ेर कर मुंह चुराने का। बस मोबाईल का हेड फ़ोन कानों में ठूंस कर रंगीन ऐनक लगा कर आँखें बंद करके मजे से गाना सुनिए। पहचान वाला समझ जाएगा कि सो रहा है और उसे सीट भी न देनी पड़ेगी।

जब ठिकाने पर पहुचे तो अंगड़ाई लेकर उठें जैसे नींद से जागे हो और फ़िर उसकी तरफ़ देख कर कहें कि- नमस्कार जी, क्या हाल चाल है? आगे जाएगें तो मैने सीट खाली कर दी है आपके लिए।

जो सज्जन रेल के दैनिक यात्री होते हैं, उन्हे सीट कब्जा करने एवं अपनी सीट बचाकर रखने का गजब का अनुभव होता है। राजनीति में सफ़लता की संभावना अन्य से अधिक होती है।

लोकल ट्रेन आते ही प्लेट फ़ार्म पर अपने-अपने रुमाल, तौलिए, पंछे, छाते, बोतलें, अखबार लेकर तैयार हो जाते हैं जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर लगती है, खिड़कियों से अपने सामान सरका देते हैं और निश्चिंत हो जाते हैं। अगर कोई पूछता है कि सीट खाली है क्या? तो कह देते हैं कि सवारी आ रही है।

सीट उनकी और उनके बाप की हो गयी। आराम से अपनी सीट पर टांगे फ़ैलाते हुए सफ़र का मजा लेते हैं। एक दो साथी मिलते ही ताश का खेल शुरु हो जाता है। दैनिक यात्री जो ठहरे। ट्रेन में विशेष छूट रहती है इनके लिए। आर पी एफ़ से लेकर टी टी तक सब ताबेदार रहते हैं।

मैं बिलासपुर जाने के लिए लोकल में फ़ंस गया। दरवाजे से चढने लगा तब तक कब्जाने वाले सारे हथियार सीटों पर आ चुके थे। मैं खिड़की के पास एक के रुमाल पर ही बैठ गया। अब वह अपना रुमाल ढूंढता फ़िर रहा था।

बार-बार मेरे पास आता था, लेकिन कहता कुछ नहीं था। जब उसने तीसरा फ़ेरा लगाया तो मैने उससे कहा कि- क्यों मित्र क्या ढूंढ रहे हो?

उसने कहा कि- मैने यहाँ पर कहीं अपना रुमाल रखा था।, मैने रुमाल दिखाते हुए कहा कि-‘ यह तो नहीं है? उसने अपना रुमाल पहचान कर ले लिया। तो उसने मुझे धौंस जमाई कि सीट उसकी है।

मैने कहा कि- यूँ अपना सामान लावरिस छोड़ना ठीक नहीं है। कोई ले जाता तो। एक तो तुम्हारा रुमाल ईमानदारी से लौटा रहा हूँ और मुझे ही धौंस दे रहे हो। अगले स्टेशन में सीट खाली होगी वहाँ बैठ जाना। तब तक खैनी खाओ।

सीट और कुर्सी का लफ़ड़ा जमीन पर ही नहीं आसमान में भी है। मुझे चीलगाड़ी से कहीं जाना होता है तो खिड़की वाली कुर्सी की ही मांग करता हूँ और ईश कृपा से मिल भी जाती है।

एक बार रायपुर से दिल्ली के लिए चढे, अपनी कुर्सी संभाले ही थे कि पड़ोसी ने खिड़की के पास बैठने की मंशा जाहिर की। उन्हे समझाया कि मुझे खिड़की वाली सीट ही लेनी थी इसलिए आधे घंटे पहले बोर्डिंग किया।

उसने अपनी मजबूरी बताई कि- खैनी खाने के बाद थूकना पड़ता है। इसलिए खिड़की वाली सीट चाहिए। मैं समझ गया कोई नया-नया कलफ़ चढा है, ट्रेन-बस की सवारी फ़्लाईट में आ गयी। 

मैने अपनी जेब से खैनी की डिबिया निकाल कर दिखाई, और कहा कि हम भी गंवईहा है भाई, तुम्हारे से पहले जहाज चढ लिए, इसलिए अपना  देहाती जुगाड़ फ़िट  कर लिए। प्लेन में खिड़की खुलती ही नहीं है दादा, कहाँ थूकोगे?

उसने कहा कि आप कहाँ थुकते हैं? मैने कहा कि इसके लिए सामने कुर्सी में एक थैली है। जिसे अंग्रेजी में वोमैटिंग बैग कहते हैं, थूकने के लिए इसका ही इस्तेमाल करता हूँ। आप भी करिए और मजे से मौज लीजिए,

क्या बताएं? नेता से कुर्सी बचाना बड़ा मुस्किल है भैया। कुर्सी का चक्कर गजब है भाई, इसे पाना भी कठिन है तो बचाना उससे भी कठिन। 

कहते हैं कि राजा पहले रानी के पेट से पैदा होता था। सोने का सिंहासन साथ लेकर आता था। लेकिन  अब राजा पेटी के पेट से पैदा होता है और अपनी कुर्सी साथ लेकर आता है।

जनता की, जनता के द्वारा,जनता के लिए सरकार आने के बाद जिन्होने कुर्सी पकड़ी, आज तक छोड़ी ही नहीं। फ़ेविकोल लगा के चिपक गए। बिना रिनिवल के ही कुर्सी पर लदे हैं। ड्रायविंग लायसेंस के रिनिवल न होने पर जनता हवलदार चालान कर देता है।

एक्सपायरी लायसेंस से सरकार चला लेते हैं। इनका चालान कौन करे? हर छोटी कुर्सी बड़ी कुर्सी के नीचे, बड़ी कुर्सी छोटी कुर्सी के उपर है, यह सनातन परम्परा है।

कुर्सियाँ आपस में तय करती हैं किस कुर्सी पर किसे बिठाना है और किसे कुर्सी से हटाना है। कुल मिला कर कुर्सियाँ ही चलती-चलाती हैं। जमीन पर खड़े होने वाले हम लोग कमर तक झुक कर फ़र्शी सलाम ठोंकने लिए ही हैं।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

लोहे की भैंस-नया अविष्कार

लोहे का पाईप, चद्दर, एंगल, गिरारी, पुल्ली, सफ्टिंग, नट-बोल्ट, स्क्रू इकट्ठे रहा हूँ, अब मैंने जो माडल कागज पे खींचा है उसे मूर्त रूप देने के लिए जरूरत है एक वेल्डिंग मशीन की, जो इन सबको जोड़ दे।एक नया अविष्कार हो जाये, इस मानव जगत के लिए. मैं भी कुछ इस संसार को देना चाहता हूँ.।वेल्डिंग मशीन के लिए दौड़ कर पड़ोसी जागेश्वर के पास जाता हूँ-
"जरा दो घंटे के लिए तेरी वेल्डिंग मशीन दे दे यार," 
"क्या करोगे महाराज आज वेल्डिंग मशीन का?"-जागेश्वर कहता है. 
"कुछ नही थोडा पाईप एंगल वेल्डिंग करना है ।" 
वेल्डिंग मशीन घर लेकर आ जाता हूँ और मनोयोग से अपने काम में लग जाता हूँ , मेरी मशीन तैयार हो जाती है ,हो जाता है तैयार मेरा नया अविष्कार, "दूध देने वाली मशीन", 
पहले हमारे घर में गाय-भैंसों से कोठा भरा रहता था, उनकी सेवा चाकरी के लिए 5  नौकर, जो दाना-चारा पानी से लेकर सारा काम करते थे, हमें मिलता था शुद्ध दूध, दही, घी, छाछ, और उस समय गरम-गरम गुलाबी मलाई चुरा कर खाने का तो क्या आनंद था. दोपहर में जब सब आराम करते थे तो मैं चुपके से निकल कर मिटटी की हांडी का ढक्कन खोल कर एक झटके में  ही पूरी मलाई साफ कर जाता था. सबसे अधिक दूध-घी मेरे ही हिस्से में आता था. 
अब ये सब एक गुजरे जमाने की बातें हो गयी, एक दिन फिर भैंस लेने की मन में आई, मैंने माँ को राजी किया, वो तैयार हो गई.लेकिन छोटे भाई ऐसा गणित समझाया कि पूरी योजना फेल हो गई. वो हिसाब लगा कर बोला, 
"माँ देख ले हिसाब, एक भैंस खरीद कर उसे खिलाने पिलाने के बाद जो दूध हमें मिलेगा, उसमे हमें घाटा ही है और उसे पालने का सिरदर्द अलग से, इससे सस्ता तो "मोल" का दूध है और कोई समस्या भी नहीं है।"
इतने से ही मेरी योजना फेल हो गई. मैंने सोचा कि इस समस्या का हल अब मशीन से ही करना है ।कम से कम बच्चों को घी - दूध मिल जायेगा,इसलिए मैंने इस मशीन का अविष्कार किया। लोहे की मशीन, बिजली से चलने वाली, बस एक तरफ से चारा डालो, दूसरी तरफ से दूध निकालो, "नो टेंशन", अब मशीन बन गई. उसे मैंने चालू किया,चारा डाला तो तो दूध निकलने लगा, मोगेम्बो खुश हुआ. एक नया अविष्कार "लोहे की भैंस" बटन दबावों, चारा डालो, दूध निकालो, अचानक देखा कि  दूध के साथ-साथ उसी पाईप से गोबर भी निकलने लगा तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. 
"अरे! मैं तो एक गोबर निकलने का कनेक्शन बनाना ही भूल गया, गोबर को तो अलग रस्ते से निकालना पड़ेगा. नहीं तो दूध वाले रास्ते से ही आएगा, दूध का सत्यानाश हो जायेगा. नया अविष्कार फेल होने की कगार पर था. मै सर पर हाथ रख कर सोच रहा था कि क्या किया जाये? समस्या का हल कैसे निकाला जाये? 
तभी महाराजिन की धमकी भरी आवाज सुनाई दी-
"अरे! पांच बज गए हैं, क्या रात तक सोते ही रहोगे?" 
बस हो गया सत्यानाश, योजना पर पानी फिर गया, मेरे नए अविष्कार की भ्रूण हत्या हो गयी. मैंने आँख मलते हुए कहा -
"प्रिये! अगर थोड़ी देर सबर कर लेती तो सात पीढ़ी बैठे-बैठे रायल्टी खाती. एक नई स्वेत क्रांति का जन्म  होता। सारा संसार दूध से मालामाल हो जाता। देखो कितना नुकसान हो गया  मेरा? जानम समझा करो, सोते से मत जगाया करो?

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

हेलमेट और लाल बत्ती का जलवा

कुंदन भैया के कुंदन जैसे चमकते मुख मंडल पर मुर्दनी छाई हुई थी, सुबह- सुबह नुक्कड़ पर जब से चेलों ने खबर दी थी कि सरकार अब लाल बत्ती लगाने के लिए नया कानून बना रही है, तब से सुनकर चिंता ग्रस्त हो गये थे। चेले भी सामने खड़े थे। हाथ बांधे हुए। तभी चुप्पी तोड़ते हुए कुंदन भैया ने प्रश्न दागा-“तो क्या करना चाहिए। यह तो बेईज्जती वाली बात है।“
“आप बस इशारा करो भैया,जो कहोगे वो हो जाएगा” एक चेले ने कहा
“लेकिन मामला गंभीर है,इतनी आसानी से हल नहीं होगा,मुझे जरा सोचने दो,जरुरत पड़ने पर मैं कॉल करता हूँ।“
कुंदन भैया, मोहल्ले के नामी-गिरामी नेता हैं। इन्होने जब से जन्म लिया है तब से अध्यक्ष ही बनते आ रहे हैं, कहने का तात्पर्य यह है कि अध्यक्ष बनने के लिए जन्म लिया है। एक बार इन्हे मुहल्ले वालों ने मुहल्ला विकास समिति का अध्यक्ष बना दिया तब से इन्होने समझ लिया कि अध्यक्ष बनना इनका जन्म सिद्ध अधिकार है। किसी के घर में छठी का कार्यक्रम हो, किसी की मौत पर शोक सभा हो, या सुलभ शौचालय का उद्घाटन, इन्हे बस अध्यक्षता करने से मतलब है।
एक बार मोहल्ले वालों ने कहा कि-अध्यक्ष के पास एक अदद कार और लाल बत्ती का होना जरुरी है। आप कार क्यों नहीं खरीद लेते? फ़िर उस पर लाल बत्ती लगा कर चला करें, जिससे हमारे मोहल्ले की भी शान बढेगी शहर में।
यह बात तो कुंदन भैया को जच गयी, लेकिन लाल बत्ती के लिए भी सरकार ने कानून बना रखा है कि अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती का उपयोग करने का अधिकार किसे है।
इसका इन्होने तोड़ निकाल लिया। एक दिन अपना हेलमेट लेकर गए अब्दुल मिस्त्री के पास और हेलमेट के उपर में ही लाल बत्ती फ़िट करवा ली। उसे चलाने के लिए स्कूटर की डिक्की में एक 6 वोल्ट की बैटरी रख ली। सोच लिया कि जब भी कहीं जाना होगा,  सर पर लाल बत्ती वाला हेलमेट लगाया और सायरन बजाते निकल पड़ेंगे सड़को पर।
एक दिन कुंदन भैया जैसे ही हेलमेट पर लाल बत्ती लगा कर निकले,
चौराहे पर पुलिस वालों ने पकड़ लिया,-“लाल बत्ती किसके परमीशन से लगा रखी है?
“जिसने हेलमेट लगाने का परमीशन दिया है”।
“तुम्हे मालूम है, लाल बत्ती लगाना जुर्म है”।
“कौन सी कानून की किताब में लिखा है कि हेलमेट पर लाल बत्ती लगाना जुर्म है, मुझे बताओ।“
अब ट्रैफ़िक पुलिस वाले चक्कर में पड़ गए। मामला ट्रांसपोर्ट कमिश्नर तक पहुंच गया, लेकिन ऐसा कानून कहीं नहीं मिला कि हेलमेट पर लाल बत्ती लगाना मना है। 
कुंदन भैया को यह बात पता थी कि हेलमेट पर लाल बत्ती लगाने पर जुर्माने का कानून की किताब  में जिक्र ही नही है, जब तक सरकार कानून लाएगी,तब तक तो लाल बत्ती का मजा लेगें, और जब कानून आ जाएगा तब इस कानून का तोड़ निकालने की सोचेंगे, लेकिन लाल बत्ती लगाना नहीं छोड़ेगें।

रविवार, 15 अगस्त 2010

हम आजाद हैं-ये भी करुं वो भी करुं-मेरी मरजी

दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल,” गाना पूरे जोर से बज रहा था, सामने के ग्राम पंचायत भवन में।

बगल में ही स्कूल में -“सरफ़रोशी की तमन्ना, आज हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है” बज रहा था। ऐसा लग रहा था कि गरम और नरम दल दोनों में काम्पिटीशन चल रहा है। हारे हुए सरपंच और जीते हुए सरपंच में।

“कुछ देर के पश्चात माननीय सरपंच लीला राम द्वारा ध्वजारोहण किया जाएगा, जल्दी से जल्दी कार्यक्रम में पहुंचे”- माइक पर गाने के बीच-बीच में उद्घोषणा भी हो रही थी।

लीला राम की लीला न्यारी ही है, झंडा फ़हराने का सुख सरपंची के बाद ही मिलता है। वह इससे वंचित नहीं होना चाहता था। कल से रिक्शे में माईक लगवा कर प्रचार करवा रहा था, अपने झंडा फ़हराने का।

मैं भी भिनसारे ही तैयार हो गए थे, आज 15 अगस्त आजादी का दिन है। बच्चे भी तैयार थे स्कूल जाने के लिए। हमारा मुल्क आजाद हो चुका है अब मुल्क में एक ही गाना चढा हुआ है लोगों की जुबान पर-“मैं ये भी करुं, वो भी करुं, चाहे जो भी करुं, मेरी मर्जी।“  सब मर्जी से ही चल रहा है।

 प्रजातंत्र है, कल ही सरपंच ने 15 हजार रुपए खाते से निकाले हैं आजादी का पर्व मनाने के लिए। बाकी पंचों ने भी अपनी मुहर लगा दी। क्योंकि उन्हे मिठाई के साथ-साथ एक-एक दारु की बोतल भी मिलनी तय है। बिना उसके आजादी का पर्व कैसे मनाया जाएगा।

जैसे ही घर से बाहर निकला तो चौक पर ध्वजारोहण की तैयारी हो रही थी। तोरण-पताका बांधी जा चुकी थी। कोटवार बिजली के खम्बे पर बांस से कटुआ डाल रहा था।

मैने पूछा-“ये क्या हो रहा है सुबह सुबह? बिजली चोरी खुले आम”।

“क्या करोगे महाराज अभी सूचना आई है, चौक का झंडा नेता जी फ़हराएंगे, लाउड स्पीकर लगाने के लिए बिजली लेनी पड़ रही है।“ – वह बोला

“फ़िर भी सीधे खंबे से बिजली लेना चोरी तो है”

“सरकार की बिजली और सरकार का झंडा, सारा आयोजन सरकारी है, फ़िर हम आजादी का पर्व मना रहे हैं, इतना तो चलता है”।

“चलाओ चलाओ भाई, सरकार की बिजली सरकार का खंबा, सरकारी आजादी है”।

इतने में जुगाली करते मियां छक्कन भी तशरीफ़ ले आए। आते ही पान की गिलौरी की एक बड़ी लम्बी पिचकारी सड़क पर मारी-“सलाम महाराज,आजादी मुबारक हो”

“राम-राम मियां जी, आपको भी आजादी मुबारक हो”
इनकी लम्बी पीक से ही पता चलता है कि देश आजाद हो गया है। कहीं पर भी थुको-मुतो आजाद जो हो गए हैं। तभी खेदु का लड़का दौड़ते हुए आता है-
“बाबा देखो तो, समारु का लड़का नल से टोंटी निकाल रहा है”। जब तक हम पहुंचते,वह टोंटी लेकर फ़रार हो चुका था। नल आजाद हो गया था और आजादी से बह रहा था।
“अगर तु सड़क के इस पार आई तो ईंट मार कर सर फ़ोड़ दूंगा” उदै राम जोर से चिल्ला रहा था। बड़े गुस्से में था।मैने आवाज सुनकर पीछे मुड़ कर देखा तो वह घर से सामने सड़क के दुसरी तरफ़ सिर्फ़ तौलिया बांधे हुए हाथ में ईंट लिए अपनी पत्नी को गरिया रहा था।
उधर उसकी पत्नी हाथ में हंसिया लेकर चंडी बनी चीख रही थी-“रोगहा घर में घुस गया तो आज तेरा गला हंसिया से काट दुंगी”. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मुझे ही जाना पड़ा –“ क्या हो गया भौजी? आजादी दिन सुबह-सुबह उदै भैया को आजाद करने का इरादा बना लिया”?
“कल रात से जुआ खेल रहा है, आजादी की छुट्टी है कहके। मैने जो 300 रुपया तीजा पर मायके जाने के लिए चावल की हंडी में छुपाकर रखा था, उसे भी दांव पर लगा दिया। आज तो इसका गला काट के ही रहुंगी, भले मुझे फ़ांसी हो जाए। रोज-रोज की खिट-खिट से आजादी तो मिल जाएगी,मैं कहती हूँ कि कुछ धरम करम करो, दिन रात दारु और जुआ, कब तक सहन करुंगी”?
मैने भौजी के हाथ से हंसिया लिया-“अरे इतनी बड़ी गलती मत करो भई, भला हो उदै भैया का इन्होने तुम्हे दांव पर नहीं लगाया। धर्मराज ने तो द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया था। तुम आभार व्यक्त करो  इनका कि तुम्हे कितना चाहते हैं, धरम-करम करके धर्मराज हो गए तो फ़िर…..समझ लो तुम।“
भौजी का गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ तो मैं आगे बढ लिया।
तभी बीच सड़क पर नानिक और गज्जु दोनो मस्ती से झुमते हुए गलबैंइहा डाले आ रहे थे,-“ये देश है बीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का”। पीछे से बस वाला हार्न बजा रहा है और ये मस्ती में उसकी परवाह किए बिना चल रहे हैं।
“अरे! साइड दो बस वाले को, कहीं तुम्हे दबा कर चला गया तो?”
“कैसे दबा कर चला जाएगा? सड़क इसके बाप की है क्या? हमने बनवाई है वोट देकर”-खेदु ने जवाब दिया।
“तुम लोग 15अगस्त तो सुबह से कहां से पीकर आ रहे हो? आज तो भट्ठी भी बंद है।“
"सब बेवस्था हो जाती है, जेब में पैसा और मुंह में जबान होनी चाहिए। जो लोग बंद करवाते हैं वही खोल भी देते हैं”- हा हा- गज्जु बोला।
"आज तो नहीं पीना चाहिए, आजादी का दिन है, मजे से झण्डा फ़हराओ, मिठाई खाओ और बांटो, आजादी का मजा लो”।
“सरकार को सबसे ज्यादा टैक्स हम लोग देते हैं। सच्चे मायने में ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हैं”। अरे आप जाओ महाराज कहां सुबह-सुबह प्रवचन सुनाने लग गए”-कह कर दोनों ने अपना रास्ता पकड़ लिया।
साढे सात बज रहे थे, हमें भी झंडा फ़हराने जाना था, आज के दिन हमारा देश आजाद हुआ था। आजाद भारत में आजादी की खुशी मनानी थी। सामने सड़क पर सारी स्ट्रीट लाईटें दिन में जल रही थी। पता चल रहा था कि हम आजाद हो गए हैं।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

चमचा साधै सब सधै

हिन्दी फ़िल्मों में हीरो के साथ एक चमचा अवश्य ही रहता है जो उसकी हां में हां मिलाता है। बिना चमचे के तो कोई फ़िल्म ही नहीं बनती। चमचा पहले कास्टिंग किया जाता है, हीरो बाद में।

हीरो तो बहुत मिल जाएगें पर उपयुक्त चमचा मिलना बहुत ही मुस्किल है। चमचा ऐसा होना चाहिए कि जिसे हीरोईन भी पसंद करे। क्योंकि हीरो और हीरोईन के बीच चमचे को सेतु का काम करना पड़ता है। इसलिए हीरो-हीरोईन दोनो की रजामंदी होना जरुरी है।

डायरेक्टर,प्रोड्युसर से लेकर पूरी युनिट में सभी के पास एक-एक चमचा होता है। क्योंकि बिना चमचा के किसी का काम नहीं चलता। चमचा छोटा हो या बड़ा लेकिन चमचागिरी के गुणों से ओत-प्रोत होना चाहिए।

कमर तक झुक कर कोर्निश करने वाले एवं दंडवत लेटने वाले चमचे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। इस विशेष योग्यता का होना निहायत ही जरुरी है। तभी चमचा अपने मालिक के हृदय में स्थान पाता है।

कभी कभी सोचना पड़ता है कि दिनचर्या में यह चमचा कहां से घुस गया? जिसके बिना काम चलता ही नहीं है। भारतीय संस्कृति में भोजन बिना चमचे के ही किया जाता है, हाथ से खाने में थाली से भोजन सीधा मुंह में जाता है।

अगर अंधेरा भी हो जाए तो आंख मुंद कर भी खाएं तो हाथ सीधा मुंह में ही जाता है। जो कि चमचे से संभव नहीं है। फ़िर भी चमचा इतनी सहजता से हमारे जीवन में प्रवेश कर गया कि पता ही नहीं चला और पूरा राज काज अपने हाथों में ले लिया।

बिना चमचे के तो अब दिनचर्या चलाना क्या कुछ भी सोचना मुस्किल है। अत्र-तत्र-सर्वत्र चमचा ही चमचा, रसोई से लेकर सत्ता के मठ मंदिरों तक चमचे का ही राज चलता है।यथेष्ट तक पहुंचने के लिए पहले चमचे को साधना पड़ता है। तभी कार्य संभव हो पाता है।

अंग्रेज जब भारत में आए तो अपने साथ चमचा लेकर आए। उन्हे हाथ से खाना नहीं आता था। अंग्रेजो ने चमचे के दम पर 200 साल राज किया। जमकर चमचों का इस्तेमाल किया उन्होने।

बड़े बड़े खिताबों से नवाजा गया चमचों को, लोहे से लेकर सोने-चांदी के हीरे जड़े चमचे तैयार किए गए। साम-दाम-दंड-भेद प्रक्रिया को अपनाया। चमचों के साथ छुरी कांटे का भी जमकर इस्तेमाल किया और सोने की चिड़िया को खोखला कर दिया। इस दुष्कृत्य में चमचों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंग्रेज चले गए लेकिन चमचा छोड़ गए। चमचा संस्कृति आजाद भारत की उर्वरा भूमि में बड़ी तीव्रता से पुष्पित पल्लवित हूई।

चमचों ने मालिक बदल दिए, अंग्रेजों के द्वारा इस्तेमाल किए गए चमचों की मांग ज्यादा थी क्योंकि उन्हे राज काज का सारा गुर मालूम था। इसलिए चमचों ने अपनी उपयोगिता को बनाए रखा।

चमचे सर्वव्यापक हैं और सर्वव्याप्त हैं। आप सत्ता के गलियारों में कहीं भी जाएं,हर जगह चमचे तैनात मिलेंगे। अगर आपको कोई सही काम भी करवाना है तो चमचों से ही सम्पर्क साधना पड़ेगा।

कभी भी आपने बिना चमचे की स्वीकृति से काम कराने की कोशिश की तो वे आपका बना बनाया रायता फ़ैला देंगे। कोई काम नहीं हो पाएगा। इसलिए पहले चमचे को साधना जरुरी है,

बुद्धिमान व्यक्ति यही कार्य सबसे पहले करता है। सीधा चमचे को ही साधता है। चमचा साधै सब सधै--यह मंत्र याद रखना जरुरी है। जो इस मंत्र का नित्य जाप करता है वह संसार में कभी कष्ट नहीं पाता। तीनो भुवनों के आनंद को प्राप्त करता है, तीनों लोकों में जगह पाता है।

किसी दिलजले ने कह दिया कि-"चमचों की तीन दवाई-जूता-चप्पल और पिटाई।" चमचों की पिटाई होना बहुत ही कठिन कार्य है,क्योंकि ये घर से ही पूरे शरीर में तेल लगा कर निकलते हैं,

जहां भी आपने पकड़ने की कोशिश की, तो आपका हाथ फ़िसल जाता है और ये पकड़ में नहीं आते। साथ में तेल की शीशी भी रखते हैं। आवश्यकता पड़ने पर तेल भी लगा देते हैं- "सर जो तेरा चकराए, दिल डूबा जाए, आज्जा प्यारे तेल लगवा ले, काहे घबराए, काहे घबराए"।

दुनिया का कोई भी क्षेत्र इनसे अछुता नहीं है। अगर आप खुद मुख्तयार हैं याने चमचागिरी आती है तो सोने में सुहागा समझिए। बहुत जल्दी तरक्की करेंगे। अगर नहीं आती तो इन चमचों के माध्यम से आएगी, नहीं तरक्की किस चिड़िया का नाम है, ढुंढते ही रह जाएगें।

राजनीति,नौकरी,साहित्य इत्यादि सभी क्षेत्रों में चमचों का दखल है। राजनीति में आप चमचागिरी के सहारे एक साधारण कार्यकर्ता से बड़ी जल्दी ही मंत्री पद पा सकते हैं। अगर मंत्री पद नही मिला तो कोई एम एल सी की सीट या कार्पोरेशन की अध्यक्षी को जरुर ही पा सकते हैं।

 इसके लिए आपको जरुरत से ज्यादा मीठा होने की आवश्यकता है। भले ही शुगर की बिमारी हो जाए, लेकिन मीठा तो होना ही पड़ेगा। तभी तरक्की संभव है।

नौकरी करते हैं तो हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि- "बॉस इज आल वेज राईट"। "हां जी, हांजी कहना और इसी गांव में रहना"। जी हजुरी डटकर करो, भले फ़िर दूसरा काम मत करो। बॉस की नजर में हमेशा बने रहो। फ़िर तरक्की ज्यादा दूर नहीं है।

घटिया से घटिया लिखिए,बस नामवर साहित्यकारों की चरण चम्पी करते रहिए,नजरे इनायत होने पर आपसे बड़ा साहित्यकार-कवि कोई दूसरा नहीं है। चमचागिरी महान है चमचा देश की शान है,हमारी संस्कृति की जान है।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

ब्रह्माण्ड भैंस सुंदरी प्रतियोगिता

हमारा दुधवाला सुबह से अधपगला हो गया था, सुबह-सुबह ही अपनी लाठी हाथ में लिए घुम रहा था, मै बस स्टैंड जा रहा था, एक जजमान आने वाले थे, तो मैने रामजी को खड़े हुए देख लिया, सोचा कि सुबह-सुबह कौन इसके मुंह लगे, दारु पीया हुआ है फ़ालतु समय और दिमाग दोनो ही खराब करेगा,इसलिए बचकर निकलना चाहता था। मैं सोच ही रहा था कि वह मुझे मत देखे, लेकिन उसने देख ही लिया और जोर से आवाज दी-

"महाराज पाय लागी, रुक देवता रुक, चरण छुने दे"। ऐसा कहके उसने पैर पकड़ लिए। वह दारु के नशे में झूम रहा था।
"खुश रहो, जय हो, राम जी, कैसे सुबह सुबह दारु भट्ठी पहुंच गए" मैने पुछा
"क्या बताऊं महाराज, एक लफ़ड़ा हो गया है, मैं ठहरा अनपढ, हमारे दुधडेयरी के पास एक मास्टर किराए में रहने आए हैं, बहुत पढे लिखे और विद्वान हैं। उसी के कहने से गलती कर बैठा। आप कुछ किजिए तभी मेरी चिंता दूर होगी।" राम जी ने पैर पकड़े-पकड़े कहा
"अरे पैरों को तो छोड़, सब देख रहे हैं, सुबह-सुबह दारु पीकर मेरा फ़जीता कर रहा है बीच बाजार में।" मैने थो्ड़ा झिड़कते हुए कहा।
"नई छोड़ता मैं पैर, पहले मेरी बात सुनो और फ़िर समस्या का हल करो।" वह पैर छोड़ने को तैयार नहीं था।
"छोड़ साले पैरों को, तमाशा लगा दिया है बस स्टैंड में। जब तु पैर छोड़ेगा तभी तेरी बात सुनुगां, मैने गुस्से से कहा। तब जाकर उसने पैर छोड़े। सुबह-सुबह कोई शराबी मिल जाए तो पूरा दिन खराब कर देता है।
वह कहने लगा-" क्या बताऊं महाराज, 15 दिन पहले मास्टर जी पेपर पढ रहे थे, तो मैं उनके घर के पास से गुजरा, उनको बैठे देखा तो राम राम कर लि्या। बस यही राम-राम करना मेरे लिए बहुत बड़ी चिंता में बदल गया।"
"आगे बोल जल्दी, मेरे पास अभी समय नहीं है।" मैने कहा जल्द बाजी करते हुए कहा
मास्टर जी बोले अखबार में एक समाचार है वो तुम्हारे ही काम का है काका, तुम्हारी डे्यरी में 50-60 भैंस हैं एक एक सुंदर, और बम्बई में एबीसीएल ब्रह्माण्ड भैंस सुंदरी प्रतियोगिता आयोजित करवा रहा है, तुम भी अपनी एक भैंस उस प्रतियोगिता में साज संवार कर बतौर प्रतियोगी भेज दो। तुम्हारी जमना भैंस बहुत सुंदर है और उसका फ़िगर भी प्रतियोगिता के लायक है। जमना अगर जीत जाएगी तुम्हे बहुत लाभ होगा, पेपर और टीवी में तु्म्हारी फ़ोटो आएगी,डेयरी का मुफ़्त में प्रचार-प्रसार होगा, तुम्हे घर-घर दूध बेचने जाने की जरुरत नहीं है, जिसे दूध चाहिए वह डेयरी से आकर ले जाएगा और इनाम में लाखों रुपए नगद मिलेंगे, उसके बाद तो जमना टीवी में विज्ञापन करके लाखों कमाएगी। अगर किसी निर्माता निर्देशक की नजर पड़ गयी तो हिरोईन बनना नि्श्चित है। बस तुम बैठे बैठे खाना। इस तरह मास्टर जी ने मुझे बहुत बड़ा सपना दिखा दि्या----
"फ़िर आगे क्या हुआ? जल्दी बता, बात को लम्बी मत कर, मेरे जजमान आने ही वाले होगें।"
"मैने मास्टर को पूछा कि प्रतियोगिता में जाने के लिए क्या करना पड़ेगा?"
तो उन्होने बताया कि-" जमना को रोज दिन में तीन टाईम पीयर्स साबुन से रगड़-रगड़ के नहलाना और उसकी पूंछ को सनसिल्क शैंम्पु से धोना, फ़िर देखना 10-15 दि्न में एक दम चकाचक हो जाएगी, कोई भी नहीं कह सकता कि गंवई गांव की मुर्रा भैंस है। एक दम विदेशी लगेगी।"
"मैने भी वही किया महाराज, मेरी जमना बहुत खुबसूरत है, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, कटारी जैसी भौंह, जो देखे वह दीवाना हो जाए, रोज सुबह-शाम फ़ेयर एन्ड लवली लगाता था, रात को मास्चराईजर, इससे फ़रक यह पड़ा कि एकदम गोरी हो गयी थी, त्वचा चिकना गयी थी, पूंछ के बाल खुले खुले हवा में लहराते थे  जैसे कोई नागिन असाढ में झूम रही हो।"
"फ़िर क्या हुआ?"- मैने पूछा
"उसे मुंबई भे्जते समय आयोजकों ने कहा कि उसके साथ एक मैनेजर भेजना पड़ेगा, अब मैनेजर के काम के लिए मैने अपनी डेयरी में काम करने वाले बरातु को तैयार किया, वह पढा लिखा है अंग्रेजी जानता है, नौकरी नहीं मिली तो गोबर-कचरा करता है। जमना आखिर भैंस ठहरी चारा पानी के बाद गोबर तो करेगी ही और कोई उसका समय निश्चित नहीं है, कहीं कैटवाक करते समय ही पतले गोबर का एक छर्रा मा्र कर पूंछ हिला दिया तो फ़िर हो गया काम सबका। इसलिए उसके लिए एक बरमु्डा पेंट भी सिलाया। उसके चारे पानी की व्यवस्था करना बरातु के जिम्मे कर के मैने जमना को मुंबई भेज दिया महाराज।"
"चलो ठीक किया, अगर जमना जीत जाएगी तो तुम्हारी किस्मत बदल जाएगी, इनाम के पैसे और भी भैंस खरीद लेना। इसमें चिंता की क्या बात है?" मैने कहा
"आप चिंता कहते हैं मेरे यहाँ प्राण निकल रहे हैं"।
"क्यों?"- मैने उसके सामने एक प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा किया
"मेरा पोता कालेज में पढता है, अभी घर आया तो बता रहा था कि जो भी सुंदरी प्रतियोगिता में मुंबई चल देती है, वह वापिस नहीं आती, हारे चाहे जीते, वहीं रहकर संघर्ष (स्ट्रगल) शुरुकर देती है, अगर कामयाब नहीं होती तो मैनेजर या आयोजक के साथ ही लिविंग इन रिलेशनशिप बना कर रह जाती है। बता रहा था कि प्रतियोगिता के निर्णायक के रुप में देश-विदेश से तरह-तरह के पड़वे भी आ रहे हैं, उद्घाटन के लिए शक्तिकपूर और अमन वर्मा को बु्लाया गया है, कहीं कास्टिंग काऊच हो गया तो मेरी इज्जत का क्या होगा? मैं गांव में किसी को मुंह दि्खाने के ला्यक नहीं रहुंगा। गांव की बदनामी होगी सो अलग, मेरी जमना भोली भाली है कोई सहरावत या बिपासा थोड़ी है।"
पोता बता रहा था कि अगर वापस आ गयी तो दुहाती नहीं है, फ़िगर खराब होने का डर हो जाता है, क्योंकि प्रतियोगिता तो हर साल होती है,हो सकता है अगले साल फ़िर जाना पड़ जाए। अब इस फ़िगर के चक्कर में मेरा शुद्ध नुकसान हो रहा है। मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है,इसलिए सुबह से पी-पी कर घुम रहा हूँ और आपको ढुंढ रहा था।"
"अब मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए"।
"आपकी जजमानी मुंबई तक चलती है महाराज, मैं जानता हूँ आप मुंबई आते-जाते रहते हैं, मेरी जमना को आप ही वहां के खलनायकों से बचा सकते हो, मुझे नहीं बनाना उसे ब्रह्मान्ड सुंदरी। हाय मेरी जमना, जबसे तू गयी है कोठा है सूना, उसे वापस ला दो महाराज, मैं वादा करता तुम्हारे लौटते ही 10किलो फ़ेयर एण्ड लवली, 5किलो लिपिस्टिक, 20किलो माश्चराईजर लेकर आउंगा, हर महीने तुम्हारा गोल्डन फ़ेसि्यल करवाऊंगा, चाहे इसके लिए मुझे कर्जा लेना पड़े या डेयरी बेचना पड़े।लेकिन तुझे एक दम अफ़सर की बीबी जैसे सजा कर रखुंगा भगवान, एकदम सजाकर।"
"हां तो हो गयी तेरी बात पूरी कि और भी कुछ बचा है, मैं तेरी जमना को वापस लाने का प्रयास करता हूँ, और तु सुबह से दारु पी के मत घुम ,जाकर घर में सो जा, तेरी जमना वापस आ जाएगी कहीं नहीं जाएगी।'-अब शराबी से पीछा छुड़ाने के लिए मुझे नेता की तरह आस्वासन देना पड़ा।
"ठीक है महाराज, आप कह रहे हैं तो जा रहा हूँ नहीं तो और भी पीने का मन था, मेरे को चिंता है कि जमना आएगी तो दुहाएगी नहीं ऐसा कहते हैं, उसको इनाम मिले या न मिले, ब्रह्माण्ड सुंदरी बने या न बने, लेकिन मेरा तो रोज का नुकसान हो रहा है, दुहना नीचे रखते ही, दोनो समय 20 किलो दूध दुहाती थी। बहुत नुकसान हो जाएगा।"
" भैंसी चाहे कोठा (डेयरी) की हो या ब्रह्माण्ड सुंदरी, वो जहाँ जाएगी उसे दुहाना ही पड़ेगा, यहां तो डेयरी में तुम एक ही दुहने वाले, बाहर देखो कितने सारे दुधवाले भैंस हाथ में रस्सी लेकर घुम रहे हैं कि कोई भैंस मिलती और दूह डालते, जाओ राम जी तुम भी घर जाओ और मुझे भी जाने दो जजमान के आने का समय हो गया है।"- उसे आश्वस्त करके मैं चल पड़ा जजमान की ओर..............