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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

लक्ष्मण मंदिर सिरपुर ......Sirpur Chhattisgarh..............ललित शर्मा

संग्रहालय की कुछ मूर्तियाँ और  लक्ष्मण मंदिर
प्रारंभ से पढ़े  
सकुड़ से लौटते हुए रास्ते में मख्मल्ला और खरखरा नामक दो नाले मिले, बरसाती खेती में नालों का भी सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण योगदान रहता है। यहाँ से लौटते हुए हमें लक्ष्मण मंदिर देखना था। जो हमारे रास्ते में ही था। मंदिर के मुख्य द्वार पर गाड़ी लगाने के बाद हमने मंदिर में प्रवेश किया। सामने ही अद्भुत दृश्य था, जिसे देखने के लिए देश विदेश के पर्यटक आते हैं। सिरपुर में अथाह पुरा सामग्री है, जिसे एक दो दिन में देखना संभव नहीं है। लगभग 48 जगह पर उत्खनन हो चूका है। हम लक्ष्मण मंदिर पहुचे, यह ईंटों का बना खूबसूरत भव्य मंदिर है। 7 फुट ऊँची चूना पत्थर (लाइम स्टोन) की जगती पर पर स्थापित है। जगती में लेट्राईट का भी इस्तेमाल हुआ है, ऐसे लेट्राईट ब्लॉक के बने मकान मैंने कोंकण के रत्नागिरी इलाके में देखे थे।

लक्ष्मण मंदिर - सिरपुर
लक्ष्मण मंदिर का निर्माण मगध के राजा सूर्य वर्मन की पुत्री, श्रीपुर के प्रतापी नरेश महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता, हर्ष गुप्त की पत्नी महारानी वासटा ने ईस्वी 650 में कराया था। मंदिर के मुख्य द्वार पर शेषशैया में विष्णु प्रदर्शित है, कहते हैं जिस देवता को मंदिर मंदिर समर्पित किया जाता था उसे द्वार शीश पर उत्कीर्ण किया जाता था। द्वार पर विष्णु के अवतार, कृष्ण लीला के दृश्य, मिथुन दृश्य एवं द्वारपालों का अंकन है। द्वार के दोनों तरफ चौखट में नृत्य करते मयूर अंकित होना मौर्यों की उपस्थिति को प्रदर्शित करता है। मंदिर के गर्भ गृह में नागराज शेष की बैठी हुयी सुन्दर रखी हुयी है। बाहरी दीवारों पर कूटद्वार, वातायन आकृति, गवाक्ष, भारवाहकगण, गज, कीर्तिमुख एवं आमलक प्रदर्शित हैं। 

लक्ष्मण मंदिर - सिरपुर एवं कंठी ध्रुव 
यहाँ पर हमारी भेंट 62 वर्षीय कंठी ध्रुव से होती है। ये लक्ष्मण मंदिर के केयर टेकर है, आदित्य सिंह ने बताया की जितना सिरपुर के विषय में कोई पुराविद नही जानता उससे अधिक कंठी ध्रुव जानते हैं, यह अतिश्योक्ति नहीं है। कंठी के पिताजी श्रवण ध्रुव मंदिर उत्खनन के प्रारंभिक दिनों से ही यहाँ चौकीदार थे, उनकी जगह पर कंठी को नौकरी दी गयी है। गुटखा चबाते हुए कंठी बताते है कि  - मंदिर उत्खन से पहले यहाँ घना जंगल था। यह मंदिर टीले में दबा हुआ था। मेरी जानकारी में है जब इसकी खुदाई हुयी थी। तब से मैं यही पर रहता हूँ। सिरपुर का मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देख-रेख में है। मंदिर के समीप जल का विशाल कुंड है। लक्ष्मण मंदिर 1952 में प्रकाश में आया था। श्रीपुर नगर का उल्लेख व्हेनसांग ने अपने यात्रा वर्णन में किया है। मंदिर स्थल पर पेड़-पौधे रोप कर सुन्दर बगीचे का निर्माण किया गया है। भारतियों के प्रवेश के लिए 5 रूपये एवं विदेशियों के लिए 2 डालर का टिकिट रखा गया है।

राजिवादित्य 
ईंटो से बना यह मंदिर भारत में पुरातत्व की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखता है। मंदिर निर्माण के विषय पर चर्चा हो रही थी। मुझे प्रतीत होता है कि मंदिर निर्माण के पश्चात् ईंटों पर कलाकृतियाँ नहीं उकेरी गयी हैं। पहले इसका प्रतिरूप बना कर मंदिर आकृति की मांग के अनुसार सांचों में ईंटे ढाली गयी होंगी। उसके बाद मंदिर की परिकल्पना के अनुसार उन्हें जोड़ा गया होगा। मंदिर निर्माण के पश्चात  ईंटों को घिस कर वर्तमान स्वरूप दिया होगा। क्योंकि ईंटो पर खुदाई करना असंभव है, यदि लगी हुयी ईंटों पर खुदाई के दौरान कोई चूक हो जाये तो उसे खोद कर निकलना पड़ेगा और इससे समय के साथ आर्थिक नुकसान भी होगा। लक्ष्मण मंदिर के वास्तुविद ने कमाल का काम किया है। डॉ हेमु यदु की किताब में महारानी वासटा को मंदिर का शिल्पी बताया गया गया है। यह तो तय है की महारानी वासटा के धन से मंदिर का निर्माण हुआ होगा पर मंदिर का शिल्पी होने की बात हजम नहीं होती। मैं मानता हूँ कि मंदिर को मूर्त रूप देने वाला वास्तुकार और शिल्पकार कोई अन्य ही होगा, जिसका नाम प्रकाश में नहीं आया है। 

फोटो पॉइंट की यायावरी खोज 
मंदिर के पीछे दो संग्रहालय है, जिनमे सिरपुर से उत्खनित मूर्तियाँ रखी हुयी हैं, राजीव ने लगभग सारी मूर्तियों के ही चित्र ले लिए। जिसमे शिव लिंग पर उकेरी गयी 4 देवी, महिषासुरमर्दनी, बुद्ध, विष्णु, नरसिंह, रथारूढ़ देव एवं अन्य ढेर सारी प्रतिमाएं रखी हुयी है। मुझे पहाड़ को खोद कर उसमे बनायीं हुयी गुफाओं का प्रतिरूप बहुत पसंद आया। जिस तरह रामगढ की पहाड़ी पर सीता बेंगरा बनी हुयी है वैसा कुछ दृश्य उसमे दिखाई देता है। संग्रहालय से निकलते हुए सूरज सिर पर चढ़ चुका था।  संग्रहालय लौटते हुए मुझे फोटो के लिए एक लोकेशन दिखाई दे गया जहाँ से विष्णु मंदिर के साथ व्यक्ति की भी फोटो आ सकती है। बगीचे में डली बेंच पर बैठ कर मैंने राजीव से चित्र लेने कहा। दो-तीन बार में जैसा चाहता वैसा ही चित्र मिल गया। यहीं पर मैंने राजीव का भी चित्र लिया। बहुत ही सुन्दर चित्र आया। भूख जोरों की लग चुकी थी, सिरपुर के एकमात्र होटल में फोन करके आदित्य सिंह ने  भौजी को खाना बनाने के लिए कह दिया था। यहाँ से निकल कर हम अब सोनवानी भौजी के होटल में ही रुके। 

लक्ष्मण मंदिर - सिरपुर का मूर्ति शिल्प 
होटल झोपडी नुमा छोटा सा ही है, पर समय पर खाना मिल जाये वह बड़ी बात है। सुबह जब रेस्ट हाउस से चल रहे थे तो चौकीदार को दोपहर के खाने के लिए कहा तो उसने सिलेंडर ख़त्म होने की मज़बूरी बताई, बीमार केयर टेकर चन्दन साहू मजे से एक रूम  में बैठ कर संगी-साथियों के साथ ताश खेल रहा था। होटल में प्रवेश करते ही तीन लोग (दो वृद्ध एवं 1 महिला) भोजन करते दिखाई दिए। आधुनिकवसना प्रौढ़ युवती ने जींस-कुर्ती धारण कर रखे थे। नैनों में कजरे के साथ दिल्ली वाला पेसल जुड़ा भी बांध रखा था। उसकी खाने की प्लेट में एक सुग्गा भी समोसे में चोंच मार रहा था। लगा कि पालतु है, बड़े इत्मिनान से समोसे का भोग लगा रहा था। हाव-भाव से लगा कि आधुनिकवसना प्रौढ़ युवती कोई पत्रकार या ब्यूटी पार्लर की मालकिन होगी। क्योंकि सिरपुर में पत्रकारों की उपस्थिति होते रहती है, यह कोई नयी बात नहीं थी। हमने भी हाथ मुंह धोकर खाना लगाने का हुक्म दिया।

ग्रामीण होटल भोजन का इंतजाम 
खाना लगते तक मेरा ध्यान  सुग्गे की तरफ था। तभी आधुनिकवसना प्रौढ़ युवती का फोन बजा और उसने चर्चा शुरू की। दो लाइनों में ही खुलासा हो गया, वह ब्यूटी पार्लर वाली थी। कह रही थी गोल्डन फेशियल से अच्छा डायमंड फेशियल होता है। डायमंड फेशियल से चेहरे पर चमक आती है, दुल्हन के लिए यही ठीक रहता है। गोल्डन फेशियल थोड़ी अधिक उम्र वालियों के सही रहता है। इससे धीरे-धीरे स्किन टाईट होती है। डायमंड फेशियल थोडा महंगा है, लेकिन दुल्हन के लिए वही उपयुक्त है। मशरूम फेशियल और पर्ल फेशियल भी किया जा सकता है, ओके डायमंड फेशियल, फायनल करती हूँ, तुम बता देना रायपुर में कहाँ आना है? मैं............को फोन कर दूंगी वो मुझे लेने आ जायेगा, लेकिन जल्दी वापस आउंगी, उन्हें बिना बताए आना है न...... अब मोबाईल पर बता देना............ मैं चले आउंगी............. टेक केयर। पर्स से एक थैला निकाला, अपने रुमाल से सुग्गे की चोंच पोंछी, उसे सहलाया, "किस" किया, सुग्गे का चेहरा डायमंड फेशियल की चमक से चमाचम हो गया। उसे थैले में रखा सहेज कर और सुग्गा धन्य हो गया ऐसी मालकिन पाकर ............

सुग्गे वाली आधुनिकवसना प्रौढ़ युवती
लो जी अपनी भविष्यवाणी सत्य हो गयी बिना पतरा देखे ही। अरे भाई घुमक्कड़ी सब सिखा देती है, किसकी क्या पहचान होती है, व्यक्ति की शक्ल, खानपान बोली-भाषा और उसका पहनावा बता देता है कि वह किस प्रदेश का रहने वाला है और क्या काम करता है? अब ये न पूछना कैसे होता है सब? घुमक्कड़ी करो और खुद जान जाओ। हमारा भोजन लग चुका था, गरमा गरम रोटियां, तुअर की दाल के साथ लौकी चना दाल की सब्जी। भूख के समय यह किसी तसमई से कम नहीं लग रही थी। भोजनोपरांत हम रेस्ट हाउस की और थोडा आराम करने के लिए चला पड़े। डट कर खाने के बाद बिस्तर की जरुरत थी। मैंने कहा कि राजीव भाई कच्चे ब्लॉगर ही निकले। कैसे -राजीव ने पूछा। अरे भाई ब्लॉगर को अपने ब्लॉग के लिए हर जगह सामग्री मिल जाती है। अगर पक्के ब्लॉगर होते तो सुग्गे के साथ सुग्गे वाली की भी फोटो होती :).... देखो हमने फोटो ले ली, न तुम्हे पता चला न सुग्गे वाली को। ब्लोगिंग में स्टोरी के साथ सबूत चाहिए भाई........ ही ही ही ही (हँसी, महफूज अली से साभार) जारी है ..... आगे पढ़ें 

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

स्नानाबाद से सीधा प्रसारण --------------- ललित शर्मा

3म नम: शिवाय, नम: शिवाय, नम: शिवाय, हर हर गंगे, हर गंगे। स्नान हो रहा है, एक लोटा पानी डालते ही विचार उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। बरसाती बादल की तरह बस फ़ट पड़ने को तैयार। सावन मास के आखरी दिन नित्य की तरह अपना जलमस्तकाभिषेक स्वयं कर रहा हूँ। कोई देवाधिदेव महादेव तो नहीं जो कोई भी भक्त आकर स्नान करा जाएगा। महादेव भाग्यशाली हैं, पंच स्नान दस स्नान से भी कुछ फ़र्क नहीं पड़ता बरसात के मौसम में। यहाँ तुच्छ मानव को ठंडे जल से ही छींक आ जाती है। कसाईखाने में जाने की नौबत आ जाती है। बरसात तो आखिर बरसात है, न आए तो रोना पीटना मच जाता है, आ जाए तो समस्या खड़ी हो जाती है। पर आना जरुरी है, नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

अति किसी भी चीज की वर्जनीय है। अतिवृष्टि, अतिप्रेमासक्ति, अति धनवृष्टि, अतिज्ञानदृष्टि, अति अल्पज्ञता, अतितृष्णा, अतिकृपणता, अतिदरिद्रता अतिक्षुधा, अति, अति आदि आदि आदि पागलपन की निशानी है। कुछ लोगों को लोकैषणा पागल कर देती है तो कुछ को वित्तैषणा। वित्तैषणा में व्यक्ति सर्वभक्षी हो जाता है। लोकैषणा उसे अंधा बना देती है। प्रेमासक्ति सांप को भी रस्सी बना देती है। हर हर गंगे हर गंगे, बालों को एक हाथ से रगडते हुए एक लोटा जलाभिषेक और हो जाता है। सब चलचित्र सा चल रहा है। स्नानागार नहीं, यह चिंतन केंद्र हो गया। सारे विचार यहीं लोटे के जल के साथ लोटते हैं। हर हर गगें हर गंगे…… 

कल्पनाएं, परिकल्पनाएं, अल्पनाएं रक्काशाओं का रक्स घुंघरुओं की लयबद्ध ताल ध्वनि के संग भंवरे की गुंजन सुनाई देती है, गुन गुन करता भंवरा पराग कणों के लालच में फ़ूलों पर मंडरा रहा है। फ़ूल का मन भी सांवले सलोने भंवरे को देख कर प्रसन्न हो गया। पराग कणों के लालच में फ़ूलों की देह सहला रहा है। फ़ूल लाल हो कर पराग कण छोड़ देगा। दोनो ही बेवफ़ा हैं, फ़ूल ने पराग कण छोड़े और भंवरे ने चुराए और उड़ गया दूसरे फ़ूल की ओर।

तृष्णा और क्षुधा के साथ कैसी वफ़ा की उम्मीद? दोनों की ही जरुरत है। तितलियाँ कौन सी कम हैं? जो भंवरे ने किया, वही तितलियों ने किया। फ़ूल के जिस्म को सहलाया और भिगोया, धोया, निचोया और हो गया। संसार यही है, स्वार्थ सिद्धी योग जीव-जंतु, थलचर, नभचर, चलचर, उभयचर सभी को आता है। इसे सीखने के लिए किसी बाबा की दरकार नहीं। प्रकृति और आवश्यकता सब सीखा देती है। नव जातक को कौन दूध पीना सिखाता है, वह स्वयं ही आँखे बंद किए हुए स्तन ढूंढ लेता है और अपनी क्षुधा शांत कर लेता है। हर हर गंगे, हर हर गंगे……

एक लोटा जल और सिर पर पड़ते ही फ़ेसबुकिया बु्ड्ढे-बुढिया,छोरे-छोरी, छिछोरे-छिछोरी दिखाई देने लगे। फ़ेसबुक पर इतना अधिक प्रेम-इश्क उमड़ रहा है कि लोगों की रगों से फ़ूट-फ़ूट कर बह रहा है। कोई दवा नहीं जो रगों से फ़ूटते फ़ेसबुकिया प्रेम को थक्का बना कर जमा दे, रोक ले। बुढापे में अल्हड़ पहाड़ी नदी सा बहता प्रेम बड़े-बड़े भाखड़ाओं को भी धराशायी करता उफ़नती कोसी की तरह पार तोड़ता फ़ेसबुकिया मैदानों की तरफ़ दौड़ रहा है तबाही मचाने के लिए। इसके रास्ते में आने वाले कई महल दोमहले धराशायी हो गए।

भोर से ही भिक्षुक निकल पड़ते हैं कमंडल लेकर, जहाँ चैट की बत्ती हरी देखी, "लाईक भिक्षाम देहि" और "कमेंट भिक्षाम देहि" के अतिरिक्त कुछ सुनाई-दिखाई नहीं देता। जिन्हे हम जानते हैं उन्हे तो बिना कहे लाईक दे आते हैं पर जिन्हे नहीं जानते वे भी आकर अपना पेज टिका देते हैं। "प्लीज एक लाईक दीजिए" साला लाईक नहीं हुआ, गुडमार्निग का चुम्मा हो गया। कम से कम ब्रश तो कर लो यार, दांतो की सड़न दूरियां बढा रही है। क्लोज अप का जमाना है। फ़िर लाईक, इश्क, प्यार, चुम्मा, सब मिल जाएगा, थोड़ा माउथ फ़्रेशनर इस्तेमाल किए करो। हर हर गगें हर गंगे……

फ़ेसबुकिया कबूतर और कबूतरी किसी भी मुंडेर पर गुटुर गुं कर लेते हैं पर कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी, साम्यवादी, पुंजीवादी, अन्नावादी, बाबावादी, धर्मनिरपेक्षतावादी दलों के दल के दल मौजूद हैं। बिना दलों के इनकी बात कही-सुनी नहीं जाती। किसी की वाल पर हमला भी होता है तो लगता है कि वियतनाम पर अमेरिका ने फ़िर से कारपेट बमिंग कर दी। धड़ाम-धड़ाक-धुम-धड़ाम के अलावा सदवचन @%$#@%& भी सुनाई देते हैं। किसी दूसरे ग्रुप में यही शहीदी विचारवान साथ में वड़ापाव खाते दिख जाते हैं एक कटिंग चाय के साथ।

वाह रे फ़ेसबुक, एक भाई साहब सामयिक दृष्टि से अपना चिंतन प्रतिदिन संध्या काल में लिखते हैं। उनकी पोस्ट तो कुंवारी ही रह जाती है। कमेंट करना बहुत बड़ी बात है, लाईक किए बगैर ही लोग निकल लेते हैं। उनकी पीड़ा का अहसास तब होता है जब कोई रुपसी अपनी प्रोफ़ाईल फ़ोटो बदलती है तो वाह-वाह और लाईक करने वालों की लाईन लग जाती है। अगर किसी सुंदरी ने दो लाईने लिख दी समझिए केंवाच सी खुजली सम्पूर्ण वातावरत में फ़ैल जाती है। लोग कंघे लेकर अपनी खुजाल मिटाने निकल पड़ते हैं। ऐसे में सदवचन लिखने वाले सज्जन को गहन पीड़ा होना स्वाभाविक है। हर हर गगें हर गंगे…… 

ऐसे में अदम गोंडवी याद आते हैं। प्रेम का रोग, भरे पेट का बुद्धिविलास है, जिसके पेट में रोटी न हो, वह क्या खाक प्रेमार्थ और नयनों की भाषा समझेगा? उसे मुंडेर पर बैठी कबूतरी की गजल कैसे पसंद आएगी? चाहे उसने कितना भी खुश्बू वाला अफ़गान स्नो पोत रखा हो और उसकी खुश्बू मीलों तक जा रही हो। उसे तो सिर्फ़ गर्म रोटी की ही महक खींच ले जाती होगी मीलों दूर, चाहे रोटी महक पाने के लिए उसे दिन-रात हथौड़ा बजाना क्यों न पड़े।

अदम कहते हैं - गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे, पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें। देखने को दे उन्हे अल्लाह कम्प्यूटर की आँख, सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे। फ़ेसबुक पर कभी रोटी की चिंता की गजल-कविता नहीं पढी। सोचता हूँ क्या रोटी की भूख बोल्ड नहीं हो सकती? अगर खाने को रोटी न मिले और पेट भूखा रहे तो क्लीन बोल्ड होने में भी समय नहीं लगता। भूख, गरीबी, मुफ़्लिसी, टूटे छप्पर नंगापन, तन की पीड़ा व्यक्त करती कविताओं को तालियाँ बहुत मिलती हैं, पर रोटी नहीं मिलती। "एक फ़ेसबुकिए को दुनियां में यायावर क्या चाहिए, एक नेट, एक लैपी, 100 कमेंट 500 लाईक हरदम रहे।" हर हर गंगे हर गंगे………

आंख बंद किए लोटे पर लोटा उड़ेल रहा हूँ, कितना पानी गंगा जी में बह गया पता ही नहीं चला, क्योंकि जब कोई पुरस्कार-सम्मान वितरण का दृश्य सामने आता है तो कंट्रोल ही नहीं होता। दिखाई देता है कुटिल मुस्कान लिए पुरस्कार-सम्मान दाता और अनुग्रहित कमान सी कमर झुकाए फ़र्शी सलाम ठोकता पुरस्कार का आकांक्षी दरिद्र भाव लिए प्राप्तकर्ता। पुरस्कार लेखक के जमीर को खरीद लेता है, मुंह पर ताला लगा देता है। बार-बार सुनना पड़ता है उसे फ़ुंफ़कार कि हमने आपको सम्मानित किया, जब आपका कोई सम्मान नहीं था। सम्मान के विषधर सांप को गले में लपेटे वह ठगा सा खड़ा देखते रहता है और उसके सामने द्रौपदी का चीर हरण हो जाता है।


कितना बेबस नपुंसक बना देता है एक सम्मान? सम्मान देकर जमीर खरीदने वालों का बाजार गर्म है तो जमीर बेचकर सम्मान पाने वाले भी कम नहीं। जैसे गर्म गोश्त के सौदागर एक रात का सौदा करके नोच लेते हैं बदन को, उसे एक रात की कीमत तो पूरी वसूलनी है। ये  सिर्फ़ एक रात ही नोचते हैं , पुरस्कार-सम्मान देने वाले तो जर खरीद गुलाम समझ लेते हैं। छुटभैयों का सम्मान पत्र कोई पद्मश्री तो नहीं, जिस लौटाने की घोषणा करके कोई भी सुर्खियों में आ जाएगा या स्वर्ण पदक नहीं जिसे बेचकर एक वक्त की रोटी जुटा लेगा… मोबाईल बजने लगता है………जब भी बाथरुम में होता हूँ किसी को मेरी याद तभी आती है। …चेहरे पर साबुन लगाए झट-पट तौलिया लपेटे बाहर आता हूँ………हेल्लो हेल्लो हेल्लो……और फ़ोन कट जाता है…… हर हर गगें हर गंगे……