शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

सिरपुर का धसकुड़ .....Sirpur Chhattisgarh...........ललित शर्मा

राजीव रंजन , आदित्य सिंह, बंधू 
प्राम्भ से पढ़ें 
सिरपुरिहा मित्र को फोनिया कर हम सिरपुर पहुंचे तो वे चौक पर ही मिल गए. छुटटी का दिन होने के कारण नौकरी वाले लोग घर में ही मिल जाते हैं. राजिम में अधिक समय लगने के कारण विलंब हो गया था और अंधेरा भी. अगले दिन हमारा कार्यक्रम सिंगा धुरवा तक जाने का था. रात्रि विश्राम सिरपुर में करने के पश्चात हम सिरपुर से 15 किलो मीटर की दूरी पर घने वन में स्थित धसकुड़ का प्राकृतिक झरना भी देखना चाहते थे. राजीव रंजन, आदित्य सिंग और मैं हम तीन प्राणी वनांचल स्थित ग्राम बोरिद की ओर जा रहे थे. चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ बोरिद ग्राम सिरपुर के उत्तर पूर्व में 16 किलो मीटर की दूरी पर है. रायपुर से 84 किलोमीटर पर प्राचीन राजधानी श्रीपुर के अवशेषों पर नवीन सिरपुर गाँव बसता है। सिरपुर के आस‍‌ पास सघन वन होने से वातावरण रमणीय है. कभी यहाँ घनघोर वन थे. आवागमन के साधन भी बहुत कम होते थे. वर्तमान में जब सिरपुर को विश्व धरोहर बनाने की मांग हो रही है तब निजी वाहनों के अलावा राजकीय परिवहन सुविधा नगण्य ही है, सुबह एक बस सिरपुर जाती है फिर वही बस दोपहर ढ़ाई बजे रायपुर वापस लौटती है. कल्पना कर सकते हैं उन दिनों की जब परिवहन का कोई साधन नही रहा होगा तब यहाँ जीवन कितना कठिन होगा?
राजीव रंजन , आदित्य सिंह एवं यायावर 
हमारी कार बोरिद की तरफ बढ़ रही थी एवं आपस में सिरपुर को लेकर चर्चा चल रही थी. महासमुंद के बड़गाँव निवासी आदित्य सिंग प्रायमरी स्कूल शिक्षक के रुप में 7 अक्टुबर सन् 1994 को इस इलाके में पदस्थ हुए थे. वे कहते हैं कि " तब तो बोरिद को काला पानी कहा जाता था. जब मैं गाँव में पहुंचा तो स्कूल के नाम पर केवल एक दीवार बस थी. सोचता रहा कि बच्चों को कहाँ और कैसे पढ़ाया जाएगा? कुछ दिनों में ग्रामीणों ने नंदीराम देवदास के इंदिरा आवास के मकान में स्कूल लगाने की सुविधा बनाई. स्कूल मे दाखिल खारिज और हाजिरी रजिस्टर भी नही था. हाजरी रजिस्टर खरीद कर लाने के बाद 28 विद्यार्थियों का नाम लिखा गया और पढ़ाई प्रारंभ हुई. ग्रामिणों से चर्चा कर स्कूल बनाने के लिए उन्हें तैयार किया. तब कहीं जाकर एक वर्ष में स्कूल के लिए दो कमरे बन सके और विद्यार्थियों की शिक्षा स्वयं के भवन में प्रारंभ हुई. बोरिद जाने के लिए रास्ता नही था. बरसात के मौसम में गाँव तक पहुंचना दुखदाई था. परन्तु बच्चों को शिक्षित करने की बड़ी जिम्मेदारी थी, इसलिए जाना पड़ता था. कुछ दिनों बाद गाँव में ही सपरिवार रहने लगा. ग्रामिणों के पास स्वयं के रहने के लिए मकान की कमी थी, वे अन्य को कहाँ रखते. फिर एक इंदिरा आवास में व्यवस्था हुई. वहीं सपरिवार रहने लगा. उन दिनों गाँव में बिजली नहीं थी. बहुत ही कठिन था, जीवन यापन करना।

धसकुड़ का झरना
रास्ते में आदित्य सिंग से छत्तीसगढ़ी गीत की फरमाईश करता हूँ, वे सुनाने को सहर्ष राजी हो जाते हैं। आदित्य सिंग गीत अच्छे लिखते हैं। उनके गाए गीत राजीव (आमचो बस्तर) ने रिकार्ड किए।मुख्य सड़क पर थोड़ी दूर चलने के बाद कच्ची सड़क आ गई, कच्ची सड़क पर मुरम डाल रखी थी, कार के निकलने में कठिनाई हो रही थी। धीरे धीरे कच्ची सड़क पर आगे बढ़ते रहे, लगभग 5 किलोमीटर चलने पर दांयी तरफ एक पगडंडी जाती है उसके दोनो तरफ चूना डाल रखा था, जैसे किसी मंत्री के स्वागत के समय रास्ता बताने के लिए डाला जाता है। हमें कार यहीं सड़क पर छोड़नी पड़ी, आगे की यात्रा यहीं से 11 नम्बर की सवारी पर करनी थी। पैदल चलने मे राजीव को थोड़ी परेशानी थी क्योंकि ४ दिन पहले ही उसके पैर का प्लास्टर खुला था और पैर में सुजन आने का भी डर था। छड़ी के सहारे राजीव बराबर चल रहे थे। जंगल में यह "धसकुड़" झरने तक जाने का मार्ग है। बोरिद गाँव चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा है एवं मुख्य सड़क से लगभग 50 से 75 फिट की गहराई पर है। हम मुख्य सड़क से नीचे उतरते आए हैं, जंगल में "खैर" के वृक्षों की अधिकता है। खैर से कत्था बनता है जिसका उपयोग पान में किया जाता है। यहाँ खैरवार जाति के लोग निवास करते हैं जिनका मुख्य पेशा खैर से कत्था निकालना है। आधा किलोमीटर मुरम की पगडंडी पर चलने के बाद रास्ता गायब हो गया। जंगल में पड़े उबड़ खाबड़ पत्थरों पर चलना पड़ रहा था। थोड़ा सा भी कहीं पैर मुड़ा और 50,000 का नगद नुकसान एवं 4 महीने का शय्या विश्राम तय मानिए।

राजीव रंजन
जँगल में मकड़ियों के जाले लगे थे, उनके बीच से गुजरने पर सिर के बालों में फँसने से पसीने के कारण खुजली हो रही थी. आगे चलने पर झरने की कल कल ध्वनि सुनाई देने लगी। रास्ते में बड़ी चट्टाने आने के कारण एक वृक्ष की छाँव में राजीव बैठकर अपनी आगामी उपन्यास की नायिका की कल्पना में लग गए और हम झरने तक पहुँचने के लिए आगे बढ़ते रहे। प्राकृतिक वनों मे वानस्पतिक विविधता दिखाई देती है। जंगल महकमे द्वारा लगाए गए वन हरे तो होते हैं पर वानस्पतिक विविधता दिखाई नहीं देती। सामने झरना दिखाई देने लगा। पानी की धार कम हो चुकी थी। बरसात में अपने पूर्ण यौवन पर होता है यह झरना। झरने के नीचे कुंड मे पानी भरा हुआ था, इस पानी का खेती में उपयोग करने के लिए झरने से निकले हुए नाले को बांध दिया गया है। निर्जन स्थान होने के कारण भालुओं का खतरा अधिक है। कभी कभी चीते तेंदुए भी चले आते हैं झरने का सौंदर्य दर्शन करने। मैने झरने के चित्र लिए, कुण्ड में छोटी रुदवा मछलियाँ तैर रही थी, उन्होने भी कुशल माडेल की तरह पोज देकर फोटो खिंचवाई। जंगल में पीछे राजीव को अकेला छोड़ आए थे, सुरक्षा की चिंता हो रही थी। 

मुझे एक पत्थर पर कुछ चिन्ह दिखाई दिए। समीप जाने पर तोड़ने के लिए पत्थर पर सुराख बने दिखाई थे। मैने अनुमान लगाया कि सिरपुर यहाँ से 15 किलोमीटर पर है, हो सकता है कि प्राचीन राजधानी में निर्माण के लिए पत्थर यहाँ से भी जाते हों। जंगल में यहाँ से 5 किलोमीटर पर सिंगा धुरवा में शरभपुरियों की राजधानी होने का कयास लगाया जा रहा है। हमें वहाँ तक भी जाना है, हम लौटकर राजीव के पास पहुँचे तो वे वृक्ष की शीतल छाँव के नीचे आराम फरमा रहे थे। जिस उबड़ खाबड़ रास्ते से हम गए थे उसी से लौटना पड़ा। कार तक पहुँचने मे पसीना निकल गया, कार में रखा हुआ पानी भी गरम हो गया था.अब बोरिद में ही जाकर पानी पीना था। रास्ते में एक महिला सिर पर प्लास्टिक का धमेला रखे आ रही थी.जंगल के गाँव में भी प्लास्टिक ने डेरा जमा लिया है। घरेलू कामों के लिए बांस की बनी टोकरियाँ और लोहे की चद्दर के धमेले दिखाई नहीं देते। नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी सच करने का उद्यम गाँव गाँव में हो रहा है। महाप्रलय आने पर सारी दुनिया प्लास्टिक में ही चिपक कर मरेगी. आगे बढ़ने पर अपने पशु लेकर चराने जाता हुआ चरवाहा मिला। उसने अपनी खुमरी को मोर पँखों से सजा रखा था। उसे पहाटिया कहने पर उसने बताया कि वह गोंड़ ठाकुर है। गाँव में दुर्गा पूजा का जोर चल रहा है। पहले छत्तीसगढ़ के गाँवों मे जंवारा का चलन था। शहरों की बयार गाँव तक बह रही है, दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने का चल यहाँ पर भी जोरों से है।

बोरिद का स्कूल
लो जी, पहुंच गए स्कूल के तीर, सजा-धजा स्कूल याने पाठशाला। कभी हम भी अम्मा का सिला हुआ झोला टांक कर आया करते थे। स्कूल में झाड़ू लगा कर टाट पट्टी बिछाते, सब काम पाली में होता था। झाड़ू न लगाने पर ५ पैसे का अर्थ दण्ड देना पड़ता था। अब ऐसा नहीं है, प्रत्येक स्कूल मे चपरासी है। आदित्य सिंग का जाना पहचाना गाँव, जहाँ उन्होनें जीवन के महत्वपूर्ण साल गुजारे। वे बताते हैं कि गाँव के लतेल नामक व्यक्ति का बरहा ( जंगली सुवर ) ने पेट फाड़ दिया था, जिसके बाद वह मर गया़। स्कूल पहुंचने पर ध्रुव गुरुजी मिलते हैं, दो बच्चे आकर कहते हैं "मे गो आउट सर"। सुनकर लगा कि अब आदिवासी अंचल के लोग भी समझ चुके हैं, बिना अंग्रेजी के भारत में गुजारा संभव नहीं। सरकार चाहे कितना ही हिन्दी का बढ़ावा देने का पाखण्ड कर ले पर तकनीकि शिक्षा की सारी पढ़ाई अंग्रेजी में ही होती है। 28 विद्यार्थियों से प्रारंभ हुए स्कूल में आज 60 बच्चे पढ़ते हैं, पाँच कक्षाओं को मिलाकर इतनी कम दर्ज संख्या से लगा कि ग्रामवासी अभी भी शिक्षा के प्रति उदासीन हैं।

केजा बाई
गाँव में 64 घर हैं, कुल जनसंख्या 399 है। जिसमे लगभग 36 घर गोंड़ों के, 17 घर गांड़ा के, 10 घर यादवों के 1 घर तेली का। मुख्य काम खेती करना ही है। स्कूल के समीप सुकलई नाला बहता है, हम नाले की तरफ चल पड़े। नाले मे भरपूर पानी था। पानी रोकने के लिए एनीकट बना हुआ है, इसमे साल भर पानी रहता है। यह नाला रायपुर जिले एवं महासमुंद जिले का विभाजन करता है। बोरिद महासमुंद जिले का अंतिम गाँव है। नाले के किनारे बैठकर चर्चा होती है कि किस तरह गाँवों के नाम अब बदल रहे हैं। गाँव के लोग पढ़ लिख गए हैं तो उटपटांग नामों से शर्मिंदा होना पड़ता है। इसलिए गाँव का नाम ही बदल लेना चाहिए़। स्कूल के शिक्षक बी एल ध्रुव बताते हैं कि चिरको अब चित्रकूट, मुड़ियाडीह अब रामपुर, भोसड़ा अब भवानीपुर, घोंठ अब नरसिंहपुर हो गया है। हमारे यहाँ भी गधीडीह ‍‍अब गणेशपुर हो गया। चर्चा चल रही थी, सुबह नाश्ता करके ही चले थे। गाँव में खाने की व्यवस्था करने में वक्त जाया होता इसलिए हमने सिरपुर लौटने का निर्णय किया। तभी नाला पार करके अपनी बकरियों के साथ बुढ़ी माई आ गई, गुरुजी को पहचानी नहीं, समीप जाने पर ही पहचान पाई। कहने लगी "बने देंह धरे हस, पेट घलो निकलगे हे, चिन नई पाएंव गौ।" बुढ़िया माई के कथन पर सब मुस्कुरा कर रह गए।

मंगतु और यायावर
चलते चलते बुढ़िया माई का नाम पता चला "केजा बाई" इसका एक ही बेटा है और ५ एकड़ जमीन है, बेटा किसी दूसरे गाँव में नौकरी करता है। उसके बीबी बच्चों को मंगतु और केजा बाई पाल रहे हैं। पोता जवान हो गया है, बकरियाँ बेचकर उसके विवाह की योजना बन रही है। केजा बाई कहती है "मूल ले ब्याज बने सुहाथे, उचित ला गिंजरन दे कोनो मेरन, है तो मोरे बेटा। हाथी फिरे गाँव गाँव, जेखर हाथी तेखर नाँव। बात तो पते की कह गयी माई। घर पहुँचे तो उसका पति मंगतु राम मिला। ये बारनयापारा में फारेस्ट गार्ड था, फुरफुंदी बीट से 1993 में रिटायर हुआ। अब घर का ही काम करता है, खेती रेगहा में दे रखी है, घर का काम चल जाता है। मंगतु बताता है कि गाँव में सड़क और बिजली लगभग साथ ही आई। कपार्ट ने सड़क बनाने के लिए 75% राशि दी, बाकी 25% काम गाँव वालों ने श्रमदान करके किया। सड़क और बिजली के लिए गुरुजी आदित्य सिंग ने प्रयास कर स्थानीय जनप्रतिनिधियों बिसन लाल चंद्राकर, फजल हुसैन पाशा एवं दीनदयाल साहू के माध्यम से करवाया। गाँव वालों को सड़क एवं बिजली लाने के लिए प्रेरणा दी. इस दृष्टि से गुरुजी का काम महत्वपूर्ण है, अगर प्रेरणा देने मात्र से गाँव का भला हो जाए। मंगतु चाय बनवाने को कहता है। पर समयाभाव के कारण हम मना कर देते हैं और लौट चले सिरपुर की ओर, जंगल के आदिवासी गाँव की सैर करके।  जारी है ...... आगे पढ़ें 
राजीव रंजन, यायावर,आदित्य सिंग,बी एल ध्रुव

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मोटल पंडवानी ----Motel Pandwani----- ललित शर्मा

पंडवानी मोटल का खूबसूरत दृश्य
छत्तीसगढ़ अंचल पर्यटन की दृष्टि से सम्पन्न राज्य है। यहाँ हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं, लहराती बलखाती नदियाँ, गरजते जल प्रपात, पुरासम्पदाएं, प्राचीन एतिहासिक स्थल, अभ्यारण्य, गुफ़ाएं-कंदराएं, प्रागैतिहासिक काल के भित्ती चित्रों के साथ और भी बहुत कुछ है देखने को, जो पर्यटकों का मन मोह लेता है। यहाँ की धरा किसी स्वर्ग से कम नहीं है। वनों से आच्छादित धरती पर रंग बिरंगी तितलियों के साथ शेर की दहाड़ एवं हाथियों की चिंघाड़ भी सुनने मिलती है। मन करता है कि कभी इस पावन भूमि को अपने कदमों से चलकर उसका एक-एक इंच भाग के दर्शन कर लूँ, यहाँ के नजारे अपनी आँखों में संजो लूँ। न जाने फ़िर कभी किसी जन्म में देखना संभव हो भी या नहीं। मेरे जैसे घुमक्कड़ को ऐसे ही स्थान पसंद आते हैं। मैं हमेशा प्रकृति के समीप ही रहना पसंद करता हूँ क्योंकि प्रकृति ही मुझे आगे चलने के लिए उर्जा प्रदान करती है। प्रकृति के नजारों का आनंद ही मेरी यायावरी का ईंधन है।

सुसज्जित शयन कक्ष
छत्तीसगढ नया राज्य है, इसका निर्माण हुए 11 वर्ष ही हुए हैं। इतने कम समय में सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा की दृष्टि से बहुत कार्य किए हैं। इन कार्यों में प्रमुख हैं पर्यटन स्थलों के समीप प्राकृतिक वातावरण में मोटल एवं रिसोर्ट का निर्माण। पूर्व में छत्तीसगढ अंचल में पर्यटन करने पर ठहरने और खाने के लिए ग्रामीण होटलों का सहारा लेना पड़ता था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के बनाए विश्राम गृह तो है, पर वे मध्यप्रदेश के जमाने से लोकनिर्माण विभाग के अधीन हैं और पर्यटक जब रात को थका हारा विश्राम करने लिए यहाँ पहुंचता था तो पहले किसी अन्य नाम से यहाँ से कमरे बुक मिलते थे। भले ही कोई वहाँ रहने के लिए रात भर नही आए, परन्तु सरकारी आरक्षण तो आरक्षण होता है। ऐसी दशा से निपटने के लिए पर्यटकों को सुविधा देने की दृष्टि से पर्यटन स्थलों पर मोटलों एवं रिसोर्ट्स का निर्माण पर्यटन विभाग द्वारा किया गया। लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर मोटल या रिसोर्ट हैं। जहाँ ठहरने के साथ भोजन की उत्तम सुविधा भी उपलब्ध है। कुछ विश्राम गृह भी लोकनिर्माण विभाग ने पर्यटन मंडल को हस्तांतरित किए हैं।

सुव्यवस्थित रसोई घर
पर्यटन विभाग ने पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पर्यटन स्थलों पर 21 मोटलो का निर्माण किया है। जहाँ भोजन के साथ ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। ऐसा ही एक मोटल रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर ग्राम केन्द्री (अभनपुर) के समीप निर्मित हुआ है। इस मोटल का नाम छतीसगढ की प्रसिद्ध काव्य लोक गाथा पंडवानी पर रखा गया है। पंडवानी मोटल रायपुर से 22 किलोमीटर अभनपुर से 5 किलोमीटर और नवीन राजधानी से अधिकतम 5 किलोमीटर पर स्थित है। पंडवानी मोटल को केन्द्र में रख कर अगर हम समीपस्थ पर्यटन स्थलों पर गौर करें तो राजिम लोचन मंदिर 23 किलोमीटर, प्रसिद्ध तीर्थ बल्लभाचार्य की जन्म भूमि चम्पारण 23 किलोमीटर, छत्तीसगढ की सांस्कृतिक झलक पुरखौती मुक्तांगन 3 किलोमीटर, एयरपोर्ट 7 किलोमीटर, नवीन क्रिकेट स्टेडियम 10 किलोमीटर, प्रस्तावित टायगर सफ़ारी 3 किलोमीटर एवं नैरोगेज का रेल्वे स्टेशन केन्द्री में आधे किलोमीटर पर स्थित है।

रेस्टोरेंट से बाहर का नजारा
राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने से यहाँ से यात्रा के साधन बस, टैक्सियाँ हमेशा उपलब्ध हैं। रात को ही अगर कहीं अचानक जाना पड़े तो आवा-गमन के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं। पंडवानी मोटल से 2 किलोमीटर पर छत्तीसगढ की महत्वाकांक्षीं सिंचाई परियोजना "महानदी उद्वहन सिंचाई परियोजना ग्राम झांकी" स्थित है। परियोजना स्थल की ऊँचाई समुद्र तल 324.25 मीटर है। इसका निर्माण 1978 में हुआ था। उस समय यह एशिया की पहली उद्वहन सिंचाई परियोजना थी। मोटल के समीप होने से इस स्थान का भ्रमण किया जा सकता है। महानदी यहाँ से 16 किलोमीटर पर प्रवाहित होती है। इसके तीर पर बसे पद्म क्षेत्र राजिम की मान्यता विश्व भर में है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष यहाँ पर राजिम कुंभ उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। माघ मास की पूर्णिमा से लेकर शिवरात्रि तक चलने वाले इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

विशाल हॉल
पंडवानी मोटल में पर्यटकों सुविधाओं की दृष्टि से ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। साफ़-सुथरे एसी और नान एसी रुम हैं। रुम के अलावा एसी डोरमैट्री भी उपलब्ध है। जेब जितना खर्च करना चाहे उतने खर्चे में ही मोटल में ठहरने का लाभ उठाया जा सकता है। लगभग 5 एकड़ में बगीचा लगा हुआ है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं। एक कृत्रिम गुफ़ा के साथ ही स्वीमिंग पूल की व्यवस्था भी है। स्नान के लिए गर्म पानी और खाने के लिए साफ़ सुथरा शाकाहारी रेस्टोरेंट भी है, अन्य होटलों की तरह किचन में मुझे गंदगी नहीं दिखाई दी। साफ़ सुथरा रसोई घर होने से उत्तम भोजन मिलने की संभावना रहती है। पंडवानी मोटल में "बार" की सुविधा नहीं है और न ही यहाँ मांसाहारी भोजन मिलता है। रुम सर्विस के लिए पर्याप्त स्टॉफ़ की व्यवस्था है। घर से दूर शांत वातावरण में रह कर आस-पास के पर्यटन स्थलों की सैर करने की दृष्टि से यह स्थान उत्तम है। पर्यटन विभाग ने मोटल का संचालन निजी हाथों में दे रखा है, इसलिए पर्यटकों को अच्छी सेवा मिलने की उम्मीद की जा सकती है।