शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

अदभुत शिल्पकारी : रुड़ा बाई नी बाव -રુદ઼ા બાઈ ની બાવ​ -- ललित शर्मा


अड़ालज का रास्
मारुतिनंदन रेस्टोरेंट से भोजन करके गांधीनगर मार्ग पर बढते हैं, इस मार्ग पर आगे चल कर बाएं हाथ को अड़ालज लिखा हुआ एक बोर्ड लगा है। हमारी गाड़ी यहीं से एक गोल चक्कर लेती है और अड़ालज की ओर बढ जाती है। बावड़ियाँ तो बहुत देखी हैं। लेकिन जिग्नेश ने बताया कि रुड़ा बाई नी बाव नामक यह बावड़ी कुछ खास हैं। खंडहरों में चक्कर काटने वाले मेरे जैसे आदमी को सुनकर ही अच्छा लगा। हमने तुरंत निर्णय ले लिया बाव देखने का। थोड़ी देर में अड़ालज से पहले दाएं हाथ की तरफ़ मुक्तिधाम दिखाई देता है। मुक्ति धाम गाँव में सही जगह पर था। अगर व्यक्ति को मुक्ति हमेशा याद रहे तो दुनिया चमन हो जाए, अमन हो जाए। लेकिन याद कहाँ रहता है, आदमी बड़ी जल्दी भूल जाता है। मुक्तिधाम से दाएं मुड़ने पर एक बड़ा चौक आता है, उसके चारों तरफ़ सब्जी वालों ने डेरा लगा रखा है। इसके दाएं तरफ़ एक लोहे का गेट नजर आता है। उसके दाएं तरफ़ रुड़ाबाई नी बाव की जानकारी देते हुए एक पत्थर लगा है।

बाव में शिल्पकार
हम गेट से बावड़ी में प्रवेश करते हैं वहाँ बाएं हाथ की तरफ़ एक मंदिर है और सीधे में बावड़ी का प्रवेश द्वार है। वावड़ी 5 मंजिली है और लगभग 100 से उपर सीढियाँ हैं नीचे उतरने के लिए। बावड़ी का प्रस्तर शिल्प अदभुत है। कारीगर ने बहुत ही बारीकी से छेनी हथौड़े का काम कर अंकन किया है। पहला स्टेप उतरने बाद दोनो तरफ़ सुंदर झरोखे बने हुए हैं। झरोखों पर बेल बूटे से लेकर हाथी, घोड़े, नर-नारी इत्यादि कुशलता से उकेरे गए हैं। हाथि्यों की तो पूरी फ़ौज ही है। बावड़ी को अंग्रेजी में स्टेप वेल कहा जाता है। मैने अन्य जगहों पर बावड़ियाँ देखी हैं पर इस बावड़ी की कला अद्भूत है। बावड़ी में नीचे उतरने पर अंतिम मंजिल पर जाली से ढंका हुआ एक कुंआ है। इस कुंए तक जाने नहीं दिया जाता। यह बावड़ी पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। 

सिक्का फ़ेंक तमाशा
कुछ लोग कुंड के पानी में सिक्के फ़ेंक रहे थे, फ़ेंका गया सिक्का पानी में सीधे डूबता नहीं था। कई देर तक वह पानी के उपर चक्कर काटता रहता था। हमने भी कई सिक्के फ़ेंक कर जायजा लिया। लगा कि पानी घनत्व अधिक होने के कारण सिक्का सीधे नहीं डूब रहा था। सिक्का कई देर तक कुंए में गोल चक्कर काटते हुए डूबता उतरता रहता और फ़िर पानी पर तैरने लगता। पानी पर सैकड़ों सिक्के तैर रहे थे। अन्य किसी कुंए में सिक्के फ़ेंकने के बाद पानी में डूब जाते हैं, लेकिन इस बावड़ी में सिक्के नहीं डूब रहे थे।अगर आप जाएं तो प्रयोग करके देख सकते हैं। बावड़ी के निर्माण में लाल सेंड स्टोन का प्रयोग किया गया है। शिला लेख में लिखा है कि पत्थर लाने के लिए जिन गाड़ियों का उपयोग किया गया था उनके तेल का खर्च एक लाख स्वर्ण मुद्राएं था। मुझे समझ नहीं आया कि 1550 में कौन से ऐसे वाहन चलते थे जिन्हे चलाने के लिए तेल का उपयोग किया जाता होगा।

बावड़ी का सुंदर दृश्य, यहीं पर ब्राह्मी मे लिखा हुआ शिलालेख है
बावड़ी निर्माण के पीछे की कहानी यह है कि अड़ालज गाँव पाटण राज्य के अंतर्गत आता था। राजा वीर सिंह बाघेला ने वेबु राज्य के सामंत ठाकोर को लड़ाई में हराकर उसके राज्य पर कब्जा किया तथा उसकी रुपवती कन्या लाल बा के साथ शास्त्रोक्त पद्धति से विवाह रचाया। स्थानीय बोली में रुड़ा नेक काम करने वाले को कहा जाता है। लाल बा के प्रजा वत्सल होने के कारण प्रजा के प्रति उसका अपार स्नेह था। वह अपनी प्रजा का ख्याल रखती थी इसलिए उसे रुड़ा बाई कहा जाने लगा। 1550 में भयंकर अकाल पड़ा, राज्य में त्राहि-त्राहि मच गयी। इससे द्रवित होकर रानी लाल बा ने अपने खजाने से 5 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रजा की सहायता के लिए निकाली और बावड़ी का निर्माण करना तय किया। तब से यह बावड़ी रुड़ा बाई नी बाव के नाम से जानी जाती है। यह बावड़ी गुजरात की शिल्प धरोहरों के मुकुट मे चमकता हुआ एक हीरा है। शिल्प कला की एक धरोहर है। 5 माले की यह बावड़ी शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है। 

बावड़ी से बाहर आते हुए नामदेव जी के साथ
कुछ समय बाद अहमदशाह ने वीरसिंह वाघेला को युद्ध में मार गिराया और उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। लाल बा की सुंदरता के चर्चे उसने सुन रखे थे। लाल बा के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा। जब यह घटना घट रही थी तब बावड़ी का काम चालु था। इसका गुम्बद एंव तीन दरवाजे बनने बाकी थे। लाल बा ने चतुराई का सहारा लिया और अहमदशाह को संदेश दिया  कि जब बावड़ी का कार्य पूरा हो जाएगा वह उसके साथ विवाह कर लेगी। शायद अहमदशाह ने लाल बा की बात नहीं मानकर जिद की होगी तब हार कर लाल बा ने अपना सतित्व बचाने के लिए बावड़ी की पांचवी मंजिल से कूद कर जल समाधि ले ली। रुड़ा बाई (लाल बा) के जान देने के पश्चात बावड़ी का काम अधुरा रह गया। अभी तक बावड़ी का गुम्बद एवं तीन दरवाजों का अधूरा पड़ा है। शिल्पकारों का अधूरा छोड़ा गया काम भी स्पष्ट दिखाई देता है।

हाथीयों की फ़ौज की मौज
सुंदर शिल्पकला युक्त निर्माणों के साथ शिल्पकारों की पीड़ा भी जुड़ी होती है। यहाँ भी वही हुआ जो अन्य जगहों पर सुनाई देता है। राजा ने उन शिल्पकारों को मार डाला जिन्होने ने बावड़ी का निर्माण किया था। इस तरह की बावड़ी का निर्माण अन्य स्थान पर न कर सके। निर्माण के पुरुस्कार स्वरुप शिल्पकारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मैने जहाँ भी निर्माण देखे हैं वहाँ पर बनाने वाले शिल्पकारों की कोई चर्चा ही नहीं होती। उनके नाम निशान नहीं होता। जिन्होने बनवाया है उनका ही नाम होता है। हाँ अपवाद स्वरुप आमेर के किले के शिल्पियों दिलावर सिंह और मोहन लाल का नाम किले के साथ जुड़ा है। रुड़ाबाई की बाव के शिल्पियों का भी कोई नाम नहीं निशान नहीं है। 

इतिहास के झरोखे में
इस बावड़ी में ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख है जिस पर रुड़ा बाई की बाव के निर्माण के विषय में लिखा है। मैं शिलालेख की तश्वीर लेना चाहता था। यह शिला लेख 4 थी मंजिल पर लगा है और उपर की सीढियाँ बंद होने के कारण नीचे से एक फ़िट के छज्जे से होकर उस तक पहुंचा जा सकता है। साथ की दीवाल पर कोई पकड़ नहीं होने के कारण दुर्घटना की आशंका भी थी। पुरातत्व सर्वेक्षण के चौकीदार ने बताया कि इस रास्ते से कुछ लो गिर कर प्राण गंवा बैठे हैं। इसलिए रास्ता बंद कर दिया है। मैने खतरा उठाना ठीक नहीं समझा। शिलालेख की फ़ोटो तो और कहीं भी मिल जाएगी। अगर किसी और ने फ़ोटो नहीं ली होती तो एक बार प्राण की बाजी लगाई जा सकती थी। बाव के उपरी हिस्से में लोहे के जाल लगा दिए गए हैं तथा एक बगीचा भी बना है। जहाँ लोग तफ़री करते दिखाई दिए।

बावड़ी के उपर का दृश्य
बाव की उपरी सतह पर रस्सी से पानी निकालने के लिए चकरी की व्यवस्था भी है। साथ ही गगरियाँ रखने के लिए खेळ का निर्माण भी किया गया है। हमने बाव को अच्छी तरह से देखा। अब समय हो गया था आगे बढने का। विदेशी पर्यटक भी दिखाई दे रहे थे, यह बाव गुजरात पर्यटन के नक्शे पर है। जिसके कारण जो भी पर्यटक आते हैं वे इस बाव को जरुर देखते हैं। अहमदाबाद के नजदीक होने के कारण यहाँ तक आने के लिए सभी तरह के साधन उपलब्ध हैं। अहमदाबाद से गांधी नगर के लिए शानदार सड़क जाती है। अगर यहाँ के लोगों का ट्रैफ़िक सेंसर सही काम करे तो यह दूरी बहुत ही कम समय में पूरी की जा सकती है। रुड़ाबाई  की बाव देखना सुखद रहा। बाजार से होते हुए हम वापस गांधीनगर की ओर चल पड़े।………आगे पढें

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

"हुं छुं अमदाबाद" હું છું અમદાબાદ​ --- ललित शर्मा

प्रारंभ से पढे
चौधरी की चाय, चौधरी की चाय के शोर के साथ आँख खुली। आँख बंद किए किए ही चाय का आर्डर दिया। महाराज भी उठ चुके थे, उन्होने एक चाय मुझे थमाई और एक चाय खुद थामी। 5 रुपये में चाय उम्दा थी, लेकिन कप छोटा था, महाराज ने चाय वाले से दुबारा कप में चाय डलवाई तब उनकी इच्छा पुरी हुई। सूरत जा चुका था कब का, खिड़की से बाहर झांके तो मणिनगर था, मतलब अहमदाबाद करीब था। विनोद भाई का फ़ोन आया उन्होने लोकेशन ली, थोड़ी देर में ड्रायवर का भी फ़ोन आ गया। उसने कहा कि वीआईपी लेन में स्टेशन के सामने गाड़ी खड़ी है, सामने ही मिलुंगा।

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच भी वही देखने मिला जो हर जगह रेल पटरी के किनारे देखने मिलता है सुबह-सुबह और सिर झुका कर आँखे बंद करनी पड़ती है। कोई नया दृश्य नहीं है, यह नजारा देखने के बाद मुझे अंग्रेजों को धन्यवाद देने का मन हो जाता है, वे होते तो उन्हे प्रशस्ति-पत्र भी देता। अगर उन्होने ने रेल की पटरी नही बिछाई होती तो लोग सुबह-शाम की निस्तारी के लिए कहाँ जाते? भारत में भाषाएं संस्कृति अलग-अलग है, लेकिन पटरियों के किनारे लोटा-डब्बा लेकर जाने वाले सभी एक वर्ग से ही आते हैं। बिना किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के अपना काम निपटाते हैं, शायद यही एक काम है जो भारतीयों को एक सूत्र में बांधता है। कुछ दिनों बाद शायद इनकी अखिल भारतीय स्तर पर युनियन भी बन जाए। :)

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच ट्रेन ने काफ़ी समय ले लिया। डाऊन गाड़ी मान कर इसे पीट दिया गया और एक घंटे लेट हो गयी। एक चाय और पीकर खुमारी उतारने की कोशिश की। गाड़ी ने धीरे-धीरे चलकर स्टेशन तक पहुंचाया। प्लेट फ़ार्म की सीढियों पर चेकिंग चल रही थी, दो चार सिपहिया यात्रियों का बैग खुलवाने में लगे थे। हमें रोका नही, और हम रुके नहीं। स्टेशन से बाहर निकले तो गाड़ी लगी थी। ड्राईवर हाजिर था, लगभग 8 बज रहे थे। अहमदाबाद स्टेशन के बाहर निकलते ही, एक बहुत बड़ी होर्डिंग दिखाई दी। उसी गर्वीले अंदाज में  जैसी लखनऊ स्टेशन के बाहर दिखाई दी थी। "हुं छुं अमदाबाद" लिखी हुई होर्डिंग सीना तान कर खड़ी थी। स्टेशन पर ट्रैफ़िक बहुत अधिक था। ड्राईवर जिग्नेश ने बताया कि सुबह और शाम स्टेशन के भीतर-बाहर जाना बहुत मुश्किल होता है। हमे अहमदाबाद ने ही बताया "हूँ छूँ अमदाबाद" । परिचय के बाद हम चल पड़े अपने ठिकाने पर, जिग्नेश से अहमदाबाद के रास्तों के बारे में पूछते हुए चलते हैं। वह में बीएसएनएल की 11 माले की ईमारत में ले जाता है। इस इमारत में 4 लिफ़्ट हैं, जिसमें 3 साधारण है और एक सुपरफ़ास्ट। कब 11 वीं मंजिल पर पहुंचती है पता ही नहीं चलता।

11 वीं मंजिल पर स्थित गेस्ट हाऊस में हमारा रुम था। रुम में पहुच कर चाय बुलाई, अटेंडेंट से गरम पानी का पता किया, उसने बताया कि गीजर चालु ही रहता है। मैने पहले नामदेव जी को स्नान करने कहा और मैंने रुम की खिड़की खोली, नीचे झांकते ही छत्तीसगढ दिखाई दिया। वाह भाई तू जहाँ तक चलेगा, मेरा साया साथ होगा वाली लाईन याद आ गयी। क्यों नहीं साथ होगा? जन्म भूमि और कर्म भूमि की बात तो यही होती है, मरते-जीते खींच कर ले ही जाती है जहाँ जन्म हुआ है। एक बिल्डिंग की छत पर छत्तीसगढ पर्यटन का प्रचार करती एक होर्डिंग दिख रही थी। जिसमें छत्तीसगढ आने का आमंत्रण था। वहीं खिड़की के सामने एक कबुतर भी बैठा था। उसकी गुटर गुँ जारी थी। जिग्नेश ने बताया था कि इस जगह का नाम सुंदरपुरा है, हमें स्नान करके सबसे पहले कांकरियाँ तालाब के पास एक विवाह घर में जाना था। जहाँ कुछ देरे नामदेव जी को दर्जी समाज के सम्मेलन में हाजिरी देनी थी। जिग्नेश को भी नहाने भेज दिया और उसे 10 बजे बुलाया। गेस्ट हाउस में केयर टेकर ने पोहा दही का नाश्ता कराया। लेकिन पोहा में मीठा डाल कर मजा किरकिरा कर दिया। खैर अन्न का अपमान करना मेरी फ़ितरत में नहीं, जो मिला खाया और आगे बढे।

जिग्नेश आ चुका था, तभी मुझे याद आया कि अहमदाबाद में हमारे दिग्गज सीनियर ब्लॉगर रहते हैं। उनका नम्बर मेरे दूसरे फ़ोन में था। पाबला जी को फ़ोन लगाया उनका नम्बर लेने के लिए। थोड़ी देर में पाबला जी ने नम्बर दिया, मैने उनसे बात की। बड़े खुश हुए भाई, मुझे भी अच्छा लगा। गेस्ट हाऊस से निकल कर सबसे पहला काम था ब्लॉगर मित्र से मिलना। जिसे हमने आभासी पढा था, देखा था, समझा था लेकिन रुबरु नहीं हुए थे। जिस तरह लोग दिन की शुरुआत मंदिर के भगवान के दर्शन से करते हैं, उसी तरह हम किसी भी शहर में जाने पर दिन की शुरुवात ब्लॉगर देव के दर्शन से करते हैं। बस यह देव-देवी कृपा बनी रहे। पता पूछते-पूछते हम उनके 5 वें माले के दफ़्तर में पहुच गए। वे गायब थे, थोड़ी देर में पहुंच गए, हमने छत्तीसगढ की राम कथा की एक प्रति भेंट की। यह हम उनके लिए विशेष तौर पर लाए थे। जब घर से चले थे तो बेगानी जी से मिलना याद था। लेकिन रास्ते में भूल गए। इसलिए पाबला जी से नम्बर लेना पड़ा। संजय भाई ने फ़टाफ़ट काफ़ी बना कर पिलाई, उनके दर्शन के पश्चात फ़िर मिलने का वादा कर विदा लेकर कांकरिया तालाब के जसवंत हॉल की ओर चल पड़े। 

कांकरिया तालाब अहमदाबाद का मुख्य आकर्षण है, यहाँ शाम को काफ़ी रौनक रहती है लोग पिकनिक मनाने और तफ़री करने आते हैं। इसके सामने ही मिला जसवंत राय हॉल्। गुजराती दर्जी सम्मेलन चल रहा था, नामदेव जी भी जाति मोह में यहां तक पहुच गए थे। स्टेज पर रौनक लगी थी, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के दो साधु अतिथि के तौर पर मंच पर विराजमान थे। हम भी पिछली कुर्सियों पर बैठ गए जाकर। जिनके निमंत्रण पर नामदेव जी पहुंचे थे उन्हे ही फ़ुरसत नहीं थी परघाने की। इसलिए हमने कहा था कि घर से ही परघे परघाए चलो। क्या भरोसा उनकी बोली आपकी समझ में न आए। उस सज्जन को बुलाकर मैने नामदेव जी के बारे में बताया तो वे उन्हे मंच पर ले गए और शाल श्री फ़ल से सम्मान किया। नामदेव जी भी बिरादरी में मिल गए। सभी ने उन्हे देखा और पहचाना। अब हमने ईशारा किया कि काम खत्म हो गया आज का, अब आगे बढा जाए। जिग्नेश को पूछने पर उसने बताया कि पहले रुड़ाबाई नी बाव में चलते है फ़िर वहीं से गांधीनगर का अक्षर धाम देख लेगें। ये आईडिया सही लगा, समय का सदुपयोग हो जाएगा। हम गांधीनगर की ओर चल पड़े। विनोद भाई ने फ़ोन पर भोजन की खैर खबर ली।

अहमदाबाद से गांधीनगर के रास्ते पर बहुत सारे ढाबे हैं, जिनके साईन बोर्ड पर "काठियावाड़ी-पंजाबी खाना" लिखा है। काठियावाड़ी खाने के साथ पंजाबी खाना भी मिलता है। मैं पहले भी गुजरात का पंजाबी खाना खा चुका था। वह भी गुजराती खाने जैसा ही था। मतलब गुजराती अगर पंजाबी बोलेगा तो वह भी गुजराती में बोलेगा। हा हा हा। एक ढाबा बढिया दिखाई दिया, झमाझम सजावट बडे बड़े साईन बोर्ड और गाड़ियों की भीड़। हमने यहीं भोजन के लिए गाड़ी रोकी और तय किया कि काठियावाड़ी भोजन ही करेंगे। ढाबे नुमा होटल का नाम मारुतिनंदन होटल था। वेटर ने मीनू कार्ड सामने लाकर रख दिया। उसमें मारुतिनंदन स्पेशल बहुत कुछ दिखाई दिया, पर समझ नहीं आया। 

हमने काठियावाड़ी थाली का आर्डर दिया। मुझे छाछ की बारहों महीने जरुरत रहती है। इसलिए छाछ देख कर मन प्रसन्न हो गया। वेटर ने पूछा कि रोटली चाहिए की रोटला। मैने बाजरे की रोटी खाने के इरादे से रोटले का आडर दे दिया। जब रोटी आई और एक कौर खाया तो कुछ खटक गया। मुझे बाजरे के आटे में मिलावट लगी। खाने का मन नहीं किया, लेकिन खाना थाली में न छोड़ने के कारण दो रोटले खा ही लिए, छोटे छोटे थे। अब यही रोटले आगे की यात्रा में भारी पड़ने वाले थे, यह मुझे मालूम नहीं था।  जिग्नेश और नामदेव जी ने रोटली ली वे सुखी रहे। भोजन करके हम रुड़ा बाई नी बाव की तरफ़ बढे........... क्रमश यात्रा जारी है..........आगे पढें