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बुधवार, 27 दिसंबर 2017

बुंदेलखंड के दो प्राचीन नगर हैं, ओरछा एवं गढकुंढार

बुंदेलखंड के दो प्राचीन नगर हैं, ओरछा एवं गढकुंढार। गढ कुंढार तो नहीं देख सके पर गत वर्ष पहाड़ों से लौटते हुए ओरछा जाना हुआ और इस वर्ष भी पहाड़ों से लौटते हुए ओरछा पहुंच गए। वैसे तो ओरछा का इतिहास 8 वीं सदी से प्रारंभ होता है, परन्तु यहां रौनक बुंदेलाओं के कार्यकाल में आई एवं बुंदेलाओं ने भव्य निर्माण कार्य करवाए। 

निर्माण कार्यों में जहाँगीर महल, राज महल, राम राजा मंदिर, रायप्रवीण महल, लक्ष्मीनारायण मंदिर, फ़ुल बाग, पालकी महल, सावन भादो, चतुर्भुज मन्दिर प्रमुख हैं। इसके साथ ही राजाओं की भव्य छतरियाँ (मृतक स्मारक) आकर्षक हैं। बेतवा नदी के तट पर बनी यह छतरियाँ भव्य दिखाई देती हैं। कहा जा सकता है कि ओरछा नगर की पहचान हैं।

वर्तमान में ओरछा एक बड़ा पर्यटन केन्द्र बनता जा रहा है। यहाँ पांच सितार स्तर के कई होटल एवं रिसोर्ट बन चुके हैं। इससे साबित होता है कि पर्यटकों की आवा जाही अच्छी है। 

झांसी रेल्वे स्टेशन के समीप होने का लाभ भी इस स्थान को मिला। जिसके कारण झांसी पहुंचने वाले पर्यटक पहले ओरछा आते और फ़िर खजुराहो की ओर निकल जाते हैं, इस बीच झांसी छूट जाता है। मेरे साथ भी यही हुआ और झांसी छूट गया।

वर्तमान में ओरछा छोटा सा नगर है, जिसमें लोगों का पता मंदिर के आगे और पीछे लिखने से चिट्ठी पहुंच जाती है, बुंदेलाओं के समय में इसकी चमक चरम सीमा पर थी। बुंदेलाओं का राज1783 में खत्म होने के साथ ही ओरछा की कीर्ति एवं चमक घने जंगलों में खो गई। यह पुन: स्वतंत्रता संग्राम के समय सुर्खियों में आया जब स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहां के एक गांव में आकर छिपे थे। 

गत वर्ष ओरछा को मैने अपने कैमरे की आँख से देखा था। कुछ चित्र लिए थे, इस नगरी के श्वेत श्याम चित्र आपको पसंद आएंगे क्योंकि श्वेत श्याम चित्रों का अपना अलग ही आनंद है। इस यात्रा में मेरे सूत्रधार मुकेश पाण्डेय जी Chandan बने। उनके साथ ही ओरछा भ्रमण संभव हुआ। अगर आज कहा जाए तो वे ओरछा के पुरातत्व एवं इतिहास के अच्छे जानकार हैं। 

बुधवार, 10 अगस्त 2016

पालकी महल, सावन भादो, चतुर्भुज मंदिर ओरछा

आरम्भ से पढ़ें 
राम राजा मंदिर के समक्ष ही हरदौल का बैठका है। यह एक उद्यान है, जहाँ कभी आमोद प्रमोद के लिए राजपरिवार की चहल पहल रहती थी। इस उद्यान में जल के लिए प्रणालिकाएं एवं कुंड बने हुए हैं, जिनमें कभी जल प्रवाहित होता होगा और बहिश्त की याद दिलाता होगा। उद्यान के मध्य में हरदौल का बैठका है, जिसमें हरदौल की अश्वारोही प्रतिमा स्थापित है, यहाँ उनके दर्शन करने के लिए भक्तों का मेला लगा हुआ था। इस उद्यान को फ़ूल बाग कहते हैं। इसके सामने "टुरी हटरी" लगी हुई है, जहाँ शृंगार की वस्तुएं मिलती हैं। हमने यहाँ के कुछ चित्र लिए। 
पालकी महल और हटरी
हरदौल का बैठका स्थित महल का निर्माण राजा वीरसिंह के कार्यकाल में किया गया था। यह आयताकार महक द्विमंजिला है। भूतल पर तीन मेहराब द्वार हैं और इसके दोनो तरफ़ कक्षों का निर्माण किया गया है। इसमें प्रस्तर स्तंभ लगे हुए हैं। पालकी महल को इसमें बाद में जोड़ा गया था। इसका विस्तार सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में किया गया बताया जाता है। यह बहुत ही सुंदर इमारत है। इस महल के ऊपरी मंजिल से बाहर छज्जा निकला हुआ है। जिसका उपयोग राजा द्वारा प्रजा से सम्पर्क स्थापित करने लिए किया जाता होगा।
सावन भादो भवन
हरदौल के बैठके से लगा हुआ पालकी महल है। इस महल की आकृति पालकी जैसे होने के कारण इसका नाम पालकी महल पड़ा। पालकी महल के समीप ही सावन भादो नामक दो मीनारे हैं। इन्हें वायु यंत्र माना जाता है। इसके नीचे के तहखाने में राजा परिवार गर्मी के दिनों में शीतलवायू का आनंद लेता था। कहते हैं यहाँ पहुंचने के लिए सुरंग है, राजमहल से सुरंग के माध्यम से यहाँ पहुंचा जाता था। किंवदन्ति है कि वर्षा ऋतु में सावन  खत्म होने और भादों मास के शुभारंभ के समय ये दोनों स्तंभ आपस में जुड़ जाते थे। हालांकि यह संभव नहीं है। 
चंदन कटोरा
इन मीनारों के नीचे जाने के रास्ते बंद कर दिये गये हैं इसलिए प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। सावन भादो के तहखाने के ऊपर राजदरबार भी बना हुआ है। इसके समक्ष प्रस्तर निर्मित एवं अलंकृत प्याला रखा हुआ है। कहते हैं जब राजा युद्ध के लिए जाते थे तो इस प्याले में चंदन भरा जाता था। युद्ध के लिए जाने वालों का इस प्याले से चंदन अभिषेक कर युद्ध के लिए विदा किया जाता था। एकाश्म शिला से निर्मित होने के कारण इससे धातु की ध्वनि निकलती है।   
फ़ूल बाग में लाला हरदौल की प्रतिमा
फ़ूल बाग से हम चतुर्भुज मंदिर पहुंचे। इसका निर्माण महल जैसे ही हुआ है। यह ओरछा की बड़ी इमारत है। इसका निर्माण ऊंचे अधिष्ठान पर किया गया है। इसके गर्भ गृह का मुंह राजमहल के समक्ष है। कहते हैं कि इसे राजा इस तरह से बनवाया था कि राजमहल के शयन कक्ष से जब वे सो कर उठें तो गर्भ गृह में भगवान के दर्शन हो जाएं। परन्तु उनकी यह योजना अधूरी रह गई क्योंकि भगवान राम राजा यहां तक पहुंचे ही नहीं, उनकी योजना धरी की धरी रह गई। वर्तमान में इसके गर्भ गृह में रामदरबार स्थापित है।
चतुर्भुज मंदिर से राजमहल का शयन कक्ष
इस भवन की छतों में ज्यामितिय आकृतियों का निर्माण किया गया है। मुख्य मंडप विशाल है, इसमें  हजारों भक्त समा सकते हैं। इसकी छत के गुंबद के नीचे पद्मांकन है। छत मेहराबों पर बही हुई है। ओरछा के स्थापत्य में मेहराबों का उपयोग प्रमुखता के साथ किया गया है। 
चतुर्भुज मंदिर की भव्य इमारत
ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित होने के कारण यहाँ से राम राजा मंदिर, सावन भादो, राज महल आदि सभी कुछ दिखाई देता है। चतुर्भूज मंदिर की कुछ फ़ोटो लेकर हम रेस्ट हाऊस लौट आए। आज मुझे टीकमगढ़ जाना था, जहाँ मित्र मरावी साहब इंतजार कर रहे थे। 
चतुर्भुज मंदिर का गर्भ गृह
ओरछा से शाम की बस से मैं टीकमगढ के लिए चल पड़ा। झांसी से ओरछा होकर टीकमगढ के लिए बसें चलती हैं। ओरछा से टीकमगढ लगभग अस्सी किमी की दूरी पर है और बस का किराया भी अस्सी रुपए है। पहले तो कंडेक्टर ने मुझसे अस्सी रुपए ही लिए, फ़िर पता नहीं क्या सोचकर उसने दस रुपए लौटा दिए। अंधेरा होते तक मैं टीकमगढ पहुंच गया। 
टीकमगढ़ का सर्किट हाऊस
यहां मेरे लिए सर्किट हाऊस में मरावी साहब ने रुम बुक करवा रखा था। अस्पताल चौक पर बस रुकी, यहां से थोड़ी सी ही दूरी पर सर्किट हाऊस है। अपने रुम पहुंच कर बैग रखा और हाथ मुंह धोया तब तक मरावी साहब भी पहुंच गए थे। रात का भोजन उनके साथ किया। अगले दिन रविवार को मड़खेरा का सूर्य मंदिर देखने का कार्यक्रम था। जारी है आगे पढें… 

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

कंचन घाट ओरछा की छतरियाँ

आरम्भ से पढ़ें 
विरंची नारायण आज सुबह से ही आतंक फ़ैला रहे थे, आज ओरछा में दूसरा दिन था। अगर ओरछा वालों से पूछो कि यहाँ देखने के लिए क्या है? तो कहेंगे कि मंदिर के आगे और मंदिर के पीछे की सड़क पर ही सब कुछ है। यह वास्तविकता भी है, परन्तु यहाँ भ्रमण अध्ययन करने के लिए पुष्कल समय चाहिए। पर गर्मी के दिनों को छोड़ कर। वृंदावन लाल वर्मा जी ने ओरछा की बरसात का बढिया वर्णन किया है। अबकि बार ओरछा बरसात में ही देखना है। इस बरसात में तो टीकमगढ़ जिले में त्राहि-त्राहि मच गई थी। मुकेश जी समय से रेस्ट हाऊस पहुंच गए थे। आज का भ्रमण हमने छतरियों से प्रारंभ किया। 
बेतवा के कंचन घाट पर वीर सिंह की छतरी
बेतवा नदी के किनारे कंचन घाट पर बीर सिंह बुंदेला की छतरी है, यह छतरी तीन मंजिला है। बुदेंलों के इतिहास में वीर सिंह का कार्यकाल स्वर्णयुग कहलाता है। इनके कार्यकाल में ही जहाँगीर महल, नौबतखाना, फ़ूलबाग, लक्ष्मी नारायण मंदिर एवं हमाम जैसी भव्य इमारतों का निर्माण हुआ। यह छतरी तीन मंजिली है तथा बुंदेला स्थापत्य के आधार पर ही इसका निर्माण हुआ है। मेहराबों से छतों को सहारा देकर मध्यम में गुम्बद का  निर्माण किया गया है। पवित्र पावन बेतवा नदी इसके अधिष्ठान को छूते हुए बहती है। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
इसके साथ इन्हें छतरियों का समूह भी कहा जा सकता है। बेतवा के किनारे अन्य पन्द्रह छतरियां भी निर्मित हैं। यहाँ की अधिकांश छतरियां तीन मंजिली है, सूचना फ़लक पर मधुकर शाह, बीरसिंह देव, जसवंत सिंह, उद्वैत सिंह, पहाड़ सिंह आदि का नाम अंकित है। ये छतरियां पंचायतन शैली के मंदिरों जैसी बनी हुई हैं। चौकोर चबुतरे के मध्य में गर्भगृह एवं उसके चारों कोणों में खाली स्थान है, ऊपर जाकर यही अष्टकोणीय हो जाते हैं। इनमें गुंबद विशेष स्थान रखता है। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यहां मध्यप्रदेश पुरात्त्व विभाग के एक चौकीदार मिला। उसने बताया कि छतरियों के समूह में निर्मित बगीचे की देखरेख वह स्वयं के खर्चे से करता है। यहां बहुत सुंदर उद्यान जैसा निर्मित कर दिया गया है। जिससे छतरियों की रौनक बढ गई है। यहां किसी धारावाहिक के फ़िल्मांकन की जानकारी भी मिली। इन छतरियों के गुम्बदों पर जटायू प्रजाति के गिद्धों ने अपना बसेरा बना रखा है। यहां गिद्ध देखकर अच्छा लगा। विगत कई वर्षों से मैने गिद्ध नहीं देखे थे। इनको यहाँ का वातावरण पसंद आ गया है और बेतवा नदी किनारे पर होने के कारन भोजन पानी भी उपलब्ध है।
बेतवा के किनारे छतरी के गुम्बद पर जटायू गिद्ध राज
एक आंकड़े के अनुसार 1990 के दशक में इस जाति का 97% से 99% पतन हो गया। जिसके कारण आज भारतीय गिद्धों का प्रजनन बंदी हालत में किया जा रहा है। खुले में यह विलुप्ति की कग़ार में पहुँच गये हैं। शायद इनकी संख्या बढ़ जाये। गिद्ध दीर्घायु होते हैं लेकिन प्रजनन में बहुत समय लगाते हैं। गिद्ध प्रजनन में 5 वर्ष की अवस्था में आते हैं। एक बार में एक से दो अण्डे पैदा करते हैं लेकिन अगर समय ख़राब हो तो एक ही चूज़े को खिलाते हैं। यदि परभक्षी इनके अण्डे खा जाते हैं तो यह अगले साल तक प्रजनन नहीं करते हैं। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यही कारण है कि भारतीय गिद्ध अभी भी अपनी आबादी बढ़ा नहीं पा रहा है। पर्यावरण संतुलन के लिए गिद्धों का होना आवश्यक है और इनकी रक्षा होनी चाहिए, वरना यह भी डायनासोर की तरह विलुप्त प्रजाति की सूची में सम्मिलित हो जाएगें।ओरछा में अभयारण्य भी है, बेतवा नदी के दूसरे किनारे पर एक फ़ोटो पाईंट बना हुआ है। इस अभयारण्य में प्रवेश शुल्क लगता है। हमने इस स्थान पर पहुंच कर छतरियों के चित्र लिए। धूप अधिक होने के कारण फ़ोटोग्राफ़ी में आनंद नहीं आया। 
बेतवा के किनारे छतरी समूह
यहाँ से हम लाला हरदौल की समाधि पर गए।  छत्तीसगढ़ अंचल में हरदे लाला, हरदे बाबा के नाम से पूजित लोकदेवता के मूल स्थान से परिचित होऊं। ओरछा नरेश वीरसिंह देव बुंदेला के सबसे छोटे पुत्र हरदौल का जन्म सावन शुक्ल पूर्णिमा सम्बत 1665 दिनांक 27 जुलाई 1608 को दतिया में हुआ था। लाला हरदौल की ख्याति और उनके प्रभा मंडल का विस्तार भारत के कई राज्यों में हैं। जहाँ गाँव-गाँव में इनके चबूतरे स्थापित हैं और मान्यता है कि विपत्ति का निवारण इनके द्वारा होता है।
लाला हरदौल की समाधि
इतिहास में राज्य परिवारों में सत्ता के साथ षड़यंत्र भी चलते थे। इन षड़यंत्रों से हमेशा हानि ही हुई है। ऐसी ही एक कथा लाला हरदौल की है, जो उन्हें इतिहास में प्रसिद्ध कर लोक देवता के रुप में स्थापित करती है। इन्हीं में से एक है हरदौल की कहानी, जो जुझार सिंह (1627-34) के राज्य काल की है। दरअसल, मुगल जासूसों की साजिशभरी कथाओं के कारण् इस राजा का शक हो गया था कि उसकी रानी से उसके भाई हरदौल के साथ संबंध हैं। लिहाजा उसने रानी से हरदौल को ज़हर देने को कहा। रानी के ऐसा न कर पाने पर खुद को निर्दोष साबित करने के लिए हरदौल ने खुद ही जहर पी लिया और त्याग की नई मिसाल कायम की।
बेतवा के किनारे छतरी समूह
हरदौल अपनी बैठक से जहर सेवन कर घोड़े पर बैठकर निकल गए, थोड़ी देर बाद जहर ने असर किया, वे घोड़े से गिर गए और उनकी मृत्यू हो गई। जिस स्थान पर उनकी मृत्यू हुई वहाँ स्मारक बना हुआ है। एक गद्दी रखी हुई है, जिस पर घोड़े पर सवार हरदौल की प्रतिमा के साथ तलवारें रखी हैं। जब हम पहुंचे तो काफ़ी लोग यहाँ पर थे, वे उन्हें विवाह का निमंत्रण देने आए थे। मान्यता है कि लाला हरदौल को भात का निमंत्रण देने के बाद वे सब काज खुद ही संभाल लेते हैं। लोग इन्हें मांगलिक कार्यों का निमंत्रण देने आते हैं तथा विवाहोपरांत आशीर्वाद लेने (जोड़े की जात देने) भी जोड़े के साथ आते हैं। अब भोजन का समय हो रहा था, हम भोजन करने के लिए आ गए। जारी है… आगे पढें।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

ध्वनि प्रकाश इंद्रजाल संग ओरछा के इतिहास का सफ़र


आरम्भ से पढ़ें 
किसी भी पर्यटक स्थल पर ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम में किसी एक इमारत पर प्रकाश की व्यवस्था की जाती है और ध्वनि के माध्यम से वहां का इतिहास एवं जानकारी दी जाती है। ओरछा में राजमहल के प्रांगण में यह व्यवस्था की गई है। मध्यप्रदेश के पर्यटन विभाग द्वारा यहाँ कुर्सियां लगा कर तात्कालिक व्यवस्था की जाती है। लगभग सौ कुर्सियां लगाई गई थी। जिनमें आधी कुर्सियों पर वीआईपी लोगों के परिजनों का ही कब्जा था। नौ बजे के बाद ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।

रंग बिरंगे लट्टुओं की मद्धम रोशनी में अमिताब बच्चन ओरछा की कथा बताना शुरु करते हैं, प्रकाश एवं संगीत के बीच एक इंद्रजाल से बुना जाता है, कुर्सी पर मुंह फ़ाड़े लोग प्रकाश के करतब के साथ ऐतिहासिक गाथा में बहते चले जाते है। यह एक तरह का तिलस्म ही लगता है। ओरछा की गाथा पौराणिक काल से प्रारंभ होती है। वैदिक काल से लेकर मौर्यकाल तक बुंदेलखंड का पौराणिक काल माना जा सकता है। इस दौरान यह प्रसिद्ध राजाओं के अधिकार में रहा। विशेषकर चंद्रवंशी शासकों की लम्बी सूची मिलती है।

मौर्य वंश के तीसरे राजा अशोक ने बुंदेलखंड के अनेक स्थानों पर विहारों, मठों आदि का निर्माण कराया था । वर्तमान गुर्गी (गोलकी मठ) अशोक के समय का सबसे बड़ा विहार था। बुंदेलखंड के दक्षिणी भाग पर अशोक का शासन था जो उसके उज्जयिनी तथा विदिशा मे रहने से प्रमाणित है। परवर्ती मौर्यशासक दुर्बल थे और कई अनेक कारण थे जिनकी वजह से अपने राज्य की रक्षा करने मे समर्थ न रहै फलत: इस प्रदेश पर शुङ्ग वंश का कब्जा हुआ। इसके पश्चात वाकाटक एवं गुप्तों के शासन के बाद कलचुरियों का भी शासन रहा। त्रिपुरी के कल्चुरियों के शासन के पश्चात बुंदेलों का शासन प्रारंभ होता है। 

महोबा चन्देलों का केन्द्र था। हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद गहरवारों ने इस पर अधिकार कर लिया था। गहरवारों को पराजित करने वाले परिहार थे। स्मिथ और कीनधम ने इस जनश्रुति का समर्थन अपने ग्रंथों में किया है। केशवचन्द्र मिश्र का कथन है कि चन्द्रात्रेय से नन्नुक के राज्यकाल तक का (सन 740 से 831 तक) 10 वर्ष तक का समय चन्देलों के उदय का काल है। इस वंश के प्रमुख शासक मुनि चन्द्रात्रेय, नृपति भूभुजाम और नन्नुक हैं। धंग के खजुराहो शिलालेख से इसका प्रमाण मिलता है। इसी संदर्भ मे कोक्कल के लेख और ताम्रपत्रों से प्रभूत सामग्री मिलती है। 

चंदेलों के पश्चात बुंदेलों का शासन प्रारंभ हुआ। बुंदेल क्षत्रीय जाति के शासक थे तथा सुदूर अतीत में सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित माने जाते हैं। अक्ष्वाकु के बाद रामचन्द्र के पुत्र "लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है। इस तरह बुंदेलों के इतिहास का कारवां आगे बढता है। इसमें कहानियाँ, किंवदन्तियां और वास्तविकता के साथ कथा आगे बढती है। इनकी पीढी में एक राजा हेमकरण  हुआ, उसने देवी के समक्ष अपनी गर्दन पर जब तलवार रखी और स्वयं की बलि देनी चाही तो देवी ने उसे रोक दिया परंतु तलवार की धार से हेमकरन के रक्त की पांच बूंदें गिर गई थीं इन्हीं के कारण हेमकरन का नाम पंचम बुंदेला पड़ा था। 

ओरछा दरबार के पत्र में अभी भी पूर्ववर्ती विरुद्ध के प्रमाण मिलते हैं जैसे - श्री सूर्यकुलावतन्स काशीश्वरपंचम ग्रहनिवार विन्ध्यलखण्डमण्लाहीश्वर श्री महाराजाधिराज ओरछा नरेश। चूंकि हेमकरन को विन्ध्यवासिनी देवी का वरदान रविवार को मिला था, ओरछा में आज भी पवरात्र महोत्सव में इस दिन नगाड़े बनाये जाते हैं। मिर्जापुर स्थित गौरा भी हेमकरन के बाद गहरवारपुरा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके बाद का चक्र बड़ी तेजी से घूमा और वीरभद्र ने गदौरिया राजपूतों मे अँटेर छीन लिया और महोनी को अपनी राजधानी बनाया। 

नए राजा राजपाट संभालते हैं, पुराने इतिहास में दर्ज होते जाते हैं। रुद्रप्रताप के साथ ओरछा के शासकों का युगारंभ होता है। ओरछा की स्थापना मन 1530 में हुई थी। रुद्रप्रताप बड़ नीतिज्ञ था, ग्वालियर के तोमर नरेशों से उसने मैत्री संधी की। उसके मृत्यु के बाद भारतीचन्द्र (1531 ई०-1544 ई०) गद्दी पर बैठा। हुमायूँ को जब शेरशाह ने पदच्युत करके सिंहासन हथियाया था तब उसने बुंदेलखंड के जतारा स्थान पर दुर्ग बनवा कर हिन्दु राजाओं को दमित करने के निमित्त अपने पुत्र सलीमशाह को रखा। कलिं का किला कीर्तिसिंह चन्देल के अधिकार में था। शेरशाह ने इस पर किया तो भारतीचन्द ने कीर्तिसिंह की सहायता ली। शेरशाह युद्ध में मारा गया और उसके पुत्र सलीमशाह को दिल्ली जाना पड़ा।

भारतीचन्द के उपरांत मधुकरशाह (1554 ई०-1592 ई०) गद्दी पर बैठा। इसके बाद समय में स्वतंत्र ओरछा राज्य की स्थापना हुई। अकबर के बुलाने पर जब वे दरबार में नही पहुँचा तो सादिख खाँ को ओरछा पर चढ़ाई करने भेजा गया। युद्ध में मधुकरशाह हार गए। मधुकरशाह के आठ पुत्र थे, उनमें सबसे ज्येष्ठ रामशाह के द्वारा बादशाह से क्षमा याचना करने पर उन्हें ओरछा का शासक बनाया गया। राज्य का प्रबन्ध उनके छोटे भाई इन्द्रजीक किया करते थे। केशवदास नामक प्रसिद्ध कवि इन्हीं के दरबार में थे।  इन्द्रजीत का भाई वीरसिंह देव (जिसे मुसलमान लेखकों ने नाहरसिंह लिखा है) सदैव मुसलमानों का विरोध किया करता था) उसे कई बार दबाने की चेष्टा की गई पर असफर ही रही। अबुलफज़ल को मारने में वीरसिंहदेव ने सलीम का पूरा सहयोग किया था, इसलिए वह सलीम के शासक बनते ही बुंदेलखंड का महत्वपूर्ण शासक बना। जहाँगीर ने इसकी चर्चा अपनी डायरी में की है।

वीरसिंह देव (1605 ई० - 1627 ई०) के शासनकाल में ओरछा में जहाँगीर महल तथा अन्य महत्वपूर्ण मंदिर बने थे। जुझारसिंह ज्येष्ठ पुत्र थे, उन्हें गद्दी दी गई और शेष 11भाइयों को जागीरें दी गई। सन् 1633 ई० में जुझारसिंह ने गोड़ राजा प्रेमशाह पर आक्रमण करके चौरागढ़ जीता परंतु शाहजहाँ नें प्रत्याक्रमण किया और ओरछा खो बैठे। उन्हें दक्षिण की ओर भागना पड़ा। उनके कुमारों को मुसलमान बनाया गया तथा वे कहीं पर दक्षिण में ही मारे गये। वीरसिंह के बाद ओरछा के शासकों में देवीसिंह और पहाड़सिहं का नाम लिया जाता है परंतु ये अधिक समय तक राज न कर सके। 

इसके बाद चम्पतराय से चलकर इतिहास छत्रसाल तक पहुंचता है। छत्रसाल मुगलों से स्वतंत्र राज करना चाहता था। औरंगज़ेब ने इन्हें भी दबाने की कोशिश की पर सफल न हुए। छत्रसाल स्वयं कवि थे। छत्तरपुर इन्हीं ने बसाया था। कलाप्रेमी और भक्त के रुप में भी इनकी ख्याती थी। धुवेला-महल इनकी भवन निर्माण-कला की स्मृति दिलाता है। बुंदेलखंड की शीर्ष उन्नति इन्हीं के काल में हुई। छत्रसाल की मृत्यु के बाद बुंदेलखंड राज्य भागों में बँट गया। एक भाग हिरदेशाह, दूसरा जगतराय और तीसरा पेशवा को मिला। छत्रसाल की मृत्यु  13 मई सन् 1731 में हुई थी।

इस बीच जुझार सिंह के भाई लाला हरदौल की करुण कथा भी सुनाई जाती है। जिसमें जुझार सिंह रानी के संबंध छोटे भाई से होने की शंका पाल कर रानी द्वारा उसे जहर देने का आदेश देता है। हरदौल भाभी की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए जहर सेवन कर लेता है और उसकी मृत्यू हो जाती है। राजा इंद्रजीत के काल में राज नर्तकी एवं कवियत्री राय प्रवीण का उनसे प्रेम एवं अकबर द्वारा राय प्रवीण को अपने दरबार में भेजने की कथा सुनाई जाती है। राय प्रवीण अपने बौद्धिक बल से कबित्त पढ जुगत लगाकर अकबर को चकमा देकर ओरछा लौट आती है। इस तरह ओरछा की कथा सुनाकर प्रकाश एवं ध्वनि  प्रदर्शन का समापन हो जाता है। जारी है आगे पढें……

शनिवार, 6 अगस्त 2016

ओरछा का चित्रित लक्ष्मी नारायण मंदिर

आरम्भ से पढ़ें 
ओरछा भ्रमण करते हुए हम लक्ष्मीनारायण मंदिर की ओर जा रहे थे तभी रास्ते में केशव भवन दिखाई दिया, तुरंत ही दिमाग ने रसिक कवि केशव दास की फ़ाईल खोल दी। ये वही केशव दास है जिन्हें कुंए पनिहारिनों ने बाबा कह दिया था उन्होंने एक दोहा रचा -केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं। चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं।।  केशव दास मुख्यत: शृंगार एवं वीर रस के कवि थे। उनका केशवदास का जन्म 1546 ईस्वी में ओरछा में हुआ था। वे सनाढय ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम पं काशीनाथ था। ओरछा के राजदरबार में उनके परिवार का बड़ा मान था। 
कवि केशव दास का घर
केशवदास स्वयं ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह के दरबारी कवि, मंत्री और गुरु थे। इंद्रजीत सिंह की ओर से इन्हें इक्कीस गांव मिले हुए थे। केशवदास संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। उनके कुल में भी संस्कृत का ही प्रचार था। नौकर-चाकर भी संस्कृत बोलते थे।  संवत 1608 के लगभग जहांगीर ने ओरछा का राज्य वीर सिंह देव को दे दिया। केशव कुछ समय तक वीर सिंह के दरबार में रहे, फिर गंगातट पर चले गए और वहीं रहने लगे। 1618 ईस्वी में उनका देहावसान हुआ।
लक्ष्मीनारायण मंदिर
जब हम लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुंचे तो यहाँ सिर्फ़ एक चौकीदार के अलावा कोई नहीं था। इस मंदिर का शिल्प अद्भुत है, सामने से त्रिकोणात्मक दिखाई देता है, पर है चौकोर। यह ओरछा की एक भव्य इमारत है, इसका निर्माण ओरछा के बुंदेल राजा बीरसिंह कराया था। यह महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्मारक है, इसका निर्माणं 1622 ई. में हुआ था। इस मंदिर का वास्तु शिल्प इस तरह का है कि यह उड़ान भरते हुए गरुड़ सा दिखाई देता है, मुख्य द्वार गरुड़ मुख है, यह मंदिर ओरछा गांव के पश्चिम में एक पहाड़ी पर बना है। 
चित्रित गलियारा
इस मंदिर में दोनो हिन्दू एवं इस्लामिक वास्तु कला का प्रयोग हुआ है, मेहराबदार छतें एवं गर्भ गृह का गुंबद गोल है। इस मंदिर में सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के भित्ती चित्र बने हुए हैं। भित्ती एवं छतों पर बने चित्रों के चटकीले प्राकृतिक रंग इतने जीवंत लगते हैं जसे वह हाल ही में बने हों। भित्ति चित्रों में राजमहल, अंग्रेजों के साथ झांसी की लड़ाई, रामायण के प्रसंग, कृष्ण लीला, आखेट इत्यादि को प्रमुख स्थान दिया गया है। इस तरह यह मंदिर तत्कालीन वास्तु शिल्प एवं चित्र कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। 
अंग्रेज सैनिकों का चित्रण
मंदिर के गर्भगृह का शिखर पर शत कमल दल निर्मित है। जैसे कमल की पंखुड़ियाँ अभी ही खिली हों। इस मीनार रुपी गर्भगृह की भित्तियों पर गवाक्ष एवं झरोखे बने हुए हैं। भवन की प्रथम मंजिल पर यह चार मंजिलों का है। जो मंदिर को भव्यता प्रदान करता है। गर्भगृह में प्राचीन प्रतिमा नहीं है, उसके स्थान पर छोटी सी अन्य कोई प्रतिमा रखी हुई है। इस मंदिर में पूजा नहीं होती। गर्भ गृह के मुख्य द्वार के समीप लकड़ी का एक झूला रखा हुआ है।  बीरसिंह के उत्तराधिकारी पृथ्वी सिंह ने सन् 1793 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। 
शतकमल दल शिखर
लक्ष्मीनारायण मंदिर एक टीले पर बना हुआ है, इसका शिल्प देखकर ही लगता है इसकी भव्यता का पता चलता है। छद्म गवाक्षों एवं गवाक्षों में की गई फ़ुलकारी अद्भुत है। यह इमारत भी इस्लामिक एवं हिन्दु वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के सारे गलियारों की भित्तियों एवं छतों पर की गई पौराणिक आख्यानों की चित्रकारी निर्माण करता की सनातन धर्म में गहन आस्था प्रदर्शित करती है। इन चित्रों में अंग्रेजों की सेना के साथ युद्ध को प्रदर्शित किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात मंदिर में चित्रकारी की गई है।
गर्भ गृह
लक्ष्मीनारायण मंदिर का अवलोकन करने के पश्चात हम रेस्ट हाऊस लौट आए। थोड़ी दे विश्राम करने के बाद मुकेश पाण्डेय जी ने कहा कि आपको एक बढिया स्थान की सैर करवा के लाता हूँ, जो आपको बहुत पसंद आएगी। सैर के नाम पर तो हम हमेशा तैयार रहते हैं। अब वाहनारुढ होकर हम झांसी खजुराहो मार्ग पर चल दिए। मुकेश पान्डेय जी मेरा घुमक्कड़ी का स्वाद जानते हैं, इसलिए विश्वास था कि वे किसी अच्छे ही स्थान पर लेकर जाएंगे। जारी है आगे पढें…

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

ओरछा का जहाँगीर महल

जहाँगीर महल का निर्माण बुंदेला राजाओं एवं मुगलों की दोस्ती का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि बादशाह अकबर ने अबुल फज़ल को शहजादे सलीम (जहांगीर) को काबू करने के लिए भेजा था, लेकिन सलीम ने बीर सिंह की मदद से उसका कत्ल करवा दिया। इससे खुश होकर सलीम ने ओरछा की कमान बीर सिंह को सौंप दी थी।
जहाँगीर महल का प्रवेश द्वार हाथी दरवाजा
जब जहाँगीर गद्दी पर बैठा तो उसके ओरछा आगमन को लेकर इस महल का निर्माण कराया गया। यह महल मुगल एवं हिन्दु शैली के मिश्रित वास्तु की पहचान है। परन्तु जहाँगीर के आगमन को लेकर इस महल का निर्माण संदेह के दायरे में हैं। क्योंकि इसके निर्माण में कई बरस लग गए होंगे। शायद यह महल पूर्व से तैयार होगा और यहाँ जहाँगीर को ठहराने के बाद इसका नामकरण जहाँगीह महल हो गया होगा।
जहांगीर महल का पंच कुंडीय आँगन
वैसे, ये महल बुंदेलाओं की वास्तुशिल्प के प्रमाण हैं। खुले गलियारे, पत्थरों वाली जाली का काम, जानवरों की मूर्तियां, बेलबूटे जैसी तमाम बुंदेला वास्तुशिल्प की विशेषताएं यहां साफ देखी जा सकती हैं। हमने कुछ फ़ोटो गलियारे से भी लिए। महल के निर्माण में चूना सूर्खी का प्रयोग हुआ है। 
जहांगीर महल की भित्तियों में चित्रांकन
जहाँगीर महल ओरछा के कक्षों में जड़ी हुई पाषाण की चौखेंटों (प्रस्तर द्वारशाखाओं) का अलंकरण खूबसूरत है। सिरदल में अर्ध पद्म के साथ पक्षियों का अंकन किया गया है। चौखट के किवाड़ों ;में आयताकार अलंकरण त्रिआयामी दिखाई देता है। तत्कालीन शिल्पकारों की मेहनत एवं कुशलता उनके कार्य में परिलक्षित होती है।
जहाँगीर महल से राम राजा दरबार का दृश्य
चूना मिलाने का यंत्र यहां देखा जा सकता है तथा इसका उपयोग वर्तमान में भी संरक्षण कार्य के लिए प्रतीत होता है। बेतवा (वेत्रवती) नदी के तट पर बसे हुए ओरछा की सुरक्षा पंक्ति त्रिस्तरीय है, इसके अतिरिक्त बेतवा नदी  भी एक बड़ी प्राकृतिक सुरक्षा प्राचीर का कार्य करती है।
जहाँगीर महल का भीतरी दृश्य
विडम्बना है कि बेतवा नदी की गोद में बुंदेला राजाओं ने जन्म लिया और उसी की गोद में चिर निदा में लीन हो गए। जहाँगीर महल में 136 कक्ष हैं, मध्य में बड़ा आंगन है, जिसमें पंच भूतों के प्रतीक पाँच कुंड बने हुए हैं, इसके साथ ही महल के द्वार पर दो प्रस्तर हस्ति बने हुए हैं, एक की सूंड़ में जंजीर है और दूसरे की सूंड़ में फ़ूल।
जहांगीर महल का गज शिल्प
इसके लिए कहा जाता  है कि बुंदेलों से दोस्ती करोगे तो फ़ूलों जैसे रहोगे और दुश्मनी करोगे तो कैद मिलेगी। महल के समक्ष ऊंट खाना बना हुआ है। इसके समीप ही हौद जैसी संरचना बनी हुई है, मुझे तो लगता है यह लोहा गलाने की भट्टी होगी, जिसमें राजकीय हथियार बनाने के लिए लोहा गलाया जाता रहा होगा।
राज महल होटल का भीतरी दृश्य
जहांगीर महल भ्रमण के बाद हम भोजन करने के लिए राजमहल होटल आ गए। यह एक सितारा होटल रिसोर्ट है तथा इसका डायनिंग हॉल भी बहुत बड़ा है। गरमी के समय ठंडा दही भोजन के लिए उपयुक्त रहता है। वैसे भी मुझे सितारा होटलों का भोजन जमता नहीं है, क्योंकि सब्जियों में अत्यधिक ग्रेवी रहती है। सब्जियां तो घर की ही पसंद आती हैं। जारी है........आगे पढ़ें.......  

बुधवार, 3 अगस्त 2016

ओरछा के राम राजा सरकार

ट्रेन एक घंटा विलंब से झांसी पहुंची। मुकेश जी रास्ते में थे, तब तक हमने स्टेशन के बाहर लगी त्रिमूतियों (राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, वृंदावन लाल वर्मा) के साथ एक सेल्फ़ी ली। तब तक मुकेश जी पहुंच गए। ओरछा में रेस्ट हाऊस बुक था, परन्तु इसका एसी खराब था। एसी का पंखा हवा फ़ेंकता था पर ठंडा नहीं कर रहा था। इस भीषण गर्मी से निजात पाने के लिए हमने खाट बाहर ही डाल ली। हल्की सी बरसात से मौसम सुहाना हो गया था। एक भरपूर नींद ली।
झांसी रेल्वे स्टेशन पर मैथली शरण गुप्त, वृंदावन लाल वर्मा एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्रतिमाएँ
आज 26 मई 2015 को ओरछा की सुबह बदलियाना थी, उठकर स्नानादि से निवृत होने के बाद टहलने लगा तो डाक बंगले के इर्द गिर्द चिडियों ने आकर्षित किया। कैमरा निकाल कर उनके पीछे फ़ोटो के लिए चल पड़ा। कुछ देर चिड़ियों की फ़ोटोग्राफ़ी तब तक पटवारी महोदय भी पहुंच गए। तहसीलदार साहब ने पटवारी की ड्यूटी लगाई थी, हमारे राम राजा सरकारे के दर्शनों के लिए। तब तक मुकेश जी भी पहुंच गए। हम राम राजा दरबार पहुंचे तो धूप निकल आई थी और आरती चल रही थी। आरती के बाद हमने दर्शन किए तथा स्थल का एक चक्कर लगाया। यहाँ मंदिर में कुछ प्राचीन प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जो अन्य किसी स्थान से लाई गई हैं। अब वे विस्मृत हो गई, राम राजा दरबार में फ़ोटो खींचने की मनाही है। 
ओरछा डाक बंगले की सुबह मुकेश पान्डेय जी के साथ
राम राजा की कहानी भी रोचक है। कहा जाता है कि संवत 1600 में तत्कालीन बुंदेला शासक महाराजा मधुकर शाह की पत्नी महारानी कुअंरि गणेश राजा राम को अयोध्या से ओरछा लाई थीं।  एक दिन ओरछा नरेश मधुकरशाह ने अपनी पत्नी गणेशकुंवरि से कृष्ण उपासना के इरादे से वृंदावन चलने को कहा। लेकिन रानी तो राम की भक्त थीं। उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया। गुस्से में आकर राजा ने उनसे यह कहा कि तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर अपने राम को ओरछा ले आओ। रानी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनाकर साधना आरंभ की। 
ओरछा नगर का प्रवेश द्वार
इन्हीं दिनों संत शिरोमणि तुलसीदास भी अयोध्या में साधना रत थे। संत से आशीर्वाद पाकर रानी की आराधना और दृढ़ होती गई। लेकिन रानी को कई महीनों तक राजा राम के दर्शन नहीं हुए। वह निराश होकर अपने प्राण त्यागने सरयू की मझधार में कूद पड़ी। यहीं जल की अतल गहराइयों में उन्हें राजा राम के दर्शन हुए। रानी ने उनसे ओरछा चलने का आग्रह किया। उस समय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने शर्त रखी थी कि वे ओरछा तभी जाएंगे, जब इलाके में उन्हीं की सत्ता रहे और राजशाही पूरी तरह से खत्म हो जाए। तब महाराजा शाह ने ओरछा में ‘रामराज' की स्थापना की थी, जो आज भी कायम है।
राम राजा दरबार में मुकेश पान्डेय चंदन, ललित शर्मा एवं पटवारी जी
कहते हैं कि राजा ने चतुर्भुज मंदिर बनवाया, इसमें भगवान राम की स्थापना होनी थी। परन्तु स्थापना के वक्त प्रतिमा अपने स्थान से हिली नहीं। इसे चमत्कार मान कर महल के उस हिस्से को मंदिर का रुप दे दिया गया और यह राम राजा मंदिर कहलाने लगा। भगवान राम को यहाँ का राजा माना जाता है, मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है। रानी के दिए वचनों के कारण यहाँ राम राजा की सत्ता स्थापित हुई जो आज पर्यंत चल रही है। मान्यता है कि यहां राजा राम हर रोज अयोध्या से अदृश्य रूप में आते हैं। 

शीश महल रेस्टोरेंट पर्यटन विभाग
यहाँ राम राजा को सूर्योदय के पूर्व एवं सूर्यास्त के बाद सलामी दी जाती है, इस सलामी के लिए मध्यप्रदेश पुलिस के जवान तैनात हैं। क्योंकि देश में राजा राम चंद्र का यह एक ऐसा मंदिर है जहां राम की पूजा भगवान के तौर पर नहीं बल्कि राजा के रूप में की जाती है। चुंकि यहां के राजा राम हैं इसलिए मंदिर खुलने और बंद होने का समय भी तय है। सुबह में मंदिर आठ बजे से साढ़े दस बजे तक आम लोगों के दर्शन के लिए खुलता है। इसके बाद शाम को मंदिर आठ बजे दुबारा खुलता है। रात को साढ़े दस बजे राजा शयन के लिए चले जाते हैं। मंदिर में प्रातःकालीन और सांयकालीन आरती होती है जिसे आप देख सकते हैं। देश में अयोध्या के कनक मंदिर के बाद ये राम का दूसरा भव्य मंदिर है। 
रेस्टोरेंट का डायनिंग हॉल
राम राजा के दर्शनोपरांत हम शीश महल की  ओर पहुंचे, यह मध्यप्रदेश पर्यटन के अधीन है। यहाँ रेस्टोरेंट के साथ ठहने के लिए किंग एवं क्वीन सुईट भी हैं। हमने यहाँ पराठे एवं दही का नाश्ता किया। इसके बाद किंग एवं क्विन सुईट का नजारा देखा। इन दोनों सुईट के बीच एक आँगन हैं। साज सज्जा भी महल के इंटिरियर से मिलती जुलती है। परन्तु सुइट के हालात देख कर तो लगता नहीं कि कोई हजारों रुपया खर्च यहाँ रात गुजारने आता होगा। सरकारी काम सरकारी जैसा ही होता है। काम न धाम पर महीनें तनखा पक्की है तो कौन ध्यान देता है, रख रखाव पर। यहाँ से हम जहाँगीर महल देखने के लिए पहुचें। जारी है आगे पढें…