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शनिवार, 28 नवंबर 2015

नवकलेवर पूजन एवं दारु खोजन उत्सव - कलिंग यात्रा

मंदिर के बाहर निकलते ही भगवा कपड़ों में वाद्य यंत्र धारण किए गाते बजाते भक्त दिखाई दिए, इनके साथ ही मंदिर के मुख्य पुजारी एवं उनके सहयोग नवीन वस्त्र धारण कर मंदिर परिसर की ओर जुलूस की शक्ल में बढ रहे थे। पूछने पर पता चला कि आज नवकलेवर का उत्सव है,  संयोगवश हम भी इस त्यौहार के साक्षी बन गए। नवकलेवर भगवान की काष्ठ प्रतिमाएं बदलने के उत्सव को कहते हैं। जिस वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार दो आषाढ होते हैं उस वर्ष भगवान की पुरानी प्रतिमाएं बदल कर स्थापित की जाती हैं।

दारू खोज मुहूर्त के लिए जाते हुए दैतापति
इन प्रतिमाओं को बदलने का भी बड़ा कठिन विधि विधान है। हमारे पण्डा जी पुर्णचंद महापात्र ने बताया कि प्रतिमाओं के लिए ऐसे  ही किसी वृक्ष को काटकर नहीं बना दी जाती। इसके लिए विशेष प्रकार की"दारु" (नीम की लकड़ी) का चयन किया जाता है। यह चयन प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही होता है। इस काम में कई पंडित या दैतापति लगते हैं। शास्त्रों के अनुसार, पेड़ के लिए सबसे पहले मुख्य पंडित को सपना आता है, उसके बाद दसियों पंडित उस पेड़ की तलाश में निकलते हैं। प्रतिमा निर्माण के लिए वृक्ष पुराना हो, नदी या तालाब के किनारे हो, शंख, चक्र, गदा, पद्म के चिन्ह हों, पेड़ का कोई हिस्सा टूटा न हो, उसमें कोई कील नहीं ठोकी गई हो, किसी पशु का पंजा न लगा हो तथा पेड़ पर कोई घोंसला न हो। 
कृष्णा किर्तन करते हुए भगत
मुख्य दैतापति को सपना आने के बाद वह वृक्ष के स्थान की ओर संकेत करता है। फ़िर 10 पुजारियों का दल चारों दिशाओं में उस स्थान एवं वृक्ष की खोज करते हैं। इस खोज की समयावधि 45 दिन निश्चित है, इस अवधि में ही "दारु" की खोज अवश्य ही होनी चाहिए। पेड़ को काटने के पहले सारे पंडित दो दिन तक अन्न जल नहीं लेते एवं शास्त्रों के बताए मंगल चिन्ह एवं शर्तें पूर्ण होने पर उस वृक्ष को पूजा करके विधि विधान से प्रतिमाओं के लिए काटा जाता है। यह प्रक्रिया गोपनीय रुप से आधी रात को सम्पन्न की जाती है। उसके पश्चात लकड़ी की प्रतिमाएं बनाई जाती है और स्थापित की जाती है। 
हरे राम हरे कृष्ण, कृष्ण हरे हरे
पण्डा जी ने बताया कि - नव कलेवर का समय 12 या 19 वर्षों में एक बार आता है। हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं में चारों धामों को एक युग का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार कलियुग का पवित्र धाम जगन्नाथपुरी माना गया है। यह भारत के पूर्व में उड़ीसा राज्य में स्थित है, जिसका पुरातन नाम पुरुषोत्तम पुरी, नीलांचल, शंख और श्रीक्षेत्र भी है। उड़ीसा या उत्कल क्षेत्र के प्रमुख देव भगवान जगन्नाथ हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और श्रीकृष्ण का युगल स्वरूप है। श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के ही अंश स्वरूप हैं। इसलिए भगवान जगन्नाथ को ही पूर्ण ईश्वर माना गया है।
दैतापति दल लवाजमा के साथ मंदिर की ओर
वैसे तो रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरंभ होती है। परन्तु इस वर्ष नवकलेवर होने के कारण अधिक आकर्षण रहेगा।  यह यात्रा मुख्य मंदिर से शुरू होकर 2 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है।जहां भगवान जगन्नाथ सात दिन तक विश्राम करते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है, जो मुख्य मंदिर पहुंचती है। यह बहुड़ा यात्रा कहलाती है। जगन्नाथ रथयात्रा एक महोत्सव और पर्व के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रथयात्रा के मात्र रथ के शिखर दर्शन से ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। स्कन्दपुराण में वर्णन है कि आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य फल प्राप्त होता है और भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती है।
दम लगा कर है जोर
रथयात्रा के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा- तीनों के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। ये लकड़ी वजन  में भी अन्य लकडिय़ों की तुलना में हल्की होती है और इसे आसानी से खींचा जा सकता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है और यह अन्य रथों से आकार में बड़ा भी होता है। यह रथ यात्रा में बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ के कई नाम हैं जैसे- गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष आदि। इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। 
रथयात्रा मार्ग से आता हुआ दल
भगवान जगन्नाथ के रथ पर हनुमानजी और नरसिंह भगवान का प्रतीक होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ पर सुदर्शन स्तंभ भी होता है। यह स्तंभ रथ की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ हैं। रथ की ध्वजा यानि झंडा त्रिलोक्यवाहिनी कहलाता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ नाम से जानी जाती है। इसके 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। इसमें लगभग 1100 मीटर कपड़ा रथ को ढंकने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
उत्सव में सम्मिलित 
बलरामजी के रथ का नाम तालध्वज है। इनके रथ पर महादेवजी का प्रतीक होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। यह 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। सुभद्राजी के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक मढ़ा जाता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथ का ध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।
बिकाश बाबू की मौज
भगवान जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा के रथों पर जो घोड़ों की कृतियां मढ़ी जाती हैं, उसमें भी अंतर होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ पर मढ़े घोड़ों का रंग सफेद, सुभद्राजी के रथ पर कॉफी कलर का, जबकि बलरामजी के रथ पर मढ़े गए घोड़ों का रंग नीला होता है। रथयात्रा में तीनों रथों के शिखरों के रंग भी अलग-अलग होते हैं। बलरामजी के रथ का शिखर लाल-पीला, सुभद्राजी के रथ का शिखर लाल और ग्रे रंग का, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ के शिखर का रंग लाल और हरा होता है। पण्डा जी की बातें हमने मोबाईल फ़ोन में सुरक्षित कर ली।
लाईव टेलीकास्ट
जब इस महत्वपूर्ण पर्व पर हम पुरी में उपस्थित थे तो सोचा कि उसकी फ़ोटोग्राफ़ी भी अच्छे से होनी चाहिए। मीडिया वालों का लाईव प्रसारण चल रहा था। हम कोई तीन चार मंजिल का भवन ढूंढ रहे थे जिसकी छत से चित्र लिए जा सकें। तभी एक भवन की छत पर छतरी लगाई कुछ कैमरामेन दिखाई दिए तो हम वहीं पहुंच गए और उस भवन से लगातार कुछ अच्छे चित्र लिए। छत पर काफ़ी समय व्यतीत किया। उसके बाद नीचे आकर वाद्यको समेंत सभी के खूब चित्र लिए। बिकास बाबू ने वाद्यों की धुन पर खूब नृत्य किया और थोड़ा बहुत मजा हमने भी लिया। इस तरह हमारी हमने भगवान जगन्नाथ के दर्शन लाभ प्राप्त किए।

रिक्शे पर सवार राजा और राणा
सूर्य देवता अस्ताचल की ओर जा रहे थे, हम मंदिर से निकल कर रिक्शे में सवार होकर समुद्र तट पर पहुंच गए। शाम की समय यहां की रौनक ही अलग होती है। पुरी होटल से चलते हुए स्वर्गद्वार के आगे तक हमने पैदल भ्रमण किया। फ़िर चना चबेना लेकर समुद्र के किनारे एक स्थान पर आसन जमा कर बैठ गए। ठंडी हवा में आंखे बंद कर समुद्र की गर्जना सुनने का अलौकिक आनंद आया। यह आनंद गुंगे के गुड़ जैसा है। छेना मिठाई बेचने वाला भी वहीं आ गया। बिकास बाबू ने सभी प्रकार की मिठाईयों का आनंद लिया क्योंकि जब हम समुद्र की गर्जना सुनने का आनंद ले रहे हैं तो वे मिष्टी आनंदाधिकारी है। दस बजे तक हमने समुद्र के किनारे वक्त गुजार दिया। उसके बाद एक होटल से भोजन कर अगली सुबह चिल्का झील भ्रमण की तैयारी करते हुए झपक लिए। जारी है, आगे पढें।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

जगन्नाथ दर्शन - कलिंग यात्रा

आज हमें भगवान जगन्नाथ का प्रसाद ग्रहण करना था। यहाँ प्रतिदिन भगवान को छप्पन भोग लगते हैं और वही प्रसाद के रुप में अन्न सत्र में कुछ दक्षिणा देने के बाद प्राप्त हो जाता है। कहते हैं "जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ।" हम होटल से पैदल ही मंदिर तक चल पड़े। थोड़ी देर चलने के बाद एक गली से जगन्नाथ मंदिर के शीर्ष पर स्थापित चक्र एवं ध्वज दिखाई देने लगा। जगन्नाथ मंदिर के पंडे जगत प्रसिद्ध हैं, मंदिर के सामने आते ही एक पण्डा महाराज हमारे सामने आ गए। बिकाश बाबू ने ही उनसे बात की और वे हमें दर्शन कराने के लिए तैयार हो गए। मंदिर के बाहर ही मोबाईल एवं चप्पल जूता स्टैण्ड बना  हुआ है, नगद देकर भी वे रखवाली करते हैं और नि:शुल्क भी है। हमने मोबाईल एवं सैंडिल जमा करवाए और पंडा महाराज हमें मंदिर के भीतर ले गए।
मंदिर के सामने की गली 
आज नवकलेवर उत्सव का प्रारंभ था। इसलिए मंदिर में अपार भीड़ थी। पण्डा जी हमें बाईं तरफ़ वाले द्वार से भीतर ले गए। वहां पुलिस की चौकस व्यवस्था थी। मंदिर का पट खुलने में अभी देर थी। जैसे ही पट खुला भीड़ पेलते ढपेलते भीतर जाने को उद्धत हो गई। हम भी भीड़ के साथ पहुंचे। सामने भगवान जगन्नाथ के साथ सुभद्रा एवं बदभद्र दिखाई दिए। धक्का मुक्की  में दर्शन हो गए। मुफ़्त दर्शनों के साथ यहाँ वी आई पी दर्शन की सुविधा है। जो 300 रुपए प्रति टिकिट में कराई जाती है। टिकिट दर्शनार्थियों को न देकर पण्डों को दी जाती है और वे उसकी मनमानी कीमत भी वसूलते हैं, इससे उनकी अतिरिक्त कमाई हो जाती है। हम तो मुफ़्त के दर्शनार्थी थी इसलिए दूर से ही दर्शन करके तृप्त हो गए।
पंडा पूरणचंद्र महापात्रा 
द्वार से बाहर निकलने पर सामने ही ब्रह्मा गादी है, जहाँ पण्डा जी लोग विश्रामासन में दिखाई देते हैं। ब्रम्हागादी से हम मंदिर के परिक्रमापथ की ओर चल पड़े। यहाँ पर छोटे छोटे अन्य देवों के मंदिर भी हैं। हमारे पण्डा पुरणचंद्र महापात्र जी हमें प्रसाद वाली जगह पर ले गए जहाँ सूखा प्रसाद ढाई सौ रुपए से लेकर हजारों रुपए तक मिलता है। हमने घर ले जाने के लिए न्यूनतम ढाई सौ रुपए का प्रसाद लिया। यहीं दान के चंदे की रसीदी काटी जाती हैं। यहां से आगे बढने पर अन्न सत्र प्रारंभ होता है। जहां पत्तल और मिट्टी के कुल्हड़ों में भोजन प्रसाद दिया जाता है। भगवान को भोग लगने के बाद यहीं पर पण्डा लोग प्रसाद का वितरण मय दक्षिणा अपने कोटे के हिसाब से करते हैं।
भगवन जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र 
जगन्नाथ मंदिर का एक बड़ा आकर्षण यहां की रसोई है. यह रसोई विश्व की सबसे बड़ी रसोई के रूप में जानी जाती है. इस विशाल रसोई में भगवान को चढ़ाने वाले महाप्रसाद तैयार होता है जिसके लिए लगभग 500 रसोइए और उनके 300 सहयोगी काम करते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस रसोई में जो भी भोग बनाया जाता है, उसका निर्माण माता लक्ष्मी की देखरेख में ही होता है. भोग निर्माण के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है.यहां बनाया जाने वाला हर पकवान हिंदू धर्म पुस्तकों के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही बनाया जाता है। भोग पूर्णत: शाकाहारी होता है। भोग में किसी भी रूप में प्याज व लहसुन का भी प्रयोग नहीं किया जाता। भोग निर्माण के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है।
मंदिर द्वार पर दर्शनार्थी 
रसोई के पास ही दो कुएं हैं जिन्हें गंगा व यमुना कहा जाता है। केवल इनसे निकले पानी से ही भोग का निर्माण किया जाता है। इस रसोई में 56 प्रकार के भोगों का निर्माण किया जाता है। रसोई में पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं। कहते हैं कि मंदिर में भोग पकाने के लिए 7 मिट्टी के बर्तन एक दूसरे पर रखे जाते हैं और लकड़ी पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर रखे बर्तन की भोग सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकते जाती  है। परन्तु इस प्रक्रिया को किसी को दिखाया नहीं जाता।
मंदिर की ध्वजा एवं चक्र 
जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतया प्रसाद ही कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला। कहते हैं कि महाप्रभु वल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुँचने पर मंदिर में ही किसी ने उन्हें प्रसाद दे दिया। महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया और उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव प्राप्त हुआ। इसी महाप्रसाद से छत्तीसगढ़ अंचल में स्थाई मित्रता का संकल्प लेकर "महाप्रसाद" बदा जाता है। फ़िर आजीवन दोनो एक दूसरे का नाम न लेकर महाप्रसाद से ही संबोधित करते हैं।
महाप्रसाद जगन्नाथ मंदिर पुरी
अन्न सत्र में पहुंचने पर देखा कि यहाँ सब्जी बाजार जैसे प्रसाद का बाजार लगा हुआ है, पण्डा जी ने एक कुल्हड़ चावल और दालमा दिलाया। यही भगवान का श्रेष्ठ प्रसाद माना जाता है। भोजन करने के लिए प्रस्तर निर्मित बड़ी छतरी बनी हुई है। यहीं बैठकर हमने पत्तलों में प्रसाद ग्रहण किया। भूख भी जोर की लगी थी और मंदिर में प्रसाद ग्रहण करने की इच्छा ने स्वाद को बढा दिया। प्रसाद ग्रहण करने के बाद हमसे प्रसाद की दक्षिणा के 120 रुपए लिए। वहीं पर जल ग्रहण करने के लिए नल की व्यवस्था भी है। नल से जल पीकर भोजनोपरांत आत्मा तृप्त हो गई। पण्डा जी हमारे साथ फ़ंस कर छटपटा रहे थे, क्योंकि हम ठहरे घुमक्कड़ के साथ पुरातत्व निरीक्षक, इसलिए उन्हें हमारे साथ अधिक समय लग रहा था। हमें छोड़ कर वे और भी जजमान देखना चाहते थे। बिकाश बाबू ने उन्हें दक्षिणा देकर विदा किया और हम मंदिर परिसर के बाहर आ गए। जारी है … आगे पढें। 

नोट - मंदिर परिसर में किसी भी तरह की फ़ोटो लेना वर्जित है, इसलिए सारे चित्र बाहर से ही लिए गए हैं। 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

विराट नगर का कलचुरी कालीन मंदिर

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
लाहाबाद से रीवा की ओर बढ चले। एकबारगी तो हमने तय किया कि रीवा से जबलपुर, कवर्धा होते हुए रायपुर पहुंचे और जबलपुर पहुंच कर गाड़ी का ब्रेक सीधे ही तोप कारखाने के सामने लगाया जाए।। प्राचीन एवं नवीन ब्लॉगर मिलन हो जाएगा। परन्तु उधर के भी रास्ते के खराब होने का समाचार मिला तो हमने जबलपुर जाने का इरादा त्याग दिया। इलाहाबाद से इज्जतगंज होते हुए हम रीवा की ओर बढे। रास्ते में ट्रैफ़िक कमोबेश पहले जैसा ही था। एक स्थान पर आने वाले मार्ग पर जाम लगा हुआ था और हम अपनी साईड में चल रहे थे। तभी हमारे सामने एक उड़ीसा नम्बर की गाड़ी आ गई। जबकि उसे दिख रहा था कि सामने से गाड़ी आ रही है। पाबला जी ने अपनी गाड़ी वहीं रोक ली और सड़क न छोड़ने की ठान ली।

हमारी गाड़ी रुकने से पीछे भी जाम लग रहा था। थोड़ी देर बार जीप वाला तो गाड़ी नीचे से उतार कर ले गया। उसके पीछे पीछे एक ट्रक वाला भी घुस गया। अब पाबला जी की खोपड़ी खराब हो गई। उन्होने ट्रक वाले को बगल से जाने कहा। ट्रक वाला कच्चे में गाड़ी उतारने को तैयार नहीं था और पाबला जी भी अपने स्थान से टस से मस होने को तैयार नहीं थे। गुस्से के मारे चेहरा तमतमा रहा था और आँखे लाल हो गई थी। मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे रहे थे। अब जाम पूरी तरह से लग चुका था। मैं सोच रहा था कि अगर इस जाम में फ़ंस गए तो फ़िर 2-4 घंटे की फ़ुरसत। क्योंकि जाम हमारी गाड़ी के कारण ही लग रहा था। मैंने पाबला जी को बहुत मनाया तब कहीं जाकर वे गाड़ी सड़क से नीचे उतार कर आगे बढे। नहीं तो हो गया था पंगा।

मध्यप्रदेश की सीमा तक सड़क ठीक थी। जैसे ही हमने मध्यप्रदेश की सीमा में प्रवेश किया वैसे बड़े बड़े गड्ढों वाली सड़क से सामना हुआ। आगे बढने पर सड़क ही गायब हो गई थी। सिर्फ़ गड्ढे ही गड्ढे थे। रीवा से कुछ दूर पहले हमें एक ठीक ठाक होटल नजर आया। रात के 9 बज रहे थे। सोचा कि यहीं भोजन कर लिया जाए। होटल किसी भाजपानुमा नेता का था। मध्यप्रदेश पहुंच कर लगा कि हम घर ही पहुंच गए हैं क्योंकि मध्यप्रदेश हमारा बंटवारा भाई जो है। लेकिन यह नहीं सोचा था कि सड़क इतनी खराब होगी। भोजनोपरांत मैने पीछे की सीट संभाल ली और सो गया। अब रात को गाड़ी कहाँ कहाँ और कैसे-कैसे चली उसका मुझे पता नहीं।

सुबह शहडोल के पहले मेरी नींद खुली अर्थात हम अनूपपुर पेंड्रा वाले मार्ग पर थे। तभी सोहागपुर में एक मंदिर दिखाई दिया। स्थापत्य की शैली से दूर से ही कलचुरी कालीन मंदिर दिख रहा था। मैने तत्काल गाड़ी रुकवाई। जैसे मनचाही मुराद मिल गई हो। इस मंदिर को विराट मंदिर कहा जाता है। कहते हैं कि महाभारत में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान जिस विराट नगर का वर्णन है वह यही विराट नगर है। यहाँ के सम्राट राजा विराट थे। समीप ही बाणगंगा में पाताल तोड़ अर्जुन कुंड स्थित है। शहडोल का पूर्व नाम सहस्त्र डोल बताया जाता है। कलचुरी राजाओं का राज जहाँ भी रहा उन्होने वहाँ सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया है।

मंदिर प्रांगण में प्रवेश करने पर यह पीछे की तरफ़ झुका हुआ दिखाई देता है। आगे बढने पर एक केयर टेकर मिला। उसने बताया कि वह फ़ौज से अवकाश प्राप्त है। लेकिन उसके पास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कोई परिचय पत्र नहीं था। उसने मुझसे कहा कि यहाँ फ़ोटो खींचने का 25 रुपए चार्ज लगता है तथा वह रसीद लेकर आ गया। मैने जब उसका मेन्युअल देखा तो उसमें वीडियो बनाने का चार्ज 25 रुपए लिखा था और फ़ोटो लेना फ़्री था। इस तरफ़ केयरटेकर पर्यटकों को ठग कर अतिरिक्त कमाई कर रहा है। गिरीश भैया और हम दोनो मंदिर के दर्शन करने के लिए आए और पाबला जी गेट के समीप ही रुक गए। उनके पैर की एडी में तकलीफ़ होने के कारण अधिक दूर चल नहीं पा रहे थे।

मंडप ढहने के कारण पुन: निर्मित दिखाई दे रहा था। केयर टेकर ने बताया कि 70 साल पहले मंदिर के सामने का हिस्सा धराशायी हो गया था, जिसे तत्कालीन रीवा नरेश गुलाबसिंह ने ठीक कराया था। उसके बाद ठाकुर साधूसिंह और इलाकेदार लाल राजेन्द्रसिंह ने भी मंदिर की देखरेख पर ध्यान दिया। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। मंदिर का मुख्य द्वार शिल्प की दृष्टि से उत्तम है। मुख्यद्वार के सिरदल पर मध्य में चतुर्भुजी विष्णु विराजित हैं। बांई ओर वीणावादिनी एवं दांई ओर बांया घुटना मोड़ कर बैठे हुए गणेश जी स्थापित हैं। मंदिर का वितान भग्न होने के कारण उसमें बनाई गई शिल्पकारी गायब है।

मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। जिसकी ऊंचाई लगभग 8 इंच होगी तथा जलहरी निर्मित है एवं तांबे के एक फ़णीनाग भी शिवलिंग पर विराजित हैं। यह मंदिर सतत पूजित है। जब मैने गर्भ गृह में प्रवेश किया तो कुछ महिलाएं पूजा कर रही थी। मंदिर के शिखर पर आमलक एवं कलश मौजूद है। बाहरी भित्तियों पर सुंदर प्रतिमाएं लगी हुई है। दांई ओर की दीवाल पर वीणावादनी, पीछे की भित्ती पर शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी विष्णु तथा बांई ओर स्थानक मुद्रा में ब्रम्हा दिखाई देते हैं। साथ ही स्थानक मुद्रा में नंदीराज, गांडीवधारी प्रत्यंचा चढाए अर्जुन, उमामहेश्वर, वरद मुद्रा में गणपति तथा विभिन्न तरह का व्यालांकन भी दिखाई देता है।

मिथुन मूर्तियों के अंकन की दृष्टि से भी यह मंदिर समृद्ध है। उन्मत्त नायक नायिका कामकला के विभिन्न आसनों को प्रदर्शित करते हैं। इन कामकेलि आसनों को देख कर मुझे आश्चर्य होता है कि काम को क्रीड़ा के रुप में लेकर उन्मुक्त केलि की जाती थी। यहाँ मैथुनरत स्त्री के साथ दाढी वाला पुरुष दिखाई देता है। इससे जाहिर होता है कि यह स्थान शैव तंत्र के लिए भी प्रसिद्ध रहा होगा। प्रतिमाओं में प्रदर्शित मैथुनरत पुरुष कापालिक है। कापालिक वाममार्गी तांत्रिक होते हैं। वे पंच मकारों को धारण करते हैं - मद्यं, मांसं, मीनं, मुद्रां, मैथुनं एव च। ऐते पंचमकार: स्योर्मोक्षदे युगे युगे। कापालिक मान्यता है कि जिस तरह ब्रह्मा के मुख से चार वेद निकले, उसी तरह तंत्र की उत्पत्ति भोले भंडारी के श्रीमुख से हुई। इसलिए कापालिक शैवोपासना करते हैं।

ज्ञात इतिहास के अनुसार उन्तिवाटिका ताम्रलेख के अनुसार जिला का पूर्वी भाग, विशेषकर सोहागपुर के आसपास का भाग लगभग सातवी शताब्दी में मानपुर नामक स्थान के राष्ट्रकूट वंशीय राजा अभिमन्यु के अधिकार में था. उदय वर्मा के भोपाल शिलालेख में ई. सन् 1199 में विन्ध्य मंडल में नर्मदापुर प्रतिजागरणक के ग्राम गुनौरा के दान में दिये जाने का उल्लेख है. इससे तथा देवपाल देव (ई. सन् 1208) के हरसूद शिलालेख से यह पता उल्लेख है कि जिले के मध्य तथा पश्चिमी भागों पर धार के राजाओं का अधिकार था. गंजाल के पूर्व में स्थित सिवनी-मालवा होशंगाबाद तथा सोहागपुर तहसीलों में आने वाली शेष रियासतों पर धीरे-धीरे ई.सन् 1740 तथा 1755 के मध्य नागपुर के भोंसला राजा का अधिकार होता गया. भंवरगढ़ के उसके सूबेदार बेनीसिंह ने 1796 में होशंगाबाद के किले पर भी अधिकार कर लिया. 1802 से 1808 तक होशंगाबाद तथा सिवनी पर भोपाल के नबाव का अधिकार हो गया, किंतु 1808 में नागपुर के भोंसला राजा ने अंतत: उस पर पुन: अधिकार कर लिया।

वर्ष 1817 के अंतिम अंग्रेज-मराठा युध्द में होशंगाबाद पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तथा उसे सन् 1818 में अप्पा साहेब भोंसला द्वारा किए गए अस्थायी करार के अधीन रखा गया. सन् 1820 में भोंसला तथा पेशवा द्वारा अर्पित जिले सागर, तथा नर्मदा भू-भाग के नाम से समेकित कर दिए गए तथा उन्हें गवर्नर जनरल के एजेंट के अधीन रखा गया, जो जबलपुर में रहता था. उस समय होशंगाबाद जिले में सोहागपुर से लेकर गंजाल नदी तक का क्षेत्र सम्मिलित था तथा हरदा और हंडिया सिंधिया के पास थे. सन् 1835 से 1842 तक होशंगाबाद, बैतूल तथा नरसिंहपुर जिले एक साथ सम्मिलित थे, और उनका मुख्यालय होशंगाबाद था. 1842 के बुंदेला विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें पहले की तरह पुन: तीन जिलों में विभक्त कर दिया गया।

इस मंदिर के आस पास कई छतरियाँ (मृतक स्मारक) बनी दिखाई देती हैं। मंदिर के मंडप में अन्य स्थानों से प्राप्त कई प्रतिमाएं रखी हुई हैं। जिनमें पद्मासनस्थ बुद्ध की मूर्ति भी सम्मिलित है। मंदिर का अधिष्ठान भी क्षरित हो चुका है। इसका सरंक्षण जारी दिखाई दिया। विराट मंदिर के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया। कलचुरीकालीन गौरव का प्रतीक विराट मंदिर सहस्त्र वर्ष बीत जाने पर भी गर्व से सीना तानकर आसमान से टक्कर ले रहा है। अगर इसका संरक्षण कार्य ढंग से नहीं हुआ तो यह ऐतिहासिक धरोधर धूल में मिल सकती है। यहाँ से हम अपने मार्ग पर चल पड़े।

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

ओस कण से निर्मित मंदिर : स्वयंभूनाथ

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
रबार स्क्वेयर से हमारी बस स्वयंभूनाथ मंदिर की ओर चल पड़ी। भूखाग्नि में तो सभी झुलस रहे थे। मंदिर के समीप ही एक रेस्टोरेंट में नाश्ते का कार्यक्रम था। वहाँ पहुंचने पर थोड़ी देर के लिए विश्राम का समय मिल गया। सुशीलापुरी जी हमें दरबार स्क्वेयर में मिली थी। उनका एक ठिकाना काठमांडू में भी है, वे वहीं ठहरी हुई थी। इस रेस्टोरेंट में पहुंच कर जिसे जहाँ जगह मिली वो वहीं टिक गया। नास्ते के बतौर सिर्फ़ 2 ही विकल्प थे, चाऊमीन एवं फ़्राई राईस। किसी ने चाऊमीन का आर्डर दिया तो किसी ने चावल का। मैने चाऊमीन खाने की सोची और आर्डर दे दिया। नाश्ता आते तक हम फ़ोटो ग्राफ़ी करते रहे। पहले चावल दिया गया। हमारी चाऊमीन बाद में आई। नाश्तोपरांत स्मृतियों में संजोने के लिए एक ग्रुप फ़ोटो यहाँ ली गई।

स्वयंभूनाथ स्तूप (शाक्य मुनि मंदिर) का शिखर
दूर से ही स्वयंभूनाथ मंदिर का शिखर दिखाई दे रहा था। साथ ही उसमें बनी हुई बड़ी बड़ी आँखे भी। हमने स्वयंभूनाथ के मंदिर में प्रवेश करने के लिए विदेशियों के लिए 50 नेपाली रुपए का शुल्क है। स्थानीय लोगों के लिए नि:शुल्क प्रवेश है। द्वार से प्रवेश करते ही सामने हिरण्यमय धातू की चमक चढाए जल कुंड के बीच बुद्ध की मूर्ति स्थानक मुद्रा में दिखाई दी। यहाँ पर गिरीश भैया के कुछ चित्र लिया। मुकेश सिन्हा भी चित्र स्पर्धा में कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होने भी खटाखट खटका दबाया। पहाड़ी पर बने हुए स्तूप तक जाने के लिए पैड़ियाँ बनी हुई हैं। पैड़ियों के समीप ही वज्रयान का प्रतीक चिन्ह वज्र रखा हुआ है।  जिसे लोहे की पट्टियों से बांधा हुआ है।
ब्लॉगर्स का सामुहिक छाया चित्र

ऊँची पहाड़ी पर बने इस मंदिर पर जाने के लिए पूर्व की ओर सड़क से सीढ़ियाँ बनी हैं, जिसके दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष हैं तथा दस-दस फुट के फासले पर भूमि-स्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की कई मूर्तियाँ रखी हुई हैं। इसके साथ ही बीच-बीच में गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियाँ भी हैं। इनके दोनों ओर मयूर और गरुड़ की मूर्तियाँ हैं। सीढ़ियों के लगभग मध्य में दो हाथियों की मूर्तियाँ हैं और अंत में वीरासन में बैठे दो सिहों की प्रतिमाएँ। अंतिम सीढ़ी पर धर्मधातुमंडल पर स्वर्णमंडित वज्र बना है। इस चक्र में गाय, सूअर, गेंडा, सिंह, शेर आदि बारह विभिन्न पशु-पक्षियों की सजीव मूर्तियाँ, उत्कीर्ण  मंत्रचक्र हैं। ये बारह पशु-पक्षी तिब्बती वर्ष के बारह महीनों के प्रतीक हैं। इस स्तूप के परिसर में मंदिरों और चैत्यों की भरमार है, जो काठमांडू में हिंदू-बौद्ध समन्वय का बहुत अच्छा उदाहरण है।
स्वयंभूनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार एवं टिकिट खिड़की

पैड़ियों से चल कर हम एक विशाल प्रांगण में पहुचते हैं। यहां प्रस्तर निर्मित मनौती स्तूप दिखाई देते हैं साथ ही प्रस्तर निर्मित भूमि स्पर्श मुद्रा में, ध्यान मुद्रा में, स्थानक मुद्रा में बुद्ध की भिन्न भिन्न प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। मेरे साथ संपत मोरारका जी भी पहुंच गई धीरे-धीरे टहलते हुए। उनकी हिम्मत को सलाम करना ही पड़ेगा। कई साथी तो सीढियों की चढाई देखकर नीचे रह गए, सम्पत जी को पर्यटन का बड़ा शौक है, जो उन्हें स्वयंभूनाथ तक खींच लाया। सम्पत जी के कैमरे से मैने उनके चित्र लिए। इस प्रांगण में नेपाल के शिल्प विक्रय की कई दुकाने हैं। जहाँ बौद्ध धर्म के वज्रयान से संबंधित तांत्रिक मुद्राओं वाले मुखौटे बेचे जाते हैं। मुझे एक कड़ा पसंद आया था, लेकिन उसका मालिक नहीं था दुकान में। 
दो यायावर - बंदा और बुद्ध

यह स्तूप काठमांडू घाटी का प्राचीनतम बौद्ध स्तूप (चैत्य) है। स्थापत्य-कला की दृष्टि से अद्वितीय होने के साथ-साथ प्राकृतिक स्थल की दृष्टि से भी यह अत्यंत मनमोहक है। स्थानीय लोगों की यह मान्यता है कि स्वयंभू के स्तूप के शिखर पर चारों दिशाओं में बने विशाल एवं दैदीप्यमान नेत्र काठमांडू के हर नागरिक के क्रिया-कलाप को हर पल देख रहे हैं, अतः किसी भी व्यक्ति को कोई बुरा काम नहीं करना चाहिए। स्थापत्य-कला की दृष्टि से स्वयंभूनाथ अद्वितीय है। इस स्तूप का व्यास साठ फुट है और शिखर तक की ऊँचाई लगभग तीस फुट होगी। स्तूप के शीर्ष पर दस फुट ऊँची वर्गाकार कुर्सी बनी है, जिसकी चारों दिशाओं पर धातु और हाथी-दाँत से निर्मित दो विशाल नेत्र हैं। इस वर्गाकार कुर्सी के मुंडेर के ऊपर चारों ओर पंचकोणीय फ्रेम बने हैं। इनमें हरेक में नीचे की पंक्ति में बुद्ध की ध्यान-मुद्रा में चार पीतल की चमकती मूर्तियाँ हैं। इनके ऊपर मध्य में भूमि-स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति है।
कांस्य शिल्प

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी एक कहानी है, जिसे बौद्ध पंथी मान्यता देते हैं। यहाँ उपस्थित एक लामा (जिनक नाम भूल गया) कहते हैं कि इस मंदिर का निर्माण ओस के कणों से हुआ है। शांतिवास नामक बौद्ध धर्मावलम्बी राजा था। इस स्थान पर तांत्रिक साधनाएं होती थी, जिसके लिए नर बलियाँ दी जाती थी। वह नर बलि देने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने फ़ैसला किया और अपने पुत्र से कहा, ''कल सुबह सूर्य उगने से पहले भोर के अंधेरे में तुम मेरी तलवार लेकर प्याऊ पर जाना। वहाँ मेरी मूर्ति के नीचे एक व्यक्ति सफ़ेद चादर ओढ़े सोया होगा। तुम बिना चादर को हटाए देवी का स्मरण करके उस आदमी की बलि दे देना।''
मनौती स्तूप

आज्ञाकारी राजकुमार ने पिता की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। लेकिन जब राजकुमार ने उत्सुकतावश मृत व्यक्ति की चादर हटाई, तो उसका कलेजा धक रह गया। वह मृत व्यक्ति और कोई नहीं, स्वयं उसके पिता राजा थे। राजकुमार को असीम दुःख हुआ। एक रात उसे वज्रयोगिनी देवी ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ''जहाँ पर तुमने राजा का वध किया है, उसी पहाड़ की चोटी पर तुम शाक्य मुनि (भगवान बुद्ध) का स्तूप बनवाओ। तभी तुम्हें इस पाप से मुक्ति मिल सकती है।''दूसरे दिन राजकुमार ने स्वप्न की बात अपने दरबारियों को बताई। सभी ने मंदिर बनवाने के विचार का अनुमोदन किया। 
पाप नाशक यंत्र और गिरीश भैया

फौरन ही मंदिर बनाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं। दूर-दूर से चूना, पत्थर, मिट्टी आदि लाई गई और हज़ारों आदमी उस सामग्री को बांस के टोकरों में भरकर पीठ पर लादकर पहाड़ की चोटी पर पहुँचाने में लग गए। परंतु दुर्भाग्य ने राजकुमार का पीछा नहीं छोड़ा। पूरी घाटी में पानी का भयंकर अकाल पड़ा। एक बूँद वर्षा नहीं हुई। सभी सरोवर, नदी, नाले और तालाब सूख गए। लोगों के घर के कुएँ भी सूख गए। ऐसे संकट में मंदिर बनाने के लिए पानी जुटाना बहुत मुश्किल हो गया। राजकुमार को एक युक्ति सूझी, उसने पहाड़ी के इर्द-गिर्द चारों तरफ़ रात में सैंकड़ों सफ़ेद चादरें बिछवा दीं। सुबह के समय आकाश से पड़नेवाली ओस-बिंदुओं से चादरें गीली हो जातीं, उन्हें निचोड़कर पानी इकट्ठा किया जाता, फिर उससे मंदिर-निर्माण किया जाता।
लेखिका सम्पत मोरारका जी

दिन में मंदिर का निर्माण कार्य होता था, तो रात में कोई राक्षस आकर उसे बिगाड़ जाता था। सभी लोग बहुत परेशान थे। एक रात लोगों ने छिपकर उस दानव को देखा। सैंकड़ों लोग मशालें जलाकर तलवार, बरछा लेकर उस दानव के पीछे भागे और उसे घाटी से दूर पहाड़ के उस पार भगाकर दम लिया। हज़ारों लोगों के रात-दिन के परिश्रम से जब स्वयंभू-मंदिर बनकर तैयार हुआ, तब उस घाटी में वर्षा हुई। पानी आया और यहाँ के निवासी खुशहाल हुए। तब से इस घाटी में कभी भी पानी का संकट नहीं आया है। इस कहानी को सुनकर बौद्ध स्तूप के निर्माण के विषय में ज्ञानार्जन हुआ। मेरे अतिरिक्त गिरीश पंकज, सुनीता यादव, शैलेष भारतवासी, मुकेश सिन्हा, सम्पत मोरारका जी ने ओ3म मणि पद्में हूँ बीज मंत्र लिखे चक्रों को घुमाया। 
इस चित्र में व्यवधान हुआ 

सुनीता यादव जी के साथ कुछ चित्र लिए तथा चित्रों के साथ प्रयोग भी किए। जूम करके चित्र लेते हुए सब्जेक्ट एवं कैमरे के बीच यदि कोई आ जाए और उसी समय क्लिक हो जाए तो दिमाग की बत्ती ही गुल हो जाती है। ऐसे ही एक चित्र खराब होने से मेरा मुड चढ गया सातवें आसमान पर। सुनीता जी ने कई चित्र लिए मेरे। लेकिन सभी चित्रों में भृकुटि तनी हुई है चेहरे से सौम्यता एवं सहजता फ़ना हो गई। यही होता है मेरे साथ, यदि मेरे मन की नहीं हो पाती और मैं कुछ कह या कर न पाऊं तो काफ़ी देर तक मानसिक स्थिति डांवा डोल रहती है। जब उस वाकये की तरफ़ से ध्यान हट जाए और कुछ हँसी मजाक इत्यादि साथियों के साथ हो जाए तब सामान्य स्थिति आती है।
लामा

सांझ हो रही थी, पक्षी अपने घोंसलों की और लौट रहे थे। स्वयंभूनाथ का रमणीय दृश्य हमें स्थान छोड़ने ही नहीं दे रहा था। थोड़ा समय होता तो इस मंदिर के प्रस्तर शिल्प की पड़ताल करता तथा स्मृति आलेख ढूंढता। परन्तु हमारे पास इतना समय नहीं था। पराधीने सपनेहू सुख नाहिं। हमारी काठमांडू यात्रा परिकल्पना के अधीन चल रही थी। हम स्तूप से बाहर आ गए और बस के समीप पहुंच गए। काफ़ी साथी बस में बैठ चुके थे। वहीं पर छोटी सी रेहड़ी पर मालाएं चूड़ियाँ इत्यादि एक लड़की बेच रही थी। उसकी दूकान पर मुझे एक बड़े मनकों वाली माला दिखाई, जिसे गाँव में हम गाय-बैलों को पहनाते हैं। 
वज्रयान का प्रतीक वज्र

ये मालाएं वर्तमान में आधुनिक नारियाँ धारण करती हैं, मनुष्य के फ़ैशन में भी प्रचलन में आ गई है। मैने सोचा कि एक माला ले ली जाए। जल्दबाजी में मोल भाव करके 100 नेपाली रुपए में सौदा पटा। माला लेकर हम बस में आए तो किसी ने देखने लिए मांगी। तो उसने बताया कि माला का लॉकेट टूटा हुआ है। हम दौड़ कर माला वापस करने गए, तो दुकान वाली लड़की को धमकाए कि धोखाधड़ी करती है। वह बोली कि माला टूटी हुई थी इसलिए हमने कम भाव में दी। उससे  पैसे लेकर हम बस में आ कर बैठ गए।
इसी चित्र में हमने कलाकारी की थी-एम एफ़ हुसैन के घोड़े जैसा बादल

सारी सवारियाँ आ चुकी थी, पाबला जी नदारत थे। अब पाबला जी की खोज शुरु हुई, कहीं दिखाई नहीं दिए। तो नेपाल की सीमा पर लिया हुआ नेपाली नम्बर अब काम आया। उन्हें फ़ोन लगा कर पूछा तो वे बोले कि आप बस लेकर आ जाईए, मैं नीचे रास्ते में मिल जाऊंगा कहीं। अब उन्हें भी काठमांडू के स्थान का नाम नहीं मालूम और हमें भी। जैसे कह देते कि राम लाल की आटा चक्की के पास खड़ा हूँ या चुनौटी लाल के पान ठेले के पास मिलुंगा। फ़िर हमने दुबारा फ़ोन मिलाया तो यही जवाब आया। हमने बस ड्रायवर को कह दिया कि चलिए, आगे कहीं रास्ते में पाबला जी मिल जाएगें। रास्ते में पाबला जी मिल गए और हम सांझ का अंधेरा होते होते होटल रिव्हर व्यू में पहुंच गए। लेकिन रिव्हर कहीं दिखाई नहीं दी।

नेपाल यात्रा आगे पढे……… जारी है।