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चिरनिद्रा -- ललित शर्मा

निद्रा का सताया हुआ
थका तन-बदन
महसूस नहीं कर पाया
रात रानी की महक
मेंहदी की खुश्बू
बौराई हवा की गंध
महुए के फ़ूलों की
मदमाती गमक
दुर भगाती नींद को
उनकी आँखों में
तैरते हजारों प्रश्नामंत्रण
लाजवाब थे
लुढक गया वहीं
निद्रा ने भर लिया
आगोश में
शून्य सिर्फ़ शून्य था
न चेतना, न सपने
न पराए, न अपने
यह निद्रा का
सुखद अहसास था
शायद चिर निद्रा
ऐसी ही सुखद होती होगी ?

बेदांती महाराज की दंत कथा एवं सिरपुर भ्रमण ---- ललित शर्मा

मन की उड़ान
रती में दफ़्न जब किसी प्राचीन नगर, मंदिर देवालय या अन्य संरचना के बाहर आने की सूचना मिलती है तो रोमांचित हो उठता हूँ। निर्माण करने वाले शिल्पकारों की कारीगरी देखने की इच्छा जागृत होकर व्याकुल कर देती है। कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने लगते हैं, अनगिनत सवाल मन में उठने लगते हैं। सारे जवाब पाना संभव नहीं। कल्पनाओं की अलग ही दुनिया है। जहाँ राजमहल होते हैं, वहाँ कल्पनाए राजा रानी की कहानियां गढने लगती हैं, सेनापति और दरबारी सामने दिखाई देने लगते हैं। उनका खान-पान, बोली, वेशभूषा कैसी होगी? जहां कब्रिस्तान होते हैं वहाँ कल्पना उठने लगती है कि कौन सोया है इन कब्रों में। कैसा होगा यह अपने जमाने और भी नाना प्रकार की बाते। खाली खोपड़ी में बहुत कुछ उपजते हुए एक चल चित्र सा चलने लगता है। ऐसा ही कुछ मेरे मन मस्तिष्क में सिरपुर के विषय में उमड़ता-घुमड़ता रहता है।

बड़े गुरुजी बेदांती महाराज (मध्य में)
छत्तीसगढ के महासमुंद जिले में महानदी के तटीय इलाके के उत्खनन में श्रीपुर नामक राजधानी प्राप्त हुई है। वैसे तो यहाँ पूर्व में कई बार जा चुका था। तब देखने लायक आँखे नहीं थी। जब आँख खुली तब सवेरा समझा और फ़िर खुली आँखों से देखने लगे। गत 16 से 18 जनवरी तक छत्तीसगढ की नदी घाटी सभ्यता पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन संस्कृति विभाग छत्तीसगढ शासन के सौजन्य से था। देश के विभिन्न स्थानों से पुराविद, इतिहासकार, शोधार्थी सम्मिलित होने पहुंचे थे। तीन ब्लॉगर भी थे इस सेमिनार में। 18 जनवरी का दिन सिरपुर भ्रमण के लिए तय हुआ था। बड़े गुरुजी ने कहा था कि मैं अगर सिरपुर भ्रमण पर जाऊंगा तो वे भी जाएगें। मैने भी सोचा कि येल्लो भाई, हो गया कबाड़ा, इस जनम में तो पीछा छूटने वाला नहीं। पता नहीं यह शनि कैसे सिर पर सवार हो गया। कोई तो बचाओ इससे।

यहीं खोपड़ी थी
बड़े गुरुजी सुनकर खिसिया गए, बोले- मोर खंगे रहिस त तोर ले भेंट होए है ( कुछ बाकी था, इसलिए तुम्हारे से मुलाकात हुई।) क्या बाकी था गुरुदेव, बुढौती तक तो सब निपट गया। गुरुजी बोले - एक बार की बात है, गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। पूजा पाठ करके अपना गुजर-बसर करता था। ब्राह्मण कहीं से जजमानी करके आ रहा था तो उसे रास्ते में मनुष्य की एक खोपड़ी पड़ी दिखाई। उसने सोच कर कि इस का कुछ संस्कार बाकी है, उस खोपड़ी को अपने पंछे में बांध लिया और घर ले आया। देखा जाए कि क्या बाकी है? ब्राह्मण ने पत्नी से छिपाकर उस खोपड़ी को खपरैल में रख दिया। दूसरे दिन ब्राह्मण अपनी कथा पूजा में चला गया। पत्नी को खपरैल में कुछ पंछे में बंधा दिख गया। उसने जिज्ञासावश पंछे को खोला तो खोपड़ी दिखाई दी। उसने माथे पर हाथ मारा और कहने लगी कि आने दे पंडित को आज उसकी खबर लूंगी, जादू टोना शुरु कर दिया है।

पंडित के आने से पहले गुस्से में पंडिताईन ने उस खोपड़ी को खलबत्ता (इमामदस्ता) में कूट कर चूर-चूर करके नाली मे बहा दिया और पंडित का इंतजार करने लगी। सांझ को पंडित लौटा, उसके ढूंढने पर खपरैल के छप्पर में वह खोपड़ी दिखाई नहीं दी। पंडित ने पत्नी से पूछा तो वह उस पर भड़क गयी। क्या पंडिताई से पेट नहीं भरता जो अब जादू टोना करने चले हो। मैने उस खोपड़ी को खलबत्ता में कूट पीस कर नाली में बहा दिया। पंडित बोला - बहुत अच्छा किया। मै तो यह देखने के लिए खोपड़ी को उठा लाया था कि इसका क्या होना बचा है? उस खोपड़ी का तुम्हारे हाथों की यह संस्कार होना बाकी था इसलिए यहाँ तक पहुंच गयी। बड़े गुरुजी ये कहानी सुना कर कुछ इस अंदाज में मुस्काए जैसे विक्रम अब वेताल को फ़िर से कंधे पर उठाकर चल पड़ेगा, मेरी तरफ़ देखते हुए। मै भी मुस्कुराता हूँ और सोचता हूँ कि इस डोकरा का मेरे हाथों क्या खंगा है?

बस पंगा होने ही वाला था कि मैने बड़े गुरुजी के कान में मंतर पढ दिया और दोनो गुरु-चेला चल दिए पूर्व दिशा में जहाँ सूर्योदय पर छोटा चेतन हमारा इंतजार कर रहा था। ठिकाने पर पहुंचते ही बड़े गुरुजी मुस्काए, जैसे मोगेम्बो खुश हुआ हो। बेदांती की मुस्कान बहुत ही सुंदर लगती है। इनकी मुस्कान पर तो दस-बीस मैजिक वार दूँ। पर क्या किया जाए भविष्य को भी देखना है। चेतन ने टेबल पर मुंगफ़ल्ली-चने लाकर रख दिए। बोला- कम्पलीमेंट्री है सर। एक तरफ़ उसका घर एक तरफ़……… की तर्ज पर एक तरफ़ बेदांती महाराज एक तरफ़ फ़ल्ली और चना। मै देखता रहा कि अब क्या होगा? होगा क्या, एक घूंट लगाते ही  बेदांती महाराज बड़े गुरुजी शान से मुंगफ़ली और चने चबाने लगे और बोले - का बताओं महाराज, तोर मोर पटे घला नहीं, फ़ेर तोला भेंटे बिना मन माड़हे नहीं। कनवा ला भांव नहीं, कनवा बिना रहांव नहीं।( क्या बताऊं महाराज, तुम्हारी मेरी पटती नहीं है, पर तुम्हारे मिले बिना मेरा मन मानता नहीं है। काना मुझे पसंद नहीं है,  बिना उसके रहना भी पसंद नहीं है।

जय हो बेदांती महाराज की
बेदांती महाराज की दोस्ती अब मजबुरी बन गयी, इनके दर पर आदतन हो गया पहुंचना। चेतन फ़िर ध्यान भंग करने पहुंच गया - और क्या लाऊँ? बेदांती महाराज बोले- मेरे लिए स्माल और महाराज के लिए फ़ुल्ल। चेतन आर्डर लेकर चला गया। बेदांती महाराज से चर्चा चलते रही, मुंह कड़ुवा होते ही मीठा बोलने लगे, बड़े प्रेम से ब्लॉग कहानी सुनाने लगे। ब्लॉगिंग पर गंभीर चर्चा होने लगी। बेदांती महाराज बोले- मैने तो कमेंट करना बंद कर दिया है। जिसकी पोस्ट मुझे अच्छी लगती है वहीं कमेंट करता हूँ। मैने कहा कि कभी एकाध कमेंट मेरी पोस्ट पर भी कर दिया करो। तो बोले - तैं मोर मन के लायक लिखथस त कमेंट करथौं (तुम मनभावन लिखते हो तब कमेंट करता हूं) धन्य हुए देव! एक साल में आपके मन के लायक एक पोस्ट भी नहीं लिखे। काहे ये नालायक चेला को फ़िर याद करते हो। चेतनSSS- अगला आर्डर कैंसिल। चलो अब बहुत टैम हो गया घर जाना है। बेदांती महाराज उठते और कहते हैं - कल कितने बजे चलना है सिरपुर? तैं के बजे आबे? बिहनिया आठ बजे अजायबघर में मिलना। मिलन का करार होने के बाद दोनो अपने-अपने रास्ते चल देते हैं। :)

 

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