सोमवार, 26 सितंबर 2016

खारुन नदी के संग-संग सफ़र: उद्गम से पदयात्रा

कभी आप वनों में उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तो के साथ बहती किसी अल्हड़ सी नदी के साथ-साथ चले हैं? नहीं न। फ़िर आज चलते हैं प्राकृतिक सुषमा के बीचे वनों से आच्छादित भूधरा पर प्रवाहित सलिला खारुन नदी के साथ उसके उद्गम के सफ़र पर। 
कंकालिन मंदिर पेटेचुवा
खारुन नदी रायपुर शहर की जीवन रेखा है, जिसका सफ़र बालोद जिले के ग्राम पेटेचुवा से प्रारंभ होकर सोमनाथ में शिवनाथ से मिलन तक का है। नदी का उद्गम ग्राम पेटेचुवा के नायक तालाब से हुआ है। यहाँ इसे कंकालीन नाला कहा जाता है, जो आगे चलकर नदी का रुप धारण कर लेता है।
खारुन उद्गम नायक तालाब
रायपुर से धमतरी होते हुए चारामा घाट से पहले दाँए तरफ़ मरकाटोला ग्राम से पेटेचुआ तक का सफ़र 115 किमी का है। 
नदी के साथ साथ पदयात्रा का आरंभ
इस छोटे से वनग्राम में कंकालीन माता का प्रसिद्ध मंदिर है। खारुन नदी कंकालीन मंदिर  की चौहद्दी से लगकर खैरडिग्गी ग्राम तक का पांच किमी का सफ़र घने वन के बीच से तय करती है। इस पांच किमी का सफ़र विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरता है, यह ट्रैकिंग रोमांचित कर जाती है एवं अद्भूत अनुभूति से भर देती है। 
पदयात्रा के साथी, नारायण साहू, बन्नु राम
जब हम नदी के साथ साथ यात्रा प्रारंभ करते हैं तब पहला स्थान भालू खांचा नाम का स्थान मिलता है। इस खांचा में बारहों महीने पानी रहता है, जिसका उपयोग भालू करते हैं। 
खारुन नदी में भालू खांचा
अगले पड़ाव में भकाड़ू डबरी मिलती है, यह छोटा सा तालाब है, जो पानी से लबालब भरा रहता है, इसके नामकरन के पीछे की कहानी रोचक है। मेरे साथी रामकुमार कोमर्रा बताए हैं कि गाँव में भकाड़ू नामक अविवाहित व्यक्ति रहता था। उसकी मृत्यु होने पर उसके रक्शा (कुंवारा प्रेत) बन जाने के डर से ग्रामवासियों ने दाह संस्कार के श्मशान में भूमि नहीं दी। तब वन में तालाब के किनारे उसके दाह संस्कार का निर्णय लिया गया, तब से इस तालाब का नाम भकाड़ू डबरी पड़ गया।
जंगल के मध्य भकाड़ू डबरी
आगे बढने पर नदी के बीच चटान काट कर कोटना जैसी आकृति बनाने के कारण एक स्थान को कुकुर कोटना कहा जाता है, यहाँ कभी शिकारी कुत्ते पानी पीते थे। यहां हमने दोपहर के भोजन में गांव से बनाकर लाई हुई टमाटर की चटनी के अंगाकर रोटी का आनंद लिया। 
दोपहर का भोजन कुकुर कोटना में
अगला पड़ाव अइरी बुड़ान है, जहां मछली भोजन की तलाश में अइरी नामक चिड़ियों का डेरा रहता है। यहां एक स्थान ऐसा भी है जहाँ कि मिट्टी खारी है और उसे चाटने के लिए नीलगाय, चीतल, कोटरी आदि जानवर आते हैं, उनके खुरों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं। 
अइरी बुड़ान
अगला पड़ाव नाहर डबरी है, गहराई होने के कारण यहाँ नदी का पानी कुछ महीनो ठहर जाता है, जिसका उपयोग वन ग्राम नाहर के लोग करते हैं। यहां जंगल के खोदकर लाए हुए बेचांदी कांदा की प्रोसेसिंग की जाती है।
नाहर डबरी में बेचांदी कंद की प्रोसेसिंग
इस यात्र का महत्वपूर्ण स्थान मासूल है, यहां नदी गहराई में उतर जाती है, ऊपर नीचे रखी बड़ी चट्टानें इमारत होने का भ्रम उत्पन्न करती हैं। यह स्थान इतना रमणीक है कि कुछ पल ठहरने का मन हो जाता है तथा भालूओं से भी भेंट हो सकती है। क्योंकि इनके रहने के लिए यह आदर्श स्थान है। 
नदी का बीहड़ मार्ग
इस स्थान का मासूल नाम धरने के पीछे की कहानी तिहारु राम सोरी बताते हैं, मासूल एक बड़ा और मोटा सर्प होता है, जो एक स्थान पर ही पड़ा रहता, उस पर दीमक चढ़ जाती है, फ़िर भी नहीं हिलता। जो उसके मुंह के सामने आ जाता है उसे खा लेता है। एक बार मछली पकड़ने वालों ने उसे लकड़ी का लट्ठा समझ कर उठा लिया और पानी रोकने के लिए आड़ के रुप में लगा दिया। पानी में मछली देख कर जब उसने हरकत की तब पता चला कि यह मासूल सर्प है, तब से इस स्थान का नाम मासूल प्रचलित हो गया।
मनोरम स्थल मासुल
मासूल के आगे दोरदे नामक स्थान है, यहां से मछलियां नदी में ऊपर नहीं चढती। जंगल यहीं पर समाप्त हो जाता है और आगे खैरडिग्गी नामक गांव का खार लग जाता है। नदी का यह सफ़र आनंददायक है। 
जोहर ले, सफ़र के साथी तिहारु राम सोरी
जब भी यहां कि ट्रेकिंग करें तब ट्रेकिंग शुरु करने से पहले अपना वाहन खैरडिग्गी ग्राम में बुलवा लें, अन्यथा इसी रास्ते पर पुन: लौटना होगा। विशेष ध्यान रखे कि गांव के किसी जानकार व्यक्ति के साथ पर्याप्त भोजन पानी लेकर ट्रेकिंग करें।       

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

प्रकृति का अजूबा जलजली (दलदली) मैनपाट

राजधानी रायपुर से 352 किलोमीटर अम्बिकापुर एवं अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर छत्तीसगढ़ का शिमला एवं निर्वासित तिब्बतियों की शरण स्थली मैनपाट स्थित है। 

मैनपाट के ग्राम कमलेश्वरपुर के इर्द गिर्द शरणार्थी तिब्बतियों के कैम्प हैं। यहीं पर पर्यटन विभाग के शैला रिसोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर जलजली (दलदली) नदी है। 

इस नदी का लगभग 3 एकड़ का क्षेत्र ऐसा है कि इस पर कूदने से यह हिलता है। इसे जम्पिंग लैंड भी कह सकते हैं। जब इस भूमि पर कोई कूदता है तो यह स्पंज की गेंद जैसी प्रतिक्रिया देती है। यहाँ आने के बाद लोग बच्चों की तरह उछल कूद कर इसे परखते हैं।

मैनपाट
मैनपाट जलजली

जलजली की इस विशेषता से बाहरी दुनिया के लोग अधिक परिचित नहीं है। फ़िर भी कुछ सैलानी प्रतिदिन कुदरत के इस अजूबे को देखने के लिए पहुंचते हैं। 

जब संसार में कहीं पर धरती हिलती है तो हलके से भी कंपन से घबराहट फ़ैल जाती है और इससे भारी क्षति भी होती है। 

यही एकमात्र ऐसा भूचाल है जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और प्रकृति के इस अजूबे को देख कर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। 

इस स्थल से थोड़ी दूर झरना भी है लेकिन वन क्षेत्र होने कारण यहाँ तक पहुंचने का मार्ग नहीं बना है।
मैनपाट
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
मेरा मानना है कि यह स्थान देश में धरती बनने की प्रक्रिया का प्रथम उदाहरण है। जब धरती पर जल ही जल था और उसके बाद धीरे-धीरे जल में वनस्पति का जमाव होने लगा और जल दलदल में परिवर्तित होकर ठोस होते गया. 

करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया के पश्चात जल ठोस भूमि में परिवर्तित हो गया। यहाँ पर जल से भूमि बनने की यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है। सैकड़ों वर्षों के पश्चात यह भूमि भी ठोस हो जाएगी। 
मैनपाट जलजली
मैनपाट जलजली (वेट लैंड)
दलदली की इस भूमि के नीचे नदी बहती है। वनस्पति ने इस भूमि को इतना अधिक जकड़ रखा है कि इसका क्षरण भी नहीं होता और कूदने पर हमेशा यह इसी तरह की प्रतिक्रिया करती है। 

नदी के जल के ऊपर मिट्टी और वनस्पति की लगभग 4-5 मीटर मोटी परत है, इस पर मैने पत्थर से भरी ट्राली लेकर ट्रेक्टर को भी जाते हुए देखा है, यह जमीन इतने वजन के बाद भी फ़टती नहीं है और न ट्रेक्टर के पहिए इसमें धंसते हैं। प्रकृति का यह अजूबा मैने मैनपाट में देखा और कहीं नहीं।