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शनिवार, 19 मई 2012

46 वर्षों से बाट जोह रहे उपन्यास "धान के देश में" का प्रकाशन ---- ललित शर्मा

कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाए तरुवर फ़ले, केतक सींचो नीर। इस कथन से लगता है कि किसी भी कार्य को भाग्य एवं ईश्वर के भरोसे छोड़ देना चाहिए। समय आने पर कार्य होगा ही। लेकिन अधिरता भी रखना जरुरी है। यदि कार्य के प्रति लगन लगी रहेगी तो एक दिन अवश्य सम्पन्न भी होगा और सिरे भी चढेगा। अकर्मण्यता से सिर्फ़ ईश्वर के भरोसे छोड़ने से कार्य सिद्ध नही होता, इसके लिए सतत प्रयास भी करना चाहिए और सतत प्रयास ही रंग लाता है। ऐसी ही कुछ कहानी स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास "धान के देश में" की है। यह उपन्यास सन् 1965 में लिखा गया था। इसका प्रकाशन लेखन के 47 वें वर्ष में हो रहा है। प्रख्यात साहित्यकार और पत्रकार पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी जी ने इस उपन्यास की भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को  लिखी थी। छत्तीसगढ शासन के संस्कृति विभाग एवं हरिप्रसाद अवधिया जी के पुत्र जी.के. अवधिया के वित्तिय सहयोग से वैभव प्रकाशन रायपुर से "धान के देश में उपन्यास" का प्रकाशन होना सुखद है।


उपन्यास के प्रकाशन को लेकर मैने गत वर्ष एक पोस्ट ललित डॉट कॉम पर लिखी थी। जिसके फ़लस्वरुप यह उपन्यास चर्चा में आया। संस्कृति विभाग के उच्चाधिकारियों की दृष्टि इस पर पड़ी और वे उपन्यास के प्रकाशन के लिए सहयोग करने को तैयार हो गए। छत्तीसगढ की पृष्ठ भूमि को लेकर रचित यह उपन्यास सांस्कृतिक विरासत से कम नहीं है। उपन्यास को लिखे हुए अर्ध शताब्दी बीत रही है। इन वर्षों में समाज में बदलाव आया है। लोगों के रहन सहन का अंदाज बदला है तो साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में परिवर्तन हुआ है। गांव में त्यौहारों एवं शादियो के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत गायब हो रहे हैं तो लोकाचार में भी परिवर्तन आया है। साहित्य भी सांस्कृतिक प्रदूषण की मार झेल रहा है ऐसे समय में स्व: हरिप्रसाद अवधिया के उपन्यास का प्रकाशन होना छत्तीसगढ की संस्कृति के प्रचार प्रसार एवं उसे संवर्धन में महती भूमिका निभाएगा। ग्रामीण परिवेश पर आधारित उपन्यास में छत्तीसगढ के रीति रिवाजों, परम्पराओं का विशेष रुप से सम्मिलित होना इसे विशेषता प्रदान करता है, उपन्यास के कुछ अंश यहाँ पर उदधृत करना प्रासंगिक समझता हूँ।



दूर्गाप्रसाद द्वारा विधवा राजवती का हाथ मांगने से उपन्यास का कथानक प्रारंभ होता है। इसके साथ कहानी फ़्लेश बैक में चलती है। साथ ही ग्रामीण अंचल का सुंदर चित्रण भी - संध्या की सुनहरी किरणे अभी पेड़ों के पत्तों पर बिछल रही थीं। खेतों से झुण्ड के झुण्ड गायों को घेर कर लाते हुये ग्वाले अपनी बाँस की बाँसुरी पर सुरीली तान छेड़ रहे थे। पश्चिमी क्षितिज में डूबते हुये सूर्य की लालिमा को उड़ती हुई धूल ने ऐसा ढँक दिया था कि मानो लाल रंग के परदर्शी मलमल से परदा कर दिया गया हो। गाँव के अंतिम छोर पर मिट्टी का छोटा सा घर था। लाल खपरैल की जगह घास की छत थी। दीवालें नीचे से आधी दूर तक गोबर से लिपी हुई थीं। शेष आधा भाग गेरू से पुता था। घर में एक ही दरवाजा था और एक ही खिड़की। घर तथा दरवाजे के मध्य छोटा सा साफ-सुथरा लिपा-पुता आँगन था जिसके बीचोबीच तुलसी चौरा (एक छोटे से चबूतरे पर बोया गया तुलसी का पौधा) था। आँगन के एक कोने में धनिया और मिर्च के पौधे संध्या की बिखरती हुई कालिमा में उनींदे हो रहे थे। दूसरे कोने में एक गैया कोठा था जिसमें एक देसी गाय बँधी थी जिसके पास ही बँधा बछड़ा रह-रह कर रँभा उठता था - शायद दिन भर के बाद इस समय तक उसे जोरों से भूख लग आई थी।


ग्रामीण अंचल में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले गहनों का जिक्र भी उपन्यास में है -रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने सुहागिनों के मांग में सिंदूर की मोटी नारंगी रंग की रेखायें थीं और हाथों में चूड़ियाँ। विभिन्न गहनों से उन्होंने अपना श्रृंगार कर रखा था - कानों में 'खिनवा', बाहों में 'बँहुटे' या 'नागमोरी', कमर में चांदी के 'करधन' और पावों में काँसे या चांदी की 'पैरियाँ'। विधवायें सफेद रंग की साड़ियाँ पहने थीं और किसी-किसी के हाथ में चांदी का 'चुरुवा' था क्योंकि इस क्षेत्र के रिवाज के अनुसार वे चुरुवा के सिवा अन्य कोई गहना नहीं पहनतीं। साथ ही त्यौहारों एवं उत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों का विशेष उल्लेख है।

सोहर गीत हैं -
सतहे मास जब लागै तौ अठहे जनाय हो ललना।
अठहे मास जब लागै तौ सधौरी खवाय हो ललना।
नवे मासे जब लागै तो कंसासुर जानय हो ललना।
जड़ि दिहिन हाथे हथकड़ियाँ पावें बेलिया तो ललना।

इस प्रकार सोहर के पदों में ललनाओं ने बालक की श्री कृष्ण से तुलना कर उसके यश की कामना प्रकट करती हैं।

विवाह के अवसर पर औरतें गाती हैं

घेरी बेरी बरजेंवँ दुलरू दमाद राय,
दूर खेलन मत जाव हो।
दूर खेलत सुवना एक पायेव,
लइ लानेव बहियाँ चढ़ाय हो।
बारे दुलरुवा के हरदी चढ़त हय,
सुवना करत किलकोर हो।
तुम तो जाथव बाबा गौरी बिहाये,
हमहु क ले लौ बरात हो।
अइसन दुलरू मैं कबहुँ नहिं देखेंव,
सुवना ला लाये बरात हो।

दीवाली के अवसर पर गाँव में जुआ खेलने की परम्परा है और थाने में सरगर्मी बढ़ गई थी। पुलिस वाले जुये की टोह में गाँव-गाँव का दौरा कर रहे थे। स्वयं सब इस्पेक्टर खुड़मुड़ी आये। गाँव के कोटवार भुलउ ने उनकी बड़ी आवभगत की। चौपाल पर खाट बिछा दी गई। उस पर सब इंसपेक्टर बैठ गये। दारोगा का आगमन सुन कर महेन्द्र और सदाराम भी आ गये। तीनों में बातें होती रहीं। भुलउ चुपचाप बैठा था। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गये थे। दारोगा ने भुलउ को बताया कि वह रात गाँव में ही रहेगा। सुनकर भुलउ दौड़ता हुआ गया और उसके लिये खाट तथा रसद का प्रबंध कर आया। बेगार और रसद अंग्रेजी शासन के युग में साधारण बात थी।

उपन्यास में दीवाली का जिक्र - लक्ष्मी पूजा की रात गाँव में प्रायः कोई नहीं सोया। औरतें 'गोड़िन गौरा' की पूजा और उत्सव में व्यस्त हो गईं। इसके पहले दिन वे औरतें मालगुजार और बड़े किसानों के घर जाकर 'सुआ नाच' नाचती रहीं थीं। बाँस से बने एक टोकनी में चाँवल भर कर उसमें चार-पाँच पतली लकड़ियाँ खड़ी की गई थीं। उन लकड़ियों के ऊपरी भाग में मिट्टी के छोटे-छोटे तोते बनाये गये थे। उस टोकनी को बीच में रख कर स्त्रियाँ गोल घेरे में आधी झुकी हुईं गोल घूम घूम कर, झूम झूम कर नाचती रहीं थीं। उनके मुँह से एक स्वर होकर सहगान के रूप में छत्तीसगढ़ का 'सुआ गीत' गूँज रहा था -

जावहु सुवना नन्दन वन
नन्दन वन आमा गउद लेइ आव,
ना रे सुआ हो, आमा गउद लेइ आव।
जाये बर जाहव आमा गउद बर, कइसे के लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, कइसे के लाहव टोर।
गोड़न रेंगिहव, पंखन उड़िहव, मुँहे में लइहव टोर,
ना रे सुआ हो, मुँहे में लइहव टोर।
लाये बर लाहव आमा गउदला, काला मैं देहँव धराय,
ना रे सुआ हो, काला मैं देहँव धराय।
गुड़ी में बइठे मोर बंधवइया, पगड़िन देहव अरझाय।
रे सुआ हो, पगड़िन देहव अरझाय।

आगे चलकर उपन्यास में प्रेम कहानी जन्म लेती है और विभिन्न घटनाक्रमों को लेकर उत्सुकता एवं रोचकता को बनी रहती है। मेरा प्रयास उपन्यास की एक झलक प्रस्तुत करना है। "धान के देश में" उपन्यास शोधार्थियों के लिए भी मददगार साबित होगा। उपन्यास प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में इनकी महती भूमिका है। "धान के देश में" के विमोचन की सूचना सभी मित्रों तक पहुंचाई जाएगी। जिन्होने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से प्रकाशन हेतू सहयोग प्रदान किया उन्हे साधुवाद।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के दस्तावेज उपन्यास को प्रकाशन का इंतजार

इंतजार की सीमा क्या हो सकती है? जीवन पर्यंत देहावसान तक या उसके पश्चात भी? कभी-कभी इंतजार की घड़ियाँ लम्बी हो जाती हैं और अंतिम यात्रा के पश्चात भी चलते रहती हैं। ऐसा ही कुछ एक उपन्यास के साथ हुआ।

इस उपन्यास को मैने पढा। छत्तीसगढ अंचल की संस्कृति की अमिट छाप है इसमें। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन का प्रथम आंचलिक उपन्यास है पढते हुए लगता है कि मैं समय के उस काल खंड में पहुंच गया हूँ।

सन् 1965 में लिखे गए इस उपन्यास का नाम है “धान के देश में”। इसकी भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी ने लिखी थी। लेकिन यह उपन्यास काल की गर्त में दब गया। प्रकाशित न हो सका।

धान के देश की भूमिका में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि “हरिप्रसाद अवधिया जी की रचनाओं से मैं पहले ही परिचित हो चुका था यद्यपि मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य तब हुआ जब मैं महाकोशल में काम करता था।

उनका जन्म स्थान रायपुर है। सन् 1918 में उनका जन्म हुआ था। सत्रह वर्ष की अवस्था से ही वे कहानियाँ लिखने लगे। उनकी 'नौ पैसे' शीर्षक कहानी पहली रचना है। वह इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'नई कहानियाँ' नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वे आज तक बराबर लिखते जाते हैं। उनकी रचनायें 'सरस्वती', 'माधुरी', 'विशाल भारत', 'नव भारत' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुई हैं। सन् 1948 में वे एम.ए. हुये और साहित्य के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अवतीर्ण हुये।

जब मैंने उनकी रचनायें पढ़ीं तब मैंने उन्हें उपन्यास लिखने के लिये कहा। सच तो यह है कि उस समय जो भी तरुण साहित्यकार मेरे पास आते थे, उन सभी को मैं उपन्यास लिखने के लिये प्रेरित करता था।

लमनहर चौहान जी ने मुझको अपना एक उपन्यास दिखलाया। उस छोटी अवस्था में भी उनका रचना-कौशल देखकर मैं विस्मित हो गया।

विश्वेन्द्र ठाकुर और परमार जी कहानियाँ लिखा करते थे। उनसे भी मैंने छत्तीसगढ़ के जन-जीवन को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने "धान के देश में" नाम देकर पहली बार उपन्यास की रचना की है।

उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते।

मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरात्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।“

एक अर्ध शताब्दी भी बीत गयी लेकिन “धान के देश में” की सुध लेने कोई नहीं आया। सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूस लेखकों ने शासकीय अनुदान से अपनी घटिया से घटिया रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवा लिया।

लेकिन जो इस दुनिया से चला गया है उसकी सुध कौन ले? धान के देश में नामक उपन्यास अपने प्रकाशन की बाट आज भी जोह रहा है। इकबाल का एक शेर याद आता है मुझे-

हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुस्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

मेरे धान के देश में उपन्यास का जिक्र करने का कारण यही है कि कोई संस्था व्यक्ति या शासन अगर इस महत्वपूर्ण उपन्यास को प्रकाशित करना चाहता है तो उसे इसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध कराई जा सकती है।

जिससे यह उपन्यास अपने काल खंड की अंधेरी कोठरियों से निकल कर प्रकाशित हो और उपन्यासकार स्व: हरिप्रसाद अवधिया जी का उपन्यास प्रकाशन का इंतजार मरणोपरांत समाप्त हो सकें।