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गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

सूर्य मंदिर की मिथुन प्रतिमाएं - कलिंग यात्रा


कलाओं का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से किया गया है। कलाओं की गणना में सबसे अधिक प्रसिद्ध संख्या चौसठ है। शुक्र नीति एंव तंत्र ग्रंथों में कलाओं की संख्या चौसठ ही दी गई है। ललित विस्तार में पुरुषकला के रुप में छियासी नाम गिनाए गए हैं और कामकला के रुप में चौसठ नाम। वात्सायन से लेकर अन्य आचार्यों ने भी कलाओं की संख्या चौसठ ही गिनी है। कला शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ॠग्वेद में ही मिलता है - यथा कलां यथा यथा शफ़म् यथा ॠणं संनयामसि। आचार्य वात्सायन कहते हैं - जिस क्रिया से, जिस कौशल से कामनियाँ प्रसन्न हों, वशीभूत हो जाएं, वही कला है।" नागरिक के लिए वात्सायन चौसंठ कामकलाओं में शिक्षित होने बात कहते हैं। वात्सायन कहते हैं कि - कामकला की शिक्षा प्राप्त करने के बाद चतुर्वण को दान, वीरता, व्यवसाय एवं श्रमादि द्वारा धनार्जन करना चाहिए और इसके उपरांत ही विवाह करना चाहिए। इससे ज्ञात होता है कि कामकला का चित्रण शैक्षणिक दृष्टिकोण से किया जाता था। 
नायिका - शाल भंजिका
कामकला एक ऐसा विषय है जिस पर सार्वजनिक चर्चा करना वर्तमान में असभ्यता माना जाता है। पर गुह्य संभाषण करना हर स्त्री पुरुष चाहता है क्योंकि विषय ही रसदार है। मनुष्य के जीवन से जुड़ा हुआ है। भोजन क्षुधा के अतिरिक्त मनुष्य को संसर्ग क्षुधा ही सताती है। कई वर्षों पूर्व डिस्कवरी चैनल पर महाद्वीपों का डोंगी से सफ़र करने वाले व्यक्ति से सफ़र सम्पन्न होने के उपरांत पत्रकार ने पूछा - आप छ: महीने से एकल डोंगी का समुद्र में सफ़र कर रहे हैं, घर पहुंचने के पश्चात वह पहला काम बताईए जिसे आप प्राथमिकता में प्रथम रख कर करना चाहेंगे। उसने जवाब दिया - घर पहुंचने पर मैं सबसे पहले एकांत वातावरण में अपनी पत्नी के साथ चर्मसुख का आनंद उठाना चाहुंगा। यह घटना याद आने का कारण कोणार्क की भित्तियों में उत्कीर्ण कामकेलि की विभिन्न मुद्राएं हैं, जिन्हें सार्वजनिक रुप से प्रदर्शित किया गया है।
नायिक - शुक सारिका
विदेशी पर्यटक मिथुन प्रतिमाओं को आश्चर्य मिश्रित भावों से देखते हैं कि भारत में यौन शिक्षा प्राचीन काल से ही चली आ रही है और इसे सार्वजनिक तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वरना पाश्चात्य देशों में भारत के विषय में सिर्फ़ यही धारणा है कि यह जादू टोने, साधू संतों एवं सांपो का देश है। इससे सीधा अर्थ लगा लिया जाता है असभ्य है और सभ्यता का ठेका तो पाश्चात्य देशों के पास है। वात्सायन कहते हैं पति-पत्नी को धार्मिक और सामाजिक नियमों की शिक्षा  कामसूत्र के द्वारा मिलती है। जो दम्पति कामशास्त्र के मुताबिक अपना जीवन व्यतीत  करते है उनका जीवन यौन-दृष्टि के पूरी तरह सुखी होता है। ऐसे दम्पति अपनी पूरी जिंदगी एक-दूसरे के साथ संतुष्ट रहकर बिताते हैं। कामसूत्र द्वारा ऐसी बहुत सी  विधियां बताई जाती है जो स्त्री और पुरुष को आपस में ऐसे मिला देती है जैसे कि दूध में पानी।
 नायिका-पुत्र वल्लभा
भारतीय दर्शन में उपदेश किया गया है कि मनुष्य को जीवन काल में पुरुषार्थ चतुष्टय को धारण करना चाहिए। धर्म अर्थ काम मोक्ष द्वारा ही जीवन सुखमय और आनंददायक होकर अंतिम मंजिल को प्राप्त करता है। इसमें काम का महत्व धर्माचरण के इतना ही पवित्र रखा गया है। जिस प्रकार आहार त्याग देने या पौष्टिक पदार्थों के न खाने से शरीर सूख कर कांटा हो जाता है, इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, क्षुधा-पिपासा शरीर को सोखने लगती है, उसी प्रकार काम निरोध से भी हानि होती है, अनेक शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ पकड़ लेती हैं। ऐसी स्थिति में सारांश यह निकलता है कि बलात निर्यंत्रण या अतिशय भोग ये दोनो ही उपाय हानिकर हैं। इनकी उपाय पूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए। वात्सायन कहते हैं कि इन्हें इस प्रकार प्राप्त करें कि एक पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थ का बाधक न बने।
नायिका मुग्धा
प्राचीनकाल में अभिजात्य नागरजनों एवं साहित रसिकों तथा विलासप्रियों के लिए नायिका रसानुभूति का माध्यम एवं मनोरंजन का कलापूर्ण साधन भी रहा है। भित्ति प्रतिमाओं में शिल्पकारों ने नायिका यथा, गणिका, शुक सारिका, आंजना, शाल भंजिका, रमणिका, अभिसारिका, मुग्धा एवं अन्य को भित्तियों में स्थान दिया है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नायिकाओं को ही स्थान दिया जाता था, समाज में नायक भी होते थे, भरत ने नायक के चार भेद किए हैं- धीरललित, धीरप्रशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत। ये भेद नाटक के नायक के हैं। "अग्निपुराण" में इनके अतिरिक्त चार और भेदों का उल्लेख है : अनुकूल, दर्क्षिण, शठ, धृष्ठ। ये भेद स्पष्ट ही शृंगार रस के आलंबन विभाव के हैं। मनोरंजन की दृष्टि से इनका चित्रण भी मंदिरों की भित्तियों पर किए जाने की परम्परा रही है।  
नायक - धीरललित
मंदिरों में उत्कीर्ण मैथुन प्रतिमाओं के द्वारा हमारे पूर्वज कुछ गूढ़ संदेश आने वाली पीढ़ी के लिए संकेत के तौर पर देकर गए हैं। यह भोग विलास का कोरा प्रदर्शन नहीं है। स्त्री-पुरुष संयोग को प्रतिमाओं में प्रदर्शित करते हुए यह भी दर्शाया गया है कि "अङादङात सम्भवसि हृदयादधि जायसे। आत्मा वै पुत्रानामासि सजीव शरद: शतम्॥ (निरुक्त निघंटु कांड 3/1/4) तू मेरे अंग प्रत्यंग से प्राप्त हुआ  है, तू मेरे हृदय से उत्पन्न हुआ है और मेरा ही पुत्र संज्ञक स्वरुप है। ऐसा तू सौ वर्षों तक जीवित रह।" मानव शरीर को अमरावती कहा गया। इसे अमरावती कहने का कारण है कि शरीर के द्वारा नए शरीर की उत्तप्त्ति होती है, इस शरीर द्वारा सतत उत्पन्न होक मानव युगों युगों तक जीवित रहता है। इस दृष्टि से परम्परागत शरीर नष्ट नहीं होता। इसलिए अप्रमत्त होकर इसकी रक्षा करनी चाहिए। यही संसार का अंतिम सत्य है,  जो जहाँ से शुरु होता है वहीं समाप्त भी होता है। जारी है… आगे पढ़ें। 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

भानगढ़ का मंदिर शिल्प

भूतिया कुंए का पानी पीते रतन सिंह जी
आरंभ से पढें
सोमेश्वर मंदिर से दांई तरफ़ चलने पर घनी झाड़ियाँ है तथा इधर कोई रिहायसी निर्माण कार्य नहीं है। यहाँ पर शेवड़ों की मढियाँ और समाधियाँ है तथा एक भवन के बाहर शिवलिंग स्थापित है और भवन के भीतर गणेश जी। कहते हैं कि यहीं पर शेवड़े (शव साधक तांत्रिक) तांत्रिक उपासना करते थे। जो चेला दर चेला चली आ अही है। धूणे के पास एक छोटा सा कुंआ है, जिस पर डिब्बा और रस्सी रखी हुई थी। गढ में काम करने वाले मजदूर इसी कुंए से पानी पीते हैं। हमें भी प्यास लग रही थी। भरत सिंह ने पानी निकाला तथा हमने बारी-बारी से अपनी प्यास बुझाई। कुंए का जल शीतल होने के साथ मीठा भी था। इस दौरान चौकीदार हमारे साथ ही चल रहा था। झाड़ियों के बीच से हम रास्ता बनाते हुए टीले पर चढे। यह मंगला देवी का मंदिर था। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है। बलुए पत्थर से निर्मित मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है। 

मंगला माता मन्दिर
भानगढ़ के मंदिरों में मुझे कहीं पर भी मिथुन  मूर्तियाँ दिखाई नहीं दी। जिस तरह अन्य प्राचीन मंदिरों में दिख जाती है। किसी भी प्राचीन मंदिर बहुत सारी नहीं तो एक मिथुन मूर्ति मिलती ही है। अगर मानव मिथुन मूर्तियाँ नहीं प्राप्त होती तो उनकी जगह पशु मिथुनरत मूतियाँ उत्कीर्ण होती हैं। प्रतीत होता है कि पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में मिथुन मूर्तियों का निर्माण शिल्पकारों ने बंद कर दिया होगा। जबकि प्राचीन काल में मिथुन मूतियों के निर्माण के पीछे मान्यता थी कि मंदिरों में मिथुन प्रतिमाएं बनाने के कारण उस पर तड़िक प्रकोप नहीं होता तथा वे मिथुन मूर्तियों को मंदिर में उत्कीर्ण कर जनता के लिए एक कौतूक पैदा करना चाहते थे। मिथुन मूर्तियों के निर्माण के पीछे अन्य कारण भी बताए जाते हैं। यहाँ मिथुन मूर्तियों के न होने से लगता है कि मिथुन दृश्यों का कौतुक जन सामान्य की निगाह में समाप्त हो गया था।

केशवराय मंदिर के पार्श्व में मंगला माता मंदिर
मंगला देवी मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा गायब है। इसके वितान पर 16 वाद्यकों का चित्रण है। संगीत में प्रयोग में आने वाले तत्कालीन वाद्यों का चित्रण शिल्प की समृद्धता का परिचायक है। इसके द्वार पर भी प्रतिहारों का अंकन है. इस मंदिर से थोड़ी दूर पर केशव राय का मंदिर है, इस मंदिर के गर्भ गृह में भी प्रतिमा नहीं है। गर्भ गृह के द्वार पर दंडधारी प्रतिहारों का ही अंकन है. इस मंदिर में कोई विशेष शिल्पकारी नहीं है। कहते हैं कि इन मंदिरों की प्रतिमाएं तत्कालीन राजा जयपुर ले गए थे। यहाँ पर हमने कुछ देर विश्राम किया। चौकीदार ने चर्चा के दौरान बताया कि यहाँ आर्कियोलाजी के 16 चौकीदार 4-4 की पाली में काम करते हैं। किसी को भी कभी कोई भूत प्रेत नहीं दिखाई दिया और न ही कोई आवाजें सुनाई दी। उसका कहना है कि लोगों ने इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रखी हैं। उसने बताया कि एक बार मंगला माता के मंदिर तरफ़ आते हुए उसे शेर मिल गया था। हाथ में लालटेन लिए दो चौकीदार साथ थे और मंगला माता के मंदिर तरफ़ जा रहे थे। अचानक झाड़ियों में से शेर निकल कर सामने आ गया। उनकी तो घिघ्गी बंध गई। थोड़ी देर बाद शेर चला गया। यहाँ भूत प्रेतों की बजाए जंगली जानवरों का अधिक डर है।

भानगढ के यात्री
इस किले में 5 द्वार हैं जिन्हें हनुमान द्वार, फ़ुलवारी द्वार, अजमेरी द्वार, दिल्ली द्वार तथा लुहारी द्वार के नाम से जाना जाता है। 5 शताब्दी पूर्व भानगढ़ के समीप से अजमेर और दिल्ली जाने वाला मार्ग रहा होगा। इसलिए इन द्वारों का दिल्ली और अजमेरी द्वार नामकरण किया गया होगा। लुहारी द्वार से संबंधित कथानक है कि इस द्वार के समीप लुहारों की बस्ती थी। इस स्थान पर आज भी लौह मल के बड़े बड़े ढेर पड़े हैं। राजा को आयुधों के निर्माण के लिए सिद्धस्थ लुहारों की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हे अलग बस्ती बनाकर बसाया गया होगा। इन लुहारों के वशंज समीप के गांवों में रहते हैं। गढ की प्राचीर के ये द्वार दूर-दूर स्थित हैं। भानगढ का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है, इसे एक दिन में देख पाना संभव नहीं। जंगली जानवरों की आमद के कारण यहाँ पर रात्रि में भ्रमण करने अनुज्ञा नहीं दी जाती तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रात्रि में किसी भी संरक्षित स्मारक में जाने की अनुमति नहीं देता। इसमें भानगढ़ की कोई विशेष बात नहीं है। 

चलते चलते यात्रा समापन  चित्र
भानगढ़ से भ्रमण कर हम अब वापस जयपुर की ओर चल पड़े। मुझे अलवर से खैरथल जाना था और अन्य साथियों को जयपुर। चौकीदार से चर्चा होने पर उसने बताया कि 5 बजे आश्रम एक्सप्रेस दौसा से खैरथल जाने के लिए मिल सकती है। अगर आप 5 बजे तक दौसा स्टेशन तक पहुंच गए तो खैरथल जाने के लिए यह बढिया साधन है। भानगढ से दौसा लगभग 22 किलो मीटर की दूरी पर है। प्रदीप जी ने जल्दी ही मुझे दौसा स्टेशन पहुंचा दिया। यहाँ से मैने खैरथल की टिकिट ली। क्योंकि अगले दिन मुझे अलवर का बाला किला देखना था। एक घंटे प्रतीक्षा करने के पश्चात आश्रम एक्सप्रेस प्लेट फ़ार्म पर लगी। अंधेरा हो चुका तथा थोड़ी ठंड भी बढ चुकी थी। यह समय राजस्थान में अच्छी ठंड का था और मैने छत्तीसगढ़ के वातावरण के हिसाब से एक पतली सी स्वेटर ले रखी थी। खैरथल पहुंचते तक सिकुड़ कर आधा रह गया था। ...... आगे पढ़ें ..........