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रविवार, 28 अगस्त 2016

जंगल, हाथी और किसान

प्राचीन काल से छत्तीसगढ के वन हाथियों की आदर्श शरण स्थली रहे हैं। विशेषकर सरगुजा अंचल हाथियों के लिए प्रसिद्ध रहा है। मान्यता है कि इंद्र के एरावत जैसे सुंदर गजों के स्वर यहां के वनों में गूंजने के कारण इस अंचल का नाम सरगजा (surgaja) लोक प्रसिद्ध हुआ। यहां के हाथियों का दर्शन लाभ मुझे भी हुए। अबकि बार की सरगुजा बाईक यात्रा के दौरान प्रतापपुर के घाटपेंडारी में 32 हाथियों के दल की उपस्थिति मिली।

उड़ीसा एव॔ झारखंड से हाथियों के आने-जाने का कारीडोर बना हुआ है । इन तीनो राज्यों मे हाथी स्वच्छन्द विचरण करते हैं। बार नवापारा के जंगल में उड़ीसा से आए हुए एक गजदल ने कुछ वर्षों से स्थाई निवास बना लिया है। जंगल कटने के कारण इनका रहवास क्षेत्र निरंतर छोटा होते जा रहा है। नित्य ही हाथियों और मनुष्यों की आपसी मुड़भेड़ के समाचार मिलते रहते हैं। जिनमें कभी हाथियों के हमले से मनुष्य मारे जाते है तो कभी मनुष्यों के हमले से हाथी। दोनो में आपसी मुड़भेड़ सतत जारी है।

खबर है कि जशपुर क्षेत्र के ठाकुरटोली ग्राम में एक हाथी खेत की सुरक्षा के लिए खींचे गये विद्यूत तारों की चपेट में आकर मारा गया। आज आदमी जीत गया, एक खेत की फसल बचाने में कामयाब रहा और एक हाथी की पुन: बलि हो गयी। विडम्बना है कि दोनों को ही वनवास करना है पर दोनो को ही एक दूसरे की उपस्थिति फूटी आंख भी नहीं सुहा रही। जिसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ग्रामीण मानते हैं कि हाथी उनके क्षेत्र का अतिक्रमण कर रहे हैं और जंगल हाथियों की बपौती है। निर्वहन करने कहां जाएगें?

झारखंड राज्य के प्रमुख सचिव सतपथी का कहना था कि वे छत्तीसगढ की सीमा पर हाथियों के आवा गमन के लिए उनके रास्ते मे प्राकृतिक जैसे दिखाई देने वाले सेतू का निर्माण कर रहे हैं जिससे हाथियों को रहवास एवं विचरण के लिए बड़ा क्षेत्र मिल जाएगा तथा आदमी और हाथियों की मुड़भेड़ कम हो जाएगी। छत्तीसगढ सरकार ने भी भी असम से हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूवा को बुलाया था। करोड़ों खर्च हुए पर वह भी कुछ विशेष नहीं कर पाई।

इस आपसी मुड़भेड़ में प्रतिवर्ष कईयों के प्राण हरण होते हैं। ऐसी स्थिति में वनांचल निवासियों को हाथियों को स्वीकार करना होगा तथा सह अस्तित्व मानकर निर्वहन करना होगा। तुम उनके रास्ते मे न आओ वे तुम्हारे रास्ते हे नहीं है। जब तक दोनो एक दूसरे की उपस्थिति स्वीकार नहीं करेगें तब तक दोनो का ही जीना कठिन है। अब हाथी मेरे साथी बनाकर ही जीने से समस्या का हल निकल सकता है।
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गुरुवार, 7 जनवरी 2016

प्राचीन नगरी कुशावती : कोसीर

रामगमन वन मार्ग के शोधार्थी यह मानते हैं कि दंडकवन में भगवान रामचंद्र ने अपने वनवास काल के 13 वर्ष व्यतीत किए। यह तो तय है कि प्राचीन काल में दंडकवन से ही होकर दक्षिणापथ मार्ग उत्तर से दक्षिण को जोड़ता था और इसी मार्ग का उपयोग तीर्थ यात्री तथा अन्य लोग करते थे। जहाँ मान्यता है कि तुरतुरिया के वाल्मीकि आश्रम में वैदेही सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था। वहीं एक जन मान्यता और है कि लव की नगरी लवण एवं कुश की नगरी कोसीर को माना जाता है। रायगढ़ जिले का एक बड़ा ग्राम कोसीर है, यह सारंगढ़ से 16 किमी और राजधानी रायपुर से सरायपाली, सरसींवा होते हुए लगभग 212 किमी की दूरी पर स्थित है। इस ग्राम से थोड़ी-थोड़ी दूरी बलौदाबाजार, रायगढ़ एवं जांजगीर जिलों की सीमाएं भी है, इस तरह इसे तिनसिया पर बसा हुआ ग्राम भी कह सकते हैं।


कोसीर से इंटरनेटीय परिचय करवाने वाले दो बंधू लक्ष्मीनारायण लहरे और नीलकमल वैष्णव हैं। ये दोनों कोसीर जैसे दूरस्थ ग्रामवासी होते हुए भी पत्रकारिता एवं साहित्य के क्षेत्र में जागरुकता के साथ सक्रीय हैं और प्रचार-प्रसार के सभी माध्यमों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी क्षेत्रों में इनकी सक्रियता दिखाई देती है। पिछले कई वर्षों से कुश की नगरी कोसीर देखने की महती इच्छा मन में थी। आखिर वह दिन आ ही गया जब मैं मार्च के महीने की अंतिम तिथियों में बाईक से कोसीर पहुंच गया। अभनपुर से कोसीर पहुंचने में मुझे लगभग 4 घंटे की लगातार बाईक रायडिंग करनी पड़ी। आखिर 12 बजे मैं नीलकमल वैष्णव जी के घर के सामने था और लक्ष्मीनारायण लहरे जी का घर भी इनके घर के सामने ही है।


दोपहर का भोजन लक्ष्मी नारायण जी के यहाँ करने बाद हम कोसीर भ्रमण पर निकले। यहां कौशलेश्वरी देवी का प्रसिद्ध स्थान है, जिसे स्थानीय भाषा में कुसलाई दाई कहते हैं। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है और लोग अपनी मानता को पूर्ण करने के लिए यहां पर "पूजा" भी देते हैं। हम मंदिर पहुंचे, ऊंचे अधिष्ठान पर कांक्रीट से निर्मित मंदिर के गर्भगृह में महिषसुर मर्दिनी की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के आस-पास मंदिर के प्रस्तर निर्मित भग्नावशेषों का निरीक्षण करने के पश्चात अनुमान है कि इस स्थान पर कलचुरी काल का 11 वीं 12 वीं शताब्दी में यहाँ प्रस्तर निर्मित मंदिर रहा होगा। जिसके ढह जाने के बाद इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
 
स्थानीय निवासियों का कहना है कि ग्राम के आस-पास खेत खार एवं तालाबों में भी प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष प्राप्त हो जाते हैं। जिस तरह कोसीर ग्राम टीले पर बसा हुआ है, उससे प्रतीत होता है कि इस टीले के नीचे प्राचीन बसाहट रही होगी। प्राचीन बसाहट पर नई बस्ती बसने के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं। कई स्थानों पर प्राचीन बसाहट को छोड़ कर उसके समीप ही नए गांव एवं बस्ती आबाद हो जाती हैं। वर्तमान कौशलेश्वरी मंदिर, प्राचीन अधिष्ठान पर ही निर्मित है, इस अधिष्ठान की ऊंचाई लगभग 10 फ़ुट होगी। इस मंदिर के समीप ही पश्चिम दिशा में ढुकूरिया तालाब तथा दक्षिण दिशा में जल कुंड है, जो इसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है। 

छत्तीसगढ़ अंचल में प्राचीन काल में मृदा भित्ति दुर्ग बनाने की परम्परा रही है। सुरक्षा के लिए परिखायुक्त दुर्ग बनते रहे हैं और इनकी संख्या आज 48 को भी पार कर गई है। वर्तमान में डमरु उतखनन में बौद्ध स्तूप प्राप्त हुए हैं, इससे इन मृदा भित्ति दुर्गों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कोसीर की सीमा में चारों तरफ़ कई तालाब हैं, जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि कभी यहां परिखायुक्त मृदा भित्ति दुर्ग रहा होगा। कालांतर में परिखा को मिट्टी से पाटकर खेत बना दिए गए होगें तथा उसका कुछ भाग बच गया होगा जिसका उपयोग सिंचाई एवं ग्रामवासियों की निस्तारी के लिए प्रयोग किया जाता है। कोसीर ग्राम में 56 एकड़ का बड़ा बंधवा तालाब भी है। जो सिंचाई का बड़ा साधन रहा होगा।

कोसीर में साहित्य रसिकों एवं बुद्धिजीवियों की भी कमी नहीं है, यहाँ के निवासियों में साहित्य के प्रति रुचि एवं संस्कार होने के कारण एक साहित्यकारों की संस्था भी है, जिसके द्वारा मंदिर परिसर में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में स्थानीय कवियों द्वारा कविता पाठ किया गया। यह काव्य गोष्ठी लगभग 4 घंटे तक चली, जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार तीरथ राम चंद्रा, नीलम प्रसाद आदित्य, सुनील एक्सरे, लक्ष्मीनारायण लहने, नीलकमल वैष्णव के साथ मैने भी कविता पाठ किया। शाम को सारंगढ़ का दौरा किया गया। रात्रि विश्राम कोसिर में करने बाद अगले दिन हम गिरौदपुरी धाम के दर्शन के लिए रवाना हुए। (नोट- सभी चित्र लक्ष्मीनारायण लहरे की वाल से)