आज एक अक्तूबर है, अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जा रहा है सरकारी तौर पर, अख़बार विज्ञापनों से अटे पडे है,
क्या अब ऐसा समय आ गया है कि हमें अपने बुजुर्गों को याद करने के लिए साल में एक दिन निश्चित करना पडे?
एक आदमी जो अपनी पूरी जवानी हवन कर अपने परिवार कि बगिया को विभिन्न झंझावातों एवं सामाजिक कठिनाईयों का सामना करते हुए सींचता है और बुढापा आने के बाद उसे किनारे कर दिया जाता है, जैसे इस घर को बसाने में उसका कोई योगदान ही नही है, ये कैसी विडम्बना है?
जो घर का मालिक था वो ही चौकीदार हो जाता है. बड़ी शरम कि बात है. आज का युवा अपने इस कर्त्तव्य से क्यों विमुख होते जा रहा है?
जिसे अपने कर्त्तव्य कि याद दिलाने के लिए सरकारी तौर पर कानून बनाना पडे या वृद्धजन दिवस मनाना पडे.
ये वही देश है जहाँ राम ने अपने वृद्ध पिता का आदेश मान कर १४ बरस वन का वास किया था, ये वही देश है जहाँ श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को कांवर में बैठा कर तीर्थ यात्रा के लिए ले जाता है, कहाँ गई ये हमारी संस्कृति?
कहाँ गयी वो हमारी सांस्कृतिक विरासत जो हमें निरंतर अपने कर्तव्यो कि याद पित्र ऋण -ऋषि ऋण एवं राष्ट्र ऋण के रूप में निरंतर दिलाती थी.?
शायद हम पश्चिम की आधुनिकीकरण की आंधी में कुछ ज्यादा ही बह गए अपने संस्कारों को भी भूल बैठे.इसका इलाज क्या है?
यह विषय मै आप लोगों पर छोड़ता हूँ. हाँ मुझे "लगे रहो मुन्ना भाई"फिल्म का सेकंड इनिग होम जरुर याद आ रहा है.