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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

बेटी की किलकारी -- श्रुति का जन्म दिन-----ललित शर्मा


कल मेरी पुत्री श्रुतिप्रिया का जन्म दिन था. तीन साल पहले मैं बचपन के मित्र कंवर लाल के गाँव गया. जोधपुर से डेचू और डेचू से चलकर बाप तहसील में कुशलावा उसका गाँव है. मेरे अचानक पहुचने पर वह बहुत खुश हुआ. उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं उसके गाँव तक पहुच सकता हूँ. बस उसे तो यही लगी रही कि कहाँ बैठों और क्या खिलाऊं. मैं उसे मना करता रहा और वह मनुहार करता रहा. बरसों के बाद दोनों मिले थे.खूब बातें हुयी,  थोड़ी देर बाद वह उठा और एक अख़बार का फटा हुआ पन्ना लेकर आया, जिसे उसने जतन से संभाल रखा था. उसमे एक कविता थी. जिसे मुझे पढ़ कर सुनाया. मैंने उसे वह कविता लिख कर देने को कहा. उसने मुझे कविता लिख दी. 


कल पुराने पैड के भीतर से वह पन्ना गिरा. कंवरिया की यादों ने मुझे घेर लिया. तुरंत उसे फोन लगाया और बात की. उसने पूछा कि आज कैसे याद आई? मैंने नहीं बताया. हाल-चाल और खैरियत लेकर फोन काट दिया. श्रुति के जन्मदिन पर वह कविता प्रस्तुत है. इसके रचयिता का नाम मुझे पता नहीं. किसी को पता हो तो  अवश्य बताएं. उनका नाम एवं लिंक दिया जायेगा..... 

कन्या भ्रूण अगर मारोगे, माँ दुर्गा का श्राप लगेगा.

बेटी की किलकारी के बिन, आँगन-आँगन नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, वह घर सभ्य नहीं होता 
बेटी के आरतिए के बिन, पावन यज्ञ नहीं होता है.
यज्ञ   बिना बादल रुठेंगे, सूखेगी वर्षा की रिमझिम
बेटी की पायल के स्वर बिन, सावन-सावन नहीं रहेगा 
आँगन-आँगन नहीं रहेगा, आँगन-आँगन नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, उस घर कलियाँ झर जाती हैं.
खुशबु निर्वासित हो जाती ,गोपी गीत नहीं गाती हैं.
गीत बिना बंशी चुप होगी, कान्हा नाच नहीं पायेगा.
बिन राधा के रस न होगा, मधुबन मधुबन नहीं रहेगा
आँगन आँगन नहीं रहेगा, आँगन आँगन  नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, उस घर घड़े रीत जाते हैं
अन्नपूर्ण अन्न न देती, दुरभिक्षों के दिन आते हैं
बिन बेटी के भोर अलूणी,थका थका दिन साँझ बिहूणी
बेटी बिना न रोटी होगी, प्राशन प्राशन नहीं रहेगा    
आँगन आँगन नहीं रहेगा, आँगन आँगन  नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, उसको लक्ष्मी कभी न वरती
भव सागर के भंवर जाल में, उसकी नौका कभी न  तरती
बेटी के आशीषों में ही, बैकुंठों का बासा होता
बेटी के बिन किसी भाल का, चन्दन चन्दन नही रहेगा
आँगन आँगन नहीं रहेगा, आँगन आँगन  नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, राखी का त्यौहार न होगा
बिना रक्षा बंधन भैया का, ममतामय संसार न होगा
भाषा का पहला सवार बेटी, शब्द शब्द में आखर बेटी 
बिन बेटी के जगत न होगा, सर्जन सर्जन नहीं रहेगा 
आँगन आँगन नहीं रहेगा, आँगन आँगन  नहीं रहेगा 

जिस घर बेटी जन्म न लेती, उसका निष्फल हर आयोजन
सब रिश्ते नीरस हो जाते, अर्थहीन सारे संबोधन 
मिलना-जुलना आना-जाना, यह समाज का ताना बाना
बिन बेटी कैसे अभिवादन, वंदन वंदन नहीं रहेगा
आँगन आँगन नहीं रहेगा, आँगन आँगन  नहीं रहेगा 

NH-30 सड़क गंगा की सैर