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बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

निठल्लाई माने सदा सप्ताहांत

प्ताहांत याने संडे का दूनिया को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। शनिवार से ही सप्ताहांत मनाने की तैयारी शुरु हो जाती हैं। पश्चिमी देश चाहे नाच-गा कर मस्ती करके संडे मनाएं या समुद्र के किनारे धूप सेकते हुए इसका आनंद ले। लेकिन भारत में इसे मनाने का तरीका कुछ अलग ही है। जितना काम सप्ताह के अन्य दिनों में व्यक्ति करता है उससे दुगना काम सप्ताहांत को करने पड़ते हैं। शनिवार की रात को ही सारे काम नोट करवा दिए जाते हैं और सुबह होते ही कामों की सूची सामने होती है। दफ़्तरों के काम तो भले ही इस दिन बंद रहते हैं पर घरेलू कामों की जंग का मुहाना खुल जाता है। बाजार से सामान लाना, घर के लॉन की (अगर हो तो) साफ़ सफ़ाई, गाड़ी की धुलाई, इलेक्ट्रानिक और इलेक्ट्रिकल सामानों की रिपेयरिंग, रिश्तेदारों एवं मित्रों का उलहाना उतारने के लिए उनसे भेंट मुलाकात इत्यादि अनेक कार्य सप्ताहांत के सिर पर सवार होकर आते हैं। 

रवि का उदय होना तो नित्य है लेकिन सप्ताह में एक दिन ही रवि के नाम समर्पित होने से रविवार हो जाता है। बस इसी दिन घर-गृहस्थी को संभालना ही संडे का फ़ंडा है। नौकरी पेशा लोगों के साथ व्यापरियों में भी अब संडे का महत्व बढते जा रहा है। पहले तो लाला जी सप्ताह में सातों दिन दुकान खोले बैठे रहते थे।उनकी  मान्यता थी कि ग्राहक एवं मौत का भरोसा नहीं कब आ जाए। क्योंकि दोनो का ही इंतजार करना पड़ता है। अब बदलती पीढी के साथ संडे मनाने का तरीका बदलते जा रहा है। नए लाला जी सप्ताह में छ: दिन खूब भाग दौड़ करके कमाते हैं और सप्ताहांत याने संडे को पिकनिक मनाने के लिए यार दोस्तों या परिवार के साथ किसी स्थान पर निकल जाते हैं। 6 दिन कमा कर एक दिन खर्च करने की परिपाटी बनती दृष्टिगोचर हो रही है।  

संडे क्या होता है, उसे पता है जिसने कभी संडे का मजा चखा हो, जिसके जीवन में एक बार तो संडे आया हो। वरना देश की अधिकतर आबादी का यह हाल है कि जिस दिन काम नहीं मिला वह दिन संडे हो जाता है। खैर संडे का महत्व वही जानता है  जो सप्ताह में 6 दिन खटता है, रोजी-रोटी के पीछे भागता है। रोज रोटी के लिए दस-बीस गालियाँ खाता है। फ़िर सप्ताह में एक दिन उसे आराम करने का मिलता है। कुछ ऐसे भी लोग हैं वे चाहे जब ईशारा भर कर दें तभी संडे हो जाता है। उनके प्रभुत्व एवं प्रभाव से सप्ताह के अन्य दिन संडे की आगवानी करते हुए लिए अपना स्थान छोड़ देते हैं । क्यों न छोड़े वी आई पी का हक है जिस दिन को चाहे संडे बना दे। जबरा को तो सलाम करना ही पड़ता है। 

महानगरों के निवासी अपने मित्रों से संडे पर ही मिलने आने का आग्रह करते हैं। अन्यथा उनके पास समय नहीं रहता। कईयों का तो यह हाल है कि संडे के दिन ही वे अपने बच्चों की शक्ल देख पाते हैं। रात गुजारने की लिए घर एक सराय बनकर रह गया है। मेरे एक घनिष्ट मित्र ने मुझे यह कर चौंका दिया था कि संडे की हो मुंबई आना, अन्यथा मैं तुम्हे समय नहीं दे पाऊगां। महानगरों ने जीजीविषा ने व्यक्ति की संवेदनाओं को मार दिया है। रिश्ते-नाते सिर्फ़ औपचारिकता बन कर रह गए हैं। अगर कोई एक व्यक्ति भी घर पहुंच जाता है तो वह भारी हो जाता है। दूसरे दिन से घर मालिक का चिंतन शुरु हो जाता है और  मन ही मन "अतिथि कब जाओगे "मंत्र का जप शुरु कर देता  है।

हमें भी संडे महत्व तब पता चला जब जीवन में पहली बार संडे आया। अन्यथा सप्ताह के बाकी दिन भी हमारे लिए संडे जैसे ही थे। नहीं तो लोगों से पूछना पड़ता था कि आज कौन वार है भाई? ऐसी स्थिति तब पैदा होती है जब व्यक्ति अत्यधिक व्यस्त हो या पूरा  निठल्ला हो। निठल्ला नामक इस विशिष्ट प्रजाति के लिए हर दिन संडे हैं। इनकी जिन्दगी में कभी बाकी 6 दिन आते ही नहीं है। आएं भी कैसे? बाकी दिनों की आने की हिम्मत ही नहीं होती। अगर ये वक्त बेवक्त किसी के घर चले जाएं तो उसका भी संडे मनवा देते हैं। इनके संडे की दादागिरी से सप्ताह के छहों दिन भय खाते हैं। कौन निठल्लों से पंगा ले तथा पंगा लेकर अपने सप्ताह के बाकी दिनों का सत्यानाश करे। संडे हो या मंडे, रोज गाड़ो निठल्लाई के झंड़े इनका स्वघोषित नारा है। इतना तो तय है सप्ताह के सातों दिनों का राजा संडे को माना ही जा सकता है। क्यों है कि नहीं?

(कैरिकेचर गुगल से साभार)