रविवार, 8 नवंबर 2009

ठग तरह तरह के लूटन को तैयार

हम अंधविश्वास से ग्रसित समाज में व्याप्त कुरीतिओं की चर्चा कर रहे हैं. जो घटनाएं वास्तविक जीवन में घटी हुयी हैं और जिनका सम्बन्ध हमारे जीवन से है. ये सभी घटनाएँ हमारे जीवन में घटित होती रहती हैं. हम इनसे जूझते रहते हैं और जब हम लुटपिट जाते हैं तो भी नही चेतते. हमें इनसे सबक लेकर इसं अंधविश्वासों एवं कुरीतियों से पीछा छुडाना चाहिए. 

पिछले आलेख पर प्रतिक्रियाएँ आई हैं वो आपके समक्ष प्रस्तुत  हैं - संगीता पुरी ने कहा… बिना आग के चावल पकाने की मुझे जानकारी नहीं मिली .. अब अगली कडी में इसका इंतजार रहेगा .. ये लोग वास्‍तव में ठग होते हैं .. ये सिर्फ साधु बनकर ही नहीं .. कई अन्‍य तरीकों से भी घूमा करते हैं .. कभी सोने चांदी साफ करने के बहाने ये लोग सोने चांदी को साफ कर देते हैं .. तो कभी इन्‍हे साफ करने का पाडडर बेचते ये लोग नजरों के सामने से सोने चांदी को गायब कर देते हैं .. कभी खुदाई में गडा हुआ कीमती सामान बताते हुए नकली सामानों को चुपके चुपके महंगे दामों में बेच जाते हैं .. उनके अचानक गायब होने के बाद ही लोगों को मालूम हो पाता है‍ कि वे ठगे गए हैं .. वहां शायद हिप्‍नोटाइज करने का सहारा लेते हैं .. उनके पोल को भी खोले जाने की आवश्‍यकता है .. वैसे साधु बनकर ठगी करना सबसे आसान है .. इसलिए इसका अधिक सहारा लेते हैं !!

गिरिजेश राव ने कहा… इसीलिए कहा जाता है - मुच्छड़ से पंगा, ना बाबा ना।

Ashish Shrivastava ने कहा… जय हो !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा… हिन्दूस्तान में ऎसे काले/पीले/नीले/हरे पंडितों और रहमान अली/सुलेमान अली/मियाँ मलिक/बाबा बंगाली जैसे बाबाओं की कोई कमी नहीं...एक ढूंढों,हजार मिलेंगें...वैसे ढूंढने की भी कोई जरूरत नहीं,ये लोग खुद आपको ढूंढ लेंगें :)किस्सा बढिया सुनाया आपने...लेकिन बिना आग के चावल पकने की जानकारी छुपा गए... शायद अन्त में देंगें जैसे कि मजमे वाले करते हैं...देखने वाला बेचारा इसी इन्तजार में खडा रहता है कि बाबा जी बस अभी बताने ही वाले हैं :)

अब हम आगे चलते हैं कि लोग ठगी के नए नए तरीके इजाद करके कैसे लुटने का काम करते है. अब हम चलते हैं. एक बार कुछ साल पहले हमारे ३६ गढ़ में अकाल पड़ गया. 

पहले तो वर्षा नहीं हुई, फिर  जब फसल काटने का टाइम आया तो जब फसल कटी हुई खेत में पडी थी तो कई दिन लगातार वर्षा हो गई जिससे कटी कटाई फसल बर्बाद हो गई, मेरे हाथ ही स्वयं १२ एकड़ में ३२ बोरा धान ही हाथ आया. कहने का मतलब ये है कि इस अकाल एवं अवर्षा से सभी परेशान थे. 

हमारे गांव में एक राइसमिल वाला मारवाडी सेठ है. उसके यहाँ एक भगवा कपडे वाले संत का अवतरण हुआ. सेठ ने उसकी बड़ी खातिरदारी की. कई दिनों तक उसने सेठ की गद्दी पर डेरा डाल रखा था और सुबह शाम गांव में घूम  कर सबसे घरों घर जाकर मिलता था और फर्राटे दार अंग्रेजी में बात करता था. लोग भी उसके चक्कर में आ रहे थे. कि बाबा जी बहुत पढा लिखा है. अंग्रेजी में ही बात करता है. 

एक दिन शाम के समय वो मेरे घर पर पधारे.हमारे एक मित्र और बैठे थे वो गायत्री परिवार से सम्बंधित हैं. हमने उठ कर उनका अभिवादन किया. उचित स्थान प्रदान किया. 

अब बाबाजी ने अपनी मंशा मेरे सामने जाहिर करना शुरू किया, महाराज इस इलाके में वर्षा नहीं हुयी है और मेरा इरादा है कि नगर में वृष्टि यज्ञ किया जाये जिससे यहाँ वर्षा हो जाये और अकाल ग्रस्त क्षेत्र को इसका लाभ मिले , 

आपको ही इस कार्य के लिए उपयुक्त पात्र समझ कर सेठ जी ने आपके पास भेजा है. इस लिए आप मेरे निवेदन पर विचार कीजिये कि इस यज्ञ को हम किस तरह सम्पन्न करेंगे और व्यवस्था में कितना खर्च आएगा? 

उनकी बातें सुन कर पहले तो मैंने अपने मित्र की ओर देखा कि उनका चहरे के क्या हाव भाव हैं. थोडा उसे पढने की कोशिस की. मैं समझ गया था सेठ जी ने अपना पीछा छुडाने के लिए इसे मेरे पास भेज दिया. 

मैंने कहा कि " बाबाजी आपका काम तो हो जायेगा-और वर्षा होने की भी १००% गारंटी है. तो बाबा जी बोले मुझे तो पहले ही मालूम था कि सेठ सही ठिकाने पर भेज रहे हैं. खर्चा कितना आएगा ये बताईए जल्दी से जल्दी क्योंकि हमारे पास समय भी काम है और गांव में पैसा भी इक्कट्ठा करना है यज्ञ के लिए. 

अब मैं पूर्ण रूप से उसकी नियत समझ गया था. मैंने कहा कम से कम २० लाख रूपये और अधिक से अधिक तो चाहे आप पूरी सरकार का खजाना खुलवा कर लगा दो जैसी आपकी मर्जी. 

वो बोले ये तो बहुत जयादा है कम में काम चलाओ. मैंने कहा कम में काम नही चलेगा. तो उसने कहा कि आप मुझे अथर्ववेद दे दो, मुझे सेठ जी ने बताया है कि आपके पास सब मिल जायेगा, और किसी दुसरे यज्ञ कर्ताओं का इंतजाम करता हूँ मुझे संस्कृत नहीं आती इस लिए समस्या हो रही है. नहीं तो मै स्वयं ही यज्ञ का आयोजन कर लेता. हाँ लेकिन मुझे मंत्र शक्ति से अग्नि प्रज्ज्वलित करना आता है.

मैंने मन ही मन सोचा कि अब ये फंसा अपनी आरती उतरवा कर ही जायेगा" मैंने कहा" ये तो बहुत चमत्कार की बात है महाराज, इतने गुणी महापुरुष के दर्शन पाकर तो हम कृतार्थ हो गये. ये तो हम बडभागी हैं जो आप हमारे ड्योढी पर आये और अपने चरणरज से हमारा घर पवित्र किया. 

मेरे द्वारा प्रशंसा सुन कर बाबाजी गद-गद हो गये. फिर मैं पूछा महाराज "अग्नि, मंत्र में है या समिधाओं में?"

तो उसने कहा " मंत्र में" 

मैंने कहा कि अथर्ववेद के कौन से मंडल के कौन से सूक्त के कौन से मंत्र में यह शक्ति निहित है. मुझे भी बताएं.

तो उसने कहा कि मैंने अपनी डायरी में लिख रखा है सब, लेकिन मुझे मंत्र तो जबानी याद है. 

मैंने कहा" महाराज अग्नि का एकमात्र काम है जलाना और ये दोस्त और दुश्मन नही पहचानती जो इसकी लपटों के लपेटे में आ जाता है उसे जला कर राख कर देते है. 

बाबा जी बोले आप सही बोल रहे है. तो मैंने कहा महाराज जिस मंत्र में अग्नि है उसका उच्चारण तो आपको मुह से ही करना पड़ेगा, उसके बाद ही तो यज्ञ की अग्नि प्रज्ज्वलित होगी. 

उन्होंने कहा सही कह रहे हो. 

मैंने  कहा -"तो महाराज जब मंत्र आपके मुंह से निकलेगा तो सबसे पहले आपके मुंह को जलाएगा, क्योंकि उसमे तो अग्नि का वास है." 

अब बाबाजी समझ चुके थे कि वो मेरे शब्द जाल के चक्कर में फँस चुके है. मैंने कहा "महाराज आपके तो मंत्रों में शक्ति है अग्नि प्रज्ज्वलित करने की, मैं तो बिना मुंह खोले-बिना किसी मंत्र का उच्चारण किए ही सिर्फ एक आहुति से ही अग्नि प्रज्ज्वलित कर सकता हूँ. 

अब वो चुप हो गये -चलने कि तैयारी करने लगे. मैंने कहा महाराज सेठ जी ने जान बुझ कर आपको मेरे पास भेजा है. 

तो मेरे मित्र बोले - महाराज अब आप जाइये और इस यज्ञ की कही पर चर्चा भी मत कीजिये. नही तो आपके लिए अनर्थ हो जायेगा. अब बाबाजी चल पडे. 

तब मेरे मित्र ने बताया कि ये हमारे गायत्री मंदिर में भी गये थे और इनकी योजना थी कि लाख दो लाख रुपया नगर के सम्मानित नागरिकों का नाम लेकर इक्कट्ठा करते और छोटा मोटा यज्ञ करवा कर बाकी पैसा ले कर चम्पत हो जाते-आपने शुरुवात में ही इनकी योजना फेल कर दी. 

नए-नए भेष बना कर, नई -नई युक्तियों का अविष्कार करके लोगों का धन लुट कर अपना धन्धा चलाने के लिए ढोंगी लोग आते हैं -अपनी सतर्कता से ही इनसे बचा जा सकता है. 

शनिवार, 7 नवंबर 2009

काले तांत्रिक से महामुकाबला

अभी हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे हैं. हम इस ढोंगी तांत्रिको एवं गरीब बेसहारा औरतों को ही "टोनही" घोषित करने के कारणों का विश्लेषण करते हुए आगे बढ़ रहे हैं,.पिछली पोस्ट पर कुछ प्रतिक्रियाए  आई हैं, हम उनका यहाँ उल्लेख कर रहे हैं

.महफूज़ अली ने कहा… आज तुम जितना भी पैसा दोगे तुम्हे दुगनाकर दूंगा. लोंगों ने विश्वास करके उसे पैसे लाकर दिये. और बाबा रात को ढाई लाख रुपया लेकर चंपत हो गया. जब दुसरे दिन लोगों को नही मिला तो पुलिस थाने में रिपोर्ट की गई, मिडिया में समाचार बना, और वो चमत्कारी तांत्रिक बाबा अंतरध्यान हो गया, आज तक नही मिला है.उसकी तलाश जारी है......................... jee....aise bahut se case hamare lucknow mein bhi ho chuke hain.........achcha laga ......

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा… अंधविस्वास का भंडाफोड़ बहुत अच्छा .....

.ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा… बाबा जी का काम हुआ, फिर भला वे वहां क्यूं रूकते?

संगीता पुरी ने कहा… ग्रामीणों की अज्ञानता और भोलेपन का हमेशा ही नाजायज फायदा उठाया जाता है .. उन्‍हें जागरूक करने की आवश्‍यकता है .. पर वह बिना आग के चावल बनाता कैसे था ?

एक दिन की बात है मै रायपुर शहर में किसी काम से घूम रह था, लेकिन जिससे काम था वो कहीं चला गया था, अब शाम को मिलता। अब क्या करूँ?  

टाइम पास करना था तो मै टाटीबंध टांसपोर्ट नगर में चला गया, वहां पर एक मित्र का मोटर बाडी बनाने का कारखाना है, सोचा उससे मुलाकात हुए बहुत दिन हो गए है. आज टाइम है मिल के कुछ गप-शप हो जायेगी और मुलाकात भी जायेगी. 

मै वहां पहुच गया. कारखाने में काम चल रहा था. हमारे मित्र के साथ कुछ लोग और भी बैठे थे. उसमे काला सा पीले कपडे पहने एक आदमी अलग ही दिख रह था. उसने मेरे बैठते ही मेरा नाम पूछा. मैंने उसे बताया. फिर उसने मुझे कहा कि यहाँ ट्रासपोर्ट नगर में लोग मुझे "काला पंडित" के नाम से जानते हैं और मै तांत्रिक हूँ, किसी कोई भी समस्या हो उसका हल मेरे पास है. यहाँ के सारे सरदार (ट्रक वाले) मुझे जानते हैं और मेरा यही धंधा है.

मैंने कहा "बहुत अच्छा हुआ महाराज,आपके दर्शन हुए। मैं धन्य हो गया, आपके दर्शन ही मुझे मिलने थे इसलिए मैं यहाँ तक पहुच पाया, नहीं तो मुझे और कहीं ही जाना था. 

वह बड़ा खुश हुआ और अपनी विद्या की चर्चा करने लगा कि वो तंत्र-मंत्र से क्या-क्या कर सकता है और किसका-किसका उसने काम सुधारा है, मुझे सब बताने लगा.

मैंने कहा "महाराज ये सब मुझे बताने की क्या जरुरत है. मैं तो यह सब नहीं मानता. 

वो गुस्से में आ गया और मुझसे बोला" तुम क्या समझते हो? मैं तुम्हे तुम्हारे ठिकाने से उड़ा दुंगा, तुमको मेरे से उलझना बहुत ही महंगा पड़ेगा." 

हमारी ये बातें वहा और लोग भी सुन रहे थे. जब वो गरम होने लगा तो मित्र बोले "छोडो ना महाराज आप क्यों फालतू ललित जी से उलझ रहे हो. 

वो बोला " इसने मेरी तंत्र विद्या पर संदेह किया है मैं इसको तो अब उड़ा कर छोडूंगा. 

अब मुझे उससे मजाक करके उसके क्रोध और बढ़ाने की इच्छा हो गई, देखता हूँ ये क्या करता है? ये सोच के मैं बोला " महाराज! मुझे उडाने के लिए पंख तो लगाना पड़ेगा? बिना पंख के मैं कैसे उड़ सकता हूँ? मेरे को जल्दी से ये विद्या सिखा दो, आज कल पैट्रोल भी बहुत महंगा हो गया है.मैं घर से उड़ कर सीधा रायपुर आ जाये करूँगा मेरा किराया भाडा भी बच जायेगा." 

ऐसा सुनते ही वह उबल पड़ा-"मजाक करता है मेरे साथ, अभी तेरे को दिखाता हूँ. 

मैंने वहां पर काम कर रहे सभी कारीगरों और अन्य आदमियों को बुलाया और बोला " यारों ये महाराज अब मेरे को उडाने वाला है तुम लोग भी देख लो, नहीं तो ये चमत्कार फिर देखने नहीं मिलेगा." और उस महाराज से बोला" दिखा महाराज मैं भी आज तेरी तंत्र शक्ति का चमत्कार देखना चाहता हूँ. तू तो मुझे उडाने की बात कर रह है. मैं तो ६ फुट का हूँ इतनी तकलीफ मत कर कहीं तेरा ज्यादा तेल जल जाये मुझे उडाने में तू एक काम कर अपने मंत्र शक्ति से मेरे हाथ का ही एक बाल हिला के दिखा दे सबके सामने तो मैं तुझे मान लूँगा." 

वो मुझ पर और भी गरजने लगा, लाल आँखें करके. मित्र ने देखा कि कहीं मामला बिगड़ ना जाए सोच के उस महाराज को बोले " क्यों तुम फालतू काम कर रहे हो, मेहमान मुझसे मिलने आया है और तुम उसके ही पीछे पड़ गए, आज के बाद मेरे गैरेज में मत आना, 

महाराज, मित्र पर ही चढ़ बैठा. बोला "तुम भी मेरा अपमान कर रहे हो. तुम्हे भी ठिकाने लगा दूंगा". 

मुझे भी अब क्रोध आने लगा था. मैंने एक लड़के को बुलाया.और दो सौ रूपये देकर बोला "जा दो किलो तेल और आधा किलो चावल लेकर आना, आज इस महाराज का बैंड बाजा कर ही जाऊंगा. तुम भी तमाशा देखना और आज टाटीबंध में ये रहेगा या मैं. आज हो जाने जंतर-मंतर। अब कौन जीतता है तुम ही देखना". 

तमाशबीनों  की भीड़ लगने लगी थी. मैंने कहा- महाराज मैंने तेल मंगवा लिया है. तुमको उबलते हुए तेल से अपने हाथ पैर धोने हैं और फिर उबलते तेल की कडाही अपने सर पर डाल कर नहाना है. लेकिन कहीं पर जलना नही चाहिए। अपना तंत्र मंत्र चला कर बच जाना, अगर नही बच सका तो मैं तुम्हे गरमा-गरम तेल से अभी सबके सामने नहा कर बताऊंगा। उसके बाद तुम इस टाटीबंध में मुझे कभी नजर नहीं आना. अगर ये नहीं करना चाहता तो दूसरा रास्ता भी है मैंने अभी जो चावल मँगवाया है. उसे बिना आग जलाये पका कर दिखाना मंत्र से,  अगर नहीं पका पाया तो मैं सबके सामने पका कर दिखाऊंगा। जो मंजूर है वो बोल दे। उसके बाद तू क्या मुझे उडाएगा मैं तुझे यही से उड़ा कर सबके सामने दिखाता हूँ बोल-मैंने कहा।. 

अब उसकी सिट्टी पिट्टी गोल हो गई. मित्र बोले "महाराज मैं आपको पहले से ही बोल रहा हूँ कि तुम इनके साथ मत उलझो, ये भी बहुत बड़े तांत्रिक हैं तुम अब अपने रोजी रोटी का भी सत्यानाश कर लोगे" इतनी देर में वो कारीगर तेल लेकर आ गया था. 

मैंने उसे गरम करने कहा. और जोर से बोला" तेल को एकदम गरम करले उसमे से धुंवा निकालना चाहिए उसके बाद इस महाराज को पकड़ कर इसके सर पर डालना है" 

इतना सुन कर वो इधर-उधर तांक- झांक करने लगा. मैंने कहा इसे आज छोड़ना नही है और ये नहीं जला तो इसको मैं अपना गुरु बना लूँगा. चरण पकड़ लूँगा. 

बात बढ़ते देख कर वो अब भागने की तैयारी करने लगा. मैं बोला इसका पकड़ कर रखो भागने मत देना, आज इसका भूत उतरना ही पड़ेगा, अब उस तांत्रिक ने सोचा कि आज तो फँस गए तो दुकानदारी भी चौपट हो जायेगी और गरम तेल से तो जलना ही पड़ेगा। उसने एक नया नाटक चालू किया, वह जोर जोर से रोने लगा,  

मेरे पैर पकड़ने लगा "नहीं-नहीं ऐसा मत करो मेरे उपर तेल मत डालो, मेरे उपर तेल मत डालो, मेरे पैर छोड़ ही नही रहा था। 

मैंने कहा "पहले ही मै तुम्हारे को कह रह था कि मेरे से मत उलझ अपनी दुकानदारी कर, लेकिन तू तो मेरे को मंत्र से उडाने(मारने) की धमकी दे रहा था। अब चला तेरा मंत्र" 

वो पैर छोड़ नहीं रहा था। मुझे माफ़ कर दो,  मुझे माफ़ कर दो। वहां उपस्थित बाकी लोग उसका तमाशा देख रहे थे. तभी मित्र बोले - छोड़ दो ना, इसको सबक मिल चूका है। 

मैंने कहा नहीं, अभी तो इसका भूत उतारना है। फिर सब बोलने लगे छोड़ दो ना। तो मैंने एक शर्त पर उसे छोडा कि आज के बाद यहाँ इस इलाके में नज़र मत आना। उसने कहा नहीं आउंगा मैं ये इलाका ही छोड़ दूंगा। 

ऐसा बोल के वो अपनी सायकिल उठा कर ऐसे भगा जैसे उसके पीछे भूत लग गए हों. कहीं मेरे को फिर से ना पकड़ ले.