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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

मैकल सुता रेवा एवं अमरकंटक

अमरकंटक मेकलसुता रेवा का उद्गम स्थल है, यह पुण्य स्थली प्राचीन काल से ही ॠषि मुनियों की साधना स्थली रही है। वैदिक काल में महर्षि अगस्त्य के नेतृत्व में ‘यदु कबीला’ इस क्षेत्र में आकर बसा और यहीं से इस क्षेत्र में आर्यों का आगमन शुरू हुआ। 

वैदिक ग्रंथों के अनुसार विश्वामित्र के 50 शापित पुत्र भी यहाँ आकर बसे। उसके बाद, अत्रि, पाराशर, भार्गव आदि का भी इस क्षेत्र में पदार्पण हुआ। नागवंशी शासक नर्मदा की घाटी में शासन करते थे। मौनेय गंधर्वों से जब संघर्ष हुआ तो अयोध्या के इच्छ्वाकु वंश नरेश मान्धाता ने अपने पुत्र पुरुकुत्स को नागों की सहायता के लिए भेजा जिसने गंधर्वों को पराजित किया। नाग कुमारी नर्मदा का विवाह पुरुकुत्स के साथ कर दिया गया।

इसी वंश के राजा मुचुकुंद ने नर्मदा तट पर अपने पूर्वज मान्धाता के नाम पर मान्धाता नगरी स्थापित की थी। यदु कबीले के हैहयवंशी राजा महिष्मत ने नर्मदा के किनारे महिष्मति नगरी की स्थापना की। उन्होंने इच्छवाकुओं और नागों को पराजित किया। कालांतर में गुर्जर देश के भार्गवों से संघर्ष में हैहयों का पतन हुआ। उनकी शाखाओं में तुण्डीकैर (दमोह), त्रिपुरी, दशार्ण (विदिशा), अनूप (निमाड़) और अवंति आदि जनपदों की स्थापना की गयी। महाकवि कालिदास इसी अमरकंटक शिखर को अपने अमर ग्रंथ मेघदूत में आम्रकूट कहकर सम्बोधित करते हैं।

अमरकंटक का में कलचुरी राजा कर्ण ने मंदिरों का निर्माण कराया था, इन्हें कर्ण मंदिर समूह कहा जाता है। कर्ण मंदिर समूह तीन स्तरों पर है। परिसर में प्रवेश करते ही पंच मठ दिखाई देता है। इसकी शैली बंगाल एवं असम में बनने वाले मठ मंदिरों जैसी है। इससे प्रतीत होता है कि यह स्थान कभी वाममार्गियों का भी साधना केन्द्र रहा है। इस तरह के मठों में अघोर एकांत साधनाएँ होती थी। पंच मठ के दाएँ तरफ़ कर्ण मंदिर एवं शिव मंदिर हैं। शिवमंदिर में श्वेतलिंग है तथा इससे समीप वाले मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। 

इन मंदिरों के सामने ही जोहिला (नदी) मंदिर एवं पातालेश्वर शिवालय है। इसके समीप पुष्करी भी निर्मित है।, इन मंदिरों से आगे बढने पर उन्नत शिखर युक्त तीन मंदिरों का समूह है जिनका निर्माण ऊंचे अधिष्ठान पर हुआ है। यहाँ भी कोई प्रतिमा नहीं है तथा द्वार पर ताला लगा हुआ है। इन मंदिरों का निर्माण बाक्साईट मिश्रित लेट्राईट से हुआ है। 

पातालेश्वर मंदिर, शिव मंदिर पंचरथ नागर शैली में निर्मित हैं। इनका मंडप पिरामिड आकार का बना हुआ है। पातालेश्वर मंदिर एवं कर्ण मंदिर समूह का निर्माण कल्चुरी नरेश कर्णदेव ने कराया। यह एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। 

सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे। इनका काल 1041 से 1073 ईस्वीं माना गया है। वैसे इस स्थान का इतिहास आठवीं सदी ईस्वीं तक जाता है। मान्यता है कि नर्मदा नदी का स्थान निश्चित करने के लिए सूर्य कुंड का निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

मिट्टी का कूकर : छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के बालोद जिला मुख्यालय से लगभग दस किमी दूर दिसम्बर 2010 में एक गांव में कुम्हार परिवार से मिलने गया था। गांव का नाम भूल रहा हूँ। उस कुम्हार ने मिट्टी के भाण्डों को नवोन्मेष कर नया रुप दिया था। 

उपरोक्त चित्र में दिख रहा मिट्टी का कूकर उसने तैयार किया था, जो धातु के कूकर जैसे ही कार्य करता है एवं इसमें पकाया गया भोजन माटी की सौंधी खुश्बू लिए होता है।
औद्योगिकरण ने सबसे अधिक चोट भारत के परम्परागत शिल्प पर की, जबकि यह हमारी प्राचीन अर्थ व्यवस्था की रीढ़ था। इसके एवज में मशीनें खड़ी की और परम्परागत शिल्प को मटियामेट कर दिया। 
जो कुशल हाथ अद्भुत कृतियों को गढ़ते थे वे जीवनयापन करने के लिए परम्परागत व्यवसाय को त्याग कर मजदूरी कर रहें हैं। आजादी के बाद की सरकारें अंग्रेजों की परिपाटी पर चली और परम्परागत शिल्प व्यवसाय चौपट हो गया।
नये शोध आने पर अब लोग पुनः जागरूक होते दिखाई दे रहे हैं, शहरों में मिट्टी के तवे बिकते दिखाई देते हैं। यह पता नहीं कि लोग इनकी खरीदी ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाने के लिए करते हैं या भोजन पकाने के लिए। 
वैसे भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग स्वास्थ्य एवं देश की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे की धुंगिया खुशबू के साथ बने भोजन का कहना ही क्या है।

शनिवार, 6 जनवरी 2018

हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर और मौर्य सम्राट

पंख झाड़ चुका मोर, यह चित्र मध्य नवम्बर माह में पुष्कर राजस्थान के पास अजयपाल के मंदिर के समीप का है। इस समय मोर अपने सारे पंख झाड़ चुका था और नए पंख निकल रहे थे। 

वैसे वर्ष में एक बार अगस्त माह के आस पास मोर अपने सारे पंख झाड़ देता है और ग्रीष्म काल आते तक उसके सारे पंख पुन: आ जाते हैं। मोरनियों को रिझाते समय नृत्य के दौरान भी इसके पंख टूट जाते हैं।

प्राचीन काल से ही लोक के लिए मोर महत्वपूर्ण पक्षी है, चंद्रगुप्त का साम्राज्य का चिन्ह ही मोर था और इसलिए वे मौर्य कहलाए। चंद्रगुप्त के सिक्कों पर मोर चिन्ह का अंकन होता था। वैसे मोर को तंत्र से अधिक जोड़ा गया है। धन समृद्धि के लिए मोर पंख को घर में रखना बताया गया। पौराणिक ग्रंथों में देवताओं ने मोर को विशेष स्थान दिया। 

इन्द्र देव का मोरपंख के सिंहासन पर बैठना, कृष्ण का अपने मुकुट पर मोरपंख को स्थान देना, यहां तक पौराणिक काल में महर्षियों द्वारा इसी मोरपंख की कलम बनाकर बड़े-बड़े ग्रंथ लिखना आदि कुछ ऐसे मुख्य उदाहरण हैं, जो #मोरपंख की उपयोगिता का स्वत: बखान करते हैं।

बौद्धधर्म के अनुसार मोर अपनी पूंछ फैलाकर अपने सारे पंखों को खोल देता है, इसलिए उसके पंख खुलेपन अर्थात जहां विचारों की कमी ना हो, व्यक्तियों के दिल में हर किसी के लिए प्रेम और सानिध्य हो, जैसे हालातों को दर्शाते हैं। 

ईसाई धर्म में मोर के पंख, अमरता, पुनर्जीवन और अध्यात्मिक शिक्षा से संबंध रखते हैं। इस्लाम धर्म में मोर के खूबसूरत पंख जन्नत के दरवाजे के बाहर अद्भुत शाही बगीचे का प्रतीक माने जाते हैं। 

तांत्रिक क्रियाओं में भी मोर पंख का उपयोग होता है, मोरपंखी से झाड़ा देकर नकारात्मक शक्तियों को दूर किया जाता है, सुख समृद्दि एवं #वशीकरण में मोर पंख को उपयोगी माना गया है। 

दिगम्बर जैन साधु मोर पंख का चंवर अपने साथ रखते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मोर के माध्यम से देवताओं ने संध्या नाम के असुर का वध किया था। 

पक्षी शास्त्र में मोर और गरुड़ के पंखों का विशेष महत्व बताया गया है। कहते हैं कि सही विधि से मोर पंख को घर में स्थापित किया जाए तो वास्तु दोष दूर होते हैं और कुंडली के सभी नौ ग्रहों के दोष भी शांत होते हैं। अपने गुण एवं विशेषताओं के कारण मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी भी है।

सोमवार, 1 जनवरी 2018

हिन्दी ब्लॉगिंग : दशा एवं दिशा

अरसे से मृतप्राय ब्लॉगजगत को एक बार पुनः जीवन देने का आह्वान पुराने ब्लॉगरों ने फेसबुक के माध्यम से किया। इस आह्वान पर कुछ ब्लॉगरों ने ध्यान दिया और एक जुलाई को पोस्ट भी लगाकर श्रीगणेश भी किया। मेरे व्यक्तिगत संकलक के हिसाब से चौबीस घंटों में 70 ब्लॉग अपडेट भी हुए।

कुछ ब्लॉगरों ने ब्लॉग का इतिहास सा लिख डाला तथा इसके पतन के कारणों का उल्लेख भी अपनी समझ के अनुसार किया। जब ब्लॉगिंग के मेरे प्रारंभिक दिन थे तब पचीस पचास कमेंट के साथ सौ हिट्स दिखाई देती थी। 

कालांतर में ब्लॉगिंग का पतन का दौर प्रारंभ हुआ। मठ धराशाई हुए और मेरे मायने में लोग ब्लॉगिंग की मठाधीशी एवं उसकी बंद दुनिया से निकल कर फेसबुक के उन्मुक्त वातावरण में आकर रम गये और ब्लॉग पर नहीं लौटे। 

हमारे से ब्लॉग की दुनिया नहीं छूटी, जब भी समय मिला पोस्ट लगी और फेसबुक ने एग्रीगेटर का काम निभाया, नये पाठक मिले। कभी कभी तो हिट्स का आंकड़ा चौबीस घंटे में पांच हजार से अधिक पहुँच जाता है। भले ही कमेंट न आए पर ट्रैफिक देखकर आत्मिक संतोष होता है। 

ब्लॉग जगत की उलझनों से छुटकारा मिलने के बाद लेखन का स्तर भी सुधरा, उसे भी दिशा मिली वरना राजनीतिक, नर-नारी, हिन्दू-मुस्लिम आदि विवाद चित्त को स्थिर नहीं होने देते थे। 

लेखन को नई दिशा मिलने के बाद ब्लॉग पर कभी ट्रैफिक की कमी नहीं रही और ब्लॉगिंग अद्यतन निरंतर जारी है। इदं नमं के भाव से पोस्ट करने के बाद पाठकों का आना प्रारंभ हो जाता है। जिसमें फेसबुक एवं ट्विटर की महती भूमिका है।

अगर पीछे मुड़कर देखुं तो ब्लॉगिंग को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया मठाधीशी ने। चिट्ठाचर्चा ब्लॉग ने अपने चमचों की बड़ाई की, उनकी पोस्ट का लिंक लगाया एवं उसे दूसरे गुट के किसी भी ब्लॉगर की खिल्ली उड़ाने एवं मानमर्दन करने का मंच बना लिया। 

जहाँ गुरुदेव-गुरुदेव कर चरणचंपी करने वाली नई नस्ल आई वहीं चरण पखरवाने वाले गुरुदेव अपने को किसी अखाड़े के परमहंस मठाधीश से कम नहीं समझने लगे। यही विवाद ब्लॉगिंग की जड़ में मठा डालने का काम करते रहे। 

जगजाहिर है गुट बनाकर एक दूसरे की टांग खिंचाई एवं गिरोहबाजी ब्लॉगिंग की अकाल मृत्यु का कारण बनी। अगर व्यर्थ की टांग खिंचाई और मठाधीशी से परे रहते तो ब्लॉगिंग अभी अपने उत्कर्ष पर रहती। 

अब दो दिनों से पुनः हल्ला हो रहा है ब्लॉगिंग की ओर चलो। हम तो यहीं थे, कहीं नहीं गये और हमारा ब्लाॅग भी अपडेट होते रहा। हाँ यही ब्लॉगिंग की ओर चलो का नारा देने वाले ब्लॉग पर नहीं थे। 

मुझे नहीं लगता कि ब्लॉगिंग के वह दिन फिर लौटेंगे। सभी अघा चुके हैं और फेसबुक ब्लॉगिंग का आनंद ले चुके हैं, यहाँ सभी के अपने अपने मठ हैं और खुद मुख्तयार हो चुके हैं ऐसे में जमी जमाई दुकानदारी से स्थानांतरित होना महंगा ही पड़ेगा। 

हाँ थोड़ा बहुत समय ब्लॉग को दिया जा सकता है। ऐसा भी नहीं है कि ब्लॉगरों का तोड़ा पड़ गया है, नये ब्लॉगर भी आ रहे हैं और उनकी ब्लॉगिंग चालु है। पुराने ब्लॉगरों के आह्वान पर एक एक पोस्ट तो लोगों ने चेप दी है अब देखते हैं बासी कढी में कितना उफान आता है।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

शौचालय के पहले जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता

वर्तमान में जल संकट का सामना ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक मनुष्य को करना पड़ रहा है। नदियाँ सूख रही हैं, कूप एवं तालाब सूख जाते हैं, बांधों में जल का स्तर कम हो जाता है, घर घर में बोरवेल के कारण भूजल का स्तर भी रसातल तक पहुंच रहा है। जहाँ दस हाथ की खुदाई से जल निकल आता था वहाँ हजार फ़ुट में भी जल निकलने की संभावना नजर नहीं आती। 

इसके साथ ही हर वर्ष ग्रीष्म काल में जल संकट से वन्य प्राणियों के जान गंवाने के समाचार निरंतर आते रहते हैं, परन्तु लोग इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। नलकूपों द्वारा जल का असीमित दोहन हो रहा है। दिनचर्या में सम्मिलित ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो जल के बिना सम्पन्न हो सके। जहाँ भी जल संकट आता है वहां के लोग शासन प्रशासन को लानते भेजना प्रारंभ कर देते हैं परन्तु स्वयं की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।

पहाड़ों की ये स्थिति है कि वहाँ भी पेयजल नहीं है। मीलों दूर से जल की व्यवस्था करने पर मजबूर हैं। चीड़ ने पहाड़ों का सारा जल निचोड़ लिया है। लोग मैदानों की तरफ भागे आ रहे हैं, पर कब तक चलेगा यह सब। इसकी भी एक सीमा है। जल के संसाधन पहाड़ों पर भी बचाने होंगे।

आज से तीस बरस पहले मीठे पानी का एक कुंआ ही गाँव भर की प्यास बुझा देता था, निस्तारी के लिए तालाब का जल उपयोग में आता था। जब आज सब नल जल के भरोसे हो गए तो कुंए, बावड़ियों, तालाबों आदि की दुर्दशा देखी नहीं जाती। 

कभी पेयजल का स्रोत रहे इन साधनों में वर्तमान में लोग कूड़ा कचरा फ़ेंकते दिखाई देते हैं, जिससे प्राकृतिक जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं या बंद हो गए हैं। तालाबों की भूमि अतिक्रमण के कारण सिमटती जा रही है और आबादी बढती जा रही है। लोग शतुरमुर्ग की तरह भूमि में गर्दन गड़ाए सभ्यता को समूल नष्ट करने वाले तूफ़ान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जब भी किसी कुंए या प्राकृतिक जल स्रोत की दुर्दशा देखता हूँ तो आत्मा कलप जाती है और सोचता हूं कि मुर्ख मनुष्य अपनी ही जाति के समूल नाश का उद्यम कर रहा है। रजवाड़ों के काल में शासक, जमीदार एवं धनी मानी व्यक्ति कुंए, बावड़ियाँ, पुष्करी, तालाब आदि लोककल्याण के भाव से निर्मित करवाते थे तथा इस कल्याण का कार्य करने के लिए शास्त्र भी नेति-नेति कहकर उन्हें प्रोत्साहित करते थे। परन्तु वर्तमान में सब खत्म होते जा रहा है।

हम देख रहे हैं कि आज एक लीटर पानी की कीमत 20 रुपए हो गई है, जो लोग सहर्ष लेकर पीते हैं, घरों में आर ओ का जल आ रहा है। लोगों ने घरों में जल शुद्धि के आर ओ मशीने लगवा ली हैं। जबकि आर ओ में एक लीटर जल शोधन करने के लिए तीन लीटर जल व्यर्थ जाता है। इस वर्तमान को देखकर भविष्य की चिंता होती है कि आने वाला कल कितना भयानक हो सकता है।

पर्यावरण रक्षा के लिए असली नकली गुहारें होती दिखाई देती हैं। मानता हूँ कि पर्यावरण के साथ इको सिस्टम भी सुधारना आवश्यक है। परन्तु सबसे पहले गाँवों एवं शहरों के पुराने पेयजल के स्रोतों को भी बचाना आवशयक है। जो कुंए, तालाब बावड़ियाँ हैं, उनकी सफ़ाई करके उनका जल प्रयोग में लाना प्रारंभ करना चाहिए, जिससे वर्षाजल से धरती सींचित हो सके एवं भूजल का स्तर बढता रहे। 

स्थानीय शासन एवं सामाजिक संस्थाओं को सबसे पहले इस ओर ध्यान देना चाहिए। जो जल के प्राचीन स्रोत हैं, उनकी सफ़ाई करवा कर मरम्मत करवानी चाहिए जिससे उनका संरक्षण हो सके। अभी भी समय है, यह आवाज हर जगह उठनी चाहिए। जल है तो सब कुछ है, यह चराचर सृष्टि है, प्राण है, जीवन है, वन्य प्राणी हैं, इको सिस्टम है, वरना सब नष्ट हो जाएगा। 

बहुत देर हो जाएगी और आने वाली पीढी आपको कोसने एवं लानते भेजने के अलावा क्या कर सकती है। सरकार को भी चाहिए कि वह प्राचीन जल के स्रोतों को बचाने की कोई योजना बनाए जो कारगर हो एवं इसका लाभ जन जन को हो। शौचालय के पहले जल स्रोतों के संरक्षण की आवश्कता है।

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

स्वस्थ रहने के लिए ॠतु के अनुसार भोजन करें

धरती के किसी भी प्राणी को जीवन संचालन के लिए उर्जा की आवश्यकता होती है एवं प्राण संचालन की उर्जा भोजन से प्राप्त होती है। मनुष्य भी चौरासी लाख योनियों में एक विवेकशील प्राणी माना गया है, इसे भी उर्जा के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। अन्य सभी प्राणियों का तो भोजन निर्धारित है, उन्हें पता है कि क्या खाना है। परन्तु मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपनी रुचि, स्वाद एवं उपलब्धता के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार का भोजन करता है।
हरियाणा का भोजन 
हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक शोध करके मनुष्य के खाने लायक भोजन के मानक तैयार किए और उन्हें पथ्य एवं कुपथ्य का नाम दिया। यह बताया कि कौन सा भोजन मनुष्य के लिए लाभकारी है और कौन सा हानिकारक। परन्तु वर्तमान समय में मनुष्य उन मानकों के विपरीत भोजन कर रहा है जिससे उसके स्वास्थ्य को हानि ही हो रही है।

वर्तमान में हम देख रहे हैं कि सब्जी जैसी वस्तु की मंहगाई का सुर्खियों में बनी हुई हैं। इसका अर्थ है कि हमारे खान पान में बदलाव हो रहा है एवं बेरुत (गैर मौसमी) की सब्जियों का सेवन बढ गया है, जिसके कारण मंहगाई भी दिखाई दे रही है और स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है, चिकित्सा का खर्च बढ रहा है। छोटे-छोटे बच्चों को उच्च रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रोल बढने की शिकायतें दिखाई दे रही हैं। 

यह हमारे अनुचित एवं बिना ॠतु के खान पान का परिणाम है। शारीरिक व्याधियों में निरंतर वृद्धि हो रही है तथा मधुमेह एवं उच्च रक्तचाप के रोगी बढ़ रहे हैं। आज स्थिति यह है कि भारत में शायद ही ऐसा घर हो जिसमें इन दोनो व्याधियों में किसी एक का मरीज न मिल जाए।

कभी टमाटर मंहगे हैं तो कभी निम्बू मंहगा है तो कभी दाल ने कमर तोड़ दी तो कभी प्याज के भाव ने जीना दूभर कर दिया। यह सब वर्तमान में ही क्यों सुनाई देता है? आज से तीस बरस पहले तो यह सब सुनाई नहीं देता था कि सब्जियों का मूल्य बढ गया है और न सत्ता पक्ष ध्यान देता था न विपक्ष, न अखबार वालों को इस तरफ़ देखना पड़ता था। और भी बहुत सारी जन समस्याएं थी जिस पर सरकार और प्रशासन ध्यान देता था।

अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो हमारे पूर्वज स्वस्थ रहा करते थे एवं प्रसन्नता से अपनी पूरी उम्र जी कर जाते थे। आज व्याधियों के कारण अकाल मृत्यू का प्रतिशत बढ गया है। हम तीस चालिस बरस पीछे का हमारा जीवन देखें तो हम हमेशा ॠतु में होने वाली उपज का ही सेवन करते थे। भारत में वर्षा, शीत एवं ग्रीष्म तीन प्रमुख ॠतुएं होती हैं। वर्षाकाल में हरी सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता था। ग्रीष्म ॠतु में ही वर्षाकाल के भोजन की तैयारी कर ली जाती थी।

गेंहूँ, चावल, दाल, गुड़, नमक, घी आदि भोजन के मुख्य तत्व को जमा कर लिया जाता था। दाल की बड़ी, बिजौरी, पापड़, खट्टी मिर्च, टमाटर, आम का अमचूर इत्यादि तैयार सुखा कर लिए जाते तथा विभिन्न तरह के अचार बना लिए जाते थे। इसके साथ ही सब्जियों को सुखा लिया जाता था, जिसे विभिन्न अंचलों में सुखसी, सुखड़ी, सुखौंत, खोइला, खेलरा आदि नामों से जाना जाता है। 

मेथी, पालक, लाल भाजी, चुनचुनिया एवं अन्य तरह की भाजियों को सुखाकर डिब्बे में बंद कर दिया जाता था। जिसका उपयोग वर्षा काल में किया जाता था।मांसाहार करने वाले भी अपने लिए मांस सुखा लेते थे, यहाँ तक कि मछली भी सुखा ली जाती थी, जिसे सुखसी कहा जाता है। 

वर्षाकाल में दही और छाछ का प्रयोग भी नहीं किया जाता था। भैषजिक शास्त्रों में वर्षा को संक्रमण का काल एवं स्वास्थ्य के लिए सचेत रहने का काल बताया गया है। रोगकारक विषाणुओं की शत्रु सूर्य की किरणें है और वर्षाकाल में सूर्य प्रकाश न होने के कारण व्याधियों के विषाणु अधिक सक्रीय हो जाते हैं। इसलिए खान पान के प्रति विशेष सावधानी रखी जाती थी।

वर्षाकाल में बोई गई सब्जियों की आमद शीत काल में होती है, इसलिए दीवाली के समीप हरी सब्जियों की आमद होने कारण इनका सेवन प्रारंभ होता था। शीत ॠतु को सेहत के लिए सबसे अधिक उपयुक्त बताया गया है। इस ॠतु में खाया पिया अंग लगता है तथा डटकर भोजन एवं ब्यंजनों का सेवन करने की परम्परा रही है। चिकित्सा विज्ञान भी इसे हेल्दी सीजन कहता है। 

संक्रामक रोगों की कीटाणु धरती से गायब हो जाते हैं एवं अधिक शीत होने के कारण कफ़जनित रोग होते हैं। इस तरह हम भी सब्जियों का सेवन शीत ॠतु में ही अधिक करते थे। स्कूल जाते समय रोटी के साथ गुड़ या एक अचार की फ़ांक रखकर ले जाते और दोपहर का भोजन हो जाता था।
ग्रामीण बाजार 
इस तरह ग्रीष्म काल भी वर्षाकाल की तैयारियों में बीत जाता था। इस दौरान घी दूध, दही, मही का सेवन बढ जाता है और ऐसा भोजन किया जाता है जिसमें पानी की मात्रा अधिक हो। क्षेत्र के अनुसार लोक ने ग्रीष्मकालीन भोजन का अविष्कार कर लिया। भोजन में खटाई की मात्रा बढ जाती है। 

छत्तीसगढ़ अंचल में बासी का सेवन प्रारंभ हो जाता है। एक बटकी बासी, चटनी, अचार, प्याज या मही (छाछ) के साथ खाकर आदमी अपने काम पर चला जाता है। हरियाणा, राजस्थान में जौ के दाने (घाट) एवं बाजरे या गेहूँ के आटे की राबड़ी का सेवन सुखकारक हो जाता है। पंजाब में लस्सी का एवं गुजरात में छाछ का चलन बढ जाता है तो दक्षिण में इमली का सेवन अधिक हो जाता है।

कृषि की तकनीकि में नवोन्मेष होने के कारण बेरुत में भी सब्जियां दिखाई देने लगी। जिन्हें विभिन्न तरह की रोगरक्षक दवाईयों के छिड़काव से तैयार किया जाता है। अब हर मौसम में सभी तरह की सब्जियां मिलने लगी तो लोग पथ्य एवं कुपथ्य को भूल कर उसका सेवन करने लगे। अब यही आदत में सम्मिलित हो गई। बेरुत की किसी भी सब्जी का मूल्य बढ जाता है तो हो हल्ला प्रारंभ हो जाता है। 

सभी जानते हैं कि वर्षा के दौरान टमाटर का उत्पादन नहीं होता है, प्याज का उत्पादन नहीं होता है तो इसका सेवन कम किया जा सकता है या नहीं भी किया जा सकता। कोई आवश्यक नहीं है कि जिस वस्तु से स्वास्थ्य को हानि हो उसका सेवन जबरिया किया जाए।

दो-तीन दशक पूर्व हमने ही देखा है कि भोजन में तेल इत्यादि का प्रयोग नहीं होता था। घी का प्रयोग किया जाता था। बिना बघार के सब्जियाँ बनती थी, हमारे यहाँ तो पानी से बघार दे दिया जाता था और वह सब्जी भी अत्यंत स्वादिष्ट एवं लाभकारी होती थी। 

वर्तमान में तेलों का चलन बढ गया। अखाद्य तेलों को भी खाद्य का जामा पहनाकर बाजार में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें राईसब्रान, सोयाबीन, पॉम आईल, वनस्पति घी इत्यादि। ये सब तेल सेहत के अत्यंत हानिकारक है एवं शुगर एवं हृदयरोग आदि की व्याधियों के मुख्य कारक भी हैं। जहां तक हो सके इन तेलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। भोजन में गाय, भैंस का घी एवं अधिक जरुरी हुआ तो सरसों तेल का उपयोग किया जा सकता है।

आयुर्वेद के प्रथम पृष्ठ पर ही सार तत्व लिख दिया गया है कि मानव शरीर में व्याधियों का कारण कफ़, पित्त एवं वात का असंतुलन है। इनका संतुलन बनाए रखने के लिए पथ्य का सेवन करना चाहिए। एक सूत्र दिया है ॠतभुक, हितभुक, मितभुक, ॠतु के अनुसार भोजन का सेवन करना चाह्रिए, जो आपके जीवन के लिए हितकारी उस भोजन का सेवन करना चाहिए, तथा स्वास्थ्य के लिए लाभकारी यही है कि भोजन मितव्ययिता के साथ किया जाए। 

पहले के लोग सूर्यास्त तक भोजन कर लेते थे। आज लोग रात बारह बजे के बाद भी प्रेतकाल में भोजन करते हैं। इससे चया-पचय को हानि होती एवं जठराग्नि के मंद होने से कफ़, पित्त, वात का संतुलन बिगड़ कर व्याधियों को जन्म देता है। 
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्द अंगाकर  रोटी  
मेरा इतना ही कहना है कि ॠतु के अनुसार भोजन होना चाहिए। कहा गया है न - समय पाये तरुवर फ़ले, केतक सीचो नीर। परन्तु वर्तमान में यह उक्ति चरितार्थ होते दिखाई नहीं देती क्योंकि कृषि तकनीक ने ॠतु चक्र ही बदल दिया। परन्तु अभी भी समय है अगर स्वस्थ रहना है तो ॠतुओं के अनुसार भोज्य का सेवन करना चाहिए।

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था वेंटीलेटर पर

शिक्षाकर्मियों की हड़ताल हुई और सारी शैक्षणिक व्यवस्था वेंटीलेटर पर चली गई। शिक्षा सत्र के मध्य में विद्यार्थियों की पढाई का नुकसान हुआ। सरकारी स्कूलों में पढाई के प्रति न सरकार गंभीर है, न शिक्षक।

शिक्षा सत्र आरंभ होने की सुगबुगाहट के साथ सरकार और मीडिया सभी एकाएक जाग उठते हैं, अखबार शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ गिनाने लगते हैं तो सरकार गुणवत्ता सुधारने की कवायद का बखान करने लगती है।

आनन-फ़ानन में दो-चार आदेश जारी करने के बाद कर्तव्यों की इति श्री हो जाती है और व्यवस्था अपने उसी ढर्रे पर चलने लगती है। एक तरफ़ देखें तो सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं में पढाई का स्तर नित्य ही गिरते जा रहा है, जिसके कारण निजी संस्थाएं चाँदी काट रही हैं।

कई संस्थाएं तो इतनी ऊंची पहुंच रखती हैं कि वे शासन के आदेशों की धज्जियां उड़ा कर अवमानना करते हुए मनमानी फ़ीस बढा कर अपनी मनमानी करते हैं। 

शिक्षा नित मंहगी होते जा रही है, अगर कहें तो आम आदमी के पहुंच के बाहर हो रही है। विद्यार्थी को नामी शिक्षण संस्था में प्रवेश दिलाने के लिए पालक का दम निकल जाता है। जिधर देखो उधर ही शिक्षा की दुकाने सजी हुई हैं।

सरकारी स्कूलों में कोई अपने बच्चे को पढाना नहीं चाहता। हर पालक चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढे। उच्च शिक्षा के लिए सरकारी महाविद्यालयों में उतना कोटा नहीं है जितने विद्यार्थी हैं। इसलिए इन्हें मजबूरन निजी शिक्षण संस्थाओं में मोटी फ़ीस देकर पढाई करनी पड़ती है। जिसका बोझ परिवार पर अतिरिक्त पड़ता है। 

जिसके पास काला-पीला धन या टेबल के नीचे की कमाई है, वह अपने बच्चे को निजी संस्थाओं में पढा लेता है, परन्तू उनका मरण हो जाता है जिनके पास बड़ी फ़ीस देने के लिए धन नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के नाम पर नित नए प्रयोग होते दिखाई देते हैं।

नई सरकारें सत्ता में आती हैं तो पाठ्यक्रम बदल दिया जाता है। वामपंथ, दक्षिणपंथ, उत्तरपंथ इत्यादि पथों का प्रभाव पाठ्यक्रम पर डालने का कार्य किया जाता है। जिसका असर विद्यार्थियों के मानस को दुषित करने के साथ ही शिक्षा की गुणवत्ता को हानि पहुंचाता है। 

निजी स्कूलों के पीछे दीवानगी आलम यह है कि नेता, अधिकारी, कर्मचारी एवं सरकारी स्कूलों के शिक्षक अपने बच्चे को निजी स्कूलों में पढाना चाहते हैं। सरकारी तंत्र की अंतिम इकाई चपरासी का बच्चा भी आपको निजी स्कूलों में पढाई करता मिल जाएगा।

जो संस्था उन्हें रोजी-रोटी, रोजगार दे रही है, उसकी गुणवत्ता एवं कार्यक्षमता पर ही संदेह है। यही कारण है कि आम आदमी भी अपने बच्चे को निजी शिक्षण संस्थाओं में पढाना चाहता है क्योंकि सरकारी संस्थाओं की शिक्षा में लोगों को विश्वास नहीं रह गया और जनता में यह अविश्वास स्वयं कर्ताधर्ताओं ने फ़ैलाया है। 

अब स्पष्ट दिखाई देता है कि समाज में दो वर्ग पैदा हो गए हैं, एक वह जिसे अंग्रेजी बोलकर शासन करना है तथा दूसरा वह जिसे हिन्दी बोलकर जी हजूरी करनी है। शासक एवं शासित का विभाजन स्पष्ट दिखाई देने लगा है। यह खाई दिनों दिन और भी गहरी होती जानी है। इसका समय रहते उपचार करना होगा।

सरकार ने गरीब बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढाने की दिशा में आर टी आई एक्ट लागु किया है। जिसके तहत गरीब बच्चों को भी मंहगे निजी स्कूलों में पढाई करने का अवसर मिलेगा। प्रश्न यह उठता है कि कितने गरीब इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। सभी को निजी स्कूल दाखिला देने से रहे। 

शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने एवं धरातल पर अमीर गरीब की खाई मिटाने के लिए पहल करनी होगी। हमारे पास सरकारी स्कूलों के रुप में बहुत बड़ा अमला है, भवन हैं, अन्य सुविधाएँ भी दी जा रही है। परन्तू इनके प्रति लोगों का विश्वास खत्म हो रहा है। इस विश्वास को पुन: जगाना होगा।

यह प्रयोग केरल के एक कलेक्टर ने किया, उसने अपनी बेटी को सरकारी स्कूल में भर्ती कराया, जिससे सभी शिक्षक समय पर स्कूल आने लगे। नियत विषय को ईमानदारी से पढाने लगे। इससे उस स्कूल में शिक्षा का स्तर सुधरा। 

शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सरकार को कड़ा कदम उठाकर एक आदेश अपने सभी मंत्रियों , विधायकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को देना चाहिए कि वे अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में ही पढाएँ। इसका सकारात्मक प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा और गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। यह शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम होगा तथा इससे सामाजिक सद्भवाना का पाठ विद्यार्थी होश संभालते ही पढने लगेगा.

जब मंत्री एवं आम आदमी तथा कलेक्टर और चपरासी के बच्चे एक ही स्थान पर बैठकर पढाई करेगें। शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बड़ी लकीर खींचनी होगी अन्यथा शिक्षा के नाम पर ढोल पीटना बेमानी है। 

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

सावधान: अब हाथियों ने राजधानी देख ली है।

हाथियों ने अब राजधानी का रास्ता देख लिया गजदल दो बार राजधानी रायपुर के समीप पहुंच चुका है, यह हाथियों एवं मानवों दोनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। हालिया तौर पर हाथियों को वन विभाग ने जंगल की ओर खदेड़ दिया, परन्तु जो रास्ता हाथियों ने देख लिया है, उस पर वे फ़िर लौटेंगे। अभी तक तो सरगुजा अंचल, जशपुर, कोरबा एवं सिरपुर क्षेत्र के ग्रामीण हाथियों के उत्पात से परेशान हैं तथा हाथी एवं मानव संघर्ष में एक दूसरे को जान गंवानी पड़ रही है। अब यही स्थिति राजधानी रायपुर में भी बनने के आसार दिख रहे हैं।
 फ़ोटो सांकेतिक है, यह मेरे द्वारा राजा जी पार्क हरिद्वार के चिल्ला रेंज में ली गई थी
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात हाथियों की समस्या के निदान के लिए तत्कालीन अजीत जोगी सरकार ने असम से हाथी प्रशिक्षक पार्वती बरुआ को छत्तीसगढ बुलाया था, जिसके द्वारा हाथियों को साधकर हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष को कम किया जाता। परन्तु इस कार्य में एक हाथी मौत के कारण विधानसभा में प्रश्न उठने के बाद इस कार्य को बंद कर दिया गया। हाथियों के हमले से आम ग्रामीणों की जान लगातार जा रही तथा इस संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। फ़सलों का नुकसान को आम बात है, पर हाथियों के दल के सामने अचानक कोई मनुष्य पड़ जाता है तो उसे हाथी पटक कर मार डालते हैं।
ऐसा नहीं है कि हाथियों के दल कहीं दूसरे स्थान से अचानक छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर गए और उत्पात मचा रहे हैं। यहाँ इनकी बसाहट प्राचीनकाल से ही रही है। सरगुजा अंचल के हाथियों को ऐरावत के सदृश उत्तम माना गया है। पहले के राजा महाराजा इन्हें प्रशिक्षित करके अपने काम में लेते थे तथा अन्य राजाओं को भी भेंट करने के उल्लेख मिलते हैं। हाथियों एवं मानव के बीच संघर्ष तो तब भी आमना सामना होने पर रहा होगा, पर इस हद तक नहीं क्योंकि उनके पर्यावास क्षेत्र में मानव का कोई सीधा दखल नहीं था, वे स्वच्छंद विचरण करते थे। कालांतर में मानव द्वारा हाथियों के पर्यावास क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने के परिणाम को ही अब भुगतना पड़ रहा है।
अभी तक हाथी और मानव संघर्ष के कारण राजधानी से दूर सरगुजा, प्रतापपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा, बार नवापारा क्षेत्र से से ही धन-जन हानि के समाचार आते थे। तब राजधानी के लोगों को पता नहीं चलता था कि हाथियों की समस्या क्या है और हाथी प्रभावित अंचल के लोग किस तरह भय के वातावरण में अपनी राज गुजारते हैं, किस तरह उनकी फ़सल को हाथी नुकसान पहुंचाते हैं, किस तरह उनके घर फ़ोड़ कर बेघर कर डालते हैं। अब हाथियों ने राजधानी के समीप अपनी आमद दे दी तो उनके पहुंचने की धमक ही होश उड़ाने के लिए काफ़ी है।
हाथियों का शहरी क्षेत्र में पहुंचना अनायास नहीं है। इसके लिए मानव ही जिम्मेदार है। सरकारों की अदूरदर्शी नीतियों के कारण अंधाधुंध कटते जंगल एवं खनिज निकालने के लिए खदानें खुलने के कारण हाथियों के प्राकृतिक रहवास क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ जिम्मेदार है। जंगल कटने एवं जल के प्राकृतिक स्रोत सूखने के कारण हाथियों के सामने भोजन पानी की समस्या खड़ी हो गई है तथा हाथियों के रहवास क्षेत्र में मानवीय दखल बढ़ने एवं उसके नष्ट होने के कारण अब हाथियों को भोजन-पानी के लिए शहरी क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा था। जिससे हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है। 
राजधानी के आस पास हाथियों के पहुंचने की आशंका साल भर पहले से ही जताई जा रही थी। वन्य प्रेमी श्री प्राण चड्ढा ने गत वर्ष अपनी अप्रेल 2016 की ब्लॉग पोस्ट में संकेत दिया था कि "सरहदी इलाके से बढ़ते हुए एक हाथी रुद्री-[धमतरी] के इलाके की रेकी कर आया है।" इस एक वर्ष में ही हाथियों ने अपनी उपस्थिति राजधानी में दे दी। हाथियों के राजधानी में पहुंचने से सरकार की नींद खुलनी चाहिए, क्योंकि मामला अब सुदूर अंचल का नहीं रहा, जो राजधानी चैन की नींद ले सके। शीघ्र ही कोई योजना बनाकर हाथी संकट निदान करना आवश्यक है। खतरा अब सिर पर मंडरा रहा है, वो दिन दूर नहीं जब राजधानी के लोगों को अपनी जानमाल की सुरक्षा के लिए रतजगा करना पड़ेगा। इसलिए चैन से सोना है तो जाग जाइए वरना बहुत देर हो जाएगी।   

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

कहानी तीन दोस्तों की : एफ़. एम. 36 FM 36 Raipur

कहानी तीन दोस्तों की है, जिसमें दो #BE और एक #MBA। इन्होंने लीक से हटकर नौकरी करने की परम्पराओं के तोड़ते हुए व्यवसाय प्रारंभ किया। अधिक दिन तो नहीं हुए हैं पर इन दो महीनों में अपने हुनर से कुछ करने की चाह लिए लगन से आगे बढ़ रहे हैं और उम्मीद ही नहीं आशा भी है कि आगे चलकर कामयाब भी होगें।

हाँ जी! मैं रितेश पटेल, श्रीकांत नायक एवं ट्विंकल नामक नौजवानों की बात कर रहा हूँ। तीनो दोस्तों ने पढाई करने के बाद नौकरी तलाशने की बजाए रेस्टोरेंट/ होटल व्यवसाय में कदम रखा है। इन्होंने रायपुर के विवेकानंद आश्रम के सामने जी ई रोड़ पर दुकान किराए से ली और उसमें बढिया थीम बेस्ड इंटीरियर करवा कर #एफ़_एम_36 #FM_36 रेस्टोरेंट प्रांरभ किया। दुकान में जगह न होने के कारण इन्होंने इसका किचन वैन में सामने ही रखा है। 

एक शाम उदय भैया के आग्रह पर यहाँ तक जाना हुआ और हमने इनके रेस्टोरेंट में इंडियन, कान्टिनेंटल एवं चायनीज फ़ूड का आनंद लिया। आप यहाँ गिटार बजा कर अपना शौक पूरा कर सकते हैं, साथ ही इनके सेल्फ़ में कुछ पुस्तकें भी दिखाई दी। अपना भोजन आते तक आप पुस्तकों का भी आनंद ले सकते हैं। 

रेस्टोरेंट की खास बात है कि इन्होंने वेटर नहीं रखे तथा ग्राहक से ऑडर लेकर खुद ही टेबल तक पहुंचाते हैं और उनसे आत्मीय वार्तालाप कर फ़ीड बैक भी लेते हैं। जिससे ग्राहक के अनुकूल सेवाएँ देकर उसमें सुधार कर सकें और ग्राहक से सम्पर्क भी स्थापित हो।

इन तीनों द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए एक मार्ग दर्शन है जो पढ लिख कर रोजगार कार्यालय में नाम लिखाकर इंटरव्यू की प्रतीक्षा करते हुए सरकार को कोसते रहते हैं। इन्होंने जो कदम उठाया है यह अन्य शिक्षित लोगों के लिए प्रेरणा बनेगा। 

मैने इन्हें अपने होटल में एक घुमक्कड़ी की दीवार बनाने की सलाह दी, आशा है कि जब मैं जाऊंगा तो वह तैयार मिलेगी। अगर कभी आप रायपुर आएं तो इन तीनों से अवश्य मिलिए, आपको यहाँ का भोजन, स्नैक्स पसंद आएगा और इनसे मिलकर भी अच्छा लगेगा और इनका उत्साहवर्धन भी होगा। इनकी वेबसाईट http://foodmaster.in/ है।

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

दोगला : शब्द चिंतन ( ललित निबंध)

दोगला एक ऐसा शब्द है जिसका प्रचलन धड़ल्ले से होता दिखाई/सुनाई देता है। दोगला आदमी, दोगली राजनीति, दोगली बात, दोगला नेता, दोगली स्त्री इत्यादि बहुधा प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह शब्द धोखा देने वाले, दो मुंही बातें करने वाले, अविश्वसनीय व्यक्ति के लिए संदर्भ में लिया जाता है। 

जबकि भारत में पानी उलीचने की बांस कमचियों से बने टोकरे लिए दोगला शब्द संज्ञा के तौर पर प्रयुक्त होता है। इसे हिन्दी वांग्मय का शब्द माना जाता है। परन्तु यही शब्द फ़ारसी में पहुंच कर घातक होकर लड़ाई झगड़े की जड़ गाली बन जाता है तथा अर्थ बदलकर वर्णसंकर, जारज (प्रेमी/उपपति/आशिक से उत्पन्न होने वाला) हो जाता है।

शब्द की महिमा अपरम्पार है तथा पूर्व प्रचलित एकार्थी शब्द कालांतर में बहुअर्थी हो जाता है। जिस मानक अर्थ में प्रयुक्त होने के लिए शब्द ने जन्म लिया, कभी कभी तो उसके विपरीत अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगता है। जैसे सम्भ्रांत - सम+भ्रांत। जो दशों दिशाओं से याने सब तरफ़ से विचलित (पागल) हो गया हो (निरुक्त) उसे सम्भ्रांत कहा गया। परन्तु वर्तमान में इसका प्रयोग कुलीन के समानार्थी होने लगा। किसी परिवार या व्यक्ति को सभ्य बताने के लिए इस शब्द का प्रयोग होता है। 

लोकप्रचलित हिन्दी भाषा में विभिन्न भाषाओं के शब्दों को सहज स्वीकार किया गया है, वे अब इतने अधिक घुलमिल गए हैं कि पता ही नहीं चलता किस भाषा से इन शब्दों की व्युत्पति हुई है। अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्द हिन्दी प्रवेश कर इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त कर गए हैं कि वार्तालाप या लेखन के समय कोई इनके समानार्थी शब्द भी नहीं ढूंढता एवं सहजता के साथ समाज भी स्वीकार लेता है। 

दोगले से मिलाजुला एक शब्द और है हरामजादा, इसका प्रयोग भी गाली के तौर पर होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है हरम में जन्म लेने वाला। मुगल बादशाहों के हवसगाह होते थे हरम। जिसमें हजारों स्त्रियाँ रखी जाती थी। रखैल (रखी हुई) शब्द भी यहीं की व्युत्पत्ति है। इन स्त्रियों से जन्म लेने वाले हरामजादे कहे जाते थे। हरामजादे शब्द संज्ञा है, जब यही शब्द प्रवृत्ति बन जाता है तो हरामजदगी हो जाता है अर्थात जिसके स्वभाव में ही जन्म से दोगलापन है। 

हरामजादा या दोगला शब्द के अर्थ में संस्कृत में जारज: शब्द प्रयुक्त होता है। जार: (जारयति इति जृष् वयोहानौ धातौ: धञ, णिलुक् च) उपपति: (उपमित: पत्या) ये दो पुल्लिंग नाम मुख्य से भिन्न अप्रधान पति (यार) के हैं। अमृते भर्तरि जारज:, मृते भर्तरि जारजो गोलक:। (अमरकोश) जार से उत्पन्न संतान को जारज कहा गया है। इस तरह हम देखते हैं कि संज्ञा के लिए प्रयोग होने वाले शब्द प्रवृत्ति के रुप में प्रयुक्त होते हुए विशेषण बन गये और विशेषता बताने/जताने के लिए प्रयुक्त होने लगे तथा गाली के रुप में प्रतिष्ठित हो गए।

राम मनोहर लोहिया जी का कहा स्मरण हो आता है  कि तन का दोगला एक बार चलता है पर मन का दोगला घातक होता है अर्थात मन के दोगले को अधिक घातक बताया गया। मन का दोगला होना व्यक्ति की प्रवृत्ति हो गई। दोगला शब्द वर्तमान में प्रवृत्ति बन गया। वर्तमान समय में दोगले शब्द ने अन्य अर्थ ग्रहण कर लिया। अब इसका अर्थ 1. दो तरह की बातें करने वाला 2. जिसकी कथनी और करनी में विसंगति हो, में बदल गया। 

समाज में ऐसे मनुष्य (स्त्री/पुरुष) भी रहते हैं जिनकी कथनी और करनी में विसंगति होती है। ये मुंह के सामने मीठी-मीठी मुंह चोपड़ी बातें करते हैं और पीठ पीछे षड़यंत्र करने से बाज नहीं आते, मौका पाकर खंजर भी चला देते हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें कोई दोष है, यह इनकी जन्मजात प्रवृति है, जो दिनचर्या में सम्मिलित है। दोगलई किये बिना ये रह ही नहीं सकते। ये व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र किसी के साथ भी दोगलाई कर सकते हैं। इनकी दोगलाई की कोई सीमा चिन्हित या तय नहीं है।

मनोवैज्ञानिकों ने अनुभव किया कि कुछ लोग परिस्थितिवश दोगलई करना चाहते हैं, परन्तु कर नहीं पाते। क्योंकि उनकी प्रवृत्ति में नहीं है। प्रवृत्ति में होने के कारण सहजता होती है तथा प्रवृत्ति में न होने के कारण कृत्रिमता असहज कर देती है। और वे अपनी दोगलई को स्वत: ही प्रकट कर देते हैं। क्योंकि कबीर दास जी ने कहा है "सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदय सांच हें, वाके हिरदय आप॥" कहीं न कहीं उसके हृदय में आप है जो उसे दोगलई करने से रोक देता है। 

इतिहास में देखते हैं कि बहुत सारे राजे-महाराजे, यति-जति दोगलों की भेट चढ़ गए तथा वर्तमान में भी चढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं है यह प्रजाति सिर्फ़ भारत में ही पाई जाती है। युरोप का उदाहरण हम ले सकते हैं, यीशु ने मनुष्यों को सन्मार्ग बताने में अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया तो कहा- हे पिता (ब्रह्म), इन्हें माफ कर दे (जिन्होंने सूली पर चढ़ाया था) क्योंकि इन्हें नहीं मालूम है कि ये क्या कर रहे हैं। 

दोगले लोगों को ढूंढने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है, वे आस-पास ही पाए जाते हैं, जो निकटस्थ होकर अपनी करनी करने तैनात रहते हैं। यीशु को सूली पर चढाने वाले दोगलई प्रवृत्ति से ग्रसित लोग थे। इसलिए यीशु ने उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना की। पर हर आदमी संत नहीं होता। लौकिक जीवन में दोगली प्रवृत्ति के लोगों को पहचान कर बचना ही श्रेयकर होता है। दोगला मनुष्य कितना भी सोने चांदी का मुलम्मा ओढ़ ले पर उसकी प्रवृत्ति बता देती है कि वह क्या है। इति दोगला शब्दाख्यान।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

प्राचीन काल के प्रतिमा शिल्प में आभूषण अलंकरण

स्त्री एवं पुरुष दोनों प्राचीन काल से ही सौंदर्य के प्रति सजग रहे हैं। स्त्री सौंदर्य अभिवृद्धि के लिए सोलह शृंगार की मान्यता संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक चली आ रही है। कवियों ने अपनी कविताओं में नायिका के सोलह शृंगार का प्रमुखता से वर्णन किया है तो शिल्पकार भी क्यों पीछे रहते, उन्होंने भी प्रतिमा शिल्प में सौंदर्य वृद्धि की सभी युक्तियों को कुशलता के साथ उकेरा है। मंदिरों की भित्तियों में स्थापित जब हम प्रतिमा शिल्प को देखते हैं तो नख-शिख अलकंरण दिखाई देता है, जिसमें वस्त्राभूषण अलंकरण प्रमुखता से उकेरे गए हैं।
पायल धारिणी (राजा रानी मंदिर भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
गुप्तकाल से मंदिर शिल्प योजना में भित्तियों में प्रतिमा शिल्प का प्रयोग दिखाई देता है। इसके पश्चात के काल में प्रतिमा शिल्प के अलंकरण में भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्त्रों के छापे, पहने का ढंग एवं आभूषणों की बनावट भी पृथक दिखाई देती है। इन प्रतिमाओं में हम देखते हैं कि पुरुष सौंदर्य की वृद्धि के लिए केश विन्यास, वस्त्र, माला, बाजूबंद पहने दिखाई देते हैं। जबकि स्त्रियों के आभूषण अलग दिखाई देते हैं। जिस तरह वर्तमान काल में वस्त्रों एवं आभूषणों में बदलाव फ़ैशन के आधार पर होता है उसी तरह प्राचीन काल में बदलाव दिखाई देता है। 
संध्या काल ( सूर्य मंदिर कोणार्क उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
लगभग तीस वर्षों के भ्रमण काल में मैने विभिन्न कालों में निर्मित मंदिरों के स्थापत्य एवं प्रतिमा शिल्प को देखा है। आप प्रतिमा अलंकरण को देखकर उसके निर्माण काल का अंदाजा लगा सकते हैं। आभूषण (आभरण) प्राचीन काल से ही अलंकरण का साधन रहे हैं। भारत के निवासी प्राचीन काल से आभूषन प्रिय रहे हैं जो आभूषण केश से लेकर पैरों तक धारण करते थे। केशों में चिमटी, माथे पर बेन्दा, कानों में कुंडल, गले में हार, बाजू पर बाजूबंद, कलाई में चूड़ी, कमर में कमरधनी, उंगली में अंगूठी एवं पैरों में पायल का अलंकरण होता था। वर्तमान में इन आभूषणों का प्रयोग उसी रुप में विद्यमान है।
संध्या काल ( शिवालय देवर बीजा, जिला बेमेतरा छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमाओं के शीर्ष पर कीरीट मुकुट दिखाई देता है। स्त्री एवं पुरुष कानों को समान रुप से विभूषित करते थे। तत्कालीन साहित्य में कुंडल एवं कर्णिका का वर्णन होता है। विविध धातुओं से निर्मित रत्नकर्णिका, दारुकर्णिका, त्रपुकर्णिका कहलाती थी। इसके अतिरिक्त आमुक्तिका आभूषण का उल्लेख मिलता है। इसमें कुंडल, आधुनिक झुमके, कर्णिका, बाली एवं आमुक्तिका को टॉप्स माना जा सकता है। घोंघे की खोल जैसे टॉप्स वर्तमान में भी दिखाई देते हैं।
नर्तकी (गणेश मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
समकालीन साहित्य में कंठ में पहने जाने वाले विभिन्न प्रकार के हारों का उल्लेख है।  जिसमें सुवर्ण सूत्र, कंठ सूत्र, अर्ध हार, हार के साथ मुक्ता हारों में नील मुक्ताहार, लोहित मुक्ताहार एवं श्वेत मुक्ताहार तथा विभिन्न धातुओं से निर्मित रत्नहार, रुचक हार, हिरण्यहार, सुवर्णहार, दंतहार, काषार्पण हार चन्द्रहार प्रमुख हैं, इसके परवर्ती राजपूत काल में नौलखा हार की खूब धूम रही। कंठ आभूषणों में वनमाला का उल्लेख भी आवश्यक है। अधिकतर विष्णु की मूर्ति में वनमाला का अंकन मिलता है। बाजू में धारण करने वाले आभूषण वलय, केयूर एवं अंगद नाम से जाने गए। वलय हाथीदांत से युक्त होता था, केयूर स्वर्ण से बनता था तथा अंगद स्वर्ण एवं रजत के तारों से बनाया जाता था। 
कलश धारिणी देवी (जराय का मठ बरुआ सागर उत्तर प्रदेश) फ़ोटो ललित शर्मा
चूड़ियों को कटक वलय यादि कहा जाता था, इन्हें विभिन्न धातुओं से एवं आकारों में बनाया जाता था। अंगुली में पहने के लिए अंगुलिमुद्रा एवं मुद्रिका या अंगुलीयक होती थी। कई प्रतिमाओं में तो कई अंगुलियों में अंगूठी धारण किए हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही मेखला कमर का आभूषण था इसे स्त्रियाँ धारण करती थी, यह रत्न एवं ताम्रयुक्त होती थी। इसे करधनी, किंकणी, कटक, सुवर्णसूत्र, रशना, कांची मेखला आदि कहा जाता है। घुंघरुयुक्त बजने वाली करधनी को कांचीगुण कहा गया है। पैरों में पैजनी, पायल इत्यादि धारण की जाती थी, यह लघुघंटिकायुक्त रजत एवं कांसे से निर्मित की जाती थी। 
नदी देवी गंगा ( देऊर मंदिर मल्हार जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़) फ़ोटो ललित शर्मा
प्रतिमा शिल्प में अप्सराओं, नायिकाओं एवं देवियों को भिन्न भिन्न तरह के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था तथा उनके अनुचरों, परिचारको एवं परिचारिकाओं के शरीर पर आभूषण कम दिखाई देते हैं। उस काल में भी बड़े लोग स्वर्ण, रजत एवं बहुमुल्य रत्न जड़ित आभूषणों का प्रयोग करते थे। जिनके पास (दास दासियाँ) अधिक धन नहीं होता था वे रजत, कांसे एवं तांबे के आभूषण धारण करते थे। वर्तमान में यही परिपाटी दिखाई देती है। आभूषण हमेशा उच्चकुल एवं धनवानों के ही होते हैं।
शाल भंजिका ( मुक्तेशर मंदिर समूह भुवनेश्वर उड़ीसा) फ़ोटो ललित शर्मा
आभूषणों का महत्व सौंदर्य वृद्धि के साथ धार्मिक भी है, जिस प्रकार विवाहित स्त्रियां बेन्दा (टीका) धारण करती हैं, कुछ स्थानों पर मंगलसूत्र विवाहित एवं सौभाग्य का सूचक माना गया है। इसी तरह पुरुष भी ताबीज इत्यादि धारण करते थे। उत्खनन के दौराण अर्ध मूल्यवान रत्न अधिक प्राप्त होते हैं, जिनका आभूषणों में प्रयोग किया जाता था। स्वर्ण एवं रजत के आभूषणों में पत्थर भी जड़े जाते थे, जिन्हें रत्न कहा जाता है। गोमेद, जम्बुमणि, स्फ़टिक, सेलखड़ी, हाथी दांत, शीशा आदि जड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी के मनके भी धारण किए जाते थे। 
चंवर धारिणी ( विट्ठल मंदिर हम्पी कर्नाटक) फ़ोटो ललित शर्मा
उपरोक्त आलेख के लिए मैने भारत के चारों ओर के विभिन्न मंदिरों की भित्तियों में जड़ित प्रतिमाओं के चित्रों को जुटाया है। इनमे एक चीज समान है, वह है कि किसी भी प्रतिमा की नाक में छिद्र नहीं है अर्थात प्राचीन काल में नाक में नथ, कील, लौंगादि आभूषण धारण नहीं किए जाते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि कुषाण काल तक की प्रतिमाओं में नाक का आभूषण प्राप्त नहीं होता। मेरे द्वारा खींचे गए चित्रों में आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवी एवं पन्द्रहवी शताब्दी तक की प्रतिमाएँ जुटाई गई है। जिसमें किसी ने भी नाक का आभूषण नहीं पहना है।
क्षीर सागर में शेष शैया पर भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी (लक्ष्मीनारायण मंदिर ओरछा) फ़ोटो ललित शर्मा
अब प्रश्न यह उठता है कि महिलाओं द्वारा नाक में आभूषण कब से पहने जाने लगा। इसका जवाब भी मंदिरों से प्राप्त होता है। जब मैं ओरछा भ्रमण कर रहा था तब लक्ष्मीनारायण मंदिर की भित्तियों पर अठारवीं शताब्दी की भित्ति चित्रकारी दिखाई थी। इस चित्रकारी में रामायण के प्रसंगों से लेकर अंग्रेजों के साथ युद्ध तक को प्रदर्शित किया गया है। इन भित्ति चित्रों में कृष्ण राधा के उपवन विहार का प्रसंग भी दिखाई देता है, इस चित्र में सभी महिलाओं ने नाक में नथ पहन रखी है। शेष शैया पर विश्राम करते विष्णु के चित्र में भी लक्ष्मी की नाक में नथ पहनाई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि नाक में आभूषण पहनने की परम्परा मुगल काल में प्रारंभ हुई और अद्यतन जारी है।    

शनिवार, 1 जुलाई 2017

मानव का पक्षी प्रेम एवं शुक सारिका प्रसंग


पक्षियों से मनुष्य का जन्म जन्मानंतर का लगाव रहा है। पक्षियों का सानिध्य मनुष्य को मन की शांति प्रदान करता है तो बहुत कुछ सीखने को उद्यत करता है। कुछ पक्षी तो ऐसे हैं जो मनुष्य से उसकी बोली में बात करते हैं और इन्होंने सामान्य नागरिक के गृह से लेकर राजा महाराजाओं के महलों के अंत:पुर एवं ॠषियों की कुटियों में भी स्थान पाया है। शुक एवं काग ऐसे पक्षी हैं, जो ॠषियों के सानिध्य में ज्ञानार्जन कर शुकदेव एवं कागभुसुण्डि के नाम से लोक में प्रतिष्ठित हुए। शुक के सम्बंध में एक धारणा यह भी है कि वह बहुत बुद्धिमान होता है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शुक ने शिवजी का समस्त ज्ञान श्रवण द्वारा आत्मसात कर लिया था। वही अध्यात्म-पारंगत शुकदेव रूप में अवतरित हुआ।  इतिहास आलेख  शुक सारिका 
शुक सारिका खजुराहो 
विरहणी के एकांत के संगी के रुप में तोता-मैना लोक प्रसिद्ध हैं। अंत:पुर की विरह व्याकुल रमणी के द्वारा इन पक्षियों के संवाद से संस्कृत साहित्य भरा पड़ा है। तोता-मैना का लोक प्रसिद्ध कहानी एवं संवाद एक समय में यह युवा एवं युवती के मुंह से सुना जा सकता था। शुक-सारिका को लेकर बहुत ही कथाएं प्रचलित हैं, इन्हीं का लोक कथाओं में रूपान्तर ‘किस्सा तोता-मैना’ के नाम से हुआ जिसके विविध संस्करण बाजार में उपलब्ध हैं। ये दोनो पक्षी मनुष्य की बोली में बोलने की क्षमता के कारण प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान तक मनुष्य के साथी बने हुए हैं।

ऐसे में ये पक्षी शिल्पकार की दृष्टि से कैसे ओझल हो सकते थे। तोता-मैना को शिल्पकारों में अपने शिल्प में शुकसारिका के रुप में स्थान दिया। प्राचीन मंदिर स्थापत्य में शुकसारिका का शिल्पांकन प्रमुखता से दिखाई देता है। शिल्पकारों ने शुकसारिका को अपने शिल्प का विषय बनाया, जिससे युगों युगों तक पक्षी एवं मनुष्य के सानिध्य, प्रेम एवं सहवास को आने वाली पीढियाँ जान सकें। मुझे भारत में आठवीं नवमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी तक के स्थापत्य में शुक सारिका का शिल्पांकन दिखाई देता है। ऐसे में शुक सारिका के शिल्पांकन से खजुराहो के मंदिर कैसे अछूते रह सकते हैं। जहाँ कामसूत्र का शिल्पांकन हो वहाँ शुक सारिका का शिल्पांकन अवश्य मिलता है क्योंकि कामसूत्र में शुक सारिकाओं के साथ आलाप करने कराना की क्रिया को चौसठ कलाओं में गिना गया है।
लोक में तोता ही एक ऐसा पक्षी एवं जीव है जो मनुष्य की वाणी का अनुकरण कर सकता है। इसे बोलना सिखाना पड़ता है या यह किसी भी बोलते हुए मनुष्य का अनुकरण कर रटता है, परन्तु मैना स्वत: बोलती है। बस्तर की पहाड़ी मैना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी आवाज में बात करके अचंभित कर दिया था। शुक सारिका लोक प्रसिद्ध हैं, शुक ख्याति तो ऐसी है कि इसे पालने वाले सबसे पहले राम राम, सीता राम बोलना सिखाना है। किसी के घर के शुक की वाणी सुनकर उस परिवार के आचार विहार का आंकलन किया जा सकता है कि परिवार कितना सुसंस्कृत एवं सभ्य है। 
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर की शुक सारिका 
साहित्य में शुक ने प्रमुख स्थान पाया है, इसकी उपस्थित संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान तक प्राप्त होती है। जायसी के ‘पद्मावत’ में तोते को गुरु और मार्गदर्शक का पद प्राप्त है। ‘हीरामन’ नाम से वह रत्नसेन और पद्मावती को परामर्श भी देता है और उनके मिलन में सहायक भी होता है। रचना के अन्त में उसके बारे में स्पष्ट लिखा है—सूआ सोई जे पंथ दिखावा। बिनु गुरु जगत को निर्गण पावा।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी आत्माराम में वेदीग्राम का सुनार महादेव तोते के साथ अपने एकाकीपन को बांट लेता है। तो प्राचीनकाल के अंत:पुर की रमणियाँ भी शुक के साथ संवाद कर अपने एकाकीपन को दूर करती थी। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में सुआ प्रमुख स्थान रखता है। यहाँ यह विरहणी का संवदिया बनता है और सुआ गीत एवं सुआ नृत्य के रुप में लोक में स्थापित एवं प्रतिष्ठित हो जाता है। 
तोते की चोंच (शुक चंचू) जैसी किंचित टेढ़ी नासिका सौंदर्य का प्रतीक बनती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की शुकनासिका और बिम्ब अधरों का बहुत ही आकर्षक चित्र खींचा है। एक तोते को उर्मिला के नाक के मोती पर होंठों की कान्ति पडऩे के कारण अनार के दाने की भ्रान्ति हुई। फिर नाक को देखकर सोचता है यह दूसरा तोता कहां से आ गयाकवियों ने तोते का अनेक रूपों में चित्रण किया है। बड़े शौक से पाला हुआ तोता भी कभी उपेक्षा का शिकार हो जाता है और काले कौवों को सम्मान मिलता है। बिहारी ने अन्योक्ति के रूप में इसका चित्रण किया है।
मरत प्यास पिंजरा पर्यो सुआ समै के फेर।
आदर दै दै बोलियत वाईसु बलि के बेर॥
शुक-सारिका तो अनादिकाल से ही घरों एवं आश्रमों की शोभा बढ़ाते रहे हैं। जगज्जनी जानकी की विदा के समय उनके द्वारा पाले हुए ये पक्षी इतने दुःखी हुए कि इन्होंने परिजनों को भी अधीर कर दिया—
सुक सारिका जानकी ज्याये। कनक पिंजरन्ह राखि पढ़ाये॥
व्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुवि धीरजु परिहरह न केही॥
शुक सारिकाएँ राज महलों या किसी विलासी नागरिक के बहिर्द्वार तक ही नहीं मिलती थी इनकी उपस्थिति तपोवन में ॠषि निवासों में भी होती थी। सुप्रसिद्ध वाणभट्ट ने अपने पूर्व पुरुष कुबेर भट्ट का परिचय देते हुए गर्व से लिखा है कि उनके गृह के शुकों एवं सारिकाओं ने समस्त वांग्मय का अभ्यास कर लिया था और यजुर्वेद एवं सामवेद का पाठ करते समय पद पद पर ये पक्षी विद्यार्थियों की गलतियां पकड़ा करते थे। कालांतर में तो शुक इतने प्रबुद्ध हो गए कि शास्त्रार्थ तक करने लगे। शास्त्रार्थ-दिग्विजय के लिए निकले आचार्य शंकर ने पनिहारिनों से मंडन मिश्र का घर पूछा तो उन्होंने यही तो कहा था—
स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरो गिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धः जानाहितं मण्डन मिश्र धामम्॥
मुक्तेश्वर मंदिर समूह भुबनेश्वर में लेखक 
राष्टकवि दिनकर ने कहा था कि पक्षी और बादल। ये भगवान के डाकिये हैं। जो एक महादेश से। दूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं। मगर उनकी लाई चिट्ठियां/पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बांचते हैं। प्राचीन काल से लेकर अद्यतन पक्षियों एवं मनुष्य का साथ बना रहा और पक्षियों के माध्यम से मनुष्य ने अपनी वाणी को विस्तार दिया। इन पक्षियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के कारण साहित्य एवं शिल्प में महत्वपूर्ण स्थान भी पाया। प्रकृति के साथ जुड़े मनुष्यों का भविष्य में भी इनसे साथ बना रहेगा। इति शुक सारिका प्रकरणम्।

सोमवार, 6 जून 2011

बन्दुक और कैमरे में कोई फर्क नहीं : छायाचित्र प्रदर्शनी

फ़ाईजाह हुसैन
बन्दुक और कैमरे में कोई फर्क नहीं है. दोनों की भाषा एक जैसी है, टारगेट, काटरेज, बुल आई, फोकस और शूट. दोनों में ही पलक झपकते ही निशाना चूक जाता है और शिकार रफूचक्कर हो सकता है.

कुशल निशानेबाज सांसों को साधना जानता है. दम साधकर ही निशाना लगाया जाता है.परिणाम के लिए साधना की आवश्यकता होती है. साधना से ही साधन सधता है. तभी अपेक्षित परिणाम निकलता है.

ऐसे ही किसी साधक की तरह अपने कैमरे से परिपक्वता से छायाकारी करती है मॉस कम्युनिकेशन में बैचलर डिग्री ले रही फाइज़ाह हुसैन. फोटोग्राफी भी अभिव्यक्ति का सर्वमान्य सशक्त माध्यम है.युवा फोटोग्राफर अपने काम के प्रति बहुत ही गंभीर और परिपक्व दिखाई देती है. यह गंभीरता और परिपक्वता उनके चित्रों में स्पष्ट झलकती है.

इनके छाया चित्रों को देखने के बाद मुझे होमाई व्यारावाला की याद आती है, उन्होंने भी बचपन में इसी तरह फोटोग्राफी की शुरुवात की होगी.   

जब कोई चित्र खिंचवाता है तो वह सजग हो उठता है.यही सजगता छायाकारी की सहजता तो भंग कर देती है. इस प्रकार खींचे गए चित्रों से संवेदना  तिरोहित हो जाती है. वह सिर्फ साधारण चित्र बनाकर रह जाता है.

फाइज़ाह हुसैन के छाया चित्रों में संवेदना नजर आती है. इन्होने संवेदना की तीसरी आँख से विषयों को पकड़ा है और उन पलों को कैमरे में कैद किया है. आम जन जीवन को सूक्ष्मता से चित्रित किया है.

चित्रों में कलात्मक सौंदर्य है. जिस पर चलते-चलते आँख ठहर जाती है. कभी छायाकारी को उच्च कला की श्रेणी में नहीं रखा गया था. लेकिन वर्तमान में इसने अपना मुकाम बना लिया है. कला स्वरूपों की सृजन प्रक्रिया का प्रमुख आधार छायांकन ही बनता जा रहा है. न्यू मीडिया आर्ट की जो अवधारणा उभरी है उसका मुख्य आधार फोटोग्राफी ही है. 

आर्ट गैलरी
महंत घासीदास संग्रहालय की आर्ट गैलरी में फाइज़ाह हुसैन की प्रथम फोटोग्राफी की दो दिवसीय प्रदर्शनी का शुभारम्भ 24 मई 2011 को हुआ. इस अवसर इन्होने अपने चुनिन्दा 45 फोटो चित्रों को प्रदर्शित किया है.

चित्रों को देखने से आभास होता है कि किसी कुशल चित्रकार ने अपनी तूलिका से रंग भर दिये हों. प्रत्येक चित्र स्वयं में एक पूर्ण कहानी है. कुछ श्वेत श्याम चित्र भी दर्शकों के मन पर अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं.

मैं जब चित्रों को देख रहा था तो प्रत्येक चित्र के साथ मन में विचारों का सैलाब उमड़ रहा था. काव्य का निर्झर फूट पड़ा था. चित्र मन को स्पन्दित कर रहे थे. कुछ शब्द भी आकृति ले रहे थे. वे भी कुछ कहना चाहते थे और उसी की परिणीति यह पोस्ट बनी है।

फाइज़ाह हुसैन के छाया चित्रों में मौलिकता,अथक, बहुमुखी क्रियाशीलता, कल्पना, सतत जिज्ञासा और पर्यावेक्षण, देश-काल या युग-सत्य के प्रति सतर्कता, आत्मविश्वास प्रदर्शित होता है. 

छाया चित्र में प्रकाश संयोजन महत्वपूर्ण होता है और यह काम तब और चुनौतीपूर्ण होता है जब प्राकृतिक प्रकाश में काम करना हो.

आम जन जीवन जुड़े विषयों पर विविध एंगल, संयोजन, छाया, प्रकाश का विशेष ध्यान रखा है।फाईन आर्ट छायाचित्र कला फोटो का एक ऐसा कार्य है जिसमे छायाकार अपनी मौलिक वैचारिक सोच एवं क्रियात्मकता से अपने अंदर की कला-पिपासा शाँत करने के लिए प्रेरित होता है| 

यह विधा फोटो की अन्य विधाओं से अलग है जैसे कि अखबार के लिए छायाचित्र खींचना, जिसे फोटोजर्नलिस्म कहते हैं.

व्यासायिक फोटोग्राफी कहानी या वस्तु के बारे में एक दृश्य से सारी बात समझा देती है जबकि फाईन आर्ट फोटोग्राफी इन दोनों विधाओं से हटकर है| यह विधा कलाकार की सोच व प्रतीकात्मक कार्य का एक सफल और सहज माध्यम बन जाती है |

24 एवं 25 मई 2011 तक आर्ट गैलरी में लगी इस प्रदर्शनी को फ़ाईजाह ने नक्सली हमले में शहीद हुए सुरक्षा बलों को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हे समर्पित कर दिया। इससे उनकी गंभीर सोच का प्रमाण मिलता है। इस चित्र प्रदर्शनी को हजारों दर्शकों ने देखा और भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अशोक बजाज एवं फ़ाईजाह हुसैन
25 मई को रात्रि 8 बजे इस छाया चित्र प्रदर्शनी का समापन छत्तीसगढ राज्य भंडारण निगम के अध्यक्ष अशोक बजाज के कर कमलों से हुआ।

उन्होने प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए फ़ाईजाह के छाया चित्रों की सराहना की। ज्ञात हो कि भाई अशोक बजाज स्वंय एक उम्दा छाया चित्रकार हैं। उनके बरसों पहले खींचे गए कुछ मेरे पास भी हैं।

उन्होने इस अवसर पर कहा कि " फ़ाईजाह  की उम्दा छायाकारी देखने मिली, चित्रों में मानव जीवन के विविध रंगों के साथ संवेदना भी परिलक्षित हो रही है, आगे चलकर एक दिन फ़ाईजाह छत्तीसगढ एवं देश का नाम रौशन करेगी। इस प्रदर्शनी में फ़ाईजाह के तीन साल का काम प्रदर्शित हुआ है।

फ़ाईजाह हुसैन द्वारा भेंट किए गए चित्र को देखते हुए अशोक बजाज
एक खास बात मुझे और देखने मिली कि फाइज़ाह हुसैन के पालकों का इन्हें भरपूर सहयोग मिल रहा है. इनके पिता मुस्ताक भाई एवं मम्मी निसरीन जी ने इस युवा छायाकार का लगातार उत्साह बढाया.

वर्त्तमान में पालकों में एक जागृति देखने में आ रही है कि वे अपने बच्चों के शौक के प्रति सजग हैं और यही सजगता बच्चों की प्रतिभा को आगे लाने में पुरजोर मदद कर रही है. ऐसे माता-पिता साधुवाद के पात्र हैं. आशा है

फाइज़ाह हुसैन अपने काम के बलबूते पर बुलंदियों को छूएगी और छायांकन में बुलंद मुकाम को हासिल करेगी. यही मेरी कामना और शुभाशीष है। लगभग 30 मिनट तक अशोक बजाज जी ने चित्रावलोकन किया। यह समाचार आकाशवाणी द्वारा भी प्रसारित किया गया।

प्रदर्शनी के शुभारंभ पर मोमबत्तियां जलाकर शहीदो को श्रद्धांजलि
इस चित्र प्रदर्शनी को लगाने के संबंध में मैने संस्कृति विभाग के एक अधिकारी से आर्ट गैलरी नि:शुल्क उपलब्ध कराने के संबंध में चर्चा की।

चर्चा करने के बाद लगा कि-"इनसे चर्चा करके जीवन में पहली बार बहुत बड़ी गलत की।" (शायद इस गलती को भविष्य में दोहराना न चाहूँ) कुछ इस तरह के रोड़े अटकाने वाले अधिकारी भी हैं, जो नियमों का हवाला देते हुए आपके अच्छे काम की भी वाट लगा सकते हैं।

इसके पश्चात फ़ाईजाह संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल से मिली तो उन्होने 500 रुपए प्रति दिन के हिसाब से आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी लगाने की अनुमति दे दी।

प्रदर्शनी शु्रु हूई तो आर्ट गैलरी के एसी चालु  नहीं किए गए। दो दिनों में दर्शक और आयोजक गर्मी के कारण तंदुरी मुर्गा बन गए। मंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं साधुवाद कि उन्होने एक उदयीमान छाया चित्रकार का हौसला बढाने का कार्य किया।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

ब्लॉग लेखन को कानून के दायरे में लाना मौलिक अधिकार का हनन

ब्लॉगिंग को कानून के दायरे में लाकर सरकार ब्लॉगरों का मुंह बंद करना चाहती है। दुसरी तरफ़ फ़िल्मों एवं टीवी चैनलों पर धारावाहिकों में खुले आम अश्लीलता और गंदगी परोसी जा रही है।
जिससे समाज में विकृतियाँ और अपराध पैदा होते  स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है, टीवी और फ़िल्मों का गलत असर समाज पर पड़ रहा है। इन्हें कानून के दायरे में लाकर इस प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा? 
सुगबुगाहट तो पहले से चल रही थी, अब सरकार का स्वर बाहर आया है कि ब्लॉगिंग को जिम्मेदार बनाने के लिए कानून के दायरे में लाना चाहिए। अंतर जाल पर बढती हुई उच्श्रृंखलता इसका पहला कारण माना जा सकता है।

दूसरा कारण ट्युनिशिया और मिश्र के आन्दोलन में अंतरजाल ने जो भूमिका निभाई है, वह सरकार के कान खड़े करने के लिए काफ़ी थी।

ब्लॉगिंग स्वतंत्र उपाय है अभिव्यक्ति का। आज गाँव तक इंटरनेट का विस्तार हो  चुका है। लोग मोबाईल पर इंटरनेट की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।

वेब साईट से लेकर ब्लॉग भी पढ रहे हैं। सूचना क्रांति के इस युग में अब सूचनाएं कुछ सेकंडों में ही आम जनता तक पहुंच जाती है। अब लोगों को इसका व्यापक असर समझ में आने लगा है। 

मध्यवर्ती संस्थाओं के टर्म का दायरा ब्लॉगर तक बढाने के पीछे तर्क यह है कि जिस तरह इंटरनेट प्रोवाईडर संस्थाएं पाठक को  इंटरनेट से जोड़ती  हैं उसी तरह ब्लॉग पर लिखे गए लेख भी पाठकों को अपने तक जोड़ते हैं।

ब्लॉग स्वामी किसी के खिलाफ़ व्यक्तिगत आरोप आक्षेप वाली पोस्ट लगाता है और पाठक जब ब्लॉग पर अपमानजनक, अमर्यादित टिप्पणी करता है तो उसका जिम्मेदार ब्लॉग स्वामी ही होगा। इसके लिए ब्लॉग स्वामी को मध्यवर्ती संस्था मान कर कानून के दायरे में लाया जा रहा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गला घोंट कर फ़ासीवादी कानून बनाना जायज नहीं कहा जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का प्राण होती है और प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने का संवैधानिक अधिकार है।

ब्लॉगिंग को कानून के दायरे में लाकर सरकार ब्लॉगरों का मुंह बंद करना चाहती है। दुसरी तरफ़ फ़िल्मों एवं टीवी चैनलों पर धारावाहिकों में खुले आम अश्लीलता और गंदगी परोसी जा रही है। जिससे समाज में विकृतियाँ पैदा हो रही है।

स्पष्ट दिख रहा है टीवी और फ़िल्मों का असर समाज पर पड़ रहा है। इन्हे कानून के दायरे में लाकर इस प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा?

समाज में जो भी अपराध होते हैं, उसमें से अधिकतर अपराधिक प्रेरणा टीवी चैनलों एवं फ़िल्मो द्वारा ही मिलती है। इससे तो यह जाहिर होता है कि संगठित होकर किया गया अपराध भी क्षम्य होता है। उसे अपराध नहीं माना जाता।

टीवी चैनलो, मीडिया वालों एवं सिनेमा वालों के अपने संगठन हैं और ये संगठन के माध्यम से अपना विरोध प्रकट करके अपनी मांग मनवा लेते हैं।

समय आ गया है अब ब्लॉ्गरों को भी संगठित होने की दिशा में सोचना पड़ेगा। तभी किसी भी काले कानून के खिलाफ़ संगठित होकर ही लड़ाई लड़ी जा सकती है। इस पर कानून विशेषज्ञों से राय लेनी चाहिए, अन्यथा भुगतने के तैयार रहना पड़ेगा।

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

रेल बजट में छत्तीसगढ के साथ सौतेला व्यवहार

वर्तमान रेल बजट को देख कर लगता है कि यह देश का रेल बजट न होकर सिर्फ़ बंगाल के लिए ही है।  बिलासपुर जोन से रेल्वे को सर्वाधिक कमाई होती है। लेकिन बजट के अवसर पर हमेशा छला जाता है। छत्तीसगढ को रेल बजट में झुनझुना थमा दिया जाता है।

रायपुर से धमतरी चलने वाली नैरो गेज रेल को गत एवं वर्तमान रेलमंत्रियों ने बजट में घोषणा के बाद ब्राड गेज में नहीं बदला है। इस बजट में एक नयी सुरसुरी और छोड़ दी गयी कि “नैरो गेज को कांकेर तक ब्राडगेज किया जाएगा।" रेल के हिस्से में अधिकतर मंत्री बिहार या बंगाल से ही आए हैं।

इन लोगों ने हमेशा छत्तीसगढ के साथ सौतेला व्यवहार किया है। ऐसा लगता है रेल मंत्रालय बंगाल और बिहार तक ही सिमट कर रह गया है। कुछ राजनैतिक ज्योतिषियों ने कहा था कि इस बार भी छत्तीसगढ को कुछ नहीं मिलने वाला। 

नीतिश कुमार रेलमंत्री थे तो छत्तीसगढ के गर्वनर दिनेश नंदन सहाय के प्रयास प्रत्येक बजट में कुछ ट्रेने युपी और बिहार जाने वालों के लिए मिल जाती थी। लेकिन देश के अन्य हिस्सों को रेलमार्ग से जोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए था।

सम्पर्क क्रांति, दुर्ग-जयपुर, पुरी-जोधपुर ट्रेनों के फ़ेरे बढाए जाने चाहिए थे। दक्षिण की ओर जाने वाली ट्रेनों की कमी हमेशा महसूस होती है। रायपुर या बिलासपुर से दक्षिण के लिए नयी ट्रेन शुरु करने की मांग काफ़ी पुरानी है। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दिल्ली के लिए नान स्टाप सुपर ट्रेन चलानी चाहिए। इन मार्गों पर एक महीने पहले भी आरक्षण नहीं मिलता। 

छत्तीसगढ से 11 सासंद लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। तब भी ये सब मिलकर दबाव बनाने में कामयाब नहीं हो सके। ममता का बजट देश का बजट न होकर सिर्फ़ बंगाल के लिए ही रेल बजट है।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या रेलमंत्री के बजट में सिर्फ़ उसके प्रदेश को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए? सारी नयी योजनाएं परियोजनाएं उनके प्रदेश में ही होनी चाहिए। देश के अन्य राज्यों के लिए सौतेला व्यवहार क्यों?

कहा गया है –“मुखिया मुख सो चाहिए खान पान को एक” प्रधानमंत्री को ध्यान देना चाहिए कि रेल मंत्री के बजट में कहीं असंतुलन तो नहीं है। बजट असंतुलित होने से विरोध के स्वर उठना स्वाभाविक है। पता नहीं कब छत्तीसगढ की सुध रेलमंत्री को आएगी।    

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढता प्रजातांत्रिक गणतंत्र

भ्रष्टाचार का लगातार विरोध हो रहा है और उसके बावजूद  भी हजारों करोड़ के घोटाले  सामने आ रहे हैं। कलफ़दार नेता से लेकर बाबा सन्यासी तक ढोल पीट रहे हैं। नेता अधिकारियों एवं व्यापारियों के मिले जुले गिरोहों द्वारा जनता के धन पर डाले गए डाकों की फ़ेरहिस्त लम्बी है।

आजादी बचाओ आन्दोलन चलाने वाले स्व: राजीव दीक्षित 2 दशक तक स्विस बैंक के काले धन की वापसी पर देश भर में प्रवचन करते रहे और भ्रष्टाचार के आंकड़े देश की जनता तक पहुंचाते रहे।

एक समय ऐसा आया कि उनके भी जन जागरण के साधन चूक गए। राजीव दीक्षित के बाबा रामदेव से मिलन के पश्चात स्विस बैंक एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे को बाबा जी ने अपने हाथों उठा कर मुद्दा बना लिया। अब ये भी इसी मुद्दे के साथ चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं।

राजतंत्र में राजा मठ और सेठ का गठजोड़ ही प्रजा पर राज करता था। मठ आम जनता को धर्म से बांध कर रखते थे तो सेठ धन से। राजा इन दोनो का पोषण करता था। कुल मिलाकर इनके चंगुल में सारी प्रजा फ़ंसी रहती थी।

राजतंत्र के अवसान के पश्चात भी यह गठजोड़ कायम है। राजा, मठ, सेठ (नेता, बाबा, व्यापारी) ही लोकतंत्र में मजा कर रहे हैं। सत्ता की धुरी बने हुए हैं। प्रजा इनकी प्रदक्षिणा कर रही है। भ्रष्टाचार की विष बेल बढती ही जा रही है।

कम होने का नाम ही नहीं लेती। भ्रष्टाचार एक ऐसा पेड़ है जिसकी जड़ आसमान में है और शाखाएं जमीन पर। हम इसे जमीन पर खड़े होकर काट रहे हैं कि यह समाप्त हो जाए,लेकिन समाप्त होने की बजाए पोषित पल्लवित होकर विकराल रुप धारण कर रहा है। जनता की गाढी कमाई पर खुले आम डाका डाला जा रहा है।

राजनैतिक दल एवं इनके कार्यकर्ता अपने प्रचार-प्रसार के लिए बैनर फ़्लेक्स से लेकर अखबारों में लाखों रुपयों के विज्ञापन देते हैं। कोई भी युवक किसी भी राजनैतिक पार्टी के संगठन का पदाधिकारी बनते ही अखबारों में लाखों के विज्ञापन दे देता है।

शहर को अपने फ़ोटो लगे फ़्लेक्स बैनरों से पाट देता है। जगह-जगह स्वागत द्वार खड़े हो जाते हैं। स्वागत रैली में सैकड़ों गाड़ियाँ लगाई जाती है और हजारों की भीड़ एकत्रित की जाती है। एक दिन में इतना पैसा कहाँ से आ जाता है।

क्या पदाधिकारी बनते के साथ कोई जादू की छड़ी मिल जाती है या कल्पवृक्ष की छत्र छाया मिल जाती है? ये इनसे क्यों नहीं पूछा जाता कि खर्चा करने के लिए रुपया कहाँ से आया?

कॉलेज में दाखिल होने वाले युवा छात्र राजनीति में आ जाते हैं। छात्र संघ के चुनावों में लाखों रुपए फ़ूंक दिए जाते हैं। यह रुपया क्या छात्रों के पालक खर्च करने में सक्षम हैं? अगर नहीं तो इनके पास यह रुपया कहाँ से आता है?

नौकरी करते हुए राजनीति में आना संभव नहीं है। जिस युवा को नौकरी मिल जाती है वह राजनीतिक पार्टियों से दूर हो जाता है लेकिन जिसे नौकरी नहीं मिलती वह युवा राजनीति में आ जाता है। राजनैतिक पार्टियाँ द्वारा अपने संगठन में लेने से वह पूर्णकालिक नेता बन जाता है।

जब 24 घंटे वह पार्टी का काम करता है तो जीविकोपार्जन के लिए धन कहाँ से लाएगा? इसके लिए उसे कहीं दलाली करनी पड़ेगी। नौकरी लगाने, लायसेंस दिलाने, ट्रांसफ़र कराने के लिए रुपए लेने-देने पड़ेगें। क्योंकि कोई भी राजनैतिक पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को वेतन नहीं देती।

इनके पास सीधा फ़ंडा है कि खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। राजनैतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को वेतन नहीं देकर उन्हे भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देते हैं एवं उनके अनैतिक कार्यों को संरक्षण एवं समर्थन। 

युवा पीढी राजसत्ता के समीप रहने वाले लोगों को जब चमचमाती हुई, लकदक करती लाखों की गाड़ियों में घुमते एवं एश-ओ-आराम के जुटाए गए सभी सामान देखती है तो इनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहती।

भले ही यह सब भ्रष्ट आचरण करके जुटाया गया हो। वह इनकी दबंगाई को देखकर प्रभावित होती है। जब सत्ता के समीप रहने वालों का कुछ नहीं बिगड़ता और उन्हे गुनाह करने पर नेताओं द्वारा बचाया जाता है तो धनार्जन एवं प्रभाव प्राप्त करने के लिए इनका ही अनुशरण करती है। वही पथ अपनाती है जिस पर भ्रष्ट लोग चल रहे हैं। 

जितना काला धन स्विस बैंकों में जमा है उससे कई गुणा अधिक धन देश में कालेबाजारियों, अधिकारियों एवं नेताओं की तिजौरी में कैद है। बेनामी सम्पत्तियों की देश में भरमार है।

विगत दिनों कई समाचार आए हैं कि किस तरह उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों ने भ्रष्टाचार कर अकूत संपत्ति एकत्रित की है। किस तरह धन पापर्टी में लगाया गया है। भ्रष्टाचार में लिप्त लोकतंत्र के पहरुए चौथे खंबे की भी कलई खुली है।

देश के नामी पत्रकारों का भी नाम सामने आया है। बड़े-बड़े कार्पोरेट हाउस अखबार छापने लगे हैं। टीवी चैनल शुरु कर रहे हैं अपने काले धन एवं काले कारनामों के छिपाने लिए। सरकार को ब्लेकमेल कर रहे हैं। इनकी करतूतों से आम आदमी का जीवन दुभर हो रहा है तथा मंहगाई निरंतर बढती जा रही है।

नैतिकता एवं ईमानदारी किस चिड़िया का नाम है, लोग भूलते जा रहे हैं। आज आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है। किसी तरह परिवार के लिए रोटी और कपड़ा का जुगाड़ कर पाता है,मकान का सपना देखना तो भूल ही गया है।

बाबा रामदेव अलख जगाने के लिए निकल पड़े हैं देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध। जगह-जगह उनके कार्यक्रम हो रहे हैं। लेकिन इनके ईर्द-गिर्द भी वही जाने-पहचाने चेहरे नजर आ रहे हैं। जो अन्य नेताओं के ईर्द-गिर्द देखे जाते थे।

बाबा रामदेव के आन्दोलन की नीयत पर प्रश्न नहीं है लेकिन इनके आस-पास दिखाई देने वाले चेहरों को देखते हुए है आन्दोलन की सफ़लता पर संदेह अवश्य होता है।  किसी का एक शेर याद आ रहा है- 

गुनाहगारों पे जो देखी रहमत-ए-खुदा ।
बेगुनाहों ने भी कहा हम भी गुनाहगार हैं।।