बुधवार, 2 दिसंबर 2009

लक्ष्मी पूजन में जुआ खेलने वालों का कारनामा

आज एक गांव की बात सुनाते हैं, हमारे देश में लक्ष्मी पूजन के दिन एवं दीवाली के त्यौहार में जुआ खेलने की कूप्रथा है. 

बड़े-बड़े समझदार और पढ़े लिखे लोग भी जुआ खेलते हैं और गांव के गंवार लोग भी जुआ खेलते हैं. वैसे जुआ खेलना क़ानूनी जुर्म है, फिर भी लोग चोरी छिपे जुआ खेलकर अपना भाग्य आजमाते हैं, 

लक्ष्मी पूजन को लक्ष्मी घर आनी चाहिए. गांव में यही सोच कर कुछ लोग जुआ खेल लेते हैं. इस अवसर पुलिस को ऊपर से निर्देश रहता है, जुआ पकड़ कर अपराध दर्ज करो, 

पुलिस भी सुंघते फिरती रहती है कि कहाँ पर "धर्मराज के अनुयायी" मौजूद हैं, बावनपरी के साथ, उनको धरा जाए. 

हमारे गांव में तालाब के किनारे शीतला माता का मंदिर है. एक तरफ तालाब और दूसरी तरफ धान के खेत हैं. बीच में शीतला मंदिर. कुछ सयाने (चतुर) जुआड़ी लोग मंदिर में बैठ कर जुआ खेलते हैं. 

एक बार दीवाली में रात को इनका मजमा लग गया. मंदिर में बैठ कर शुरू हो गया जुए का खेल, इसमें सभी उम्र के शौक़ीन लोग थे, कुछ लोग देखने भी गए थे मुफ्त का मजा लेने के लिए. 

पुलिस को किसी ने मुखबिरी कर दी कि मंदिर में जुआ चल रहा है. पुलिस ने रात को मंदिर के पास घेरा डाला और घात लगा कर सबको दबोचने की तैयारी की. 

पुलिस पीछे से धान के खेत से आकर मेड पर दुबकी हुई दबोचने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी. इतने में ही एक जुआड़ी  को लघुशंका लगी, वह तालाब की मेड पर धान के खेत की तरफ गया लघु शंका करने,

उसे अँधेरे में कुछ साये हिलते हुए दिखाई दिए, उसने आवाज लगाई "कौन है बे?" उधर से कोई जवाब नहीं मिला तो उसने फिर गाली बक कर आवाज लगाई. 

अब पुलिस से रहा नहीं गया, दरोगा चिल्लाया " पकड़ो सालों को एक भी भागने ना पाए"!  जुआडियों को  पता चल गया कि पुलिस की रेड हो गई। 

सब अपना-अपना माल असबाब समेट कर भागने लगे, भागने के रास्ते को पुलिस ने बंद कर दिया था. लोग तालाब में कूद गए, 

इन जुआडियों में एक मोटा आदमी भी था। वह भी इनके साथ तालाब में कूद गया. बाकी सब तो तैर कर पार निकल गए और मोटा होने के कारण ये फँस गया. अब निकल भी नहीं सकता था. 

चिल्लाने लगा" मैं तैर नहीं सकता साहब- मुझे बचाओ- मुझे बचाओ- भले ही मुझे हवालात में बंद कर देना लेकिन मुझे निकालो।" पुलिस ने उसे तालाब से निकाला और उसे पकड़ कर ले गई. 

आज जब भी उसे मैं देखता हूँ तो मुझे हंसी आ जाती है. जो अपराधी थे वो भाग गए और देखने वाला फँस गया. इसी को कहते हैं. "माल खाए गंगा राम और मार खाए मनबोध"

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

दूध देने वाली लोहे की भैंस: एक नया अविष्कार

कबाड़ इकट्ठा कर रहा हूँ लोहे का, पाईप, चद्दर, एंगल, गिरारी, पुल्ली, सफ्टिंग, नट-बोल्ट, स्क्रू, अब मैंने जो माडल कागज पे खींचा है उसे रूप देने के लिए जरूरत है एक वेल्डिंग मशीन की, जो इन सबको जोड़ दे, एक नया अविष्कार हो जाये, इस मानव जगत के लिए. 

मैं इस संसार को कुछ देना चाहता हूँ. वेल्डिंग मशीन के लिए दौड़ कर जागेश्वर मिस्त्री के पास जाता हूँ, 

"जरा दो घंटे के लिए तेरी वेल्डिंग मशीन दे दे यार," 

क्या करोगे महाराज आज वेल्डिंग मशीन का? जागेश्वर कहता है. 

"कुछ नही थोडा वेल्डिंग करना है पाईप, एंगल."

 मैं वेल्डिंग मशीन घर लेकर आ जाता हूँ और अपने काम में लग जाता हूँ मनोयोग से, अब मेरी मशीन तैयार हो जाती है. हो जाता है तैयार मेरा नया अविष्कार, "दूध देने वाली मशीन", 

पहले हमारे घर में गाय-भैंसों से कोठा भरा रहता था, उनकी सेवा चाकरी के लिए 5  नौकर, जो दाना-चारा पानी से लेकर सारा काम करते थे, हमें मिलता था शुद्ध दूध, दही, घी, छाछ, और उस समय गरम-गरम गुलाबी मलाई चुरा कर खाने का तो क्या आनंद था. 

दोपहर में जब सब आराम करते थे तो मैं चुपके से निकल कर मिटटी की हांडी का ढक्कन खोल कर एक झटके में  ही पूरी मलाई साफ कर जाता था. 

दादी बहुओं (मेरी माँ-चाची) को बकती थी, उन पर संदेह करती थी कि मलाई ये खा जाती है, ये रोज का काम था. एक दिन माँ ने मुझे रंगे हाथों पकड लिया और दादी के दरबार में पेश किया, 

दादी बोली " मलाई खा गया तो क्या हुआ? मेरा पोता है, बड़ा होकर जवान बनेगा" अब इसे पकड़ कर मत लाना, और सबसे अधिक दूध-घी मेरे ही हिस्से में आता था. अब  ये सब एक गुजरे जमने की बातें हो गयी, 

दादी भी नहीं रही. सब पशुधन भी चला गया, हम संभाल नहीं सके, एक दिन फिर भैंस लेने की मन में आई, मैंने माँ को राजी किया, वो तैयार हो गई. लेकिन छोटे भाई ऐसा गणित समझाया कि पूरी योजना फेल हो गई. 

वो हिसाब लगा कर बोला "माँ देख ले हिसाब, एक भैंस खरीद कर उसे खिलाने पिलाने के बाद जो दूध हमें मिलेगा, उसमे हमें घाटा ही है और उसे पालने का सिरदर्द अलग से, इससे सस्ता तो "मोल" का दूध है. कोई समस्या नहीं है. 

इतने से ही मेरी योजना फेल हो गई. मैंने सोचा कि इस समस्या का हल अब मशीन से ही करना है कम से कम बच्चों को घी - दूध मिल जायेगा,

इसलिए मैं इस मशीन का अविष्कार किया, लोहे की मशीन, बिजली से चलने वाली, बस एक तरफ से चारा डालो, दूसरी तरफ से दूध निकालो, "नो टेंशन", 

अब मशीन बन गई. उसे मैंने चालू किया. और चारा डाला तो तो दूध निकलने लगा. मैं बहुत खुश हुआ. एक नया अविष्कार "लोहे की भैंस" बटन दबावों, चारा डालो, ढूढ़ निकालो, 

फिर अचानक देखा कि " दूध के साथ-साथ उसी पाईप से गोबर भी निकलने लगा" तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. 

अरे! मैं तो एक गोबर निकलने कनेक्शन बनाना ही भूल गया, गोबर को तो अलग रस्ते से निकालना पड़ेगा. नहीं तो दूध वाले रास्ते से ही आएगा, दूध का सत्यानाश हो जायेगा. 

 मेरा नया अविष्कार फेल होने की कगार पर था. मै सर पर हाथ रख कर सोच रहा था कि क्या किया जाये? इस समस्या का हल कैसे निकाला जाये? 

तभी महाराजिन की धमकी भरी आवाज सुनाई दी. "अरे! पांच बज गए हैं, क्या रात तक सोते ही रहोगे?" बस हो गया सत्यानाश, हमारी योजना पर पानी फिर गया, हमारे नए अविष्कार की भ्रूण हत्या हो गयी. 

मैंने आँख मलते हुए कहा " मेडम! अगर थोड़ी देर सबर कर लेती तो सात पीढ़ी बैठे-बैठे रायल्टी खाती. सारी आर्थिक समस्याओं का हल हो जाता. एक नई स्वेत क्रांति का जन्म हो जाता. 

तुम तो मुझे सिर्फ निट्ठल्ला ही समझती हो. अब देखो कितना नुकसान हो गया दुनिया का? जानम समझा करो, सोते से मत उठाया करो?