सोमवार, 17 जून 2013

पापा जादूगर ..........

जादूगर तरह तरह के खेल दिखा रहा था, बच्चे मंत्र मुग्ध होकर उसके हैरत अंगेज करतब देख रहे थे। कभी डिब्बे से कबूतर निकालता और उसे गायब कर देता तो कभी रंग बिरंगे फ़ूल निकाल कर दिखाता। कभी छोटी सी बॉल को फ़ुटबाल बना देता तो कभी रुमाल को हवा में गायब कर देता। उसकी छड़ी में गजब का जादू था, उसे घुमाते ही पलक झपकते जादू हो जाता। बच्चों के मन में कौतुहल था कि जादूगर ये सब कैसे करता है। सब बच्चों के बीच से उदय उठा और जादूगर के पास पहुंचा। उसे अपनी खिलौना कार दी और बोला - इसे बड़ा कर दो। जादूगर चकित होकर उदय की ओर देखकर बोला - "बेटा कार को बड़ा करने वाला जादू सिर्फ़ आपके पापा ही दिखा सकते हैं, वे ही इस कार को बड़ा कर सकते हैं, मैं नहीं। उस वक्त उदय तीन साल का था। अब वह मेरे से जिद करने लगा कि कार को बड़ा करो। मैने उससे कुछ दिनों का समय लिया और कार को बड़ा कर दिया।

जादूगर ने यह बात सहज ही कही थी लेकिन उसमें गुढार्थ था। पापा ही दुनिया के एकमात्र ऐसे जादूगर होते हैं जो परिवार की सभी मांगों को पूरा कर सकते हैं। बच्चा हो या बूढा हो, सभी की आशाएं उसके साथ लगी रहती हैं। दुनिया के महान जादूगर होते हैं पापा। मेरे पापा भी जादूगर थे, मैं सोचता था कि उनके पास जादू की असीमित शक्तियाँ हैं। उनके पास नाग मणि है, जो चाहो मांग लो। मनवांछित मिल जाएगा। लेकिन यह जादू क्या होता है और कैसे होता है, इसका रहस्य पापा बनने के बाद ही पता चलता है। जो चीजें पलक झपकते ही प्राप्त होने की कामना करने बाद प्राप्त हो जाती थी वे किस तरह से आती हैं और उस जादू को दिखाने के लिए कौन से मंत्र को सिद्ध करके उसका सफ़ल प्रयोग करना पड़ता है। यह सिर्फ़ पापा ही जानते हैं और कोई नहीं। उदय भी जान जाएगा कि पापा ने छोटी सी कार को बड़ा कैसे किया जब उसका बेटा उससे यह इच्छा जाहिर करेगा।

पापा को हमेशा कई मोर्चों पर लड़ना होता है, उसके लिए युद्ध के कई मोर्चे खुले होते हैं। इतने मोर्चों पर कोई बहादूर योद्धा ही लड़ कर विजय प्राप्त कर सकता है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते ही दो मोर्चे तो सभी के लिए खुल जाते हैं। अर्थ अर्जन करना और गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति करना। कुछ कम खट कर अधिक कमा लेते हैं तो कुछ अधिक भाग दौड़ करने के बाद भी गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाते हैं। लेकिन बच्चों को हमेशा पापा से जादू की ही उम्मीद होती है, उनके सपने अनंत होते हैं और सभी सपने मूर्त हो जाएं यह किसी भी जादूगर से संभव नहीं है। कल्पनाओं की  उड़ाने अनंत होती हैं। आज एक बच्चे की कल्पनाओं को साकार करने के लिए सारा परिवार तैयार रहता है। लेकिन कभी वह समय भी था जब कल्पनाएं और आकांक्षाए सारी जिन्दगी पूर्ण नहीं हो पाती थी।


जादूगर पापा तो प्रत्येक युग में हुए हैं, समय के परिवर्तन के साथ उनका जादू भी परिष्कृत होते गया। पहले होली और दीवाली ही नए कपड़े सिलाए जाते थे। घर में दर्जी अपनी मशीन लेकर आता था और महीने भर सभी के कपड़े सिलता था। उस जमाने में सिले सिलाए कपड़ों को अच्छा नहीं समझा जाता था। कहा जाता था कि - न जाने किस बीमार या मुर्दे के उतार कर सिले सिलाए कपड़े बेचे जाते हैं। इसलिए कपड़े सिलवा कर ही पहने जाते थे। आज वे बीमारों और मुर्दों के कपड़े घर घर में मौजूद हैं। जब भी मांग हुई और पापा को जादू से कपड़े उपलब्ध करवाने ही पड़ते हैं, वार-त्यौहार की बात क्या की जाए। एक पट्टी सिलेट में साल भर निकल जाता था। आज नर्सरी से ही कापियों और पुस्तकों का ढेर लगाना पड़ता है। एक गणवेश सारे साल चल जाती थी। लेकिन आज 5-5 गणवेशों का प्रबंध करना पड़ता है। वर्तमान में बढती हुई मंहगाई को देखते हुए घर-गृहस्थी के सामान का प्रबंध करना भी किसी जादू से कम नहीं है।


3 साल पहले उदय ने जिद पकड़ ली कि उसे छोटी सायकिल चाहिए। जबकि घर में 2 छोटी सायकिलें मौजूद थी। लेकिन उसे तो नई चाहिए थी। नई सायकिल आते ही कुछ दिन चलाई फ़िर उसके टायर आरी से काट कर देखे कि उसमें हवा कहाँ होती है। टायर शहीद हो गए लेकिन हवा की उपस्थिति का पता नहीं चला। थोड़े दिन छोटी सायकिल चला कर बड़ी सायकिल पर हाथ मारने लगा। छोटी सायकिल मुरचा खाई हुई पड़ी है। अब स्कूटी की मांग चल रही है। सायकिल को स्कूटी में बदलने का जादू सिर्फ़ पापा ही दिखा सकते हैं, दुनिया का अन्य कोई जादूगर नहीं दिखा सकता। हम 24 इंच की सायकिल से ही कैंची चलाना सीखे थे। छोटी सायकिल चलाने का सपना तो अधूरा ही रह गया। शायद मेरे पापा को सायकिल छोटी करने का जादू नहीं आता था। बदलते समय के साथ पापाओं को यह सब जादू आना जरुरी हो गया है। जिससे गृहस्थी की हर जरुरतें पूरी हो सकें और बच्चे कह सकें मेरे पापा बहुत बड़े जादूगर थे।

शुक्रवार, 31 मई 2013

मन पखेरु उड़ चला फ़िर : परिचर्चा से लौट कर

कार्यक्रम - परिचर्चा : मन पखेरु उड़ चला फ़िर
स्थान - कान्स्टिट्युशन क्लब डिप्टी स्पीकर हॉल नई दिल्ली
दिनांक-18 मई 2013, समय - 5 बजे सांय

काव्य संग्रह का पुनः लोकार्पण 
घन चक्करों से घुरते-फ़िरते दिल्ली के गोल चक्करों के चक्कर काटते हुए मेजबान के साथ वीपी हाउस के समीप स्थित कान्स्टिट्युशन क्लब कुछ विलंब से पहुंचे। द्वार पर पहुंचते ही सुनीता शानु जी का चित्र लगा फ़्लेक्स बैनर दिखाई दिया। इससे प्रमाणित हो गया कि सही स्थान पर पहुंच गए। हाथों में गुलदस्ते थामे डिप्टी स्पीकर हॉल की ओर बढते हुए हमारी ओर लोगों की निगाहें जमी हुई थी। गुलदस्ता चीज ही ऐसी है, दिल्ली की सारी राजनीति और औपचारिकताएं गुलदस्तों पर टिकी है। ये दिल्ली है भाय, गुलदस्ता किसी का होता है और मौज कोई और ले जाता है गुलदस्ते के दाम चुकाने वाला खोपड़ी खुजाते रहता है कि सोचा था क्या और क्या हो गया? पलक झपकते ही परदा बदल जाता है, रामलीला की जगह कृष्णलीला( अश्वत्थामा हत: नरो वा कुंजरो वा) का प्रहसन शुरु हो जाता है। कांच के दरवाजे को खोलते ही सामने एक बड़ा फ़्लेक्स लगा दिखाई देता है। जिससे प्रदर्शित होता है कि प्रकाशक ने "मन पखेरु उड़ चला फ़िर" काव्य संग्रह पर परिचर्चा करने हेतु बड़ा आयोजन किया है।

सम्मानित अथितिगण 
बड़ी बड़ी धवल प्राचीरों के मध्य नीले रंग की कुर्सियाँ  गजब का कांट्रास्ट बना रही थी। सर्व प्रथम शैलेष भारतवासी ने आगे बढ कर अभिवादन किया और उसके पश्चात रतनसिंह शेखावत जी के साथ हमारा मेंट्रो अखबार के प्रधान सम्पादक राजकुमार अग्रवाल जी से भेंट हुई। विशेष अतिथि, मुख्यातिथि एवं अथिति श्रोता इत्यादि धीरे-धीरे सभागृह में स्थान ग्रहण कर चुके थे। आज काव्य संग्रह की परिचर्चा में आनंद कृष्ण (जबलपुर) मैत्रेयी पुष्पा (दिल्ली) लक्ष्मी शंकर बाजपेयी (दिल्ली) को बोलना था और संचालन का जिम्मा ओम निश्चल (बनारस) के जिम्मे था। सुनीता शानु जी को अपने काव्य संग्रह से कविता पाठ भी करना था। ये एक ऐसा अवसर था जब दो वर्षों के पश्चात मेरी भेंट ब्लॉगर मित्रों से होनी थी। साथ ही साहित्य जगत की महा हस्तियों के भी दर्शन होने थे।

ब्लॉगर रतनसिंह, ललित शर्मा, अविनाश जी 
कार्यक्रम प्रारंभ हो गया। सारी नीली कुर्सियाँ भर चुकी थी। सम्मानादि की औपचारिकता के पश्चात आनंद कृष्ण जी ने कविता संग्रह पर प्रकाश डाला। शैलेष भारतवासी बारातियों के स्वागत में व्यस्त दिखाई दिए। राजीव तनेजा, संजु तनेजा, मोहिन्दर कुमार, अनिवाश वाचस्पति, संतोष त्रिवेदी, पवन चंदन, सुमीत प्रताप सिंह, सिद्देश्वर जी उत्तराखंड से, अंजु चौधरी, वंदना गुप्ता, डॉ अरुणा जी, आलोक खरे, शाहनवाज हुसैन, राघवेंद्र अवस्थी, मुकेश सिन्हा, बबली वशिष्ठ (हेमलता), बलजीत कुमार, राजीव कुमार इत्यादि ब्लॉगर उपस्थित हो चुके थे। सारी कुर्सियों ने मेहमानों का भार वहन कर लिया था। साथ ही सामने रखे सोफ़े पर भी मेहमान शोभायमान हो चुके थे। आनंद कृष्ण जी ने काव्य संग्रह की गहन समीक्षा की। इसके पश्चात लक्ष्मीशंकर बाजपेयी जी ने काव्य संग्रह की सराहना करते हुए सुनीता जी से अपेक्षा रखी कि वे अब छंद बद्ध, मुक्त कविता, दोहे, गजल इत्यादि के पृथक संग्रह प्रकाशित करें। मैत्रेयी पुष्पा जी ने कहा कि कोई भी कथाकार पूर्व में कवि होता है। मैं भी कविताएं लिखती थी उसके बाद ही गद्य लेखन लेखन प्रारंभ किया।

एक चौका हमने भी मार दिया छत्तीसगढ़ी कविता का
इसके पश्चात दूसरे सत्र में कुछ कवियों द्वारा कविता पाठ किया गया। जिसमें मुकेश कुमार सिन्हा, ब्लॉगर ललित शर्मा, अंजु चौधरी, सिद्देश्वर जी, बबली वशिष्ठ, अमन दलाल, नीलम नागपाल मेंहदी रत्ता, संगीता विज के साथ ओम निश्चल एवं लक्ष्मी शंकर बाजपेयी ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन मंचीय कवियत्री ममता किरण ने किया। कार्यक्रम सम्पन्न होने पर सभी कवियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए गए, इसके पश्चात भोजन की घोषणा हो गयी और ब्लॉगर साथियों के साथ चर्चा करने का अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की उपलब्धि यह रही कि "मन पखेरु उड़ चला फ़िर" के बहाने ब्लॉगर साथियों के साथ एक अर्से के बाद मुलाकात हो गयी। भोजनोपरांत कार्यक्रम में उपस्थित सभी देवी एवं देवता अपने-अपने ग्राम को प्रस्थान कर गए और मेरा ग्राम दूर होने के कारण मैं दिल्ली का मेहमान बना रहा।

कवियत्री हेमलता को स्मृति  चिन्ह देते अविनाश जी 
काव्य संग्रह के विमोचन का कार्यक्रम पिलानी में रखा गया था, लेकिन व्यवधान होने से मैं पहुच नही पाया। इसलिए दिल्ली के कार्यक्रम में उपस्थित होना अत्यावश्यक हो गया था। कार्यक्रम बढ़िया रहा, इसकी सफ़लता का श्रेय परदे के पीछे से संचालन कर रहे सुनीता जी के पतिदेव पवन चोटिया जी को देना होगा। उनकी अथक मेहनत एवं परिश्रम से यह आयोजन सफल हो सका। ये उनका स्नेह ही था जिसने मुझे 1500 किलो मीटर दूर से दिल्ली खींच लिया। सुनीता जी की रचनाधर्मिता से तो सारा ब्लॉग जगत एवं साहित्य जगत परिचित है। कम्पनी के कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद भी उनका लेखन कार्य 25 वर्षों से अहर्निश जारी है। व्यंग्य लेखन में उन्हे महारत हासिल है। पवन जी उन्हे हमेशा प्रेरित करते रहते हैं। तीन दशकों के लेखन के बाद पवन जी चाह्ते थे कि सुनीता जी का काव्य संग्रह भी साहित्य जगत के सामने आए और वह घड़ी आ गई जब सुनीता जी का काव्य संग्रह " मन पखेरु उड़ चला फ़िर" के नाम से सामने आया।

अगली शाम सुनीता जी, पवन जी के साथ 
सुनीता जी को लेखन के प्रति प्रोत्साहित करने के पीछे सारा परिवार ही दिखाई देता है। जिसमें उनके माता-पिता, सास-ससुर, पति पवन चोटिया जी , पुत्र आदित्य तथा अक्षय का नाम उल्लेखनीय है। पवन जी ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, दिल खोल कर खर्च किया और कहीं अहसास नहीं होने दिया कि यह आयोजन उनका है। सभी को यही लगा कि हिन्दी युग्म में बड़े पैमाने पर इस काव्य संग्रह की लांचिग की है। फ़िर भी शैलेष जी ने काफ़ी मेहनत की उन्हे साधुवाद। साथ ही सुनीता शानु जी को भी प्रथम काव्य संग्रह के प्रकाशन मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं। वे उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर हों। अस्माकं वीरा/वीरांगना उत्तरे भवन्तु की कामना के साथ साधुवाद। :) 
कार्यक्रम उपरांत एक विमोचन फुटपाथ पर 
मिलते हैं अगली कथा में .......... जारी है।