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सोमवार, 17 जून 2013

पापा जादूगर ..........

जादूगर तरह तरह के खेल दिखा रहा था, बच्चे मंत्र मुग्ध होकर उसके हैरत अंगेज करतब देख रहे थे। कभी डिब्बे से कबूतर निकालता और उसे गायब कर देता तो कभी रंग बिरंगे फ़ूल निकाल कर दिखाता। कभी छोटी सी बॉल को फ़ुटबाल बना देता तो कभी रुमाल को हवा में गायब कर देता। उसकी छड़ी में गजब का जादू था, उसे घुमाते ही पलक झपकते जादू हो जाता। बच्चों के मन में कौतुहल था कि जादूगर ये सब कैसे करता है। सब बच्चों के बीच से उदय उठा और जादूगर के पास पहुंचा। उसे अपनी खिलौना कार दी और बोला - इसे बड़ा कर दो। जादूगर चकित होकर उदय की ओर देखकर बोला - "बेटा कार को बड़ा करने वाला जादू सिर्फ़ आपके पापा ही दिखा सकते हैं, वे ही इस कार को बड़ा कर सकते हैं, मैं नहीं। उस वक्त उदय तीन साल का था। अब वह मेरे से जिद करने लगा कि कार को बड़ा करो। मैने उससे कुछ दिनों का समय लिया और कार को बड़ा कर दिया।

जादूगर ने यह बात सहज ही कही थी लेकिन उसमें गुढार्थ था। पापा ही दुनिया के एकमात्र ऐसे जादूगर होते हैं जो परिवार की सभी मांगों को पूरा कर सकते हैं। बच्चा हो या बूढा हो, सभी की आशाएं उसके साथ लगी रहती हैं। दुनिया के महान जादूगर होते हैं पापा। मेरे पापा भी जादूगर थे, मैं सोचता था कि उनके पास जादू की असीमित शक्तियाँ हैं। उनके पास नाग मणि है, जो चाहो मांग लो। मनवांछित मिल जाएगा। लेकिन यह जादू क्या होता है और कैसे होता है, इसका रहस्य पापा बनने के बाद ही पता चलता है। जो चीजें पलक झपकते ही प्राप्त होने की कामना करने बाद प्राप्त हो जाती थी वे किस तरह से आती हैं और उस जादू को दिखाने के लिए कौन से मंत्र को सिद्ध करके उसका सफ़ल प्रयोग करना पड़ता है। यह सिर्फ़ पापा ही जानते हैं और कोई नहीं। उदय भी जान जाएगा कि पापा ने छोटी सी कार को बड़ा कैसे किया जब उसका बेटा उससे यह इच्छा जाहिर करेगा।

पापा को हमेशा कई मोर्चों पर लड़ना होता है, उसके लिए युद्ध के कई मोर्चे खुले होते हैं। इतने मोर्चों पर कोई बहादूर योद्धा ही लड़ कर विजय प्राप्त कर सकता है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते ही दो मोर्चे तो सभी के लिए खुल जाते हैं। अर्थ अर्जन करना और गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति करना। कुछ कम खट कर अधिक कमा लेते हैं तो कुछ अधिक भाग दौड़ करने के बाद भी गृहस्थी की आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाते हैं। लेकिन बच्चों को हमेशा पापा से जादू की ही उम्मीद होती है, उनके सपने अनंत होते हैं और सभी सपने मूर्त हो जाएं यह किसी भी जादूगर से संभव नहीं है। कल्पनाओं की  उड़ाने अनंत होती हैं। आज एक बच्चे की कल्पनाओं को साकार करने के लिए सारा परिवार तैयार रहता है। लेकिन कभी वह समय भी था जब कल्पनाएं और आकांक्षाए सारी जिन्दगी पूर्ण नहीं हो पाती थी।


जादूगर पापा तो प्रत्येक युग में हुए हैं, समय के परिवर्तन के साथ उनका जादू भी परिष्कृत होते गया। पहले होली और दीवाली ही नए कपड़े सिलाए जाते थे। घर में दर्जी अपनी मशीन लेकर आता था और महीने भर सभी के कपड़े सिलता था। उस जमाने में सिले सिलाए कपड़ों को अच्छा नहीं समझा जाता था। कहा जाता था कि - न जाने किस बीमार या मुर्दे के उतार कर सिले सिलाए कपड़े बेचे जाते हैं। इसलिए कपड़े सिलवा कर ही पहने जाते थे। आज वे बीमारों और मुर्दों के कपड़े घर घर में मौजूद हैं। जब भी मांग हुई और पापा को जादू से कपड़े उपलब्ध करवाने ही पड़ते हैं, वार-त्यौहार की बात क्या की जाए। एक पट्टी सिलेट में साल भर निकल जाता था। आज नर्सरी से ही कापियों और पुस्तकों का ढेर लगाना पड़ता है। एक गणवेश सारे साल चल जाती थी। लेकिन आज 5-5 गणवेशों का प्रबंध करना पड़ता है। वर्तमान में बढती हुई मंहगाई को देखते हुए घर-गृहस्थी के सामान का प्रबंध करना भी किसी जादू से कम नहीं है।


3 साल पहले उदय ने जिद पकड़ ली कि उसे छोटी सायकिल चाहिए। जबकि घर में 2 छोटी सायकिलें मौजूद थी। लेकिन उसे तो नई चाहिए थी। नई सायकिल आते ही कुछ दिन चलाई फ़िर उसके टायर आरी से काट कर देखे कि उसमें हवा कहाँ होती है। टायर शहीद हो गए लेकिन हवा की उपस्थिति का पता नहीं चला। थोड़े दिन छोटी सायकिल चला कर बड़ी सायकिल पर हाथ मारने लगा। छोटी सायकिल मुरचा खाई हुई पड़ी है। अब स्कूटी की मांग चल रही है। सायकिल को स्कूटी में बदलने का जादू सिर्फ़ पापा ही दिखा सकते हैं, दुनिया का अन्य कोई जादूगर नहीं दिखा सकता। हम 24 इंच की सायकिल से ही कैंची चलाना सीखे थे। छोटी सायकिल चलाने का सपना तो अधूरा ही रह गया। शायद मेरे पापा को सायकिल छोटी करने का जादू नहीं आता था। बदलते समय के साथ पापाओं को यह सब जादू आना जरुरी हो गया है। जिससे गृहस्थी की हर जरुरतें पूरी हो सकें और बच्चे कह सकें मेरे पापा बहुत बड़े जादूगर थे।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

भानगढ़ की रत्नावती और सिंधु शेवड़ा

बाजार से आगे बढने पर पीपल के वृक्ष के पत्ते सरसराहट की आवाज के साथ इस गढ के वैभव की गाथा कहते हैं।मुख्य मार्ग के सुनसान बाजार के खंडहर बेबस स्तब्ध खड़े थे। समय की मार से कुछ भी नहीं बचा। सारी रौनक और वैभवता नष्ट हो गई है। जो बसा है उसे एक दिन उजड़ना भी होता है ये संसार का नियम है। धरा पर कोई स्थायी नहीं रह सका। किसी को प्रतिद्वंदिता ने उजाड़ दिया तो किसी को प्रकृति के कोप का सामना करना पड़ा। पूरी धरती को मानव ने पग पग नाप कर अपनी उपस्थिति के चिन्ह छोड़ दिए। इनकी बातें सुनने के लिए ध्यान लगा कर उस काल खंड में जाना होगा जब यहाँ प्रतिहार, अनुचर, दंडधारी विचरण करते थे। खड्गधारी एक आवाज में ही किसी का प्राण हरण करने के लिए तत्पर रहते थे। समय गुजर गया लेकिन पीपल आज भी उन गाथाओं को सुनाता है। 
आरंभ से पढें
सुनसान भानगढ़ नगर
मैं पीपल की छांव में जाकर बैठ गया। मुझे बैठे देख कर उसने पत्ते फ़ड़फ़ड़ाए और कहने लगा। थक गए पथिक, चलते-चलते। तनिक विश्राम करो, तुम्हारी जिज्ञासा मुझ पर प्रगट है। तुम्हे वही कहानी सुनाता हूँ, जिसे सुनने की आकांक्षा लिए यहाँ आए हो। यह कहानी है, रानी रत्नावती की। हाँ! वही रानी रत्नावती, जिसके सौंदर्य के चर्चे वर्तमान में भी विद्यमान हैं। अप्रतिम सौंदर्य की स्वामिनी थी वह। उसके पिता ने विवाह के लिए स्वयंवर रचाया था। इस स्वयंवर में दूर देशों के नरेश तथा राजा आए थे। एक से बढ कर एक पराक्रमी, धनुर्धारी बल पौरुष के धनी रत्नावती का वरण करने की आकांक्षा से पधारे थे। स्वयंवर समारोह की चमक - दमक देखते ही बनती थी। स्वयंवर के मध्य व्यवधान की आशंका से राजा ने अपने सुदृढ़ एवं उद्भट सैनिकों को सुरक्षार्थ तैनात कर रखा था।

चलते फ़िरते प्रेत
मैने जम्हाई ली, चेहरे पर थोड़ी थकान दिख रही थी। उसने बोलना जारी रखा … तुम सुन रहे हो न राहगीर, अगर तुम्हारा ध्यान भटका तो वंचित रह जाओगे इस कथा से। मैने सिर हिला कर सहमति दी……वह कहने लगा… इन राजाओं में सिंधू देश का राजा भी रत्नावती के वरण की आकांक्षा लेकर आया था। स्वयंवर प्रारंभ हुआ, सभी राजाओं के चेहरे पर यह गुमान का भाव था कि रत्नावती उसका ही वरण करेगी। रत्नावती ने स्वयंवर सभा का एक चक्कर लगाया, सभी राजाओं पर भरपूर दृष्टि डाली और भानगढ़ नरेश के गले में वरमाला डाल दी। दूदूंभि बज उठी, पुष्प वर्षा होने लगी, हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ परदों के पीछे से सुनाई देने लगी। ब्राह्मणियाँ मंगल गान करने लगी। साक्षात राम एवं सीता के स्वयंवर का दृष्य सजीव हो उठा। सभी राजा विवाह की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान कर गए। इधर दोनों का विवाह सम्पन्न हो गया।

विश्राम के पल - सिंह त्रयी (भरत सिंह, प्रदीप सिंह, रतन सिंह)
स्वयंवर स्थल पर ही भानगढ के विनाश के बीज पड़ गए… समझ रहे हो न? उसने मुझसे प्रश्न किया। आगे बताओ कहानी रोचक होती जा रही है, मैने कहा। तो सुनो- सिंधु देश का राजा रत्नावती की  सुंदरता पर मोहित था, उसने रत्नावती के सौंदर्य के चर्चे पहले ही सुन रखे थे। लेकिन भानगढ़ के राजा जैसा सामरिक दृष्टि से सक्षम नहीं था। रत्नावती से विवाह करने की आकांक्षा को लेकर वह उससे युद्ध नहीं कर सकता था। क्योंकि युद्ध में उसकी हार निश्चित थी। वह मन मसोस कर रह गया। लेकिन रत्नावती को पाने की उसकी कामना प्रबल होती गई। वह सिंधु देश में जाकर सिर्फ़ यही चिंतन करने लगा कि रत्नावती को कैसे प्राप्त किया जाए। उसे अपने महल की शोभा कैसे बनाए? शारीरिक बल काम न आने पर व्यक्ति तंत्र बल-छल की ओर प्रयाण करता है। यही सिंधु राजा ने भी किया।

शिवालय एवं शेवड़ों का धूणा
कुछ इतिहास में घटी घटनाओं का जिक्र करना चाहुंगा। जो इस गाथा से जुड़ी हुई हैं। एक बार राजा भगवंत दास यहाँ शिकार खेलते हुए आए। उन्हे यह स्थान अपनी राजधानी बनाने लिए सुरक्षित और उपयुक्त लगा। इस स्थान पर एक प्राचीन शिवालय था जहाँ कुछ शेवड़े अपनी तांत्रिक साधना करते थे। यह स्थान शेवड़ों के धूणे के नाम से प्रसिद्ध था। राजा ने अपना विचार शेवड़ों के गुरु को बताया। उसने राजा से कहा कि - तुम यहाँ राजधानी बना सकते हो, हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तुम्हारा महल इतनी दूर होना चाहिए कि उसे धूणे की धुंवा छू न पाए। राजा ने सहमति दे दी एवं यहाँ गढ का निर्माण किया। राजा अपने राज काज में लग गया और शेवड़े अपने धूणे में मस्त हो गए। एक दिन खूब आँधी आई और धूणे की धुंवा राजमहल तक पहुंच गई। बस इसी दिन से भानगढ़ के विनाश की नींव पड़ गई।

पहाड़ी पर सिंधु शेवड़े की छतरी (चित्र पर क्लिक करके देखें)
प्यास लगने लगी थी, मैने एक घूंट पानी की ली और आगे सुनने लगा। सुन रहे हो न … सिंधु राजा रत्नावती को भूल नहीं पा रहा था। अब उसने तांत्रिकों का सहारा लेना शुरु किया। उसने सोचा कि रत्नावती को प्राप्त करने का सिर्फ़ तंत्र मंत्र का ही एक रास्ता बचा है। उसने भानगढ़ की पहाड़ी पर डेरा जमा लिया। वो देखो उपर छतरी … दिखाई दे रही है न। वहीं सिंधु राजा रहने लगा। उसने डेरे के शेवड़ों से तंत्र मंत्र सीखे और उन्हे सोधने में लगा रहा। मनुष्य की कामना प्रबल होती है, वह उसका उत्कर्ष भी कर सकती है तो पतन भी। बस यही कुछ भानगढ़ पर भी मंडरा रहा था। मंत्र सोधते सोधते एक दिन सिंधु राजा सिद्ध हो गया और सिंधु शेवड़ा कहलाने लगा। बस अब समय आ गया था रत्नावती पर तंत्र मंत्र का प्रयोग करने का। 
कभी इन गलियारों में रौनक थी
उपर पहाड़ी पर बैठा सिंधु शेवड़ा गढ की भीतर हो रही सारी गतिविधियों को जानता था। रत्नावती की एक दासी सुंगधित तेल लेने बाजार तक आती थी जिसे उसके बालों में लगाती थी। सिंधु शेवड़ा नगर में प्रवेश कर गया और दासी कटोरे में तेल लेकर महल की ओर जा रही थी। उसने तेल देखने लिए अपने हाथ में लेकर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया और पहाड़ी पर पुन: चढ गया। इधर दासी को विलंब होने का कारण रत्नावती ने पूछा। तो उसने रास्ते में एक शेवड़े के मिलने का कारण बताया। रानी ने दासी के हाथ से कटोरा लेकर देखा तो उसमें तेल घूम रहा था। उसे कुछ भान हुआ और उसने तेल का कटोरा एक बड़ी शिला पर फ़ेंक दिया। शिला पर तेल गिरते ही वह शिला उड़ने लगी। रानी समझ गई कि तेल में शेवड़े ने तंत्र का प्रयोग किया है।

गढ के झरोखे से
जैसे ही तेल शिला पर गिरा, उधर शेवड़े को मंत्र शक्ति से पता चला कि तेल का प्रयोग हो गया है। उसने आदेश दिया कि उपर आ जाओ, आदेश मिलते ही शिला पहाड़ की ओर उड़ चली। सिंधु शेवड़ा शयन मुद्रा में था, शिला देख कर उसने सोचा कि रानी शिला पर बैठी है, उसने आदेश दिया कि मेरी वक्ष पर ही बैठो। शिला जब नीचे उतरने लगी तो उसे रानी दिखाई नहीं दी और सिंधु शेवड़ा समझ गया कि शिला उसकी छाती पर गिरेगी और उसकी मृत्यु निश्चित है। तो उसने मंत्र से शिला के दो टुकड़े कर दिए और श्राप दिया कि रात दूसरे पहर तक यह नगर नष्ट हो जाएगा यहाँ कुछ भी नहीं बचेगा। इस नगर में आज के बाद कोई भी आबाद नहीं पाएगा। आधी शिला सिंधु शेवड़े के वक्ष पर गिरी और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। आधी शिला नगर के उपर भ्रमण करने लगी। रत्नावती को अनिष्ट का अहसास हो गया और उसने नगर वासियों को अर्ध रात्रि तक नगर खाली करने का आदेश दे दिया।

खंडहर हुआ रानी रत्नावती का महल
नगर खाली हो गया सिंधु शेवड़े के श्राप से। कथा कहते हुए पीपल ने एक लम्बी सांस ली, तब से लेकर आज तक यह नगर फ़िर कभी आबाद नहीं हुआ। कईयों ने कोशिश की लेकिन श्राप के भय से कोई भी इस नगर में पुन: बसने को तैयार नहीं हुआ। खजाने के चोरों ने पूरा गढ़ खोद डाला। जो कुछ मिला सब उठा ले गए। घरों एवं महल के दरवाजों को भी नहीं छोड़ा। सब उखाड़ ले गए। वीरान पड़ा है यह नगर। इसे देख देख मैं खून के आँसू रोता हूँ। कितना वैभव था इस नगर का। कभी यह स्वर्ण नगरी से कम नही था। आज जंगली जानवरों का बसेरा हो गया। मैं ही बूढा बच गया हूँ इसकी गाथा कहने को, मेरे बाद शायद कोई और गाथा कहने वाला न मिले। इस नगर का इतिहास समय की गर्त में दफ़न हो जाए। तुम सुन रहे हो न…  मैने हुंकारु भरी, आँसूओं की दो बूंदे मेरी पेशानी पर टपकी। पीपल सुबक रहा था……… आगे पढें

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

सिरपुर में एलियन्स ......Sirpur Chhattisgarh........ ललित शर्मा

उडनतश्तरी
प्राम्भ से पढ़ें 
मानव मन अज्ञात के प्रति प्रत्येक काल में ज्ञात होने के लिए दीवानगी की हद तक उत्सुक रहा है। फंतासियाँ गढ़ना, मनोरंजनार्थ उन्हें रोचक बनाकर प्रस्तुत करना आदिम काल से चला आ रहा है। जिनमे भूत-प्रेत, मानव के अमानवीय चमत्कारों, अन्तरिक्ष में चमक रहे तारों-सितारों एवं ग्रहों में निवास करने वाले परग्रहियों, देव एवं दानवों की शक्तियों की कथाओं का वर्णन प्रमुखत: सम्मिलित होता है।19 वीं सदी से वर्तमान तक समग्र विश्व एलियन नामक परग्रही की उपस्थिति को सिद्ध करने में लगा हुआ है। गाहे बगाहे एलियन का जिक्र होते रहता है। कभी कोई धरती पर या फिर अन्तरिक्ष में एलियन देखने का दावा करके रोमांचित करने का  प्रयास करता है।

फ़िल्मी जादू 
किसी-किसी ने एलियन के चित्र के लेने के भी दावे किये हैं। लेकिन वे चित्र इतने स्पष्ट नहीं हैं, जिससे एलियन की पहचान हो सके। एलियन के चरित्र को गढ़ने में फिल्मो का महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश विदेशी फिल्मो में काल्पनिक कथाएँ गढ़ कर एलियन को मुख्य किरदार बना कर प्रस्तुत किया गया है। ऐसी ही एक फिल्म "कोई मिल गया" का हिंदी में मनोरंजनार्थ निर्माण हुआ। एलियन जैसी आकृति प्रागैतिहासिक काल के भित्ति चित्रों एवं प्राचीन शिल्पाकृतियों में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान पाई गयी। इनमे एलियन की वर्तमान में प्रचलित होकर रूढ़ हुई आकृति से मिलान करने पर अत्यधिक समानता पाने के कारण  परग्रहियों के पृथ्वी पर आने का अनुमान लगाया जाता है।

फ़िल्मी जादू
भारत भी उड़नतश्तरियों की कहानियों एवं दावों से अछूता नहीं है।  आजादी से पहले ओडिशा में एलियन को देखा गया था और बाकायदा इसका विवरण पारंपरिक ताम्रपत्र पर खुदाई कर दर्ज करवाया गया। 1947 में आजादी से कुछ ही महीने पहले ओडिशा के नवागढ़ जिले में एक उड़ने वाली अज्ञात वस्तु उतरी थी। स्थानीय कलाकार पचानन महाराणा ने इस घटना को ताम्रपत्र पर दर्ज किया था। एलियन्‍स की इसी तरह की पुरानी कहानियों को दर्ज करने वाले ऎसे पत्रों को अब 'दी ऑब्लिट्रेरी जर्नल' में कॉमिक्स और दृष्टांतों के साथ प्रकाशित किया गया है। पुरी में कार्यशाला चलाने वाले सम्मानित "पट्टचित्र" कलाकार पचानन ने एलियन व उनके विमान के रेखाचित्र बनाए थे। ये एलियन 31 मई 1947 को पहाड़ी इलाके नयागढ़ में उतरे थे। इससे एक महीने बाद ही न्यू मेक्सिको के पास रोसवेल में एक संदिग्ध दुर्घटना हुई थी। अमरीकी वायुसेना ने दुर्घटनास्थल पर एक उड़नतश्तरी को बरामद करने का दावा किया।

रायसेन जिले से प्राप्त शैलचित्र 
नर्मदा घाटी के प्रागैतिहासिक शोध के दौरान सिड्रा अर्किओलोजिकल एनवायरमेंट रिसर्च ट्राइब वेलफेयर सोसायटी के अनुसार रायसेन जिले से 70 किलोमीटर दूर भरतीपुर के घने जंगलों के शैलाश्रयों में मिले प्राचीन शैल चित्रों के आधार पर अनुमान लगाया है कि यहाँ दूसरे ग्रह के प्राणी आए होंगे। यहाँ उड़न तश्तरी की भी तश्वीर उकेरी गयी है। इस चित्र में उकेरी गयी एलियन जैसी खड़ी आकृति का सिर बड़ा है। प्रागैतिहासिक मानव अपने आस पास नजर आने वाली चीजों को पहाड़ों की कंदराओं में उकेरते थे। संभव है कि उन्होंने किसी उड़नतश्तरी जैसी आकृति एवं एलियन को पृथ्वी पर देखा होगा तभी इनके चित्र गुफाओं में उकेरे। रायसेन से मिले शैलचित्र आदि मानव की तत्कालीन जीवन शैली से मेल नहीं खाते। कुछ इसी तरह के चित्र भीम बैठका एवं रायसेन जिले के फुलतरी गाँव की घाटी में भी मिले हैं।

सिरपुर से प्राप्त एलियन्स की प्रतिमा 
वर्तमान में प्रचलित परग्रहियों की आकृति से समानता लिए कुछ प्रस्तर एवं मिटटी की आकृतियाँ छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के सिरपुर में स्थित दक्षिण कोसल की राजधानी श्रीपुर के उत्खनन के दौरान प्राप्त हुयी हैं। उत्खनन में प्राप्त आकृतियों में से एक तो हुबहू एलियन की शक्ल से मिलती है। काले रंग की इस शिल्पाकृति की आँखे तिरछी हैं। सिर गंजा, छोटा सा मुंह, एवं नासिका से लेकर गुद्दी तक दो रेखाएं खिंची हुयी हैं। नर्मदा घाटी से प्राप्त शैलचित्रों में चित्रित आकृति को देख कर तो मात्र अनुमान लगाया जा रहा है, लेकिन सिरपुर से प्राप्त शिल्पाकृतियों को देखने के पश्चात् माना भी जा सकता है कि आज से ढाई हजार पूर्व के लोगों ने एलियन्स को देखा था। सिरपुर के उत्खनन निर्देशक अरुण कुमार शर्मा का मान्यता है कि सिरपुर में परग्रही प्राणियों (एलियन्स) का आना-जाना था।

अरुण कुमार शर्मा 
अन आइडेंटिफाई ऑब्जेक्ट्स याने उड़नतश्तरी पर शोध तो सैकड़ों वर्षों से चल रहा है। लेकिन इनके अस्तित्व को लेकर किसी निर्णय पर नहीं पंहुचा जा सका है। एलियन की सत्यता की खोज में विश्व की कई संस्थाएं अध्ययन में लगी है एलियन की खोज में आम आदमी को शामिल करने के लिए एक वेबसाइट सेटीलाइव डॉट ओआरजी को लॉंच की गई है. अमेरिका के शोधकर्ता डॉक्टर टार्टर ने अपना पूरा करियर एलियन की खोज में लगा दिया है. मंगल पर भी एलियन होने के चिन्ह प्राप्त होने का दावा किया जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि आगामी 40 वर्षों के दौरान एलियन की प्रमाणिक खोज हो जाएगी। हमें उस दिन की प्रतीक्षा है  जब सिरपुर में प्राप्त एलियन की शिल्पाकृतियाँ दक्षिण कोसल में परग्रहियों  के आगमन के प्रमाण के रूप में सिद्ध होंगी। उत्खनन निर्देशक अरुण कुमार शर्मा का अनुमान सत्य साबित होगा। .......... जारी है  ...... आगे पढ़ें 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

जादूगर का जादू का कमाल धमाल

हम बचपन से जादू देखते आये हैं, कभी टिकिट लेकर कभी बिना टिकिट सड़क के किनारे, कभी सांप नेवले का खेल, ये सब हमारी वास्तविक जिंदगी में भी होता है.

यहाँ भी सांप नेवले का खेल देखना-दिखाना पड़ता है. इससे पहले मैंने एक पोस्ट इस जादू के खेल पर लिखी थी. साथियों ने और भी इच्छा है कि एक दो जादू की ट्रिक और हो जाये. चलिए अब एक नया जादू देखते है. 

हमारे गांव में एक जादूगर आया. मंदिर के पास उसने डेरा जमाया और अपना तम्बू लगाया, रोज दो खेल जादू के दिखने लगा, 

एक दिन हमारे स्कुल में आकर कहा कि स्कुल के बच्चों के लिए स्पेशल शो है दो रूपये की टिकिट चार आना हो गई है. 

सिर्फ स्कुल के बच्चों के लिए, हम भी घर से चार आना लेकर जादू देखने गए. जादूगर एक कोरे कागज पर बिना स्याही के रंग बिरंगे अक्षर प्रगट कर देता था. कभी किसी का नाम लिखता था, कभी वर्णमाला के अक्षर दिखाता था.

उस समय हम सोचते थे कि यदि ये जादू हमें सीखा दे तो परीक्षा के समय बड़ा काम आयेगा, नक़ल के पुर्जे ऐसे ही कागज पर तैयार करके ले जायेंगे. गुरूजी को दिखेगा भी नहीं अपना भी काम हो जायेगा. अब इसका तोड़ हमने पाया है. चलिए देखते हैं ये जादू कैसे किया जाता था.

एक सादा कागज लो और उस पर निम्बू के रस से कुछ भी लिखो, 

फिर उसे थोड़ी सी आंच दिखाओ अक्षर अपने आप प्रगट होने लगते हैं. अगर हम लहसुन के रस से कागज पर लिखते हैं और उसे आंच दिखाते है तो लिखे हुए को छोड़ कर पूरा कागज लाल दिखाई देगा. 

गाय के दूध से कागज पर लिख कर आंच दिखाते हैं तो लिखा हुआ अक्षर पीला रंग का दिखाई देगा. 

यदि गेंदा के रस लिखते हैं तो भी रंग पिला ही दिखाई देगा.

आंवले के रस से लिख कर कागज गरम करने से हरे रंग के अक्षर दिखाई देंगे. 

नारंगी के रस से हाथ की हथेली पर अक्षर लिख कर उस पर थोड़ी राख डाल दें तो अक्षर काले दिखाई देंगे. आप आजमा कर भी देख सकते हैं. ये था आज का जादू.