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बुधवार, 20 जुलाई 2016

अहर्निश यात्रा महे : रांची की ओर

यात्रा  2 से 7 जुलाई 2015
शास्त्रों ने उत्तिष्ठ जागृत, चरैवेति चरैवेति कहके एवं फ़िल्मों ने चलती का नाम गाड़ी, चलना ही जिन्दगी है, सुहाना सफ़र,  ये मौसम हंसीन गाकर मनुष्य के मन को सदैव चलने के लिए ही प्रेरित किया है। यहाँ तक दार्शनिकों ने इस दुनिया को भी एक सराय कह दिया और यहाँ मनुष्य का कुछ पल का "अल्प विश्राम" (ठहराव) बताया, न कि पूर्ण विश्राम। पूर्ण विश्राम की अवस्था में देह से देही विदा हो जाता है और अन्य किसी साधन अपनी यात्रा पूर्ण करने लग जाता है। जीवित रहने का अहसास तभी होता है जब चलते रहता हूँ, इसलिए मुझे चलना ही पसंद है। चलते-चलते कहाँ आ गया हूँ मैं, ऐसा कभी नहीं हुआ। हमेशा बाट पर ही पहूँचा ठाठ से और वहाँ की दुनिया को "रज्ज' के देखा, समझा तथा आगे बढ़ गया। 
बिकास और मैं यात्रा पर
अब साप्ताहिक दौरा झारखंड और बंगाल के कुछ इलाकों का प्रारंभ हो गया है।  परसों रांची पहुंचेगे, फ़िर आगे का सफ़र जारी रहेगा। बाबू साहब ( Ramakant Singh) ने एक बात कही थी, जो हमेशा याद आती है "बाबा की झोली में का-का चीज, लंवग, ईलायची और धतूरा के बीज।" इतना सामान ही एक घुमक्कड़ की घुमक्कड़ी के लिए काफ़ी होता है। जितना कम सामान रहेगा, सफ़र उतना ही आसान रहेगा। हमारा यह सफ़र कई हिस्सों में होना था। रायपुर से हावड़ा मेल से चलकर अल सुबह झारसुगडा पहुंच यात्रा को अल्प विराम मिला।  पड़ाव तक पहुंचाने वाली ट्रेन को पुरी से आना है, उसके आने में दो घंटे का विलंब है। बैठ गए ट्राली पे आसन लगा के। 
झारसुगड़ा रेल्वे स्टेशन पर कुली बाबा
मौसम मानसुकाना बना हुआ था। सामने बादलों के बीच सूरज भैया धीरे-धीरे कपार पर चढने की तैयारी कर रहे हैं और प्लेट फार्म पर अर्जुन के गोत्रज ग्राहकों की तलाश में लगे हैं। एक ढिबरी चाय अंदर डालने पर ठेले पर लदे कुली बाबा बोले "इ टेसन मा सब छका लोग नकली है। एगो असली नही है, आर पी एफ, जी आर पी सब सेट कर लेते है। सब मरद लोग है, जब ये संतान पैदा नही कर सकते तो इनका संख्या कैसे बढ जाता है? सोचने का बात है कि नहीं? बिलकुले सोचने का बात है। हम बक्सर से उनाईस सौ चौहत्तर में आए थे मजदूरी करने। तब से आज तक कुच्छो नही बदला है। एक ठो बंगाली का चाय दूकान होता था ऊ भी बंद हो गया।

होटल ली लैक रांची की बालकनी से
हमारे यहां पंवरिया लोग होते थे, राजा महाराजा के यहां गाने का पेशाकरते थे। जिसके यहां बचाऽ हो या शादी हो तो नाच गा कर पेट पालते थे। अब ऊ लोग पढ लिख के नौकरी धंधा पकर लिए और छकाऽ लोग ई सब करने लग गया। हमारे यहां गोंसाई लोग होते थे, उनका काम भीख मांगना और चेला बनाना था। चाहे केतना ही खेत बाड़ी हो, लेकिन भीख मांग के गुजारा करते थे। ऊ लोग भी नौकरी धंधा मे लग गया। कुछ लोग ही ई सब काम करता है। बकिया सब छोर दिए। फिर कुली बाबा ने जेब से निकाल कर एक गोली खाई। पूछने पर बोले " हाथ गोर का नस-नस जाम हो जाता है, इसलिए भोरे मा एक गोली खा लेते हैं आधे घंटे मे सब नस खुल जाएगा। काम पे लग जाएगें। दिल्ली तक इलाछ करा लिए, कौनो फायदा नही हुआ। ई रोग तो जान के साथ ही जाएगा। पहले खूब योगराज, महायोगराज गुगुल खाए, फेर फायदा कुच्छो नही हुआ।
नवीन साहू
अब कुली बाबा तो अपने काम मे लग गये, उनकी नसें खुल गयी हैं। पर अच्छे दिन आने के बाद भी भारतीय रेल की नसें नही खुली है। बड़का डाकदर कौनो दवा नहीं ढूंढ पाए हैं। हमार गाड़ी एक घंटा पचास मिनट लेट चल रही है, इसके कारण एलांऊंस करने वाली बाई बहुत दुखी है और बार बार दुख व्यक्त कर रही है। हमारी ट्रेन आ गई, सहयात्री बिकास बाबू के साथ हम ट्रेन में सवार हो गए। हमें यह ट्रेन हटिया तक पहुंचाएगी। हटिया पहुंचने के बाद रांची के ली लैक होटल तक पहुंचने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। सौ रुपए में ऑटो किए, उसने हमें होटल तक पहुंचाया। नाम से तो सोचे थे कि कोई झील के किनारे होगा होटल, जिसके कारण ली लैक नाम धराया है। परन्तु होटल पहुंचने पर पता चला कि किसी छोटे से तालाब के किनारे बना है, जिसके चारों तरफ़ कचरे का ढेर और प्रदूषित पानी की बदबू। हमको कौन सा जनम भर ठहरना था। पहुंचने पर बैकुंठपुर वाले चंद्रकांत पारगीर से मुलाकात हो गई। सेमीनार का कार्यक्रम अगले दिन था। संझा नहाए, खाए और सुत गए। 
चंद्रकांत पारगीर, मृत्युंजय पाठक, ललित शर्मा एवं राजेश अग्रवाल
हमको सुबह हे रे नवीनवा ने आकर जगाया और टी मेकर से चाय भी बना कर पिलाई। पूछा कि रांची मे रात कैसे कटी? रात तो कट गयी जैसे तैसे। होटल बढिया है, रूम में एसी से लेकर फ्रीज तक की बेवस्था है। लेकिन पंखा नही है। हम ठहरे भारतीय मानसिकता के मनई। बिना पंखा के नींद ही नही आती। पंखा से भले ही हवा न आए लेकिन उसकी आवाज ही लोरी का काम करती है। बिना पंखा लोरी के ऊलट-पुलट कर नींद आई। स्नानाबाद से लौटकर नास्ता पानी हो गया। अब संझा को लीटी चोखा का प्रोग्राम जमाते है। बिकास बाबू कुछ कामरेडी मुड मे दिखाई दे रहे है। उन्होने आज 3 जीबी नाश्ता किया और 2 जीबी दूध पीया और दूध का दही कर निकल लिए। यही है डीजिटल इंडिया। 
सुनीता नारायणन, ललित शर्मा, चंद्रभूषण, राजेश अग्रवाल, बिकास शर्मा
अब तैयार होकर सेमीनार स्थल पर पहुंच गए, झारखंड के खनिज एवं कोयले के साथ प्रदूषण एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए धुंआधार कार्यक्रम हुआ। बिलासपुर से राजेश राजेश अग्रवाल, रायपुर से डी श्याम कुमार और दिल्ली से सुनीता नारायणन पहुंची थी। झारखंड के खनिज सचिव ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत की। कई तरह के प्रश्नोत्तर हुए, चिंताए जताई गई। चिंतओं के समाधान भी ढूंढने की कोशिश की गई। इस दौरान दृष्टिपात पत्रिका वाले अरुण कुमार झा जी भी पहुंचे, जान पहचान तो ब्लॉगिंग के जमाने से है, पर साक्षात भेंट आज ही हुई। दिन भर की थका देने वाली मीटिंग के बाद सारा नजला चिकन-फ़िश पर गिरा और कार्यक्रम का समापन हो गया। यात्रा जारी है… आगे पढें।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

हैदराबाद में भटक कर ब्लॉगर पहुंचे अपने धाम : दक्षिण यात्रा सम्पन्न 21

आज का दिन हमने विप्रो भ्रमण के लिए नियत किया था। बाहरी आगंतुकों को शनिवार को इस परिसर में प्रवेश दिया जाता है। इसके लिए बाकायदा पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ती है। उसके बाद वहां से परिचय पत्र जारी किया जाता है, उसे लेकर ही परिसर में प्रवेश दिया जाता है। जाहिर है विप्रो बड़ी कम्पनी है और इसने अपने कर्मचारियों के लिए परिसर में दोस्ताना वातावरण निर्मित कर रखा है, जिसमें बहुत बड़ी कैंटिन, बगीचा एवं ओपन थियेटर भी है। 
विप्रो बैंगलोर में पाबला जी के साथ
हम लगभग एक बजे विप्रो पहुंच गए। एक लम्बे सफ़र के बाद सुबह उठने में विलंब हो गया। यहां एक आकर्षक डोम बना हुआ है, जिसकी छत में कांच लगे हुए हैं, यह बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हमने दोपहर का नाश्ता यहां की कैंटीन में ही किया और परिसर का भ्रमण किया। विप्रो ने अपने परिसर में खूब हरियाली कर रखी है। बैगलोर जैसे शहर में शुद्ध वायु एवं वातावरण के लिए इसकी निहायत ही आवश्यकता दिखाई देती है। अन्य कम्पनियों और कारखानों को भी इससे सीख लेनी चाहिए कि कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढाने के लिए अच्छे माहौल की आवश्यकता पड़ती है।
विप्रो का ग्लास डोम
विप्रो भ्रमण के बाद हम होटल आ गए। विचार विमर्श कर फ़ैसला किया कि आज की रात 9 बजे हम यहां से प्रस्थान कर लें और रात भर गाड़ी चला कर हैदराबाद में विश्राम करें। ब्लॉगर मित्र विजय सप्पति जी का भी कई बार फ़ोन आ चुका था और वे रविवार को हैदराबाद में हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। दिन भर आराम करने के बाद हमने रात नौ बजे के आस पास होटल छोड़ दिया और वापसी के लिए गाड़ी चल पड़ी। वैसे रात का सफ़र करना तो नहीं चाहिए। परन्तु एक फ़ायदा यह रहता कि रात को ट्रैफ़िक कम रहता और सफ़र जल्दी कटता है। परन्तु नींद के झोंकों पर भी काबू करना पड़ता है।
रात का सफ़र, बैंगलोर से निकलते हुए
चलते मुझे भोजन करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। पाबला जी खाने के मूड में नहीं थे क्योंकि खा लिए तो फ़िर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाएगा। बैंगलोर शहर के बाहर निकलते हुए हमने सोचा कि हाईवे पर कोई ढाबा मिलेगा तो खाना खा लिया जाएगा। परन्तु चलते हुए समस्या यह रहती है कि थोड़ा और चल लिया जाए, फ़िर देखा जाएगा। यही हमारे साथ हो रहा था। रात एक बजे ढाबा दिखाई दिया, हमने गाड़ी लगाई, जैसे ही भीतर प्रवेश किया तो माहौल समझ नहीं आया। हर जगह लोग दारु की बोतल लिए बैठे थे और कुछ अजीब से संदिग्ध चेहरे भी दिख रहे थे। मैं भीतर जाकर लौट आया, लम्बे सफ़र में सुरक्षा भी जरुरी होती है। पाबला जी को मना किया और गाड़ी फ़िर स्टार्ट कर ली।
रास्ते में एक मंदिर में पर्व
आगे चलकर एक स्थान पर सरदार जी का ढाबा दिखाई दिया। हमने गाड़ी वहीं रोक ली। लेमन राईस का आर्डर दे दिया, तब तक पाबला जी ने आराम कर लिया। लेमन राईस में मुंगफ़ली इतनी अधिक डाल दी कि मेरा मन उखड़ गया। पर खाना भी जरुरी था। अधूरे मन से भोजन किया और फ़िर हम आगे की यात्रा पर चल पड़े। देश में विकास हो रहा है और हाईवे बन रहे हैं। अच्छी स्पीड वाली सड़कों का निर्माण हो रहा है। हैदराबाद बैंगलोर हाईवे भी फ़ोर लाईन का बना है। परन्तु बीच का डिवाईडर पार करके कौन, कब आपकी गाड़ी के सामने आ जाए, इसका पता ब्रह्मा को भी नहीं चलता। 
जान जाए  चाहे लूले लंगड़े हों, पर सफ़र ऐसे ही करेंगे
हमने डिवाईडर पार निकलने वालों के कई एक्सीडेंट सुबह सुबह देखे, मन खराब हो गया। थोड़ी सी जल्दी मचाने के कारण लोग जान से हाथ धो बैठते हैं और सड़क दुर्घटना में सबसे अधिक जवान मौते होती हैं। पीछे माँ बाप औलादें बिलखती रह जाती है। बैरिकेट लगाकर बनाए गए हाईवे पर भी लोग घुस जाते हैं। इस यात्रा में मेरा पूरा ध्यान सड़क पर ही रहा। जहाँ भी रोड़ क्रासिंग दिखाई देती, पाबला जो हाथ का इशारा कर स्पीड कम करवाता, वरना इनसे गाड़ी एक सौ बीस से कम चलती ही नहीं है। सारी यात्रा में मेरा यही काम रहा। कभी-कभी तो मुझे भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते थे। :)
चिकनी फ़र्राटेदार सड़क
अब हमारा टारगेट हैदराबाद था, सुबह से कई बार विजय जी का फ़ोन आ चुका था, वो समझ रहे थे कि हम सुबह नाश्ते के टैम पर पहुंच जाएगें, परन्तु हम तो झपकियां लेते हुए आ रहे थे। इसलिए इतनी जल्दी पहुंचना संभव नहीं था। हम पौने एक बजे के लगभग हैदराबाद शहर में प्रवेश कर गए। विजय जी बताए पते को ढूंढते रहे, उनसे संपर्क करते हुए। उन्होंने एक ही स्थान के तीन तीन पते बता दिए, हमारा जीपीएस और कहीं ले गया। फ़िर मुड़ कर वापस आए। एक घंटे तक सिकंदराबाद कैन्ट एरिए में ही घूमते रहे, आखिर घूमते घूमते थक गए पर उनका घर का पता नहीं मिला। 
हैदराबार 82 किमी और नागपुर 562 किमी
मैने उनसे फ़ोन पर कहा कि हम हमारी जगह बता देते हैं, आप यहां आ जाओ। वे अपना पता ही बताते रहे, लेकिन घर से निकलने को तैयार नहीं हुए। मैने उनसे जी पी एस पता मांगा, वो भी नहीं दिया, जिस तरह विवेक रस्तोगी जी ने अपना जीपीएस पता दे दिया, जीपीएस में वो पता फ़ीड करते ही हम उनके घर के ठीक सामने पहुंच गए थे, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इधर हम उनका घर ढूंढते हुए नागपुर रोड़ पर पहुंच गए। जहां से माईल स्टोन नागपुर की दूरी 500 किमी के आस पास दिखा रहा था। हम विजय जी का घर ढूंढते हुए एकदम पक चुके थे। माईल स्टोन देखकर सरदार का दिमाग सनक गया और गाड़ी नागपुर रोड़ पर बढ़ा दी। 
हैदराबाद के पार नागपुर की ओर
विजय जी का फ़िर फ़ोन आया, पूछे कहां पर हो, मैने कहा कि हम नागपुर निकल लिए और हैदराबाद से काफ़ी आगे आ चुके हैं। बोले कि मैं सुबह से इंतजार कर रहा हूँ, सारा बनाया हुआ खाना खराब हो जाएगा। मैने कहा कि अब लौटना संभव नहीं है और पाबला जी नाराज है, फ़ोन पर भी बात नहीं करेंगे। इसलिए इस मुलाकात को पेंडिग ही रखा जाए तो ठीक है। उन्होंने निराश होकर फ़ोन बंद कर दिया। नए शहर में घर तक बुलाने के लिए दो तरीके हैं, पहला तो उसे जीपीएस का अंक्षाश देशांश दे दो, जिससे वह बिना असुविधा के पते पर पहुंच जाएगा या फ़िर शहर का ऐसा कोई लैंड मार्क बता तो जहाँ तक कोइ आसानी से पहुंच जाए और उसे लेने आ जाओ। ये दोनो काम विजय जी ने नहीं किए और घर से ही निर्देश देते रहे। हमारा भी समय खराब हुआ और उनका भी खाना।
अस्ताचल  को जाता विरंचीनारायण
हैदराबाद में आराम करने का प्लान बना कर चले थे, वह फ़ेल हो गया। अब गाड़ी फ़िर हाईवे पर थी। रास्ते में एक उड़ीपी रेस्टोंरेंट में भोजन किया और आगे बढ गए। अभी भी हमको लगभग आठ सौ किमी का सफ़र करके घर पहुंचना था। रात भर गाड़ी चला कर थक चुके थे। शाम को ई टीवी की स्टेट हेड प्रियंका कौशल ने राजिम पर कार्यक्रम के प्रसारण की सूचना दी, तो कुछ मित्रों ने वीडियो बनाकर मुझे वाट्सएप पर भेज दिया। गाड़ी चलाते हुए लगातार 27 घंटे हो चुके थे, थककर बुरा हाल था, जैसे तैसे करके रात बारह बजे तक नागपुर पहुंचे और वहां रात रिश्तेदार संध्या सत्येन्द्र शर्मा जी के रात गुजारी। 
एक सेल्फ़ी हो जाए, बाय बाय दक्षिण यात्रा
यहां फ़ुल आराम कर एवं दोपहर का भोजन कर एक बजे के बाद नागपुर से निकले। शाम को भिलाई पहुंचते तक पाबला जी गाड़ी चलाने की हालत में नहीं थे। जैसे तैसे करके घर पहुंचे। मेरे पास सामान कुछ ज्यादा हो गया था। उसे लेकर बस में जाने का मेरा मन नहीं था। पाबला जी बोले कि घर पर ही रात आराम कर लो, सुबह चार बजे अभनपुर छोड़ आऊंगा। घर के समीप पहुंच कर रात रुकना मुझे जम नहीं रहा था तब हम नाम वर्मा जी को फ़ोन किया, उन्होने समस्या का हल निकाल दिया और गाड़ी लेकर पहुंच गए। इस तरह मैं रात ग्यारह बजे घर पहुंचा और हमारी दक्षिण की साप्ताहिक यात्रा निर्विघन सम्पन्न हुई।  इति दक्षिण यात्रा …

सोमवार, 21 मार्च 2016

ब्लॉगर भोज सह ब्लॉगर मिलन: दक्षिण यात्रा - 6

बैंगलोर में हिन्दी ब्लॉगर बिरादरी भी रहती है, यह तो हम वर्षों से जानते थे और यहाँ पहुंचने के पूर्व भी ब्लॉगर मिलन का कार्यक्रम बन गया था। सोचा यह था कि एक दिन सभी किसी नियत स्थान पर एकत्रित हो जाएं तो सभी से मिलन हो सकता है। परन्तु हमारे प्रवास के दिनों में रविवार सम्मिलित नहीं था। रविवार तक तो हमें घर पहुंचना था। मंगलवार का रात्रि भोजन का निमंत्रण भाई आशीष श्रीवास्तव द्वारा मिला। हम रात्रि साढे आठ बजे के आस पास उनके घर पर पहुंच गए। घर पर उनके अलावा उनकी माता जी, श्रीमती जी एवं पुत्री गार्गी, कुल मिलाकर चार की नफ़री है।
पाबला जी, ललित जी, पीडी जी, आशीष जी एवं गार्गी जी :)
घर पहुंचने पर चाय पानी के संवाद चर्चा प्रारंभ हुई, ब्लॉग एगीगेटर नारद से लेकर चिट्ठा जगत, ब्लॉग वाणी इत्यादि की चर्चा के साथ हमारी वाणी एवं ब्लॉग सेती एग्रीगेटर का भी जिक्र हुआ। परन्तु ब्लॉगिंग का जो आनंद 2011 तक था वह इन एगीगेटरों के माध्यम से लौट कर नहीं आया। चिट्ठा जगत में उस समय 30 हजार ब्लॉग दर्ज थे। ब्लॉग वाणी सफ़ल एग्रीगेटर था, जल्दी खुल जाता था और फ़ीड भी एक बटन दबाने पर दिखाई देने लगती थी। मेरे डेस्कटॉप पर हमेशा खुला रहता था। जब भी समय मिला सरसरी तौर पर एक निगाह डाल लेता था। पर अब उस जैसा मजा नहीं, मैने कई वर्षों से किसी एग्रीगेटर की ओर झांक कर देखा ही नहीं।
आशीष श्रीवास्तव जी का छत्तीसगढ़ से नाता है, साथ पड़ोस के गोंदिया शहर के निकट के गाँव के निवासी भी हैं। वर्डप्रेस पर इनका ब्लॉग विज्ञान विश्व काफ़ी प्रसिद्ध है, इसके साथ ब्लॉग स्पॉट पर भी इनके कई ब्लॉग हैं। हमारे से सीनियर ब्लॉगर हैं, प्रारंभिक दिनों में इन्होनें हिन्दी ब्लॉगिंग को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चर्चा के बीच ये बार-बार किसी को फ़ोन लगा रहे थे। थोड़ी देर बाद द्वार उन्मुक्त हुआ और ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी सपत्नी प्रकट हुए। यह मेरे लिए बोनस जैसा था, उम्मीद से दुगना। प्राचीन ब्लॉगर प्रशांत प्रियदर्शी को निक नेम "पीडी" के नाम से जानते हैं। पीडी जी का ब्लॉग "मेरी छोटी सी दुनिया" है, इस पर दो बज्जिया बैराग बढिया पोस्ट चेपे हैं।
बातचीत करते खाना भी लग गया, खूब बातें हुई। नए पुराने ब्लॉगरों के जिक्र के साथ। जब ब्लॉगर साथ बैठेगें तो चर्चा होगी ही न। पाबला जी गार्गी की फ़ोटो लेते रहे। गार्गी ने लिखाई कर सारे घर की दीवारें रंग डाली हैं, मेरा बेटा उदय भी यही करता था, पर उसकी इन हरकतों में उसकी मां सतत निगाह रखती थी। थोड़े दिनों में उसकी यह आदत छूट गई। बच्चों के लिए दीवाल एक श्याम पट का काम करती है। जो चाहे मांड लो, जैसे चाहे पेंसिल घुमा लो। हमारे समय में तो चाक पेंसिल मिलती थी, जिसका लिखा कपड़े की एक रगड़ से साफ़ हो जाता था। आज की पेसिंलों का लिखा मिटाने के लिए फ़िर से दीवालें पोतनी पड़ती है।
भोजन के वक्त वजन कम करने की बात छिड़ गई। पाबला जी का वजन काफ़ी कम हो गया है और आशीष श्रीवास्तव जी ने भी अपना वजन भोजन पर नियंत्रण करके कम कर लिया। 2005 के आस पास हमारा भी वजन 103 किलो था, पर शक्कर अधिक होने के कारण धीरे धीरे कम होते होते 75 किली रह गया। वो तो भला हो डॉक्टर सत्यजीत साहू का जिन्होने इस पर ध्यान दिया, वरना हम तो घिसते घिसते आज 25 किलो के रह जाते। सारे कपड़े ढीले हो गए, नए कपड़े लेने पड़े। जब वजन बढने लगा तो फ़िर नए कपड़े आए। आज वजन ठीक है, 90-95 के बीच कांटा झूलते रहता है। वैसे भी एक उम्र में आकर डाईट पर नियंत्रण करना आवश्यक है। खासकर कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों के लिए।
राष्ट्रपति पुरस्कृत ज्योतिषी संगीता पुरी जी से कभी मजाक कह दिया करता हूँ कि ग्रहों के संकट निवारण के लिए "ब्लॉगर भोज" के लिए अपने क्लाईंटों को कहा करें, जिससे उनके संकट का निवारण शीघ्रता से हो जाएगा और समस्याओं का समाधान भी। यथा 5-11-21-51 ब्लॉगर श्रद्धानुसार जिमाने में कोई हर्ज नहीं है। वर्तमान में ब्लॉगर ही संकट मोचन बनकर सामने आए हैं। विभिन्न विषयों पर लिखे जा रहे ब्लॉगों के कारण ही गुगल पर जानकारियाँ उपलब्ध हो पाई हैं और इसमें ब्लॉगरों के योगदान को किसी काल में भी नकारा नहीं जा सकता। नेट पर हिन्दी ब्लॉगरों की ही देन है।
ब्लॉगरों की बैठकी तो ऐसी होती है, जैसे बहुत दिनों के बाद कोई घर छुट्टी आता है और सारी रात परिजनों से बातचीत में कट जाती है, सुबह पौ फ़टते पता चलता है कि बातचीत में ही रात गुजर गई। यहाँ भी रात बढने लगी तो चर्चाओं पर विराम देकर हमने आशीष जी से विदा ली। उत्तम ब्लॉगर भोजन से हृदय आनंदित हो गया था और अब एक लम्बी नींद की आवश्यकता महसूस हो रही थी। सभी नीचे छोड़ने आए और हम अपने ठिकाने होटल लौट आए। इस तरह एक छोटी सी ब्लॉगर बैठकी हो गई। आशीष जी का घर हमारे होटल से नजदीक ही था। जल्दी ही जीपीएस वाली बाई ने हमें होटल तक पहुंचा दिया और कहा " आपकी मंजिल आ गई है।" जारी है, आगे पढें…

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

देशी एंटी वायरस (व्यंग्य)

का बताएं भैया! हम तो ठेठ गंवईहा ठहरे. कछु कहत हैं तो लोग मजाक समझत हैं. अरे भाई हमको मजाक आती ही नहीं है. लेकिन जो बात दिल से कह देत हैं (बिना दिमाग लगाये) वो मजाक बन जात है ससुरी. अगर हम बात दिमाग लगा के करत हैं तो लोगन का रोवे का परत है, का बताएं बड़ी समस्या हो गई है. अभी हम देखत रहे समस्या चहुँ ओर ठाडी है. टरने को नांव ही नहीं लेत है. लेकिन हम ठहरे गंवईहा बिना समस्या टारे हम ना टरे.

अब देखिये ना कितना शोर मचा रहता है कि कम्पूटर मा  कोई जिनावर घुस गवा है. जिसके कम्पूटर मा घुस जात है उसको कम्पूटर ठाड़ हो जात है, बिगाड़ हो जात है. कच्छू करई नई देत है. हम एक भैया से पूछे भैया ये कौन सा जिनावर है जो कम्पूटर को और तुमाये को भी हलाकान कर डारे है? तो उन्होंने बताये के वायरस होत है. एक तरह को कीट है. तो हमने पूछो "कम्पूटर में कीट को काय काम है?" तो बोले जब इंटरनेट चलत है तो जो दुश्मन बैरी होय ना, वो अपनों जासूस भेज देत है हलाकान करबे के लिए. ये कीट भी दो तरह के होत हैं, एक है मित्र कीट दुसर है दुश्मन कीट, फेर दुश्मन कीट के हटाने के लाने मित्र कीट को बुलाओ फेर दुनो में लड़ाई होत है और मित्र कीट दुश्मन कीट को खा के ख़तम कर देत है. बस इत्ती सी बात है. अब वा के लिए तो इत्ती सी बात है और हमारे जैसे देहाती गंवईहन के लिए इत्ती सारी बात है. हमारे तो भेजे में ही नहीं घुसी. चलो भलो हुवो भेजे मे नहीं घुसी, नहीं तो माथ अलग पिराई और डाक्टर की भेट पूजा अलग होती.

अब जो हमारे मित्र रहे कम्पूटर वारे, वो बड़े बुलागर रहे. कम्पूटर मा लिखत रहे, लिख लिख के बहुत बड़े लेखक बन गए. बड़ो नांव हो गयो वा को. हमने एक दिन पूछो बताओ तो भैया का लिखत हो? हमको तो कछु पतों चले. तो भईया उनने कम्पूटर खोल के दिखायो और वो बांचन लागे हम मूड हिला -हिला के सुनत रहे. एक जगह लिखे रहे,  हमकू चड्डी खरीदना है. पुरानी वाली फट गई है, वो हरे नीले पट्टे वाले कपडे की बनी थी अब वो कपड़ा नहीं मिल रहा है. हम बहुत ढूंढ़ डारे, हमारे सारे आस-पास के मित्र भी ढूंढ़ डारे, उनको भी नहीं मिल रही है. हम आपसे गुजारिश कर रहे है.कि कोई हमें बता दे कि ये चड्डी को पट्टा वाला कपडा कहाँ मिलेगो. तो बताने वारे को हम बहुत बहुत धन्यवाद देंगे. हम ये चड्डी का कपड़ा इसलिए ढूंढ़ रहे हैं कि इसको धारण करने के बाद स्वर्गिक आनंद आत है. मिल जाये तो आप भी इस्तेमाल करके देखें.

एक जगह वो लिखे रहे हमारी भैंसिया गुम गई है. तालाब में गई थी नहाने. चरवाहों वही भूल गवो, कल से नहीं आई है. हम गांव में बहुत ढूंढ़ लिए, नहीं मिल रही है. भैंसिया जाने के गम में हमारी अम्मा ने रात को दूध नहीं पियो है. उनको बड़ा सदमा लगो है, सुबह-सुबह गश खा के गिर पड़ी. इधर हमारी बीवी भी परेशान किये दे रही है. उनके मईके से दो सारे आये हुए है. गांव में  पहलवानी करते हैं. उनको दूध की जरुरत है. जब से ये आये है इनको देख के भैंसिया फरार हो गई है. अब ये सारे हमारे महीने भर की तनखा को दूध तीन दिन में पी जावेगे. मोल को दूध बहुतै मंहगो परत है. ये सारेन को देख के हमरो तो बी पी बढ़ जात है. 

श्रीमती कह रही है के दूध लेके आओ हमारे भैया लोगों के लिए, नहीं तो हम मईके जात हैं और भईया लोगो दूध नहीं मिलत है तो ये बौरा जात है कहत रहे की दूध नहीं मिलो तो जीजी! आज जीजाजी को राम-नाम-सत् समझो. तुम्हारे लिए नयो जीजा ढूंढ़ देंगे. अब बताओ भैया हम फँस गए है. एक तरफ कुंवा दूसरी तरफ खाई, और ये खाई भी हमने एक होंडा के चक्कर में खुदाई. तो भईया बाकी बात तो मैं बाद में भी लिख देगें. अभी हमारी भैंसिया को पता बताय दो. आपकी मेहरबानी होगी. मुर्रा नसल की भैंस है टेम्पलेट का रंग काला है. अगल बगल में विजेट लगे हैं. दो कान, दो सींग एक मुहं, दो आंख, चार पैर, एक पूंछ है और एक निशानी है उसके पहचान की, वो जहाँ कही भी जात है, दांत निपोर के पगुरावत रहत है. 

हमने भी कहा क्या बढ़िया लिखते हैं मान गए भैया. आप तो हमारे शहर की नाक है. अब हमें भी कुछ लिखना सीखा दीजिये ना कंप्यूटर में. देखिये अभी एक सुन्दर गजल उतर रही है. लिख तो देंगे लेकिन छापेंगे कहाँ? इस लिए हमें भी ये बुलागरी सीखा दीजिये. 

अब उनसे गुरु मन्त्र पा के नर्मदा मैईया को नांव ले के बुलागरी चालू कर दी. अब जैसे ही हमने दो चार गजल लिखी हमारे कम्पूटर पे भी दुश्मन कीट को हमला हो गवो. हमने इंजिनीयर बुलावो तो उसने बताया कि इन दुश्मन कीटों को मारने के लिए एक हजार को खर्च है  मित्र कीट की फ़ौज बुलानी पड़ेगी. हम तो डर गए थे. दे दिये हजार रूपये, भईया वो इंजिनीयर हजार रूपये की सीडी लाया और हमारे कम्पूटर में लगा के बोलो "अब ठीक हो गया है कोई समस्या नहीं है." कुछ दिन भईया बढ़िया चलो कम्पूटर, फेर एक दिन ठाड़ हो गवो. चल के नहीं दे. हमने सोचा इंजिनियर बुलाएँगे, वो फेर हजार रूपये ले जायेगा. मित्र कीट डाले हैं करके मूरख बना के चले जायेगो. 

तो हमने भी जुगत लगाईं और इसकी देशी दवाई करबे की सोची. भाई जब अंगरेजी दवाई काम नहीं करत है तो देशी दवाई बहुत फायदा करत है. बस रोग पकड़ में आ जाये. हमारे घर में लकड़ी के चक्का वारी बैल गाड़ी है. वा में जब चक्का जाम हो जाय, तब कालू राम काला वाला मोबिल आईल पॉँच रूपये का डालते रहे हैं. गाड़ी भी बढ़िया चलत है और बैलान को भी आराम है. वो भी दुआ दे रहे हैं. तो हमने ठान लिया देशी इलाज करना है कम्पूटर का. पाँच रूपये का तेल मंगाए और डाल दिये कम्पूटर में. 

बस फिर क्या था? तब से हमारा कम्पूटर शानदार चल रहा है. अब बता देते हैं का चमत्कार हुआ? जैसे ही हमने काला मोबिल आईल डाला, सारे दुश्मन कीट (वायरस) का मुंह काला हो गया. अब उनको डर हो गया. अगर बाहर निकले तो पहचाने जायेंगे, काला मुंह लेके कहाँ जायेंगे? जो देखेगा वो दुत्कारेगा. और बिरादरी वाले भी बोलेंगे.  कहाँ काला मुंह करवा के आये हो? इसलिए उस दिन से वो हमारे कम्पूटर में दुबके बैठे है. बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर रहे और हम मजे से बुलागरी कर रहे हैं. अगर आपको भी कम्पूटर में कोई वायरस की समस्या हो तो देशी ईलाज करके देखो. हमने किया है और उसका भरपूर लाभ उठा रहे है. बुजुर्ग कहत रहे "फायदे की चीज हो तो सबको बताओ और घाटे की है तो हजम कर जाओ, इसलिए ये बात हम बुजुर्गों का सम्मान करते हुए कह रहे हैं. भईया हम तो गंवई ठहरे…………।

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

पाबला जी को दुसरे जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाएँ

आज हर दिल अजीज, सभी ब्लोगर्स के जन्म दिन को जोर शोर से मनाने वाले बी.एस. पाबला जी का जन्म दिन है. 21 सितम्बर का दिन मुझे याद है क्योंकि इस दिन मैंने पाबला जी का प्रथम जन्म दिन मनाया था. पहला जन्मदिन क्यों मनाया था उसकी जानकारी यहाँ पर लीजिये.

ਪਾਬਲਾ ਜੀ ਨੂ ਜਨਮਦਿਨ ਦੀ ਲਖ ਲਖ ਮੁਬਾਰਕਾਂ 






ब्लॉगर मित्र पाबला जी को दुसरे जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाये.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नवल धवल सूरज से आलोकित, हो घर आँगन परिवार

नवल धवल सूरज से आलोकित, हो घर आँगन परिवार
नूतन वर्ष २०१० की आपको अशेष शुभकामनाएं अपार

बाधाएं दूर हो जीवन की, नित प्रेम सुरभि का हो संचार
मन में करुणा व्यापे निश दिन, बढे सुखों का कोषागार 

आज नव वर्ष २०१० का प्रथम सूर्योदय हो चूका है. सूर्य की स्वर्णिम किरणे धरा को स्वर्णमयी चादर में लपेट चुकी हैं. गुलाबी ठण्ड में कोहरे की हलकी सी धुंध प्रकाश की  किरणों का मार्ग रोकने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन किरणों को तो धरा पर आना है, 

एक सत्य की तरह, चाहे कितनी भी धुंध की चादर उसे ढकने का असफल प्रयास कर लें, किरणों को तो मंजिल तक पहुंचना ही है.अब पथिक चल पड़ा है. दृढ निश्चय करके लक्ष्य की ओर, जहाँ उसे पहुंचना ही है. यही जीवन है.दृढ निश्चयी पथिक मंजिल पा ही लेता है. 

चाहे कितने भी अवरोधक खड़े किये जाएँ उसे रोकने के लिए. इन दिनों में मैंने यही देखा है. मैं बैठा था बीते हुए वर्ष में मैंने ब्लॉग जगत पर जो लिखा उसकी चर्चा करने के लिए.

गत जनवरी माह में मैं ब्लाग पर आ चूका था. लेकिन सक्रिय लेखन १५ जुलाई से प्राम्भ किया. उसके बाद सिलसिला बदस्तूर जारी है. 

जो कारवां एक बार चल पड़ा वो रुका नहीं है. इस यात्रा में बहुत से सहयात्री मिले. उनका बहुमूल्य सहयोग मुझे प्राप्त हुआ. मैंने शिल्पकार के मुख से ब्लाग पर कवितायेँ लिखना प्रारंभ किया. 

उसके पश्चात् "एक लोहार की" , ललित डोट कॉम, ललित वाणी, अड़हा के गोठ,  इससे पूर्व गुरतुर गोठ में छत्तीसगढ़ी लिखता रहा. जब मित्रों का दायरा बढा तो एक सामूहिक ब्लॉग की आवश्यकता हुई, 

तब आपस में विचार करके चर्चा पान की दुकान पर ब्लाग का उदय हुया. मैंने अन्य सामूहिक ब्लॉग पर भी लिखा उल्टा तीर, नेट प्रेस, जबलपुर ब्रिगेड, साल के अंत में आते-आते चर्चा मंच पर चिटठा चर्चा भी लिखी. अंतिम में हिंदी चिटठा चर्चा परिवार में शामिल हुआ. 

इसके पूर्व पंजाबी ब्लाग पंजाब दी खुशबु में भी अपना पंजाबी लिखने का शौक पूरा करने के लिए शामिल हुआ.

इस अवधि में मैं सभी ब्लॉगों पर लगातार 356 पोस्ट लिखी, जिन्हें लग भग २,८६,289 पाठकों ने अपना प्रेम और स्नेह दिया तथा सभी को मिलाकर अभी तक 1665 टिप्पणियां प्राप्त हुई. 

यह मेरे गत वर्ष के लेखन का लेखा जोखा था. जहाँ तक कोशिश हुयी की मेरी दो पोस्ट लगातार प्रकाशित होती रहे और मैं इसमें कामयाब भी हुआ. एक गृहस्थ जीवन के झंझावातों से समय निकाल कर इतना कर पाना बहुत ही मुश्किल है. लेकिन मैंने इसे निरंतर करने की पुरजोर कोशिश की. 

इन दिनों में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. ब्लॉग की राजनीति से मैं दूर था और हमेशा ही दूर रहना चाहूँगा. क्योंकि मैंने राजनीति को बहुत ही करीब से जिया है. 

जहाँ तक लोगों का पहुंचना एक सपना है. उसे मैं छोड़ कर आ चूका हूँ अपने घर, अब मुझे सिर्फ शांति से बैठ कर लेखन कार्य ही करना है. 

इसलिए मैं इस ब्लाग राजनीति दूर रहता हूं और अपनी टिप्पणी भी सोच समझ कर देता हूँ कि मेरी किसी टिप्पणी से किसी को ठेस मत पहुंचे. ईश्वर ने अभी तक तो साथ दिया है. 

अपनी कृपा बनाये रखी है. आगे उसकी मर्जी. "जेहि विधि रखे राम तेहि विधि रहिये".

इस यात्रा में मेरे सहयोगी बने उनमे प्रथम नाम संजीव तिवारी जी का ही आता हैं. उनसे मेरी मुलाकात नेट पर ही हुयी उन्होंने मुझे ब्लागिंग की बारीकियों के विषय में अवगत कराया. 

फिर समीर लाल जी ब्लॉग पर पहुचे अपने उड़ान तश्तरी लेकर. तब लेकर उनसे रोज दुआ सलाम हो ही जाती है.ताऊ जी रामपुरिया जी का अपार स्नेह प्राप्त हुआ.

अनिल पुसदकर भैया, बी.एस. पावला, अविनाश वाचस्पति ,डॉ.सत्यजित साहू. "गिरीशपंकज भैया  अलबेला खत्री, आचार्य रूपचंद शास्त्री, निर्मला कपिला , संगीता पूरी , कुसुम ठाकुर, श्रीमती आशा जोगलेकर, अल्पना देशपांडे, बबली, लवली कुमारी,पी.सी. गोदियाल , 

परमजीत बाली जी,  संजीव तिवारी, शरद कोकास, दिनेश राय दिवेदी ,गिरिजेश राव, गिरीश पंकज, राजकुमार ग्वालानी, जी.के अवधिया, खुशदीप सहगल, राजीव तनेजा, पंकज मिश्रा, राज भाटिया. ज्ञान दत्त पांडेय, चिटठा चर्चा वाले अनूप शुक्ल जी ने भी चर्चा में स्थान दिया ,

हिन्दी चिटठा चर्चा में पंकज मिश्रा जी ने चर्चा की . अजयकुमार झा से मित्रता हुयी., एम् वर्मा, परम जीत बाली, श्यामल सुमन, महेंद्र मिश्रा  शिवम् मिश्रा सदा अदृश्य रहें वाले टिप्पू चाचा, मुरारी पारीक, रतन सिंग शेखावत जी, ताऊ जी लट्ठ वाले, रवि रतलामी  सूर्यकांत गुप्ता, बाल कृष्ण अय्यर, सुनील कौशल, विवेक रस्तोगी, रवि  कुमार रावतभाठा, दीपक तिरुवा महफूज अली  अजय कुमार जी.पंडित डी.के.शर्मा"वत्स", का अपार स्नेह मिला.

अब चर्चा पान की दुकान पर समीर लाल जी , ताऊ रामपुरिया जी , अजय झा जी, राजीव तनेजा जी, जी.के. अवधिया जी. योगेन्द्र मौदगिल जी, अनिल पुसदकर जी , गिरीश पंकज जी ,शरद कोकास जी,  महेंद्र मिश्रा जी, कुसुम ठाकुर जी, बालकृष्ण अय्यर जी , संजीव तिवारी जी, राजकुमार ग्वालानी जी . बी.एस. पावला जी, अपनी उत्कृष्ट रचनाये दे रहे है. 

इस तरह छत्तीसगढ़ से हमारा सामूहिक ब्लाग चल रहा है. हमारा उद्देश्य है की हम पाठकों को अच्छी से अच्छी रचनाएँ दे.

अभी कुछ दिनों में नए साथी भी मेरे से जुड़े. जिसमे डॉ. टी.एस. दराल जी,अरविन्द मिश्रा जी, दिनेश राय दिवेदी जी, डॉ. रूपचंद शास्त्री जी, कार्टूनिस्ट काजल कुमार जी, सुरेश शर्मा जी, जबलपुरिहा दुबे जी, हिमाशु जी, वाणी गीत जी, विवेक गुप्ता जी , मनोज कुमार जी, अदा जी, अल्पना वर्मा जी, सुनीता शानू जी, रेखा प्रह्लाद जी, शबनम खान जी, गिरीश बिल्लोरे जी, प्रवीण शाह, अंतर सोहिल जी, जाकिर अली रजनीश जी, स्मार्ट इंडियन जी, बवाल जी, हमारे युवा साथी कुलवंत हैप्पी जी, मिथलेश दुबे जी,  का साथ मिला, अब कारवां बढ़ चला है. ब्लाग जगत का परिवार भी बढ़ रहा है.

मैं सभी पाठको एवं ब्लागर मित्रों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और आशा करता हूँ कि जब तक मैं इस दुनिया में हूँ इसी तरह अपना स्नेह बनायें रखे. आपका आभारी रहूँगा. 

यदि किसी मित्र का नाम मानवीय भूल से इस सूची में छुट गया हो तो मुझे क्षमा करना. तथा मुझे आगाह करना, यही मित्रता है, मित्र की भूल को क्षमा कर देना. आपसे पुन: आशीष की आकांक्षा के साथ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये. 

कुछ मित्रों के समयाभाव होने के कारण लिंक नही दे पाया क्षमा प्रार्थी हूँ. 

 

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

ललित डाट कॉम का उदय

मैने इस ब्लॉग पर 15  सितम्बर 2009 मंगलवार हिंदी दिवस से लिखना प्रारंभ किया था. सामाजिक सरोकारों से संबधित विषयों पर एक अलग ब्लाग होना चाहिए. 

यह सोच कर ललित डाट कॉम का उदय हुआ. जिस दिन मैंने  इस पर पहली पोस्ट डाली, उस दिन हिंदी दिवस था. मेरा प्रथम आलेख हिंदी दिवस को ही समर्पित था. 

१५ सितम्बर को इस लेख को कितने पाठकों ने पढ़ा? ये तो मुझे नहीं पता. लेकिन १६ सितम्बर की दो टिप्पणियाँ दिख रही हैं. 

पहली है संगीता पुरी,  १६ सितम्बर २००९ ६:५७ AM  िबिल्‍कुल सही कहना है आपका .. हिन्‍दी के प्रति आपकी भावना बहुत अच्‍छी लगी Udan Tashtari,  १६ सितम्बर २००९ ७:०० ऍम सही कहा..सहमत!! 

उस दिन मैने पहली पोस्ट मे लिखा था। इन १०० पोस्टो में मैंने ब्लाग जगत को बड़े करीब से साक्षी भाव से देखा है. यहाँ होती हुयी हलचलों से मैं वाकिफ हुआ. 

ब्लॉग के बुखार को समझने की कोशिश की. जीवन में नए ब्लॉग मित्र बने. सभी से मुझे सहयोग मिला. यह आभासी दुनिया भी वास्तविक जीवन के बड़े करीब लगी. क्योंकि सारे किरदार तो वहीं से आते हैं. कोई अलग दुनिया नहीं है. 

वही दुनिया की अच्छाईयाँ-बुराईयाँ, पक्ष-विपक्ष मैंने यहाँ पाए. कुछ तो सिर्फ इसी में उलझ रहते हैं तो कुछ योगी भाव से सृजन में लगे हैं. हां कुछ युवा- नव जवान साथी हैं जो पूरी  उर्जा के साथ ब्लोगिंग को अंजाम दे रहे हैं. 

मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ और आग्रह करता हूँ. वे लेखन जैसे शुभ और पवित्र कर्म को अहर्निश जारी रखे. ताकि आने वाली पीढ़ी आपको एक आदर्श के रूप में याद रख सके. 
मैंने यहाँ पर बहुत कुछ सीखा. इन 100 दिनों में मैंने बहुत कुछ अनुभव किया. इन 100 पोस्टों में मुझे पढ़ने के लिए लगभग 69451 पाठक आये. 

अभी पोस्ट लिखे जाने तक 613 टिप्पणियाँ प्राप्त हुयी. गूगल में पेज रेंक 3 है. यह सतत लेखन का परिणाम ही है.  

इस अवधि में जिन्होंने मुझे प्रत्यक्ष-और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया. मैं उनका आभारी हूँ एवं सभी पाठको का अभिनन्दन करता हूँ जिन्होंने मेरे लेखन को पढ़ा और सराहा. 

कुछ विशिष्ट साथी हैं जो निरंतर मेंरा उत्साह वर्धन करते है. उनका उल्लेख एक अलग पोस्ट में करूँगा. सभी को मेरा विनम्र प्रणाम. नूतन वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं.