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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

देशी एंटी वायरस (व्यंग्य)

का बताएं भैया! हम तो ठेठ गंवईहा ठहरे. कछु कहत हैं तो लोग मजाक समझत हैं. अरे भाई हमको मजाक आती ही नहीं है. लेकिन जो बात दिल से कह देत हैं (बिना दिमाग लगाये) वो मजाक बन जात है ससुरी. अगर हम बात दिमाग लगा के करत हैं तो लोगन का रोवे का परत है, का बताएं बड़ी समस्या हो गई है. अभी हम देखत रहे समस्या चहुँ ओर ठाडी है. टरने को नांव ही नहीं लेत है. लेकिन हम ठहरे गंवईहा बिना समस्या टारे हम ना टरे.

अब देखिये ना कितना शोर मचा रहता है कि कम्पूटर मा  कोई जिनावर घुस गवा है. जिसके कम्पूटर मा घुस जात है उसको कम्पूटर ठाड़ हो जात है, बिगाड़ हो जात है. कच्छू करई नई देत है. हम एक भैया से पूछे भैया ये कौन सा जिनावर है जो कम्पूटर को और तुमाये को भी हलाकान कर डारे है? तो उन्होंने बताये के वायरस होत है. एक तरह को कीट है. तो हमने पूछो "कम्पूटर में कीट को काय काम है?" तो बोले जब इंटरनेट चलत है तो जो दुश्मन बैरी होय ना, वो अपनों जासूस भेज देत है हलाकान करबे के लिए. ये कीट भी दो तरह के होत हैं, एक है मित्र कीट दुसर है दुश्मन कीट, फेर दुश्मन कीट के हटाने के लाने मित्र कीट को बुलाओ फेर दुनो में लड़ाई होत है और मित्र कीट दुश्मन कीट को खा के ख़तम कर देत है. बस इत्ती सी बात है. अब वा के लिए तो इत्ती सी बात है और हमारे जैसे देहाती गंवईहन के लिए इत्ती सारी बात है. हमारे तो भेजे में ही नहीं घुसी. चलो भलो हुवो भेजे मे नहीं घुसी, नहीं तो माथ अलग पिराई और डाक्टर की भेट पूजा अलग होती.

अब जो हमारे मित्र रहे कम्पूटर वारे, वो बड़े बुलागर रहे. कम्पूटर मा लिखत रहे, लिख लिख के बहुत बड़े लेखक बन गए. बड़ो नांव हो गयो वा को. हमने एक दिन पूछो बताओ तो भैया का लिखत हो? हमको तो कछु पतों चले. तो भईया उनने कम्पूटर खोल के दिखायो और वो बांचन लागे हम मूड हिला -हिला के सुनत रहे. एक जगह लिखे रहे,  हमकू चड्डी खरीदना है. पुरानी वाली फट गई है, वो हरे नीले पट्टे वाले कपडे की बनी थी अब वो कपड़ा नहीं मिल रहा है. हम बहुत ढूंढ़ डारे, हमारे सारे आस-पास के मित्र भी ढूंढ़ डारे, उनको भी नहीं मिल रही है. हम आपसे गुजारिश कर रहे है.कि कोई हमें बता दे कि ये चड्डी को पट्टा वाला कपडा कहाँ मिलेगो. तो बताने वारे को हम बहुत बहुत धन्यवाद देंगे. हम ये चड्डी का कपड़ा इसलिए ढूंढ़ रहे हैं कि इसको धारण करने के बाद स्वर्गिक आनंद आत है. मिल जाये तो आप भी इस्तेमाल करके देखें.

एक जगह वो लिखे रहे हमारी भैंसिया गुम गई है. तालाब में गई थी नहाने. चरवाहों वही भूल गवो, कल से नहीं आई है. हम गांव में बहुत ढूंढ़ लिए, नहीं मिल रही है. भैंसिया जाने के गम में हमारी अम्मा ने रात को दूध नहीं पियो है. उनको बड़ा सदमा लगो है, सुबह-सुबह गश खा के गिर पड़ी. इधर हमारी बीवी भी परेशान किये दे रही है. उनके मईके से दो सारे आये हुए है. गांव में  पहलवानी करते हैं. उनको दूध की जरुरत है. जब से ये आये है इनको देख के भैंसिया फरार हो गई है. अब ये सारे हमारे महीने भर की तनखा को दूध तीन दिन में पी जावेगे. मोल को दूध बहुतै मंहगो परत है. ये सारेन को देख के हमरो तो बी पी बढ़ जात है. 

श्रीमती कह रही है के दूध लेके आओ हमारे भैया लोगों के लिए, नहीं तो हम मईके जात हैं और भईया लोगो दूध नहीं मिलत है तो ये बौरा जात है कहत रहे की दूध नहीं मिलो तो जीजी! आज जीजाजी को राम-नाम-सत् समझो. तुम्हारे लिए नयो जीजा ढूंढ़ देंगे. अब बताओ भैया हम फँस गए है. एक तरफ कुंवा दूसरी तरफ खाई, और ये खाई भी हमने एक होंडा के चक्कर में खुदाई. तो भईया बाकी बात तो मैं बाद में भी लिख देगें. अभी हमारी भैंसिया को पता बताय दो. आपकी मेहरबानी होगी. मुर्रा नसल की भैंस है टेम्पलेट का रंग काला है. अगल बगल में विजेट लगे हैं. दो कान, दो सींग एक मुहं, दो आंख, चार पैर, एक पूंछ है और एक निशानी है उसके पहचान की, वो जहाँ कही भी जात है, दांत निपोर के पगुरावत रहत है. 

हमने भी कहा क्या बढ़िया लिखते हैं मान गए भैया. आप तो हमारे शहर की नाक है. अब हमें भी कुछ लिखना सीखा दीजिये ना कंप्यूटर में. देखिये अभी एक सुन्दर गजल उतर रही है. लिख तो देंगे लेकिन छापेंगे कहाँ? इस लिए हमें भी ये बुलागरी सीखा दीजिये. 

अब उनसे गुरु मन्त्र पा के नर्मदा मैईया को नांव ले के बुलागरी चालू कर दी. अब जैसे ही हमने दो चार गजल लिखी हमारे कम्पूटर पे भी दुश्मन कीट को हमला हो गवो. हमने इंजिनीयर बुलावो तो उसने बताया कि इन दुश्मन कीटों को मारने के लिए एक हजार को खर्च है  मित्र कीट की फ़ौज बुलानी पड़ेगी. हम तो डर गए थे. दे दिये हजार रूपये, भईया वो इंजिनीयर हजार रूपये की सीडी लाया और हमारे कम्पूटर में लगा के बोलो "अब ठीक हो गया है कोई समस्या नहीं है." कुछ दिन भईया बढ़िया चलो कम्पूटर, फेर एक दिन ठाड़ हो गवो. चल के नहीं दे. हमने सोचा इंजिनियर बुलाएँगे, वो फेर हजार रूपये ले जायेगा. मित्र कीट डाले हैं करके मूरख बना के चले जायेगो. 

तो हमने भी जुगत लगाईं और इसकी देशी दवाई करबे की सोची. भाई जब अंगरेजी दवाई काम नहीं करत है तो देशी दवाई बहुत फायदा करत है. बस रोग पकड़ में आ जाये. हमारे घर में लकड़ी के चक्का वारी बैल गाड़ी है. वा में जब चक्का जाम हो जाय, तब कालू राम काला वाला मोबिल आईल पॉँच रूपये का डालते रहे हैं. गाड़ी भी बढ़िया चलत है और बैलान को भी आराम है. वो भी दुआ दे रहे हैं. तो हमने ठान लिया देशी इलाज करना है कम्पूटर का. पाँच रूपये का तेल मंगाए और डाल दिये कम्पूटर में. 

बस फिर क्या था? तब से हमारा कम्पूटर शानदार चल रहा है. अब बता देते हैं का चमत्कार हुआ? जैसे ही हमने काला मोबिल आईल डाला, सारे दुश्मन कीट (वायरस) का मुंह काला हो गया. अब उनको डर हो गया. अगर बाहर निकले तो पहचाने जायेंगे, काला मुंह लेके कहाँ जायेंगे? जो देखेगा वो दुत्कारेगा. और बिरादरी वाले भी बोलेंगे.  कहाँ काला मुंह करवा के आये हो? इसलिए उस दिन से वो हमारे कम्पूटर में दुबके बैठे है. बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर रहे और हम मजे से बुलागरी कर रहे हैं. अगर आपको भी कम्पूटर में कोई वायरस की समस्या हो तो देशी ईलाज करके देखो. हमने किया है और उसका भरपूर लाभ उठा रहे है. बुजुर्ग कहत रहे "फायदे की चीज हो तो सबको बताओ और घाटे की है तो हजम कर जाओ, इसलिए ये बात हम बुजुर्गों का सम्मान करते हुए कह रहे हैं. भईया हम तो गंवई ठहरे…………।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

वेलेन्टाईन डे है आया


रगों का दर्द पुराना फ़िर उभर आया
अंगुठा हिलाया कीबोर्ड खटखटाया
मुखड़ा हुआ पूरा तो अंतरा ये बोला
आरकुट गया फ़ेसबुक का जमाना
हो गए न घायल काहे दिल लगाया

माउस सुन रहा था मौज के मुड में
आ के वह बोला हो फ़ील के गुड़ में
मौसमे बहार था गोली जब घुमती
दुपट्ठे से साफ़ कर बारम्बार चूमती
आप्टिकल ने आके ठिकाने लगाया

कीबोर्ड न चुप रहा उसने मुंह खोला
जर्दे की पीक मारी खंखार के बोला
जबसे है बसंत मेरा हाल बुरा यारों
खूब खटखटाके पिंजर हिला डाला
बड़ा ये रंगीला मौसम का भरमाया

माईक्रोटेक मानिटर ने राज खोला
हम थे जवान गरदन हिलाके बोला
रुतबा था हमारा लोग रंग देखते थे
मरती थी हम पे भी कुड़ियाँ ढेर सारी
एलईडी के दिन हैं क्या जमाना आया

रैम क्यूँ चुप रहती मिसरी सी घोली
थोड़ा इठला कर मधुर स्वर में बोली
थी जब मैं 16 की सीडी खूब चलाई
फ़्लापी रही साथ फ़िल्म भी दिखाई
अब न पूछते कोई कैसी है यह माया

सुन रहा था सब डेस्कटॉप मुंह फ़ाड़े
आँखों में था आँसू रोया मार दहाड़ें
लैपटॉप मोबाईल ने कूड़ा कर डाला
जिसको भी देखो हाथ में है साला
मनाओ वेलेन्टाईन दर्द उभर आया

(C) तोप रायपुरी

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पांडे के पोथी पतरा अऊ पंडियाईन के मुखगरा -- ललित शर्मा

सुबह-सुबह कम्प्युटर का बटन दबा कर अंतरजाल से जुड़े ही था कि श्रीमती जी ने टेबल पर सरोता ला कर रख दिया। हम सरोता देखते ही समझ गए कि आज कैरियाँ जिबह करनी पड़ेगीं अचार के लिए। साथ ही उन्होने कह दिया कि पेड़ से कैरियाँ भी तोड़नी पड़ेगीं। आदेश का तत्काल पालन किया और दादी ने कैरियाँ तोड़ी उदय ने सायकिल की टोकरी में रख कर घर पहुंचाया। अचार के लिए पेड़ से हाथ से तोड़ी गयी कैरियाँ ही श्रेष्ठ होती है। पेड़ से जमीन पर गिरी हुई कैरियों का अचार सड़ जाता है। इधर मैने सरोता संभाल लिया। मनोयोग से कैरियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। श्रीमती जी मसाले तैयार करने में जुटी थी। अचार बनाना श्रम साध्य कार्य है। भोजन का मुख्य अंग होने के कारण अचार का प्रचलन सम्पूर्ण भारत में है। लेकिन घर के बने अचार की तो बात ही निराली है। बनाते वक्त सावधानी भी रखनी पड़ती है, नहीं तो फ़फ़ूंद लग कर सड़ने का खतरा निरंतर बना रहता है। बाजार के अचार तो खाने लायक ही नहीं रहते। घर के बने अचार की विशिष्टता यह है कि एक तरह का मसाला डालने के बाद भी अलग-अलग घरों के अचारों में स्वाद का बदलाव पाया जाता है।

एक बार हरिद्वार में हर की पौड़ी के पास मैने एक अचार की दुकान देखी थी। जिसमें तरह-तरह के अचार बरनियों में सजे थे। अचार देखकर लालच आ गया और सोचा कि कुछ अचार ले लिए जाए। आम, नींबू, मिर्च, कटहल, गोभी, करील, केर, गाजर, सिंगरी और भी न जाने कितने तरह के अचार थे। मैने सभी आचार 100-100 ग्राम लिए। वहाँ से मुझे मसूरी तक की यात्रा करनी थी। रास्ते में अचार का स्वाद लिया जाएगा सोच कर बैग के हवाले किया और चल पड़े। द्रोणाचार्य गुफ़ा (झंडु नाला) के पास बैठ कर सभी अचारों का स्वाद लिया। किसी भी अचार में पृथक स्वाद नहीं मिला। सब में एक जैसा ही स्वाद था। पूरा मजा किरकिरा हो गया। तब जाकर घर के अचार का महत्व समझ में आया। घर के बने अचार के तो कहने ही क्या हैं।

कल 25 अप्रेल का दिन था, इस दिन वैवाहिक बंधन में बंध कर स्वेच्छा से अपनी स्वतंत्रता को खोया था  कुछ बंधन जीवनोपयोगी होते हैं। इसमें वैवाहिक बंधन को पवित्र बंधन माना गया है। वैवाहिक जीवन में आचार और सरोते का बड़ा महत्व है। अचार से ही आचार संहिता बनती है, जिसमें प्रेम, विश्वास, सम्मान, समर्पण, एवं परिवार के प्रति जिम्मेदारियों के निर्वहन का संकल्प इत्यादि मसाले डाले जाते हैं त्तब कहीं जाकर ग़ृहस्थी नामक अचार का निर्माण होता है। जिस तरह किसी राष्ट्र को चलाने के लिए स्वनिर्मित संविधान की प्रमुख भूमिका होती है ठीक उसी तरह गृहस्थी को चलाने के लिए स्वनिर्मित आचार संहिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्वघोषित आचार संहिता के सहारे बिना किसी विघ्न बाधा के जीवन नैया खेते हुए वैतरणी पार हो सकते हैं।

हाँ! एक बात है सरोता का ध्यान रखना पड़ता है। यह सरोता सिर्फ़ काटने का ही काम करता है, जोड़ने के काम तो इसकी प्रवृति में ही नहीं है। इसका निर्माण काटने के उद्देश्य से ही हुआ है। इसे चलाते वक्त नजर चूकी और यह घायल करने से नहीं चूकने वाला। इस तरह सरोते का प्रयोग करते हुए सावधानी जरुरी है। समाज में सरोते जगह-जगह मिल जाएगें जो अवसर मिलते ही आपके विश्वास को काटने का प्रयत्न करते हैं। इन सरोतों से निपटने के लिए व्यक्ति को अच्छा श्रोता होना जरुरी है। तभी सार्थक चिंतन कर नीर-क्षीर किया जा सकता है। इतिहास गवाह है राम राज में भी ऐसे ही एक सरोते ने सीता की अग्नि परीक्षा कराई थी। सरोते ने अपना काम कर दिया। आगे अब तुम भुगतो। भगवान को भी गहरा संताप सहना पड़ा। सरोते का कुछ नहीं बिगड़ा, वह आज तक चल रहा है, जैसा पहले चला करता था।

सरोते कई तरह के होते हैं, छोटी सरोती से लेकर बड़े सरोते तक मिलते हैं। सुपारी आम काटने वाले से लेकर मधुर संबधों को भी काटने वाले सरोते मिलते हैं। सरोते ऐसा नहीं है कि दाम्पत्य जीवन में ही मिलते हैं वे तो आपको प्रत्येक जगह मिल जाएगें। सरोते को साधकर आचार संहिता का पालन करते हुए अब हमारी गृहस्थी बालिग हो चुकी है। समाज में तरह-तरह के सरोते मिलते हैं, प्राचीन काल का विभीषणी सरोता प्रसिद्ध है, इसने ही अपने भाई रावण का सर्वनाश कराया था। वर्तमान में जयचंदी सरोते चलन में हैं, जो घर परिवार से लेकर देश का सर्वनाश करने पर आमादा हैं। विभीषणी एवं जयचंदी सरोते मौका देखते ही काम कर जाते हैं। पर विडम्बना यह है कि इनसे काम पड़ ही जाता है, घर में ही संभाल कर रखना पड़ता है। आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी भी मांग कर ले जाते हैं, लेकिन वापस कर जाते हैं। घर में रखना खतरे से खाली नहीं है।
सरोते से काम ले लिया। आम काट कर अचार बना लिया। घर में था इसलिए फ़टाफ़ट काम आ गया नहीं तो पड़ोसी से मांग कर लाना पड़ता। श्रीमती जी ने वर्षगांठ की सुबह ही सरोता सामने रख कर चिंतन करने पर मजबूर कर दिया। श्रोता को भी सरोता कहा जाता है। श्रोता वाला सरोता बनने में कोई बुराई नहीं है। अच्छा सरोता सभी पसंद करते हैं, अच्छा सरोता ही उम्दा वक्ता होता है। पांडे के पोथी पतरा अऊ पंडियाईन के मुखगरा, दुनो एकेच होथे। (पंडित जी जो पोथी पत्रा देख कर बताएंगे वह पंडिताईन मुंह जबानी ही बता देती है) क्योंकि पंडिताईन ने सरोता होने का मरम जान लिया है। इनके फ़जल से मैं भी अच्छा सरोता बनने के उद्यम में हूँ। क्योंकि वर्षगांठ पर इससे अच्छा तोहफ़ा कोई दूसरा नहीं हो सकता। आखिर कहना ही पड़ेगा सरोता जिंदाबाद।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

दूंगी तैनू रेशमी रुमाल -- ललित शर्मा

रुमाल वर्तमान में हमारी जरुरत का सामान बन गया है। ऑफ़िस या काम पर जाने से पहले आदमी हो या औरत रुमाल साथ रखना नहीं भूलते। बच्चा भी जब स्कूल जाता है तो उसकी वर्दी पर माँ पिन से रुमाल लगाना नहीं भूलती। रुमाल का कब क्यों और कैसे अविष्कार हुआ यह बता पाना तो कठिन है। पर सुना है कि फ़्रांस के राजा की बेटी से विवाह करने वाले इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द्वितीय के मन में प्रथमत: रुमाल बनाने का विचार आया। गद्दीनशीन होने पर उसे हाथ और नाक मुंह पोंछना पड़ता था, उसके लिए तौलिए का काम लिया जाता था, जो कि बहुत भारी था। इसलिए उसने आदेश दिया रंग-बिरंगे कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़े तौलिए के स्थान पर प्रयोग में लाए जाएं। इस तरह रुमाल  का जन्म हुआ। रुमाल इंग्लैंड से होते हुए एशिया में भारत तक पहुंच गया। हैंडकरचीफ़ से इसे स्थानीय भाषा के रुमाल, कामदानी, करवस्त्र, उरमाल, सांफ़ी इत्यादि नाम भी मिल गए। रुमाल का सफ़र चल पड़ा अब यह सभ्यता और व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
भारत में रुमाल की जगह अंग वस्त्रम् उत्तरीय का प्रचलन था, जिसे कालान्तर में अंगोछा या गमछा का नाम दिया गया। गमछा या अंगोछा सभी ॠतुओं में मनुष्य के काम आता है। महीन धागों से बना हुआ वजन में हल्का वस्त्र सर्दी, गर्मी से रक्षा करता है तो वर्षाकाल में भीगे हुए शरीर को पोंछने के काम आता है। बाजार जाने पर थैला नहीं है तो अंगोछा ही सब्जी रखने के काम आ जाता है। भोजन के वक्त थाली के अभाव में भोजन करने के भी काम आ जाता है। अंगोछा का प्रचलन वर्तमान में भी है। लोग प्रदूषण से बचने के लिए मुंह ढंक कर शहर में घूमते-फ़िरते मिल जाते हैं। अंग्रेजों के साथ रुमाल आने पर इसे भारतीय जनमानस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कोट-पतलून-बुशशर्ट के साथ-साथ रुमाल भी वेशभूषा का आवश्यक अंग बन गया। इस तरह अंग वस्त्रम् उत्तरीय के लघु रुप रुमाल की यात्रा प्रारंभ हो गयी। जो नजले से टपकते नाक, एवं पशीने से लथपथ मुंह पोंछने से चलकर आशिकों की रुह में समा गया। कमाल का रुमाल है।
वो भी क्या दिन थे जब आशिक लड़कियों के रुमाल के लिए मरा करते थे |अगर गलती से किसी लड़की का रुमाल मिल जाए तो खुद को खुशनसीब समझते थे| उस रुमाल को जान से भी ज्यादा प्यार करते| उसे तकिये के नीचे रख के सोते थे। रुमाल प्रेमियों को बहुत भाया। रंग-बिरंगे रुमालों पर विभिन्न प्रकार के चित्र एवं चिन्ह बनाए जाते हैं। किन्ही पर नाम के प्रथम अक्षर वर्णित होते हैं। पंडुक पक्षीयों का जोड़ा रुमाल पर शोभायमान होता है। जिस तरह जीवन पर्यन्त पंडूक पक्षी का प्रेम और जोड़ा बना रहता है उसी तरह प्रेमी-प्रेमिकाओं का भी ताउम्र जोड़ा बना रहे। 
नायिका कहीं अपना रुमाल जानबूझ कर या धोखे से भूल जाती तो आशिक की पौ बारह मानिए। नायिका रुमाल पर सूई-धागे से दिल का चिन्ह बनाती तो आशिक समझता कि यह दिल उसी के लिए रुमाल पर निकाल कर रख दिया है। वह इसे सूंघ कर देखता कि चमेली के इत्र की महक है या नहीं और इससे उसके कुल-परिवार के रहन-सहन एवं आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगाता। आशिक रुमाल पाकर रोमांचित हो उठता और कह उठता कि-इस तरह के रुमाल तो मसूरी के माल रोड़ पर मिला करते थे। ऐसा ही रुमाल सोहनी ने अपने महिवाल को दरिया-ए-चिनाब के किनारे दिया था और महिवाल ने उसे ताउम्र अपने गले से बांधे रखे था। उस वक्त मान्यता थी कि रुमाल का तोहफ़ा देने से प्रेम सफ़ल हो जाता है। स्थानीय  बोलियों एवं भाषाओं में रुमाल को लेकर प्रेम के गीत लिखे गए जिन्हे आज तक ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है।
फ़िल्म वालों ने भी रुमाल का प्रचार-प्रसार करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। फ़िल्मों एवं फ़िल्मी गीतों में रुमाल का इस्तेमाल धड़ल्ले से होने लगा। जब प्राण जैसा उम्दा खलनायक गले में रुमाल बांधकर रामपुरी चाकू परदे पर लहराता था तो दर्शक सिहर उठते थे और यही रुमाल देवानंद गले में डाल कर एक गीत गाता था तो सिनेमा हॉल सीटियों से गुंज उठता था। फ़िल्मी गीत भी चल पड़े -"हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका, बेचैन केर रहा है ख्याल आपका" दूंगी तैनू रेशमी रुमाल,ओ बांके जरा डेरे आना, ओ रेशम का रुमाल गले पे डालके, तु आ जाना दिलदार, मै दिल्ली का सुरमा लगा के अरे कब से खड़ी हूँ दरवज्जे पे, उलझे से गाल वाला,लाल लाल रुमाल वाला।  इस तरह फ़िल्मों मे रुमाल अब तक छाया हुआ है।
जहाँ एक तरफ़ यह रुमाल प्रेमियों को आकर्षित करता रहा वहीं दूसरी तरफ़ इसने बेरहमी से कत्ल भी किए। इतिहास में जब दुनिया के सबसे खुंखार सीरियल किलर का जिक्र आता है तो पीले रुमाल की क्रूरता भी सामने आती है। बेरहाम नामक इस बेरहम ठग को खून से डर लगता था, यह अपने शिकार की हत्या पीले रुमाल से गला घोंट कर करता था। 1765-1840 तक इस बेरहम खूनी का दौर चला। व्यापारी हो या फिर तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालु या फिर चार धाम के यात्रा करने जा रहे परिवार, सभी निकलते तो अपने-अपने घरों से लेकिन ना जाने कहां गायब हो जाते, यह एक रहस्य बन गया था। काफिले में चलने वाले लोगों को जमीन खा जाती है या आकाश निगल जाता है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था।यह यात्रियों के दल में शामिल होकर उन्हे हत्या करने के पश्चात लूट लेता था और उनकी लाशें दफ़ना देता था जिससे उनका नामो-निशान ही नहीं मिलता था।सन् 1809 मे इंग्लैंड से भारत आने वाले अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। तब 10 वर्षों की गुप्तचरी के पश्चात इस पीले रुमाल वाले खूनी को गिरफ़्तार किया जा सका। बताते तो ये भी है कि स्लीमैन का एक पड़पोता इंग्लैड में रहता है और उसने अपने ड्राइंगरुम में उस पीले रुमाल को संजों कर रख रखा है।
भारत में हिमाचल के चंबा का रुमाल अपनी बेमिसाल कढाई के लिए प्रसिद्ध है। सूती के कपड़ों पर जब रेशम के चमकीले रंग-बिरंगे धागों से कलाकार जब अपनी कल्पनाओं की कढाई करते हैं तो वह सजीव हो उठती है। इन रुमालों पर की गयी कलाकारी को देखकर ऐसा लगता है मानो चित्र अब बोल पड़ेगें। लोग कढाई की इस बारीक कला को देख कर आश्चर्य चकित हो जाते हैं। चम्बा में बनने वाले रुमालों पर न केवल रामायण, महाभारत, श्रीमदभागवत, दूर्गासप्तशती, और कृष्ण लीलाओं को भी काढा जाता है बल्कि राजाओं के आखेट का भी सजीव चित्रण किया जाता है। यह रुमाल एक वर्ग फ़ीट से लेकर 10 वर्ग फ़ीट तक के आकार में होते हैं। चम्बा की रुमाल कढाई प्राचीन हस्तकला का नमूना है बल्कि एतिहासिक महत्व भी रखती है। इसका पंजीयन बौद्धिक सम्पदा अधिनियम के तहत करा लिया गया है। जिससे रुमाल निर्माण की हस्तकला को संरक्षण देकर बचाया जा सके।
वर्तमान ने कागज के नेपकीन बाजार में आ गए हैं। इनका प्रचलन रुमालों को बाजार से बाहर नहीं कर पाया है। रुमाल की अपनी अलग ही महत्ता है। आज भी हस्त निर्मित रुमाल बनाए जा रहे हैं। सूती एवं रेशमी वस्त्र पर विभिन्न माध्यमों से कढाई एवं प्रिंटिग हो रही है। जिनमें हाथों से किए गए बंधेज के काम में लगभग 150 तरह के डिजाईन बनाए जाते हैं तथा मशीन एवं कम्प्युटर की सहायता से हजारों डिजाईन बनाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त बुटिक प्रिंट, टैक्स्चर प्रिंट, फ़ैब्रिक पेंटिंग, क्रोशिया वर्क, ब्लॉक प्रिंट, सैटिंग, वेजीटेबल प्रिंट, स्क्रीन प्रिंट, थ्री डी कलर, ग्लो पैंटिंग, स्प्रे पेंटिंग, थ्रेड पैंटिंग, मारबल पैंटिग, स्मोक पैंटिग, गोदना पैंटिंग, एवं फ़ैंसी रुमाल भी बनाए जा रहे हैं। समय कितना भी बदल जाए लेकिन रुमालों का चलन रहेगा और जनमानस को अपने नए-नए रुपों में आकर्षित करता रहेगा।