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मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला :मृदा भाण्ड

भ्यता के विकास के साथ मानव चरणबद्ध रुप से दैनिक कार्य में उपयोग में आनी वाली वस्तुओं का निर्माण करता रहा है। इनमें भाण्ड प्रमुख स्थान रखते हैं। जिन्हें वर्तमान में बरतन कहा जाने लगा है। प्राचीन काल में मानव मिट्टी के बरतनों का उपयोग करता था। किसी भी प्राचीन स्थल से उत्खनन के दौरान लगभग सभी चरणों से मिट्टी के बर्तन प्राप्त होते हैं तथा उत्खनन स्थल पर एक बहुत बड़ा यार्ड इनसे बन जाता है। इस यार्ड में इन्हें वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए क्रमानुसार रखा जाता है। छत्तीसगढ़ के डमरु में उत्खनन में अन्य पॉटरी के साथ कृष्ण लोहित मृदा भांड भी प्राप्त हुए। इन्हें देखकर मुझे ताज्जुब हुआ कि एक ही बरतन एक तरफ़ काला और एक तरफ़ लाल दिखाई दे रहा है। वैसे तो इन बरतन को रंग कर यह रुप दिया जा सकता था, परन्तु इन बरतनों को लाल और काला रंग पकाने के दौरान ही दिया गया था। 
मृदाभाण्ड बनाने की तकनीक का निरीक्षण करते हुए लेखक
कुम्हारों के द्वारा वर्तमान में किस तरह के बरतन बनाए एवं पकाए जा रहे हैं यह देखने के लिए हम समीप के गाँव में कुम्हार के भट्टे पर निरीक्षण करने के लिए गए। वहाँ कुम्हार से चर्चा की और उसके भाण्डों को भी देखा। इन भाण्डों में उत्खनन में प्राप्त भाण्डों जैसी स्निग्धता, चमक एवं मजबूती नहीं थी इससे साबित हुआ कि प्राचीन काल में भाण्ड निर्माण की प्रक्रिया वर्तमान से उन्नत थी और निर्माता भी समाज में उच्च स्थान रखता था। तभी तो सिरपुर स्थित तीवरदेव विहार के मुख्यद्वार की शाखा में शिल्पकार ने चाक सहित कुम्हार को स्थान दिया है। यह उनके सामाजिक मह्त्व को बताता है। 
मृदा भाण्ड पकाने की वर्तमान तकनीकि
पिछली शताब्दी में प्राचीन स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन का लक्ष्य मात्र मुल्यवान एवं कलात्मक सामग्री की खोज करना था। मृदा भांडों एवं उनके टुकड़ों की गणना व्यर्थ समझी जाती थी। प्राय: उत्खननकर्ता इन्हें फ़ेंक देते थे अथवा इतना अनुमान लगाते थे कि उस समय की सभ्यता में लोग किन-किन बर्तनों का उपयोग करते थे, इनसे उस युग का आर्थिक जीवन जोड़ते थे, परन्तु उत्खनन की दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं माना जाता था। 
उत्खनन में पाप्त मृदाभाण्ड के टुकड़े - डमरु जिला बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
सर्वप्रथम फ़्लिंडर्स पेट्री ने मिश्र में उत्खनन कार्य करते हुए अनुभव किया कि प्रत्येक काल में विभिन्न प्रकार के कौशल से निर्मित मृदाभांडों का प्रचलन रहता है और परम्परानुराग के कारण शीघ्र ही आमूल परिवर्तन नहीं होता। चर्म एवं काष्ठ की सामग्रियाँ जहां मिट्टी में दबे होने के कारण नष्ट हो जाती हैं, वहीं भांड हजारों वर्षों तक मिट्टी में दबे होने के बाद भी नष्ट नहीं होते। अत: पुरातत्व के अध्ययन में इनका महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। पेट्री की इस दृष्टि ने पुरातन सभ्यताओं के अध्ययन में क्रांति ला दी। तब से मृदा पात्रों एवं भाण्डों का अध्ययन पुरातत्व शास्त्र का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा।
कुम्हार के आवे पर- डॉ शिवाकांत बाजपेयी, डॉ जितेन्द्र साहू एवं करुणा शंकर शुक्ला
आज मृदाभाण्डों को पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला कहा जाता है। जिस प्रकार किसी वर्णमाला के आधार पर ही उसका साहित्य पढा जाता है, उसी प्रकार मृदा भाण्ड अपने काल की सभ्यता सामने लाते हैं। इनके निर्माण की एक विशिष्ट शैली का प्रचलन एक काल का द्योतक होता है। उनको एक विशिष्ट शैली में निर्मित एवं रंगों में वेष्टित करते हैं। जैसे कभी अंगुठे के प्रयोग से बर्तन बने तो कभी मिट्टी की बत्तियों से बनाए गए तो कभी चाक से बनाए गए। यह विकास अलग-अलग काल को दर्शाता है तथा बरतनों के आवश्यकतानुसार नवीन प्रकार भी दिखाई देते हैं।
पॉटरी यार्ड - तरीघाट उत्खनन जिला दुर्ग छत्तीसगढ़
रंगों के संबंध में हम देखते हैं कि भारत में कभी कृष्ण लोहित मृदा भांड बने तो कभी चित्रित धूसर बने, तो कभी कृष्णमार्जित एवं कृष्णरंजित लोहित मृदाभांड बने। ये सारे न तो एक समय में बने है और न एक ही लोगों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग कालों में, भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा पृथक रंगों के मृदा भाण्डों का विकास हुआ। इससे स्तरीकरण एवं इन मृदा भाण्डों के साथ प्राप्त सामग्रियों से कालनिर्धारण में सहायता मिलती है। अन्य सामग्रियों एवं अभिलेखों की अनुपलब्धता में उत्खननकर्ता मृदाभाण्डों का अध्ययन कर काल का निर्धारण कर सकता है। इसलिए मृदाभाण्ड काल निर्धारण के लिए मह्त्वपूर्ण रुप से सहायक होते हैं। मृदा भाण्डों का महत्व मानव सभ्यता के साथ सतत बना हुआ है और बना भी रहेगा। 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

जगन्नाथ मंदिर का शिल्प एवं इतिहास - कलिंग यात्रा

उड़ीसा राज्य के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिन्दुओं का प्राचीन एवं प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। हिन्दूओं की धार्मिक आस्था एवं कामना रहती है जीवन में एक बार भगवान जगन्नाथ के दर्शन अवश्य करें क्योंकि इसे चार धामों में से एक माना जाता है। वैष्णव परम्परा का यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण को समर्पित है। यहाँ की वार्षिक रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है। इस मंदिर में तीन मुख्य देवता भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा एवं भाई बलभ्रद की पूजा होती है। जगन्नाथ के धार्मिक महत्व के विषय में जन-जन जानता है। फ़िर भी मैं संक्षेप में उल्लेख करना चाहुंगा।
सुभाष चौक पुरी
इस मंदिर का निर्माण कलिंग राजा अनंतवर्मन गंगदेव ने कराया था। मंदिर का जगमोहन एवं विमान भाग इनके शासन काल (1078-11148 ई) में निर्मित हुआ था। फ़िर सन 1147 में राजा अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रुप दिया था। इसका ताम्रपत्रों में उल्लेख बताया जाता है। मंदिर में जगन्नाथ अर्चना सन १५५८ तक होती रही। इस वर्ष काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला किया और मूर्तियां तथा मंदिर के भाग ध्वंस किए और पूजा बंद करा दी तथा विग्रहो को चिलिका झील मे स्थित एक द्वीप मे गुप्त रखा गया। बाद में, रामचंद्र देब के खुर्दा में स्वतंत्र राज्य स्थापित करने पर, मंदिर और इसकी मूर्तियों की पुनर्स्थापना हुई।
मंदिर का विहंगम दृश्य
कलिंग शैली में निर्मित इस मंदिर को हम देखे तो वर्तमान में भी काला पहाड़ द्वारा किए गए विध्वंस के चिन्ह दिखाई देते हैं। मुख्य मंदिर के आमलक एवं जगमोहन की छत को उसके द्वारा तोड़ दिया गया प्रतीत होता है। प्रस्तर निर्मित इस मंदिर के विशाल आमलक एवं जगमोहन की छत का पुनर्निर्माण हुआ है। जो प्रस्तर निर्मित न होकर चूना सुर्खी से बना हुआ है अलग ही दिखाई देता है। राजा ने जगन्नाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया था। इसकी भित्तियों पर अप्सराएं, वादक, भारसाधक, व्यालों के साथ मिथुन मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं। इसकी भव्यता देखते ही बनती है।
चलो चले मुसाफ़िर
मंदिर का विस्तार वृहत क्षेत्र में है, जो लगभग चार लाख वर्ग फ़ुट में विस्तारित है और चारदिवारी से घिरा हुआ कलिंग स्थापत्यकला एवं शिल्प का उदाहरण है तथा यह भारत के भव्यतम स्मारक स्थलों में से एक है। मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है, जिसके शिखर पर विष्णु का श्री सुदर्शन चक्र (आठ आरों का चक्र) मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर का मुख्य ढांचा एक 214 फ़ुट (65 मी) ऊंचे पाषाण चबूतरे पर बना है। इसके भीतर आंतरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। 
सिंह द्वार पर स्थापित गरुड़ स्तंभ
मंदिर का मुख्य भाग विशाल है। मंदिर की पिरामिडाकार छत और लगे हुए मण्डप, अट्टालिकारूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊंचे होते गये हैं। यह एक पर्वत को घेरी हुई छोटी पहाड़ियों एवं टीलों के समुह सदृश दिखाई देता है। मुख्य भवन एक बीस फ़ुट (6.1 मी) ऊंची दीवार से घिरा हुआ है तथा दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित है। इसका द्वार दो सिंहों द्वारा रक्षित हैं।
ध्वज एवं चक्र
मंदिर के शिखर पर स्थित चक्र, सुदर्शन चक्र का प्रतीक है और लाल ध्वज भगवान जगन्नाथ का प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर से अनेक किंवदन्तियां एवं लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। एक कथा के अनुसार भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया।

रथयात्रा मार्ग
उसके बाद राजा विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर समक्ष मूर्ति बनवाने के लिए उपस्थित हुए। विश्वकर्मा जी ने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आई, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर मूर्तिकार ने बताया कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं।
भोग प्रसाद रिक्शा
महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह भगवान जगन्नाथ को मानते थे, उन्होने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर को दिये गये स्वर्ण से कहीं अधिक था। कहते हैं कि उन्होंने अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत भी की थी कि विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा, जो विश्व में अब तक सबसे मूल्यवान और सबसे बड़ा हीरा है, इस मंदिर को दान कर दिया जाए। लेकिन यह सम्भव ना हो सका, क्योकि उस समय तक ब्रिटिशों ने पंजाब पर अपना अधिकार करके, उनकी सभी शाही सम्पत्ति जब्त कर ली थी। वर्ना कोहिनूर हीरा, भगवान जगन्नाथ के मुकुट की शान होता।
मंदिर मुख्य प्रवेश द्वार
जगन्नाथ मंदिर की एक खास बात है कि इसमें हिन्दूओं के अतिरित्क अन्य धर्मावलम्बियों का प्रवेश वर्जित है। मुख्यद्वार पर ही इस आशय की चेतावनी लिखी हुई है। भारतीय सिक्ख, जैन एवं बौद्धों के लिए प्रवेश की छूट है, परन्तु उन्हें अपनी भारतीय पहचान दिखानी होती है। मंदिर ने धीरे-धीरे गैर-भारतीय मूल के लेकिन हिन्दू लोगों का मंदिर क्षेत्र में प्रवेश स्वीकार करना आरम्भ किया है। अन्यथा बाली द्वीप के लोगों को भी प्रवेश नहीं दिया जाता था। पूछने पर पण्डा जी ने बताया कि अन्य लोगों को भगवान स्वयं रथयात्रा के दिन मंदिर से बाहर आकर दर्शन देते हैं, इस दिन कोई भी भगवान के दर्शन कर सकता है। यह  रथ यात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को होती है, जो तिथियों के अनुसार जून या जुलाई में होती है। जारी है… आगे पढें।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

पाटन दरबार चौक में ब्लॉगर्स जमावड़ा

नेपाल यात्रा प्रारंभ से पढें
मारा वातानुकूलित चलयान आगे बढा। इस बीत सुनिता यादव जी ने सभी को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं दी। इसी के साथ छोटा सा फ़ोटो सैशन भी चला। बनारस वाले भैया हमें काठमाण्डू शहर से परिचित करवा रहे थे। हमें बताया गया कि संग्रहालय जा रहे हैं। बस एक स्थान पर रुकी, बताया गया कि समीप ही टिकिट खिड़की है। संग्रहालय में प्रवेश करने के लिए यहीं पर टिकिट लेनी पड़ती है। टिकिट का मूल्य 150 नेपाली रुपए था। उसने गले में लटकाने के लिए प्रवेश पत्र दिया। जिससे पहचान रहे कि ये सभी नगद देकर इस इलाके में प्रवेश कर रहे हैं। राजीव शंकर मिश्रा जी ने सभी की टिकिट लेने में सहायता की।
पाटन दरबार चौक का रास्ता
अब यहाँ से पैदल ही हम लोग आगे बढ चले। टिकिट घर से बाहर निकलने पर बाजों के बजने की आवाज आने लगी। एक मुखौटाधारी चटक रंगों के वस्त्र पहन आगे-आगे नृत्य कर रहा था और उसके पीछे छोटी-छोटी कन्याएं रक्तिम वस्त्रों में सज-घज कर चल रही थी। उनके साथ महिलाएं भी थी, जो उनकी माताएं लगी। मैने उनकी फ़ोटुएं ली। यह पता नहीं था कि पंक्तिबद्ध रैली की शक्ल में ये सब कहाँ जा रहे हैं। बाजार के बीच से हम आगे बढते रहे। कुछ प्राचीन मंदिर दिखाई दिए, जिन्हे प्रस्तर से बनाया गया था। उनका गर्भ गृह बंद था।
कुमारी पूजन को जाती बालिकाएं
रास्ते के दोनो तरफ़ लकड़ी के बनाए हुए अलंकृत मकानों की झलक दिखाई देने लगी। इन घरों में लगी हुई लकड़ी पर सुंदर खुदाई की गई थी। ह्स्ताधारित शिल्प का अद्भुत प्रदर्शन यहाँ दिखाई दिया। इस इलाके के सभी घरों का निर्माण लकड़ी से ही हुआ है। छतों पर लगी लकड़ियों में फ़णीनाग के छत्र युक्त पुरुष की मूर्ति दिखाई दी तथा खिड़कियों के नीचे एक बाज एवं कबूतर निरंतरता से बने हुए दिखाई दिए। ये नेवाड़ी संस्कृति के पारम्परिक चिन्ह दिखाई दे रहे थे। एक बच्चा खिड़की से झांक कर मुस्कुराते हुए सड़क पर गुजरते पर्यटकों को देख कर हाथ हिला रहा था।
काष्ठालंकृत खिड़की से झांकता बच्चा-नेवाड़ी संस्कृति
मुकेश सिन्हा जी ने मुझे घायल कर रखा था। मैं जब भी कोई चित्र लेने की कोशिश करता वो अपना कैमेरा धरे मेरे सामने आ जाते। जबकि उनके कैमरे में 22 एक्स का जूम है। लेकिन समीप से जाकर फ़ोटो लेने की आदत पड़ी हुई है। जब कैमरे में जूम है तो उसका भरपूर उपयोग करना चाहिए और मै करता भी हूँ। कई जगह इनकी करामात के कारण चित्र लेने में व्यवधान हुआ। कुछ भी हो लेकिन मुकेश जी चित्र बढिया लेते हैं। 
पाटन दरबार चौक में स्थित मंदिर में मुकेश सिन्हा
अब जहां हम पहुचे उसे दरबार स्क्वेयर कहते हैं। इस चौक पर कई मंदिर बने हुए हैं तथा राजमहल को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। इस स्थल पर प्राचीन इमारते हैं, राजमहल को हनुमान ध्योखा कहते हैं। हनुमान ध्योखा नेपाल के शाही परिवार का प्राचीन निवास है, इसका निर्माण 16 बीं शताब्दी में हुआ था। इस ईमारत के पूर्वी द्वार को हनुमान द्वार कहा जाता है। समीप ही नरसिंह भगवान की सुंदर प्रतिमा बनी हुई है। ऐतिहासिक शाही ईमारत परिसर में पंचमुखी हनुमान एवं त्रिभुवन संग्रहालय बने हुए हैं। काफ़ी संख्या में गोरी चमड़ी वाले विदेशी संग्रहालय की इमारत में दिखाई दिए। संग्रहालय देखने के लिए 150 नेपाली रुपए की टिकिट लेनी पड़ती है तथा इस दरबार स्क्वेयर में प्रवेश करने के लिए 150 नेपाली रुपए  शुल्क लिया जाता है।
राजमहल में नरसिंह
समीप ही एक ईमारत में शौचालय का निर्माण किया गया है, जिसके द्वार पर हिंदू देवी देवताओं की प्रतिमाएं लगी हुई हैं। द्वार के शीर्ष पर महिषासुर मर्दनी प्रतिमा है। हिन्दू राष्ट्र में देवी देवताओं की प्रतिमाओं का शौचालय के प्रवेश द्वार पर लगे होना मुझे आश्चर्य चकित कर गया। यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया जिससे पूछा जा सकता। कुछ लोग शौचालय के कलात्मक द्वार पर खड़े होकर चित्र खिंचवा रहे थे जिससे शौच को जाने-वालों को व्यवधान उत्पन्न हो रहा था। चलते चलते मैने भी एक चित्र लिया। कम से कम याद तो रहेगा कि शौचालय में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का प्रयोग हो रहा है। हो सकता है यह बदलाव माओवादी सरकार आने के बाद हुआ हो।
शौचालय के द्वार पर महिषासुर मर्दनी एवं अन्य अनुषांगी देवता
दरबार स्क्वेयर में काफ़ी गहमा गहमी थी यहाँ कुमारी पूजा उत्सव का आयोजन हो रहा था। इस दृष्टि से नेवाड़ी समुदाय काफ़ी परम्परावादी लगा। जो अपनी प्राचीन संस्कृति को वर्तमान में भी बनाए रखने में कामयाब है। नहीं तो पश्चिम की बयार में संस्कृतियों में विकृति पैदा हो रही है। सामाजिक ताने बाने बिखरने के साथ वर्जनाएं एवं परम्पराएं भी टूट रही हैं। परम्परागत चटक रंगों के परिधानों एवं आभूषणों से सजधज कर युवतियाँ आयोजन में सम्मिलित थी। हम उनके इस आयोजन को देख रहे थे और चित्र ले रहे थे।
नेपाल का इकलौता प्राचीन शिखर युक्त कृष्ण मंदिर
काठमाण्डू का यह हिस्सा पाटन कहलाता है। यह प्राचीन शहर है जो काठमांडू (कांतिपुर) से  जुड़ा हुआ है। प्राचीन अभिलेखों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पाटन का इतिहास लिच्छवी काल सन 570  से प्रारंभ होता है तथा इसका निर्माण भारबी द्वारा होना बताया जाता है जो मनदेव के पोते थे। राजमहल परिसर का निर्माण प्रथम मल्ल साम्राज्य के राजा सिद्धी नरसिंह मल्ल द्वारा सन 1618 से 1681 के मध्य कराया गया है। इन्होने सुंदरी चौक, तालेजु मंदिर, तथा भद्रखल नामक तालाब का निर्माण किया। इन्होने 1684 में कृष्ण मंदिर का निर्माण कराया। यह नेपाल का प्रथम शिखर युक्त मंदिर है। श्रीनिवास मल्ल ने अपने पिता द्वारा अधूरे छोड़े गए मल्ल चौक को पूर्ण कराया। योग्रेन्द्र मल्ल द्वारा 1684 से  1705 ईस्वीं के बीच मंदिर का मणिमंडप एवं स्वयं की प्रतिमा का निर्माण कराया गया।
कृष्ण मंदिर परिसर में जमावड़ा 
कृष्ण मंदिर का शिल्प नयनाभिराम है, इसका प्रवेश द्वार छोटा है तथा लिखा हुआ है कि सिर्फ़ हिन्दू ही मंदिर में प्रवेश करें। कृष्ण मंदिर के सामने विशाल प्रस्तर स्तंभ पर पीतल के गरुड़ विराजमान हैं। इस मंदिर के समीप सभी ब्लॉगर एकत्रित हो गए और यहीं पर चित्र सत्र प्रारंभ हो गया। नमिता राकेश, गिरीश पंकज, सम्पत मोररका, सुनीता यादव, रविन्द्र प्रभात, मनोज पांडे, मुकेश तिवारी, सुशीला पुरी, मुकेश सिन्हा, ब्लॉगर दम्पत्ति कृष्ण कुमार यादव, आकांक्षा यादव, पाखी, विनय प्रजापति इत्यादि सभी इस सुंदर स्थान को अपनी स्मृति में संजो लेना चाहते थे। कैमरों के बटन फ़टाफ़ट दब रहे थे, जिनके पास कैमरे नहीं थे वे मोबाईल से चित्र ले रहे थे। इस स्थान पर हम लोगों ने काफ़ी समय बिताया। अगर जाने की याद नहीं दिलाई जाती तो चित्र लेते हुए रात हो जाती। इस स्थान पर दुबारा आना चाहूंगा तथा जम कर फ़ोटोग्राफ़ी करनी है।
नेवाड़ी युवतियाँ परम्परागत परिधान में 
कुमारी पूजा उत्सव प्रारंभ था। सुंदर परिधानों में छोटे-छोटे बच्चे अपने परिजनों के साथ मौजूद थे। उनकी चेहरे से लग रहा था कि इस उबाऊ संस्कार से वे परेशान हैरान हैं। उनके माता पिता तसल्ली दिलाने के लिए खाने पीने की चीजें दे रहे थे जिससे बच्चों का मन विचलित न हो और कर्मकांड में संलग्न रहें। कुछ बच्चे रोना-गाना मचा रखे थे। आयोजन स्थल पर अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई थी। पर्यटकों के लिए यह अजूबा था वे कैमरे के प्रयोग में लगे हुए थे। यहां से पैदल-पैदल हम अपने बस के ठिकाने पर पहुंचे। भूख जोरों की लग रही थी। अगले पड़ाव पर लघु भोजन का इंतजाम था।

आगे पढ़ें…………

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा




लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

एक दिन ऐसा आएगा,यह न हमने सोचा था
बाड़ ही खेत खाएगा, यह न हमने सोचा था
राज अपना सुराज हो, इसकी किसको चिंता है।
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

बेटी के स्कूल जाते ही माँ उसकी खैर मनाती है
सही सलामत आ पाए बाप को चिंता सताती है
सड़कों पर होते बलात्कार, इसकी  किसको चिंता है
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

सभ्यता का ढोल पीटके गार्ड पार्टिकल तक जा पहुंचे
ताकत का प्रदर्शन करके तुम परमाणु बम सजा चुके 
आदिमयुग की बर्बरता तुममे अभी तक जिंदा है।
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

अत्याचारों की देखो अब तो, हद हो गयी है यारों
अपराधी खुले आम घुमे रहे, यह प्रजातंत्र है यारों
भारत गारत हो रहा है, इसकी किसको चिंता है
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

घड़ियाली आंसू बहाकर, सत्ता बेवकूफ़ बनाती है
लाल किले की प्राचीरों से,बेबस सिसकियाँ टकराती हैं
अबलाओं की लाज लुट रही,इसकी किसको चिंता है।
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

यह कृष्ण की धरती है,जिसने लाज द्रौपदी की बचाई थी
रण कुरुक्षेत्र सजा भीषण,कौरवों ने मुंह की खाई थी।
 जाग रही है पुन: कौरवी सेना,इसकी किसको चिंता है
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

न्याय मांगने इस धरा पर खड़ा हुआ है हर बंदा 
हाथ जोड़ खड़े रहने पर पड़ता है पुलिसिया डंडा
अंग्रेजों सा बर्ताव हो रहा इसकी किसको चिंता है
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्दवासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥

समय आ गया है अब, हाथों में तिरंगा उठा लो
गर भुजबल आया हो,तुम रण कुरुक्षेत्र सजा लो
नारा एक बुलंद करो, इस देश की हमको चिंता है
लाल किले से लोकतंत्र आज हुआ शर्मिन्दा हैं।
जागो हिन्द वासियों अपराधी अभी तक जिंदा हैं॥


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