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मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला :मृदा भाण्ड

भ्यता के विकास के साथ मानव चरणबद्ध रुप से दैनिक कार्य में उपयोग में आनी वाली वस्तुओं का निर्माण करता रहा है। इनमें भाण्ड प्रमुख स्थान रखते हैं। जिन्हें वर्तमान में बरतन कहा जाने लगा है। प्राचीन काल में मानव मिट्टी के बरतनों का उपयोग करता था। किसी भी प्राचीन स्थल से उत्खनन के दौरान लगभग सभी चरणों से मिट्टी के बर्तन प्राप्त होते हैं तथा उत्खनन स्थल पर एक बहुत बड़ा यार्ड इनसे बन जाता है। इस यार्ड में इन्हें वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए क्रमानुसार रखा जाता है। छत्तीसगढ़ के डमरु में उत्खनन में अन्य पॉटरी के साथ कृष्ण लोहित मृदा भांड भी प्राप्त हुए। इन्हें देखकर मुझे ताज्जुब हुआ कि एक ही बरतन एक तरफ़ काला और एक तरफ़ लाल दिखाई दे रहा है। वैसे तो इन बरतन को रंग कर यह रुप दिया जा सकता था, परन्तु इन बरतनों को लाल और काला रंग पकाने के दौरान ही दिया गया था। 
मृदाभाण्ड बनाने की तकनीक का निरीक्षण करते हुए लेखक
कुम्हारों के द्वारा वर्तमान में किस तरह के बरतन बनाए एवं पकाए जा रहे हैं यह देखने के लिए हम समीप के गाँव में कुम्हार के भट्टे पर निरीक्षण करने के लिए गए। वहाँ कुम्हार से चर्चा की और उसके भाण्डों को भी देखा। इन भाण्डों में उत्खनन में प्राप्त भाण्डों जैसी स्निग्धता, चमक एवं मजबूती नहीं थी इससे साबित हुआ कि प्राचीन काल में भाण्ड निर्माण की प्रक्रिया वर्तमान से उन्नत थी और निर्माता भी समाज में उच्च स्थान रखता था। तभी तो सिरपुर स्थित तीवरदेव विहार के मुख्यद्वार की शाखा में शिल्पकार ने चाक सहित कुम्हार को स्थान दिया है। यह उनके सामाजिक मह्त्व को बताता है। 
मृदा भाण्ड पकाने की वर्तमान तकनीकि
पिछली शताब्दी में प्राचीन स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन का लक्ष्य मात्र मुल्यवान एवं कलात्मक सामग्री की खोज करना था। मृदा भांडों एवं उनके टुकड़ों की गणना व्यर्थ समझी जाती थी। प्राय: उत्खननकर्ता इन्हें फ़ेंक देते थे अथवा इतना अनुमान लगाते थे कि उस समय की सभ्यता में लोग किन-किन बर्तनों का उपयोग करते थे, इनसे उस युग का आर्थिक जीवन जोड़ते थे, परन्तु उत्खनन की दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं माना जाता था। 
उत्खनन में पाप्त मृदाभाण्ड के टुकड़े - डमरु जिला बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
सर्वप्रथम फ़्लिंडर्स पेट्री ने मिश्र में उत्खनन कार्य करते हुए अनुभव किया कि प्रत्येक काल में विभिन्न प्रकार के कौशल से निर्मित मृदाभांडों का प्रचलन रहता है और परम्परानुराग के कारण शीघ्र ही आमूल परिवर्तन नहीं होता। चर्म एवं काष्ठ की सामग्रियाँ जहां मिट्टी में दबे होने के कारण नष्ट हो जाती हैं, वहीं भांड हजारों वर्षों तक मिट्टी में दबे होने के बाद भी नष्ट नहीं होते। अत: पुरातत्व के अध्ययन में इनका महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। पेट्री की इस दृष्टि ने पुरातन सभ्यताओं के अध्ययन में क्रांति ला दी। तब से मृदा पात्रों एवं भाण्डों का अध्ययन पुरातत्व शास्त्र का एक आवश्यक अंग माना जाने लगा।
कुम्हार के आवे पर- डॉ शिवाकांत बाजपेयी, डॉ जितेन्द्र साहू एवं करुणा शंकर शुक्ला
आज मृदाभाण्डों को पुरातत्व शास्त्र की वर्णमाला कहा जाता है। जिस प्रकार किसी वर्णमाला के आधार पर ही उसका साहित्य पढा जाता है, उसी प्रकार मृदा भाण्ड अपने काल की सभ्यता सामने लाते हैं। इनके निर्माण की एक विशिष्ट शैली का प्रचलन एक काल का द्योतक होता है। उनको एक विशिष्ट शैली में निर्मित एवं रंगों में वेष्टित करते हैं। जैसे कभी अंगुठे के प्रयोग से बर्तन बने तो कभी मिट्टी की बत्तियों से बनाए गए तो कभी चाक से बनाए गए। यह विकास अलग-अलग काल को दर्शाता है तथा बरतनों के आवश्यकतानुसार नवीन प्रकार भी दिखाई देते हैं।
पॉटरी यार्ड - तरीघाट उत्खनन जिला दुर्ग छत्तीसगढ़
रंगों के संबंध में हम देखते हैं कि भारत में कभी कृष्ण लोहित मृदा भांड बने तो कभी चित्रित धूसर बने, तो कभी कृष्णमार्जित एवं कृष्णरंजित लोहित मृदाभांड बने। ये सारे न तो एक समय में बने है और न एक ही लोगों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग कालों में, भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा पृथक रंगों के मृदा भाण्डों का विकास हुआ। इससे स्तरीकरण एवं इन मृदा भाण्डों के साथ प्राप्त सामग्रियों से कालनिर्धारण में सहायता मिलती है। अन्य सामग्रियों एवं अभिलेखों की अनुपलब्धता में उत्खननकर्ता मृदाभाण्डों का अध्ययन कर काल का निर्धारण कर सकता है। इसलिए मृदाभाण्ड काल निर्धारण के लिए मह्त्वपूर्ण रुप से सहायक होते हैं। मृदा भाण्डों का महत्व मानव सभ्यता के साथ सतत बना हुआ है और बना भी रहेगा। 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

मुर्दों के जीवित शहर लोथल (લોથલ) में एक दिन ---- ललित शर्मा

लोथल का आसमानी चित्र
लोथल (લોથલ) ​का उत्खनित स्थल संग्रहालय से थोड़ी दूर पर ही है। मुख्यद्वार से प्रवेश करने पर सामने एक गोदी नुमा संरचना दिखाई दी। वहाँ से हम आगे बढ लिए, जिस बंदे से हमें मुलाकात करके इस बंदरगाह के विषय में जानना था वह नगर की बसाहट के नीचे की तरफ़ था। वहाँ पहुंचने पर देखा कि कुछ लोग घास काट रहे हैं। बरसात के समय बड़ी बड़ी घास उग आई थी। वहीं आवाज देने पर विपुल नामक बंदा टोपी लगाते  हुए आया। उसने बताया कि वह यहां का चौकीदार है, जो भी पर्यटक आते हैं उन्हे वही लोथल (લોથલ) नगरी की सैर कराता है। मकवाना के फ़ोन के बारे में पूछने पर उसने बताया कि उनकी मिस कॉल आई थी, पर यह नहीं बताया कि कोई आ रहे हैं उत्खनित स्थल पर। चलो कोई बात नहीं, भ्रमण किधर से शुरु किया जाए। उसने निचली बस्ती से यात्रा प्रारंभ करवाई। मोहन जोदरो एवं हड़प्पा में मानव सभ्यता के प्राप्त होने पर इसे सिंधु घाटी सभ्यता का नाम दिया। जब इस काल की सभ्यता के चिन्ह अन्य जगहों पर मिलने से इसे सैंधव सभ्यता कहा जाने लगा। लोथल दुनिया भर के पुराविदों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। प्राचीन सभ्यता  को देखने जिज्ञासु यहाँ आते ही रहते हैं।

लोथल की बसाहट (चित्र गुगल से साभार)
इसकी खोज 1954 में हुई थी, यह अहमदाबाद शहर से 83 किलोमीटर पर स्थित है। लोथल में उत्खनन का कार्य सन १९५५ से १९६२ के वर्षों में आर्कियोलाजिकल सर्वे ओफ इंडिया के विख्यात पुरातत्त्वविद डॉ. एस रंगनाथ राव के नेतृत्व में किया गया था। जैसा कि पाया जाता है यहाँ पर भी एक बड़ा टीला था। यह टीला खंभात की खाड़ी से 18 किलोमीटर पर स्थित है। लोथल शब्द से जैसे जाहिर होता है लोथ, लोथड़ा। मृत्यु के पश्चात शरीर लोथड़ा हो जाता है। किसी प्राकृतिक आपदा के कारण यह नगर मुर्दों के टीले में तब्दील हो गया। इसलिए स्थानीय लोग इसे लोथल के नाम से संबोधित करने लगे होगें। मोहन जोदरों  का अर्थ भी मुर्दों का टीला ही किया गया। जहाँ कभी आपदा के कारण नगर नष्ट हो जाते थे वहाँ  दुबारा नगर बसाए जाने पर मुर्दे ही मिलते थे। शायद इसीलिए इन स्थानों का नामकरण मुर्दों से संबंध रखता है।

विनोद गुप्ता जी, विपुल और गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला
सम्पूर्ण नगर चार दीवारी से घिरा है। चार दीवारी के भीतर ही सभी संरचनाएं प्राप्त होती हैं। विपुल भाई टोपी संभालते जाते हैं और बताते जाते हैं। इधर श्मशान है, वहाँ से कंकाल मिले हैं। इधर नगर के बड़ेरे लोगों का घर है। एक बडी सी घर की संचरना की ओर इशारा करके बताते हैं। हम आगे बढते हैं तो एक कुंआ नजर आता है। नगर में पीने के जल के लिए संभवत: इसका उपयोग किया जाता होगा। नगर में गंदे पानी की निकासी के लिए नालियों की समुचित व्यवस्था नजर आ रही थी। चौड़े रास्ते हैं नगर निवेश की चुस्त दुरुस्ती दिखाई दे रही थी। यहाँ से प्राग ऐतिसाहिक काल से बहुत से मिट्टी के बर्तन मिले हैं। जब यह नगर अपने उत्कर्ष पर था तब इसके समीप से साबरमती नदी एवं भोगोवो नदी बहा करती थी। उनके जल से यहाँ निर्मित गोदी में भराव होता था तथा मालवाहक नौकाएं गोदी में आकर लगती थीं। जिनसे सामान उतार कर गोदी के सामने बने गोदामों में रखा जाता था।

निचली बस्ती की बसाहट
लोथल नगर का वर्तमान विस्तार 580X300 मीटर का है। लेकिन नगर के आकार को देख कर लगता है कि भूतकाल में यह अधिक रहा होगा। एक पूर्ण विकसित समृद्ध नगर का आकार इतना छोटा नहीं हो सकता। उत्खनन में प्राप्त जानकारी से इस बस्ती के तीन स्तरों का पता लगा। सबसे नीचे वाले स्तर में मकान जमीन से ही बनाए गए थे। लगभग 2350 ई पू  बाढ का पानी भर जाने से यह नगरी डूब गयी। पुन: बसाहट होने पर बाढ से बचाने के लिए समुचित उपाए किए गए। नगर को बाढ से बचाने के लिए चारों तरफ़ कच्ची ईंटो की दीवार बनाई गयी। चौड़ी सड़कों से छोटी गलियां भी निकलती हैं। सड़के के दोनो ओर मकानों की बसाहट है। सभी मकानों में स्नानगृह एवं जल निकालने के लिए मोरी की व्यवस्था नजर आ रही थी। 

धातु गलाने की फ़ाउंडरी
नगर के दक्षिण पूर्व में शासक का बड़ा आवास भी मिला है। जिसमें पानी निकलने के लिए बड़ी मोरियां बनी हुई हैं। आवास का प्लेट फ़ार्म भी अन्य आवासों से ऊंचाई लिए हुए है। उसके सामने ही बर्तन पकाने की बड़ी भट्ठी भी मिली है। विपुल उसे गलाई कारखाना (फ़ाउंडरी) बता रहा था। मिट्टी में धातुओं की पहचान करके उसे निकालने की विधि जानना उस समय का क्रांतिकारी अविष्कार रहा होगा। उन्होने बड़ी तकनीक विकसित करके तांबा, लोहा मिट्टी से पृथक किया होगा तदुपरांत उससे बर्तन, मूर्तियाँ, मुहर, सिक्के आदि ढाले होगें। यहाँ भी धातुओं से निर्मित सामग्री प्राप्त हुई है। जिससे जाहिर होता है कि लोथल में धातुओं से निर्मित सामग्री का उपयोग होता था।

डॉक यार्ड पर विनोद गुप्ता जी
लोथल के पूर्वी छोर पर निचले भाग में एक आयताकार संरचना में पानी भरा हुआ था। हम उसके पास पहुंचे तो विपुल ने बताया कि यहाँ पर नाव आकर रुकती थी, उससे सामान उतार कर सामने गोदाम में रखा जाता था। वैसे यह गोदी जैसी संरचना काफ़ी बड़ी है। जानकारी लेने पर पता चला कि इसकी पश्चिमी दीवार 212 मीटर, पूर्वी दीवार 209 मीटर, उत्तरी दीवार 36 मीटर और दक्षिणी दीवार 34 मीटर लंबी है। दीवारों की अधिकतम ऊंचाई 4 मीटर है। उत्तरी दीवार में 12.5 मीटर चौड़ा प्रवेशद्वार है। ज्वार-भाटे के समय इस द्वार से जलपोत भीतर घुसते थे। रेत भर जाने से जब नदी का प्रवाह बदल गया, तब पूर्वी दीवार पर 6.5 मीटर चौड़ा एक दूसरा द्वार बनाया गया। इस गोदी में पानी के घटाने एवं बढाने की व्यवस्था है। एक तरफ़ ओव्हर फ़्लो बनाया गया है। जो पूर्व से पश्चिम की ओर छोटी नहर से जाकर फ़िर नदी में मिल जाता है। 

नगर क्षेत्र में विनोद गुप्ता जी एवं कुशवाहा जी
संग्रहालय में देखने से पता चलता है कि यहाँ अनेक मुद्राएं प्राप्त हुई, इन मुद्राओं और मुहरों का ऐतिहासिक महत्व है। ये पत्थर, पकी हुई मिट्टी अथवा तांबे की हैं। बहुत सी मुद्राएं चौरस आकार की हैं, लगभग 2.5 से 2.5 सेंटीमीटर की। इनके एक ओर बैल, हाथी, बाघ आदि कोई पशु का चित्र बना है और दूसरी ओर कुछ अक्षर कुरेदे गए हैं। एक मुद्रा में तीन-चार पशु दिखाई देते हैं। बहुत-सी आयताकार मुद्राएं भी मिली हैं। इनमें केवल लिखावट है। ये सब मुद्राएं हड़प्पा-मोहेंजोदड़ो से मिली मुद्राओं जैसी ही हैं। इन मुद्राओं पर अंकित अक्षरों को अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। बाजार क्षेत्र में कई सार्वजनिक स्नानागार बने हैं तथा इस इलाके में एक कुंआ भी है। साथ पीने के पानी को छानने का एक यंत्र भी बना देखा। जिसमें दो घड़े लगे हुए हैं। उपर के घड़े में पानी डालने से नीचे के घड़े में स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध हो जाता था। लोथल से प्राप्त होने वाला मछली पकड़ने कांटा ठीक वैसा ही है जैसा आज भी प्रचलन में है।

प्राचीन कुंए की बनावट पर गंभीर मशविरा
जब हम श्मशान की ओर जाना चाहते हैं तो विपुल कहता है कि उधर जाने का रास्ता साफ़ नहीं है। यहाँ से जो भी सामग्री मिली है, वह सब संग्रहालय में रखी है। हमने संग्रहालय से जो भी किताबें खरीदी उससे हमें जानकारी लेने में सहायता हुई। लगभग 2 घंटे लोथल बंदरगाह के उत्खनित स्थल पर बिताने के पश्चात हम वापस संग्रहालय की तरफ़ पहुंचे। वहाँ पहुंच कर आस-पास मौजूद अन्य स्थलों के विषय में जानकारी ली तो पता चला कि समीप ही लगभग 8 किलोमीटर उतेलिया पैलेस है। वहाँ पर खाने की व्यवस्था भी हो जाएगी। उतेलिया पैलेस के रास्ते में खाली जमीन पर हमें नमक जमा नजर आता है। यह स्थान गुजरात के नक्शे में समुद्र के किनारे है। अगर गुजरात के मैप मे देखे तो हमें एक पतली सी धार दिखाई देती है। यह समुद्र इस धारा के रुप में लोथल के समीप पहुंच जाता है। हमें उतेलीया पैलेस देखने की प्रबल इच्छा हो रही थी। लोथल देखने की बरसों की इच्छा पूरी कर हम उतेलिया पैलेस की ओर बढ रहे थे …………आगे पढें

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

लोथल (લોથલ) : हड़प्पा कालीन नगर -- भाग 1 --- ललित शर्मा

लोथल के प्रवेश द्वार पर विनोद गुप्ता जी और लेखक
प्राथमिक पाठशाला में पढते थे तो एक पाठ सिंधुघाटी की सभ्यता पर था। पाठ के आलेख में मोहन जोदड़ो एवं हड़प्पा, से प्राप्त खिलौने में चक्के वाली चिड़िया, मुहर और पुरुष का रेखा चित्र भी था। साथ ही उस समय के लोगों के रहन-सहन, नगर विन्यास के विषय में भी बताया गया। लोथल (લોથલ) का जिक्र भी हड़प्पा कालीन सभ्यता के साथ ही होता है, तब से मेरा मन इन स्थानों को देखने का था। मोहन जोदरो तो पाकिस्तान में चला गया। लोथल  (લોથલ) भारत में मिला। आज समय आ गया था प्राचीन इतिहास से रुबरु होने का। सुबह से ही मन में उत्साह था। जाने को तैयार हो चुका था। पराठे और छाछ का प्रात:राश ले कर चल पड़े। विनोद गुप्ता जी को घर से लिए और साथ ही कुशवाहा जी भी थे। लगभग साढे नौ बजे लोथल के लिए चल पड़े। किसी भी पुरास्थल की जानकारी के लिए वहाँ पर उपस्थित व्यक्ति ही आपकी सहायता कर सकता है, अन्यथा सभी स्थल एक जैसे ही हैं। हम डेढ घंटे में लोथल के गेट तक पहुंच चुके थे।

चिरचिरा (अपामार्ग)
जनसुविधा के लिए रुकने पर घास में एक पौधा दिखाई दिया। इसे हमारे यहाँ स्थानीय भाषा में "चिरचिरा" और आयुर्वेद की भाषा में "अपामार्ग" कहते हैं। यह पौधा बड़े काम का है, अब इस पर नजर पड़ गयी तो चर्चा करते चलें। इस पौधे के कांटो वाले फ़ल को कूटने के बाद कोदो के दाने जैसे दाने निकलते हैं। इन 50 ग्राम दानों की खीर बनाकर खाने के बाद सप्ताह भर तक भूख प्यास नहीं लगती, शौच और लघु शंका भी नहीं होती। इसका प्रयोग हठयोगी करते हैं या नवरात्र पर शरीर पर नौ दिन तक जंवारा उगाने वाले भक्त भी। कहते हैं कि इसकी जड़ को किसी प्रसूता स्त्री की कमर में प्रसव के वक्त बांध दिया जाए तो प्रसव बिना किसी दर्द के निर्विघ्न हो जाता है। प्रसवोपरांत इस जड़ को तुरंत ही खोलना पड़ना है, अन्यथा नुकसान होने की भी आशंका रहती है, इसलिए इसका उपयोग किसी कुशल वैद्य की देख रेख में ही होना चाहिए। वरना लेने के देने भी पड़ सकते हैं। कुछ और भी जड़ी-बूटियाँ दिखाई दी पर हमें तो लोथल का स्थल देखना था, इसलिए बोर्ड के पास से पैदल ही आगे बढ लिए।

संग्रहालय की वर्तमान स्थिति (नो साईन बोर्ड)
इस स्थान के इर्द - गिर्द एक "रसोड़ा" (टीन शेड की रसोई) भी बना हुआ है। पर्यटक इस स्थान पर अपना खाना बनाने का सामान साथ लाते हैं। यहाँ भ्रमण करने के बाद पिकनिक मनाकर चले जाते हैं। हम सामने दिख रही एक ईमारत की बाउंड्री तक पहुंचे तो वहां के गेट पर लिखा था "वाहनो का प्रवेश वर्जित है"। हमने वाहन बाहर ही लगा लिया। भीतर जाने पर पता चला कि यह पुरातत्व सर्वेक्षण का संग्रहालय है। इस ईमारत पर कहीं पर भी संग्रहालय होने का चिन्ह नहीं लगा है। कोई साईन बोर्ड नहीं, वहां मिले लोगों से पूछने पर उन्होने बताया कि यह संग्रहालय है। संग्रहालय के भीतर पहुंचने पर कुछ लोग बैठे दिखे, सामने टीवी पर लोथल की डाक्युमेंट्री फ़िल्म का प्रदर्शन हो रहा था। उनसे पूछने पर पता चला कि यह फ़िल्म सिर्फ़ अग्रेंजी और गुजराती में ही उपलब्ध है, अब हिन्दी भाषा गुजरातियों के लिए विदेशी भाषा हो गयी है तो हिन्दी में अब आगे मिलना संभव नहीं है। वहाँ पर 4 लोगों का स्टाफ़ दिखाई दिया। एक मकवाना जी थे उन्होने हमें संग्रहालय की सैर करवाई। 

ए एस आई कर्मचारी मकवाना एवं गुप्ता जी
लोथल (લોથલ) से उत्खनन में प्राप्त वस्तुएं अद्भुत हैं, एक हिसाब से देखा जाए तो यह समृद्ध संग्रहालय है। इस संग्रहालय में बांयी तरफ़ उत्खनन से प्राप्त माला के मोती, टेराकोटा के गहने, मुद्रा, मुहर, सीप,  तांबे और कांसे के औजार एवं वस्तुएं, हाथी दांत की बनी वस्तुएं एवं मिट्टी के बर्तन प्रदर्शित हैं तथा दूसरी तरफ़ जानवरों एवं मनुष्यों की छोटी मुर्तियाँ, चित्रित मिट्टी के बर्तन, तोलने का बांट, तथा कब्रिस्तान से प्राप्त मानव कंकाल की प्रतिकृति भी रखी हुई है। मकवाना ने बताया कि उत्खनन से प्राप्त लगभग 5 हजार वस्तुओं में से संग्रहालय में 800 वस्तुएं प्रदर्शित की गयी है। एक मृदा भांड पर मैने प्यासे कौवे द्वारा मटकी में कंकर डालते हुए अंकन देखा अर्थात प्यासे कौंवे की कहानी भी बहुत पुरानी है। पंचतंत्र की कथाओं में वर्णित चालाक लोमड़ी की कहानी भी रेखांकन द्वारा प्रदर्शित की गयी है। मृतकों के साथ रखे जाने वाला सामान भी संग्रहालय में रखा है। 

प्राचीन खेल, आप प्रांत के हिसाब से नाम देने में स्वतंत्र हैं
हाथी दांत की कलम, तीर के फ़लक, सोने के हार, एव एक स्थान पर मिले मनके इतने बारीक हैं कि उन्हे देखने के लिए पावर कांच का उपयोग किया गया है। सूई से लेकर चौपड़ तक यहां मौजूद है, बचपन में हम तीरी-पासा नामक खेल खेला करते थे, फ़र्श पर लाईन खींच कर। कौड़ी नहीं मिलती थी तो ईमली के बीज को फ़ोड़ कर दो हिस्सों में करने के बाद उसके पाँच हिस्से लेकर पासे में उपयोग करते थे। एक पट पासे का मान 5 होता था और चित पासे का मान एक। फ़िर इसी मान से सभी अपनी गोटियाँ चलते थे। लोथल एक व्यापारिक नगर होने के कारण यहाँ समय बिताने के लिए लोग इस खेल का ही प्रयोग करते थे। यहाँ मिले टेराकोटा के चौपड़ से पता चलता है। तब से लेकर आज तक यह खेल जारी है। इससे जाहिर होता है कि तीरी-पासा या चौपड़ का खेल बहुत प्राचीन है। आज हमारे यहाँ ग्रामीण अंचलों में यह खेल खेला जाता है। पशु चराने वाले चरवाहे कहीं पर भी लाईन खींच कर जंगल में उपलब्ध सामग्री से इस खेल को खेलकर मनोरंजन कर लेते हैं।

उत्खनन में प्राप्त कंकालों की प्रतिकृति
संग्रहालय मध्य में लोथल के उत्खनित स्थल का एक माडल बना कर रखा गया है। हम माडल के द्वारा उत्खनित नगर की जानकारी ले सकते हैं। साथ ही मुद्राओ एवं मुहरों का प्रदर्शन किया गया है। सभी व्यापारियों का अपना पृथक व्यापार चिन्ह हुआ करता था। जिसे मुहर कहते थे, आज हम मुहर का प्रयोग करते हैं, किसी अधिकारी के पदनाम की मुहर की मान्यता है। अधिकारी को बदलते रहते हैं पर मुहर नहीं बदलती। उसी तरह व्यापारी अपने माल और हुंडी इत्यादि पर मुहर का प्रयोग करते थे। एक साबुत मृदा पात्र दिखाई दिया जिसमें बहुत सारे छेद बने हुए थे। यह पात्र रोशनी के लिए उपयोग में लाया जाता रहा होगा। पात्र के भीतर दिया रखने पर पुष्कल प्रकाश प्राप्त हो सकता है। कुछ कुल्हाड़ियाँ भी दिखाई दीं। उतखनन से प्राप्त पुरावस्तुओं से जाहिर होता है कि जब इस नगर का विनाश हुआ होगा तब यहाँ सभ्यता अपनी चरम सीमा पर होगी।

मुद्राएं एवं मुद्रांक (मुहर)
सीप का दिकसूचक यंत्र भी यहाँ से उत्खनन में प्राप्त हुआ है। मानव के लिए भ्रमण के दौरान दिशा जानना भी आवश्यक था। अगर सूरज दिखाई नहीं दे रहा है दिशाओं का भान नहीं होता। ऐसी दशा में दिशाओं को जानने के लिए चुम्बक की आवश्यकता होती है। चुम्बक ही उत्तर-दक्षिण दिशाएं बताता है। इसके लिए हम लोहे की सुई का प्रयोग कर सकते हैं। पीपल जैसे वृक्ष का हल्का पत्ता, थाली या कटोरे जैसे बर्तन एवं एक लोहे की सुई। हम सुई को ऊनी कपड़े या सिर के बालों से रगड़ कर आवेशित करने के पश्चात पत्ते पर रख कर पानी में डाल दें तो वह हमें उत्तर दक्षिण दिशा बताता है। प्राचीन काल में दिशा जानने के लिए इसी तरह के यंत्रों का उपयोग किया जाता था और आवश्यकता पड़ने पर आज भी किया जा सकता है। इन सब पुरावस्तुओं के प्राप्त होने से ज्ञात होता है कि हमारी सभ्यता पृथ्वी की अन्य सभ्यताओं से पीछे नहीं थी। वरन आगे ही चल रही थी।

उत्खनन स्थल का माडल
लोथल के उत्खनन स्थल पर जानकारी प्राप्त करने के लिए किसी जानकार आदमी की जरुरत थी। मैने प्रवीण मिश्रा जी को फ़ोन लगाया तो वे दिल्ली में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के 150 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित कार्यक्रम में थे। कुछ देर बाद उन्होने फ़ोन लगा कर जानकारी दी। लेकिन जिनके बारे में जानकारी दी वे वहाँ उपस्थित नही थे। हमारे आग्रह करने पर मकवाना ने कहा कि विकुल नाम का एक लड़का वहां पर काम कर रहा है मैं उसे फ़ोन लगा देता हूँ। विनोद भाई चाय पीने की इच्छा जाहिर कर रहे थे पर संग्रहालय में चाय का कोई इंतजाम नहीं था। न ही आस पास कोई चाय की दूकान। पूछने पर बताया कि चाय की दूकान यहाँ से 4 किलोमीटर दूरी पर मिलेगी। हमने चाय पीने के ईरादे को त्याग देना ही उचित समझा, पर्यटक एवं पुरातत्व प्रेमियों को सलाह है कि यहाँ चाय नाश्ता इत्यादि साथ लाएं। संग्रहालय में लोथल से संबंधित जानकारी देने वाली कुछ किताबें उपलब्ध हैं जो क्रय की जा सकती है। विनोद भाई ने दो-तीन किताबें ली और उत्खनित स्थल की ओर चल पड़े।   ----  आगे पढें