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मेरा डांडी काण्ठियों का मुलुक जैल्यू, बसन्त रितु मा जैयि… हैरा बण मा बुरांस का फ़ूल, पिंग्ला आग लगाणा होला…… दूर कहीं गीत बज रहा था, इसमें गीतकार कह रहा है कि मेरे पहाड़ों के देश में जाना तो बसंत ॠतु में जाना, जब हरे भरे वनों में बुरांस के फ़ूल खिले होंगे, सारी जगह फ़्योलि के पीले फ़ूलों से रंगी होगी… तब बसंत ॠतु में मेरे पहाड़ पर जरुर जाना। सच में बसंत ॠतु में पहाड़ों का सौंदर्य अद्भुत होता है। जितना कठिन यहाँ निर्वहन है, उतना सौंदर्य यहाँ बिखरा पड़ा है, तभी तो देवता भी यहाँ रमण करते हैं।
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| सामने शिखर पर बरसुड़ी गाँव और फ़ोटो लेते हुए बीनू कुकरैती |
मैं ले चल रहा हूँ आपको
बीनू के गाँव बरसुड़ी। छोटी पहाड़ी के शिखर पर बसा यह छोटा सा खूबसूरत गाँव, जिसमें हैं साठ सत्तर घर। वैसे यह गाँव कुकरैतियों (ब्राह्मणों) ने बसाया था, आधे से अधिक जनसंख्या इन्हीं की है, फ़िर रावत और दो चार घर हरिजनों के हैं। सभी एक साथ बसते हैं, कोई अलग टोला नहीं है।
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| गाँव का नया सदस्य नवजातक बछड़ा |
सामाजिक समरता यहाँ दिखाई देती है। श्री भीमदत्त कुकरैती यहाँ के पूर्व सरपंच कहते हैं कि अब तो गाँव में अधिकांश घर खाली पड़े है, सब शहरी हो गए, जो शहर नहीं जा सके वो और रिटायर फ़ौजी ही गांव में बचे हैं। रोजी रोटी के लिए पलायन का अभिशाप भी यह गांव झेल रहा है।
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| पूर्व सरपंच भीमदत्त कुकरैती एवं उनका सुंदर घर |
गाँव छोड़कर कहीं और जाना मजबूरी ही है, वरना गांव कौन छोड़ता है, यहाँ रह कर आदमी सिर्फ़ जीवनयापन कर सकता है और तरक्की कुछ भी नहीं। गांव में एक स्कूल है शहीद कलानिधि राजकीय विद्यालय। जिसमें दसवीं तक की सहशिक्षा है।
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| बुलबुल जोड़ा गीत सुनाता |
इसमें बरसुड़ी, नैणी, सिलड़ी, भलगाँव, एवं भिलड़गाँव के बच्चे अध्ययन करते हैं इसके बाद बारहरवीं की शिक्षा के लिए छ; सात किमी दूर द्वारीखाल एवं उच्च शिक्षा के लिए बाईस किमी दूर जहरीखाल जाना पड़ता है। वैसे गांव में शिक्षित लोगों की खासी संख्या है, जिससे अधिकतर शिक्षण के पेशे में है, प्रिंसिपाल, प्रोफ़ेसर, अध्यापक एवं फ़ौजियों की भरमार है। गाँव के लोगों की आमदनी मुख्य साधन पेंशन ही है।
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| बीनू के घर के बरामदे से प्रकृति सौंदर्य |
भेड़, बकरी, गाय, भैंस आदि पशुधन एवं थोड़ी सी क्यारियों में खेती करके लोग अपनी दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं जुटा लेते हैं, हल्दी, मिर्च, धनिया, चावल, गेहूं, ज्वार, मंडवा, मक्का आदि भोजन के मुख्य तत्व पैदा कर लेते हैं। अन्य कोई सामान लाने के लिए द्वारीखाल पर निर्भर रहना पड़ता है।
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| परिवार के निर्वहन की जिम्मेदारी आज भी औरतों के कंधो पर |
बीनू की ताई कहती है कि पहाड़ी पर बाघ (तेंदुए) अधिक है, जो बकरियों को उठा ले जाते हैं, इससे शुद्ध नुकसान हो जाता है। उनकी कई बकरी तेंदुए उठा ले गए। अगर कोई बीमार हो जाए या चोट फ़ेट लग जाए तो चिकित्सा के लिए द्वारीखाल में नीमहकीम है और प्राथमिक चिकित्सा कोटद्वार में ही मिल पाती है, गंभीर रोगों की चिकित्सा के लिए देहरादून या दिल्ली जाना पड़ता है।
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| स्लेट पत्थर की छत, बर्फ़ से बचने का कारगर उपाय |
पहाड़ी पर कुकरैतियों की कुल देवी झाली माली का मंदिर हैं, जहाँ विशेष पर्व पर दुनिया के सारे कुकरैती इकट्ठे होते हैं और देवी की मानता करते हैं। इसके साथ ही नागराजा एवं भैरों का स्थान भी है। लंगुरगढ़ स्थित भैरवगढ़ी मुख्य मंदिर है जो द्वारीखाल ब्लॉक एवं पौड़ी जिले के अंतर्गत है।
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| गाँव का मंदिर देवालय |
गाँव में 70 वर्षों से लगातार रामलीला का आयोजन किया जाता रहा है, परन्तु अत्यधिक पलायन के कारण दस वर्षों तक आयोजन नहीं हो सका। गाँव के युवाओं ने इसे फ़िर प्रारंभ किया, जिससे गाँव से बाहर दूरस्थ शहरों में रहने वाले कम से कम इन दिनों में गाँव से जुड़ सके। उनकी आने वाली पीढी गाँव से परिचित हो सके एवं उसका संबंध बना रहे।
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| खड़ी चढ़ाई |
जहाँ तक संस्कृति की बात है तो समय के साथ कुछ बदलाव तो अवश्य संभावी हैं। जैसे पहले त्यौहार मनते थे अब उस उत्साह से नहीं मनते, परन्तु परम्पराओं का निर्वहन तो करना पड़ता है। यहाँ बग्याल मुख्य त्यौहार है, उसके बाद इगास त्यौहार मनाया जाता है। पहाड़ों में विशेषकर गढ़वाल में दीवाली को बग्वाल कहा जाता था। अब भी पुराने लोगों के मुंह से आपको बग्वाल सुनने को मिल जाएगा।
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| गाँव की बसाहट |
इसके ग्यारह दिन बाद इगास आती है। गढ़वाल में दीपावली को ही बग्वाल बोलते हैं। इसके ग्याहरवें दिन बाद हरिबोधिनी (देवउठनी) एकादशी आती है जिसको इगास कहते हैं। अमावस्या के दिन लक्ष्मी जागृत होती है और इसलिए बग्वाल को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। हरिबोधनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु शयनावस्था से जागृत होते हैं और उस दिन विष्णु पूजा करने का प्रावधान है।
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| बीनू का पुश्तैनी घर |
इस बीच भैला खेला जाता है, सभी गाँव के सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं, महिलाएँ सामुहिक गीत गाती हैं एवं ढोल दमाऊ के साथ भैला खेला जाता है। भैला मशाल को कहा जाता है जिसे भीमल वृक्ष की लकड़ी को कुछ दिनों तक पानी में भिगाकर एवं चीड़ की छाल से बांस में बांधकर तैयार किया जाता है। इसे जलाकर गाँव का चक्कर लगाया जाता है और देवी देवताओं की आराधना कर इस त्यौहार को मनाया जाता है। पलायन के कारण अब इन त्यौहारों के मनाने वालों की संख्या कम होने के कारण ग्रामीण संस्कृति से इनका विलोप होते जा रहा है।
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| रात का चौकस पहरुआ |
बीनू के खूबसूरत गाँव में दो दिन रहने का अवसर मिला, इससे पहाड़ी संस्कृति, तीज त्यौहारों के साथ जीवन यापन की कठिनाईयों से भी परिचित हुआ। मंडवे की रोटी के साथ सरसों का साग भंगलु के बघार के साथ खाया। बिच्छू बूटी से भी परिचित हुआ। बिच्छू बूटी की भाजी बनाई जाती है। इसके पत्तों में कांटे होते हैं वैसे ही इसकी तासीर गर्म है।
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| बिच्छू बूटी |
इसकी भाजी गर्भवती महिलाओं के लिए उत्तम बताई जाती है, इसका औषधीय प्रयोग ग्रामीण अंचल में देखने मिलता है, पर हमारे पास इतना समय नहीं था कि बिच्छू बूटी की भाजी का स्वाद चख सकें। यहाँ पक्षियों की बहुत सारी प्रजातियाँ हैं, जो पक्षी प्रेमियोँ को सहज ही आकर्षित करती हैं। आप किसी भी स्थान पर बैठ जाएं बुलबुल का जोड़ा आपको गीत सुना ही देगा।
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| बीनू कुकरैती ट्रैकर्स का बादशाह और उतना ही फ़र्राखदिल |
इस गाँव को देखने के बाद ईश्वर के साथ मानव का भी विराट स्वरुप दिखाई देता है। जब इस स्थान पर किसी परिवार ने बसने की सोची होगी तब यहाँ सिर्फ़ प्राकृतिक जल का संसाधन देखा होगा और भीषण वन। जहाँ वह सुरक्षित एवं शांति के साथ बस सके। यह मनुष्य ही है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेता है।
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| तनिक हम भी विश्राम कर लें सुरतिया चबाय लें |
बीनू कहते हैं कि शताब्दियों पूर्व राजस्थान से उनके पूर्वजों ने आकर यह गाँव बसाया, कुकरैतियों के पूर्वजों ने इस गाँव को बसाया तब से लेकर आज तक शताब्दियों का लम्बा सफ़र तय हो गया। हम गाँव से ही शताब्दियों के जीवन संघर्षों की कहानी सुन रहे हैं। कभी आप भी कथा सुनिए इस गाँव में आकर…… जारी है, आगे पढें…