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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

जिन्दगी भर नहीं भूलेगी पहाड़ों की मस्ती : बरसुड़ी गढ़वाल

आरम्भ से पढ़ें 
बरसुड़ी से हम द्वारीखाल की ओर चल रहे थे, पहाड़ों में पैदल चलना सामान्य सी बात है, पर हमारे लिए यह असामान्य हो रहा था। सैकिल चलाए ही तीस बरस बीत गए और पैदल चलने का मौका कभी कभी आता है, वरना वाहनारुढ़ ही रहते हैं। मैं धर्मवीर जी एवं किशोर हम तीनों एक साथ चल रहे थे, दिन ढल रहा था। 

पहाड़ों की साँझ 
किशोर की भी हमारे जैसी कहानी थी। कुल मिलाकर हम धीरे धीरे सरकते हुए चल रहे थे। अंतिम की चढाई खड़ी थी, जहाँ गाड़ी खड़ी, आखिरकार पहुंच ही गए, ड्रायवर जला भुना दिखाई दे रहा था, जिस पर बीनू भाई ने पहले पहुंचकर कुछ जलार्पण किया था। 
धीरे धीरे मंजिल की ओर  
हम द्वारी खाल पहुंच गए, नीरज, अजय एवं दीप्ति हमसे पहले पहुंच चुके थे। हमको दिल्ली जाना था। गुमखाल या कोटद्वार तक जाने के लिए कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी। बीनू भाई टैक्सी के जुगाड़ में भटक रहे थे और इधर नीरज मेरा मन भटका रहा था, कह रहा था कि उनके साथ चलें हरिद्वार, कल आपको फ़्लाईट के टाईम तक दिल्ली पहुंचा देंगे।
प्रकृति का सौंदर्य 
मेरी मान्यता है कि जिस ग्रुप के साथ जाओ, उसी के साथ लौटो। पर बीनू भाई ने छूट दे दी। कहा कि मैं नीरज के साथ जा सकता हूँ। मेरा बैग भी कार में रखवा दिया और हम हरिद्वार की ओर चल पड़े और वे दिल्ली। रात साढे दस बजे हरिद्वा पहुंचे। यहाँ हमें पंकज शर्मा जी से मिलना था। उनका ठिकाना नीरज को पता था। हम ठिकाने पर पहुंचे, वहां पंकज जी के भ्रात अनंत शर्मा जी भी मिले। 
नीरज जाट एवं पंकज शर्मा 
ठंड के मौसम में बड़ी गर्मजोशी से भेंट हुई, होटल का कमरा खुलवा दिया गया। हमने सामान रखा और भोजन के लिए चल दिए। भोजन करने के पश्चात सोते हुए रात के एक बज गए। सुबह सात बजे हमें दिल्ली के लिए चलना था पर हम पौने आठ बजे चले।  अनंत शर्मा जी ने हर की पौड़ी का गंगा जल भेंट, मेरे लिए इससे बड़ी भेंट दुनिया में और कोई नहीं हो सकती। 
हरिद्वार में पंकज शर्मा एवं अनंत शर्मा बंधुओं के साथ 
हम सपाटे से दिल्ली की ओर चल पड़े, परन्तु ट्रैफ़िक में नाड़ी ठंडी हो गई। एक बजे हमने शाहदरा से मैट्रो पकड़ी, नीरज को ड्यूटी ज्वाईन करनी थी। दीप्ति कह रही थी खाना खाकर जाना, मुझे एक एक मिनट भारी हो रहा था, किसी तरह एयरपोर्ट पहुंच जाऊं वरना दिल्ली में ही रह जाऊंगा। आखिर दस मिनट में नीरज हाजरी लगाकर आ गया। 
चीलगाड़ी का सवार घर की ओर  
हम अजमेरीगेट, फ़िर नई दिल्ली गए मैट्रो से। नीरज मुझे नई दिल्ली मैट्रो में बैठाकर आया जो एयरोसिटी जाती। नई दिल्ली से एयरपोर्ट के स्पेशल मैट्रो चलती है। जो सत्रह मिनट में एयरोसिटी पहुंचा देती है। कार से हम दो घंटे में नहीं पहुंच सकते। आखिर मैं एयरपोर्ट पहुंच गया समय से। चेक इन करके आधे घंटे बाद हवाई जहाज में बैठकर अपने घर की उड़ चला बरसुड़ी की यादें लिए……

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

वीराने में सपनों सा घर और नयार नदी के साथ दिन रात : बरसुड़ी गढ़वाल

आरम्भ से पढ़ें
पहाड़ी ढलान पर थोड़ी सी जगह में बना हुआ घर, जहाँ पड़ोस ढूंढने के लिए भी दो किमी जाना पड़ता हो। चारों ओर प्रकृति की कृपा बरसती हो और तलहटी में नयार नदी बहती हो, ऐसी स्थान पर भीमदत्त कुकरैती जी का घर है। खड्ड में बहती नयार नदी एक स्थान पर जाकर गंगा में समाहित हो जाती है। 
सपनों के घर के नीचे बहती नयार नदी
घर के आस पास की क्यारियों में प्याज, मिर्च, सब्जियाँ, अदरक, फ़ल-फ़ूल एवं अनाज आदि जरुरत की सभी चीजें उगाई जाती हैं। बहुत कम सामान ही बाजार से खरीद कर लाना पड़ता है। गोबर खाद से उगी हुई फ़सल (जिसे आजकल आर्गेनिक कहा जाता है) का स्वाद ही अलग होता है और स्वास्थ्य के लिए लाभ प्रद भी होती है। 
अलाव जलाकर ठंड भगाते पथिक अजय सिंह, धर्मवीर जी, किशोर वैभव, नीरज जाट
सांझ हो रही थी, हल्की से हवा भी चलने लगी। पहाड़ों में इसे शीतलहर कहा जाता है। हल्की सी भी ठंडी हवा हाड़ कंपाने के लिए काफ़ी है। ठंड के  मौसम में दिन भी जल्दी ही छिप जाता है और संक्राति का काल भी था। ठंड से बचने के लिए छत पर ही अलाव जला लिया और यहीं सभी इकट्ठे होकर गपियाने लगे। तब तक चाची ने खाना भी बना दिया। गरम गरम रोटी दाल सब्जी के साथ सभी ने भोजन कर लिया और नौ बजे ही बिस्तर के हवाले हो गए। 
रात का भोजन एव प्रवचन
सुबह का सूर्योदय हुआ तो सामने खाल (दो पहाड़ों के बीच की खाई) में बहती नदी में कोहरा छाया हुआ था। धूप चमकीली थी, हम ऊषा सेवन के लिए छत पर ही बैठ गए। जंगल में घर होने के कारण यहाँ जंगली जानवरों की भी आमदरफ़्त होती रहती है। जिनमें तेंदुए एवं सांभर प्रमुख हैं। बंदरों की फ़ौज भी दिखाई देती है। इन्होंने दो कुत्ते पाल रखे हैं, जो जरा सी आहट पर ही किसी के होने की सूचना दे देते हैं और रात भर चौकीदारी करते हैं।
सुरक्षा में तैनात छोटा भैरव
पहाड़ की चढाई के कारण मेरे पैरों की हालत तो खस्ता थी और कहीं चलकर जाने का मन नहीं हो रहा था। नीरज, निशा, अजय, बीनु, धर्मवीर जी, वैभव आदि चाचा जी के निर्देशन में काकड़ (सांभर) देखने एवं उनकी फ़ोटो लेने चले गए। इस दौरान मैने गरम जल से स्नान कर नाश्ता भी कर लिया। ये सभी ग्यारह बजे तक लौट कर आए। तब तक रोटियां ठंडी हो चुकी थी। 
सुबह की धूप का आनंद लेते हुए
नीरज, निशा एवं अजय तीनों हरिद्वार जाना चाहते थे और हमें वापस दिल्ली लौटना था। समय कितनी जल्दी गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। नदी से धुंध गायब हो चुकी थी और वह अब दिखाई देने लगी थी। मैं पहाड़ चढना नहीं चाहता था, सोच रहा था यहीं से नीचे उतर कर कोई गाड़ी लेकर गुमखाल तक पहुंच जाऊं। चढने के बजाय पहाड़ से उतरना मुझे सुविधाजनक लग रहा था, भले ही  यह खड़ी उतराई थी, परन्तु जोर लगाना नहीं पड़ता। 
पंडित भीमदत्त जी नए आलु के साग की तैयारी करते हुए
खैर सभी ने भोजन करके चलने का निर्णय लिया। भीमदत्त जी ने क्यारी से ताजा आलू खोदे और उनकी सब्जी बनाई गई। भात खाने का मन था इसलिए चावल भी पकाए गए। भोजन करने के बाद चाचा जी (भीमदत्त जी) ने सबको परम्परागत तरीके से पुन: पधारने आमंत्रण के साथ विदा किया। 
दोपहर का भोजन एवं वापसी की तैयारी
अब हमको पुन उसी रास्ते से चलकर द्वारीखाल तक पहुंचना था। पहाड़ियों के लिए तो यह रोजमर्रा की जिन्दगी है, परन्तु हमारे जैसे मैदानी लोगों के कठिन काम है। आगे जाने के लिए चलना तो था ही, मन मार कर चल पड़े।
परम्परागत विदाई देते हुए पंडित भीमदत्त जी
चीड़ के जंगल के बीच टेढी मेढी पगडंडी हमें बरसुड़ी गाँव लेकर जा रही थी। पहाड़ी से नीचे उतरने के बाद गाँव पहुंचने के लिए खड़ी चढाई ने हालत खराब कर दी। आखिर गाँव में घर तक पहुंचे और बाकी सामान लिया। गाँव के प्रवेश द्वार तक चाचा जी छोड़ने आए।
रास्ते में आगे बढते हुए थोड़ा ठहराव
फ़ोटो खींचते, चिड़िया देखते हम आगे बढ गए। बीनू ने द्वारी खाल से गाड़ी बुला रखी थी। जो हमें आधे रस्ते से द्वारी खाल तक छोड़ती। गाड़ी को आए काफ़ी देर हो गई हो गई थी और ड्रायवर फ़ोन की घंटी पे घंटी बजाए जा रहा था…… जारी है, आगे पढें।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

बीनू का गाँव : बरसुड़ी (गढ़वाल)

आरम्भ से पढ़ें 
मेरा डांडी काण्ठियों का मुलुक जैल्यू, बसन्त रितु मा जैयि… हैरा बण मा बुरांस का फ़ूल, पिंग्ला आग लगाणा होला…… दूर कहीं गीत बज रहा था, इसमें गीतकार कह रहा है कि मेरे पहाड़ों के देश में जाना तो बसंत ॠतु में जाना, जब हरे भरे वनों में बुरांस के फ़ूल खिले होंगे, सारी जगह फ़्योलि के पीले फ़ूलों से रंगी होगी… तब बसंत ॠतु में मेरे पहाड़ पर जरुर जाना। सच में बसंत ॠतु में पहाड़ों का सौंदर्य अद्भुत होता है। जितना कठिन यहाँ निर्वहन है, उतना सौंदर्य यहाँ बिखरा पड़ा है, तभी तो देवता भी यहाँ रमण करते हैं।
सामने शिखर पर बरसुड़ी गाँव और फ़ोटो लेते हुए बीनू कुकरैती
मैं ले चल रहा हूँ आपको बीनू के गाँव बरसुड़ी। छोटी पहाड़ी के शिखर पर बसा यह छोटा सा खूबसूरत गाँव, जिसमें हैं साठ सत्तर घर। वैसे यह गाँव कुकरैतियों (ब्राह्मणों) ने बसाया था, आधे से अधिक जनसंख्या इन्हीं की है, फ़िर रावत और दो चार घर हरिजनों के हैं। सभी एक साथ बसते हैं, कोई अलग टोला नहीं है।
गाँव का नया सदस्य नवजातक बछड़ा
सामाजिक समरता यहाँ दिखाई देती है। श्री भीमदत्त कुकरैती यहाँ के पूर्व सरपंच कहते हैं कि अब तो गाँव में अधिकांश घर खाली पड़े है, सब शहरी हो गए, जो शहर नहीं जा सके वो और रिटायर फ़ौजी ही गांव में बचे हैं। रोजी रोटी के लिए पलायन का अभिशाप भी यह गांव झेल रहा है।
पूर्व सरपंच भीमदत्त कुकरैती एवं उनका सुंदर घर
गाँव छोड़कर कहीं और जाना मजबूरी ही है, वरना गांव कौन छोड़ता है, यहाँ रह कर आदमी सिर्फ़ जीवनयापन कर सकता है और तरक्की कुछ भी नहीं। गांव में एक स्कूल है शहीद कलानिधि राजकीय विद्यालय। जिसमें दसवीं तक की सहशिक्षा है।
बुलबुल जोड़ा गीत सुनाता
इसमें बरसुड़ी, नैणी, सिलड़ी, भलगाँव, एवं भिलड़गाँव के बच्चे अध्ययन करते हैं इसके बाद बारहरवीं की शिक्षा के लिए छ; सात किमी दूर द्वारीखाल एवं उच्च शिक्षा के लिए बाईस किमी दूर जहरीखाल जाना पड़ता है। वैसे गांव में शिक्षित लोगों की खासी संख्या है, जिससे अधिकतर शिक्षण के पेशे में है, प्रिंसिपाल, प्रोफ़ेसर, अध्यापक एवं फ़ौजियों की भरमार है। गाँव के लोगों की आमदनी मुख्य साधन पेंशन ही है।
बीनू के घर के बरामदे से प्रकृति सौंदर्य
भेड़, बकरी, गाय, भैंस आदि पशुधन एवं थोड़ी सी क्यारियों में खेती करके लोग अपनी दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं जुटा लेते हैं, हल्दी, मिर्च, धनिया, चावल, गेहूं, ज्वार, मंडवा, मक्का आदि भोजन के मुख्य तत्व पैदा कर लेते हैं। अन्य कोई सामान लाने के लिए द्वारीखाल पर निर्भर रहना पड़ता है।
परिवार के निर्वहन की जिम्मेदारी आज भी औरतों के कंधो पर
बीनू की ताई कहती है कि पहाड़ी पर बाघ (तेंदुए) अधिक है, जो बकरियों को उठा ले जाते हैं, इससे शुद्ध नुकसान हो जाता है। उनकी कई बकरी तेंदुए उठा ले गए। अगर कोई बीमार हो जाए या चोट फ़ेट लग जाए तो चिकित्सा के लिए द्वारीखाल में नीमहकीम है और प्राथमिक चिकित्सा कोटद्वार में ही मिल पाती है, गंभीर रोगों की चिकित्सा के लिए देहरादून या दिल्ली जाना पड़ता है।
स्लेट पत्थर की छत, बर्फ़ से बचने का कारगर उपाय
पहाड़ी पर कुकरैतियों की कुल देवी झाली माली का मंदिर हैं, जहाँ विशेष पर्व पर दुनिया के सारे कुकरैती इकट्ठे होते हैं और देवी की मानता करते हैं। इसके साथ ही नागराजा एवं भैरों का स्थान भी है। लंगुरगढ़ स्थित भैरवगढ़ी मुख्य मंदिर है जो द्वारीखाल ब्लॉक एवं पौड़ी जिले के अंतर्गत है।
गाँव का मंदिर देवालय
गाँव में 70 वर्षों से लगातार रामलीला का आयोजन किया जाता रहा है, परन्तु अत्यधिक पलायन के कारण दस वर्षों तक आयोजन नहीं हो सका। गाँव के युवाओं ने इसे फ़िर प्रारंभ किया, जिससे गाँव से बाहर दूरस्थ शहरों में रहने वाले कम से कम इन दिनों में गाँव से जुड़ सके। उनकी आने वाली पीढी गाँव से परिचित हो सके एवं उसका संबंध बना रहे।
खड़ी चढ़ाई 
जहाँ तक संस्कृति की बात है तो समय के साथ कुछ बदलाव तो अवश्य संभावी हैं। जैसे पहले त्यौहार मनते थे अब उस उत्साह से नहीं मनते, परन्तु परम्पराओं का निर्वहन तो करना पड़ता है। यहाँ बग्याल मुख्य त्यौहार है, उसके बाद इगास त्यौहार मनाया जाता है।  पहाड़ों में विशेषकर गढ़वाल में दीवाली को बग्वाल कहा जाता था। अब भी पुराने लोगों के मुंह से आपको बग्वाल सुनने को मिल जाएगा।
गाँव की बसाहट
इसके ग्यारह दिन बाद इगास आती है। गढ़वाल में दीपावली को ही बग्वाल बोलते हैं। इसके ग्याहरवें दिन बाद हरिबोधिनी (देवउठनी) एकादशी आती है जिसको इगास कहते हैं। अमावस्या के दिन लक्ष्मी जागृत होती है और इसलिए बग्वाल को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। हरिबोधनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु शयनावस्था से जागृत होते हैं और उस दिन विष्णु पूजा करने का प्रावधान है।
बीनू का पुश्तैनी घर
इस बीच भैला खेला जाता है, सभी गाँव के सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं, महिलाएँ सामुहिक गीत गाती हैं एवं ढोल दमाऊ के साथ भैला खेला जाता है। भैला मशाल को कहा जाता है जिसे भीमल वृक्ष की लकड़ी को कुछ दिनों तक पानी में भिगाकर एवं चीड़ की छाल से बांस में बांधकर तैयार किया जाता है। इसे जलाकर गाँव का चक्कर लगाया जाता है और देवी देवताओं की आराधना कर इस त्यौहार को मनाया जाता है। पलायन के कारण अब इन त्यौहारों के मनाने वालों की संख्या कम होने के कारण ग्रामीण संस्कृति से इनका विलोप होते जा रहा है।
रात का चौकस पहरुआ
बीनू के खूबसूरत गाँव में दो दिन रहने का अवसर मिला, इससे पहाड़ी संस्कृति, तीज त्यौहारों के साथ जीवन यापन की कठिनाईयों से भी परिचित हुआ। मंडवे की रोटी के साथ सरसों का साग भंगलु के बघार के साथ खाया। बिच्छू बूटी से भी परिचित हुआ। बिच्छू बूटी की भाजी बनाई जाती है। इसके पत्तों में कांटे होते हैं वैसे ही इसकी तासीर गर्म है।
बिच्छू बूटी
इसकी भाजी गर्भवती महिलाओं के लिए उत्तम बताई जाती है, इसका औषधीय प्रयोग ग्रामीण अंचल में देखने मिलता है, पर हमारे पास इतना समय नहीं था कि बिच्छू बूटी की भाजी का स्वाद चख सकें। यहाँ पक्षियों की बहुत सारी  प्रजातियाँ  हैं, जो पक्षी प्रेमियोँ  को सहज ही आकर्षित करती हैं। आप किसी भी स्थान पर बैठ जाएं बुलबुल का जोड़ा आपको गीत सुना ही देगा।
बीनू कुकरैती ट्रैकर्स का बादशाह और उतना ही फ़र्राखदिल
इस गाँव को देखने के बाद ईश्वर के साथ मानव का भी विराट स्वरुप दिखाई देता है। जब इस स्थान पर किसी परिवार ने बसने की सोची होगी तब यहाँ सिर्फ़ प्राकृतिक जल का संसाधन देखा होगा और भीषण वन। जहाँ वह सुरक्षित एवं शांति के साथ बस सके।  यह मनुष्य ही है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेता है।
तनिक हम भी विश्राम कर लें सुरतिया चबाय लें 
बीनू कहते हैं कि शताब्दियों पूर्व राजस्थान से उनके पूर्वजों ने आकर यह गाँव बसाया, कुकरैतियों के पूर्वजों ने इस गाँव को बसाया तब से लेकर आज तक शताब्दियों का लम्बा सफ़र तय हो गया। हम गाँव से ही शताब्दियों के जीवन संघर्षों की कहानी सुन रहे हैं। कभी आप भी कथा सुनिए इस गाँव में आकर…… जारी है, आगे पढें

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

एक पहाड़ी गाँव की यात्रा : उत्तराखंड

नुष्य एवं प्रकृति का गठजोड़ जन्मघूंटी से हो जाता है। जब वह धरती पर जन्म लेकर पहली सांस लेता है तो प्रकृति से जुड़ जाता है। पशु-पक्षी, वन-पर्वत, नदी-नाले एवं स्वच्छंद पवन जीवन का आधार बन जाती है। भले ही अब मनुष्य सर्व सुविधा युक्त शहरों में बस रहा है, परन्तु प्रकृति के सहवास के लिए तत्पर रहता है। इनमें से मैं भी एक हूँ, जो हमेशा प्रकृति का सामिप्य पाने पहाड़ों, नदियों, वनों की ओर दौड़ लगाता रहता हूँ।
यात्रा के लिए तैयार, ट्रेन के इंतजार में
इस वर्ष की पहली घुमक्कड़ी बोहनी का सुत्रधार बीनु कुकरेती बने। बीनु कुकरेती का गांव बरसुड़ी उत्तरांचल के गढवाल में हैं। पूर्व में यहाँ जाने का कार्यक्रम बना, परन्तु संयोग नहीं होने के कारण पहुंच नहीं पाया। इस बार पुस्तक मेले से बरसुड़ी जाने का कार्यक्रम बन ही गया। आई एस बी टी से हम रात की बस से कोटद्वार के लिए चले,उत्तर प्रदेश परिवहन की खटारा बस, जिसका गेयर लगाने में ही चालक को आधी ताकत लगानी पड़ती थी।  हमारे साथ वैभव एवं धर्मवीर माथुर जी भी थे। इस समय ठंड अधिक पड़ रही थी क्योंकि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान कर रहे थे। देवताओं की छ: महीने की रात्रि समाप्ति की ओर थी। इसलिए ठंड भी अधिक थी।
पहाड़ों की सुंदरता
ठंड को देखते हुए इस बार मेरे साथ पहनने के कपड़े कम एवं ओढने के अधिक थे। बीनु ने भी चेता दिया था कि ठंड से बचने का सामान साथ में होना चाहिए। 221 रुपए प्रति व्यक्ति किराए में दिल्ली से मेरठ, बिजनौर होकर हम चार बजे कोटद्वार पहुंचे। बस ने कोटद्वार तक का 210 किमी का सफ़र पाँच घंटे में तय किया। यहाँ से हमें द्वारीखाल की बस मिलनी थी। कोटद्वार में ठंड अपनी चरम सीमा पर थी। यहाँ बस अड्डे के सामने कुछ अच्छे होटल हैं, जिसमें मिठाईयों के साथ चाय भी मिल जाती है। 
ग्रे हेडेड पैराकीट (तोता)
द्वारीखाल के लिए मिनी बसे चलती हैं। यहां से द्वारी खाल के लिए पहली बस सुबह छ: बजे जाती है। हमने होटल में चाय पीते हुए कुछ समय व्यतीत किया। बीनु ने कहा कि गाँव में सब्जियां नहीं मिलती है, इसलिए कुछ सब्जियाँ हमने कोटद्वार से खरीद ली। कोटद्वार से बस छ: बजे चल पड़ी और मुझे नींद आ गई। गुमखाल पहुंचने पर नींद खुली। यहाँ एक रेस्टोरेंट के सामने यह बस रुकी थी। ठंड भगाने के लिए एक एक चाय पी और आगे बढे। कोटद्वार से द्वारी खाल की दूरी 42 किमी की है। हम यहाँ आठ बजे पहुंच चुके थे। 
बरसुड़ी गांव की ओर ट्रेकिंग किशोर वैभव एवं धर्मवीर जी संग
द्वारीखाल से बरसुड़ी की दूरी लगभग सात किमी है। यह कच्चा रास्ता है, जिस पर कुछ दूरी तक चरचकिया जा सकती है, फ़िर पैदल ही चलना पड़ता है। यहाँ टैक्सी से हम कुछ दूरी तक पहुंचे और फ़िर पैदल यात्रा प्रारंभ की। एक तो पहाड़ी गांव पहुंचने का जज्बा और दूसरा यहाँ की संस्कृति से परिचित होने का जोश कदमों को आगे बढाए जा रहा था। रास्ते में चीड़ के पेड़ों के गिरे हुए पत्तों पर फ़िसलने के खतरा बना हुआ था। आखिर टहलते टहलते बीनु के गाँव पहुंच गए।
बरसुड़ी गाँव का स्वागत द्वार
गांव में प्रवेश द्वार बना हुआ है, प्रविश नगर कीजै सब काजा, हृदय राखि कोसलपुर राजा।  प्रवेश द्वार पर निर्माणकर्ता ग्राम प्रधान भीमदत्त कुकरेती का शिलालेख लगा है। पतली सी पगडंडी आगंतुकों को गांव की ओर ले जाती है। पहाड़ी गाँव की बसाहट ढलान के हिसाब से ऊपर नीचे होती है। घरों की निर्माण सामग्री में लकड़ी एवं पत्थरों का उपयोग होता है। छतें नीची होती हैं, अर्थात मकानों की ऊंचाई अधिक नहीं होती, छ: या सात फ़ुट तक की ऊंचाई की छत से गुजारा चल जाता है।  
धूप सेकते हुए बरसुड़ी गांव में 
घर पहुंच कर बीनु ने दरवाजा खोला और हम बाहर छत पर धूप सेवन करने बैठ गए। ताई ने गर्मागर्म चाय पिलाई और बीनु के चाचा भीमदत्त जी माल्टे काटने लगे। पहाड़ में यहाँ माल्टों का सीजन है। छत्तीसगढ़ में हम इन्हें लेटर्रा कहते हैं। खट्टा मीठा स्वाद होने से एकाध ही खाए जा सकते हैं। बहुत अधिक नहीं। ताई हरा नमक बनाकर ले आई (नमक में धनिया, लहसुन और मिर्च पीस दी जाती है) जिसे हमने माल्टे पर लगा कर खाया तो आनंद आ गया। पहाड़ों चिड़ियों की कुछ अलग प्रजातियाँ दिखाई देती हैं। घर के आसपास बहुत सारी चिड़ियां दिखाई दी। बीनु और वैभव चिड़ियों की फ़ोटो ले रहे थे और हम कुछ को पहचानने में लगे हुए थे।
नीरज जाट पहुंच कर माल्टे छील रिया है।
चाचा ने पुलाव बना लिया था। भाई धर्मवीर जी घर से आधा किलो देशी घी लाए थे। पुलाव में घी डालकर खाया। खाना खाने के बाद नींद आने लगी। मैं घर के भीतर भारी रजाई ओढकर सो गया। ठंड में रजाई में सोने का मजा ही कुछ और है। भले ही हमारी तरफ़ ब्लेंकेट ने रजाईयों को रिप्लेस कर दिया परन्तु मजा तो रजाई में ही है। ठंड के दिनों में अगर सु लग जाए तो बहुत तकलीफ़ होती है, समझ लो मरण तुल्य कष्ट होता है रजाई से बाहर निकल कर मूत कर आना। टंकी फ़ुल होते ही मेरी नींद खुल गई। नीरज जाट, निशा एवं अजय सिंह भी दिल्ली से कार से आ रहे थे। हमारे झपकी लेते तक नीरज लोग भी पहुंच गए और इनका भी स्वागर माल्टे से किया गया। 
सुंदर नजारे के बीच भीमदत्त कुकरेती के घर
इसके बाद हम चाचा के घर की ओर चल पड़े, जो गांव से दो ढाई किमी की दूरी पर था। चढाई उतराई से मुझे बड़ी तकलीफ़ होती है। मैदानी इलाके में तो भले ही बीस किमी चलना पड़ जाए परन्तु पहाड़ी इलाके गोडे तोड़ देता है, पिंडलियों में दर्द भर जाता है क्योंकि हमें पहाड़ में चलने की आदत ही नहीं है। गांव वालों को तो रोज की आदत है इसलिए उन्हें तकलीफ़ नहीं होती। परन्तु मैदान के आदमी पहाड़ में आकर मारे जाते हैं। तीखा ढलान एवं खड़ी चढाई ही दम फ़ुलाने के लिए काफ़ी होती है। आखिर धीरे धीरे चलकर हम चाचा जी के घर पहुंच गए। दोनों पैर चलकर सीधे हो चुके थे।  आगे पढें…

नोट यह यात्रा 9 जनवरी से 12 के बीच सम्पन्न हुई।