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गुरुवार, 15 मई 2014

कुंआ: मानव सभ्यता की पहचान

ल ही जीवन है, क्षितिज, जल, अग्नि, गगन एवं हवा आदि पंच तत्वों में अनिवार्य तत्व जल भी है। बिना जल के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मानव ने सभ्यता के विकास के क्रम में जल की अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति हेतु नदियों एवं प्राकृतिक झीलों के किनारे अपना बसेरा किया। वह नदियों एवं झीलों के जल से निस्तारी करता था। जब मानव समूह विशाल रुप लेने लगे तो गाँव एवं नगर बसने  लगे। निवासियों के लिए जल उपलब्ध कराने की दृष्टि से कुंए, तालाब इत्यादि निर्मित किए जाने लगे। आवागमन के मार्गों पर जल की व्यवस्था कुंए एवं प्याऊ के रुप में की जाने लगी। इस तरह भू-गर्भ जल की उपस्थिति को मनुष्य ने जान लिया और मानवकृत जल के संसाधन विकसित होने लगे।
हड़प्पाकालीन नगर लोथल (गुजरात) के कुंए का निरीक्षण करते हुए विनोद गुप्ता जी के साथ
पेयजल की उपलब्धता के लिए प्राचीन काल से मानव ने कुंए, बावड़ियों एवं तालाबों का निर्माण किया। पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन के दौरान प्राचीन नगर बसाहटों में कुंए मिलते हैं। हड़प्पा काल में नगर के मध्य एवं व्यापारिक केन्द्रों में पक्के कुंए होते थे। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, लोथल इत्यादि स्थानों पर उत्खनन के दौरान पक्के कुंए प्राप्त हुए हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ अंचल के सिरपुर में पक्के प्राचीन कुंए उत्खनन में प्राप्त हुए हैं, जिनमें अभी भी मीठा जल उपलब्ध है। इसके साथ ही प्राचीन व्यापार मार्गों पर भी कुंओं के अवशेष मिलते हैं। 

तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में रावण की वाटिका वर्णन करते हुए लिखा है - बन बाग उपवन वाटिका, सर कूप वापी सोहाई। जल के बिना जीवन नहीं है, अत: रावण की लंका में भी कूप, वापी सरोवरों की बहुतायता पाई गई। स्नान के लिए सरोवर, पेयजल की प्राप्ति के लिए कूप एवं सिंचाई तथा पशुओं की निस्तारी के लिए बावड़ियों का निर्माण कराया गया था। राज्य द्वारा प्रजा की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जल की उत्तम व्यवस्था की जाती थी। 

संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि बाण अपनी कृति कादंबरी (सातवीं शताब्दी) में पोखर-सरोवर खुदवाने को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे. लोक-कल्याण हेतु इस प्रकार के खुदवाए गए जलकोष को चार वर्गों में विभाजित किया गया है- 1.कूप जिसका व्यास 7 फीट से 75 फीट हो सकता है और जिससे पानी डोल-डोरी से निकाला जाए, 2. वापी, छोटा चौकोर पोखर, लंबाई 75 से 150 फीट हो और जिसमें जलस्तर तक पाँव के सहारे पहुँचा जा सके, 3.पुष्करणी, छोटा पोखर, गोलाकार, जिसका व्यास 150 से 300 फीट तक हो, 4.तड़ाग पोखर, चौकोर, जिसकी लंबाई 300 से 450 फीट तक हो.।

जल की व्यवस्था हमारे समाज के लिए कभी मजबूरी रही होगी परन्तु कालांतर में इसने परम्परा का रुप ले लिया। पोखर की चर्चा ऋग्वेद में भी है. गृह्मसूत्र के अनुसार, किसी भी वर्ग या जाति का कोई भी व्यक्ति, पुरूष या स्त्री पोखर खुदवा सकता है और यज्ञ करवाकर समाज के सभी प्राणियों के कल्याण-हेतु उसका उत्सर्ग कर सकता है. आज भी यह काम पुण्य कमाने का समझा जाता है। कुंआ पोखर आदि निर्माण करने को प्रोत्साहित करने के लिए शास्त्रों द्वारा महिमा मंडन किया गया, कहते है - जो धनी पुरुष उत्तम फल के साधन भूत ‘तडाग’ का निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है, उन दोनों का पुण्य समान होता है। जो पोखरा खुदवाते हैं, वे भगवान् विष्णु के साथ पूजित होते हैं।

महाभारत में भीष्म पर्व के माध्यम से वेदव्यास ने कोई तालाब कितने समय के लिए पानी संचित रख सकता है उसके अनुरूप उनका विभाजन किया है। उन्होंने इस तरह के तालाबों के निर्माण से मिलने वाले पुण्य की भी व्याख्या की है। हिन्दू संस्कृति में इस तरह के जल-स्रोतों का निर्माण एक धार्मिक कृत्य माना जाता रहा है और इसे अपनी कीर्ति रक्षा का सबसे सहज उपाय भी बताया गया है। कूप या कुएं इस श्रृंखला की सब से छोटी इकाई हुआ करते थे जो कि न केवल पेय जल के स्रोत थे वरन उनके आकार के अनुसार उनसे सिंचाई की भी संभावनाएं बनती थीं। 
सिरपुर के बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ
कवि केशवदास ने कविप्रिया में नगर वर्णन करते हुए लिखा है -  खाई कोट अट ध्वजा, वापी कूप तड़ाग, वार नारी असती सती, वरनहु नगर सभाग। पदमावत में जिक्र है कि वारी सुफ़ल आहि, तुम बालापन में ही फ़ल गई, मध्यकाल में वाटिका लगाने के बाद उसका विवाह किया जाता था। तब तक लगाने वाला उसका फ़ल न खाता था। वाटिका लगाने एवं फ़लने के बाद वापी कूप तड़ाग का विवाह करने के बाद ही स्वामी उनका उपभोग करता था। व्यंग्य करते हुए कहा है कि - तुम्हारी वाटिका तो कुंवारी ही फ़ल गई।

कुंओं का निर्माण करना साधारण कार्य नहीं था। भू-गर्भ से जल निकालने के लिए भू-तल तक उत्खनन करना पड़ता था। कुंओं का निर्माण करने के लिए शिल्पशास्त्रों ने विधान बताया है। शिल्पशास्त्र मयमतम के रचयिता कहते हैं - ग्राम आदि में यदि कूप नैऋत्य कोण में हो तो व्याधि एवं पीड़ा, वरुण दिधा में पशु की वृद्धि, वायव्य कोण में शत्रु-नाश, उत्तर दिशा में सभी सुखों को प्रदान करने वाला तथा ईशान कोण में शत्रु का नाश करने वाला होता है । ऐसा कहा गया है ॥१-२॥ वराह मिहिर ने कहा है -  यदि ग्राम के या पुर के आग्नेय कोण में कूप हो तो वह सदा भय प्रदान करता है तथा मनुष्य का नाश करता है । नैऋत्य कोण में कूप होने पर धन की हानि तथा वायव्य कोण में होने पर स्त्री की हाने होती है । इन तीनों दिशाओं को छोड़कर शेष दिशाओं में कूप शुभ होता है ॥४-५॥

स्थान चयन के लिए परम्परागत साधनों से भू जल की उपस्थिति जांचने के बाद समस्त देवताओं का आहवान एवं पूजन करके कूप का निर्माण निश्चित किया जाता था। सही मुहूर्त में कूप का निर्माण प्रारंभ किया जाता था। भूमि के आधार पर कुंओं को खोदने के पृथक पृथक निर्माण विधि प्रयोग में लाई जाती थी। जहाँ मिट्टी मजबूत होती थी वहाँ वांछित गहराई तक कुंआ खोदने के पश्चात उसे ईंटों या पत्थरों से पक्का बांधा जाता था। जहाँ रेत पाई जाती है वहाँ जमीन पर ही कुंओं की चिनाई करके बाद उसके नीचे की रेत धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक निकाली जाती है। इसे स्थानीय भाषा में "कोठी गलाना" कहते हैं। यह विधि खतरनाक भी  है क्योंकि यहाँ कुंओं में जल सामान्य से अधिक उत्खनन के पश्चात निकलता है। कभी कभी ईटों के भसकने के कारण मजदूरो के दब जाने से जान लेवा दुर्घटनाएँ हो जाती हैं।

शास्त्रकार कूप निर्माणकार के प्रोत्साहन की दृष्टि से नारद पुराण कहता है- एकाहं तु स्थितं पृथिव्यां राजसन्तम। कुलानि तारयेत् तस्य सप्त-सप्त पराण्यपि।।65।। अर्थात्-जिसकी खुदवाई हुई पृथ्वी में केवल एक दिन भी जल स्थित रहता है, वह जल उसके सात कुलों को तार देता है। दीपालोक प्रदानेन वपुष्मान् स भवेन्नरः। प्रेक्षणीय प्रदानेन स्मृतिं मेधां च विंदति।।66।। अर्थात्- ‘दीप दान’ करने से मनुष्य का शरीर उत्तम हो जाता है और जल के दान के कारण उसकी स्मृति और मेधा बढ़ जाती है। -बृहस्पति स्मृति।  

शास्त्रों में नृपों के लिए स्पष्ट निर्देश देकर जल प्रदुषित एवं जल साधन नष्ट करने वाले के लिए दंड का विधान किया गया है। लिखित स्मृति कहती है- पूर्णे कूप वापीनां वृक्षच्छेदन पातने। विक्रीणीत गजं चाश्वं गोवधं तस्य निर्द्दिशेत्।। अर्थात्- जो मनुष्य कुआँ या बावड़ी को पाट देता है, वृक्षों को काट कर गिरा देता है तथा हाथी या घोड़े को बेचता है, उसे ‘गौ के हत्यारे’ के समान मानकर दण्डित करना चाहिए। ‘तडाग देवतागार भेदकान् घातयेन्नृपः।।‘ ‘अग्नि पुराण’ में राजाओं के लिए स्पष्ट निर्देश है कि यदि कोई व्यक्ति जलाशय या देवमंदिर को नष्ट करता है तो राजा उसे ‘मृत्युदण्ड’ से दण्डित करे। स्कंद पुराण के माहेश्वर खण्ड में कहा गया है कि जो व्यक्ति पोखरा को बेच देते हैं, जो जल में मैथुन करते हैं तथा जो तालाब और कुओं को नष्ट करते हैं, वे ‘उपपातकी’ हैं। ऐसे व्यक्ति जब दुबारा जन्म लेते हैं तो वे अपने ‘हाथों’ से वंचित होते हैं।
सिरपुर के प्राचीन बाजार क्षेत्र के मध्य कुंआ
जल सर्वकाल में मानव एवं चराचर जगत के लिए जीवन का स्रोत है, इसके महत्व को प्राचीन काल के मानवों ने समझा तथा जल की समुचित व्यवस्था की ओर ध्यान देते हुए जल के संसाधनों के रुप में कूप, तालाबों का निर्माण करवाया। हरियाणा, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के हरितक्षेत्र में कुंआ पूजन का विधान है। पुत्र जन्म होने पर स्त्रियाँ सद्य: प्रसुता से कुंए की समारोह पूर्वक पूजा करवाती हैं। यह जल संसाधन के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता प्रकट करने का सामाजिक नियम निर्मित किया गया है। इस तरह कुंए प्राचीन काल से मानव सभ्यता एवं प्राणी जगत की जलापूर्ति का साधन बने हुए हैं। बढती हुई जनसंख्या के समक्ष जलापूर्ति एक विकराल समस्या के रुप में सामने आ रही है। भू-जल का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। पर्जन्य से जितना जल पृथ्वी पर आता है उसे बचाकर भू-गर्भ के जल की वृद्धि करने का प्रयत्न करना चाहिए।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मृत्यु का उत्सव -- पंछी उड़ जाना ---- ललित शर्मा,


कफ़न बढा तो किसलिए नजर तू डबडबा गई, सिंगार क्यों सहम गया बहार क्यूँ लजा गई.
न जन्म न मृत्यु बस इतनी सी बात है, किसी की आँख खुल गई किसी को नींद आ गई


मृत्यु पर किसी का बस नहीं चलता, होश संभालने के बाद यही सुना पढ़ा और समझा है. दुनिया इसे ही शास्वत सत्य बताती है. एक दिन इसका आना तय है. किस दिन आएगी यह तय नहीं है. लेकिन आएगी जरुर ये मानते है. मृत्यु ही एक ऐसी शै है जिसका भय ही मनुष्य और पशु को अलग करता है, ग़ालिब ने कहा है - मौत ने कर दिया लाचार वगर्ना इंसा, है वो खुदबी के खुदा का भी कायल न होता. मनुष्य और पशु के जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया एक जैसी है. मनु स्मृति कहती है- जन्मने जायेते शुद्र: संस्कारात द्विज उच्यते.... संस्कार मिलने के पश्चात ही मनुष्य कहलाया है. जिसे मृत्यु का बोध हो गया. मृत्यु क्यों और कैसे होती है? विभिन्न धर्म दर्शनों में स्वमतानुसार उल्लेख है. पर मृत्यु आती है यह सभी मानते हैं. देह का अवसान होता है. कहते हैं जरा के पश्चात मृत्यु आती है और कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी घट जाती है. इसलिए राजकुमार सिद्धार्थ को जरा एवं मृत्यु के दर्शन नहीं कराए. एक दिन उन्होंने ने जरा एवं मृतक दोनों को देख लिया और बुद्ध हो गए. वैराग आ गया. सिद्धार्थ का वैराग स्थायी था. पर श्मशानी का वैराग अस्थायी होता है.. 

कभी कभी ऐसे वाकये घटते हैं कि कठिन प्रश्नों के जवाब सरलता से मिल जाते हैं. मित्र  के पिताजी गुजर गए थे और मुझे सुबह समाचार मिला. अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने पंहुचा. वे अपने कार्य से सेवानिवृत हो चुके थे. कैंसर से उनकी मृत्यु हुयी. सारे नाते रिश्तेदार जार-जार रो रहे थे. कोई दहाड़ें मार कर छाती कूट रहा था. हम उन्हें सभालने में लगे थे. मित्रों का काम यही होता है, जो सुना सुनाया, रटा रटाया था, वही उनको कह कर दिलासा दे रहे थे. पंडित जी के आने के बाद कार्यवाही प्रारंभ हुयी. अर्थी उठा कर श्मशान में पहुचे. सभी गंभीर मुद्रा में मृतक के परिजनों से सहानुभूति रख रहे थे. तभी राम नाम सत्य की जोरदार आवाजें आने लगी. देखा तो एक और अर्थी पहुच रही है. वे कह रहे थे-- "राम नाम सत्य है, खाया पीया मस्त है." मैंने इस तरह का उद्घोष पहली बार सुना था जीवन में. न जाने कितनो की अंतिम यात्रा में शामिल हुआ. लेकिन इस तरह नाद नहीं सुना था. पता चला कि किसी जवान की ही अर्थी थी. आश्चर्य चकित रह गया. एक तरफ लोग वृद्ध की अर्थी पर अभी तक रोये जा रहे हैं. दूसरी तरफ जवान की मृत्यु पर उत्सव जैसा माहौल है.

देखने से लग रहा था कि छोटे तबके के लोग हैं. सभी खा पीकर दारू की बोतले साथ में लेकर साथी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. मै बैठे बैठे सोचने लगा कि इन्होने ही मृत्यु के रहस्य को पाया है. जीवन अगर उत्सव है तो मृत्यु भी उत्सव होना चाहिए. जिसकी जितनी साँस थी इस दुनिया में उसने अपनी सांसे पूरी कर ली. फिर किस चीज का शोक मनाना? उसकी जीवन यात्रा का उत्सव मनाना चाहिए. जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना. सभी का अपना अपना दृष्टिकोण है. कोई डूबते सूरज को देख कर रोता है और कोई हँसता है. रोने वाला सोचता है कि जिंदगी का एक दिन कम हो गया. हंसने वाला सोचता है कि जिन्दगी का एक दिन और अच्छे से जी लिया, ईश्वर तुम्हे धन्यवाद है, तुम्हारा आभार है. यही मृत्यु के शोक पर प्रगट होता है. कुछ लोग सोचते हैं कि कुछ दिन जीवन का उपभोग और कर लेते. जल्दी चले गए दुनिया से. कुछ लोग सोचते हैं कि सांसारिक जीवन का उपभोग अच्छे से कर लिया. अब चला भी जाये तो कोई अफ़सोस नहीं है. साथियों को उत्सव मनाना चाहिए. 

"नवानि देहानि जीर्णानि विहाय" जब भगवान ने गीता में उपदेश दिया है कि "नैनम छिदंति शास्त्राणि नैनम दहति पावक: न क्लैदयन्ति राप: न शोषयति मारुत:" आत्मा अजर अमर अविनाशी है. उसे शरीर बदल कर फिर आना है. जब फिर आना है तो शोक किस चीज का मनाते हैं. नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. रो कर विदा करने की बजाये  हंस कर विदा करने. हम नए कपडे धारण करते हैं तो उत्साह और उत्सव होता है. जीर्ण देह को छोड़ कर नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. यह भी वैसी ही प्रक्रिया है जैसे हम अपने ब्लॉग का टेम्पलेट बदलते हैं. हमारा शरीर भी ब्लॉग जैसा ही है. जिसमे बहुत सारे गजट और विगेट लगे हैं. जब कोई विगेट काम करना बंद कर देता है तो उसे हम हटा देते हैं, नया लगा लेते हैं या उस विगेट के बिना ही काम चला लेते हैं. अगर टेम्पलेट में कोई समस्या आती है तो हम तुरंत टेम्पलेट बदल लेते हैं. पुराने टेम्पलेट का कोई शोक नहीं करते. नया टेम्पलेट लगा कर मित्रों को दिखाते हैं उसकी सुन्दरता के विषय में पूछते हैं. 

जीवन और मृत्यु के साथ भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए. जितने दिन जीये, रज्ज के जीये. मस्ती से जीये, मित्रों से, परिवार से मिलजुल के जीयें. ईश्वर की बनायीं सुन्दर सृष्टि के कण-कण का आनन्द लें. फूलों की महक से लेकर चिड़ियों की चहक तक. झरनों की कल-कल से लेकर मस्त पवन के झकोरों तक, बछड़े की उछल कूद से लेकर बाल गोपालों की लीला तक प्रकृति का सौंदर्य बिखरा पड़ा है. इतना अद्भुत सौदर्य है कि आंखों में भी नहीं समाता. अपलक देखते रहते हैं उस अद्भुत कारीगर की कारीगरी को, चित्रकारी को. बड़े-बड़े राजपाट धराशायी हो गए. अपने को चक्रवर्ती राजा साबित करने वाले नहीं रहे. जो अच्छा था उसे अभी सहस्त्राब्दियों बाद भी याद किया जाता है, जो बुरा था उसे भुला दिया जाता है, वैसे भी हमारी संस्कृति में मरने के सारे अवगुण माफ़ कर दिये जाते हैं. अगर कोई कीड़े पड़ के भी मरता है तो उसके नाम के साथ स्वर्गवासी ही लिखा जाता है. भले ही उसके सारे कार्य नरकगामी हों. जाने के बाद भी यादें मधुर हों. कटुता न हो, उत्सव हो. धन, पद, प्रतिष्ठा सब धरी रह जाती है. कौन कितना मिलनसार और जिंदादिल था यही सभी को याद रहता है. यदि कभी किसी को याद कर दिल में हूक उठे. तो समझो उसका जीवन सार्थक रहा और मृत्यु भी उत्सव.... 

कुछ विचारों की तरंगे उठी और उन्हें लिखता गया. इस पोस्ट को लिखने का कोई विशेष प्रयोजन नहीं है. खालिस खाली खोपड़ी की मगजमारी है. दिल पे मत लो यारों, वैसे भी मैं बड़ा सेंटी हूँ, बस मौजा ही मौजां  जीवन के दिन चार पंछी उड़ जाना, कर ले जतन हजार पंछी उड़ जाना. अरे भाई उड़ने के लिए उड़नतश्तरी भी चाहिए...........       
(फोटो-गूगल से साभार )