कफ़न बढा तो किसलिए नजर तू डबडबा गई, सिंगार क्यों सहम गया बहार क्यूँ लजा गई.न जन्म न मृत्यु बस इतनी सी बात है, किसी की आँख खुल गई किसी को नींद आ गई
मृत्यु पर किसी का बस नहीं चलता, होश संभालने के बाद यही सुना पढ़ा और समझा है. दुनिया इसे ही शास्वत सत्य बताती है. एक दिन इसका आना तय है. किस दिन आएगी यह तय नहीं है. लेकिन आएगी जरुर ये मानते है. मृत्यु ही एक ऐसी शै है जिसका भय ही मनुष्य और पशु को अलग करता है, ग़ालिब ने कहा है - मौत ने कर दिया लाचार वगर्ना इंसा, है वो खुदबी के खुदा का भी कायल न होता. मनुष्य और पशु के जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया एक जैसी है. मनु स्मृति कहती है- जन्मने जायेते शुद्र: संस्कारात द्विज उच्यते.... संस्कार मिलने के पश्चात ही मनुष्य कहलाया है. जिसे मृत्यु का बोध हो गया. मृत्यु क्यों और कैसे होती है? विभिन्न धर्म दर्शनों में स्वमतानुसार उल्लेख है. पर मृत्यु आती है यह सभी मानते हैं. देह का अवसान होता है. कहते हैं जरा के पश्चात मृत्यु आती है और कभी-कभी आकस्मिक रूप से भी घट जाती है. इसलिए राजकुमार सिद्धार्थ को जरा एवं मृत्यु के दर्शन नहीं कराए. एक दिन उन्होंने ने जरा एवं मृतक दोनों को देख लिया और बुद्ध हो गए. वैराग आ गया. सिद्धार्थ का वैराग स्थायी था. पर श्मशानी का वैराग अस्थायी होता है..
कभी कभी ऐसे वाकये घटते हैं कि कठिन प्रश्नों के जवाब सरलता से मिल जाते हैं. मित्र के पिताजी गुजर गए थे और मुझे सुबह समाचार मिला. अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने पंहुचा. वे अपने कार्य से सेवानिवृत हो चुके थे. कैंसर से उनकी मृत्यु हुयी. सारे नाते रिश्तेदार जार-जार रो रहे थे. कोई दहाड़ें मार कर छाती कूट रहा था. हम उन्हें सभालने में लगे थे. मित्रों का काम यही होता है, जो सुना सुनाया, रटा रटाया था, वही उनको कह कर दिलासा दे रहे थे. पंडित जी के आने के बाद कार्यवाही प्रारंभ हुयी. अर्थी उठा कर श्मशान में पहुचे. सभी गंभीर मुद्रा में मृतक के परिजनों से सहानुभूति रख रहे थे. तभी राम नाम सत्य की जोरदार आवाजें आने लगी. देखा तो एक और अर्थी पहुच रही है. वे कह रहे थे-- "राम नाम सत्य है, खाया पीया मस्त है." मैंने इस तरह का उद्घोष पहली बार सुना था जीवन में. न जाने कितनो की अंतिम यात्रा में शामिल हुआ. लेकिन इस तरह नाद नहीं सुना था. पता चला कि किसी जवान की ही अर्थी थी. आश्चर्य चकित रह गया. एक तरफ लोग वृद्ध की अर्थी पर अभी तक रोये जा रहे हैं. दूसरी तरफ जवान की मृत्यु पर उत्सव जैसा माहौल है.
देखने से लग रहा था कि छोटे तबके के लोग हैं. सभी खा पीकर दारू की बोतले साथ में लेकर साथी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. मै बैठे बैठे सोचने लगा कि इन्होने ही मृत्यु के रहस्य को पाया है. जीवन अगर उत्सव है तो मृत्यु भी उत्सव होना चाहिए. जिसकी जितनी साँस थी इस दुनिया में उसने अपनी सांसे पूरी कर ली. फिर किस चीज का शोक मनाना? उसकी जीवन यात्रा का उत्सव मनाना चाहिए. जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना. सभी का अपना अपना दृष्टिकोण है. कोई डूबते सूरज को देख कर रोता है और कोई हँसता है. रोने वाला सोचता है कि जिंदगी का एक दिन कम हो गया. हंसने वाला सोचता है कि जिन्दगी का एक दिन और अच्छे से जी लिया, ईश्वर तुम्हे धन्यवाद है, तुम्हारा आभार है. यही मृत्यु के शोक पर प्रगट होता है. कुछ लोग सोचते हैं कि कुछ दिन जीवन का उपभोग और कर लेते. जल्दी चले गए दुनिया से. कुछ लोग सोचते हैं कि सांसारिक जीवन का उपभोग अच्छे से कर लिया. अब चला भी जाये तो कोई अफ़सोस नहीं है. साथियों को उत्सव मनाना चाहिए.
"नवानि देहानि जीर्णानि विहाय" जब भगवान ने गीता में उपदेश दिया है कि "नैनम छिदंति शास्त्राणि नैनम दहति पावक: न क्लैदयन्ति राप: न शोषयति मारुत:" आत्मा अजर अमर अविनाशी है. उसे शरीर बदल कर फिर आना है. जब फिर आना है तो शोक किस चीज का मनाते हैं. नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. रो कर विदा करने की बजाये हंस कर विदा करने. हम नए कपडे धारण करते हैं तो उत्साह और उत्सव होता है. जीर्ण देह को छोड़ कर नवीन देह को प्राप्त करने का उत्सव होना चाहिए. यह भी वैसी ही प्रक्रिया है जैसे हम अपने ब्लॉग का टेम्पलेट बदलते हैं. हमारा शरीर भी ब्लॉग जैसा ही है. जिसमे बहुत सारे गजट और विगेट लगे हैं. जब कोई विगेट काम करना बंद कर देता है तो उसे हम हटा देते हैं, नया लगा लेते हैं या उस विगेट के बिना ही काम चला लेते हैं. अगर टेम्पलेट में कोई समस्या आती है तो हम तुरंत टेम्पलेट बदल लेते हैं. पुराने टेम्पलेट का कोई शोक नहीं करते. नया टेम्पलेट लगा कर मित्रों को दिखाते हैं उसकी सुन्दरता के विषय में पूछते हैं.
जीवन और मृत्यु के साथ भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए. जितने दिन जीये, रज्ज के जीये. मस्ती से जीये, मित्रों से, परिवार से मिलजुल के जीयें. ईश्वर की बनायीं सुन्दर सृष्टि के कण-कण का आनन्द लें. फूलों की महक से लेकर चिड़ियों की चहक तक. झरनों की कल-कल से लेकर मस्त पवन के झकोरों तक, बछड़े की उछल कूद से लेकर बाल गोपालों की लीला तक प्रकृति का सौंदर्य बिखरा पड़ा है. इतना अद्भुत सौदर्य है कि आंखों में भी नहीं समाता. अपलक देखते रहते हैं उस अद्भुत कारीगर की कारीगरी को, चित्रकारी को. बड़े-बड़े राजपाट धराशायी हो गए. अपने को चक्रवर्ती राजा साबित करने वाले नहीं रहे. जो अच्छा था उसे अभी सहस्त्राब्दियों बाद भी याद किया जाता है, जो बुरा था उसे भुला दिया जाता है, वैसे भी हमारी संस्कृति में मरने के सारे अवगुण माफ़ कर दिये जाते हैं. अगर कोई कीड़े पड़ के भी मरता है तो उसके नाम के साथ स्वर्गवासी ही लिखा जाता है. भले ही उसके सारे कार्य नरकगामी हों. जाने के बाद भी यादें मधुर हों. कटुता न हो, उत्सव हो. धन, पद, प्रतिष्ठा सब धरी रह जाती है. कौन कितना मिलनसार और जिंदादिल था यही सभी को याद रहता है. यदि कभी किसी को याद कर दिल में हूक उठे. तो समझो उसका जीवन सार्थक रहा और मृत्यु भी उत्सव....
कुछ विचारों की तरंगे उठी और उन्हें लिखता गया. इस पोस्ट को लिखने का कोई विशेष प्रयोजन नहीं है. खालिस खाली खोपड़ी की मगजमारी है. दिल पे मत लो यारों, वैसे भी मैं बड़ा सेंटी हूँ, बस मौजा ही मौजां जीवन के दिन चार पंछी उड़ जाना, कर ले जतन हजार पंछी उड़ जाना. अरे भाई उड़ने के लिए उड़नतश्तरी भी चाहिए...........
(फोटो-गूगल से साभार )




