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बुधवार, 28 मई 2014

सोलह शृंगार: कल और आज

किसी भी सुंदर वस्तु या व्यक्ति के सौंदर्य में अभिवृद्धि के लिए श्रृंगार या अलंकरण का पक्ष महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए विभिन्न अलंकरणों के प्रयोग करने को शृंगार करना कहते हैं। शृंगार करने के पश्चात साधारण वस्तु या मनुष्य के सौंदर्य में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है और वह मनमोहक, नयनाभिराम लगता है। उत्खनन से पता चलता है कि प्रतिमाओं का निर्माण हड़प्पा काल से हो रहा है, परन्तु उस समय मृण्मूर्तियाँ बनती थी। यही मृण्मूर्तियाँ मौर्यकाल में भी मिलती हैं तथा अलंकरण भी। परन्तु गुप्तकाल से प्रस्तर प्रतिमाओं का सफ़र प्रारंभ होता है तथा आगे चलकर कलचुरी कालीन मंदिरों की प्रतिमाओं में अलंकरणों की भरमार मिलती है। शिल्पियों ने देवी देवताओं से लेकर यक्ष गंधर्व अप्सराओं की प्रतिमाओं को सुंदर आभूषणों से सजा कर उसके सौंदर्य में वृद्धि करने का विशेष प्रयास किया है। इससे कलचुरीकालीन प्रतिमाएं अपने अलंकरणों से पृथक ही पहचानी जाती हैं। 
यक्षणी  - सिरपुर
स्त्री सौंदर्य वृद्धि के लिए सोलह शृंगार (षोडश शृंगार) का विधान बताया गया है। इन्हीं अलंकरणों से विधानपूर्वक शिल्पी प्रतिमाओं को अलंकृत करते थे। शास्त्र के विधान के अनुरुप प्रतिमाओं का निर्माण करने का मार्गदर्शन शिल्पशास्त्र करते  हैं। वैसे प्राचीन संस्कृत साहित्य में षोडश शृंगार की गणना अज्ञात प्रतीत होती है। षोड़श शृंगार की गणना वल्लभ देव कृत सुभाषितावली में प्रथम बार आती है। वल्ल्भदेवानुसार 12 वीं सदी में सोलह शृंगार इस प्रकार हैं - आद्यौ मज्जनचीरहारतिलकं नेत्राञ्जनं कुंडले, नासामौक्तिककेशपाशरचना सत्कंचुकं नूपुरौ। सौगन्ध्य करकङ्कणं चरणयो रागो रणन्मेखला, ताम्बूलं करदर्पण चतुरता श्रृंगारका षोड़श॥ अर्थात मज्जन, चीर, हार, तिलक, अंजन, कुंडल, नासामुक्ता, केशविन्यास, चोली (कंचुक), नूपुर, अंगराग (सुगंध), कंकण, चरणराग (महावर), करधनी तांबुल तथा करदर्पण (आरसी नामक अंगुठी) का वर्णन है।
मुख दर्शना (तेवर) जबलपुर
कालानुसार सोलह शृंगार के लिए भिन्न वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था। सोलहवीं सदी में  श्री रुप गोस्वामी ने उज्वलनीलमणी में सोलह शृंगार को इस प्रकार व्यक्त किया है - स्नातानासाग्रजान्मणिरसितपटा सूत्रिणी बद्धवेणि: सोत्त सा चर्चिताङ्गी कुसुमितचिकुरा स्त्रग्विणी पद्महस्ता। ताम्बूलास्योरुबिन्दुस्तबकितचिबुका कज्जलाक्षी सुचित्रा। राधालक्चोज्वलांघि: स्फ़ूरति तिलकिनी षोडशाकल्पिनीयम॥ अर्थात, स्नान, नासा मुक्ता, असित पट (कृष्ण-काला दुपट्टा), कटि सूत्र (करधनी) वेणीविन्यास, कर्णावतंस, अंगों को चर्चित करना, पुष्पमाल, हाथ में कमल, केश में फ़ूल खोंसना, तांबुल, शरीर पर पत्रावली, मकरीभंग आदि का चित्रण, अलक्तक, तिलक इत्यादि षोडश शृंगार माना गया।
परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार
इस दोनो सूचियों में भिन्नता स्पष्ट है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि जायसी ने षोडश शृंगार का वर्णन इस प्रकार किया है - मज्जन, स्नान, (जायसी ने मज्जन, स्नान को अलग रखा है) वस्त्र, पत्रावली, सिंदूर, तिलक, कुंडल, अंजन, अधरों को रंगना, तांबुल, कुसुमगंध, कपोलों पर तिल, हार, कंचुकी, छुद्रघंटिका और पायल। इससे स्पष्ट हो रहा है कि 17 वीं शताब्दी तक अधररंग (लिपिस्टिक) का प्रयोग नहीं किया जाता था। 18 वीं शताब्दी में लिपिस्टिक एवं गालों पर कृत्रिम तिल बनाना षोडश शृंगार में सम्मिलित हो गया।
परिचारिका द्वार शाखा पातालेश्वर मंदिर मल्हार
इसी प्रकार  रीतिकाव्य के आचार्य केशवदास ने सोलह शृंगार की गणना करते हुए कहा है - प्रथम सकल सुचि, मंजन अमल बास, जावक, सुदेस किस पास कौ सम्हारिबो। अंगराग, भूषन, विविध मुखबास-राग, कज्जल, ललित लोल लोचन निहारिबो॥ बोलन हँसन, मृदुचलन, चितौनि चारु, पल पल पतिब्रत प्रन प्रतिपालिबो। 'केसोदास' सो बिलास करहु कुँवरि राधे, इहि बिधि सोरहै, सिंगारन सिंगारिबो। अर्थात उबटन, स्नान, अमल पट्ट (श्वेत, उज्जवल वस्त्र - दुपट्टा), जाबक (आलता), वेणीगूँथना, माँग सिंदूर, ललाट शौर (ललाट की शोभा बढाने वाला- तिलक), कपोलों पर तिल, अंग में केसर लेपन, मेंहदी, पुष्पाभूषण, स्वर्णाभूषण, मुखवास, दंत मंजन, तांबुल और काजल स्पष्ट है। इस काल में षोडश शृंगार मे कुछ वस्तुएं जुड़ गई और कुछ कम हो गई। इससे पता चल रहा है कि केसर तक नागरिकों की पहुंच हो गई थी और वे इसका महत्व जान चुके थे।
करधन घारिणी परिचारिका सिरपुर
हिंदी विश्वकोश में इन शृंगारों की गणना इस तरह है -उबटन, स्नान, वस्त्रधारण, केश प्रसाधन, काजल, सिंदूर से माँग भरना, महावर, तिलक, चिबुक (ठोढी) पर तिल, मेंहदी, सुगंध लगाना, आभूषण, पुष्पमाल, मिस्सी लगाना, तांबूल, अधरों को रंगना। 19 वीं सदी में षोडश शृंगार में बिंदी, सिंदूर, काजल, मेंहदी, वस्त्र, मांग टीका, नथ, कर्णफ़ूल, हार, बाजूबंद, कंगन या चूड़ी, अंगुठी, करधन, बिछिया, पायल, महावर शामिल थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के षोडश शृंगार में स्थानीय प्रभाव होने के कारण थोड़ा बदलाव आया है। लंदन में निवासी शिखा वार्ष्णेय कहती है -, शैम्पू, हेयर डाई, बाली, छल्ले (hoops), मालाएँ, टैटू, क्रीम, काजल, लिपिस्टिक, पर्फ़्यूम, ब्लशर, बेल्ट, ब्रेसलेट, घड़ी, मोबाईल, जींस टॉप, पायल (एक पैर में) बिछिया (एक पैर की एक अंगुली में) शृंगार के तौर पर उपयोग में लाए जा रहे हैं।
सौंदर्य पेटिका धारी वनवासिनी  दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा बस्तर
वर्तमान में देखें तो भारत में भी षोडश शृंगार में सम्मिलित कुछ वस्तुओं में परिवर्तन हुआ है। विदेशों की अपेक्षा अत्यधिक परिवर्तन तो यहाँ दिखाई नहीं देता। झरिया निवासी शालिनी खन्ना बताती है - कामकाजी महिलाओं में समय की कमी एवं कार्य स्थल के आवा-गमन को लेकर बदलाव आया है। वर्तमान में विवाहित महिलाएँ शैंपू, परफ़्यूम, बिंदी, लिपिस्टिक, काजल, यारुज, सिंदूर, चूड़ी, मंगलसूत्र, पायल, बिछिया, बाली, मोबाईल, घड़ी, वस्त्र (सलवार कुरती, जींस टॉप) गॉगल का प्रयोग करती हैं। काल परिवर्तन कितना भी हो जाए पर सौंदर्य के प्रति जागरुकता हमेशा बनी रहेगी। इससे पता चलता है कि षोडश शृंगार की कोई निश्चित परिभाषा या सूची नहीं है, देश काल के अनुसार उसमें बदलाव होता रहता है। वर्तमान जब कोई शिल्पकार या चित्रकार अपनी छेनी या कूंची उठाएगा तो अधिक नहीं सिर्फ़ कुछ बदलाव ही दिखाई देगें। जो भविष्य में निर्माण के समय और काल को सूचित करेगें।

शनिवार, 4 मई 2013

त्रिपुरी के कलचुरि

त्रिपुर सुंदरी तेवर
प्रारंभ से पढें
आज का दिन भी पूरा ही था हमारे पास। रात 9 बजे रायपुर के लिए मेरी ट्रेन थी। मोहर्रम के दौरान हुए हुड़दंग के कारण कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया था। आज कहीं जाने का मन नहीं था। गिरीश दादा को फ़ोन लगाए तो पता चला कि वे डूबलिया कार्यक्रम में डूबे हुए हैं। ना नुकर करते 11 बज गए। आखिर त्रिपुर सुंदरी दर्शन के लिए हम निकल पड़े। शर्मा जी नेविगेटर और हम ड्रायवर। दोनो ही एक जैसे थे, रास्ता पूछते पाछते भेड़ाघाट रोड़ पकड़ लिए। त्रिपुर सुंदरी मंदिर से पहले तेवर गाँव आता है। यही गाँव विजय तिवारी जी का जन्म स्थान एवं पुरखौती है। हमने त्रिपुर सुंदरी देवी के दर्शन किए और कुछ चित्र भी लिए। मंदिर के पुजारी दुबे जी ने बढिया स्वागत किया। 

तेवर का तालाब
ससम्मान देवी दर्शन के पश्चात हम तेवर गाँव पहुंचे। राजा हमे सड़क पर खड़ा तैयार मिला। तेवर गाँव में प्रवेश करते ही विशाल तालाब दिखाई देता है। कहते हैं कि यह तालाब 85 एकड़ में है। अभी इसमें सिंघाड़े की खेती हो रही हैं। तेवर पुरा सामग्री से भरपूर गांव है। जहाँ देखो वहीं मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। कोई माई बाप नहीं है। खंडित प्रतिमाए तो सैकड़ों की संख्या में होगी। इससे मुझे लगा कि यह गाँव कोई प्राचीन नगर रहा होगा। तालाब के किनारे पर शिवालय दिखाई दे रहा था और एक चबुतरे पर शिवलिंक के साथ कुछ भग्न मूर्तियाँ भी रखी हुई थी। ग्राम के मध्य में एक स्थान पर खुले में उमा महेश्वर की प्रतिमा रखी हुई है, यहाँ कुछ लोग पूजा कर रहे थे। ढोल बाजे गाजे के साथ कुछ उत्सव जैसा ही दिखाई दिया।

तेवर की बावड़ी
इससे आगे चलने पर एक विशाल बावड़ी दिखाई देती हैं। इसके किनारे पर एक मंदिर बना हुआ है, इस मंदिर में एक शानदार पट्ट रखा हुआ है जिसमें बहुत सारी मूर्तियाँ बनी हुई हैं। इस मंदिर के ईर्द गिर्द सैकड़ों मूर्तियाँ लावारिस पड़ी हुई हैं जिनका कोई माई बाप नहीं है। इसके बाद राजा हमें एक घर में मूर्तियाँ दिखाने ले जाता है, वहां पर सिंह व्याल की लगभग 5 फ़िट ऊंची प्रतिमा है, जिसे रंग रोगन लगा दिया गया है और उसके साथ ही दर्पण में प्रतिबिंब देखते हुए श्रृंगाररत अप्सरा की सुंदर प्रतिमा भी दिखाई थी। पास ही चौराहे पर उमामहेश्वर की एक बड़ी भग्न प्रतिमा रखी हुई है। राजा यहाँ से हमें झरना दिखाने ले चलता है। 

झरने में गड्ढे
4-5 किलो मीटर कच्चे रास्ते पर जाने के बाद एक स्थान पर झरना दिखाई देता है। इस स्थान के आस-पास बड़े टीले हैं और टीलों के बीच के मैदान में गाँव के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। उम्मीद है कि इन टीलों में भी कोई न कोई मंदिर या भवन के अवशेष अवश्य ही दबे पड़े होगें। झरने का जल निर्मल है, हमने यहीं पर बैठ कर भोजन किया और झरने के निर्मल जल पीया। झरने की तलहटी में लगभग 1 फ़ीट त्रिज्या के कई गड्ढे बने हुए हैं और यहीं पर शिवलिंग भी विराजमान है। साथ ही एक दाढी वाले बाबा की मूर्ति भी रखी हुई है जिसे विश्वकर्मा जी बताया जा रहा है। अवश्य ही यह किसी राजपुरुष की प्रतिमा होगी। विजय तिवारी जी ने बताया था कि त्रिपुर सुंदरी मंदिर के रास्ते में खाई में महल के अवशेष भी दिखाई देते हैं। 

विशाल मंदिर का मंडप
हम महल के अवशेष देखने के लिए खाई पर पहुंचे, वहाँ सब्जी बोने वालों ने अतिक्रमण कर रखा है। कहते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान यहाँ से बहुत सारी पुरासामग्री निकली है और मिट्टी के कटाव में बहुत सारे मृदा भांड के अवशेष हमें भी दिखाई दिए। झाड़ झंखाड़ के बीच हम खाई में उतरे और मंडप तक पहुंचे। यह किसी विशाल मंदिर का मंडप है। गर्भगृह के स्थान पर एक गड्ढा बना हुआ है, खजाने के खोजियों ने यहाँ पर भी अपना कमाल दिखा रखा है। इस गड्ढे को लोग सुरंग कहते हैं। बताया जाता है यहाँ से रास्ता महल तक जाता था। खाई में सैकड़ों की संख्या में बिल दिखाई दे रहे थे ऐसी अवस्था में अधिक देर हमने ठहरना मुनासिब न समझा। क्योंकि यह स्थान सांपों के लिए मुफ़ीद स्थान है। 

अप्सरा
अब तेवर के ऐतिहासिक महत्व की चर्चा करते हैं, पश्चिम दिशा में भेड़ाघाट रोड पर स्थित वर्तमान तेवर ही कल्चुरियों की राजधानी त्रिपुरी है जो कि शिशुपाल चेदि राज्य का वैभवशाली नगर था। इसी त्रिपुरी के त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने के कारण ही भगवान शिव का नाम ‘त्रिपुरारि‘ पड़ा। यहाँ स्थित देवालयों एवं भग्नावशेषों से ही ज्ञात होता है कि कभी यह नगर वैभवशाली रहा होगा। तेवर की प्राचीनता हमें ईसा की पहली शताब्दी तक ले जाती है। तेवर जिसे हम त्रिपुरी कहते हैं यह चेदी एवं त्रिपुरी कलचुरियों की राजधानी रहा है।  गांगेय पुत्र कल्चुरी नरेश कर्णदेव एक प्रतापी शासक हुए,जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे।

भग्नावशेषों का निरीक्षण करते हुए
जबलपुर के पास ही गढ़ा ग्राम पुरातन "गढ़ा मण्डलराज्य' के अवशेषों से पूर्ण है। गढ़ा-मण्डला गौड़ों का राज्य था गौड़ राजा कलचुरियों के बाद हुए हैं। जबलपुर के पास की कलचुरि वास्तुकला का विस्तृत वर्णन अलेक्ज़ेन्डर कनिंहाम ने अपनी रिपोर्ट (जिल्द ७) में किया है। प्रसिद्ध अन्वेषक राखालदास बैनर्जी ने बी इस विषय पर एक अत्यन्त गवेष्णापूर्ण ग्रंथ लिखा है। भेड़घाट और नंदचंद आदि गाँवो में भी अनेक कलापूर्ण स्मारक हैं। भेड़ाघाट में प्रसिद्द "चौंसठ योगिनी' का मंदिर। इसका आकार गोल है। इसमे ८१ मूर्तियों के रखने के लिए खंड बने हैं। यह १०वीं शताब्दी में बना है। मन्दिर के भीतर बीच में अल्हण मन्दिर है। इन सभी स्थानों में मन्दिरों और मूर्तियों में जिस प्रकार की कला पाई जाती है। 

हमारा त्रिपुरी दर्शन पूर्णता की ओर था। राजा को गाँव में छोड़ कर हम जबलपुर वापस आ गए, मुख्यमार्ग में कर्फ़्यू लगे होने के कारण कई घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए हम सिविल लाईन पहुंचे। यहाँ से स्टेशन थोड़ी ही दूर है, 9 बजे हमारी ट्रेन का टाईम था और अमरकंटक एक्सप्रेस हमारी रायपुर वापसी थी। नियत समय पर ट्रेन पहुंच गई और जबलपुर की यादें समेटे हुए चल पड़ा अपने गंतव्य की ओर नर्मदे हर नर्मदे हर का जयघोष करते हुए। इति जाबालिपुरम् यात्रा