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बुधवार, 15 सितंबर 2010

पानी बेचने वाले पापी

पहले जब हम कभी सफ़र में जाते थे तो हमेशा याद रखते थे कि पानी की सुराही ली है कि नहीं। बाकी सामान बाद में देखा जाता था। क्योंकि पानी सफ़र के लिए अत्यावश्यक था।

1989 की  बात है मैं भोपाल जा रहा था। घर से गाड़ी स्टेशन छोड़ गयी। जब प्लेट फ़ार्म पर पहुंचा तो पानी की याद आई। पानी की सुराही तो गाड़ी में वापस चली गयी थी। अब सोचने लगा क्या किया जाए? कोई पानी रखने का साधन मिले तो रख लिया जाए, लेकिन ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर आ चुकी थी।

तभी मेरी निगाह एक ठेले पर पड़ी, उसमें अन्य सामानों के साथ पानी की भरी बोतलें भी रखी थी। मैने पानी की बोतल के दाम पूछे तो उसने 18 रुपए बताए। भोपाल की टिकिट कुल 70 रुपए थी। मैने मजबुरन बोतल खरीद ली और उसका पानी चख कर देखा तो कसैला लगा। मैने बोतल का पानी खाली करके उसमें स्टेशन का प्याऊ का पानी भरा और गाड़ी में बैठ लिया। कहने का मतलब मैने बोतल के लिए 18 रुपए दिए और पानी मुफ़्त का भरा।

ये पहली शुरुवात थी भारत में पाप कमाने के धंधे की। हमारे पूर्वज कहते थे कि प्यासे को पानी और भूखे को भोजन कराना बड़े पुण्य का काम है। जो पानी का पैसा लेता है वो भिष्ठा खाता है। धनी-मानी लोग कुंए-बावड़ी खुदवाते थे।

गर्मी के दिनों में प्याऊ खोलते थे ताकि प्यासे को पानी मिले। प्यास से तड़फ़ कर किसी जान न निकले,साथ ही हमें पुण्य मिले जिससे हमारा अगला जनम सुधरे। आज भी हमें कुछ जगह प्याऊ मिल जाती है धार्मिक स्थलों पर। लेकिन स्टेशन और बस अड्डों पर प्याऊ का नामो निशान मिट हो गया है।

यात्रियों के रैन बसेरे के साथ प्याऊ भी गायब हो गयी हैं। क्योंकि पानी अब पैसे में मिलने लगा है। यदि कोई प्याऊ खोल देता है तो पानी का धंधा करने वाले पापी वहां  की मटकियाँ फ़ोड़ आते हैं जिससे उनका धंधा चलता रहे।

बाजारवादियों ने पानी का भी बाजारीकरण कर दिया। 14 रुपया लीटर पानी बेच रहे हैं, 20 वर्षों पहले हमने सोचा भी नहीं था कि हमारे देश में पानी भी बिकने लगेगा। लेकिन देखिए अब बिक रहा है।

गरीब से गरीब मजदूर को भी मैने पानी खरीद कर पीते देखा है। मिनरल वाटर के नाम खुले आम लूट चल रही है। जिस पानी को प्रकृति ने हमें मुफ़्त में दिया है उसे हम आज खरीद रहे हैं,ये कैसा दुर्भाग्य है और शान से मिनरल वाटर कहकर पी रहे हैं। जबकि बोतल पर कहीं पर भी मिनरल वाटर नहीं लिखा रहता।

बोतल पर लिखा रहता है पैकेज्ड ड्रिंकिग वाटर। यह है आंख के अंधों का काम। नल के पानी को बोतल और पाऊच में भर कर बेचा जा रहा है। घर-घर 20-20 लीटर की बोतलें पहुंचाई जा रही है। पानी के धंधे ने एक बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है। आज अरबों रुपए का खेल पानी के नाम पर हो रहा है।

हम आज भी घरों में दूसरे दिन बासी पानी का इस्तेमाल नहीं करते। 24 घंटे होते ही पीने का पानी बदल दिया जाता है क्योंकि बासी पानी से स्वास्थ्य को हानि होती है। व्यक्ति कब्जियत जैसी महाबीमारी का शिकार हो जाता है। वायु विकार बढ जाता है। 

एक कम्पनी की पानी की बोतल  पर कहीं नहीं लिखा है कि इस पानी का इस्तेमाल कितने दिनों तक करना है, कोई एक्सपायरी डेट इस पर नहीं लिखी है। कुछ कम्पनियाँ तो लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर रही हैं, गंगाजल के नाम से नल का पानी भर कर बोतल में बेच रही हैं।

बोतल पर लिखा है-- न्युट्रिशियन फ़ैक्टस--कैलोरी -0, टोटल फ़ैट-0% , टोटल कर्ब-0%, प्रोटीन-0%।  जिस पानी को मिनरल वाटर कह कर बेचा जाता है इसमें कहीं नही लिखा है कि कौन सा मिनरल कितने प्रतिशत है ।

इससे पता चलता है कि जिस पानी का इस्तेमाल हम अमृत समझकर कर रहे हैं वह मरा हुआ है। उसमें जीवन नाम की चीज कहीं नहीं है। बस बासी पानी पिए जा रहे हैं और अपनी सेहत खराब कर रहे हैं।

कम्पनियों ने अपना मार्केटिंग नेटवर्क इतना तगड़ा बना लिया है कि अब गाँव-गाँव तक इन्होने अपनी पहुंच बना ली है। गाँव-गाँव में अब पानी बेचा जा रहा है।

व्यक्ति की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पानी खरीदने पर खर्च हो रहा है। अभी तो यह बीमारी प्रारंभिक अवस्था में है लेकिन कुछ दिनों के बाद महामारी का रुप धारण कर लेगी। इसलिए जहां तक हो सके बोतल बंद पानी का बहिष्कार करें। अपने प्राकृतिक स्रोतों के पानी का उपयोग करें।

पानी के प्राकृतिक स्रोतों को दुषित होने से बचाएं। वाटर हार्वेस्टिंग के द्वारा बरसात के पानी को जमा कर जल स्तर को बढाएं। पानी का धंधा करने वाले पापियों को प्रोत्साहन न दें। अपनी आने वाली पीढी को विरासत में जल खरीद कर न पीना पड़े ऐसा कुछ काम करें।

अपना पानी का धंधा चलाने के लिए पानी के प्रदुषित होने का प्रचार कर अपना उल्लु सीधा कर रहे हैं, आम आदमी की जेब पर डाका डाल कर अपनी तिजोरी भर रहे हैं। पानी बेचने वाले पापियों को करारा जवाब दें।