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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

भूटानी मुद्रा और टॉकिन : भूटान यात्रा 4

प्रारम्भ से पढ़ें 
भूटान की मार्केट में भारतीय मुद्रा उसी तरह स्वीकार की जाती है जिस तरह भारत में। परन्तु वे भारतीय मुद्रा रुपए के बड़े नोट लेकर भूटानी (नोगंत्रोम) मुद्रा वापस करते हैं। भूटानी नोटों का काजग अच्छा है, नेपाली मुद्रा जैसे गंदे नोट नहीं है। नेपाल के नोट तो जेब में रखने की इच्छा ही नहीं होती। वैसे भी नेपाल में भारत के 500 एवं 1000 के बड़े नोट प्रतिबंधित हैं। परन्तु भूटान में ऐसा नहीं है। वैसे मुद्रा का यह खेल ध्यान देने योग्य है। भूटान में तो भूटानी मुद्रा चलती ही है। परन्तु भारत के सीमांत क्षेत्र में भूटानी मुद्रा का काफ़ी प्रचलन है। भूटानी नोट तो देखने मिले, लेकिन सिक्के कहीं दिखाई नहीं दिए। वैसे विदेशी मुद्रा के प्रति मेरा आकर्षण नहीं के बराबर है और नहीं मैं विदेशी मुद्रा अपने पास रखने की कोशिश करता हूँ।
भूटानी 100 रुपया
भूटानियों के नाम बहुत कठिन लगे, उच्चारण एवं याद रखने में। मुझे जो भी भूटानी मिले, उनमें किसी का भी नाम याद नहीं और न ही मैं याद रखने के लिए दिमाग पर जोर डाला। मुझे कौन सा यहाँ बसना है, जो इतनी माथापच्ची करुं। यहाँ दुकानों के दरवाजे बड़े नहीं होते। भारत में जैसे घर के दरवाजे 3 फ़ुट चौड़े होते हैं वैसे ही यहाँ दुकानों के द्वार भी होते हैं। एक दुकानदार से चर्चा हुई, वह अच्छी हिन्दी बोलता था। उसने मुझे रुपए एवं भूटानी मुद्रा के खेल के विषय में बताया कि भारत और भूटानी मुद्रा नोंगत्रम में कोई खास अंतर नहीं है और जो अंतर है वह आम आदमी की समझ में नहीं आता। भारत के सीमांत क्षेत्र में धड़ल्ले से भूटानी मुद्रा का चलन होता है।
स्ट्रीट मार्केट
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र के बेलपाड़ा, नांगड़ाकाटा, तेलीपाड़ा, बीनागुड़ी, दालगांव और इथेबाड़ी इत्यादि स्थानों में भूटानी मुद्रा का भारतीय मुद्रा की तरह ही चलन है। भूटान की सीमा फ़्यूशलिंग के इस पार जयगाँव में भूटानी मुद्रा के 500 और 1000 के नोटों का चलन नहीं है। अगर आप किसी दुकानदार देगें भी तो वह नहीं लेगा। लेकिन जयगाँव से 25-30 किलोमीटर दूर बसे गाँव एंव कस्बों हासीमआरा, अलीपुर द्वार, कालचीनी, कालपाड़ा, हाशिमआरा, नंगड़ाकाटा और बानरहाटा में भूटानी नोट आराम से चल जाते हैं। यहाँ के लोग इन नोटों से व्यापार व्यवहार कर लेते हैं। इन नोटों के चलन के पीछे बड़ा गिरोह भी हो सकता है जो काले धन को एक नम्बर का बनाने का काम करता है।
रेड वाईन "टॉकिन"
जबकि भारत में अन्य किसी देश की मुद्रा में व्यापार एवं व्यवहार करना कानूनन अपराध है, परन्तु सीमा क्षेत्र में मांग के अनुसार व्यापारियों को भूटानी मुद्रा में लेन देन करना पड़ता है। अन्यथा उनका व्यापार ठप्प हो जाएगा। ग्राहक जो भी मुद्रा दें, उसे स्वीकार करना उनकी मजबूरी है। हमने थिम्पू में भारतीय मुद्रा से ही खरीदी की। दुकानों का संचालन अधिक औरते ही करती हैं और टीवी पर भारतीय गानों के फ़िल्में भी देखती हैं। इसके कारण उन्हें हिन्दी बोलने एवं समझने में कोई अत्यधिक परेशानी नहीं होती। 
भूटानी दुकान के समक्ष ब्लॉगर
थिम्पू के बाजार में शराब के लिए कोई अलग से दुकान नहीं है। किराने की दुकानों में शराब मिलती है। कोई भी बालिग व्यक्ति शराब खरीद सकता है। लोग राशन के साथ शराब खरीदते हैं। भूटान की लोकल शराब "टॉकिन" है, जिसमें अल्कोहल 16% है। रेड वाईन जैसी इस शराब का प्रचलन अधिक है और इसे बिना पानी या सोडा के इस्तेमाल किया जाता है। कुछ कुछ आयूर्वैदिक आसव जैसा स्वाद है। साथ ही सस्ती भी है। 750 एम एल की एक बोतल 140 रुपए मे मिल जाती है। मेरे सामने ही कुछ भूटानी महिलाएं राशन के साथ एक-एक बोतल टॉकिन खरीद कर ले गई। 
एक दृश्य
रिसोर्ट में आने के बाद हम लोगों का भोजन बन कर तैयार हो गया था। भोजन करने के उपरांत हमने अपने बिस्तर की शरण ली। बाहर ठंड बढ रही थी। रिसोर्ट के केयर टेकर कह रहे थी कि आज की रात पारा - 14 पार कर जाएगा। ब्लू पाईन की लकड़ी से रुम का फ़र्श एवं दीवारे बने होने के कारण रुम गर्म था तथा वाताकूलन की व्यवस्था भी थी। बैड के गद्दे में लगे हीटर का बटन चालु करके सो गए तो रात को रजाई में पसीने आ गए। कुल मिला कर ठंड से बचने का इंतजाम उम्दा था। मैदानी लोगों को पहाड़ की ठंड बर्दास्त नहीं होती। अब बाकी कल देखा जाएगा। आज की रात तो गुलजार हो कर गुजर रही है। ……… जारी है, आगे पढ़ें 

शुक्रवार, 9 मई 2014

कौड़ी, तू कितने कौड़ी की?

प्राचीन स्थलों पर उत्खनन के दौरान अन्य वस्तुओं के साथ कौड़ियाँ, शंख, सीप भी पाई जाती हैं। इससे जाहिर होता है कि ये मानव जीवन का अहम हिस्सा थी। शंखों से चूड़ियाँ बनाई जाती थी तो सीप और छोटी शंखियाँ आभुषण के रुप में प्रयुक्त होती थी। इनमें कौड़ियों का अहम भूमिका थी। मानव ने जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समाज का निर्माण किया और समूहों में रहने लगा। जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की वस्तु के लिए चोरी डकैती करने की बजाए उसने  विनिमय के तौर पर वस्तुओं का आदान-प्रदान किया। स्वयं के पास आवश्यकता से अधिक कोई वस्तु उपलब्ध होने पर अन्य आवश्यक वस्तु से बदला किया। वस्तु विनिमय में बहुत जटिलताएं थी, वस्तु के योग्य मूल्य नहीं मिल पाता था तथा संचयन आदि की आवश्यकता को देखते हुए विनिमय के लिए मुद्रा की आवश्यकता हुई, तब उसने कौड़ियों का इस्तेमाल विनिमय के लिए प्रारंभ किया होगा।

ऐसा नहीं है कि कौड़ियाँ उन्हे सहज ही उपलब्ध हो जाती थी। प्राप्त करने के लिए श्रम करना पड़ता था। कौड़ी जल में पाए जाने वाले जीव (घोंघा) की एक प्रकार की जाति गैस्ट्रोपोडा की उपजाति प्रोसेब्रैकिया है। कौड़ी इस जीव का अस्थिकोश है। यह कुबड़ा खोल रंगीन एवं चमकीला होता है तथा विभिन्न आकृतियों में पाया जाता है। कौड़ियाँ प्राय: हिन्द एवं प्रशांत महासागर के तटीय जल में पाई जाती हैं। रंगीन कौड़ी को प्रशांत महासागर क्षेत्रीय राजा आभुषण के तौर धारण करते थे तथा अफ़्रीका एवं भारत में मुद्रा के तौर पर प्रचलित थी। कौड़ियों की खास पहचान होती है, कौड़ियों के 165 प्रकारों में कुछ प्रयोग ही मुद्रा के तौर होता था। सिर्फ़ "मनी कौड़ी" एवं "रिंग कौड़ी" मे से मनी कौड़ी पीली या हल्के पीले रंग की होती है। भारत एवं एशिया में इसका ही मुद्रा के तौर पर चलन था।

कौड़ियों के विनिमय का मापदंड तय करके लागु किया गया। जिसे विभिन्न कालों में पृथक-पृथक नामों से जाना जाता था। लगभग 3000 से 4500 वर्ष पहले, मध्य चीन में कौड़ी को मुद्रा का प्रारंभिक रूप माना जाता है, मार्कोपोलो ने अपनी चीन यात्रा के दौरान कौड़ियों का प्रयोग मुद्रा के तौर पर होते देखा। अफ़्रीका तथा युरोप के देशों में मुद्रा के तौर पर कौड़ियों का चलन रहा है। मालद्वीप को "कौड़ियों का देश" कहा जाता था इस स्थान से जहाजों भर कर कौड़ियाँ युरोप के देशों में ले जाई जाती थी। यदि मालदीव कौड़ियों को इकठ्ठा करने का केंद्र था तो भारत उनके वितरण का केंद्र था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ज़माने में भारत में हर वर्ष चालीस हजार पौंड के मूल्य की कौड़ियों का आयात किया जाता था। मुद्रा के तौर पर इसका चलन भारत में 20 वीं शताब्दी में सन् 1939 ईस्वीं तक था। 

प्रारंभिक मुद्रा के रुप में कौड़ियों का प्रचलन था। धातू के सिक्के आने के बाद इसके मानक तय किए गए। भविष्य पुराण में मजदूरों को पारिश्रमिक देने का उल्लेख मिलता है। उस काल में मजदूरी "पण" मुद्रा के रुप में दी जाती थी। बीस कौड़ी की एक कांकिणी और चार कांकिणी का एक "पण" माना गया। मेवाड़ राज्य में  २० भाग = १ कौड़ी, २० कौड़ी = आधा दाम, २ आधा दाम = १ रुपया माना जाता था। सर जॉन माल्कन के अनुसार  ४ कौड़ी = १ गण्डा, ३ गण्डा = १ दमड़ी, २ दमड़ी = १ छदाम,  २ छदाम = १ रुपया (अधेला), ४ छदाम = १ रुपया = ९६ कौड़ी मुद्रा मान था। छत्तीसगढ़ में सदियों से कोरी का मान चलता है, जिससे कौड़ी का भ्रम होता है। पर एक कोरी का मान 20 है और सारी गणना इसके आगे पीछे ही चलती है, जैसे दू आगर 10 कोरी = 202 या फ़िर पाँच कम 10 कोरी = 95 की संख्या होती है।

कौड़ियों ने मानव की सभ्यता के साथ एक लम्बा सफ़र तय किया है। इसके प्रचलन के बाद ही धातुओं के सिक्के विनिमय के लिए प्रयोग में आए। तांबे, चाँदी एवं सोने ने सिक्के का रुप लेकर मुद्रा का स्थान प्राप्त कर लिया और कौड़ी चलन से बाहर हो गई। परन्तु इसका प्रयोग वर्तमान में भी मांगलिक कार्यों एवं श्रृंगार के तौर पर हो रहा है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में आज भी कौड़ियों का उपयोग होता है। अहिर जाति इसे अपने अंग वस्त्रों में लगाकर सौंदर्य वृद्दि करती है वहीं आदिवासी अंचल में नृत्य के समय कलाकार कौड़ियों के आभुषण धारण कर सौंदर्य वृद्धि करते हैं। भारत के अन्य प्रदेशों में भी कौड़ियों का प्रयोग होता है। किसी न किसी तरह से कौड़ी मानव की जीवन यात्रा में भौतिकता के इस दौर में भी सम्मिलित है।

कहावतों में कौड़ियाँ भी ढल गई, दो कौड़ी का आदमी, इससे तात्पर्य है वह आदमी किसी काम का नहीं है। दौ कौड़ी में भी मंहगा है, अर्थात अनुपयुक्त है, कोई काम का नहीं है। फ़ूटी कौड़ी  एवं कानी कौड़ी आदि कहावतों से जाहिर होता है विनिमय के लिए फ़ूटी कौड़ी एवं कानी (छिद्र युक्त) कौड़ी को दोषपूर्ण माना जाता था। जिस तरह वर्तमान में खोटा सिक्का या कटा फ़टा नोट समझा जाता है। दूर की कौड़ी लाना अर्थात कोई महत्वपूर्ण वस्तु, सुझाव या जानकारी लाना। इससे जाहिर होता क्षेत्र के अलावा अन्य कहीं दूरस्थ स्थान से बेहतरीन स्तर की कौड़ी भी लाई जाती थी। इस तरह कई तरह की कहावतों में कौड़ियों का इस्तेमाल हुआ है। 

कौड़ी से पासे का खेल खेला जाता था और खेला भी जाता है। अभी भी गावों में समय व्यतीत करने एवं मनोरंजन के लिए कौड़ियों से तीरी-पासा खेला जाता है। कौड़ी एवं सीपों अब घर सजाने के लिए विभिन्न तरह के सजावटी बंदनवार, तोरण, हैंगर इत्यादि बनाए जाने लगे हैं। कौड़ी को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। त्यौहारों में विवाहादि मांगलिक अवसरों पर कौड़ी का चलन अब भी कायम है। भले ही कौड़ी मुद्रा के रुप में चलन से बाहर हो गई हो पर कहावतों एवं लोकसंस्कृति में लोक के जनमानस में अभी भी श्रद्धा की पात्र बनी हुई है।चाहे कितना भी सांस्कृतिक बदलाव आ जाए पर कौड़ी प्राचीन काल से लेकर अब तक मानव के साथ जुड़ी हुई है। कौड़ी से बिछुड़ने की सोचना भी दूर की कौड़ी है।